नेता कोई भी हो, सबके भाषणों से गायब हैं जनता के असल मुद्दे ‘

मुल्क में नए किस्म की सियासत यानी मुद्दाविहीन राजनीति का दौर चल पड़ा है जिसमें सियासी दलों को तो फायदा हो रहा है। पर इस चलन से आवाम का कितना नुकसान हो रहा है, ये राजनेता अंदाजा नहीं लगा सकते। दरअसल, जनहित की राजनीति में मुद्दा जहां महंगाई-रोजगार का होना चाहिए, वहां धर्म-समुदाय के नाम पर जनता को आपस में भिड़ाया जा रहा है। कमोवेश, मौजूदा समय के पांच राज्यों के चुनावी हुड़दंग में चकल्लस ऐसी ही मची हुई है। चुनावी मौसम को चुनावी हुड़दंग इसलिए कहा जाने लगा है क्योंकि आमजन के मुद्दों के जगह अब सिर्फ बिना वजह का शोर होता है। सियासी भाषणों से जमकर ड्रामा हो, उसकी पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी होती है जिसका मुख्यालय दिल्ली है।


राजधानी में सियासी पार्टियों के जितने के भी मुख्यालय हैं वहां आजकल इसी की पाठशाला लगती है। सप्ताह में करीब दो बार प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश में चुनावी सभा करने पहुंच रहे हैं। वहां कुछ ऐसा बोलकर चले आते हैं जिससे माहौल एकाध दिनों तक चर्चाओं में रहता है। पिछले सप्ताह शाहजहांपुर में योगी को यूपी का उपयोगी बोल आए थे और उसके पिछले सप्ताह लाल टोपी बोलकर हंगामा कटवा दिया था। यूपी चुनाव में इस समय लाल टोपी, जालीदार टोपी, धर्म-धर्मांतरण, जिन्ना आदि के मसले ही तो गर्म हैं। दालों का रेट आसमान छू रहा है, ईंधन की कीमतें, रोजमर्रा की वस्तुएं आपे से बाहर हैं, बावजूइ इसके कोई राजनेता बोलने को राजी नहीं है।


बहरहाल, चुनाव जैसे-जैसे अपने रंगत में आता जा रहा है, कोरोना भी जोर मारने लगा है। कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्र सरकार ने करीब दर्जन भर राज्यों में रात्रि कर्फ्यू लगाया है जिनमें ज्यादातर वो राज्य हैं जिनमें चुनाव नहीं हैं। सिर्फ उत्तर प्रदेश में रात्रि कर्फ्यू की घोषणा हुई है। कहीं भाजपा की जबरदस्त तैयारियों पर कोरोना पानी ना फेर दे। चुनाव कहीं वर्चुअल तरीके से ना कराने पड़ जाएं। दिल्ली में बीते एक सप्ताह से रोजाना कोरोना संक्रमण के केस बढ़ रहे हैं। दिल्ली ही क्या पूरे देश में यही हाल है। संक्रमणों और मरने वालों की संख्या में भी एकाएक बढ़ोतरी हुई है। कोरोना के नए वेरिएंट ओमिक्रोन ने अपने शुरुआती चरण में ही हंगामा बरपा दिया है। इसलिए दिल्ली में मुख्य चुनाव आयोग के कार्यालय में सुगबुगाहट इस बात है कि शायद चुनाव आगे बढ़ाए जाएं, इसको लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त बीते दिनों उत्तराखंड के दौरे पर पहुंचे। पंजाब भी जाने वाले हैं और आज उत्तर प्रदेश गये हैं। जहां सभी जिलों के एसपी-डीएम के साथ बैठक करके स्थिति का जायजा लेंगे। चुनाव कराने के मुताबिक अगर उनसे फीडबैक अच्छा नहीं मिला तो कुछ महीनों के लिए चुनाव टाले भी जा सकते हैं। ऐसा भी हो सकता है बिहार विधानसभा चुनाव की तरह प्रचार वर्चुअल कराने का निर्णय लिया जाए। 


कोरोना की स्थिति आगे क्या रहने वाली है, किसी को पता नहीं? चिकित्सकों में भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। वो तीसरी लहर का अंदाजा अक्टूबर के आसपास लगा रहे थे। डब्ल्यूएचओ ने भी यही तुक्का मारा था, हालांकि उनका अनुमान पहली लहर में भी धराशायी हुआ था। लेकिन पिछली दोनों लहरों की टाइमिंग ठीक से देखें, तो दोनों का आगमन एक ही वक्त पर हुआ था। होली त्योहार के तुरंत बाद कोरोना ने एकदम जोर पकड़ा था। शुरुआत इन्हीं दिनों यानी दिसंबर-जनवरी से होनी आरंभ हुई थी, जो धीरे-धीरे बढ़ती गई। इस हिसाब से तो मार्च-अप्रैल के लिए हमें अभी से सतर्क होना चाहिए। केंद्र सरकार और राज्यों की हुकूमतों को अभी से कमर कस लेनी चाहिए। चिकित्सा तंत्र की उन दिनों परीक्षा होती है, उन्हें अपनी तैयारियों को अभी से दुरुस्त करना चाहिए। मौसम चुनावी है इसलिए उन राज्यों को सबसे ज्यादा गंभीर होना चाहिए, जहां चुनाव हैं। विशेषकर उत्तर प्रदेश को, जहां सियासी दलों की रैलियों में एक साथ लाखों लोगों जुट रहे हैं। क्योंकि ऐसी गलती हम पश्चिम बंगाल चुनाव में पहले कर चुके हैं। वहां बढ़ते कोरोना के बीच चुनाव संपन्न हुए थे। चुनाव खत्म होते ही पाबंदियां लगा दी गई थीं, लेकिन तब तक संक्रमण बुरी तरह फैल चुका था। यही हाल इस वक्त यूपी में है, लेकिन इस बात की कोई परवाह नहीं कर रहा। बेशक, वहां रात्रि कर्फ्यू लगा दिया है जो कोरोना रोकने का विकल्प कतई नहीं हो सकता।


स्थिति चाहे कैसी भी हो, चुनावी रैलियों में बड़े नेताओं को भीड़ चाहिए। भीड़ जुटाने का दबाव अब सिर्फ कार्यकर्ताओं के कंधों पर नहीं होता। जिले के पटवारी, तहसीलदार, लेखपाल, ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को भी लगाया जाता है। रैली से पूर्व गांव के बाहर बसों को तैनात किया जाता है, उन्हें खचाखच भरने की जिम्मेदारी इन सरकारी मुलाजिमों की ही होती है। ये बात तो काफी समय से तय हो चुकी है कि अब चुनावी रैलियों में जुटने वाली भीड़ वास्तविक नहीं होती, वह लालच देकर बुलाई जाती है। मतदाताओं को पैसे भी दिए जाते हैं, जिस जिले में रैली होती है भीड़ के लोग स्थानीय नहीं, बल्कि अन्य जिलों के होते हैं। बंगाल में इसको लेकर हंगामा भी कटा था। ममता बनर्जी सार्वजनिक रूप से भाजपा पर आरोप लगाती रहीं थीं कि उनकी रैलियों में दिखने वाले चेहरे बंगाली नहीं हैं बल्कि बहारी हैं। दरअसल, ये तस्वीरें गंदी सियासत की परिभाषा को बताने के लिए पर्याप्त हैं। साफ-सुधरी राजनीति के लिए राजनेताओं को इन हथकंड़ों से तौबा करनी चाहिए।


-डॉ. रमेश ठाकुर-






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शिक्षा बेचने का गंदा धंधा

देश के अनेक राज्यों में समय-समय पर छात्रों के लिए परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है। हर वर्ष करोड़ों की संख्या में विद्यार्थी विभिन्न प्रकार की परीक्षाएं देते हैं। स्कूलों व कोलेजों में भी बहुत प्रकार की परीक्षाएं आयोजित करवाई जाती हैं। अगर किसी अच्छे स्कूल या कॉलेज में दाखिला लेना हो तो परीक्षा देनी पड़ती है। किसी प्रकार की नौकरी प्राप्त करनी हो तो परीक्षा देनी पड़ती है, किसी कोर्स का दाखिला लेना हो तो परीक्षा देनी पड़ती है। लेकिन जब परीक्षा के भवन में नकल की जाती है तो परीक्ष प्रणाली पर एक प्रश्नचिन्ह लग जाता है। परीक्षा के दौरान नकल देश में कोई नई बात नहीं है और इसे समाज में बुरी नज़र से देखा जाता है। इसके बावजूद नकल का प्रचलन दशकों से देश के ज्यादातर हिस्सों में फल-फूल रहा है। इससे हमारी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता भी कम हो जाती है। आइए, इससे जुड़े कुछ चुनिंदा पहलुओं पर विचार करें। सबसे पहले कुछेक अभिभावक भी बच्चों को नकल करवाने के लिए चारों तरफ फिरते रहते हैं। उनके लिए उनके बच्चे का परीक्षा में हर कीमत पर पास होना इज्ज़त का सवाल बन जाता है। इसके लिए पैसे लगें, सिफारिश लगे या फिर कोई भी हथकंडा अपनाना पड़े, सब जायज होता है। आसपास का इतना दबाव होता है कि कहीं कम मार्क्स आ गए या फिर मुन्ना या मुन्नी फेल हो गई तो इज्ज़त ख़राब हो जाएगी। हमारे छात्र भी अभिभावकों के इस दबाव के कारण नकल की तरफ अग्रसर हो जाते हैं और अपनी नैसर्गिक प्रतिभा का विनाश कर बैठते हैं। पैसे बनाने के लिए खुले कुछ शिक्षा संस्थान तो नकल की गारंटी पर ही छात्रों का दाखिला करवाते हैं। कुछ बरस पहले पंजाब के बॉर्डर जिले में एक उच्च शिक्षा अधिकारी को स्कूल में नकल रोकने पर कुछ घंटे के लिए बंधक बना लिया गया था और बड़े लेवल पर हस्तक्षेप होने पर स्थिति काबू में हुई। ऐसी घटनाएं सुन कर कई बार तो ऐसा महसूस होता है कि नकल से जुड़ा सब कुछ एक बड़ा नेक्सस और चक्रव्यूह है जिसे भेदने के लिए सरीखे नेतृत्व की हम सबको जरूरत है। नकल की प्रवृत्ति एक लत है। हमारे कुछ शिक्षा संस्थान भी देश में शिक्षा की गुणवत्ता को निचले स्तर पर अपने फायदों के लिए धकेल रहे हैं। उच्च शिक्षा में भी कभी-कभी ऐसी स्थितियां देखने को मिल जाती हैं। हाल ही में मुजफ्फरपुर स्थित एक यूनिवर्सिटी में परीक्षा में नकल करने से रोकने पर छात्रों ने जमकर उत्पात मचाया। शिक्षकों के साथ मारपीट की गई। एग्जाम हॉल में एक छात्र को नकल करने के आरोप में शिक्षकों ने पकड़ा। उसे एक्सपेल्ड कर बाहर निकाल दिया। उक्त छात्र ने बाहर निकलकर अपने साथियों को कॉल कर बुला लिया।


 दर्जनों की संख्या में पहुंचे छात्र अचानक से परीक्षा हॉल में प्रवेश कर गए। फिर शिक्षक के साथ मारपीट करने लगे। आंसर शीट फाड़ने का प्रयास करते हुए जमकर उत्पात मचाने लगे। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि हम छात्रों को शिक्षित करने के साथ नकल के दुष्परिणामों के बारें में समझा नहीं पाए हैं। नकल करने की जिद पर छात्रों का इस तरह का बर्ताव समाज के लिए चिंता जताने वाला है। शिक्षकों के लिए ऐसे माहौल में परीक्षा ड्यूटी करना आसान नहीं होता। परीक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी के लिए इस नैतिक प्रहार से निपटना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। देखने में तो यह भी आता है कि नकल करना और करवाना अब पैसा कमाने का माध्यम बन गया है। अगर नकल करवानी है तो माता-पिता के पास धन होना जरूरी हो गया है। कुछ विद्यार्थी दूसरों के लिए आज भी नकल करवाने और चिट बनाने का काम करते रहते हैं। बहुत से विद्यार्थी तो ब्लू-टूथ और एसएमएस के द्वारा भी नकल करते रहते हैं। बच्चों के मूल्यांकन में भी बहुत गड़बड़ी होने लगी है। सच यह है कि कोई भी परीक्षा प्रणाली विद्यार्थी के चरित्र के गुणों का मूल्यांकन नहीं करती है। हमारी परीक्षा प्रणाली अत्यंत दोषपूर्ण है। जो परीक्षा प्रणाली केवल कंठस्थ करने पर जोर देती है, विश्लेषण और अभिव्यक्ति पर कम ध्यान देती है, वो विद्यार्थियों की योग्यता का मूल्यांकन नहीं कर सकती। हमें सतत चलने वाली परीक्षा प्रणाली को स्कूलों और कॉलेजों में विकसित करने की जरूरत है। विद्यार्थी के ज्ञान, गुण और क्षमता का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए। अकादमिक परीक्षाओं में नकल करने और करवाने वालों को सोचना चाहिए कि ऐसा कब तक चलेगा।


आगे चलकर जब किसी छात्र को कोई व्यावसायिक कार्य या फिर नौकरी पाने के लिए स्किल का प्रदर्शन करना होगा, तब वे क्या करेंगे? इसी साल फरवरी में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पेपर लीक होने के मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि ऐसी घटनाएं देश की शिक्षा प्रणाली को बर्बाद कर रही हैं। भारत में स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं में ही नहीं, सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी नकल बहुत ज्यादा बढ़ रही है और अधिकारियों को नकलार्थियों के आधुनिक तरीकों से निपटने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। राजस्थान में हाल में हुई एक परीक्षा में नकल कराने वाले गिरोह को पकड़ा गया। पूछताछ में आरोपियों ने नकल के ऐसे तरीकों का खुलासा किया जिन्हें सुनकर सब हैरान रह गए थे। परीक्षा में चप्पल और सैनिटरी नैपकिन में डिवाइस छिपाकर नकल कराने के तरीके के साथ ही अभ्यर्थियों का एग्जाम से पहले एक ट्रेनिंग सेशन भी कराया गया था। नकल करने के तरीकों में किसी अन्य के स्थान पर प्रॉक्सी कैंडिडेट के जरिए परीक्षा देना भी शामिल है जिसे कुछ लोगों ने तो अपना पेशा ही बना लिया है। इसके अलावा पेपर चुराना और उन्हें बेचना भी एक पेशेवर अपराध बन चुका है। यह शिक्षा बेचने का गंदा धंधा है। जरूरत इस बात की है कि हम सब नकल के दुष्परिणामों के बारे में बड़े स्तर पर जागरूकता मुहिम चलाएं, ठीक जैसे वातावरण और पर्यावरण को बचाने के लिए कर रहे हैं। छात्रों का भविष्य धूमिल करने के लिए स्लो प्वाइजन का काम कर रही परीक्षाओं में नकल की प्रवृत्ति हमरी शिक्षा से जुड़ी गुणवता को धीरे-धीरे खत्म कर रही है। इसके लिए जन जागरण की भी आवश्यकता है।


 हमारे छात्र इसके विरोध में खुद आगे आएं तो कमाल हो जाए। प्रण इस बात का भी लेना होगा कि नकल की बीमारी को किसी भी कीमत पर न तो सपोर्ट किया जाना चाहिए और न ही प्रमोट किया जाना चाहिए। नकल करने की प्रवृत्ति और नकल कराने की मनोवृत्ति का मूल कहां से पैदा होता है, इसे समझने की जरूरत है। नंबरों की होड़ और फेल होने का डर इसके दो बड़े कारण हैं। फेल होने के बाद निराशा का शिकार होने वाले और सार्वजनिक रूप से अपमानित होने वाले छात्रों के लिए नकल एक टॉनिक की तरह है। सभी नकल करने वाले एक जैसे होते हैं। नकल करने वालों में प्रतिभा नहीं होती। नकल करने वाले जीवन में कुछ कर नहीं पाते। जिस समाज में फेल होना अपराध होता है, वहां नकल करना सामाजिक रूप से वैधता पा जाता है। दोनों बातें एक सिक्के के दो पहलू सरीखी हैं। नकल करने की प्रवृत्ति से छात्रों का भविष्य बिगड़ रहा है। इसके लिए शिक्षा जगत से जुड़े सभी लोगों को शिक्षा के साथ जोड़ने का सकारात्मक रास्ता खोजना चाहिए, ताकि नकल कराने के लिए दीवारों पर चढ़ने की जरूरत न पड़े। हमें ऐसा कोई रास्ता निकालना चाहिए कि हमारे छात्र परीक्षा के डर से आज़ाद हों। अभिभावक भी अपने पुराने अनुभवों को बच्चों पर लादने की कोशिश से बाज आएं। अच्छा होगा कि नंबरों की होड़ पर विराम लगे। प्रतिभा और नंबर को तराजू के दोनों तरफ रखकर तौलने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाए। इसमें थोड़ा वक्त लग सकता है, लेकिन प्रवेश परीक्षाओं को आधार बनाकर या फिर नंबरों के महत्त्व को कम करके रास्ता निकाला जा सकता है।


-डा. वरिंदर भाटिया-




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घातक होगी ओमिक्रोन संक्रमण मामले में लापरवाही

देश में ओमिक्रोन के लगातार बढ़ते मामलों से दहशत का माहौल बनने लगा है। बढ़ रहे मामलों को देखते हुए फरवरी माह में कोरोना की तीसरी लहर की भविष्यवाणी की जा रही है।


ऐसे में पहले से ही रोजी-रोटी के संकट से जूझ रहे करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के साथ-साथ एक और लॉकडाउन का डर अभी से सताने लगा है। दरअसल, चंद दिनों में ही ओमिक्रोन के देशभर में 500 से भी ज्यादा मरीज सामने आ चुके हैं और यह आंकड़ा प्रतिदिन तेजी से बढ़ रहा है। इसी के चलते कुछ राज्यों द्वारा 'नाइट कर्फ्यू' लगाए जाने की शुरुआत हो चुकी है। हालांकि ओमिक्रोन को लेकर सरकार द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है कि इसमें ऑक्सीजन की जरूरत कम ही है। फिर भी संक्रमण की रफ्तार से तीसरी लहर की चिंता स्वाभाविक ही है। इन परिस्थितियों के मद्देनजर इससे निपटने के लिए समय रहते केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा प्रभावी उपाय किए जाने की सख्त आवश्यकता है।


24 नवम्बर 2021 को जहां ओमिक्रोन का पहला मामला दक्षिण अफ्रीका में सामने आया था, वहीं भारत सहित पूरी दुनिया में केवल एक महीने के अंदर ही यह 110 से भी ज्यादा देशों में फैल चुका है। इस एक महीने में दुनियाभर में इस वेरिएंट के लाखों मामले सामने आ चुके हैं। दक्षिण अफ्रीका में कोरोना संक्रमण के 95 फीसदी मामलों की प्रमुख वजह ओमिक्रोन ही है। ब्रिटेन में जहां 29 नवम्बर तक ओमिक्रोन के 0.17 फीसदी मामले सामने आ रहे थे, वहीं 23 दिसम्बर तक इसके 38 फीसदी मामले दर्ज किए गए। यही हाल अमेरिका का भी है, जहां ओमिक्रोन की वजह से संक्रमण दर में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। हाल यह रहा कि 22 दिसम्बर तक हर चौथा मामला ओमिक्रोन की वजह से आया।भारत में भी यह संक्रमण फैलने की रफ्तार काफी तेज है।


चिंताजनक स्थिति यह है कि ओमिक्रोन में अब तक कुल 53 म्यूटेशन हो चुके हैं और यह डेल्टा के मुकाबले बहुत तेजी से फैलता है। डेल्टा में कुल 18 और इसके स्पाइक प्रोटीन में दो म्यूटेशन हुए थे लेकिन ओमिक्रॉन के स्पाइक प्रोटीन में 32 म्यूटेशन हो चुके हैं। इसके रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन में भी 10 म्यूटेशन हो चुके हैं। वायरस स्पाइक प्रोटीन के जरिये ही मानव शरीर में प्रवेश करता है। लंदन के इंपीरियल कॉलेज के वायरोलॉजिस्ट डा. टोम पीकॉक के मुताबिक वायरस में जितने ज्यादा म्यूटेशन के जरिए वेरिएंट बनेगा, वह उतना ही अधिक खतरनाक होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ओमिक्रोन को कई दिनों पहले ही 'वेरिएंट ऑफ कंर्सन' घोषित करते हुए कह चुका है कि तेजी से फैलने वाला यह वेरिएंट लोगों के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है। यूके स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी के मुख्य चिकित्सा सलाहकार डा. सुसान हॉपकिंस का कहना है कि कोरोना का यह वेरिएंट दुनियाभर में प्रमुख डेल्टा स्ट्रेन सहित अन्य किसी भी वेरिएंट के मुकाबले बदतर होने की क्षमता रखता है। विशेषज्ञों के अनुसार डेल्टा वेरिएंट की आर वैल्यू 6-7 थी अर्थात् एक व्यक्ति वायरस को 6-7 व्यक्तियों में फैला सकता है। ओमिक्रोन की आर वैल्यू तो डेल्टा के मुकाबले करीब छह गुना ज्यादा है। इसका अर्थ है कि ओमिक्रोन से संक्रमित मरीज 35-45 लोगों में संक्रमण फैलाएगा।


भारत में ओमिक्रोन का पहला मामला 2 दिसम्बर को सामने आया था और उसके बाद से मूल वायरस के मुकाबले तीन गुना से भी ज्यादा तेज रफ्तार से फैल रहा है। दक्षिण अफ्रीका में ओमिक्रोन का सबसे पहले पता लगाने वाली 'साउथ अफ्रीकन मेडिकल एसोसिएशन' की अध्यक्ष डा. एंजेलिक कोएत्जी का भारत के संदर्भ में कहना है कि कोरोना वायरस के इस नए वेरिएंट के कारण यहां संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी दिखेगी। हालांकि, मौजूदा टीकों से इस रोग को फैलने से रोकने में निश्चित ही मदद मिलेगी।टीकाकरण नहीं कराने वाले लोगों को शत-प्रतिशत खतरा है। यही वजह है कि इस समय टीकाकरण पर बहुत ज्यादा जोर दिया जा रहा है और बहुत सारी सेवाओं में टीकाकरण प्रमाण पत्र को अनिवार्य किया जा रहा है। एंजेलिक कोएत्जी का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति का टीकाकरण हो चुका है या जो व्यक्ति पहले भी कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुका है, उससे संक्रमण कम लोगों को फैलेगा और टीकाकरण नहीं कराने वाले लोग वायरस को संभवतः शत-प्रतिशत फैलाएंगे।


डा. एंजेलिक कोएत्जी के मुताबिक ओमिक्रोन उच्च संक्रमण दर के साथ तेजी से फैल रहा है, लेकिन अस्पतालों में गंभीर मामले अपेक्षाकृत कम हैं। यह बच्चों को भी संक्रमित कर रहा है और वे भी औसतन 5 से 6 दिन में ठीक हो रहे हैं लेकिन ओमिक्रोन भविष्य में अपना स्वरूप बदलकर अधिक घातक बन सकता है। अधिकांश विशेषज्ञों की भांति उनका भी यही मानना है कि टीकाकरण के अलावा कोविड सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन ओमिक्रोन संक्रमण को नियंत्रित करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। लापरवाहियों के चलते भारत कोरोना की दूसरी लहर के दौरान तबाही का जो मंजर देख चुका है, ऐसे में यदि चुनावी रैलियों में सभी राजनीतिक दलों द्वारा इसी प्रकार भारी भीड़ जुटाई जाती रही तो डर यही है कि कहीं फिर से वही हालात न पैदा हों, जैसे मार्च-अप्रैल में चुनाव प्रचार के लिए पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम, पुडुचेरी राज्य विधानसभा चुनावों की रैलियों में जुटाई गई भारी भीड़ के चलते हुए थे। सवाल यह भी उठता है, जब भी ऐसे सवाल उठते हैं तो संबंधित राज्यों में नाइट कर्फ्यू जैसी पाबंदियां लगाकर कोरोना के खिलाफ सख्त कदम जैसी बातें दोहराई जाने लगती हैं लेकिन यह कैसी हास्यास्पद स्थिति है कि अधिकांश जगहों पर जहां रात में सड़कें पहले ही सुनसान रहती हैं, वहां कर्फ्यू और दिन में शादी-ब्याह जैसे समारोहों में 100-200 लोग, तो रैलियों में लाखों की भीड़ इकट्ठा करने की अनुमति होती है। अदालतें इसके लिए बार-बार फटकार लगाते हुए सचेत भी करती रही हैं किन्तु डर इसी बात का है कि कहीं महज कागजों तक ही सीमित कोरोना पाबंदियां तीसरी लहर को खौफनाक न बना दें।


-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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जिन्हें ईसा से नफ़रत है,'मसीहाई' वह क्या जानें

मानव इतिहास में ईसा मसीह का नाम प्रत्येक धर्म व जाति के लोगों द्वारा अत्यंत सम्मान से लिया जाता है। ईसाईयों का एक वर्ग ईसा को ईश्वर मानता है और प्रभु यीशु मसीह कहकर संबोधित करता है तो दूसरा वर्ग उन्हें ख़ुदा का बेटा इसलिये कहता है क्योंकि उनका जन्म अविवाहित व पवित्र मां मरियम के पेट से ईश्वरीय चमत्कार से हुआ था। उधर मुसलमानों में भी ईसा को इसलिये पूरा सम्मान दिया जाता है क्योंकि मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार धरती पर अवतरित होने वाले एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बरों में ईसा भी एक थे। उन्होंने मुहम्मद साहब से पहले अवतार लिया था। धार्मिक मान्यताओं व विश्वासों से इतर ईसा मसीह धरती पर मानवता के लिये आदर्श मानव रूप में अवतरित हुये। करुणा,क्षमा,प्रेम,सेवा,सत्कार,शिक्षा,ग़रीबों,निर्बल,दुर्बल,असहाय,बीमार व कुष्ठ लोगों की सेवा को ही वे सबसे बड़ा धर्म व कर्तव्य मानते थे। किसी परोपकारी अथवा उद्धार करने वाले को 'मसीहा' कहकर पुकारना ईसा के सेवा भाव का ही परिणाम है। आज भारत सहित पूरे विश्व में अनेकानेक शिक्षण संस्थान,अस्पताल,कुष्ठ रोगी अस्पताल,लावारिसों के लिये खुले 'होम्स' आदि तमाम लोकहितकारी संस्थायें व संस्थान इन्हीं 'ईसा '  के मानने वालों द्वारा संचालित किये जा रहे हैं जिसका लाभ ईसाई तो कम ग़ैर ईसाई ज़्यादा उठा रहे हैं। भारत में अकेली मदर टेरेसा ने ही लाखों ग़ैर ईसाई अपेक्षित,तिरस्कृत व प्रताड़ित लोगों को नया जीवन प्रदान किया। सेवा भाव में उनकी दूसरी मिसाल मौजूद नहीं। उनकी इन्हीं सेवाओं के लिये उन्हें भारत रत्न प्रदान किया गया था। 


परन्तु  हर समय आँखों पर संप्रदायवाद का चश्मा लगाये रखने वालों को मानवता के प्रति इनकी सेवा,इनका त्याग व बलिदान नज़र नहीं आता। इन्हें सिर्फ़ यह दिखाई देता है कि चूँकि यह ईसाई संस्थायें हैं लिहाज़ा यह सारी सेवायें लोगों का धर्म परिवर्तन कराने के लिये ही की जाती हैं। सांप्रदायिकता की नज़रों से हर चीज़ को देखने वाले इन लोगों को यह भी बताना चाहिये कि मिशनरीज़ द्वारा चलाये जा रहे इन्हीं स्कूल व कॉलेज से शिक्षित होकर निकले करोड़ों छात्रों में से अब तक कितने छात्रों ने धर्म परिवर्तन किया और मिशनरीज़ संचालित अस्पतालों से स्वास्थ्य लाभ पाने वाले कितने मरीज़ों ने धर्म परिवर्तन किया ? इन्हें ईसा से भी दुश्मनी है,माँ मरियम से भी और अब तो गत 25 दिसंबर को हमारे देश में आगरा में तोहफ़े बांटने के प्रतीक सेंटा क्लॉज़ का भी पुतला यह कहकर फूँक दिया गया कि 'धर्म परिवर्तन हेतु लालच देने के लिये सेंटा क्लॉज़ तोहफ़े बांटता है'। क्या पूरे विश्व में और इस परंपरा की शुरुआत से ही सेंटा क्लॉज़ धर्म परिवर्तन हेतु तोहफ़े बांटता है ? विश्व हिन्दू परिषद् के लोगों ने वाराणसी में भी सेंटा क्लॉज़ का पुतला फूंकने की योजना बनाई थी जिन्हें पुलिस ने नज़रबंद कर दिया क्योंकि पुलिस को कार्यक्रम की ख़बर पुतला दहन से पहले ही लग गई थी।


गत 25 दिसंबर को तो हरियाणा का अंबाला जिला भी इन संप्रदायिकतावादियों की चपेट में आ गया। अंबाला ज़िले की गिनती आम तौर  पर देश के शांतिप्रिय ज़िलों में की जाती है। साम्प्रदायिक दंगों अथवा धर्म जाति आधारित नफ़रत अथवा संघर्ष का भी इस ज़िले अथवा शहर का कोई इतिहास नहीं है। परन्तु पिछले दिनों क्रिसमस के दिन अंबाला के इस शांतिपूर्ण वातावरण को न केवल अशांत करने का कुत्सित प्रयास किया गया बल्कि अंबाला को कलंकित भी कर दिया गया। अंबाला छावनी स्थित होली रिडीमर कैथोलिक चर्च के  बाहर लगी यीशु मसीह की मूर्ति को कुछ असामाजिक तत्वों ने खंडित कर दिया। 1843 में निर्मित यह चर्च अंबाला छावनी के सबसे प्राचीन भवनों में प्रमुख है। बताया जाता है कि 1948 में इटेलियन कैपुचिन की निगरानी में होली रिडीमर कैथोलिक चर्च का निर्माण किया गया था। अंबाला के इतिहास की इस तरह की यह पहली घटना है जिसकी वजह से यहां रहने वाले ईसाई समुदाय के लोगों में अपने व अपने धर्मस्थलों की सुरक्षा के प्रति चिंता को बढ़ा दिया है।


