एआई के बढ़ते उपयोग से कोडिंग और प्रोग्रामिंग में भारतीय नौकरियां पर पड़ेगा असर, बनानी होगी नई रणनीति

एक तरफ जहां दुनियाभर में इस बात की पुरजोर वकालत की जा रही है कि एआई के आगमन से आईटी इंडस्ट्री में नया बूम आ जाएगा तो दूसरी तरफ गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भरे बाजार और बढ़ती कानूनी दुविधाओं से जूझते हुए, भारतीय आईटी कंपनियां अपने मार्जिन को बचाने के लिए 'दबाव' महसूस कर रही हैं और अपने मुनाफे में सुधार के लिए तेजी से ऑटोमेशन प्लेटफार्मों की ओर झुक रही हैं। दुनिया के बड़े टेक्नोलॉजी दिग्गजों के भी इसे लेकर अपने-अपने मत हैं। आईबीएम की एग्जीक्यूटिव चेयरमैन गिन्नी रोमेटी का कहना है कि "कुछ लोग इसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता कहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह तकनीक हमें बेहतर बनाएगी। इसलिए मुझे लगता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बजाय हम अपनी बुद्धिमत्ता को बढ़ाएंगे।" एलन मस्क, जो भविष्य की तकनीकों पर अरबों डॉलर खर्च करने के लिए जाने जाते हैं, मानवता के लिए इसे सबसे बड़ा खतरा बताते हैं।

मौजूदा समय में एआई के विकास के साथ भारतीय आईटी क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। एक्सपर्ट मानते हैं कि नई तकनीकों को अपनाने और एकीकृत करने की क्षमता ही तय करेगी कि क्या ये कंपनियां संभावित खतरों को विकास के अवसरों में बदल सकती हैं ? इसे लेकर अधिकतर कंपनियां और टेक दिग्गज आशान्वित हैं। वह मानते हैं कि मौजूदा घटनाक्रम ऐसे भविष्य का संकेत देते हैं जहां एआई न केवल आईटी कंपनियों की क्षमता बढ़ाएगा, बल्कि उन्हें इनोवेशन और मार्केट में नेतृत्व करने के नए रास्ते भी खोलेगा।

आईटी क्षेत्र न केवल एक प्रमुख नियोक्ता है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता भी है। यह जीडीपी में 7% का योगदान करता है और कुल निर्यात का लगभग एक-चौथाई हिस्सा इसी से आता है। हालांकि, एआई के ऑटोमेशन की क्षमता, दक्षता के संदर्भ में आशाजनक है, लेकिन इससे आर्थिक संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव भी हो सकते हैं। कैपिटल इकोनॉमिक्स के अनुसार, यदि एआई इस क्षेत्र में मानव नौकरियों को पूरी तरह से प्रतिस्थापित कर देता है, तो अगले दशक में भारत की जीडीपी वृद्धि दर में लगभग एक प्रतिशत की गिरावट हो सकती है।

एआई दुनिया भर में अर्थव्यवस्थाओं और उद्योगों में बदलाव ला रहा है। भारत के विकसित भारत 2047 के विजन और समावेशी विकास हासिल करने के क्रम में एआई महती भूमिका निभा रहा है। अर्थव्यवस्था में 500 बिलियन डॉलर का योगदान करने की क्षमता के साथ, AI कृषि, स्वास्थ्य सेवा और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला सकता है। एआई न केवल इनोवेशन में बड़ा योगदान दे रहा है, बल्कि भारत की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों को हल करने के लिए एक रणनीतिक टूल साबित हो रहा है।

तमाम संभावनाओं के बीच एआई को लेकर चुनौतियां भी बनी हुई हैं। भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी स्किल गैप और असमानताओं से जूझ रही है। भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में कहा कि वैश्विक तकनीकी महाशक्ति बनने के लिए, हमें स्वास्थ्य, शिक्षा, स्मार्ट शहरों और कृषि में चौथी औद्योगिक क्रांति प्रौद्योगिकियों का लाभ उठाने के लिए सभी हितधारकों से सहयोग की आवश्यकता है।