देश के अनेक राज्यों में चर्च में तोड़ फोड़ करने,आगज़नी करने,ईसा मसीह व मरियम की मूर्तियों को खंडित करने के समाचार अक्सर आते रहते हैं। जिन शिक्षिकाओं द्वारा मिशनरीज़ स्कूल्स में शिक्षा दी जाती है,जिन्हें नन्स  के नाम से जाना जाता है उनके साथ बलात्कार करने तक की दुःखद व शर्मनाक ख़बर सुनी जा चुकी है। क्या कोई धर्म यही सिखाता है कि जो हमारे बच्चों को शिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाये उसका इस आरोप में बलात्कार किया जाये कि वह धर्म परिवर्तन कराती है ? 1999 में ओड़िसा के मनोहरपुर क्षेत्र में इन्हीं क्रूर सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा ऑस्ट्रेलियन मिशनरी ग्रहम स्टेंस व उनके दस वर्षीय पुत्र फ़्लिप व छः वर्षीय पुत्र टिमोथी, तीनों को सोते समय उन्हीं के वाहन में ज़िंदा जला दिया गया था। उस समय भी पूरी दुनिया में देश की बहुत बदनामी हुई थी। आज उसी मनोहरपुर के लोग प्रतिदिन ग्रहम स्टेंस व उनके बच्चों की याद में शोक मनाते आ रहे हैं।


भारत,पाकिस्तान,बांग्लादेश,अफ़ग़ानिस्तान जैसे कई देश हैं जहां सक्रिय सांप्रदायिकतावादी शक्तियां जो स्वयं किसी का कल्याण नहीं कर सकतीं,जिन्हें दया करुणा प्रेम,अहिंसा,सहयोग,परोपकार पर नहीं बल्कि नफ़रत,हिंसा,क्रूरता पर यक़ीन है वही लोग किसी भी धर्म के किसी भी आराध्य अथवा महापुरुष के दुश्मन बने बैठे हैं। नफ़रत,वैमनस्य संभवतः इनके संस्कारों में शामिल है। अन्यथा मंदिर-मस्जिद-चर्च व गुरुद्वारों ने बनाने के सिवा किसी का बिगाड़ा ही क्या है ? यह धर्मस्थल व महापुरुष हमेशा से संपूर्ण मानवता के लिये प्रेरणादायी रहे हैं। किसी भी धर्म का सच्चा अनुयायी अपने दिल में किसी भी धर्म के किसी भी धर्मस्थल अथवा महापुरुष के प्रति बैर नहीं रख सकता। भारतवासियों का विशेषकर यह स्वभाव है तभी तो यह देश पूरी दुनिया में अनेकता में एकता का प्रतीक समझा  जाता है। परन्तु जिन्हें जिन्हें ईसा से नफ़रत है,मसीहाई वह क्या जानें। 


-निर्मल रानी-





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गहलोत ने फिर दिखाई जादूगरी, आलाकमान को खुश कर पायलट को कर दिया किनारे

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी जादूगरी से कांग्रेस आलाकमान को खुश कर दिया है। राजस्थान की राजनीति में उनके विरोधी माने जाने वाले सचिन पायलट व उनके समर्थकों को गहलोत किनारे लगाने में सफल रहे हैं। राजनीति में आने से पहले अशोक गहलोत जादूगरी के पेशे से जुड़े हुए थे। उनके पिता लक्ष्मण सिंह गहलोत अपने जमाने के जाने-माने जादूगर थे। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी जादू की कला विरासत में मिली थी। हालांकि अशोक गहलोत जादूगरी के क्षेत्र में तो नहीं गए। मगर समय-समय पर अपनी जादूगरी दिखाकर राजनीति के क्षेत्र में वह लगातार ऊंची सीढ़ियां चढ़ते चले गए।


तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर काम कर रहे अशोक गहलोत छात्र जीवन से ही कांग्रेस से जुड़ गए थे। उस समय कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे हरिदेव जोशी और परसराम मदेरणा के सानिध्य में उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में ऊंची छलांग लगाई। 1980 में पहली बार जोधपुर से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीत कर इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में उप मंत्री बने। गहलोत राजीव गांधी व नरसिम्हा राव के मंत्रिमंडल में भी राज्य मंत्री रहे। तीन बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और कांग्रेस सेवा दल के अध्यक्ष रह चुके अशोक गहलोत जैसे-जैसे राजनीति की ऊंची सीढ़ियां चढ़ते गए वैसे-वैसे एक-एक कर अपने विरोधी नेताओं का सफाया करते गये।


1998 में वरिष्ठ नेता परसराम मदेरणा को मात देकर पहली बार मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत ने उसी कार्यकाल में परसराम मदेरणा, शिवचरण माथुर, पंडित नवल किशोर शर्मा, हीरालाल देवपुरा, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, जगन्नाथ पहाड़िया, कमला, बनवारी लाल बैरवा, रामनारायण चौधरी जैसे बड़े नेताओं को एक-एक कर किनारे लगा दिया। उसके बाद गहलोत राजस्थान कांग्रेस को अपने इर्द-गिर्द घुमाने लगे। 2008 के विधानसभा चुनाव में भी राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला था। इसके उपरांत भी अशोक गहलोत ने बसपा के विधायकों को कांग्रेस में शामिल करवा कर अपनी सरकार बना ली थी।


2018 के विधानसभा चुनाव में सचिन पायलट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के साथ ही मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। विधानसभा चुनाव सचिन पायलट के नेतृत्व में ही लड़ा गया था। हर किसी का मानना था कि कांग्रेस की सरकार बनने पर सचिन पायलट ही मुख्यमंत्री बनेंगे। क्योंकि 2013 का विधानसभा चुनाव अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते उनके नेतृत्व में लड़ा गया था। जिनमें कांग्रेस को महज 21 सीटें ही मिल पाई थीं। राजस्थान में कांग्रेस बहुत कमजोर स्थिति में थी। कार्यकर्ता हताश, निराश थे। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बुरी तरह से गिरा हुआ था। उस समय कांग्रेस आलाकमान ने युवा नेता सचिन पायलट को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना कर कांग्रेस को फिर से एक बार फिर नए सिरे से मजबूत बनाने की जिम्मेदारी सौंपी थी। सचिन पायलट ने पूरी सक्रियता से प्रदेश में दौरे कर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त किया था। मगर मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तब अशोक गहलोत एक बार फिर अपनी जादूगरी दिखाते हुए बाजी पलट कर खुद मुख्यमंत्री बन गए। उस समय सचिन पायलट को मात्र उप मुख्यमंत्री बनकर ही संतोष करना पड़ा था।


2018 में गहलोत के मुख्यमंत्री बनने की जरा भी संभावना नहीं थी। मगर अशोक गहलोत दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान को अपने विश्वास में लेकर मुख्यमंत्री के पद पर काबिज हो गए। उस समय कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट व उनके समर्थक विधायकों को आश्वस्त किया था कि आधे कार्यकाल के बाद पायलट को मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। मगर आधा कार्यकाल बीतने से पहले ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सचिन पायलट के सामने ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दी कि उनको गहलोत सरकार के खिलाफ बगावत करनी पड़ी। अशोक गहलोत इसी मौके की तलाश में थे। उन्होंने कांग्रेस आलाकमान से सचिन पायलट व उनके समर्थक सभी मंत्रियों को पद से बर्खास्त करवा दिया।


यहां तक कि सचिन पायलट को भी उपमुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से बर्खास्त करवा दिया था। एक समय तो ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दी गई थी कि पायलट व उनके समर्थक विधायकों का कांग्रेस से निष्कासन होना तय लग रहा था। मगर ऐन वक्त पर पायलट ने बदली हुई परिस्थितियों को देखकर कांग्रेस आलाकमान के सामने सरेंडर कर दिया था। सचिन पायलट इन दिनों फिर से कांग्रेसी आलाकमान के नजदीक होकर मुख्यमंत्री बनने का दांव चल रहे थे। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी व महासचिव प्रियंका गांधी भी पायलट के पक्ष में खड़े नजर आ रहे थे।


कांग्रेस आलाकमान ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर पायलट समर्थक विधायकों को फिर से मंत्रिमंडल में शामिल करने को लेकर दबाव बनाना शुरू कर दिया था। हालांकि गहलोत ने सवा साल के टालमटोल के बाद पायलट समर्थक चार विधायकों को मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल किया। यहां भी गहलोत के सख्त रुख के कारण भारी आरोपों के बावजूद किसी भी मंत्री को हटाया नहीं गया। कांग्रेस आलाकमान के समक्ष गहलोत किसी भी मंत्री को मंत्रिमंडल से हटाने पर सहमत नहीं हुए थे। जिन मंत्रियों को आरोपों के चलते हटाने के कयास लगाए जा रहे थे। मंत्रिमंडल विस्तार में उनमें से कइयों को तो पदोन्नत कर कैबिनेट मंत्री बना दिया गया।


पायलट के लगातार बढ़ते दबाव को कम करने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जयपुर में केंद्र सरकार के खिलाफ कांग्रेस की एक बड़ी सफल रैली करवा कर अपनी ताकत का इजहार कर दिया है। कांग्रेस की रैली में लाखों की भीड़ जुटाकर मुख्यमंत्री गहलोत ने आलाकमान को दिखा दिया कि राजस्थान में आज भी वही सबसे बड़े लोकप्रिय नेता हैं, जो अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत दिला सकते हैं। जयपुर की रैली में कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अधीर रंजन चौधरी, केसी वेणुगोपाल, कमलनाथ, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित सभी बड़े नेता शामिल हुए थे। हालांकि रैली को सोनिया गांधी ने तो संबोधित नहीं किया था। मगर राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला था। रैली की सफलता से सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी तीनों ही अभिभूत नजर आ रहे थे। रैली की सफलता के बाद कांग्रेस आलाकमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अगले दो साल तक मुख्यमंत्री के रूप में फ्री हैंड देने के मूड में लग रहा है। कांग्रेसी हलकों में चर्चा है कि रैली की सफलता से अशोक गहलोत की पांचों अंगुलियां घी में हो गई हैं। एक तरफ जहां कांग्रेस आलाकमान उनसे खुश नजर आ रहा है। वहीं अगले दो साल तक वह अपने तरीके से मुख्यमंत्री के रूप में काम करेंगे। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। इससे गहलोत के विरोधी नेताओं के भी धीरे-धीरे सुर बदलने लगे हैं। अब वह गहलोत के समक्ष शरणागत होने लगे हैं। हालांकि चुनाव के मामले में मुख्यमंत्री गहलोत का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है। मुख्यमंत्री रहते अशोक गहलोत 2003 के विधानसभा चुनाव में मात्र 56 सीटों पर व 2013 के विधानसभा चुनाव में मात्र 21 सीटों पर ही कांग्रेस को जिता पाए थे। मगर मौजूदा परिस्थितियों में कांग्रेस आलाकमान का पलड़ा गहलोत को ही मुख्यमंत्री बनाये रखने के पक्ष में नजर आ रहा है। जो गहलोत के लिए बड़ी राहत की बात है।


-रमेश सर्राफ धमोरा-

(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं।)



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प्रगति पर डिजिटल भारत अभियान

अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में सुशासन की स्थापना की थी। उन्होंने पारदर्शी तरीके से सरकार चलाई। उनकी सरकार जब बहुमत से केवल एक कदम पीछे थी,तब भी उन्होंने अनुचित प्रबंधन से सरकार बचाने का प्रयास नहीं किया था।


वस्तुतःयह उनकी विचारधारा और सार्वजनिक जीवन शैली के अनुरूप था, जिसमें निजी हितों का कोई महत्व नहीं था। उन्होंने अपने शासनकाल में भारत में टेलीकॉम क्रांति की शुरुआत की थी। टेलीकॉम से संबंधित सभी मामलों को तेजी से निपटाया गया। ट्राई की सिफारिशें लागू की गईं। स्पैक्ट्रम का आवंटन इतनी तेजी से हुआ कि मोबाइल के क्षेत्र में क्रांति की शुरुआत हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनकी जयंती पर एक करोड़ विद्यार्थियों को स्मार्टफोन और टैबलेट देने की योजना का शुभारंभ किया। भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ईकाना स्टेडियम में अटल जयंती पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें एक लाख युवाओं को फ्री स्मार्टफोन और टैबलेट का तोहफा दिया गया।


राजनीति और राजनीति शास्त्र दोनों अलग क्षेत्र हैं। राजनीति में सक्रियता या आचरण का बोध होता है, राजनीति शास्त्र में ज्ञान की जिज्ञासा होती है। अटल बिहारी वाजपेयी ने इन दोनों क्षेत्रों में समान रूप से आदर्श का पालन किया। राजनीति में आने से पहले वह राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी थे। कानपुर के डीएवी कॉलेज में नई पीढ़ी भी उनकी यादों का अनुभव करती है। अटल जी उन नेताओं में शुमार थे,जिनके कारण किसी पद की गरिमा बढ़ती है। वह बहुत होनहार विद्यार्थी थे। विद्यार्थियों को स्मार्टफोन और टैबलेट में पढ़ाई के लिए कंटेंट मिलेगा। साथ ही रोजगार से संबंधित जानकारियां भी दी जाएंगीं। इस अवसर पर योगी अदित्यनाथ ने डिजि शक्ति पोर्टल और डिजि शक्ति अध्ययन ऐप को लांच किया। सभी स्मार्टफोन और टैबलेट में डिजि शक्ति अध्ययन ऐप इंस्टाल है। इसके माध्यम से संबंधित यूनिवर्सिटी या डिपार्टमेंट छात्रों को पढ़ाई के लिए कंटेंट देंगे। साथ ही शासन की ओर से बूट लोगो और वाल पेपर के माध्यम से रोजगारपरक योजनाओं आदि की भी जानकारी दी जाएगी। सरकार की ओर से नामी आईटी कंपनी इंफोसिस से अनुबंध किया जा रहा है। इससे इंफोसिस के शिक्षा और रोजगार से जुड़े करीब चार हजार प्रोग्राम निःशुल्क युवाओं को उपलब्ध होंगे। जिन युवाओं का रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया है,उन युवाओं का डिजि शक्ति पोर्टल पर फिर से रजिस्ट्रेशन किया जा सकता है।


लखनऊ अटल जी कर्मभूमि रही है। उनका कहना था कि छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता। इसलिए छोटा मन हमें नहीं रखना चाहिए। इसलिए विराट सोच के साथ खड़ा होने का जज्बा होना चाहिए। इस जज्बे के साथ जब हमारा युवा खड़ा होगा तो वह ही नहीं सम्पूर्ण देश मजबूती से आगे बढ़ेगा। मुख्यमंत्री ने योगी आदित्यनाथ ने समझा कि प्रदेश के बच्चे स्मार्ट फोन और टैबलेट के अभाव में पढ़ाई के लिए परेशान होते थे। इसलिए विद्यार्थियों के हित में यह निर्णय लिया। योगी आदित्यनाथ ने युवाओं से सोच ईमानदार तो काम दमदार का नारा भी लगवाया। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने देश के शिक्षा विभाग की ओर से मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि कोरोना कॉल में पूरी दुनिया की मेधा चहारदीवारी में कैद हो गयी। ऐसे समय में स्मार्टफोन और टैबलेट पर ही पूरी दुनिया काम करने लगी। पठन-पाठन से लेकर अन्य कार्य डीजिटल माध्यम से हुआ। अब उत्तर प्रदेश को एक नम्बर पर लाने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती। अटल जी ने छह दशक तक देश की राजनीति को पूरी शुचिता एवं पारदर्शिता के साथ नई दिशा देने का कार्य किया। वह सार्वजनिक जीवन जीने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणादायी बना रहेगा। अटल जी का कहना था कि राजनीति सिद्धान्त विहीन नहीं होनी चाहिए, व्यक्ति को मूल्यों और सिद्धान्तों के साथ जीना चाहिए। देश समाज व सिद्धान्तों के लिए जीने वाले व्यक्ति का जीवन ही सार्थक और प्रेरणादायी होता है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि विराट सोच व्यक्तित्व को भी विराटता प्रदान करती है। युवाओं को हताशा और निराशा से मुक्त होकर विराट सोच के प्रयास करने चाहिये। इसके लिए सात वर्ष पूर्व चालीस करोड़ गरीबों के जनधन बैंक खाते खुलवाए गए। वर्ष पूर्व स्टार्ट अप इण्डिया, स्टैण्ड अप इण्डिया, डिजिटल इण्डिया आदि योजनाएं प्रारम्भ की गईं।कोरोना कालखण्ड में जनधन खातों सहित विभिन्न योजनाओं के माध्यम से गरीबों की सहायता करना संभव हुआ। मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के अन्तर्गत प्रतियोगियों के लिए निःशुल्क कोचिंग की व्यवस्था की गई। निकट भविष्य में प्रत्येक जनपद स्तर पर भी यह कोचिंग संस्थान प्रारम्भ किए जाएंगे। एक जनपद एक उत्पाद योजना लागू की गई। परिणामस्वरूप डेढ़ करोड़ से अधिक युवाओं को राज्य में ही उद्योगों में रोजगार प्राप्त हुआ है। स्वरोजगार हेतु संचालित योजनाओं,विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना आदि के माध्यम से साठ लाख युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ा गया। पांच वर्ष पहले प्रदेश में बेरोजगारी दर लगभग अठारह प्रतिशत थी। यह अब घटकर लगभग साढ़े चार प्रतिशत रह गयी है। इसके अलावा अटल जी की जयंती पर योगी आदित्यनाथ ने आगरा में उनके पैतृक गांव बटेश्वर धाम में सांस्कृतिक संकुल घाटों का निर्माण,पर्यटन विकास एवं सौन्दर्यीकरण सहित दो सौ तीस करोड़ रुपये की ग्यारह योजनाओं का शिलान्यास लोकार्पण किया। इसमें बटेश्वर धाम में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी सांस्कृतिक संकुल का शिलान्यास प्रमुख रूप से शामिल है। 


उन्होंने वर्तमान सरकार ने सत्ता में आने पर प्रत्येक विद्यालय में संस्कृत के अध्यापकों की तत्काल तैनाती कराए जाने का निर्णय लिया। यह सुनिश्चित किया कि वहां योग्यतम आचार्य रखे जाएं। इसके अलावा, संस्कृत के बच्चों को छात्रावास में रहने की व्यवस्था करायी जाए। सरकार ने संस्कृत की शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करायी। इससे किसी भी छात्र और आचार्य को भटकना नहीं पड़ेगा। केन्द्र व प्रदेश सरकार द्वारा अटल जी की स्मृति में अनेक कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। अटल जी के नाम पर प्रदेश की पहली मेडिकल यूनिवर्सिटी लखनऊ में स्थापित की जा चुकी है। प्रत्येक मण्डल में अटल आवासीय विद्यालय बनाए जा रहे हैं। श्रमिकों के बच्चों तथा अनाथ बच्चों को उत्तम शिक्षा प्रदान करने के लिए इन आवासीय विद्यालयों की स्थापना की जा रही है। अटल जी के नाम पर चवालीस इण्टर कॉलेज का निर्माण हो चुका है। प्रदेश सरकार द्वारा लखनऊ विश्वविद्यालय में अटल सुशासन पीठ, अटल स्मृति उपवन, अटल बिहारी वाजपेयी संस्कृति पुरस्कार, डीएवी कॉलेज कानपुर में अटल बिहारी वाजपेयी सेण्टर ऑफ एक्सीलेंस,बाबा साहब डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ में भी अटल बिहारी वाजपेयी पीठ,लखनऊ में अटल राष्ट्र प्रेरणा स्थल की स्थापना की गई है। इसके अलावा, प्रदेश के सबसे बड़े स्टेडियम का नाम अटल बिहारी वाजपेयी इकाना स्टेडियम रखा गया है। प्रदेश सरकार ने विभिन्न परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का कार्य किया है। अटल जी की स्मृति में केन्द्र सरकार द्वारा देश में अटल भूजल योजना, अटल ज्योति योजना, अटल पेंशन योजना, अटल नवीनीकरण और शहरी रूपान्तरण मिशन अमृत योजना संचालित की जा रही हैं। प्रदेश सरकार अटल जी की भावनाओं के अनुरूप बटेश्वर,फतेहपुर सीकरी और बाह क्षेत्र के विकास के लिए पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। प्रदेश सरकार अटल जी की भावनाओं के अनुरूप इस क्षेत्र को पर्यटन विकास के लिए एक सुन्दरतम पावन धाम के रूप में विकसित करने के लिए हर प्रकार का सहयोग करेगी। यहां अटल जी नाम पर एक म्यूजियम अटल म्यूजियम की स्थापना की जाएगी। जिसमें उनके पूर्वजों और उनके बचपन से लेकर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राज्य सरकार की योजनाओं को जोड़ते हुए इन कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने का कार्य किया जाएगा।


-डॉ. दिलीप अग्निहोत्री-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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संत क्यों करें हिंदुत्व की बदनामी?

देश के कुछ शहरों से ऐसे बयानों और घटनाओं की खबरें देखकर चिंता हुई, जिन्हें सख्ती से नहीं रोका गया तो वे भारत में सामाजिक कोहराम मचा सकती हैं। सच पूछा जाए तो वे भारत और हिंदुत्व, दोनों की बदनामी का कारण बन सकती हैं।


पहले हम यह देखें कि वे क्या हैं? हरिद्वार में निरंजनी अखाड़े की महामंडलेश्वर अन्नपूर्णा और हिंदू महासभा के नेता धर्मदास ने इतने आपत्तिजनक बयान दिए हैं कि अब पुलिस उनके खिलाफ बाकायदा जांच कर रही है। उनमें से एक ने कहा है कि हिंदू लोग किताबों को कोने में रखें और मुसलमानों के खिलाफ हथियार उठाएं। दूसरे ने कहा कि भारत में बसे पाकिस्तानियों की वजह से हिंदू पूजा-पाठ में बाधा होती है और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह जैसे लोगों का वध कर दिया जाना चाहिए। यह कितने शर्म की बात है। एक और 'हिंदू संत' ने कहा है कि इस समय भारत में श्रीलंका के तमिल आतंकवादी प्रभाकरन और भिंडरावाले जैसे लोगों की ज्रऊरत है।


इसी तरह के लोगों ने अंबाला के एक प्रसिद्ध और पुराने गिरजाघर में घुसकर ईसा मसीह की मूर्ति को तोड़ दिया। गुड़गांव में भी गिरजे में घुसकर तथाकथित हिंदूवादियों ने क्रिसमस के उत्सव को भंग कर दिया। ऐसा ही पिछले साल असम में कुछ लोगों ने किया था। रायपुर में आयोजित धर्म-संसद में अधर्म की कितनी घृणित बात हुई है। इस संसद में 20 संप्रदायों के मुखिया और कांग्रेस व भाजपाई नेताओं ने भी भाग लिया था। उनमें से ज्यादातर लोगों के भाषण तो संतुलित, मर्यादित और धर्मसंगत थे लेकिन अपने आपको हिंदू संत बतानेवाले दो वक्ताओं ने ऐसे भाषण दिए, जिन्हें सुनकर सारी संताई चूर-चूर हो जाती है। एक 'संत' ने गांधीजी की हत्या को ठीक बताया और नाथूराम गोड़से की तारीफ की। उन्होंने मुसलमानों पर इल्जाम लगाया कि वे भारत की राजनीति को काबू करने में लगे हुए हैं। किसी अन्य 'संत' ने हिंदुओं के शस्त्रीकरण की भी वकालत की। उन्होंने सारे धर्म-निरपेक्ष लोगों को 'हिंदू विरोधी' बताया।


पता नहीं, ये संत लोग कितने पढ़े-लिखे हैं? क्या उन्हें पता नहीं है कि हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री और सभी सांसद उस संविधान की रक्षा की शपथ लेते हैं, जो धर्म-निरपेक्ष है? ये लोग अपने आपको संत कहते हैं तो क्या इनका बर्ताव संतों की तरह है? ये तो अपने आपको उग्रवादी नेताओं से भी ज्यादा नीचे गिरा रहे हैं। ये समझते हैं कि ऐसी उग्रवादी और हिंसक बातें कहकर वे हिंदुत्व की सेवा कर रहे हैं लेकिन भारत के मुट्ठीभर हिंदू भी उनसे सहमत नहीं हैं। उनके ऐसे निरंकुश बयानों से हमारे देश के मुसलमानों और ईसाइयों में भय और कट्टरता का संचार होता है। अपने तथ्यों और तर्कों के आधार पर किसी भी मजहब या संप्रदाय की समालोचना करने में कोई बुराई नहीं है, जैसे कि महापंडित महर्षि दयानंद किया करते थे लेकिन घृणा और हिंसा फैलाने से बड़ा अधर्म क्या है?