टैग्सलैब के संस्थापक हरिओम सेठ कहते हैं कि भारतीय आईटी क्षेत्र में स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप एआई आधारित समाधानों को बनाने की अपार संभावनाएं हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में क्षेत्रीय स्तरों पर समाधान दिए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए दूरदराज के क्षेत्रों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं, वहां एआई के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाई जा सकती है। कृषि में छोटे किसानों को एआई की सहायता से सटीक कृषि तकनीकों का प्रदर्शन करके लाभान्वित किया जा सकता है।

डिजिटल एमिनेंट के संस्थापक मुकुल राज शर्मा कहते हैं कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं आमतौर पर कृषि, विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला वाले टास्क को पूरा करने के लिए कई तरह की परेशानियों से जूझती हैं। भारतीय आईटी कंपनियां एआई-आधारित समाधान विकसित करके इन क्षेत्रों में क्रांति ला सकती हैं। देश की बड़ी आबादी अभी भी बैंकिंग सेवाओं से वंचित है या उन्हें सीमित पहुंच प्राप्त है। भारतीय आईटी कंपनियां एआई का उपयोग करके इन लोगों तक वित्तीय सेवाएं पहुंचा सकती हैं। एआई का उपयोग करके संदिग्ध लेनदेन की पहचान और रोकथाम की जा सकती है, जिससे डिजिटल भुगतान प्रणाली में विश्वास बढ़ेगा और इसका व्यापक उपयोग संभव होगा।

अमेरिका में एक तिहाई आईटी प्रोग्रामर्स की नौकरी खतरे में

हाल के वर्षों में, अमेरिका में प्रोग्रामर्स की संख्या में उल्लेखनीय कमी देखी गई है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है। अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में प्रोग्रामर्स की संख्या में लगभग 27% की गिरावट आई है, जो मुख्यतः ChatGPT जैसे AI टूल्स के आगमन के साथ मेल खाती है।

भारतीय आईटी उद्योग पर प्रभाव

भारतीय आईटी उद्योग में बड़ी संख्या में प्रोग्रामर्स कार्यरत हैं, और अमेरिका में आई इस गिरावट से भारतीय आईटी नौकरियों पर संभावित प्रभाव के बारे में चिंताएं बढ़ रही हैं। AI और ऑटोमेशन के बढ़ते उपयोग से कोडिंग और प्रोग्रामिंग से संबंधित कार्यों की मांग में कमी आ सकती है, जिससे भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं। आईटी पेशेवरों को AI, मशीन लर्निंग, डेटा एनालिटिक्स, और साइबर सुरक्षा जैसे उभरते क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक है। इससे वे बदलते तकनीकी परिदृश्य में प्रासंगिक बने रह सकते हैं। कंपनियों को अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाना चाहिए ताकि वे नई तकनीकों के विकास और कार्यान्वयन में अग्रणी बन सकें।

कानूनी ढांचों और अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखने की आवश्यकता

कापी मशीन के हेड ऑफ मार्केटिंग अनुराग दास कहते हैं कि भारत में फिलहाल एआई के लिए कोई एकीकृत कानूनी ढांचा नहीं है। इस कारण से कारोबार में अनिश्चितता का माहौल बनता है। इसके विपरीत, यूरोपीय संघ में एआई अधिनियम मौजूद है, जिसका फायदा कंपनियों को काम करने में मिलता है। इसके बनिस्पत भारत में एआई नियमों में अनिश्चितता का असर इनोवेशन पर पड़ सकता है, क्योंकि कारोबारी बिना स्पष्ट दिशानिर्देशों के भारी-भरकम निवेश करने से हिचकिचाते हैं। एआई एल्गोरिदम डेटा-आधारित होते हैं। भारत का पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा है, कई बार विलंबित और संशोधित हुआ है। इस बिल में शामिल प्रावधान जैसे कि डेटा लोकलाइजेशन, सहमति, क्रॉस-बॉर्डर डेटा ट्रांसफर, ये सभी प्रावधान एआई के विकास और उपयोग को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं। खासकर उन व्यवसायों पर इसका अधिक असर पड़ सकता है, जो अंतरराष्ट्रीय डेटा सेट पर निर्भर हैं। इसके अलावा, संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा को संभालने वाले एआई सिस्टम के साथ पीडीपी बिल को कैसे एकीकृत किया जाएगा, इस पर भी गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं।

40 फीसद काम कर रहा है एआई

हरिओम सेठ के अनुसार विभिन्न अनुमानों के अनुसार, भारत में आईटी पेशेवरों द्वारा किए जाने वाले लगभग 40-50% कार्य एआई के माध्यम से ऑटोमेटेड किए जा सकते हैं। इनमें मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर टेस्टिंग, डेटा एंट्री, और कस्टमर हेल्प जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। एआई के कारण कुछ भूमिकाएं समाप्त हो रही हैं। साथ ही, एआई डेवलपमेंट, डेटा साइंस और एआई कंसल्टिंग में नई नौकरियां उत्पन्न हो रही हैं। ईवाई इंडिया की रिपोर्ट 'भारत का एआई आइडिया: 2025 में कहा गया है कि भारतीय उद्योगों में 24% कार्य पूरी तरह से स्वचालित किए जा सकते हैं, जबकि 42% कार्य एआई की सहायता से अधिक प्रभावी बनाए जा सकते हैं। इससे ज्ञान आधारित क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए प्रति सप्ताह 8 से 10 घंटे का अतिरिक्त समय उपलब्ध हो सकता है। उद्योगों के संदर्भ में, सेवा क्षेत्र में सबसे अधिक उत्पादकता वृद्धि की संभावना है क्योंकि इसमें श्रम की हिस्सेदारी अधिक है। इसके विपरीत, विनिर्माण और निर्माण क्षेत्रों में एआई का अपेक्षाकृत कम प्रभाव देखने को मिलेगा।

आईटी सेक्टर का वर्तमान जॉब मार्केट

नैस्कॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय आईटी क्षेत्र में लगभग 4.5 मिलियन पेशेवर कार्यरत हैं, जिसकी वृद्धि दर 7-8% प्रति वर्ष है। 2025 तक इस क्षेत्र का राजस्व 350 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। मैकेंजी की एक रिपोर्ट का अनुमान है कि भारत में आईटी पेशेवरों द्वारा किए जाने वाले लगभग 50-60% कार्यों को एआई और अन्य तकनीकों का उपयोग करके स्वचालित किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप पिछले दो वर्षों में इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में नौकरियां खत्म हुई हैं।

एआई ने आईटी क्षेत्र में कई नौकरियों की जगह ले ली है। इन बदलाव की सफलता दर मिश्रित रही है। गार्टनर की एक रिपोर्ट में पाया गया कि भारत में लगभग 30% एआई परियोजनाएं डेटा क्वालिटी के मुद्दों, विशेषज्ञता की कमी और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे जैसे विभिन्न कारणों से अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहीं। हालांकि, सफल एआई कार्यान्वयन से उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि और बचत हुई है। उदाहरण के लिए, एक्सेंचर के एक अध्ययन में पाया गया कि आईटी क्षेत्र में एआई-संचालित ऑटोमेशन से परिचालन लागत में 30-40% की कमी आ सकती है।

एआई कंप्यूटर और सेमीकंडक्टर इंफ्रास्ट्रक्चर

भारत अपनी बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था का समर्थन करने के लिए तेजी से एक मजबूत एआई कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है। 2024 में इंडिया एआई मिशन की मंजूरी के साथ, सरकार ने एआई क्षमताओं को मजबूत करने के लिए पांच वर्षों में 10,300 करोड़ रुपये आवंटित किए। इस मिशन का एक प्रमुख फोकस 18,693 ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPU) से लैस एक उच्च-स्तरीय सामान्य कंप्यूटिंग सुविधा बनाना है। इससे भारत वैश्विक स्तर पर सबसे व्यापक AI कंप्यूटर इन्फ्रास्ट्रक्चर बना सकता है। यह क्षमता ओपन-सोर्स AI मॉडल डीपसीक की तुलना में लगभग नौ गुना और चैटजीपीटी द्वारा संचालित क्षमता का लगभग दो-तिहाई है।