-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार हैं)





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फसलों के लिए अमृत है मावठ की बूंदें

उत्तरी भारत के अधिकांश हिस्सों में सर्दी की बरसात यानी की मावठ का दौर चल रहा है। आसमान से एक एक बूंद अमृत बन कर टपक रही है तो यह रबी की फसलों को नया जीवन दे रही है।


हालांकि सर्दी के तेवर तीखे होने के साथ ही जन-जीवन प्रभावित होने लगा है। कोरोना के नए दैत्यावतार ओमिक्रान के कारण अवश्य चिंता बढ़ रही है। फिर भी दो राय नहीं कि राजस्थान सहित समूचे उत्तरी भारत में सर्दी की मावठ से किसानों के चेहरे खिल गए हैं। इस समय रबी का सीजन चल रहा है। अच्छे मानसून के कारण देश में रबी फसलों का रकबा बढ़ रहा है। रबी फसलों को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। खासतौर से गेहूं की फसल के लिए समय पर सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है। राजस्थान आदि प्रदेशों में सरसों की फसल के लिए जहां पानी की आवश्यकता पूरी होगी, वहीं चने की फसल को भी बड़ी राहत मिलेगी। बागवानी फसलों में मटर, गाजर मूली आदि इससे फलेंगी-फूलेंगी। हालांकि आज गांव-गांव में बिजली उपलब्ध होने से किसान पूरी तरह तो मावठ पर निर्भर नहीं रहते पर तेज सर्दी के साथ मावठ एवं बूंदाबांदी से काश्तकारों को बड़ी राहत मिलती है। किसानों को बड़ा फायदा जहां बिजली आने की प्रतीक्षा में कड़ाके की ठण्ड में खेतों की जुताई करने से राहत मिली है, वहीं बिजली के बिल पर होने वाले खर्चे से भी प्रकृति की मावठ के कारण छुटकारा मिल गया है। मावठ की बरसात का सीधा पर्यावरणीय लाभ फसलों को मिलता है और खेत लहलहा उठते हैं। इसके साथ ही सिंचाई के लिए पानी की आवश्यकता नहीं होने से पानी का दोहन सीमित हो जाता है। इस तरह से देखा जाए तो मावठ की यह बरसात बहुत ही लाभकारी सिद्ध होती है।


रबी फसल के समय बिजली की मांग बढ़ जाने से विद्युत वितरण निगमों को भी बिजली की व्यवस्था करने के लिए दो चार होना पड़ता है। पिछले दिनों देशव्यापी कोयला संकट के कारण बिजली निगम अभी पूरी तरह से सामान्य स्थिति में नहीं आ पाए हैं। विदेशों से आयातित कोयला भी बहुत अधिक महंगा होने से बिजली निगमों के पास दोहरा संकट हो गया है। विदेशों से आयात करने वाले निजी प्लेयर्स अब कोल इंडिया पर ही निर्भर हो गए हैं, तो इससे कोयले की मांग बढ़ गई है। किसानों को फसल के लिए समय पर बिजली उपलब्ध कराना सरकारों की प्राथमिकता होती है। यहां तक कि महंगी बिजली खरीद कर भी काश्तकारों को उपलब्ध करानी पड़ती है। इतना करने के बाद भी बिजली वितरण के समय या अन्य किसी कारण से व्यवधान के कारण किसानों का आक्रोश भी क्षेत्र में देखने को मिल जाता है। इसलिए देखा जाए तो किसान ही नहीं अपितु सभी के लिए सर्दी की मावठ राहत लेकर आती है। सर्दी की मावठ, बून्दा-बान्दी व बरसात से फसलोें को पानी मिलने से करोड़ों रुपये की बिजली की बचत हो जाती है। इसके साथ ही जल दोहन भी बच जाता है। ऐसे में सर्दी के अमृत जल मावठ का स्वागत किया जाना चाहिए।


इसमें कोई दो राय नहीं कि कड़ाके की सर्दी से जन-जीवन बुरी तरह से प्रभावित होता है। फिर कोरोना का दौर चल रहा है सो अलग। ऐसे में सर्दी से बचाव भी एक बड़ी आवश्यकता हो जाती है। इस मौसम में सर्दी जनित बीमारियां भी बढ़ती हैं और इसके साथ ही बुजुर्गों के लिए सर्दी का मौसम थोड़ा तकलीफदेह हो जाता है पर इसका हल सर्दी से बचाव के तरीके अपना कर किया जा सकता है। कहा जाता है कि सर्दी का मौसम स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छा मौसम होता है। इस मौसम में जीवंतता होती है। आप अच्छा खा-पी सकते हैं, अच्छा पहन सकते हैं। यही कारण है कि सर्दी में खान-पान पर विशेष जोर दिया जाता है।


प्रकृति की मेहरबानी से सर्दी की मावठ किसानों के लिए वरदान बन कर आई है। हमें जरूर दो चार दिन की सर्दी की तकलीफ भुगतनी पड़ेगी पर अन्नदाता किसानों और देश के बिजली निगमों को निश्चित रूप से यह राहत का समय है। करोड़ों रुपये की बिजली की बचत होगी और खेतों में फसलें फल फूल सकेंगी। अरबों रुपयों का कोयला बचेगा तो किसानों की फसल पर लागत कम होगी। इस कोरोना के दौर में तो अर्थ व्यवस्था में खेती किसानी की भूमिका विशेष रूप से रेखांकित हुई है। ऐसे में प्रकृति के इस उपहार का स्वागत करना चाहिए।


-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)



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ओमिक्रॉन और सेवाओं का निर्यात

कोविड के ओमिक्रॉन वैरिएंट के उत्पन्न होने से एक बार पुनः विश्व अर्थव्यवस्था पर संकट आ पड़ा है। अलग-अलग देशों में अलग-अलग समय पर लॉकडाउन की स्थिति बन रही है। ऐसी स्थिति में जो देश दूसरे देशों से कच्चे माल के आयात अथवा उत्पादित माल के निर्यात पर निर्भर रहते हैं, उनका संकट बढ़ जाता है। हाल में एक कार निर्माता के एजेंट ने बताया कि अपने देश में गाडि़यों की खरीद की इस समय लगभग 6 से 8 महीने की वेटिंग लिस्ट हो गई है। कारण यह है कि कार के उत्पादन में लगने वाला एक छोटा सा ‘सेमी कंडक्टर’, जिसका मूल्य मात्र 2000 रुपए है, वह भारत में नहीं बन रहा है और उसका आयात भी नहीं हो पा रहा है क्योंकि निर्यात करने वाले देशों में कोविड का संकट आ पड़ा है। इससे दिखाई पड़ता है कि कोविड के कारण उत्पादित माल का विश्व व्यापार संकट में है। यदि एक भी कच्चा माल उपलब्ध नहीं हुआ तो पूरा उत्पादन ठप्प हो जाता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पत्रिका ‘फाइनांस एंड डेवलोपमेंट’ में एक लेख में कहा गया है कि कोविड संकट के कारण तमाम देश उत्पादित माल वैश्वीकरण से पीछे हटेंगे। इसी क्रम में अपने देश में दवाओं के उद्योग पर भी वर्तमान में संकट है क्योंकि चीन से आयातित होने वाले कुछ कच्चे माल उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी तरफ हमारे निर्यात भी संकट में हैं क्योंकि इंग्लैंड और नीदरलैंड जैसे देशों में कोविड के कारण लॉकडाउन की स्थिति बन रही है और उनके द्वारा हमारा माल खरीदा नहीं जा रहा है।


 इन संकटों की विशेषता यह है कि ये माल अथवा भौतिक वस्तुओं के व्यापार से उत्पन्न हुए हैं जैसे सिलिकान चिप या दवा के कच्चे माल जिनकी ढुलाई एक देश से दूसरे देश में समुद्री जहाज अथवा हवाई जहाज से करनी होती है। माल का भौतिक उत्पादन जिस देश में होता है, यदि वह देश निर्यात न कर सके तो आयात करने वाले दूसरे देश पर संकट आ पड़ता है। इसलिए कोविड के कारण सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। तुलना में सेवा क्षेत्र की स्थिति अच्छी है। कारण यह कि सेवाएं जैसे ऑनलाइन ट्यूशन, टेली मेडिसिन, अनुवाद, सिनेमा, संगीत, साफ्टवेयर इत्यादि के माल की ढुलाई समुद्री अथवा हवाई जहाज से करने की जरूरत नहीं होती है। इसकी ढुलाई इंटरनेट के माध्यम से हो सकती है। अतः किसी देश में यदि लॉकडाउन लगा भी है तो कर्मी अपने घर में बैठकर इंटरनेट से इनका उत्पादन और सप्लाई अनवरत कर सकते हैं। इसलिए वर्तमान ओमिक्रॉन के संकट को देखते हुए हमें भी सेवा क्षेत्र पर ध्यान देने की जरूरत है। मैन्युफैक्चरिंग और सेवा में दूसरा मूल अंतर सूर्योदय और सूर्यास्त का है। आज औद्योगिक देशों में सेवा क्षेत्र का अर्थव्यवस्था में हिस्सा लगभग 90 प्रतिशत, मैन्युफैक्चरिंग का 9 प्रतिशत और कृषि का मात्र एक प्रतिशत है। भारत में इस समय सेवा लगभग 60 प्रतिशत, मैन्युफैक्चरिंग लगभग 25 प्रतिशत और कृषि 15 प्रतिशत है। दोनों की तुलना करने से स्पष्ट है कि अपने देश में भी सेवा का हिस्सा 60 प्रतिशत से आगे बढ़ेगा तो मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा 25 प्रतिशत से घटेगा अथवा हम कह सकते हैं कि सेवा क्षेत्र में सूर्योदय होगा जबकि मैन्युफैक्चरिंग में सूर्यास्त रहेगा।


 इस परिस्थिति में विश्व बाजार में सेवाओं जैसे ऑनलाइन ट्यूशन की मांग में वृद्धि होगी जबकि उत्पादित माल की मांग में तुलना में कम वृद्धि होगी अथवा गिरावट भी हो सकती है। जाहिर है कि जिस क्षेत्र में मांग बढ़ने की संभावना है, उस क्षेत्र में यदि हम प्रवेश करेंगे तो अपने माल को आसानी से बेच पाएंगे। सूर्यास्त वाले क्षेत्र में हमको अपना माल बेचने में आगे तक कठिन समस्याएं आएंगी। सेवा और मैन्युफैक्चरिंग का तीसरा अंतर है कि मैन्युफैक्चरिंग में उत्तरोत्तर रोबोट और ऑटोमैटिक मशीनों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। इतना सही है कि सेवा क्षेत्र में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से भी रोजगार में गिरावट आ सकती है। लेकिन सेवा के तमाम ऐसे क्षेत्र हैं जिनका काम कम्प्यूटर से नहीं हो सकता है जैसे ऑनलाइन ट्यूशन को लें। यदि जर्मनी में बैठे किसी युवा को आपको गणित की शिक्षा देनी है तो वह सॉफ्टवेयर प्रोग्राम से कम ही सफल होगी। उसके लिए सामने एक अध्यापक बैठा होना चाहिए जो छात्र अथवा छात्रा के प्रश्नों का उत्तर दे सके और उनकी कठिनाइयों का निवारण कर सके। लगभग एक दशक पूर्व एनिमेटेड फिल्मों का जोर था। कम्प्यूटर से बनाई गई फिल्में कुछ आईं। समयक्रम में अब इनका चलन समाप्त होने लगा है और आज एनिमेटेड सिनेमा का उत्पादन कम हो रहा है। इसका अर्थ यह है कि कुछ विशेष सेवा क्षेत्रों को छोड़ दें तो ऑनलाइन ट्यूशन जैसे तमाम स्थान हैं जहां कम्प्यूटर अथवा रोबोट मनुष्य का स्थान नहीं ले सकेंगे। इसलिए सेवा क्षेत्र तुलना में सुरक्षित रहेगा। चौथा अंतर यह है कि अपने देश में प्राकृतिक संसाधनों का अभाव है। प्रति हेक्टेयर भूमि में हमारी जनसंख्या दूसरे देशों की तुलना में अधिक है। अपने देश में कोयला, बिजली और अन्य खनिज भी दूसरे देशों की तुलना में कम ही पाए जाते हैं। मैन्युफैक्चरिंग में इन प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अधिक होता है।


 जैसे आपको स्टील बनाने के लिए कोयला और लौह खनिज की भारी मात्रा में आवश्यकता होती है। यदि आपके पास कोयला नहीं है तो आपको उसका आयात करना होगा और जो कि महंगा पड़ेगा और आयातित कोयले से आपके द्वारा निर्मित स्टील महंगा पड़ेगा। ये 4 कारण बताते हैं कि आने वाले समय में सेवा क्षेत्र में हमारी स्थिति अच्छी हो सकती है। पहला कि मैन्युफैक्चरिंग का वैश्वीकरण पीछे हटेगा, दूसरा सेवा क्षेत्र का हिस्सा उत्तरोत्तर बढ़ रहा है, तीसरा सेवा क्षेत्र में रोजगार तुलना में सुरक्षित हैं और चौथा सेवा क्षेत्र के लिए प्रमुख कच्चा माल शिक्षा है जो हमारे पास उपलब्ध है और प्राकृतिक संसाधनों का अपने यहां अभाव है। इन चारों कारणों को देखते हुए हमको ओमिक्रॉन वैरिएंट का सामना करने के लिए उत्पादित माल के निर्यात के स्थान पर सेवाओं के निर्यात पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यह आश्चर्य की बात है कि इन तमाम तथ्यों के बावजूद सरकार का ध्यान उत्पादित माल के निर्यात पर ही अधिक दिखता है। इसका एकमात्र कारण यह दिखता है कि उत्पादित माल की फैक्टरी लगाने में जमीन का आवंटन, बिजली का कनेक्शन, पोलूशन का अनापत्ति पत्र, जंगल काटने की स्वीकृति, ड्रग लाइसेंस, फूड प्रोडक्ट का लाइसेंस इत्यादि, तमाम सरकारी लाइसेंसों की जरूरत पड़ती है जिसमें नौकरशाही को भारी लाभ होता है। इसलिए सरकार को विचार करना चाहिए कि क्या वह नौकरशाही के हितों की रक्षा करने के लिए मैन्युफैक्चरिंग को ही बढ़ाएगी अथवा जनता के हित साधने के लिए सेवाओं के निर्यात पर विशेष ध्यान देगी? यह आज की चुनौती है।


-भरत झुनझुनवाला-









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शर्म आपको आती पता नहीं, लेकिन हमें 'आप' पर तो आती है...

महिलाओं के प्रति की जाने वाली अभद्र टिप्पणियों के लिए भारतीय लोकतंत्र बदनाम है। ऐसे में यूं कहें कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का मंदिर अमर्यादित भाषा के वायरस से कलंकित हो रहा है। फ़िर यह अतिश्योक्ति नहीं। आज के दौर में हम विकसित होने का ढोंग भले रच लें, लेकिन सोच और समझ हमारी रसातल में जा पहुँची है। देश के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों से लेकर निचले स्तर तक के लोग महिलाओं के खिलाफ बदजुबानी में पीछे नहीं रहते। ऐसे में सवाल कई उठते, लेकिन जब लोकराज ही बिना लोकलाज के चलने लगें। फिर उन सवालों का ज़्यादा औचित्य नहीं? भारत के संविधान में विधायिका को अनुच्छेद-109 (संसद) और अनुच्छेद-194 यानी विधानसभा के तहत विशेषाधिकार प्राप्त हैं और ये विशेषाधिकार इसलिए जरूरी हैं ताकि विधायिका नागरिकों के मुद्दे उठाने और क़ानून बनाने के दौरान हुए वार्तालाप को लेकर स्वतंत्र महसूस कर सके। लेकिन जब हम अतीत को देखते हैं फ़िर वर्ष 2003 में तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष ने 'द हिन्दू' के चार पत्रकारों और एक प्रकाशक के विरुद्ध एक अरेस्ट वारंट सिर्फ इसलिए जारी कर दिया था, क्योंकि उस अख़बार में तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय जयललिता के खिलाफ कुछ ऐसा लिख दिया गया था जो अध्यक्ष महोदय को पसंद नहीं। लेकिन बीते दिनों जो कर्नाटक के विधानसभा में हुआ उसका क्या? सवाल ऐसे में यही बनता है। बीते दिनों जो कर्नाटक विधानसभा में हुआ। उसे दुनिया ने देखा। अब ऐसे में सवाल यही क्या हम एक ऐसे आधुनिक भारत के निर्माण की तरफ़ बढ़ रहे, जहां मानसिक रूप से अक्षम नागरिकों की फ़ौज बढ़ रही बस?


हर वर्ष 16 दिसंबर को निर्भया बलात्कार की घटना की बरसी होती है और उसके एक दिन बाद ही यानी 17 दिसंबर को कर्नाटक विधानसभा में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर एक फूहड़ संवाद हुआ। संवाद भी ऐसा जिससे मानव जाति अपमानित हो जाएं, लेकिन सियासतदां कहाँ आते मानव जाति में? उनकी तो एक अलग श्रेणी होती है। ऐसे में कांग्रेस नेता व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार ने एक कहावत का हवाला देते हुए व 'चेयर' को संबोधित करते हुए कहा कि, "जब रेप होना ही है तो लेट जाओ और मजे लो।" यह बयान विधानसभा अध्यक्ष का जितना घिनौना था उससे कहीं अधिक घिनौनी वह सोच है जो ऐसे नेताओं को सदन में प्रतिभाग लेने का अवसर उपलब्ध कराती हैं। पर अफ़सोस की इस शर्मसार कर देने वाली घटना को भी हमारे देश के राजनेता पक्ष विपक्ष की राजनीति के तराजू पर तोल रहे है। ऐसे में शायद वो यह भूल गए हैं कि जिस संविधान ने उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी दी है उसी लोकतंत्र के मंदिर में महिलाओं को अपशब्द कहें जा रहे है। हमारे राजनेताओं को सत्ता के सुख की ऐसी लत लगी है कि वह अपनी मर्यादा तक को ताक पर रख बैठे है। वह भूल गए है कि जिस देश में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और राजा हरिश्चंद्र जैसे प्रतापी राजाओं ने जन्म लिया है। जिन्होंने राजधर्म के नये कीर्तिमान गढ़े हो उस देश के राजनेता सत्ता सुख में मर्यादा विहीन हो चले है। इतना ही नहीं हमारे राजनेता यह तक भूल बैठे है कि जिस संविधान ने उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी दी है। उसी लोकतंत्र के मंदिर को कलंकित करने से वे बाज़ नहीं आ रहे है।


एक मशहूर शायर फैज अहमद फैज हुए हैं जिनका लिखा एक गीत है। जिनकी चंद लाइनें याद आती है कि, "बोल के लव आज़ाद है तेरे...!" वैसे उन्होंने जब ये लाइनें लिखी होगी तब शायद ही यह सोचा हो कि एक दिन अभिव्यक्ति की आज़ादी का निहितार्थ सियासतदानों द्वारा इस संदर्भ में निकाला जाएगा। वैसे सोचने वाली बात यह है कि हमारे देश में जब-जब राजनेताओं के सुर बिगड़े है तब-तब ही महिलाओं के चरित्र का चीरहरण किया गया है। महिलाओं के दामन पर उंगली उठाना तो जैसे अब राजधर्म बन गया है। कुर्सी का खेल मुग़लई दौर का होता जा रहा है। अंतर सिर्फ इतना है कि तब तलवार का बोलबाला था आज संवैधानिक लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक बदज़ुबानी का। जिस संसद में एक तऱफ महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने के लिए उनकी शादी की उम्र को 18 साल से बढ़कर 21 साल किए जाने का विधेयक लाया जा रहा। वहीं दूसरी तरफ़ कर्नाटक के विधानसभा में एक विधायक महिलाओं के रेप को एंजॉय करने की बात कह रहे है। इतना ही नहीं अफ़सोस की ये सारी बाते विधायक महोदय विधानसभा में किसान मुद्दे पर चर्चा की मांग पर बहस करने की बात को लेकर कह रहे थे। देश का दुर्भाग्य देखिए कि इस शर्मनाक टिप्पणी पर विधानसभा में उपस्थित अन्य विधायक भी ठहाके लगाने से बाज नहीं आएं। विधानसभा अध्यक्ष भी ऐसे इन बातों का चटकारा ले रहे थे, जैसे वो भूल गए हो कि उन्हें विशेषाधिकार प्राप्त हैं, लेकिन आधी आबादी के प्रति ऐसी घिनौनी सोच भी कहीं न कहीं विशेषाधिकार पर सवालिया निशान उठाती है, लेकिन इन बातों का फ़र्क कहाँ पड़ता इन नेताओं को? ज़्यादा हुआ तो मांग लेंगे माफ़ी और हो जाएगी खानापूर्ति। वैसे महाभारत काल में भी द्रौपदी के चीरहरण पर पूरी सभा धृतराष्ट्र बनकर तमाशा देखती रही और उसी इतिहास को एक बार फिर दोहराने की कोशिश कर्नाटक के विधानसभा में की गई और आज फिर पूरा देश इस घटना को अपना मौन समर्थन दे रहा है। दे भी कैसे नहीं क्योंकि यह पहली दफ़ा नहीं जब किसी पार्टी के नेता ने महिलाओं के ख़िलाफ़ अनर्गल बयानबाजी की हो। हमारे राजनेता तो जैसे महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करने में महारथ हासिल करके बैठे हो। उन्हें कहाँ फर्क पढ़ने वाला है? उनकी रगों में तो पितृसत्तात्मक सोच का वायरस भर गया है। वैसे भी औरत के अस्तित्व को हमारा समाज स्वीकार ही कहाँ करता है? औरत के पैदा होते ही उसके अस्तित्व का ठेका उसके पिता के हाथों में होता है, शादी के बाद पति और मां बनने के बाद खुद ही अपने बच्चों के हाथ मे सौंप देती है। औरत खुद क्या करती है? त्याग अपने सपनों का अपने अस्तित्व का? लेकिन अफ़सोस की इस त्याग, इस बलिदान का कोई सम्मान तक नहीं करता है, क्योंकि समाज औरत के त्याग को उसका फर्ज मान लेता है और वहीं औरत उसे अपना कर्म मानकर चुपचाप सहन करती चली जाती है। अपने वजूद तक को मिटा देती है। औरत के त्याग को समाज ने उसकी कमज़ोरी जो मान लिया है।


वैसे यह पहली बार नही है जब कर्नाटक के विधायक रमेश कुमार ने महिलाओं ख़िलाफ़ अमर्यादित बयान दिए है। इससे पहले 2019 में विधानसभा अध्यक्ष के कार्यकाल के समय वह अपनी तुलना रेप पीड़िता से कर चुके है। उनके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि जुबान फिसलना कोई बड़ी बात नहीं है। क्या हुआ जो महिलाओं के लिए अभद्र बोल दिया बाद में माफ़ी भी मांग लेते है। कौन सा उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होना है। कुछ दिन हंगामा होगा फिर सब खामोश हो जाएंगे और यह सिलसिला जारी रहेगा। वैसे उत्तरप्रदेश में कांग्रेस पार्टी महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिए 40 प्रतिशत आरक्षण की बात कह रही है, और उन्ही की पार्टी के नेता महिलाओं के लिए अपमानजनक बात कह रहे है, कितनी अजीब विडंबना है हमारे देश की। जहां रमेश कुमार के बयान का विवाद थमा भी नहीं था कि समाजवादी पार्टी के सांसद एसटी हसन ने भी लड़कियों को लेकर अनर्गल बात कर दी है। उनका मानना है कि लड़कियों की शादी की उम्र को कम कर देना चाहिए, शादी में देर होगी तो वह पोनोग्राफी वाले वीडियो देखेगी। समाजवादी पार्टी के ही सांसद शफीक उर रहमान वर्क ने भी महिलाओ के उम्र बढ़ाने का विरोध किया है उनका मानना है कि अगर ऐसा होगा तो लड़कियां आवारा हो जाएगी। प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ राममनोहर लोहिया ने कहा था कि "लोकराज, लोकलाज से ही चलता है"। आज ऐसे प्रखर समाजवादी नेता के विचारों को उन्हीं की पार्टी के नेता डुबाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे है।


महिलाएं आधी आबादी का प्रतिनिधित्व कर रही है। देश दुनिया में अपनी बुलंदी का परचम लहरा रही है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहां महिलाओं ने अपनी कामयाबी के झंडे न गाड़े हो। पर आज भी हमारा समाज पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित है। जहां औरतों को कमज़ोर माना जाता है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट की माने तो महिलाएं पुरुषों से ज्यादा काम करती है, फिर कैसे उन्हें कमज़ोर कहा जा सकता है। हमारा समाज सदियों से महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करता आया है। यहां तक कि हमारे इतिहास को भी अपने मतलब के लिए गलत तरीके से परिभाषित किया गया। यही वजह है कि जब किसी लड़की का बलात्कार होता है तो उसे उसके खानदान की इज्जत से जोड़ दिया जाता है। रेप होने से महिला की इज्ज़त चली जाने की बात कही जाती है, जबकि जो लड़का बलात्कार करता है उसे हमारा ही समाज पुरुषत्व मान कर महिमा मण्डन करता है। लड़की को ही गलत ठहरा दिया जाता है। कभी उसके कपड़े पर सवाल उठाया जाता है तो कभी उसके चरित्र पर। जब तक समाज का यह दोहरा रवैया नहीं बदल जाता तब तक महिलाओं की स्थिति नहीं सुधर सकती। ऐसे में अब महिलाओं को एकजुटता दिखानी होगी। उन्हें पार्टी से ऊपर उठकर एकजुट होना होगा। सरकार से मांग करनी होगी महिलाओं के ख़िलाफ़ अभद्र बयानबाजी पर कड़ी सजा का प्रावधान बनाया जाए। महिलाओं को ख़ुद इसका विरोध करना होगा। चाहे सार्वजनिक मंच हो या फिर घर की चारदीवारी, महिलाओं को विरोध के लिए मुखर होना होगा। तभी समाज में महिलाओं की स्थिति बेहतर हो सकेगी।


-सोनम लववंशी-




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मुझे कार्यकर्ता पद से कोई हटा नहीं सकता

आगरा स्थित बटेश्वर निवासी सामान्य शिक्षक श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी के ग्वालियर स्थित घर अटलजी पैदा हुए। उनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। भारत में उन्होंने अपनी वाणी से लोगों के दिल में अपना स्थान बनाया। केरल से कश्मीर और अटक से कटक तक उन्होंने अपनी वाणी के प्रभाव से करोड़ों लोगों को जोड़ा। अथक साधना से निर्मित अटलजी का जो व्यक्तित्व हमारे सामने है, उनके कौन से रूप का वर्णन हो, कौन सा अछूता छोड़ दिया जाए, यह निर्णय कठिन है। समग्र समेटना तो संभव नहीं, फिर भी उनका स्मरण आते ही उनकी सौम्य छवि आंखों में तैर जाती है। ग्वालियर की गलियों से निकलकर प्रधानमंत्री बनने की इस यात्रा में अनेक पड़ावों से गुजरते हुए अटलजी ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को अहर्निश साधना के साथ जिन ऊंचाइयों तक पहुंचाया, उन्हें शब्दों में बांधना कठिन है। उनका व्यक्तित्व उस सरिता की तरह रहा जो निर्बाध गति से निश्छल बहती रहती है, हर पथिक की प्यास बुझाती है, किन्तु अपने अंदर बहुत कुछ समेटे रहती है। वे उदारता के प्रतीक थेl वे सदैव सिद्धांत पर अडिग रहेl उन्होंने भले ही प्रधानमंत्री बनने का सपना न सोचा हो, पर देश सदैव उनके बारे में सोचता रहा की आज नहीं तो कल, अटलजी प्रधानमंत्री बनेंगेl


मध्य प्रदेश के दतिया निवासी विभाग संघचालक स्वर्गीय राजेंद्र तिवारी ने 'हमारे अटलजी' नामक पुस्तक में संस्मरण लिखते हुए बताया कि भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी गोलवलकर ने कहा था, "मैं आपको संघ के पांच पांडव दे रहा हूं। ये भारत के कर्णधार एवं सजग प्रहरी होंगे।" श्रीगुरुजी ने पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी को युधिष्ठिर, अटलजी को अर्जुन, जगन्नाथ राव जोशीजी को भीम, यज्ञ दत्त शर्माजी को नकुल और वसंत राव ओकजी को सहदेव कहा करते थे। उनके ये संबोधन अटलजी के लिए अर्जुन के रूप में सत्य ही चरितार्थ हुआ। अपने सम्पूर्ण जीवन को राष्ट्र की सेवा में प्रतिक्षण समर्पित करने वाले भारत माता के सपूत अटलजी पर सम्पूर्ण राष्ट्र गौरवान्वित रहा। उनका अपने सम्पूर्ण जीवन में व्यक्तिगत कुछ भी नहीं रहा, राष्ट्र की सेवा और संघ का सिद्धांत "तन समर्पित मन समर्पित और ये जीवन समर्पित" के जीवंत मूर्तिस्वरूप अटलजी भारत के प्रत्येक वर्ग में और मुख्यतः युवा हृदयों के सम्राट के रूप में पहचाने गए। राष्ट्रवाद, अनुशासन, निष्ठापूर्वक ध्येयपूर्ति के लिए सतत प्रयास, ऐसे अनेक गुण जो एक स्वयंसेवक के रूप में उन्हें प्राप्त हुआ, उनके महान और सर्वस्वीकार्य छवि को गढ़ने का काम किया।

अटलजी पाञ्चजन्य, स्वदेश एवं वीर अर्जुन के सम्पादक रहे। भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी ने जब बिना परमि

ट के जम्मू-कश्मीर जाने की घोषणा की, अटलजी उनके साथ बतौर वैचारिक पत्रकार के रूप में गए। डॉ. मुख़र्जी को जम्मू-कश्मीर के प्रवेश द्वार लखनपुर में जब पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया तो उन्होंने अटलजी से कहा, "वाजपेयी गो बैक एंड टेल द पीपल ऑफ़ इंडिया, डॉ. मुख़र्जी हैज इंटरड जम्मू एंड कश्मीर विदाउट परमिट।" डॉ. मुख़र्जी की ये बात सुन अटलजी वहां से लौटे। इसी बीच डॉ. मुख़र्जी की वहां रहस्यमय परिस्थिति में मृत्यु हो गई। अटलजी ने वहीं मन में ठाना कि डॉ. मुख़र्जी के अधूरे सपनों को पूरा करना है। इसके बाद ही वे भारतीय जनसंघ के कार्य में पूर्णतः जुट गए।

अटलजी थे तो जनसंघ और आगे भाजपा के, परंतु उन्हें सभी दलों के लोग अपना मानते थे। उनकी ग्राह्यता और स्वीकार्यता तो इसी से पता लग जाती है कि अटलजी को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री कांग्रेस के नेता पी.वी. नरसिंहराव ने सन् 1994 में प्रतिपक्ष का नेता रहते हुए जिनेवा मं् संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के प्रतिनिधिमंडल के नेता के रूप में भेजा था। जबकि ऐसी बैठकों में भारत का प्रधानमंत्री या अन्य ज्येष्ठ मंत्री ही नेता के रूप में जाते हैं, इस घटना से सारा विश्व चकित था।

नरसिंहराव ने अपने एक भाषण में कहा था कि, "अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर अटलजी की जानकारी और विदेश मंत्री के तौर पर उनके अनुभव के कारण आज विश्व में वह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के शीर्ष विशेषज्ञों में से एक हैं।" भारत के राजनैतिक विश्लेषकों का मानना था कि अटलजी अगर दस वर्ष पूर्व भारत के प्रधानमंत्री बन गए होते तो भारत का भविष्य कुछ और होता। आजादी के दूसरे दिन जो प्राथमिकताएं तय होनी थीं, वह अटलजी के प्रधानमंत्री बनने तक तय नहीं हुई थीं।


सत्ता-लोलुपता के ऊहापोह के बीच निर्विकार भाव से जनसेवा के लिए प्रस्तुत रहने का सामर्थ्य हर किसी में हो ही नहीं सकता। दलगत राजनीति के जंगलराज में अपने आप को निष्पक्ष रख पाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। अटलजी विदेश मंत्री रूप में, नेता प्रतिपक्ष के रूप में और प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका के दायित्व का निर्वाह करते हुए इन मर्यादाओं का पालन किया। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। प्रतिपक्ष में रहते हुए अटलजी रचनात्मक आलोचना के हिमायती थे। रचनात्मक दृष्टिकोण तभी संभव है जब गहन अध्ययन, सभ्यता, बाह्य और संस्कृति के अंतरंग स्वरूप से सुपरिचय, जीवन मूल्यों के प्रति लगाव और मनुष्य-मनुष्य के बीच रागात्मक संबंधों की स्थापना का लगन हो।


अटलजी को प्रधानमंत्री बनने की यात्रा में सफलता की पुष्पमालाएं ही नहीं मिलती रहीं, ऐसे क्षण भी आए जब एक तरफ जनसंघ के संस्थापक डॉ. मुख़र्जी की 1953 में संदिग्ध मौत हो गई वहीं पंडित दीनदयालजी की दारुण और रहस्यमय हत्या हो गई। इसके बाद दल को घोर निराशा और वेदना के भंवर से उबारने वाले नाविक की भूमिका इन्हें निभानी पड़ी। चुनावों को सफलता का एकमात्र मापदंड माननेवालों की दृष्टि में संसद में केवल दो स्थान, जो डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के नेतृत्व में लड़े गए पहले चुनाव में पाई गई तीन सीटों से भी कम थी, तब आस्था और विश्वास का संबल बनना पड़ा, ऐसे क्षण भी आए। अटलजी इसके बाद भी टूटे नहींl इसके बाद भी देशभर में प्रवास की अखंड धारा चलीl संसद से सड़क तक संघर्ष जारी रखाl


सन 1984 में अटलजी ग्वालियर से चुनाव लड़ रहे थे। वे उस चुनाव में पराजित हो गए। इसके बाद वे रक्षाबंधन के पर्व पर अपनी छोटी बहन से राखी बंधवाने ग्वालियर आए, उस समय पत्रकार के नाते इस पंक्ति का लेखक वहां उपस्थित था। हम सभी पत्रकार उनके पास पहुंचे। एक वरिष्ठ पत्रकार ने अटलजी से कहा, "आपके भाषण सुनकर जनता के मन में अपार श्रद्धा उत्पन्न होती है।" अटलजी ने त्वरित जवाब देते हुए कहा, "भाषण में श्रद्धा और वोट में श्राद्ध।" यह सुनकर सभी पत्रकारों ने राजनीति की गहराई समझा। अटलजी मनोविनोद में बहुत गहरी बातें कह जाते थेl उन्होंने अपनी वाणी की शैली से अपनी अलग पहचान बनाईl वे भारत के ऐसे राजनेता थे जिनकी सभा का सन्देश सुनकर लाखों लोग सहज उन्हें सुनने आ जाते थेl


अटलजी प्रधानमंत्री बनें, यह सिर्फ भाजपा की नहीं बल्कि पूरे भारत की इच्छा थी। वर्षों तक विपक्ष के नेता रहते हुए भारत का अनेक बार भ्रमण किया। भ्रमण के दौरान अपनी वाणी से प्रत्येक भारतीयों को जहां जोड़ा और भारत को समझा, वहीं सदन के भीतर सत्ता में बैठे लोगों पर मां भारती के प्रहरी बनकर सदैव उनकी गलतियों को देश के सामने रखते रहे। भारतीय राजनीति में विपक्ष में रहते हुए जितने लोकप्रिय और सर्वप्रिय अटलजी रहे, प्रधानमंत्री रहते हुए भी पण्डित जवाहरलाल नेहरू उतने लोकप्रिय नहीं हुए। अटलजी के आचरण और वचन में लयबद्धता और एकरूपता थी। वे जब तक सदन में विपक्ष या सत्ता में रहे तब तक सदन के राजनैतिक हीरो अटलजी ही रहे। इस बात को हम नहीं बल्कि तत्कालीन अनेक वरिष्ठ नेतागण स्वयं कहते थे।


सन् 1996 में पहली बार 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बनने, बाद में सन् 1999 में मात्र एक वोट से सरकार गिर जाने जैसी दुखद स्थिति में भी न वे स्वयं विचलित हुए, न पार्टी के सदस्यों को हार के कारण दुखी और हतप्रभ होने दिया। यह सब तभी संभव है जब व्यक्ति में आत्मबल हो और अपने आप पर पूर्ण विश्वास हो। अटलजी ने कहा भी, “खरीद-फरोख्त और ऐसी कोई भी जोड़-तोड़ की सरकार बनती है तो उसे चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा”। इसके लिए विरोधी नेताओं ने भी सदन में उनकी प्रशंसा की। प्रत्येक भारतीय ने भी अटलजी के दर्द को महसूस किया। देश के लोगों के आशीर्वाद से सन् 1999 के चुनाव में फिर प्रधानमंत्री बने। यही था अटलजी का अटल और विराट व्यक्तित्व।


अटलजी अक्सर कहा करते थे, "दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं"l यही कारण था वे भारत से बस लेकर लाहौर गए लेकिन जब पाकिस्तान ने आंख दिखाई तो कारगिल के युद्ध में उसे बुरी तरह पराजित भी कियाl वे छोटे राज्यों के हिमायती थेl उन्होंने बड़ी सरलता से छत्तीसगढ़, झारखंड एवं उत्तराखंड का गठन अपने कार्यकाल में कर दियाl भारत के गांवों को सड़क से जोड़ने का ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए उसे फलीभूत करने में कोई कस्र नहीं छोड़ाl राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पोखरण में परमाणु परीक्षण कर विश्व को संदेश दिया कि हम किसी से कमजोर नहींl


अटलजी सिद्धांतवादी, विचार एवं व्यवहार से सरल और जमीन से जुड़े महान नेता थे। उन्होंने विपक्ष में रहते हुए भी देश के हर दल के राजनेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में अपना विशिष्ट स्थान बनाया था। वह विपक्षी नेताओं का भी दिल जीत लेते थे। उनका मानना था कि भाजपा कार्यकर्ताओं की पार्टी है। जो नेता है, वह भी कार्यकर्ता है। उनका कहना था कि जो आज विधायक है, वह कल शायद विधायक नहीं रहे। सांसद भी सदैव नहीं रहेंगे। कुछ लोगों को पार्टी बदल देती है, कुछ को लोग बदल देते हैं, लेकिन कार्यकर्ता का पद ऐसा है, जो बदला नहीं जा सकता। कार्यकर्ता होने का हमारा अधिकार छीना नहीं जा सकता।


आज अटलजी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जनसंघ के घोषणा-पत्र में लगातार जो बातें आती रहीं, उन सभी को आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी साकार कर रहे हैं। अटलजी को भारत रत्न से विभूषित कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी ने केवल अटलजी का ही नहीं, भारत के करोड़ों लोग जो अटलजी के प्रसंशक थे, उनका सम्मान किया। अटलजी कहा करते थे, "सरकार गरीबों के लिए, सरकार समाज के लिए, सरकार राष्ट्र के लिए और सरकार एक-एक भारतीय के लिए होनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी की सरकार आज अपनी योजनाओं से देश के गरीबों तक पहुंच रही है। "सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास" अटलजी के दिखाए गए मार्ग का प्रकटीकरण ही तो है।


-प्रभात झा-

(लेखक प्रभात झा -पूर्व भाजपा उपाध्यक्ष व पूर्व राज्य सभा सांसद)





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अटल बिहारी वाजपेयी: भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष

देश के पूर्व प्रधानमंत्री तथा भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य रहे अटल बिहारी वाजपेयी जी इतने हाजिरजवाब राजनेता थे कि पलभर में सामने वाले व्यक्ति की बोलती बंद कर किया करते थे।


भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष अटल जी की इस हाजिरजवाबी, मजाकिया स्वभाव और ईमानदार शख्सियत के कारण विरोधी दलों के नेता भी उन्हें भरपूर मान-सम्मान दिया करते थे। भारत में ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी वाजपेयी जी अपने चुटीले अंदाज और हाजिरजवाबी से दूसरे पक्ष को चुप करा दिया करते थे। देश-विदेश में उनकी हाजिरजवाबी के ऐसे ही अनेक किस्से प्रचलित हैं। ऐसे ही किस्सों में से कुछ अपने पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।


एक बार पाकिस्तान के आतंकी कैंपों के बारे में कुछ पत्रकारों ने वाजपेयी जी से सवाल किया कि पड़ोसी कहते हैं, ताली एक हाथ से नहीं बजती। वाजपेयी जी ने यह सुनते ही तपाक से जवाब दिया कि ताली नहीं पर चुटकी तो बज ही सकती है। इसी प्रकार एक बार पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने बयान दिया कि कश्मीर के बिना पाकिस्तान अधूरा है। इस पर वाजपेयी जी ने अपने चुटीले अंदाज में टिप्पणी करते हुए कहा, 'किन्तु पाकिस्तान के बिना हिन्दुस्तान अधूरा है।'


ऐसा ही एक और किस्सा स्मरण आता है, जब एक पाकिस्तानी महिला पत्रकार ने अटल जी के समक्ष शादी का अनूठा प्रस्ताव रख दिया। उसने अटल जी से कहा कि अगर आप मुंहदिखाई में कश्मीर दे दें तो मैं आपसे शादी करने को तैयार हूं। अटल जी ने उस महिला पत्रकार को ऐसा करारा जवाब दिया कि उनके उस जवाब की गूंज लंबे समय तक पूरे पाकिस्तान में गूंजती रही। उन्होंने कहा कि ठीक है, मैं आपसे शादी तो कर लूंगा लेकिन दहेज में मुझे पूरा पाकिस्तान चाहिए।


भाजपा 1996 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनी और तब वाजपेयी जी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया गया। रात के समय आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार ने वाजपेयी से पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को लेकर प्रश्न पूछा कि आप आज रात बेनजीर भुट्टो को क्या संदेश देना चाहेंगे? हाजिरजवाबी का परिचय देते हुए उन्होंने उत्तर दिया कि यदि मैं कल सुबह बेनजीर को कोई संदेश दूं तो क्या उससे कोई नुकसान है?


अपनी ऐसी ही हाजिरजवाबी का परिचय देते हुए वाजपेयी जी ने एकबार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी निरूत्तर कर दिया था। दरअसल इंदिरा गांधी ने जनसंघ पर कुछ तीखी टिप्पणियां की थी और वाजपेयी उन दिनों जनसंघ के ही सांसद थे। इंदिरा ने संसद में दिए अपने भाषण में भारतीयता के मुद्दे पर जनसंघ को घेरते हुए कहा था कि वो जनसंघ जैसी पार्टी से पांच मिनट में निपट सकती हैं। वाजपेयी जी को इंदिरा का वक्तव्य बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने तीखे शब्दों में उसका जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री महोदया कहती हैं कि वह जनसंघ से पांच मिनट में ही निपट सकती हैं लेकिन पांच मिनट में तो आप अपने बाल भी ठीक नहीं कर सकती हैं, फिर भला हमसे कैसे निपटेंगी?


ममता बनर्जी जब वाजपेयी सरकार में रेलमंत्री थी, तब भी वह बात-बेबात नाराज होकर वाजपेयी की सरकार को कटघरे में खड़ा कर देती थी। ऐसे ही एक बार पेट्रोल-डीजल के बढ़े दामों को लेकर ममता बनर्जी की नाराजगी थी। हालांकि वाजपेयी जी ने उन्हें मनाने का बहुत प्रयास किया लेकिन ममता अपनी जिद से टस से मस नहीं हुई। जब वह किसी भी तरह मानने का तैयार नहीं हुई तो देश के प्रधानमंत्री होते हुए भी वाजपेयी जी स्वयं कोलकाता में ममता के घर जा पहुंचे। ममता उस वक्त कोलकाता में नहीं थी इसलिए उन्होंने ममता की मां को कहा कि आपकी बेटी बहुत शरारती है और बहुत तंग करती है। जब ममता वापस कोलकाता लौटी और उनकी मां ने वाजपेयी जी का संदेश उन्हें दिया तो वाजपेयी जी की महान शख्सियत के समक्ष सातवें आसमान पर बैठा ममता का गुस्सा पलभर में गायब हो गया।


राष्ट्रीय मंचों से लेकर अंतराराष्ट्रीय मंचों तक उन्होंने सदैव अपने वक्तव्यों का लोहा मनवाया। भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह अटल बिहारी वाजपेयी 93 वर्ष के अपने जीवनकाल में कुल तीन बार देश के प्रधानमंत्री बने। देश को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाने का कारनामा भी वाजपेयी जी के कार्यकाल में ही हुआ था। उनके प्रधानमंत्री रहते ही राजस्थान के पोरखण में 1 मई 1998 को परमाणु बम परीक्षण किया गया था और भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बनने का गौरव हासिल हुआ।


16 अगस्त 2018 को यह महान हस्ती दुनिया को सदा के लिए अलविदा कह गई। आज भले यह महान शख्सियत हमारे बीच नहीं है लेकिन प्रत्येक देशवासी के हृदय में वे हमेशा अजर-अमर रहेंगे।


-श्वेता गोयल-

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)






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पारदर्शी हो टोल वसूली

केवल तीन दशक पहले की देश की सड़कों यहाँ तक कि राष्ट्रीय राजमार्गों तक की स्थिति को यदि हम याद करें तो हमें जगह जगह सड़कों में पड़े गड्ढे, उन सड़कों में बरसातों में कीचड़ पानी आदि दिखाई देता है। चौड़ी,काली, चमचमाती हुई चार व छः लेन की सड़कें तो केवल फ़िल्मों में ही नज़र आती थीं। वह भी विदेशों में की गयी शूटिंग में। तीन दशक पूर्व तक जगह जगह दुर्घटनाओं के मंज़र दिखाई देते थे। ज़ाहिर है लगभग दो सौ वर्ष तक अंग्रेज़ों द्वारा जी भर कर लूटा गया भारतवर्, आज़ादी के बाद आर्थिक व तकनीकी रूप से कमज़ोर था और धीरे धीरे आत्मनिर्भर हो रहा था। दुर्भाग्यवश भारत को चीन व पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मिले जिन्हें भारत की प्रगति व आत्मनिर्भरता रास नहीं आती थी। लिहाज़ा आज़ादी के मात्र तीन दशक के भीतर ही भारत को अपने इन्हीं पड़ोसियों से युद्ध का सामना भी करना पड़ा। ऐसे में देश के विकास के आधारभूत ढांचे पर इसका प्रभाव पड़ना ही था।


बहरहाल तीन दशक पूर्व जब वैश्वीकरण का दौर शुरू हुआ,पूरी दुनिया ने एक दूसरे से सहयोग व एक दूसरे की बाज़ार व्यवस्था का हिस्सा बनना शुरू किया तभी भारत सहित कई विकासशील देशों में भी परिवर्तन का दौर आना शुरू हुआ। अब वह दौर समाप्त हो गया कि यदि किसी देश के पास पैसे नहीं तो वह सड़कें नहीं बना सकता। अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अनेक प्रगतिशील व जनहितकारी नीतियां व योजनायें बनीं। इन्हीं में सड़क निर्माण से जुड़ी एक नीति थी बोट अर्थात बिल्ट ऑपरेट ट्रांसफर इस नीति के तहत देश की हज़ारों सड़कें,राष्ट्रीय राजमार्ग बड़े बड़े पुल व फ़्लाई ओवर बनाये गये और अभी भी बनाये जा रहे हैं। इसमें कोई निर्माण कंपनी सरकारी स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा के बाद किसी सड़क अथवा अन्य निर्माण परियोजना का टेंडर प्राप्त करती है। उसके बाद वह कंपनी निर्माण परियोजना को पूरा कर किसी दूसरी मार्ग संचालन कंपनी के हवाले कर देती है। वह कंपनी उस परियोजना को संचालित कर उसपर आये ख़र्च की ब्याज व मुनाफ़ा सहित वसूली आम लोगों से टोल टैक्स के रूप में करती है। और जब वह कंपनी अपनी वसूली पूरी कर लेती है तब वह परियोजना सरकार को हस्तांतरित कर देती है। इसी व्यवस्था के तहत देश के अनेक एक्सप्रेस वे के निर्माण भी किये गये हैं। इनपर एक स्थान से दूसरे स्थान तक अथवा किलोमीटर के हिसाब से वाहन चालकों से वसूली की जाती है।


टोल वसूली की व्यवस्था को देरी मुक्त करने के उद्देश्य से अति आधुनिक Fastag व्यवस्था भी पिछले कुछ वर्षों से शुरू की जा चुकी है। कहीं कहीं तो फ़ास्ट टैग न होने पर वाहनों से दोगुना शुल्क वसूला जाता है। परन्तु इस टोल वसूली के तौर तरीक़ों तथा टोल शुल्क की क़ीमतों को लेकर वाहन चालकों में एक संदेह की स्थिति हमेशा बनी रहती है। किसी टोल पर कुछ शुल्क वसूला जाता है तो किसी पर कुछ । कोई टोल किसी पुरानी जगह से हटाकर किसी दूसरी नई जगह पर लगा दिया जाता है तो कभी किसी टोल का शुल्क अचानक बढ़ा दिया जाता है। टोल वसूली की पूरी व्यवस्था कंप्यूटरीकृत होने के कारण ज़ाहिर है परियोजना संचालित करने वाली कंपनी को इस बात की पल पल जानकारी मिलती है कि कब किस क्षण किस टोल प्लाज़ा पर कितने पैसों की वसूली की जा चुकी है। परन्तु टोल का भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों को इस बात की क़तई जानकारी नहीं हो पाती कि किस टोल बैरियर पर कुल कितनी वसूली की जानी है,कितनी वसूली की जा चुकी है और अब कितनी वसूली बक़ाया है।


पिछले दिनों चले किसान आंदोलन में एक वर्ष तक देश के सैकड़ों टोल किसानों ने निः शुल्क करवा दिये थे। इस दौरान टोल वसूली के पक्षधरों द्वारा कई बार टोल वसूली रुकने पर चिंता भी जताई गयी। बार बार यह बताने का प्रयास किया गया कि टोल वसूली स्थगित होने की वजह से कितना नुक़सान हो रहा है। परन्तु टोल वसूली को लेकर जनता के मन में जो चिंता,सवाल,शंकायें हैं उनपर सरकार का ध्यान कभी नहीं गया। किसान आंदोलन के दौरान ही संसद में स्वयं प्रधानमंत्री ने किसानों की मांगों पर नहीं टोल वसूली बाधित होने व मोबाईल टावर्स को कथित तौर पर नुक़सान पहुंचाये जाने पर चिंता ज़ाहिर की थी। गोया हमारे राजनेता कॉर्पोरेट्स के हितों के लिये तो चिंतित हैं ,उनको हो रहे किसी भी नुक़सान की तो उन्हें चिंता है,परन्तु ये उस आम जनता के हितों के लिये फ़िक्रमंद नहीं जिसने अपना क़ीमती वोट देकर जनहितकारी उद्देश्यों को पूरा करने के मक़सद से इन्हें सत्ता के शिखर पर बिठाया है ?


आधुनिक तकनीक व वसूली के कंप्यूटरीकृत तरीक़े के चलते आज यह पूरी तरह संभव है कि प्रत्येक टोल की शुल्क वसूली को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाये। प्रत्येक टोल पर बड़े स्क्रीन लगाये जाने चाहिये और उन्हें टोल वसूली कंप्यूटर्स से जोड़ देना चाहिये। इसके स्क्रीन पर इस बात की स्पष्ट जानकारी होनी चाहिये कि अमुक टोल वसूली वाली परियोजना की लागत क्या है? इस टोल पर कुल कितनी रक़म वसूल की जानी है। अब तक कितनी वसूली की जा चुकी है और अब कितनी वसूली बक़ाया है। टोल वसूली का स्क्रीन डिस्प्ले का यह पारदर्शी तरीक़ा जहां आम लोगों में सरकार व टोल वसूली कंपनियों के प्रति विश्वास पैदा करेगा वहीं जनता को यह विश्वास भी हो सकेगा कि टोल प्लाज़ा पर उन्हें लूटा व ठगा नहीं जा रहा है। जब तक टोल वसूली व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी नहीं होगी तब तक आम लोगों में इस बात का संदेह बना रहेगा कि टोल के नाम पर उन्हें ठगा व लूटा जा रहा है और सरकार व टोल वसूली करने वाली कंपनियों के बीच कोई न कोई साठगांठ ज़रूर है। 


-निर्मल रानी-







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मोदी सरकार ने विवाह की न्यूनतम उम्र बढ़ाकर लड़कियों को सपने साकार करने का अवसर दिया

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नारी विकास का सपना रात के अँधेरे में बंद आँखों से नहीं, दिन के उजाले में खुली आँखों से देखा है। उनके स्वप्न में नारी के चहुंमुखी विकास की कल्पना के साथ स्त्री और पुरुष की समानता की दस्तक है। मोदी ने 2020 के स्वतंत्रता दिवस सम्बोधन में घोषणा की थी कि देश में लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र को 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 किया जाएगा। वे जो कहते हैं, उसे साकार भी करते हैं, यही कारण है कि करीब एक वर्ष बाद ही प्रधानमंत्री ने अपनी घोषणा को क्रियान्वित कर दिखाया है। केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में महिलाओं के लिए विवाह की कानूनी आयु 18 से 21 वर्ष तक बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब इसे संसद में पेश किया जाएगा।


निश्चित ही इस नयी व्यवस्था के बनने से नारी जीवन में एक नया उजाला होगा। एक मंजिल, एक दिशा और एक रास्ता, फिर भी स्त्री और पुरुष के जीवन में अनेक असमानताएं रही हैं, समाज की दो शक्तियां आगे-पीछे चल रही थीं। इस तरह की विसंगतियों एवं असमानताओं को दूर करने के लिये सोच के दरवाजे पर कई बार दस्तक हुई, जब-जब दरवाजा खोला गया, दस्तक देने वाला वहां से लौटता दिखाई दिया। लेकिन मोदी ने दस्तक भी दी और इसे साकार भी किया है, जिसका स्वागत होना चाहिए। क्योंकि इससे नारी तेजी से विकास करते हुए अपने जीवन में पसरी अनेक विसंगतियों को दूर होते हुए देख सकेंगी। लेकिन कानून बनाने का फायदा तभी है, जब उसे संपूर्णता में लागू किया जाये। परिवार व समाज को बेटियों के व्यापक हित के लिए ज्यादा ईमानदारी एवं संवेदना से सोचना अपेक्षित है। अब भारत में पुरुष और महिला, दोनों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु सीमा 21 हो जाएगी, जो एक आदर्श एवं समतामूलक समाज की संरचना को आकार देगी।


लड़कियों के विवाह की उम्र का प्रश्न केवल संतुलित समाज व्यवस्था से ही नहीं जुड़ा है बल्कि यह उनके स्वास्थ्य, सोच, सुरक्षा, विकास से भी जुड़ा है। हर देश, समाज एवं वर्ग विकसित होना चाहता है। विकास की दौड़ में महिलाएं भी पीछे क्यों रहें? यह प्रश्न अर्थहीन नहीं है, पर इसके समाधान में अनेक बिन्दुओं को सामने रखकर मोदी ने चिन्तन किया और एक नवनीत समाज एवं राष्ट्र के सम्मुख प्रस्तुत किया है। प्रधानमंत्री ने तब कहा था, ‘सरकार बेटियों और बहनों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है। बेटियों को कुपोषण से बचाने के लिए जरूरी है कि उनकी सही उम्र में शादी हो।’ इसके लिए एक टास्क फोर्स की स्थापना हुई थी, जिसमें स्वास्थ्य मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, कानून मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। टास्क फोर्स ने पुरजोर तरीके से कहा था कि पहली गर्भावस्था के समय किसी महिला की आयु कम-से-कम 21 साल होनी चाहिए। सही समय पर विवाह होने पर परिवारों की वित्तीय, सामाजिक और स्वास्थ्य की स्थिति मजबूत होती है। परिपक्व उम्र में शादी होने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ने और आजीविका चुनने का मौका मिलता है। वे एक परिवार के कुशल संचालन में भी दक्ष हो जाती हैं। जगजाहिर है कि बड़ी संख्या में लड़कियों की पढ़ाई, रोजगार, परिवार संचालन की जिम्मेदारी कम उम्र में शादी की वजह से बाधित होती रही है। अपने मौलिक गुणों से सम्पन्न लड़कियां जिस किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ती हैं तो वह कल-कल करती नदी की तरह निर्मल व पवित्र रहती हुई न केवल स्वयं विस्तार पाती हैं बल्कि जहां-जहां से वह गुजरती हैं विविध रूपों में उपयोगी बनती जाती हैं। उपयोगी बनने की एक उम्र सीमा होती है।


मोदी सरकार विवाह की उम्र सीमा बढ़ाने के बाद अब बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 में संशोधन पेश करेगी और इसके परिणामस्वरूप विशेष विवाह अधिनियम और हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 जैसे व्यक्तिगत कानूनों में संशोधन लाएगी। दिसम्बर 2020 में जया जेटली की अध्यक्षता वाली केन्द्र की टास्क फोर्स द्वारा नीति आयोग को सिफारिशें सौंपी गयी थीं। इस टास्क फोर्स का गठन मातृत्व की उम्र से संबंधित मामलों, मातृ मृत्यु दर को कम करने की अनिवार्यता, पोषण में सुधार से संबंधित मामलों की जांच के लिए किया गया था। केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने इन्हीं सिफारिशों के आधार पर ही लड़कियों की विवाह उम्र बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष होने के अनेक फायदे हैं, सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लड़कियों का आत्मविश्वास एवं मनोबल बढ़ेगा। वे अपने कैरियर एवं जीवन के लिये प्रभावी निर्णय लेने में सक्षम होंगी। वे बाल विवाह जैसे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस करेंगी। अत्याचार एवं शोषण का प्रतिकार कर सकेंगी। परिवार व समाज को बेटी के 21 साल की होने का इंतजार करना पड़ेगा।


नारी को अपने जीवन स्तर को ऊंचा उठाना है, उन्हें एक ऐसा पेड़ बनना है जो छाया भी दे और फल भी दे। उनकी उपयोगिता बनी रहे। गुजरते दौर में उन्होंने सुंदर कपड़े पहनना, सुन्दर व आकर्षक दिखना, सुंदर घर सजाना, ज्ञान और विज्ञान की सुंदर बातें करना सीख लिया है। इसकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता है, लेकिन अब उन्हें अपने पैरों पर खड़े होकर स्वयं को निर्मित करते हुए समाज एवं राष्ट्र के विकास में भी योगदान देना है। इसके लिये जरूरी है कि वे कच्ची उम्र में विवाह के बंधन एवं परम्परा से मुक्ति पायें। हालांकि कानून के बन जाने पर भी वे इन परम्पराओं एवं बंधनों से मुक्त हो जायेंगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। आज भी देश एवं दुनिया में नारी के सम्मान एवं अधिकार के लिये बने कानूनों की धज्जियां उड़ते हुए देखी जाती हैं।


समाज का एक बड़ा तबका आज भी नारी को दोयम दर्जा का ही मानता है। ऐसी पुरातनपंथी सोच वालों का सोचना है कि लड़कियां जल्दी परिपक्व हो जाती हैं, इसलिए दुल्हन को दूल्हे से कम उम्र की होना चाहिए। साथ ही यह भी कहा जाता है कि चूंकि हमारे यहां पितृ सत्तात्मक समाज है, तो पति के उम्र में बड़े होने पर पत्नी को उसकी बात मानने पर उसके सम्मान को ठेस नहीं पहुंचती। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने समय-समय पर लड़कियों की शादी की उम्र पर पुनर्विचार करने की जरूरत बताई हैं। वर्ष 1929 के बाद शारदा एक्ट में संशोधन करते हुए 1978 में महिलाओं के विवाह की आयु सीमा बढ़ाकर 15 से 18 साल की गई थी।


विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मातृत्व मृत्यु दर गर्भावस्था पर उसके संक्रमित कारणों के चलते हर वर्ष एक लाख महिलाओं की मातृत्व के कारण मौत हो जाती है। मातृत्व मृत्यु दर का बड़ा कारण कम उम्र में शादियां होना ही है। इसलिये समूची दुनिया में लड़कियों की उम्र बढ़ाने पर व्यापक स्तर पर चर्चा होती रही है, परिवर्तन भी किये जा रहे हैं। चीन में शादी की न्यूनतम उम्र पुरुषों के लिए 22 साल और महिलाओं के लिए 20 साल तय की गई है। पाकिस्तान और कई अन्य मुस्लिम देशों में पुरुषों के लिए शादी की उम्र 18 साल और महिलाओं के लिए 16 साल है। ईरान में लड़कियों के विवाह के लिए न्यूनतम आयु 13 साल है, लेकिन अदालत और लड़की के पिता की अनुमति हो तो 9 वर्ष में भी लड़कियों की शादी कर दी जाती है। इराक में लड़कियों की शादी की उम्र 18 वर्ष तय है लेकिन अगर मां-बाप की इजाजत हो तोशादी 15 वर्ष की उम्र में भी हो सकती है। यहां तक कि अमेरिका में भी कोई उच्च सीमा नहीं है। वहां साल 2000 से 2015 के बीच अवयस्कों के दो लाख से ज्यादा वैध विवाह दर्ज हुए थे। लेकिन वह अलग तरह के सामाजिक ढांचे वाला अमीर शिक्षित देश है, जबकि भारत में सामाजिक ढांचा दूसरी तरह का है, यहां कानून बनाकर और उसे ढंग से लागू करके ही आदर्श समानता, सह-जीवन एवं विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है। जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे महिलाओं के लिए शिक्षा और कैरियर में आगे बढ़ने के अवसर भी बन रहे हैं। इसलिए महिला मृत्यु दर में कमी लाना और पोषण के स्तरों में सुधार लाना जरूरी है। समय की दस्तक को सुनते हुए मां बनने वाली लड़की की उम्र से जुड़े पूरे मुद्दे को संवेदनशील नजरिये के साथ देखना जरूरी है। स्वस्थ एवं समतामूलक समाज की संरचना का दिल और दिमाग में उठ रहे इस नये सपने को आकार देने में सभी सहभागी बनें, ताकि नारी जीवन-निर्माण का नया दौर शुरू हो सके


-ललित गर्ग-





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हींग लगे न फिटकरी....! - सरकारी धन से चुनाव प्रचार की रीति.... कहाँ तक ठीक....?

आपको याद होगा प्रसिद्ध विचारक अब्राहम लिंकन द्वारा रचित प्रजातंत्र की वह परिभाषा जिसमें ‘प्रजा’ को अहम् बताते हुए कहा गया था- ‘‘सरकार जनता की, जनता के लिए और जनता के द्वारा’’ (गवर्तमेंट आॅफ द पिपुल, फाॅर द पिपुल एण्ड आॅफ द पिपुल)। किंतु मौजूदा राजनीति ने इस परिभाषा को बदलकर ‘जनता’ (पिपुल) की जगह ‘सत्ता’ को बैठा दिया है, अर्थात् अब प्रजातंत्र की परिभाषा ‘‘सरकार सत्ता के लिए, सत्ता के द्वारा और सत्ता की’’ हो गई है, अब प्रजातंत्र से ‘प्रजा’ को लोप हो गया है और ‘तंत्र’ सत्ता का सेवक बनकर रह गया है, यहाँ ‘सत्ता’ से मतलब स्वार्थ की राजनीति से है। आज की राजनीति का एक मात्र लक्ष्य ‘जनसेवा’ नहीं, सिर्फ और सिर्फ ‘सत्ता’ रह गया है। अर्थात् आज की सरकारें जितने भी जनसेवा का नबाक ओढ़कर कार्य करता है, वे सब स्वार्थपूर्ण राजनीति व सत्ता की चासनी में लिपटे होते है। जनता से करों के रूप में वसूली गई भारी धनराशि से जितने भी कथित विकास कार्य किये जा रहे है उन विकास कार्यों के पीछे भी ‘जनसेवा’ कम राजनीतिक ‘ढ़िंढोरा’ ज्यादा होता है, फिर वे चाहे हजारों किलोमीटर की सड़कों के निर्माण हो या अन्य कोई कार्य और अब तो यह रीत ही बन गई है कि जनता से एकत्र सरकारी धन ऐसे कार्यों पर खर्च करो जिनसे राजनीतिक स्वार्थ सिद्धी ज्यादा हो, फिर चाहे वे जनता के लिए उपयोगी हो या नहीं?