जेनरेटिव एआई का उभार

व्यूहा मेड के सीईओ और सीओओ धृतिमान मलिक कहते हैं कि भारत की आईटी सर्विसेज के बदलाव के केंद्र में है जनरेटिव एआई। यह भारतीय टेक सेक्टर को फिर से परिभाषित करने के लिए तैयार है। सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में जनरेटिव एआई का तेजी से बढ़ना एक बड़ा फैक्टर है। यह तकनीक उन व्यक्तियों को भी सक्षम बनाती है, जिनके पास सीमित कोडिंग अनुभव है। कुछ ही दिनों में एप्लिकेशन विकसित किया जा सकता है। यह कार्य पहले महीनों तक आउटसोर्स करना पड़ता था। सॉफ्टवेयर विकास में यह निस्संदेह महत्वपूर्ण है, और इसके दूरगामी प्रभाव हैं।

आउटसोर्सिंग मॉडल को चुनौती

मलिक कहते हैं कि एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां एआई में निपुण फ्रीलांसर प्रमुख आईटी कंपनियों की तुलना में काफी कम दरों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह केवल व्यावसायिक संरचना में बदलाव नहीं है। यह स्टार्टअप्स की इनोवेशन क्षमता का प्रमाण भी है, जिससे वे स्थापित कंपनियों को चुनौती दे रहे हैं। हालांकि, आईटी दिग्गजों ने वर्षों में जो मजबूत नेटवर्क बनाए हैं, उन्हें तुरंत समाप्त करना आसान नहीं होगा। एआई के उपयोग में निष्पक्षता और पक्षपात से जुड़े नैतिक प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं। यह आवश्यक है कि एआई सिस्टम का उपयोग जिम्मेदारीपूर्वक किया जाए।

भारत में अभी तक एआई नियामक ढांचा नहीं

सेठ कहते हैं कि भारत में अभी तक एक व्यापक एआई नियामक ढांचा नहीं है। इससे एआई व्यवसायों और इसके विकास में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। एआई सिस्टम से संबंधित डेटा की सुरक्षा और एआई द्वारा होने वाली संभावित हानियों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

उभरते अवसर, जहां हम बढ़त बनाए रखेंगे

तमाम चुनौतियों के बारे में बात करने के बाद, भारतीय आईटी सेक्टर भी इसे अवसर के तौर पर ले सकता है। अक्सर कहा जाता है कि हर संकट एक अवसर भी होता है। आइए देखें कि इस अफरा-तफरी भरे समय में हम किन संभावित अवसरों का लाभ उठा सकते हैं।

सस्ते समाधान के साथ ग्लोबल साउथ हमारे नए बाजार हो सकते हैं

भारतीय आईटी इंडस्ट्री ने दशकों तक अपनी सेवाओं को विकसित देशों मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप को प्रदान करके वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। हालांकि, आज की दुनिया में तकनीकी परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एआई सक्षम समाधान भारत के आईटी सेक्टर को केवल विकसित देशों तक सीमित रखने के बजाय ग्लोबल साउथ अफ्रीका, दक्षिण एशिया, लैटिन अमेरिका और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में नए अवसरों की ओर ले जा सकते हैं।

भारत की विस्तृत सर्विस डिस्ट्रीब्यूशन क्षमताएं और तकनीकी कौशल इसे उभरते बाजारों में सुलभ, किफायती और उच्च गुणवत्ता वाले समाधान प्रदान करने में सक्षम बनाते हैं। ये क्षेत्र तेजी से डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन कई बार अत्यधिक महंगे पश्चिमी समाधान उनके लिए सुलभ नहीं होते। भारत के पास कम लागत पर एआई-समर्थित टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म बनाने की क्षमता है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वित्त और ई-कॉमर्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं। इसके अतिरिक्त, भारत सरकार की नीतियां, जैसे "मेक इन इंडिया" और "डिजिटल इंडिया", एआई और आईटी इनोवेशन को बढ़ावा दे रही हैं। भारतीय कंपनियां अब न केवल कस्टमाइज़्ड सॉल्यूशंस विकसित कर सकती हैं, बल्कि इन्हें स्थानीय जरूरतों के हिसाब से ढालकर उभरते बाजारों में तेजी से अपना सकती हैं। एआई के नेतृत्व में भारतीय आईटी उद्योग के लिए ग्लोबल साउथ एक नया व्यापारिक क्षितिज बन सकता है। सही रणनीति और निवेश के साथ, भारत उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक प्रमुख टेक्नोलॉजी पार्टनर के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।