....और अब तो उत्तरप्रदेश ने कुछ ऐसी स्वार्थ सिद्धी की पवित्र नदियों के नाम पर राजपथ निर्माण की ऐसी आंधी चलाई कि वह सभी भाजपाशासित राज्यों में तेजी से फैलती जा रही है, उत्तरप्रदेश में ‘गंगा’ के नाम पर तो मध्यप्रदेश में ‘नर्मदा’ के नाम पर लम्बे राजपथ तैयार किये जा रहे है। यह तो हुई जनता की गाढ़ी कमाई की बर्बादी की चर्चा, अब यदि मौजूदा राजनीति को प्रजातंत्र के अन्य मूल सिद्धांतों की कसौटी पर कस कर देखें तो हमें हर तरफ निराशा ही निराशा महसूस होने लगती है। निराशा का मूल कारण अब राज कार्यों में राजनीतिक स्वार्थ की मात्रा अधिक होना व जनसेवा का अंश कम होना है।


आज हर कहीं यही देखने को मिलता है कि जिस भावना से चुनाव लड़े जाते है और जिस अपेक्षित भावना से जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है दोनों तत्वों के बीच सोच-समझ का काफी अंतर पैदा हो गया है, चुनावी घोषणा-पत्र अब सिर्फ जनता को आकर्षित करने के माध्यम ही बनकर रह गए है न इन घोषणा-पत्रों की घोषणाओं को मूर्तरूप मिल पाता है और न लाखों मतदाताओं के सामने किये गए वादें ही पूरे हो पाते है, पांच सालों के साढ़ महीनों में एक या दो महीने जनता (मतदाता) की पूछ-परख के होते है, बाकी अट्ठावन महीनें मतदाता ही याचक बने रहने को मजबूर होता है, यह भी आजकी आम राजनीति का मुख्य चलन बन गया है। यह बात मैं किसी राजनीतिक दल विशेष के बारे में नहीं बल्कि राजनीति के पूरे ‘कुएँ’ में घोली गई ‘स्वार्थ’ की ‘भाँग’ की बात कर रहा हूँ।

आज सत्ता प्राप्ति तक सत्ता हथियाने के हथकंड़ों पर जोर दिया जाता है और सत्ता का सिंहासन प्राप्त होने के बाद इस सिंहासन को ‘दीर्घजीवी’ बनाने के जोड़-तोड़ शुरू हो जाते है और यह प्रक्रिया अगले चुनाव होने तक अनवरत जारी रहती है और इन्हीं प्रयासों या जोड़-तोड़ की ‘धुंध’ में ‘जनसेवा’ का लोप हो जाता है, आज की राजनीति की यही त्रासदी है। आज शासन की सेवा करने वाला आम सरकारी मुलाजिम अपनी जिन्दगी के तीन दशक पूरे आत्म समर्पण भाव से सरकार को सौंपने के बाद भी उसे शेष जिन्दगी गुजारने के लिए वे सब संसाधन नहीं मिल पाते जो महज पांच साल सरकार में अहम पदों पर रहकर लूटमार करने वाले राजनेताओं को मिल जाते है, सेवा करने और सेवा का ढ़िंढोरा पीटने वालों के बीच आज के प्रजातंत्र में यही मूल अंतर है, क्या यही सब दिखाने के लिए हमारे पूर्वज शहीदों ने अपना सर्वस्व लुटाकर आजादी प्राप्त की थी, अभी देश की जनता की इस दिशा में ‘तंद्रा’ टूटी नहीं है, जिस दिन जनता जागृत हो जाएगी तो फिर क्या होगा? कल्पना से परे है? 


-ओमप्रकाश मेहता-






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ओमिक्रॉन का बढ़ता खतरा

अभी कुछ समय पहले ही जब दक्षिण अफ्रीका में कोरोना के नए बहुरूप ओमिक्रॉन का मामला सामने आया था, तभी कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दे दी थी कि अगर समय रहते इससे निपटने के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए तो यह खतरनाक रूप ले सकता है। हालांकि कोरोना की पहली और दूसरी लहर के त्रासद अनुभवों से सबक लेते हुए दुनिया भर में इस चेतावनी की अनदेखी तो नहीं की गई, लेकिन ऐसा लगता है कि इसे सीमित करने के प्रयास ज्यादा शिद्दत से किए जाने चाहिए थे। खबर आने के बावजूद ज्यादातर जगहों पर लोगों ने अपने स्तर पर सावधानी बरतना जरूरी नहीं समझा। अब भारत में भी ओमिक्रॉन ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिए हैं। शुरुआती दौर में कर्नाटक सहित कुछ राज्यों में इसकी मौजूदगी के संकेत पाए गए, लेकिन अब गुजरते दिन के साथ अन्य इलाकों में भी इसका खतरा बढ़ता जा रहा है। देश भर में अब ओमिक्रॉन से संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यों भारत जैसे इतने बड़े देश में कुल संख्या के लिहाज से देखें तो संक्रमण का दायरा फिलहाल बहुत बड़ा नहीं दिखता है। लेकिन शुरुआती दौर से कोरोना के विषाणु के फैलाव का जो स्वरूप रहा है, उसके मद्देनजर कहा जा सकता है कि अगर वक्त रहते इसकी रोकथाम के इंतजाम नहीं किए गए, लोगों ने अपने स्तर पर एहतियात बरतना जरूरी नहीं समझा तो आने वाले दिनों में यह संकट बड़ा हो सकता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले साल अप्रैल-मई में गंभीर स्थिति में पहुंचने से पहले कोरोना के मामले इक्के-दुक्के ही बताए गए थे और इसके बाद दूसरी लहर के पूर्व भी हालात नियंत्रण में लग रहे थे। लेकिन दोनों बार इसके कहर को दुनिया ने देखा। अभी ओमिक्रॉन अपने असर में भले गंभीर नहीं दिख रहा है, लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि यह भी कोरोना विषाणु का एक नया बहुरूप है। पिछले करीब दो सालों के दौरान इसके असर के जैसे त्रासद अनुभव रहे हैं, उसके मद्देनजर इसे हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। वैज्ञानिक भी बार-बार चेता रहे हैं कि ओमिक्रॉन भयानक रूप ले सकता है। अब तो विदेश में ओमिक्रॉन से मरने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। अब यह आशंका गहरा रही है कि आने वाले दिनों में एक बार फिर दुनिया के सामने कोरोना के इस नए बहुरूप से निपटना बड़ी चुनौती साबित होगी। विडंबना है कि भारी तादाद में लोगों के कोरोना विषाणु से संक्रमित होने और मारे जाने के बावजूद अब तक इसे लेकर पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाई देती है। हालांकि भारत में टीकाकरण की रफ्तार अपनी गति से चल रही है और अब तक बड़ी आबादी को टीके की खुराक दी जा चुकी है। मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि टीका लेने के बावजूद किसी को संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। अब तक इस विषाणु की जैसी प्रकृति देखी गई है, उसमें टीकाकरण के बाद भी संक्रमण से बचाव के सभी उपायों को निरंतरता में बरतने की सावधानी बनी रहनी चाहिए। इसी में लापरवाही संक्रमण के फैलाव को नया मौका मुहैया करा सकती है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि ओमिक्रॉन बहुरूप को हर स्तर पर गंभीरता से लिया और समय रहते इसके असर को नियंत्रित किया जाए।


-सिद्वार्थ शंकर-



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जब एक दिन के लिए गायब हो गईं हेमा मालिनी

यह सत्तर के दशक की उस समय की बात है जब हेमा मालिनी सुपर सितारा थीं और उस समय के लगभग सभी सुपर सितारे खासतौर पर धर्मेंद्र, जितेंद्र और संजीव कुमार उनकी खूबसूरती के दीवाने बने हुए थे।


हेमा मालिनी से मिलने, उन तक अपने संदेश पहुंचाने, उनके साथ समय बिताने के लिए अलग-अलग तरह की तिकड़में लगाई जाती और इसमें हेमा मालिनी के साथ अधिकतर रहने वाले उनके हेयर ड्रेसर, मेकअप मैन तथा सहयोगी कलाकारों का सहारा लिया जाता था।


हां, यह सब हेमा जी की मां जया चक्रवर्ती जो उनके साथ हमेशा होती थीं उनकी नज़र बचाकर किया जाता था। मां के साथ ही उनके पिता वी.एस. आर.चक्रवर्ती को भी उत्तर भारतीय नायकों के साथ उनका नाम जोड़ा जाना बिल्कुल पसंद नहीं था। धर्मेंद्र से तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि वह पहले से शादीशुदा थे। सभी फिल्मी पत्र-पत्रिकाएं उनके संबंधों के बारे में अफवाहों से भरी रहतीं। इस बीच धर्मेंद्र कई छोटे-बड़े पत्रकारों को हेमा के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करने पर पीट भी चुके थे। वे दीवानगी की हद तक हेमा के प्रति अधिकार- भाव रखने लगे थे। संवेदनशील हेमा इस सबसे बेहद तनाव में रहती। इसी दौरान हेमा की होनेवाली भाभी स्मिता ने उन्हें उनके परिवार की गुरु माँ इंदिरा जी से मिलवाया जो पुणे में रहती थीं।


एक दिन जब वे शूटिंग के लिए निकल ही रही थीं कि उनके पास स्टूडियो से शूटिंग रद्द होने का फोन आया। उन्होंने यह बात किसी को भी नही बताई। उस दिन उनका स्टाफ भी उनके साथ नहीं था। अचानक हेमा ने अपने ड्राइवर से पुणे चलने को कहा तो वह घबरा गया क्योंकि उसे उनके परिवार का स्पष्ट निर्देश था कि वह उन्हें अकेले लेकर कहीं भी न जाए। पर जब उन्होंने जोर दिया तो वह मान गया।


हेमा अपने इस साहसिक कार्य पर खुद भी अचंभित हो रही थी, पर कुछ ऐसा था, जो उन्हें खींचे जा रहा था। पुणे में हेमा सीधे माँ इंदिरा जी के आश्रम जा पहुँचीं। आश्रम के भक्तजन उन्हें देखकर आश्चर्यचकित थे। हेमा मालिनी ने प्रवचन में भाग लिया और उसके खत्म हो जाने के बाद भी वहीं बैठी रहीं। उन्होंने पूरा दिन इंदिरा माँ के साथ ही बिताया। हेमा उनके सान्निध्य मात्र से ही बेहद शांति का अनुभव कर रही थीं।


तब तक हेमा के परिवार को भी उनकी शूटिंग रद्द हो जाने का पता चल चुका था। उन्होंने उन सभी मित्रों और संबंधियों को फोन किया, जहाँ उनके जाने की संभावना हो सकती थी। यहां तक कि धर्मेंद्र को भी फोन किया गया पर उन्हें भी पता नहीं था कि हेमा कहाँ गई थीं। अंततः हेमा की माँ को ही इंदिरा जी के पुणे स्थित आश्रम में संपर्क करने की याद आई। तब उन्हे इंदिरा ने कहा कि वे अपनी बेटी के लिए चिंतित न हों, क्योंकि वह उनके पास पूरी तरह सुरक्षित हैं और सुबह ही बंबई लौटेगी।


चलते-चलते


इंदिरा माँ ने हेमा को शांत और सहज रूप से आध्यात्मिकता के पथ पर चलना सिखा दिया था। वे उन्हें जीवन और कर्म के बारे में समझाया करती थीं। उन्होंने कई भारतीय मिथकीय पात्रों की साहसिक, उनकी निष्ठा और त्याग की कहानियाँ उन्हें सुनाई। वे मीरा के प्रति कुछ ज्यादा ही लगाव रखती थीं। वे हेमा से हमेशा ही कहा करती थीं कि तुम्हें किसी दिन किसी फिल्म में मीरा का किरदार ज़रूर करना चाहिए।"


एक बार जब हेमा आश्रम से घर लौटीं तो फिल्मकार प्रेमजी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रेमजी कई सालों से हेमा को लेकर फिल्म बनाना चाह रहे थे, पर कुछ भी तय नहीं हो पा रहा था। उनके पास एक-दो स्क्रिप्ट तो थीं, पर हेमा को वे पसंद नहीं आ रही थीं। तब हेमा ने प्रेमजी से कहा कि अगर आप मीरा के ऊपर फिल्म बनाने के इच्छुक हों तो मैं उसका हिस्सा बनना पसंद करूंगी। अगले ही दिन प्रेमजी ने गुलजार को लेखक और निर्देशक के रूप में अनुबंधित कर लिया।


-अजय कुमार शर्मा-

(लेखक जाने-माने स्तंभकार हैं।)





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जनरल बिपिन रावतः हवाएं खुद तुम्हारा तराना गाएंगी

प्रशंसा और चापलूसी से दूर रहने वाले अप्रतिम योद्धा एवं तीनों सेनाओं के समन्वयक (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) बिपिन रावत ने एक टीवी कार्यक्रम में कहा था कि 'खामोशी से बनाते रहो पहचान अपनी, हवाएं खुद तुम्हारा तराना गाएंगी।' तमिलनाडू में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में शहादत के बाद बिपिन रावत की उपलब्धियों के तराने पूरा देश गा रहा है। जनरल रावत भारतीय सेना के तीनों अंगों को नवीनतम तकनीक और शक्तिशाली हथियारों के साथ 21वीं सदी में ले जाने के सपने देखते रहे। इसीलिए उन्होंने सेना की प्रतिरक्षात्मक संरचना में अनेक बदलाव किए और सेना को सांगठनिक रूप से मजबूती दी। उनकी सैन्य बल संबंधी परिकल्पनाओं को परिणाम तक पहुंचाने के लिए ही थल, वायु और नभ सेनाओं में समन्वय बनाए रखने की दृष्टि से सीडीएस का पद भारत सरकार ने सृजित किया और इसकी दो साल पहले जिम्मेदारी जनरल बिपिन रावत को सौंपी। इस चुनौती को न केवल उन्होंने स्वीकारा, बल्कि गरिमा भी प्रदान की। दरअसल सीमांत इलाकों में पड़ोसी देशों की भारत में आतंक और अराजकता फैलाने की जो मंशा आजादी के समय से ही रही है, उसके लिए ऐसे पद की संरचना जरूरी थी। हालांकि इस पद की जरूरत कारगिल युद्ध के समय से ही की जाने लगी थी। अभी तक तीनों सेनाएं स्वतंत्र फैसला लेने की अधिकारी थीं। इस कारण युद्ध के समय त्वरित और परस्पर सहमति से फैसले नहीं हो पाने के कारण विसंगतियों का सामना मैदान में काम करने वाले सैनिकों को भुगतना होता था। इस नाते दो लक्षित हमले (सर्जिकल स्ट्राइक) म्यांमार और पीओके में सफलतापूर्वक किए। अनर्गल प्रलाप करने वाले नेताओं को भी रावत लताड़ते रहे हैं। थल सेना अध्यक्ष रहने के दौरान बिपिन रावत ने राजनेताओं को सीख देकर खलबली मचा दी थी। रावत ने दिल्ली में आयोजित एक स्वास्थ्य सम्मेलन में कहा था, 'नेता वे नहीं, जो लोगों को गलत दिशा में ले जा रहे हैं, ये अनेक शहरों में भीड़ को आगजनी और हिंसा के लिए उकसा रहे हैं।' उन्होंने आगे कहा, 'नेता वही हैं, जो आपको सही दिशा में ले जाएं। आपको सही सलाह दें एवं आपकी देखभाल सुनिश्चित करें।'


रावत ने ऐसा एनआरसी, सीएए एवं एनपीआर के विरोध में देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे तथा पुलिस व सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी का नेतृत्व कर रहे विपक्षी दलों के नेताओं के परिप्रेक्ष्य में कहा था। सेना प्रमुख की इन दो टूक बातों ने युवाओं को गुमराह कर रहे नेताओं को सबक सिखाने का काम किया था। वे रावत ही थे, जिन्होंने कश्मीर के उन पत्थरबाज युवाओं को भी ललकारा था, जो सुरक्षाबलों पर पत्थर बरसाने से बाज नहीं आ रहे थे। उन्होंने कड़ा संदेश देते हुए कहा था, 'जो लोग पाकिस्तान और आईएस के झंडे लहराने के साथ सेना की कार्यवाही में बाधा पैदा करते हैं, उन युवकों से कड़ाई से निपटा जाएगा।'


इस बयान को सुनकर कथित मानवाधिकारवादियों ने बिपिन रावत की खूब आलोचना की थी। कांग्रेस और पीडीपी नेता भी इस निंदा में शामिल थे। उन्हें हिदायत दी गई कि सेना को सब्र खोने की जरूरत नहीं है। किंतु इस बयान के परिप्रेक्ष्य में ध्यान देने की जरूरत थी कि सेनाध्यक्ष को इन कठोर शब्दों को कहने के लिए कश्मीर में आतंकियों ने एक तरह से बाध्य किया था। घाटी में पाकिस्तान द्वारा भेजे गए आतंकियों के हाथों शहीद होने वाले सैनिकों की संख्या 2016 में सबसे ज्यादा थी। इन्हीं हालात से पीड़ित होकर जनरल रावत को दो टूक बयान देना पड़ा था।


रावत के इस बयान के बाद जब अलगाववादियों और पत्थरबाजों पर शिकंजा कसा तब देखने में आया कि कश्मीर में आतंक की घटनाएं घटती चली गई। इस परिप्रेक्ष्य में रावत ऐसे विरले सेनानायक रहे हैं, जो घाटी में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी घटनाओं पर मुखर प्रतिरोध जताते रहे। चीन की पूर्वोत्तर क्षेत्र डोकलाम में घुसपैठ को नियंत्रित करने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। इसी तरह पांच अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 और 35-ए को हटाने की संसद में कार्यवाही की गई थी तब भी घाटी में शांति कायम रखने में उनकी अहम भूमिका रही थी। इन्हीं कामयाबियों के चलते उन्हें जनवरी-2020 में सरकार ने सीडीएस की कमान सौंपी थी। 1999 में कारगिल युद्ध के बाद बनी समिति के सुझाव पर करीब 21 साल बाद यह फैसला नरेंद्र मोदी सरकार ने लिया था।


इसमें दो राय नहीं कि बिपिन रावत पाक प्रायोजित आतंकवाद, चीन की आक्रामकता और अफगानिस्तान के हालत से उपजी चुनौतियों का बेखौफ होकर सामना करने में लगे रहे। वे दो-दो सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम तक पहुंचा पाए। जनरल रावत के नेतृत्व में पहला लक्षित हमला म्यांमार में घुसकर किया गया और दूसरा पाकिस्तान के विरुद्ध पीओके एवं बालाकोट में किया गया। जिसके बाद पाक अधिकृत कश्मीर में युवाओं को आतंकवादी बनाने के प्रशिक्षण शिविर लगभग खत्म हो गए। इन हमलों के जरिए उन्होंने साहसिक और देश का सैन्य गौरव बढ़ाने का काम किया।


सीडीएस बिपिन रावत की शहादत के साथ ऐसा बहुआयामी प्रतिभा का धनी सैनिक देश से चला गया, जो सेना को 21वीं सदी में होने वाली लड़ाई के लिए सेना को सक्षम बनाने में लगा था। हाल ही में उन्होंने कोरोना ओमिक्रॉन के बारे में कहा था कि यह वायरस जैविक युद्ध के लिए तैयार किया गया विषाणु भी हो सकता है, इसलिए इससे सामना करने के लिए सेनाएं तैयार रहें। इस शूरवीर को विनम्र नमन एवं श्रद्धांजलि।


-प्रमोद भार्गव-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)




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स्मृति शेष: चीन-पाक से दो-दो हाथ करने को तैयार थे जनरल रावत

एक बेहद दुखद हेलिकॉप्टर हादसे में देश के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत के निधन से सारे देश का शोक में डूबना लाजिमी है।


जनरल रावत के अलावा 12 अन्य लोगों की मौत हो गई है। देश को आगामी 16 दिसंबर को पाकिस्तान से 1971 की जंग में विजय के पचास साल के अवसर पर जश्न मनाना था और शहीदों को याद करना था। जाहिर है, उन सब कार्यक्रमों पर भी जनरल रावत के न रहने से गहरा असर पड़ेगा। जनरल रावत को देश का पहला सीडीएस बनाया गया था। वे इससे पहले भारतीय सेना के प्रमुख भी रहे थे। उन्हें थल सेना और जल सेना के कामकाज की भी गहन समझ थी। वे तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बिठाने का काम शानदार तरीके से कर रहे थे।


जनरल रावत चीन के मामलों के गहन विशेषज्ञ थे और भारत की चीन और पाकिस्तान के साथ सरहद पर चल रही तनातनी पर सरकार को लगातार सलाह देते थे। उनका मानना था कि देश किसी भी परिस्थिति में दबेगा नहीं। वह शत्रुओं की ईंट का जवाब पत्थर से देगा। चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद पर जनरल रावत ने कहा था कि "लद्दाख में चीनी सेना के अतिक्रमण से निपटने के लिए सैन्य विकल्प भी है। लेकिन, यह तभी अपनाया जाएगा जब सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर वार्ता विफल रहेगी।"


रावत के बयान से आम हिन्दुस्तानी आश्वस्त हुआ था कि भारत किसी भी स्थिति के लिए तैयार है। उन्होंने जो कहा उसमें कुछ भी ग़लत नहीं था। वह एक सधा हुआ संतुलित बयान था।


जनरल रावत देश को कभी अंधेरे में नहीं रखते थे। उन्होंने चीन को भारत के लिए सुरक्षा के लिहाज से सबसे बड़ा खतरा बताया था। कुछ समय पहले ही जनरल रावत ने कहा था, 'सुरक्षा के लिहाज से चीन, भारत के लिए बड़ा खतरा बन गया है और हजारों की संख्या में सैनिक और हथियार, जो देश ने हिमालयी सीमा को सुरक्षित करने के लिए पिछले साल भेजे थे, लंबे समय तक बेस पर वापस नहीं लौट सकेंगे। जनरल रावत ने चीन को लेकर कुछ ऐसा कहा कि चीन को बहुत बुरा लगा। तिलमिलाए चीन ने रावत के बयान पर कहा, भारतीय अधिकारी बिना किसी कारण के तथाकथित 'चीनी सैन्य खतरे' पर अटकलें लगाते हैं, जो दोनों देशों के नेताओं के रणनीतिक मार्गदर्शन का गंभीर उल्लंघन है।


चीन भले कुछ भी कहता रहे अपने पक्ष में, पर यह बात साफ है कि भारत के सामने असली चुनौती चीन की ही है। जब से जनरल रावत ने सीडीएस का कामराज संभाला था, वे सेना के तीनों अंगों को तैयार कर रहे थे कि अगर भारत को चीन-पाकिस्तान का एक साथ जंग के मैदान में सामना करना पड़े तो भी भारत पीछे न रहे। उनकी इस सोच के चलते भारतीय फौज भी अपने को लगातार तैयार कर रही थी। ये सब सैन्य तैयारियां चीन-पाकिस्तान देख रहे थे। उन्हें जनरल रावत के एग्रेसिव सोच का पता चल चुका था।


दरअसल चीन को लेकर जो राय जनरल रावत व्यक्त कर रहे थे वही पूर्व रक्षामंत्री स्वर्गीय जॉर्ज फर्नांडिस कई साल पहल कर चुके थे। उन्होंने चीन को भारत का सबसे बड़ा दुश्मन बताया था। पोखरण-2 परमाणु परीक्षण के बाद तत्कालीन एनडीए सरकार के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने दावा किया था कि भारत का चीन दुश्मन नंबर वन है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना था कि जॉर्ज साहब ने यह बयान रक्षा मंत्री रहने के दौरान मिली जानकारियों के आधार पर दिया होगा।


जॉर्ज के अलावा पूर्व रक्षामंत्री मुलायम सिंह यादव भी मानते थे कि भारत का पाकिस्तान से बड़ा दुश्मन चीन है। साल 2017 में डोकलाम विवाद के बाद लोकसभा में मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि भारत के लिए सबसे बड़ा मुद्दा पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन है। केंद्र सरकार को आगाह करते हुए उन्होंने कहा था कि भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा चीन है और सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।


बहरहाल, रक्षा मामलों के कुछ जानकार मानते हैं कि अगर भारत का चीन के साथ अब युद्ध हुआ, तो पाकिस्तान भी मैदान में खुलकर आएगा चीन के हक में। इसी के साथ अगर पाकिस्तान का भारत के साथ युद्ध हुआ तो चीन भी पाकिस्तान के हक में लड़ेगा। रक्षा मामलों के जानकार और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह तो सार्वजनिक रूप से यह कहते रहे हैं कि अगर भारत-चीन युद्ध छिड़ता है तो पाकिस्तान शांत नहीं बैठेगा। वह भी चीन के हक में लड़ेगा।


बेशक, चीन और पाकिस्तान के तेवर देखते हुए भारतीय सुरक्षा बलों को जमीनी और समुद्री सीमाओं पर पूरे साल सतर्क रहना पड़ रहा है। भारतीय सेनाएं इस जिम्मेदारी को जनरल रावत की सरपरस्ती में बखूबी निभा रही थीं। जनरल रावत के आकस्मिक निधन के बाद भी भारत की चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर तनाव खत्म नहीं होने वाला। यह तो मानकर ही चलिए। मतलब भारत अपने दो शत्रु देशों का सरहद पर एक साथ प्रतिदिन ही सामना करता रहेगा। जब तक उन्हें एक बार अच्छी तरह से ठंडा न कर दे। ये साबित कर चुके हैं कि ये बाज नहीं आएंगे। इनसे मैत्रीपूर्ण संबंधों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। तो भारत को अपने इन पड़ोसी मुल्कों की नापाक हरकतों का मुकाबला करने के लिए हर वक्त चौकस रहना ही होगा।


जनरल रावत के स्थान पर बनने वाले देश के नए सीडीएस के ऊपर जिम्मेदारी होगी कि वे अपने पूर्ववर्ती यानी जनरल रावत के समय सेना को मजबूत करने के कार्यों को जारी रखें। यही उस महान योद्धा के प्रति देश की सच्ची श्रद्धांजलि होगी। वे देवभूमि उत्तराखंड के गौरव और देश के योद्धा थे। कृतज्ञ भारत उन्हें सदैव याद रखेगा।


-आर.के. सिन्हा-

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)





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कृष्ण जन्मभूमि मुद्दे को पुनर्जीवित करने की कोशिश

कुछ ही महीनों में उत्तरप्रदेश में चुनाव होने वाले हैं. जमीनी स्तर की स्थिति पर नजर रखने वाले अधिकांश राजनैतिक विश्लेषकों का मत है कि राज्य में मोदी और योगी की लोकप्रियता में जबरदस्त गिरावट आई है. इसका कारण हैं वे परेशानियां जो आम लोगों को भुगतनी पड़ी हैं. कोरोना के कारण पलायन, किसानों का आंदोलन, बेरोजगारी में जबरदस्त इजाफा और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली जनता में असंतोष के अनेक वजहों में कुछ हैं. इन सबके चलते आम लोग साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के उस दलदल से बाहर निकल रहे हैं जिसमें वे पिछले कुछ दशकों से फंसे हुए थे. उत्तरप्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के हालिया बयान को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.


अपनी सरकार में कानून और व्यवस्था की ‘बेहतरीन’ स्थिति का वर्णन करने वाले अपने एक ट्वीट में उन्होंने समाज को बांटने की अपनी प्रवृत्ति का भरपूर परिचय दिया. उन्होंने कहा कि उत्तरप्रदेश की सरकार ने लुंगी वालों और जालीदार टोपी पहनने वालों द्वारा किए जाने वाले अपराधों, जिनमें जमीनों पर कब्जा और फिरौती के लिए अपहरण शामिल हैं, से उत्तरप्रदेश की जनता को मुक्ति दिलाई है. एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा कि अयोध्या और काशी में भव्य मंदिरों का निर्माण कार्य जारी है और अब मथुरा की बारी है. कई साम्प्रदायिक संगठनों ने यह धमकी भी दी कि वे 6 दिसंबर को मथुरा में ईदगाह पर हिन्दू कर्मकांड करेंगे.


मंदिर-मस्जिद मुद्दे को भाजपा ने सबसे पहले 1984 में उठाया था. सन् 1986 में विश्व हिन्दू परिषद ने यह संकल्प लिया कि भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या, भगवान कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में इन दोनों देवों के और वाराणसी  भगवान शिव के भव्य मंदिर बनाए जाएंगे. बाबरी मस्जिद को ढ़हाते समय संघ परिवार के कार्यकर्ताओं का नारा था कि यह तो केवल शुरूआत है और आगे काशी और मथुरा की बारी है. यह इस तथ्य के बावजूद कि सन 1991 के धर्मस्थल अधिनियम के अनुसार सभी आराधना स्थलों पर 15 अगस्त 1947 की स्थिति बनाए रखी जाना है.


मंदिर-मस्जिद का मुद्दा संघ और भाजपा के लिए वोट कबाड़ने का जरिया बन गया है. राम मंदिर आंदोलन, जिसकी परिणति बाबरी मस्जिद के ध्वंस और राममंदिर के निर्माण में हुई, ने संघ परिवार को चुनावों में जबरदस्त फायदा पहुंचाया. बाबरी मस्जिद मामले में संघ परिवार के सभी दावे खोखले थे. उच्चतम न्यायालय तक को यह कहना पड़ा कि सन 1949 में मस्जिद में रामलला की मूर्तियों की स्थापना एक अपराध था और सन 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस भी एक अपराध था. न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि बाबरी मस्जिद का निर्माण राम मंदिर के मलबे पर किया गया है और भगवान राम का जन्म ठीक उसी स्थान पर हुआ था - ये दोनों दावे अप्रमाणित हैं. पर इस सबके बावजूद इस मुद्दे ने भाजपा को वोटों से मालामाल कर दिया. यह दावा कि मुस्लिम शासकों ने देश में अनेक मंदिर गिराए थे, इतनी बार दुहराया गया कि लोग उसे ध्रुव सत्य मानने लगे. इसमें कोई संदेह नहीं कि मुस्लिम राजाओं ने मंदिर गिराए. परंतु हिन्दू राजा भी मंदिर गिराने में पीछे नहीं थे. सोमनाथ मंदिर के ध्वंस को महमूद गजनी से जोड़ा जाता है. परन्तु उसने धार्मिक कारणों से सोमनाथ पर हमला नहीं किया था. उसका उद्देश्य मंदिर की अथाह संपत्ति लूटना था.


कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ हमें बताती है कि 11वीं सदी के कश्मीर के शासक हर्षदेव के दरबार में एक अधिकारी का काम केवल सोने और चांदी की मूर्तियों को मंदिरों से उखाड़कर राजकोष में पहुंचाना था. जाने-माने अध्येता रिचर्ड ईटन के अनुसार हिन्दू राजा अपने प्रतिद्वंद्वियों के कुलदेवता की मूर्ति खंडित करते थे और औरंगजेब ने गोलकुंडा में स्थित एक मस्जिद को इसलिए गिरा दिया था क्योंकि वहां के शासक तानाशाह ने कई सालों से बादशाह को वार्षिक नजराना नहीं दिया था.


ये सारी जानकारियां ऐतिहासिक दस्तावेजों में उपलब्ध हैं. अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की अपनी नीति के तहत इतिहास के चुनिंदा पक्षों का इस्तेमाल किया. इससे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफरत पैदा हुई. आज स्थिति यह बन गई है कि शाखाओं, स्कूलों और मीडिया संस्थानों के अपने जाल के जरिए साम्प्रदायिक संगठनों ने मुस्लिम राजाओं पर मंदिरों के विध्वंसक होने का ठप्पा लगा दिया है. हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि तर्क और तथ्यों की बात करने वालों को अजीब निगाहों से देखा जाता है.


आंद्रे त्रुश्के की पुस्तक ‘औरंगजेब’ कहती है, “औरंगजेब के शासनकाल की शुरूआत में मुगल साम्राज्य में जो दसियों हजार हिन्दू और जैन मंदिर थे उनमें से सभी नहीं परन्तु अधिकांश औरंगजेब के शासनकाल के अंत में भी खड़े थे. त्रुश्के आगे लिखते हैं, “राजनैतिक घटनाक्रम के कारण औरंगजेब को कुछ हिन्दू मंदिरों पर हमला करना पड़ा. औरंगजेब ने 1669 में काशी विश्वनाथ मंदिर और 1670 में मथुरा के केशवदेव मंदिर को ढ़हाने का हुक्म दिया. परंतु इसके पीछे मंदिर से जुड़े लोगों के राजनैतिक कार्यकलाप थे और इसका उद्देश्य मुगल साम्राज्य के आगे उन्हें झुकाना था.” रिचर्ड ईटन के अनुसार औरंगजेब के शासनकाल में जिन मंदिरों को गिराने के लिए शाही फरमान जारी किए गए उनकी संख्या 1 से 12 के बीच थी.


त्रुश्के लिखते हैं, “सन् 1670 में औरंगजेब ने मथुरा में वीरसिंह बुंदेला द्वारा 1618 में निर्मित कृष्णादेव मंदिर को नेस्तोनाबूद करने का हुक्म दिया. इसके पीछे राजनीतिक कारण थे...हो सकता है कि मथुरा के ब्राम्हणों ने आगरा के किले से भागने में शिवाजी की मदद की हो.”


इतिहास के वैज्ञानिक अध्ययन से हमें यह पता चलता है कि राजाओं का लक्ष्य सत्ता और संपत्ति था. अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक इतिहास लेखन द्वारा राजाओं को उनके धर्म से जोड़ा. इस कुटिल चाल के जरिए मुस्लिम शासकों की हरकतों के लिए आज के मुसलमानों को दोषी ठहराया गया. ब्रिटिश काल से जारी अनवरत प्रचार का ही यह नतीजा है कि आम लोगों की निगाह में मुस्लिम राजा मंदिरों के ध्वंस और इस्लाम में धर्मपरिवर्तन के प्रतीक बन गए हैं. मुस्लिम राजाओं का दानवीकरण और उनके प्रति नफरत ही साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंसा का आधार है और  नफरत और ध्रुवीकरण ही संघ परिवार का प्रमुख हथियार हैं.


मथुरा में कृष्णा जन्मभूमि और शाही ईदगाह का एक-दूसरे के अगल-बगल में होना हमारी वास्तविक संस्कृति को दर्शाता है. भारत में हिन्दू और मुसलमान सदियों से मिलजुलकर रहते आए हैं और एक-दूसरे के त्यौहारों पर खुशियाँ मनाना उनके जीवन का भाग रहा है. मुंबई के दादर में एक ट्रेफिक आईलैंड है जिस पर एक मंदिर, एक मस्जिद और एक चर्च तीनों बने हुए हैं. मुम्बई में सन् 1992-93 की भयावह साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान भी इनमें से एक भी आराधना स्थल को तनिक भी नुकसान नहीं पहुंचाया गया. सभी धर्मों के लोग इस पर बहुत श्रद्धा रखते हैं. क्या हम ऐसे भारत की कल्पना कर सकते हैं जिसमें ऐसे स्थानों के प्रति सम्मान का भाव हो.


-राम पुनियानी-


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भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के मजबूत समर्थक थे जनरल रावत : अमेरिका

वाशिंगटन : अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत के पहले प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत एक असाधारण नेता, एक महत्वपूर्ण भागीदार और भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों के मजबूत समर्थक थे तथा उन्होंने दोनों देशों के बीच सामरिक साझेदारी को मजबूत करने में मदद की थी।


गौरतलब है कि बुधवार को तमिलनाडु में कुन्नूर के समीप भारतीय वायु सेना का एक हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिससे उसमें सवार जनरल रावत, उनकी पत्नी मधुलिका और 11 अन्य लोगों की मौत हो गयी।


अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने अमेरिका-भारत रक्षा संबंधों को मजबूत करने में जनरल रावत की भूमिका की सराहना की।


ब्लिंकन ने कहा, ‘‘भारत के प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल रावत, उनकी पत्नी और सहकर्मियों की दुर्घटना में हुई मौत पर मैं गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता हूं। हम जनरल रावत को एक असाधारण नेता के तौर पर याद रखेंगे जिन्होंने देश की सेवा की और अमेरिका-भारत रक्षा संबंधों में योगदान दिया।’’


रक्षा मंत्री ऑस्टिन ने कहा, ‘‘जनरल रावत ने भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी पर एक अमिट छाप छोड़ी है और वह भारतीय सशस्त्र सेनाओं के एकीकृत युद्धक क्षमता वाले संगठन के रूप में उभरने में केंद्रीय भूमिका में थे।”


ऑस्टिन ने कहा कि उन्हें इस साल की शुरुआत में जनरल रावत से मिलने का मौका मिला था और वह उन्हें महत्वपूर्ण भागीदार तथा अमेरिका का मित्र मानते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘मैं ओर मेरा विभाग हेलीकॉप्टर दुर्घटना में प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत की मौत के बाद रावत परिवार, भारतीय सेना और भारत के लोगों के प्रति गहरी संवेदनाएं व्यक्त करते हैं। रावत परिवार और दुर्घटना के अन्य पीड़ितों के परिवार के प्रति हमारी संवेदनाएं हैं। हम इस क्षति से बहुत दुखी हैं।’’


भारत के पहले सीडीएस के निधन पर शोक जताते हुए ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल मार्क मिले ने कहा कि उन्हें गर्व है कि वह जनरल रावत को एक मित्र के तौर पर तब से जानते हैं जब वह सेना प्रमुख थे। मिले ने कहा, ‘‘उन्हें याद किया जाएगा।’’ उन्होंने जनरल रावत के साथ अपनी मुलाकात की तस्वीरें भी ट्वीट कीं।


विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस ने बुधवार को अपने दैनिक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘हम भारत में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी और 11 अन्य लोगों की मौत की खबर सुनकर बहुत दुखी हैं। उन्होंने कहा ‘‘जनरल रावत एक महत्वपूर्ण भागीदार थे। वह अमेरिका-भारत रक्षा साझेदारी के मजबूत समर्थक थे। उन्होंने दोनों देशों के बीच सामरिक साझेदारी को मजबूत करने में मदद की। इन संबंधों में उनकी अहम भूमिका थी। जनरल के परिवार, उस विमान में सवार सभी लोगों के परिवारों और जाहिर तौर पर भारत के लोगों के प्रति हम संवेदनाएं व्यक्त करते हैं।’’


पेंटागन के प्रेस सचिव जॉन किर्बी ने एक अलग संवाददाता सम्मेलन में कहा कि समस्त रक्षा विभाग की ओर से रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन हेलीकॉप्टर दुर्घटना में जनरल रावत के निधन से दुखी उनके परिवार, भारतीय सेना और भारत के लोगों के प्रति गहरी संवेदनाएं व्यक्त करते हैं।


अमेरिका के कई शीर्ष सांसदों ने भी इस दुखद घटना में भारतीय जनरल की मौत पर शोक जताया है।


सीनेटर रिक स्कॉट ने कहा, ‘‘मैं जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी मधुलिका रावत और 11 अन्य चालक दल के सदस्यों और यात्रियों की दुखद मृत्यु पर शोकाकुल नरेंद्र मोदी और भारत के लोगों के प्रति गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता हूं। भारत मजबूत है और दुख की इस घड़ी में अमेरिका आपके साथ खड़ा है।’’


सीनेटर बिल हागर्टी ने कहा, ‘‘भारतीय सशस्त्र सेना के प्रमुख जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी और 12 अन्य लोगों की दुखद मृत्यु के बाद मैं भारत के लोगों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त करता हूं। उनके परिवारों के प्रति मेरी सहानुभूति है।’’


कांग्रेस सदस्य मार्क ग्रीन ने ट्वीट किया, ‘‘विमान दुर्घटना में हुई मौतों के लिए भारत के लोगों और उनके सशस्त्र बलों के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं हैं। मैं हमारी भागीदारी को इस दुख और भविष्य की प्रतिकूलताओं से उबरने के लिए एक स्थायी शक्ति के रूप से उसे विकसित करने के वास्ते हरसंभव प्रयास करना जारी रखूंगा।’’





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पाकिस्तान अपनी तौहीन क्यों करा रहा?

'तहरीके-लबायक पाकिस्तान' नामक इस्लामी संगठन ने इस्लाम और पाकिस्तान, दोनों की छवि तार-तार कर दी है। पिछले हफ्ते उसके उकसाने के कारण सियालकोट के एक कारखाने में मैनेजर का वर्षों से काम कर रहे श्रीलंका के प्रियंत दिव्यवदन नामक व्यक्ति की नृशंस हत्या कर दी गई।


दिव्यवदन के बदन का, उसकी हड्डियों का चूरा-चूरा कर दिया गया और उसके शव को फूंक दिया गया। इस कुकृत्य की निंदा पाकिस्तान के लगभग सारे नेता और अखबार कर रहे हैं और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया गया है। उसी कारखाने के दूसरे मैनेजर मलिक अदनान ने प्रियंत को बचाने की भरसक कोशिश की लेकिन भीड़ ने प्रियंत की हत्या कर ही डाली।


'तहरीक' ने प्रियंत पर यह आरोप लगाया कि उसने तौहीन-अल्लाह की है। काफिराना हरकत की है। इसीलिए उसे उन्होंने सजा-ए-मौत दी है। प्रियंत ने तहरीके-लबायक के एक पोस्टर को अपने कारखाने की दीवार से इसलिए हटवा दिया था कि उस पर पुताई होनी थी। हमलावरों का कहना है कि उस पोस्टर पर कुरान की आयत छपी हुई थी।


इन हमलावरों से कोई पूछे कि उस श्रीलंकाई बौद्ध व्यक्ति को क्या पता रहा होगा कि उस पोस्टर पर अरबी भाषा में क्या लिखा होगा? मान लें कि उसे पता भी हो तो भी कोई पोस्टर या कोई ग्रंथ या कोई मंदिर या मस्जिद वास्तव में क्या है? ये तो बेजान चीजें हैं। आप इनके बहाने किसी की हत्या करते हैं तो उसका अर्थ क्या हुआ? क्या यह नहीं कि आप बुतपरस्त हैं, मूर्तिपूजक हैं? क्या इस्लाम बुतपरस्ती की इजाजत देता है? क्या अल्लाह या ईश्वर या गाॅड या जिहोवा इतना छुई-मुई है कि किसी के पोस्टर फाड़ देने, निंदा या आलोचना करने, किसी धर्मग्रंथ को उठाकर पटक देने से वह नाराज़ हो जाता है? ईश्वर या अल्लाह को किसने देखा है लेकिन इंसान अपनी नाराजी को ईश्वरीय नाराजी का रूप दे देता है। यह उसके अपने अहंकार और दिमागी जड़ता का प्रमाण है। इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना उचित है।


जिन्ना पाकिस्तान को एक सहनशील राष्ट्र बनाना चाहते थे लेकिन पाकिस्तान दुनिया का सबसे असहिष्णु इस्लामी राष्ट्र बन गया है। कभी वहां मंदिरों, कभी गुरुद्वारों और कभी गिरजाघरों पर हमलों की खबरें आती रहती हैं। कभी कादियानियों पर हमले होते हैं। 2011 में लाहौर में राज्यपाल सलमान तासीर की हत्या इसलिए कर दी गई थी कि उन्होंने आसिया बीबी नामक एक महिला का समर्थन कर दिया था। आसिया बीबी पर तौहीन-ए-अल्लाह का मुकदमा चल रहा था।


सलमान तासीर अच्छे खासे पढ़े-लिखे मुसलमान थे। वे मेरे मित्र थे। उनकी हत्या पर गजब का हंगामा हुआ लेकिन यह सिलसिला अभी भी ज्यों का त्यों जारी है। इस सिलसिले को रोकने के लिए सरकार की सख्ती तो चाहिए ही लेकिन उससे भी ज्यादा जिम्मेदारी मजहबी मौलानाओं की है। ईश्वर और अल्लाह को अपनी तारीफ या तौहीन से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उसके कारण पाकिस्तान की तौहीन क्यों हो?



-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)





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'हिन्द की चादर' गुरू तेग बहादुर

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर द्वारा गुरु श्री तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस नानकशाही कैलेंडर के अनुसार 8 दिसम्बर को श्रद्धापूर्वक मनाया जा रहा है।


हालांकि सरकारी अवकाश सूची में शहीद दिवस का अवकाश पुराने कैलेंडर के अनुसार 24 नवम्बर को दिया गया था लेकिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अनुसार वास्तव में गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस 8 दिसम्बर को है, इसीलिए इस वर्ष यह अब 8 दिसम्बर को मनाया जा रहा है।


सिखों के नौवें गुरू तेग बहादुर सदैव सिख धर्म मानने वाले और सच्चाई की राह पर चलने वाले लोगों के बीच रहा करते थे, जिन्होंने न केवल धर्म की रक्षा की बल्कि देश में धार्मिक आजादी का मार्ग भी प्रशस्त किया। सिखों के 8वें गुरू हरिकृष्ण राय की अकाल मृत्यु हो जाने के बाद तेग बहादुर को नौवां गुरू बनाया गया था, जिनके जीवन का प्रथम दर्शन ही यही था कि धर्म का मार्ग सत्य और विजय का मार्ग है। 1 अप्रैल 1621 को माता नानकी की कोख से जन्मे तेग बहादुर ने धर्म और आदर्शों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। 14 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में वीरता का परिचय दिया था और उनकी इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने ही उनका नाम 'तेग बहादुर' अर्थात् तलवार का धनी रखा था।


गुरू तेग बहादुर ने हिन्दुओं तथा कश्मीरी पंडितों की मदद कर उनके धर्म की रक्षा करते हुए अपने प्राण गंवाए थे। क्रूर मुगल शासक औरंगजेब ने उन्हें हिन्दुओं की मदद करने और इस्लाम नहीं अपनाने के कारण मौत की सजा सुनाई थी- उनका सिर कलम करा दिया था। उस आततायी और धर्मांध मुगल शासक की धर्म विरोधी तथा वैचारिक स्वतंत्रता का दमन करने वाली नीतियों के विरूद्ध गुरू तेग बहादुर का बलिदान एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक घटना थी।


विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वालों में गुरू तेग बहादुर का स्थान अद्वितीय है। एक धर्म रक्षक के रूप में उनके महान बलिदान को समूचा विश्व कदापि नहीं भूल सकता। उस समय औरंगजेब ने आदेश पारित किया था कि राजकीय कार्यों में किसी भी उच्च पद पर किसी हिन्दू की नियुक्ति नहीं की जाए और हिन्दुओं पर 'जजिया' (कर) लगा दिया जाए। उसके बाद हिन्दुओं पर हर तरफ अत्याचार का बोलबाला हो गया। अनेक मंदिरों को तोड़ कर वहां मस्जिदें बनवा दी गई और मंदिरों के पुजारियों, साधु-संतों की हत्याएं की गई।


हिन्दुओं पर लगातार बढ़ते अत्याचारों और भारी-भरकम नए-नए कर लाद दिए जाने से भयभीत बहुत सारे हिन्दुओं ने उस दौर में धर्म परिवर्तन कराकर मजबूरन इस्लाम धर्म अपना लिया। औरंगजेब के अत्याचारों के उस दौर में कश्मीर के कुछ पंडित गुरू तेग बहादुर के पास पहुंचे और उन्हें अपने ऊपर हो रहे जुल्मों की दास्तान सुनाई। गुरू जी ने उनकी पीड़ा सुनने के बाद मुस्कराते हुए कहा कि तुम लोग बादशाह से जाकर कहो कि हमारा पीर तेग बहादुर है, अगर वह मुसलमान हो जाए तो हम सभी इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर के सूबेदार शेर अफगन के मार्फत यह संदेश औरंगजेब तक पहुंचाया तो औरंगजेब बिफर उठा। उसने गुरू तेग बहादुर को दिल्ली बुलाकर उनके परम प्रिय शिष्यों मतिदास, दयालदास और सतीदास के साथ बंदी बना लिया और तीनों शिष्यों से कहा कि अगर तुम लोग इस्लाम धर्म कबूल नहीं करोगे तो कत्ल कर दिए जाओगे।


भाई मतिदास ने जवाब दिया कि शरीर तो नश्वर है और आत्मा का कभी कत्ल नहीं हो सकता। यह सुनकर औरंगजेब ने मतिदास को जिंदा ही आरे से चीर देने का हुक्म दिया। औरंगजेब के फरमान पर जल्लादों ने भाई मतिदास को दो तख्तों के बीच एक शिकंजे में बांधकर उनके सिर पर आरा रखकर आरे से चीर दिया और उनकी बोटी-बोटी काट दी लेकिन जब भाई मतिदास को आरे से चीरा जाने लगा, तब भी वे भयभीत हुए बिना 'श्री जपुजी साहिब' का पाठ करते रहे। अगली बारी थी भाई दयालदास की लेकिन उन्होंने भी जब दो टूक लहजे में इस्लाम धर्म कबूल करने से इनकार कर दिया तो औरंगजेब ने उन्हें गर्म तेल के कड़ाह में डालकर उबालने का हुक्म दिया। सैनिकों ने उसके हुक्म पर उनके हाथ-पैर बांधकर उबलते हुए तेल के कड़ाह में डालकर उन्हें बड़ी दर्दनाक मौत दी लेकिन भाई दयालदास भी अपने अंतिम श्वांस तक 'श्री जपुजी साहिब' का पाठ करते रहे। अगली बारी थी भाई सतीदास की लेकिन उन्होंने भी दृढ़ता से औरंगजेब का इस्लाम धर्म अपनाने का फरमान ठुकरा दिया तो उस आततायी क्रूर मुगल शासक ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए उन्हें कपास से लपेटकर जिंदा जला देने का हुक्म दिया। भाई सतीदास का शरीर धू-धूकर जलने लगा लेकिन वे भी निरंतर 'श्री जपुजी साहिब' का पाठ करते रहे।


औरंगजेब के आदेश पर 22 नवम्बर 1675 को काजी ने गुरू तेग बहादुर से कहा कि हिन्दुओं के पीर! तुम्हारे सामने तीन ही रास्ते हैं- पहला, इस्लाम कबूल कर लो। दूसरा, करामात दिखाओ और तीसरा, मरने के लिए तैयार हो जाओ। इन तीनों में से तुम्हें कोई एक रास्ता चुनना है। अन्याय और अत्याचार के समक्ष झुके बिना धर्म और आदर्शों की रक्षा करते हुए गुरू तेग बहादुर ने तीसरे रास्ते का चयन किया। जालिम औरंगजेब को यह सब भला कहां बर्दाश्त होने वाला था। उसने गुरू तेग बहादुर का सिर कलम करने का हुक्म सुना दिया। 24 नवम्बर के दिन चांदनी चौक के खुले मैदान में एक विशाल वृक्ष के नीचे गुरू तेग बहादुर समाधि में लीन थे, वहीं औरंगजेब का जल्लाद जलालुद्दीन नंगी तलवार लेकर खड़ा था। अंततः काजी के इशारे पर जल्लाद ने गुरू तेग बहादुर का सिर धड़ से अलग कर दिया गया, जिसके बाद चारों ओर कोहराम मच गया। इस प्रकार अपने धर्म में अडिग रहने और दूसरों को धर्मान्तरण से बचाने के लिए गुरू तेग बहादुर और उनके तीनों परम प्रिय शिष्यों ने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहूति दे दी।


धन्य हैं भारत की पावन भूमि पर जन्म लेने वाले और दूसरों की सेवा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले उदार चित्त, बहादुर व निर्भीक ऐसे महापुरूष। हिन्दुस्तान तथा हिन्दू धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हुए गुरू तेग बहादुर को उसके बाद से ही 'हिन्द की चादर गुरू तेग बहादुर' के नाम से जाना जाता है। उन्होंने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपनी कुर्बानी दी, इसीलिए उन्हें 'हिन्द की चादर' कहा जाता है।


-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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रक्षा क्षेत्र में और आगे बढ़े भारत-रूस के कदम

रूस के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंध हमेशा से कसौटी पर खरे उतरे हैं। चाहे रक्षा क्षेत्र के करार हों, सामरिक साझेदारियां हों, आतंकवाद से लड़ने में सहयोग का मामला हो, सभी क्षेत्रों में बेहतर परिणाम सामने आए हैं।संबंध अब नए सिरे से और आगे बढ़ने आरंभ हुए, जिनको पुतिन की यात्रा ने पंख लगाए।


पुतिन बेशक कुछ ही घंटों के लिए हिंदुस्तान आए, पर खुराफाती देशों में खलबली मचा गए। हिंदुस्तान धीरे-धीरे संप्रभु ताकत बन रहा है, यही वजह है दुनिया अपने आप खिंचती आ रही है।


जहां तक दोस्ती की बात है तो सिर्फ रूस-भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया इस बात को अच्छे से जानती है कि दोनों की दोस्ती अन्य मुल्कों के मुकाबले सबसे भरोसेमंद रही है। आगे भी रहेगी, क्योंकि इसकी तस्दीक रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा ने की है। पुतिन का करीब डेढ़-दो वर्षों बाद हिंदुस्तान आना हुआ। कुछ समय के लिए ही आए, लेकिन इस दरम्यान उन्होंने रिश्तों में जो प्रगाढ़ता बढ़ाई वह काबिले तारीफ रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनका दिल खोलकर स्वागत-सम्मान किया।


वैसे, दोनों नेताओं की दोस्ती पहले से ही प्रगाढ़ रही है। राजनीतिक रिश्तों के इतर भी दोनों अपने आपसी संबंधों को तवज्जो देते हैं। भारत-रूस के मध्य दोस्ती की निरंतरता यूं ही बनी रहे, इसकी उम्मीद सभी करते हैं। दरअसल, यूपी के अमेठी जिले में राइफल बनाने के लिए खुल रही आयुध फैक्ट्री में रूस की मदद बहुत जरूरी है। एके-203 राइफल बनाने में रूस माहिर है, इस लिहाज से उनका सहयोग अत्यंत जरूरी है। भारत सरकार ने पूर्व में ही रूस से लंबी दूरी के जमीन से आसमान में मारक क्षमता वाली एयर-मिसाइल डिफेंस सिस्टम एम-400 की खरीद के लिए उनसे करार किया हुआ है। पहली खेप मिल भी चुकी है, अगले साल तक और मिल जाएगी। इस करार से भारत ने अपनी क्षमता का परिचय उन देशों को दिया है, जो खुद को आधुनिक हथियारों में अग्रणी समझते हैं। विशेषकर अमेरिका और चीन। रूस के साथ भारत के ताजा करार ने चीन-पाक को असहज कर दिया है।


गौरतलब है कि विभिन्न तरह की मुसीबतें और समस्याएं आईं, पर भारत-रूस की दोस्ती पर कभी असर नहीं पड़ा। आज से नहीं, बल्कि दशकों से रूस-भारत के द्विपक्षीय संबंध कस़ौटी पर खरे उतरे हैं, जिसे अब रूसी राष्ट्रपति की यात्रा ने और मजबूती प्रदान की है। उनकी यात्रा पर चीन-पाकिस्तान की भी नजरें रही। उन्हें पता है अगर दोनों देश मजबूती से साथ आ गए तो अफगानिस्तान में उनका खेल बिगड़ जाएगा। अफगानिस्तान के मौजूदा हालात पर भी दोनों नेताओं के बीच लंबी बातचीत हुई। इस संबंध में रूस-भारत के विदेश मंत्रियों के मध्य टू-प्लस-टू वार्ता में कई मसलों पर मंथन हुआ, जिसका असर आने वाले दिनों में दिखाई भी देगा। 21वें वार्षिक शिखर सम्मेलन में कुछ कूटनीतिक निर्णयों में ऐसा फैसला लिया जाएगा जिससे पाक-चीन की नापाक हरकतें एक्सपोज होंगी। इसमें भारत-रूस के साथ और भी कुछ देश साथ आएंगे। इसके लिए नए सिरे से रणनीति बनाई जा रही है।


अमेठी में करीब पांच लाख राइफलों का निर्माण जाएगा, जिससे भारत की रक्षा क्षमता बढ़ेगी। इसमें हर तरह से सहयोग करने का वादा रूस के रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगुए ने भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के समक्ष किया है। वहीं, विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूसी विदेश मंत्री लावरोव के मध्य एस-400 को लेकर हुई डील भी भारत की रक्षा क्षमता को और बढ़ाएगी। किसी भी मुल्क की सेना के पास अगर एके-203 जैसी लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली राइफलें होंगी, तो दुश्मन उससे मुकाबला करने के लिए सौ बार सोचेगा। करेगा तो सौ फीसदी मुंह की खायेगा। इस बात की भनक दोनों खुराफाती पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान को लग चुकी है। भारत ने रूस से अधिक सैन्य तकनीकी सहयोग की गुजारिश की है जिसे स्वीकार भी किया है। वहीं, भारत इस क्षेत्र में खुद उन्नत अनुसंधानिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है।


रूस इस बात को जान रहा है कि भारत अपनी मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और अपने लोगों की अंतर्निहित क्षमता के साथ तमाम चुनौतियों पर काबू पाकर निरंतर आगे बढ़ रहा है। पुतिन का दौरा पहले भी होता रहा है। पर, पहले के मुकाबले पुतिन ने इस बार बदलते भारत की नई तस्वीर देखी। उन्हें इच्छाशक्ति और आत्मनिर्भरता का मजबूत गठजोड़ दिखाई दिया। एक वक्त था जब दूसरे देशों के साथ सैन्य समझौतों में भारत हिचकता था, अविश्वास की कमी दिखती थी। इसलिए भारत के साथ कई मर्तबा धोखे भी हुए, जो करार हुआ उसका पालन नहीं किया गया। हथियारों की खेप समय से नहीं मिली। यहां उन देशों का नाम लेना उचित नहीं जिन्होंने भारत के साथ छल किया था। खैर, बीते दौर की बातों को भुलाकर भारत आगे बढ़ा है और वह भी मजबूती के साथ। उन्हें अब विश्वसनीय नेताओं और देशों का सहयोग मिला है।


एक जमाना वो भी था जब अमेरिका का शिकंजा हुआ करता था। कोई भी देश जब किसी मुल्क से सैन्य करार करता था, तो वह अड़ंगा लगाकर जैसा वह चाहता था, वैसा होता था। लेकिन अब वक्त बदल चुका है। सभी मुल्क स्वतंत्र हैं, कुछ भी करने को। अमेरिका कभी नहीं चाहता था सैन्य ताकत में उनसे आगे कोई दूसरा देश निकले लेकिन अब आगे बढ़ चुके हैं। यही अमेरिका की सबसे बड़ी हार है। रूस-भारत जिस तरह बेखौफ होकर सैन्य करार को लेकर आगे बढ़े हैं, वह काबिलेगौर हैं।


भारत, रूस सहित कुछ दूसरे मुल्क निकट भविष्य में अमेरिका का डटकर मुकाबला करेंगे, लेकिन उससे पहले चीन-पाक से निपटना होगा। ये ऐसे देश हैं जो प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं करते, लेकिन दूसरों के कंधों पर बंदूक रखकर वार करते हैं। ये अब तालिबानियों को बेजा इस्तेमाल करने में लगे हैं। उनकी सरकार को मान्यता देने के पीछे ऐसे ही कुछ राज छिपे हैं। लेकिन उनकी नापाक हरकतों से भारत-रूस जैसे देश वाकिफ हैं। भारत-रूस के बीच सैन्य समझौते इन्हीं नापाक हरकतों को कुचलने के लिए हैं। सामरिक, व्यापारिक, शिक्षा, शांति आदि क्षेत्रों में जिस तरह दोनों देश आगे बढ़ते दिख रहे हैं, उससे कइयों को परेशानी होगी।


-डॉ. रमेश ठाकुर-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)






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क्या वायु प्रदूषण की 'स्थाई चादर' लपेट चुका है 'राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ' दिल्ली

अन्य विकासशील देशों की ही तरह भारत भी निरंतर वायु प्रदूषण की चपेट में रहने वाले देशों की सूची में अपना नाम शामिल करा चुका है। ख़ास तौर पर दिल्ली व उसके आस पास का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तो लगभग पूरा वर्ष और चौबीस घंटे घोर प्रदूषण की चपेट में रहने लगा है। दिल्ली में हवाई जहाज़ से बाहर निकलते ही ऐसा महसूस होने लगता है कि आप किसी ज़हरीली गैस चैम्बर में प्रवेश कर चुके हैं। गत तीन दशकों से हालांकि एन सी आर में फैले इस प्रदूषण के लिये आँख मूँद कर हरियाणा -पंजाब के किसानों को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता था। बताया जाता था कि फ़सल काटने के बाद खेतों में बची पराली को जलाने से फैलने वाला धुआंयुक्त प्रदूषण दिल्ली परिक्षेत्र को अपनी आग़ोश में लेता है। केंद्र सरकार ने भी पूर्व में यही दावा था कि वायु प्रदूषण बढ़ाने में पराली का योगदान 25-30 फीसदी है। परन्तु पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय में इसी संबंध में चल रही एक सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का ताज़ा दावा था कि प्रदूषण फैलाने में पराली का योगदान मात्र 10 प्रतिशत है। परन्तु साथ ही अपने लिखित हलफ़नामे में केंद्र ने यह दावा भी किया कि प्रदूषण में पराली का योगदान मात्र 4 फीसदी ही है। देश की सर्वोच्च अदालत केंद्र के शपथ पत्र के अनुसार यह भी कह चुकी है कि 75 प्रतिशत वायु प्रदूषण उद्योग, धूल तथा परिवहन जैसे तीन मुख्य कारण के चलते है। जहां तक किसानों को प्रदूषण के लिये ज़िम्मेदार ठहराने का प्रश्न है तो इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि किसान अपनी फ़सल का बचा हुआ कचरा अर्थात पराली आदि तो वर्ष में एक ही दो बार जलाते हैं जबकि दिल्ली का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तो लगभग पूरे वर्ष ही चौबीसों घंटे प्रदूषण की गिरफ़्त में रहता है ?