भारतीय शिक्षा प्रणाली में एआई के साथ क्रांति लाई जा सकती है: भारत को एआई सक्षम शिक्षा सेवाओं में भारी निवेश करना शुरू करना चाहिए ताकि हमारी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक का समाधान किया जा सके। यह स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर भी लागू होता है।

कौशल मजबूत कर उच्च वेतन सुनिश्चित करना: बड़ी समस्या है कि अधिक प्रतिभाशाली और सक्षम लोगों का वेतन बढ़ता रहेगा और कम वेतन पाने वाले लोग सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इस प्रवृत्ति का मुकाबला करने के लिए, हमें लोगों को कौशल बढ़ाना चाहिए।

विकास का समय, लागत और प्रयास बहुत कम हो जाएगा: कोड/सॉफ्टवेयर विकसित करने का समय तेजी से कम हो जाएगा। Github के लिए को-पायलट और अन्य IDE सपोर्टिंग Ai टूल के साथ, अधिक से अधिक कोडर्स की आवश्यकता तेजी से कम हो सकती है। कम कोड और प्रोडक्टाइजेशन/SaaS आदि के साथ, कस्टम कोड विकसित करने की आवश्यकता लगातार कम होती गई।

डेटा प्रोसेसिंग के कामों में लाभकारी साबित होगा एआई

नियमित कार्यों को ऑटोमेटेड करने की AI की क्षमता कॉल सेंटर और बुनियादी डेटा प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रभावशाली है। उदाहरण के लिए, चैटजीपीटी जैसे AI टूल के लांच होने के बाद से लेखन कार्यों की आय में गिरावट देखी गई है। यह बदलाव केवल आईटी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ग्राफिक डिज़ाइन जैसे रचनात्मक क्षेत्रों को भी प्रभावित करता है, जहां AI ने उत्पादन की लागत और समय को कम करके पारंपरिक भूमिकाओं को कम करना शुरू कर दिया है।

उदाहरण के लिए, इंफोसिस ने अपने संचालन में एआई डिवाइस का इस्तेमाल किया है, जिससे कथित तौर पर कुछ विकास कार्यों के लिए आवश्यक समय में 30% तक की कमी आई है।

भविष्य की चिंताएं

आईटी क्षेत्र में एआई का बढ़ता उपयोग भारत में काम के भविष्य को लेकर कई चिंताएं पैदा करता है। कुछ प्रमुख मुद्दे जिन पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, वे हैं:

1. नौकरी विस्थापन: आईटी क्षेत्र में नौकरियों के ऑटोमेशन से महत्वपूर्ण नौकरी विस्थापन हो सकता है, विशेष रूप से एंट्री लेवल और मीडियम लेवल के पेशेवरों के लिए।

2. स्किल गैप: भारतीय आईटी क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और संबंधित तकनीकों की मांग तेजी से बढ़ रही है। कंपनियां अब मशीन लर्निंग (ML), डेटा एनालिटिक्स, क्लाउड कंप्यूटिंग, और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले पेशेवरों की तलाश कर रही हैं। हालांकि, मौजूदा शिक्षा प्रणाली कई बार इंडस्ट्री की नवीनतम आवश्यकताओं के साथ तालमेल नहीं रख पाती, जिससे एक महत्वपूर्ण स्किल गैप पैदा हो रहा है।

इसके अतिरिक्त, नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज (NASSCOM) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वर्ष 2026 तक एआई और डेटा साइंस में करीब 14-16 लाख पेशेवरों की आवश्यकता होगी, लेकिन मौजूदा शिक्षा प्रणाली केवल एक तिहाई आवश्यक स्किल्स को पूरा कर पा रही है।