दिल्ली, फ़रीदाबाद, गुड़गांव, नोएडा, गाज़ियाबाद, सोनीपत आदि राजधानी के किसी भी निकटवर्ती क्षेत्र में चले जाइये, हर जगह वही गैस चैंबर जैसे हालात नज़र आते हैं। जहां आम लोग अपने मकानों के दरवाज़े व खिड़कियां इसलिये खोलते हैं ताकि ताज़ी व स्वच्छ हवा का घरों में प्रवेश हो सके वहीं एन सी आर की स्थिति ठीक इसके विपरीत हो चुकी है। घरों के दरवाज़े व खिड़कियां खुलते ही ज़हरीली, रसायन युक्त प्रदूषित हवा इन घरों में प्रवेश कर जाती है। गगनचुंबी रिहाइशी फ़्लैट्स की किसी भी मंज़िल पर खिड़की-दरवाज़ा खुलते ही धुंआ युक्त गैस फ़्लैट्स के भीतर प्रवेश करती है। गोया राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का रहने वाला कोई भी व्यक्ति ताज़ी व प्रदूषण मुक्त हवा का भी मोहताज बनकर रह गया है। इन इलाक़ों में लाखों वाहन चौबीस घंटे सड़कों पर दौड़ते हैं। हज़ारों छोटे बड़े उद्योग अपनी चिमनियों से धुआं उगलते हैं। एन सी आर क्षेत्र में बसने वाले लाखों कबाड़ी रोज़ाना सारा दिन और प्रायः रात भर लोहे-तांबे-पीतल की तार आदि निकालने हेतु टायरों तथा बिजली व फ़ोन के तारों आदि में आग लगाते रहते हैं। सुनाई तो यह भी देता है कि पुलिस व प्रशासन की मिली भगत से कई जगह प्रदूषण फैलाने की खुली छूट दी जाती है। स्वछ भारत अभियान के अंतर्गत घरों से कूड़ा संग्रह करने की योजना के बावजूद अभी भी अनेक लोग यहाँ तक कि प्रायः स्वयं सफ़ाई कर्मी भी कूड़े की ढेरियां बनाकर उसे आग के हवाले कर देते हैं। एन सी आर क्षेत्र में पड़ने वाले ईंटों के भट्टे भी यहां का प्रदूषण बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं।


प्रतिदिन दिल्ली व हिण्डन एयरबेस से चढ़ने व उतरने वाले हज़ारों विमानों द्वारा दिन रात छोड़े जाने वाले ज़हरीले गैसयुक्त प्रदूषण की कोई चर्चा नहीं होती। अति विशिष्ट तथा विशिष्ट व्यक्तियों के क़ाफ़िले में आगे पीछे दौड़ने वाले वाहनों के प्रदूषण फैलाने का ज़िक्र कहीं नहीं सुनाई देता। चार्टर्ड विमानों से प्रदूषण नहीं बल्कि शायद सुगन्धित स्वच्छ ऑक्सीजन का स्प्रे होता होगा तभी इसके प्रदूषण की चर्चा कभी नहीं सुनी गयी। प्रतिदिन लाखों नये वाहन सड़कों पर निकलकर प्रदूषण नहीं फैलाते बल्कि किसानों के दस वर्ष पुराने गिनती के ट्रैक्टर प्रदूषण फैलाने के असली ज़िम्मेदार हैं ? पिछले दिनों देश के इतिहास में पहली बार दिल्ली को केवल वायु प्रदूषण के चलते लॉक डाउन का सामना करना पड़ा। सभी स्कूल कॉलेज बंद कर दिये गए थे। दिल्ली सरकार का सुझाव था कि दिल्ली में सप्ताह में दो दिन प्रदूषण लॉकडाउन लगाया जा सकता है। परन्तु अदालत का मत था कि अकेले दिल्ली को ही लॉक करने से कोई लाभ नहीं होगा। दिल्ली के साथ-साथ नोएडा, फ़रीदाबाद, ग़ाज़ियाबाद, ग़ुरुग्राम और सोनीपत में भी इस नियम का पालन करना होगा। अदालत का मत था कि -' यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। एक बड़े इलाक़े को बिना किसी ठोस वजह के बंद नहीं किया जा सकता। इसलिए सरकारों को लॉक डाउन के अतिरिक्त भी कुछ अन्य वैकल्पिक उपायों पर भी सोचना होगा।' 


मानव जनित प्रदूषण समस्या ने ही आज दिल्ली परिक्षेत्र की यह स्थिति कर दी है कि लोग कार पूल पर विचार करने लगे हैं। सरकार को इसी स्थिति से निपटने के लिये कभी कभी वाहनों हेतु सम विषम (ऑड-इवेन) की नीति लागू करनी पड़ती है। कोरोना से रक्षा हेतु लगाया जाने वाला मास्क लगता है प्रदूषण के चलते अब इंसानी ज़रूरत का स्थान लेने वाला है। साँस की बीमारी, दमा, फेफड़े की प्रदूषण जनित तमाम बीमारियों में इज़ाफ़ा होता जा रहा है। छोटे बच्चे और बुज़ुर्ग इसकी चपेट में कुछ ज़्यादा ही आ रहे हैं। निरंतर बढ़ते जा रहे शहरीकरण के चलते हरित क्षेत्र घटता जा रहा है जोकि मानव जीवन के लिये ऑक्सीजन देने व कॉर्बन डाई ऑक्साइड जैसी प्रदूषित गैस को ग्रहण करने का सबसे प्रमुख स्रोत है। बहरहाल, पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय में इस विषय पर हुई बहस व सरकार द्वारा रखे गये पक्ष के बाद किसानों को दिल्ली परिक्षेत्र का प्रदूषण बढ़ाने का ज़िम्मेदार ठहराने की साज़िश का तो पटाक्षेप ज़रूर हो गया है परन्तु इसके बाद अब यह सवाल और भी प्रबल हो चुका है कि क्या 'राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ' दिल्ली, वायु प्रदूषण की स्थाई चादर लपेट चुका है। 


निर्मल रानी



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दूसरी लहर के दौरान लूट मचाने वाले अस्पतालों की पहचान कर उनका ऑडिट कराना जरूरी

देश ने अभी कुछ माह पूर्व 15 अगस्त 2021 को 75वां स्वतंत्रता दिवस धूमधाम से कोरोना गाइडलाइंस का पालन करते हुए मनाया था। लाल किले की प्राचीर से हर वर्ष विभिन्न प्रकार की घोषणाओं के बाद भी आजादी के 75 वर्ष बाद भी देश बहुत सारी ज्वंलत समस्याओं से रोजाना संघर्ष कर रहा है। चिंता की बात यह है कि बहुत सारे देशवासियों के लिए रोजी-रोटी, कपड़ा-मकान, शिक्षा-चिकित्सा हासिल करना आज भी बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है। सभी जानते हैं कि वर्ष 2020 से दुनिया की तरह हमारा देश भी भयावह कोरोना महामारी से जूझ रहा है, लेकिन अच्छी बात यह है कि अब देश की जनता कोरोना की दूसरी प्रचंड लहर के प्रकोप से काफी हद तक उबर गयी, आज धरातल पर हालात धीरे-धीरे सामान्य होने के कगार पर हैं। हालांकि विशेषज्ञ अभी भी लोगों की लापरवाही के चलते भविष्य में कोरोना की तीसरी लहर आने का अंदेशा व्यक्त कर रहे हैं। क्योंकि दूसरी भयावह लहर के लिए जिम्मेदार कोरोना के डेल्टा वैरिएंट के बाद दुनिया पर कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन का खतरा मंडरा रहा है, कोरोना विशेषज्ञों को ओमिक्रॉन के डेल्टा से तेज फैलने की आशंका है।


चिंता की बात यह है कि कोरोना का नया वैरिएंट ओमिक्रॉन भारत में भी पहुंच गया है। देशवासियों को उम्मीद है कि केंद्र व राज्य सरकारें कोरोना की तीसरी संभावित लहर से लड़ने के लिए धरातल पर पूर्ण रूप से तैयार होंगी क्योंकि देश में अप्रैल व मई के माह में आयी कोरोना की दूसरी बेहद प्रचंड लहर ने हमारे देश की कामचलाऊ चिकित्सा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी थी। धरातल पर बने भयावह हालात ने हर वर्ग के जनमानस के दिलोदिमाग को झकझोर कर रख दिया था। आजादी के 75वें वर्ष में अब भविष्य में उस तरह की स्थिति उत्पन्न होने से देश को बचाना है। हालांकि देश के स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति समझने के लिए उससे जुड़े कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो चिकित्सा क्षेत्र की स्थिति पहले से ही अच्छी नहीं है। हमारे देश में डॉक्टर, नर्स, प्रशिक्षित सहयोगी स्टाफ, अस्पताल आदि की तय मापदंड के अनुसार बहुत ज्यादा कमी है। "नेशनल हेल्थ प्रोफाइल" के मुताबिक भारत अपने स्वास्थ्य क्षेत्र पर जीडीपी का महज 1.02 फीसदी खर्च करता है, जोकि श्रीलंका, भूटान और नेपाल जैसे हमारे ग़रीब पड़ोसी देशों की तुलना में भी कम है।


हालांकि केंद्र की मोदी सरकार भविष्य में चिकित्सा बजट को बढ़ाने के लिए प्रयासरत है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी कुछ दिन पहले अपने वाराणसी दौरे के दौरान "पीएम आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन" को लॉन्च किया था। उस समय केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने जानकारी दी थी कि इस मिशन के अन्तर्गत देश में हर स्तर पर मजबूत हेल्थ इंफ्रा बनाने की योजना है, जिसके लिए आगामी 5 वर्ष में 64,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इसमें सरकार का मुख्य लक्ष्य ब्लॉक, जिला, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर टेस्टिंग सुविधा के लिए लेबोरेटरी तैयार करना है, इस योजना में अगले 5 वर्षों में एक जनपद में औसतन 90-100 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र के लिए यह मोदी सरकार की एक बहुत अच्छी पहल साबित हो सकती है। हालांकि यह तो आने वाला समय ही तय करेगा कि वास्तव में यह प्रयास धरातल पर अमलीजामा लिये नजर आयेंगे या सिर्फ यह चुनावी जुमला ही साबित होंगे। लेकिन फिलहाल हम "ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडी 2021" के अनुसार गुणवत्ता और उपलब्धता के मामले में देश की स्थिति देखें तो भारत की 180 देशों में 145वीं रैंकिंग है, जो किसी भी देश की जनता को स्वस्थ रखने के दृष्टिकोण से बेहद चिंताजनक स्थिति है। जबकि भारत का संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को "अनुच्छेद 21" के तहत जीने का अधिकार देता है और जीवन जीने के लिए किसी भी व्यक्ति का स्वस्थ होना बेहद आवश्यक है। देश में "स्वास्थ्य का अधिकार" प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन फिर भी आजादी के 75वें वर्ष में भी देश में चिकित्सा व्यवस्था बेहाल है। जिस तरह से लोगों को विभिन्न कारणों से कोरोना की दूसरी लहर के दौरान इलाज के लिए चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न प्रकार की बेहद जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ा था, उसने देश के बहुत सारे छोटे व बड़े पांच सितारा अस्पतालों की अच्छी व बुरी हर तरह की सच्चाई को देशवासियों के सामने लाने का कार्य किया था। 


कोरोना के बेहद भयावह दौर ने एक तरफ तो ईमानदारी से कार्य करने वाले देश के चंद अस्पताल प्रबंधन की पहचान करवाने का कार्य किया था, वहीं दूसरी तरफ देश के उन बहुत सारे अस्पतालों के प्रबंधन के भयावह चेहरे को भी सभी देशवासियों के सामने लाने का कार्य किया था, जिन्होंने आपदाकाल में भी चिकित्सा व्यवस्था को मानव सेवा की जगह स्वयंसेवा मानकर केवल नोट छापने की मशीन मान लिया था।


वैसे भी कोरोना की दूसरी लहर के समय उत्पन्न भयावह स्थिति के चलते आज बहुत सारे लोगों की मांग है कि कोरोना काल में इलाज करने वाले सभी अस्पतालों की विस्तार से जांच करा कर उनके चिकित्सा बिलों की स्क्रूटनी व ऑडिट किया जाये। क्योंकि सरकार के द्वारा उस आपदाकाल में लूट मचाने वाले अस्पतालों के प्रबंधन की पहचान करके इनको सजा देना अभी बाकी है, जिसको अंजाम देने के लिए कोरोना काल का सभी अस्पतालों का विस्तृत ऑडिट काफी है। वैसे भी बड़े पैमाने पर लोगों का मानना है कि महामारी में कुछ लोगों के अत्यधिक धन कमाने के लोभ-लालच ने बहुत सारे अस्पतालों को संगठित अपराध करने का सबसे बड़ा व सुरक्षित अड्डा बना दिया था। अंधाधुंध पैसे कमाने के लालच में बहुत सारे अस्पतालों के प्रबंधन मानवता के दुश्मन बन गये थे। अब इन अपराधियों को पकड़ने के लिए सभी अस्पतालों की जल्द से जल्द जांच बेहद आवश्यक है। कोरोना की भयावह दूसरी लहर में जिस वक्त कोरोना के संक्रमण से संक्रमित लोगों के परिजन निजी व सरकारी अस्पतालों में मरीज को भर्ती करवाने के लिए परेशान होकर इधर-उधर धक्के खा रहे थे, उस वक्त किसी को यह होशोहवास नहीं था कि बहुत सारे अस्पतालों का प्रबंधन इलाज की आड़ में उनके साथ क्या कर रहा है। सभी की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि किसी भी तरह उनके मरीज को अस्पताल भर्ती कर लें और उनके मरीज की हर-हाल में जान बच जाये, जिसका बहुत सारे अस्पतालों ने नाजायज फायदा उठाया। इसलिए भविष्य में चिकित्सा व्यवस्था में सुधार करने के लिए अब उस समय की जांच होनी बेहद आवश्यक है। उस समय देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाली मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बहुत सारे अस्पतालों में तो मरीज के उपचार के नाम पर उनके परिजनों से लूट की जा रही थी, उपचार के नाम पर जमकर परिजनों से धन उगाही के केंद्र चलाए जा रहे थे, जिसकी अब जांच होनी आवश्यक है। कोरोना मरीजों से वसूली गई ज्यादा रकम वापस करने की मांग वाली एक जनहित याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने विचारार्थ स्वीकार कर लिया है, याचिका स्वीकार करते हुए माननीय कोर्ट ने कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा बड़े स्तर पर समाज, कोरोना मरीजों और उनके परिजनों से जुड़ा है जिनसे इलाज के समय ज्यादा पैसे लिए गए। मुद्दा महत्वपूर्ण है और इस पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। देहरादून के रहने वाले अभिनव थापर की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और बीवी नागरत्ना की पीठ ने गत आठ अक्टूबर को नोटिस जारी करते हुए केंद्र सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है।


हालांकि यह भी कटु सत्य है कि महामारी के इस बेहद भयावह काल में जहां एक तरफ तो हमारे देश के अधिकांश क्षेत्रों के सभी कोरोना वारियर्स ने अपनी ड्यूटी को पूर्ण ईमानदारी के साथ सही ढंग से अंजाम देकर के दिन-रात मेहनत करके लोगों की अनमोल जान बचाने के लिए विभिन्न प्रकार से योगदान देने का कार्य किया था, वहीं चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े अधिकांश लोगों ने तो अपनी जान की परवाह ना करके बेहद कठिन विपरीत परिस्थितियों में भी लगातार मरीजों की जान बचाने के लिए दिन-रात प्रयास करने का कार्य किया था।"


कोरोना के दौर की सच्चाई यह भी रही है कि बेहद भयावह झकझोर देने वाले इस काल में बहुत सारे अस्पतालों के प्रबंधकों ने तो इंसान व इंसानियत की रक्षा करने के लिए मरीजों के लिए अपने अस्पतालों के दरवाजे हर तरह से चौबीसों घंटे खुले रखने का बेहद सराहनीय कार्य किया था, जांच करके सरकार को इन सभी लोगों का सम्मान करते हुए इनाम देना चाहिए। वहीं देश के अलग-अलग क्षेत्रों के कुछ अस्पतालों ने इस मौके को "आपदा में कमाई का बेहतरीन अवसर मानकर" लोगों की जेबों पर विभिन्न हथकंडों से जमकर डाका डाल कर, आपदाकाल में भी इंसानियत को शर्मसार करने वाला कार्य किया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बहुत सारे अस्पतालों में मरीजों को भर्ती करने के नाम पर उनके परिजनों से एडवांस जमा करवा कर जमकर उगाही की गयी थी, मरीज के परेशान परिजनों से इलाज के नाम पर मोटी रकम अस्पताल प्रबंधन के द्वारा पहले ही जमा करवा ली गयी थी, जिसको किसी भी परिस्थिति में जायज नहीं ठहराया जा सकता है। उस समय बहुत सारे अस्पतालों ने तो बिना समुचित इलाज, दवाई व ऑक्सीजन के ही मरीजों के परिजनों से इलाज के नाम पर जमकर लूट करते हुए लाखों रुपये का भारी-भरकम बिल वसूलने का कार्य किया था। उनका यह कृत्य इंसान की मजबूरी का फायदा उठाकर इंसानियत को बेहद शर्मसार करने वाला एक दंडनीय जघन्य अपराध है, जिसकी सजा देने के लिए अस्पतालों का कोरोना काल का ऑडिट होना बेहद आवश्यक है।


वैसे भी कोरोना की दूसरी लहर में उत्पन्न अव्यवस्था की सत्यता जानने के लिए व देश की चिकित्सा व्यवस्था में मौजूद खामियों को पहचान कर, भविष्य में उन्हें दूर करके सुधार करने के लिए देश के सभी निजी व सरकारी अस्पतालों का सरकार की निगरानी में निष्पक्ष एजेंसी के द्वारा जल्द से जल्द हर पहलू का ऑडिट होना बेहद जरूरी है। इस ऑडिट में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े हुए प्रत्येक पहलू की बारीकी से जांच करके, रिपोर्ट के अनुसार भविष्य में चिकित्सा व्यवस्था में सुधार करने के लिए ठोस पहल करनी चाहिए।


दूसरी लहर के दौरान कोरोना या अन्य बीमारियों का इलाज करने वाले सभी निजी व सरकारी अस्पतालों की जांच करके यह पता लगाना चाहिए कि आखिर उस वक्त दवाई, इंजेक्शन, ऑक्सीजन, वेंटिलेटर आदि की देश में भारी कमी क्यों हुई थी। जांच के द्वारा यह पता लगाया जाना चाहिए कि उस वक्त इलाज की आपाधापी में वास्तव में नकली दवाई व इंजेक्शनों का कितनी मात्रा में जाने-अनजाने में मरीजों पर उपयोग हो गया, इन नकली दवाओं के बाजार व लोगों के पास आने का मुख्य स्रोत क्या था। दूसरी लहर के दौरान लाईफ सेविंग ड्रग्स की देश में मारामारी क्यों हुई? दवाओं व इंजेक्शनों की कालाबाजारी करने वाले लोगों के पीछे क्या दवा निर्माता कंपनी, अस्पतालों, संगठित गिरोह या किसी अन्य व्यक्ति की तो कोई भूमिका तो नहीं थी? देशहित व जनहित में इसकी जांच समय रहते आवश्यक है और दोषियों को दंडित करना आवश्यक है। अस्पतालों में डॉक्टरों व अन्य सभी सहयोगी स्टाफ की दूसरी लहर के समय उपलब्धता की क्या स्थिति थी, इस तरह के बहुत सारे बिंदुओं पर जांच जरूरी है। सरकार के द्वारा सभी अस्पतालों का ऑडिट करके और इस ऑडिट के बाद आये परिणाम के आधार पर आपदा के दौर में व्यवस्था को बेहतर बनाए रखने वाले अस्पतालों को विभिन्न प्रकार से मदद देकर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। वहीं महामारी के दौरान कोरोना के इलाज के नाम पर लूटपाट मचाने वालें अस्पतालों की पहचान करके दोषियों को दंडित करके सभी को संदेश भी देना चाहिए, जिससे कि भविष्य में मानवता को शर्मसार करने वाले इस तरह के कृत्यों पर लगाम लगायी जा सकें। वैसे भी अस्पतालों के ऑडिट की रिपोर्ट के आधार पर सरकार को भविष्य के लिए देश के चिकित्सा क्षेत्र को बेहतर करने के लिए तैयारी करने में सहयोग मिल सकता है, देश की चिकित्सा व्यवस्था में व्याप्त खामियों को दूर करने के लिए एक उचित ठोस आधार मिल सकता है।


ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर धरातल पर काम करके भविष्य में चिकित्सा व्यवस्था को बेहतर किया जा सकता है। इससे सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि देशवासियों को भविष्य में "स्वास्थ्य का अधिकार" वास्तव में जरूरत के समय धरातल पर मिल सकता है। कोरोना काल के ऑडिट के आधार पर कार्य करके आज के समय के बीमार चिकित्सा क्षेत्र के मर्ज का स्थाई निदान करके भविष्य में इस बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र को बीमारी से मुक्त करके स्वस्थ किया जा सकता है। वैसे भी आज समय की जरूरत है कि सरकार को आजादी के 75वें वर्ष में देश की जनता को सस्ता सुलभ व उच्च गुणवत्ता पूर्ण इलाज देने के लंबे समय से लंबित वायदे को पूर्ण करने के लिए जल्द से जल्द धरातल पर ठोस पहल करते हुए, सभी देशवासियों की सेहत ठीक रखने के लिए कार्य करना चाहिए।


-दीपक कुमार त्यागी-

(स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक)

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मोदी पूर्वांचल को समर्पित करेंगे चिकित्सा का सबसे बड़ा मंदिर

पूर्वांचल के लोगों की चिकित्सा एवं स्वास्थ्य की सबसे बड़ी उम्मीद को पूरा करने वाला मंदिर बन कर तैयार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 07 दिसम्बर को गोरखपुर एम्स, नागरिकों को समर्पित करने वाले हैं। पूर्वांचल ही नहीं, बिहार एवं पड़ोसी राष्ट्र नेपाल के लोगों के लिए भी यह चिकित्सा संस्थान वरदान सिद्ध होने वाला है, जिन्हें दिल्ली एम्स के फुटपाथों पर सर्द रातों, तपती गर्मी और तूफानी बारिश में भीग कर अपने नंबर का इंतजार करने को मजबूर होना पड़ता रहा है।


दशकों के राजनीतिक परिदृश्य को अगर देखें तो सिर्फ दो राजनेता ने उत्तर प्रदेश के पूर्व में स्थित इस पिछड़े क्षेत्र के लोगों की कराह सुनी और समझी है। 1998 से लगातार गोरखपुर से सांसद रहे गोरखपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में एम्स स्थापित करने की मांग अनेक बार संसद में उठाई मगर उनकी आवाज 2014 में सुनी गई, जब देश की बागडोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभाली। गोरखपुर में एम्स मुख्यमंत्री योगी की वर्षों की तपस्या का प्रतिफल है। प्रधानमंत्री मोदी गोरखपुर तथा आसपास के लोगों, खासकर किसानों को एक और सौगात देंगे। मोदी करीब 8603 करोड़ की लागत से 600 एकड़ भूमि में स्थापित नई फर्टिलाइजर फैक्टरी का भी शुभारंभ करेंगे।


गोरखपुर एम्स शुरू होने से उच्च चिकित्सा सेवाओं के लिए पूरे क्षेत्र के लोगों को दिल्ली, मुम्बई में भटकना नहीं पड़ेगा और न ही महंगे निजी कॉरपोरेट हॉस्पिटल में जाने को मजबूर होना पड़ेगा।


कई सर्वे और स्टडीज साबित करती हैं कि स्वास्थ्य पर होने वाले खर्चों की वजह से एक बहुत बड़ी जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे चली जाती है। पिछड़ा पूर्वांचल क्षेत्र भी इसी चक्रव्यूह में फंसा हुआ था। अब एक नई उम्मीदों का आकाश पूर्वांचल वासियों के सामने है। चिकित्सा और शिक्षा को नई ऊंचाई प्रदान करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री मोदी ने 22 जुलाई 2016 को गोरखपुर एम्स का शिलान्यास किया था।


करीब 1012 करोड़ की लागत वाले तथा 112 एकड़ में विस्तृत इस चिकित्सा संस्थान में ओपीडी का उद्घाटन फरवरी 2019 को किया गया और इस समय 16 सुपर स्पेशलिटी विभागों की ओपीडी शुरू हो चुकी है। उद्घाटन के बाद 300 बेड का अस्पताल पूरी तरह से कार्य करना शुरू कर देगा। इसे 750 बेड तक विस्तारित करने की योजना है।


स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरसता पूर्वांचल दशकों से राजनीतिक उपेक्षा का शिकार रहा। करीब चार दशकों तक जापानी इंसेफ्लाइटिस यहां के हजारों बच्चों को हर वर्ष निगलता रहा। सरकारें बदलती रहीं मगर किसी ने सुध तक नहीं ली। नवजात शिशुओं को खोने की अपार पीड़ा की लड़ाई योगी ने सांसद के रूप में संसद से लेकर सड़क तक लड़ी पर तत्कालीन नीति निर्माताओं के कानों तक आवाज नहीं पहुँची। वर्ष 2017 में योगी आदित्यनाथ के प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते ही परिदृश्य बदलने लगा। उन्होंने इंसेफ्लाइटिस के खिलाफ न सिर्फ जंग छेड़ी, बल्कि समन्वित प्रयासों से इस महामारी पर नियंत्रण कर लिया गया।


यह पूर्वांचल के लोगों के लिए बड़ा सुअवसर है कि प्रधानमंत्री मोदी सात दिसम्बर को गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में स्थापित रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर की नौ लैब्स को भी राष्ट्र को समर्पित करेंगे। ये लैब्स जापानी इंसेफ्लाइटिस के कारगर परीक्षण और शोध पर कार्य करेंगी। यह राज्य स्तरीय वायरस प्रशिक्षण लैब कोविड-19 की जांच और शोध के साथ अन्य विषाणु जनित बीमारियों पर शोध कार्य करेगा।