3. डेटा की गुणवत्ता और नियामक ढांचा: एआई मॉडल की सटीकता और विश्वसनीयता इस पर निर्भर करती है कि उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए किस गुणवत्ता के डेटा का उपयोग किया गया है। यदि डेटा अधूरा, गलत, पक्षपाती या असंगत होता है, तो इससे एआई मॉडल में भी पूर्वाग्रह आ सकता है। ऐसे पक्षपाती एआई मॉडल न केवल गलत निर्णय लेते हैं, बल्कि वे सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को भी बनाए रख सकते हैं या उन्हें बढ़ा सकते हैं। भारत में एआई के लिए स्पष्ट नियामक ढांचे का अभाव व्यवसायों और व्यक्तियों दोनों के लिए अनिश्चितता और जोखिम पैदा कर सकता है।

4. आईटीईएस और बीपीओ को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है: बीपीओ (बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग) उद्योग मुख्य रूप से टेक्स्ट, वॉयस और दस्तावेज़ प्रसंस्करण को संभालने के बारे में है। एलएलएम आधारित समाधानों का इस सेगमेंट पर सबसे मजबूत प्रभाव होगा। जैसे-जैसे कंपनियां अपने वर्कफ़्लो में एआई-सक्षम उपकरणों को एकीकृत करेंगी, उत्पादकता बढ़ेगी और सेवा दरें घटेंगी। इससे भारतीय बीपीओ कंपनियों के लिए मूल्य प्रतिस्पर्धा की चुनौती बढ़ जाएगी। हरिओम सेठ कहते हैं कि मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत में लाखों नौकरियां स्वचालित हो सकती हैं, जिनमें आईटीईएस/बीपीओ क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होगा। ऐसे में पूरी तरह से स्वचालन के बजाय "ह्यूमन-इन-द-लूप" दृष्टिकोण अपनाना होगा, जहां जटिल मामलों को इंसानों द्वारा प्रबंधित किया जाए और सरल कार्यों को एआई संभाले।

5. हमारे उद्योग को नए उपकरणों और मानसिकता के साथ तैयार होना होगा: भारतीय आईटी क्षेत्र को इन क्षमताओं का लाभ उठाने और प्रतिस्पर्धी बनने के लिए बड़ी मात्रा में एआई इनेबल डिवाइस, सिस्टम और प्रक्रियाएं विकसित करनी होंगी। परंपरागत रूप से हमारी ताकत इनोवेशन के बजाय प्रक्रियाओं में रही है। यदि भारतीय आईटी कंपनियां एआई-इंटीग्रेटेड वर्कफ़्लो में निवेश नहीं करतीं, तो प्रतिस्पर्धी देश (जैसे – वियतनाम, फिलीपींस) वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं। एक्सपर्ट मानते हैं कि भारतीय आईटी उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बने रहने के लिए एआई इनेबल डिवाइस, देशी इनोवेशन, और डिजिटल चेंज को अपनाने की आवश्यकता है। यदि कंपनियां समय रहते अपनी रणनीति में बदलाव नहीं करतीं, तो उन्हें विदेशी एआई डिवाइस पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसका प्रतिकूल प्रभाव होगा। इससे न केवल लागत बढ़ेगी, बल्कि वैश्विक बाजार में उनकी पकड़ भी कमजोर हो सकती है।

6. गुणवत्ता पहलू : आईटी क्षेत्र में एआई-संचालित समाधानों की गुणवत्ता चिंता का विषय रही है। कैपजेमिनी की एक रिपोर्ट में पाया गया कि भारत में लगभग 70% एआई-संचालित समाधानों को गुणवत्ता में सुधार करना होगा। इन चिंताओं को दूर करने के लिए, कई भारतीय आईटी कंपनियां एआई अनुसंधान और विकास में भारी निवेश कर रही हैं, साथ ही अपने कर्मचारियों को एआई और संबंधित प्रौद्योगिकियों में प्रशिक्षण और कौशल प्रदान कर रही हैं।