अब प्रदेश में दो एम्स संचालित हैं। एक गोरखपुर और दूसरा रायबरेली में। वर्ष 2007 में रायबरेली एम्स की स्वीकृति मिली लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव इसके संचालन में देरी हुई। मोदी-योगी की जोड़ी बनते ही प्रदेश में स्थापित दोनों एम्स विश्वस्तरीय मानक से सुसज्जित हुए और प्रदेश में स्वास्थ्य सेवा के नए युग की शुरुआत हुई। इस जोड़ी को ही एम्स के संचालन का श्रेय जाता है। वहीं, जिस बीमारी की आहट मात्र से ही पूरा परिवार हिल जाता हो, उस कैंसर के इलाज के लिए वाराणसी में देश का दूसरा बड़ा कैंसर हॉस्पिटल 'महामना कैंसर संस्थान' भी मरीजों के इलाज के लिए खोल दिया गया है।


2017 में प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद से स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर पर विशेष ध्यान दिया गया। योगी सरकार आज 'एक जनपद एक मेडिकल कॉलेज' के मंत्र के साथ आगे बढ़ रही है। प्रदेश के 59 जनपदों में कम से कम एक मेडिकल कॉलेज क्रियाशील है। 16 जनपदों में पीपीपी मॉडल पर मेडिकल कॉलेज की स्थापना प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।


प्रदेश में पहले आयुष विश्वविद्यालय महायोगी गुरु गोरखनाथ आयुष विश्वविद्यालय का गोरखपुर में शिलान्यास किया गया और इसका निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी चिकित्सा विश्वविद्यालय का निर्माण प्रारंभ हो चुका है।


लोगों को चिकित्सा पर होने वाले खर्चों से राहत देने के लिए प्रदेश में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत) में 6 करोड़ 47 लाख लोगों को बीमा कवर दिया गया है। इसके साथ ही 42.19 लाख लोगों का मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना में बीमा कवर सुनिश्चित किया गया है।


चिकित्सा क्षेत्र के समग्र विकास के लिए स्वास्थ्य शिक्षा पर भी योगी सरकार विशेष ध्यान दे रही है। प्रदेश में एमबीबीएस की 938 सीटें बढ़ाई गईं हैं तथा केंद्र सरकार से 900 सीटें बढ़ाए जाने की अनुमति शीघ्र मिलने की संभावना है। एमडी एवं एमएस में 127 सीटों की वृद्धि की गई है। चिकित्सकों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई है। इसके साथ ही 1104 भारतीय जन औषधि केन्द्रों के माध्यम से सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।


योगी सरकार के प्रयासों का ही प्रतिफल है कि आज नेशनल इंस्टिट्यूशनल रैकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) की इंडिया रैंकिंग में एसजीपीजाई 5वें, बीएचयू 7वें, केजीएमयू, लखनऊ 9वें तथा एएमयू 15वें स्थान पर है।योगी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने कोरोना महामारी का बेहतर प्रबंधन किया, टीकाकरण में भी अग्रणी भूमिका में है। 16 करोड़ लोगों को वैक्सीन की एक डोज तथा 5 करोड़ से अधिक लोगों को कोविड टीके की दोनों डोज का सुरक्षा कवच प्रदान करने वाला देश का प्रथम राज्य बन गया।


प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में मुख्यमंत्री योगी के लोक कल्याण की प्रतिज्ञा का ही सुफल है कि आज उत्तर प्रदेश अपने लोगों को उनके नजदीक ही उच्चस्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने की दिशा में सफलता हासिल कर रहा है। राजनीति, गोरखपीठ के संतों के लिए सिद्धि नहीं, बल्कि लोक-साधना का माध्यम है। उन्होंने राजनीति को लोक सेवा व कल्याण का माध्यम बनाया है। उत्तर प्रदेश के 24 करोड़ लोग इसे पूरी शिद्दत से महसूस भी कर रहे हैं।


-डॉ. महेंद्र कुमार सिंह-

(लेखक डीडीयू गोरखपुर विवि में सहायक प्राध्यापक हैं।)



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वसीम रिजवी प्रकरण: गांधीजी ने भी हिन्दू धर्म को सर्वश्रेष्ठ माना था

उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी अंततः सनातनी हो गये। कहा जा रहा है कि उन्होंने इस्लाम धर्म छोड़कर हिन्दुत्व को अपना लिया है। वसीम रिजवी कहते हैं कि इस्लाम कोई धर्म ही नहीं है। पता नहीं वसीम साहब किस अर्थ में ऐसा कह रहे हैं। वैसे धर्म अपने आप में बहुत गूढ़ है और यह मानव धर्म तक जाता है।


याद करें कि वसीम रिजवी की किताब 'मुहम्मद' पर बहुत शोरशराबा हो चुका है। उसमें उन्होंने कुरान की 35 आयतों को आतंक भड़काने तक का जिम्मेदार बताया। पुस्तक के लिए उन्होंने विभिन्न धार्मिक ग्रंथों से कम से कम 350 संदर्भ लेने का दावा भी किया है। बहरहाल, जब वसीम रिजवी हिन्दुत्व अपनाने को सनातनी होना कहते हैं, हमें इस पर विचार करना चाहिए। इस अर्थ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की याद आती है। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में जब वसीम रिजवी ने नया कदम उठाया है, राष्ट्रपिता गांधीजी का कथन याद करें।


वैसे, गांधीजी ने धर्म पर बहुत कुछ कहा है। यहां संदर्भित कथन इस प्रकार है- “मैं समझा दूं कि धर्म से मेरा क्या मतलब है। मेरा मतलब हिंदू धर्म से नहीं है, जिसकी मैं बेशक और धर्मों से ज्यादा कीमत आंकता हूं। मेरा मतलब उस मूल धर्म से है जो हिंदू धर्म से कहीं उच्चतर है, जो मनुष्य के स्वभाव तक का परिवर्तन कर देता है, जो हमें अंतर से सत्य से अटूट रूप से बांध देता है और जो निरंतर अधिक शुद्ध और पवित्र बनाता रहता है। वह मनुष्य की प्रकृति का ऐसा स्थायी तत्व है जो अपनी संपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहता है और उसे तब तक बिल्कुल बेचैन बनाए रखता है, जब तक उसे अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं हो जाता तथा स्रष्टा के और अपने बीच का सच्चा संबंध समझ में नहीं आ जाता।” (गांधी वाञ्मय-17/442)


प्रश्न है कि क्या वसीम रिजवी ने गांधीजी की तरह हिन्दू धर्म को इसलिए अपनाया है, क्योंकि गांधीजी के ही शब्दों में उसकी ' बेशक और धर्मों से ज्यादा कीमत' है। ध्यान दें कि हिन्दू धर्म की और धर्मों से ज्यादा कीमत बताकर भी गांधीजी कहते हैं कि ऐसा एक भी धर्म नहीं है जो संपूर्णता का दावा कर सके। वे धर्मों की तुलना करना अनावश्यक समझते थे। उनकी मान्यता है कि अधर्म तो मनुष्य जैसी अपूर्ण सत्ता द्वारा मिलता है, अकेला ईश्वर ही संपूर्ण है। इसलिए हमें अपने धर्म को प्रौढ़ मान कर दूसरे धर्मों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। इसलिए गांधीजी हिन्दू होने के कारण अपने लिए हिन्दू धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए भी यह नहीं कह सकते कि हिन्दू धर्म सबके लिए सर्वश्रेष्ठ है और इस बात की तो स्वप्न में भी आशा नहीं रखते कि सारी दुनिया हिन्दू धर्म को अपनाये। इसी तरह गांधीजी ईसाइयों और मुसलमानों से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे इस्लाम और ईसाई धर्म को समूचे विश्व का धर्म बनाने का सपना और उस दिशा में किए जा रहे अपने प्रयत्नों को छोड़कर, स्वधर्म का पालन करते हुए अन्य धर्मावलंबियों की मदद करें।


निश्चित ही गांधीजी तब मिशनरियों की ओर से किए जा रहे धर्म परिवर्तन की कोशिश को सही नहीं ठहराते। वे स्वेच्छा से किसी भी मतावलंबी के अपनी आस्था बदलने को भी गलत नहीं कहते। आज देखा जाय तो वसीम रिजवी के हिन्दुत्व अपनाने के पीछे भी किसी संगठन का दबाव नहीं है। वे बहुत पढ़े-लिखे हैं। उन्होंने अपनी इच्छा से ही ऐसा किया है। अपनी पुस्तक पर शोरशराबा होने पर भी उन्होंने कहा था, “असदुद्दीन ओवैसी (एआईएमआईएम प्रमुख) ही हमारे खिलाफ एफआईआर करवा रहा है तो भाई एफआईआर करवाने से क्या मतलब हुआ ? हमने तुम्हारी किताबों के हवाले से किताब लिखा तो उन किताबों के हवाले से जवाब दे दो। अपने में इंसानियत पैदा कर लो, तुम इंसानियत का मजहब अख्तियार कर लो, हम अपनी किताब को वापस ले लेंगे।”


पता नहीं, यह किताब लिखने और उसे वापस लेने की बहस भी इस मामले में कहां तक चलेगी। फारसी के प्रसिद्ध विद्वान हाफिज शिराजी जैसे लोग तो बिरले ही होते हैं, जो सर्वधर्म समभाव पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि खुदा से मिलने की ख्वाहिश है तो सभी से मुहब्बत करो। वसीम रिजवी इस दिशा में कहां तक जाएंगे, अभी से कहा नहीं जा सकता। फिलहाल, उनके कदम में राजनीति देखी जायेगी। ऐसा देखना और कहा जाय तो करना भी गलत नहीं है, बशर्ते गांधीजी का ध्यान रखें। बापू ने तो बार-बार और साफ तौर पर कहा था कि उनकी राजनीति भी धर्म का ही हिस्सा है। उनके शब्दों में, “मेरे बहुत से राजनीतिक मित्र मेरी आशा इसलिए छोड़ बैठे हैं कि उनका कहना है कि मेरी राजनीति भी मेरे धर्म से ही उद्धृत है और उनका यह कहना सही है। मेरी राजनीति तथा अन्य तमाम प्रवृत्तियों का स्रोत मेरा धर्म ही है। मैं तो इससे भी आगे बढ़कर यह कहूंगा कि धर्मपरायण व्यक्ति की प्रत्येक प्रवृत्ति का स्रोत ही धर्म होना चाहिए।” (गांधी वांग्मय/57-214)।


राजनीति में गांधी बहुतों के आदर्श हो सकते हैं। यहां मात्र धर्म और राजनीति के मामले में उनके विचार वसीम रिजवी के हिन्दुत्व अपनाने के संदर्भ में लिया गया है। उम्मीद है कि गांधीजी के कट्टर हिन्दू होते हुए राजनीति को भी उसी का अंग मानने को ध्यान में रखा जायेगा। इस पर भी विचार करना चाहिए कि आखिर गांधीजी हिन्दू धर्म को दूसरे मतों से श्रेष्ठ क्यों मानते हैं।


-डॉ. प्रभात ओझा-

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार के न्यूज एडिटर हैं।)




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विनोद दुआ: पत्रकारिता के एक युग का अंत

एनडीटीवी पर 'ख़बरदार इंडिया' 'विनोद दुआ लाइव' 'ज़ायका इंडिया का' जैसे चर्चित कार्यक्रमो के प्रस्तोता विनोद दुआ ने दूरदर्शन पर 'जनवाणी' से भी पहचान बनाई थी। दूरदर्शन पर चुनाव विश्लेषण के लिए उन्हें खास प्रसिद्धि मिली। कुछ समय पहले उन्हें कोरोना संक्रमण हुआ था।उनकी बेटी मल्लिका दुआ ने पिता के निधन की जानकारी दी,तो पूरा देश स्तब्ध रह गया। विनोद दुआ को डॉक्टरों की सलाह पर पिछले दिनों दिल्ली के एक हास्पिटल के आईसीयू में भर्ती कराया गया था।मल्लिका ने कहा, हमारे निर्भय और असाधारण पिता हमारे बीच नहीं रहे।कोरोना वायरस से संक्रमित होने के चलते ही इसी साल जून माह में उन्होंने अपनी पत्नी रेडियोलॉजिस्ट पद्मावती दुआ को खो दिया था। उन्होंने एक अद्वितीय जीवन जिया, दिल्ली की शरणार्थी कॉलोनी से अपने कैरियर की शुरुआत कर वे 42 सालों तक श्रेष्ठ पत्रकारिता के शिखर तक पहुंचे और हमेशा सच के साथ खड़े रहे। देश में कोरोना की दूसरी लहर के चरम पर रहने के दौरान विनोद दुआ और उनकी पत्नी गुरुग्राम के एक अस्पताल में भर्ती कराए गए थे। उनकी सेहत तब से खराब थी और उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता था और अंततः वे जीवन की जंग हार गए।उस समय जब टेलीविजन की दुनिया दूरदर्शन तक सिमटी हुई थी और टेलीविजन पत्रकारिता का कही नाम तक नही था उस समय विनोद दुआ एक नक्षत्र की तरह उभरे थे। वे साढ़े तीन दशकों तक किसी मीडिया जगत के बीच जगमगाते रहे।दूरदर्शन पर उनकी शुरुआत ग़ैर समाचार कार्यक्रमों की ऐंकरिंग से हुई थी, मगर बाद में वे समाचार आधारित कार्यक्रमों की दुनिया में दाखिल हुए और छा गए। चुनाव परिणामों के जीवंत विश्लेषण ने उनकी शोहरत को आसमान तक पहुँचा दिया था। प्रणय रॉय के साथ उनकी जोड़ी ने पूरे भारत को सम्मोहित कर लिया था। विनोद दुआ का अपना विशिष्ट अंदाज़ था। इसमें उनका बेलागपन शामिल था।जनवाणी कार्यक्रम में वे मंत्रियों से जिस तरह से सवाल पूछते या टिप्पणियाँ करते थे, उसकी कल्पना करना उस ज़माने में एक असंभव सी बात हुआ करती थी।


दूरदर्शन में कोई ऐंकर किसी मंत्री को यह कहे कि उनके कामकाज के आधार पर वे दस में से केवल तीन अंक देते हैं तो ये मंत्री के लिए बहुत ही शर्मनाक बात थी। लेकिन विनोद दुआ में ऐसा कहने का साहस था। इसीलिए मंत्रियों ने प्रधानमंत्री से इसकी शिकायत करके उनके कार्यक्रम को बंद करने के लिए दबाव भी बनाया था, मगर मन्त्रीगण कामयाब नहीं हुए थे,जो विनोद दुआ के बड़े प्रभाव का प्रमाण था।विनोद दुआ ने अपना यह अंदाज़ जीवनपर्यंत नहीं छोड़ा। आज के दौर में जब अधिकांश पत्रकार और ऐंकर सत्ता की चापलूसी करते हैं, विनोद दुआ नाम का यह व्यक्ति सत्ता से टकराने में भी कभी नहीं घबराया।उन्होंने कभी इस बात की परवाह नहीं की कि सत्ता उनके साथ क्या करेगी। सत्तारूढ़ दल ने उनको राजद्रोह के मामले में फँसाने की कोशिश की गई, मगर उन्होंने ल़ड़ाई लड़ी और सुप्रीम कोर्ट से जीत भी हासिल की।उनका मुकदमा मीडिया के लिए भी एक राहत साबित हुआ।


हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों भाषाओं पर दुआ साहब की अच्छीपकड़ थी।प्रणय रॉय के साथ चुनाव कार्यक्रमों में उनकी प्रतिभा पूरे देश ने देखी और उसे सराहा भी गया। त्वरित अनुवाद की क्षमता ने उनकी ऐंकरिंग को ऊंचाई तक पहुँचा दिया था।

देश की पहली हिंदी साप्ताहिक वीडियो पत्रिका परख की उनकी लोकप्रियता का प्रमाण थी। इस पत्रिका के वे न केवल ऐंकर थे बल्कि निर्माता-निर्देशक भी थे। इसके लिए उन्होंने देश भर में संवाददाताओं का जाल बिछाया और विविध सामग्री का संयोजन करके पूरे देश को मुरीद बना लिया। वे अपने सहयोगियों को भरपूर आज़ादी देते थे। वे ज़ी टीवी के लिए एक कार्यक्रम चक्रव्यूह करते थे।ये एक स्टूडियो आधारित टॉक शो था, जिसमें ऑडिएंस के साथ किसी मौज़ू सामाजिक मसले पर चर्चा की जाती थी। इस शो में विनोद दुआ के व्यक्तित्व और ऐंकरिंग का एक और रूप देखा जा सकता था।


विनोद दुआ की पत्रकारीय समझ सहारा टीवी पर उनके द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला कार्यक्रम प्रतिदिन भी कहा जा सकता है।इस कार्यक्रम में वे पत्रकारों के साथ उस दिन के अख़बारों में प्रकाशित ख़बरों की समीक्षा करते थे। इस कार्यक्रम में उनकी भूमिका को देखकर कोई कह ही नहीं सकता था कि ऐंकर पत्रकार नहीं है।


विनोद दुआ टीवी पत्रकारिता की पहली पीढ़ी के ऐंकर थे। उन्होंने उस दौर में ऐंकरिंग शुरू की थी, जब लाइव कवरेज न के बराबर होता था।1974 में युवा मंच और 1981 में आपके लिए जैसे कार्यक्रम प्रसारित होते थे। सन 1985 में समाचार आधारित चुनाव विश्लेषण लाइव प्रसारण शुरू हुआ और उन्होंने अपनी महारत साबित कर दी। जब डिजिटल पत्रकारिता का दौर आया तो वे बड़ी आसानी से वहाँ भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाब रहे।


-डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट-




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शादी की रस्मों का बनता भद्दा मजाक

वर्तमान में हमारे सभी त्यौहारों, संस्कारों, रीति-रिवाजों का पूर्ण रूप से व्यवसायीकरण हो चुका है। संचार माध्यमों की घुसपैठ तथा भौतिकवादी सोच हमारे सभी रीति-रिवाजों, संस्कारों तथा त्यौहारों में झलक रही है। देखा-देखी तथा साधनों के अभाव के बावजूद आम तथा गरीब व्यक्ति भी इन आयोजनों के लिए मजबूर हो चुका है। भौतिकवादी चकाचौंध तथा विचार शून्यता से संस्कृति, रीति-रिवाजों तथा संस्कारों की परिभाषाएं ही बदल गई हैं। शादी समारोहों में कई प्रकार के रस्मों-रिवाजों, धार्मिक एवं सामाजिक संस्कारों का प्रावधान है जिसमें देवताओं के आह्वान के साथ-साथ हल्दी, मेहंदी, उबटन, मामा आगमन, घोड़ी, जयमाला, सात फेरे, हवन, वेदिका पूजन, मांग भरना, आनंद-विनोद एवं छेड़छाड़ के उद्देश्य से दुल्हन की बहनों, सहेलियों द्वारा द्वार रोकना या जूते छुपा लेना, बारातियों को गालियां देना, विदाई तथा वधु प्रवेश आदि रस्मों-रिवाज़ हमारे शादी समारोह को चार चांद लगाकर चिर स्मरणीय बना देते हैं।


 विवाह संस्कार किसी भी व्यक्ति के जीवन का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण समारोह होता है। यह संस्कार युवक एवं युवती को जहां एक-दूसरे के हाथों में सौंप कर भविष्य के अनंत सपनों, उमंगों तथा खुशियों से दामन को भर देता है, वहीं पर यह पारिवारिक तथा सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के लिए भी जि़म्मेदारी का एहसास करवाता है। विवाह संस्कार में विभिन्न रस्मों-रिवाज़ों के पीछे कोई न कोई महत्त्व एवं गूढ़ रहस्य होता है जिसे शादी के योग्य सभी युवा-युवतियों को जानना एवं समझना चाहिए अन्यथा कोर्ट मैरिज तथा अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। आजकल बहुत सा शिक्षित युवा वर्ग शादी की आवश्यकता को न समझते हुए लिव इन रिलेशनशिप में भी रह रहा है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसे सामाजिक रूप से मान्यता नहीं है। वर्तमान में शादी समारोह में लाखों रुपए की राशि खर्च कर भव्य आयोजन किए जाते हैं। एक से बढ़कर एक शादी आयोजित होती है, लेकिन कोई भी शादी समारोह इतिहास के पन्नों में भव्य आयोजन के रूप में आज तक अपना पंजीकरण नहीं करवा पाया। इसका कारण यह है कि भौतिकवाद की इस भेड़ चाल में कोई भी धनवान तथा संपन्न व्यक्ति अपने आयोजनों में किसी प्रकार की कमी नहीं रहने देना चाहता। विवाह संस्कार की महत्त्वपूर्ण एवं अर्थपूर्ण क्रियाओं का कोई महत्त्व ही नहीं रह गया है। ब्यूटी सैलून संचालकों के सस्ते से महंगे पैकेजेस हैं। बैंड-बाजे वाले तथा ढोली चाहते हैं कि बाराती शराब के नशे में धुत्त-मदमस्त होकर सारी रात नाचते रहें तथा पैसे की बरसात होती रहे।


 उनकी ओर से लग्न मुहूर्त का समय निकले तो निकलता रहे। घोड़ी वाले का पैसे बनाने का अपना समय है। पंडित जी की अपनी मजबूरियां हैं। फोटोग्राफर एवं वीडियोग्राफर को अपना बिजनेस करना है। दूल्हे के दोस्तों तथा दुल्हन की सहेलियों की अपनी भूमिका है। शादी का कार्ड छापने से लेकर मिठाई, भाजी, धाम, टैंट, कैटरिंग, लाइट एंड साउंड, डीजे, डैकोरेशन, ब्यूटी सैलून, बड़े-बड़े होटलों में ठहरने के इंतजाम, महंगी से महंगी शराब, कुल मिलाकर शादी एक संस्कार समारोह न बन कर एक ‘इवेंट मैनेजमेंट’ बन चुका है। इवेंट मैनेजमेंट में कितने लोगों का इंतजाम, क्या-क्या रिक्वायरमेंट, ब्रेकफास्ट, लंच, कॉकटेल, डिनर का मैन्यू तथा बजट महत्त्वपूर्ण है। केवल चैक पेमेंट पर सब कुछ एकदम तैयार मिलता है। आपको सिर्फ कोट-पेंट तथा टाई लगाकर सज-धज कर आयोजन स्थल पर रोबोट की तरह हाथ जोड़ते हुए लोगों का स्वागत करना है। पड़ोसी तथा रिश्तेदार मात्र तीन घंटे के आयोजन में समारोह का आनंद लेने के बाद अक्सर आलोचनाएं करते ही पाए जाते हैं। इन भव्य शादी समारोहों में आयोजकों द्वारा सभी को दुनिया के सुखों को प्रदान करने की कोशिश की जाती है, लेकिन भौतिकवाद की चकाचौंध में विवाह-संस्कारों तथा रस्मों-रिवाजों की आत्मा ही घुटती है। सबसे बुरी हालत तो शादी संस्कारों को पूरा करवाने वाले कुल पुरोहित की होती है जिसे बंधुआ मजदूर की तरह शादी समारोह में लाकर आधे घंटे में रस्मों-रिवाज़ पूरा करने के आदेश दे दिए जाते हैं। पुरोहितों को भी व्यवस्था से समझौता करना पड़ता है। वरमाला के समय वर पक्ष की ओर से दूल्हे के दोस्तों तथा वधु पक्ष की ओर से उसके भाइयों की फौज को वरमाला डालने या न डालने पर कई बार उलझते देखा जाता है। आमोद-प्रमोद के क्षणों में विष्णु रूपी वर तथा लक्ष्मी रूपी वधु को अपने बेहद अंतरंग, अर्थपूर्ण तथा महत्त्वपूर्ण क्षणों में भी तनातनी का सामना करना पड़ता है। बुद्धिमान व्यक्तियों के अनुसार जयमाला के क्षण वर एवं वधु के लिए बहुत ही अंतरंग एवं महत्त्वपूर्ण होते हैं तथा इसमें किसी भी अनावश्यक नाटक या अन्य पात्रों की आवश्यकता नहीं होती। वरमाला बहुत ही सरल तथा सहज ढंग से ग्रहण की जानी चाहिए। इसी प्रकार लग्न, सात फेरों, हवन, वेदिका, मांग भराई आदि संस्कारों का विधि-विधान से पालन होना चाहिए।


 हमारे शास्त्रों में परिवार के कुल पुरोहित को गुरु माना जाता है। उनके निर्देशानुसार विधानपूर्वक संस्कार संपन्न होना चाहिए। विवाह संस्कार में द्वार रोकना तथा जूते चुराना इत्यादि रस्में भी वर-वधु एवं उनके भाइयों-बहनों, दोस्तों, सहेलियों के बीच हंसी-खुशी, आमोद-प्रमोद का एक कारण है, लेकिन इसके नाम पर भी भारी भरकम राशि मांगने की शर्त पर अड़े रहने से भी कई बार आंखें मैली होती हुई दिखाई देती हैं। किसी भी शादी समारोह के आयोजनों में बहुत से लोगों के हित, आजीविका तथा भावनाएं जुड़ी होती हैं जिन्हें पूरा किया जाना आसान कार्य भी नहीं होता। भौतिकवाद की चकाचौंध में पूरी तरह से आनंद लें, लेकिन शादी से पूर्व कुछ बातें वर-वधु तथा उनके अभिभावक समझदारी से सुनिश्चित कर लें कि किसी भी प्रकार का अन्न-धन तथा संसाधनों का अपव्यय न हो। हिंदू संस्कृति से शादी संस्कार संपन्न करें तो रीति-रिवाजों का उपहास न उड़ने दें। वरमाला, लग्न, वेदी, हवन, सात फेरों, मांग भराई, शादी की शर्तों की गरिमा एवं गंभीरता का ध्यान रखें। शादियों में भारी-भरकम कानफाड़ू संगीत से शरीर झूम सकते हैं, लेकिन आत्मा तृप्त नहीं हो सकती। भारी आवाज़ों के कारण हमारे विचारों का आदान-प्रदान नहीं हो पाता। अपनी संस्कृति तथा रीति-रिवाजों को अधिमान दें। भोजन की बरबादी किए बिना भूखे पेट व्यक्तियों की भूख शांत हो सकती है। अपनी बुद्धि और विवेक से बहुत ही संवेदनशील निर्णय लेकर साधारण एवं विवाह समारोह का गरिमामय आयोजन करें। फिज़ूलखर्ची को रोक कर अपने आप को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करें। विवाह संस्कार किसी भी व्यक्ति के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण और चिरस्मरणीय संस्कार होता है। इसके रीति-रिवाजों, संस्कारों का भद्दा मजाक नहीं बनना चाहिए।


-प्रो. सुरेश शर्मा-





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भारत में गरीबी खत्म करने के वादे अब तक खोखले ही साबित हुए हैं

भारत में गरीबों की हालत कितनी शर्मनाक है। आजादी के 74 वर्षों में भारत में अमीरी तो बढ़ी है लेकिन वह मुट्ठीभर लोगों और मुट्ठीभर जिलों तक ही पहुंची है। आज भी भारत में गरीबों की संख्या दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। हमारे देश के कई जिले ऐसे हैं, जिनमें आधे से ज्यादा लोगों को पेट भर रोटी भी नहीं मिलती। वे दवा के अभाव में ही दम तोड़ देते हैं। वे क ख ग भी न लिख सकते हैं न पढ़ सकते हैं। मैंने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी जिलों में लोगों को नग्न और अर्ध-नग्न अवस्था में घूमते हुए भी देखा है।

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रंगराजन आयोग का मानना था कि गांवों में जिसे 972 रु. और शहरों में जिसे 1407 रु. प्रति माह से ज्यादा मिलते हैं, वह गरीबी रेखा से ऊपर है। वाह क्या बात है? यदि इन आंकड़ों को रोजाना आमदनी के हिसाब से देखें तो 30 रु. और 50 रु. रोज भी नहीं बनते हैं। इतने रुपए रोज़ में आज किसी गाय या भैंस को पालना भी मुश्किल है। दूसरे शब्दों में भारत के गरीब की जिंदगी पशुओं से भी बदतर है। विश्व भर के 193 देशों वाली गरीबी नापने वाली संस्था का कहना है कि यदि गरीबों की आमदनी इससे भी ज्यादा हो जाए तो भी उसने जो 12 मानदंड बनाए हैं, उनके हिसाब से वे गरीब ही माने जाएंगे, क्योंकि कोरी बढ़ी हुई आमदनी उन्हें न तो पर्याप्त स्वास्थ्य-सुविधा, शिक्षा, सफाई, भोजन, स्वच्छ पानी, बिजली, घर आदि मुहय्या करवा पाएगी और न ही उन्हें एक सभ्य इंसान की जिंदगी जीने का मौका दे पाएगी।


दूसरे शब्दों में व्यक्तिगत आमदनी के साथ-साथ जब तक पर्याप्त राजकीय सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी, नागरिक लोग संतोष और सम्मान का जीवन नहीं जी सकेंगे। सभी सरकारें ये सब सुविधाएं बांटने का काम भी करती रहती हैं। उनका मुख्य लक्ष्य तो इन सुविधाओं की आड़ में वोट बटोरना ही होता है लेकिन जब तक भारत में बौद्धिक श्रम और शारीरिक श्रम का भेदभाव नहीं घटेगा, यहां गरीबी खम ठोकती रहेगी। शिक्षा और चिकित्सा, ये दो क्षेत्र ऐसे हैं, जो नागरिकों के मष्तिष्क और शरीर को सबल बनाते हैं। जब तक ये सबको सहज और मुफ्त न मिलें, हमारा देश कभी भी सबल, संपन्न और समतामूलक नहीं बन सकता। ऊपर दिए गए आंकड़ों के आधार पर आज भी आधे से ज्यादा बिहार, एक-तिहाई से ज्यादा झारखंड और उप्र तथा लगभग 1/3 म.प्र. और मेघालय गरीबी में डूबे हुए हैं। यदि विश्व गरीबी मापन संस्था के मानदंडों पर हम पूरे भारत को कसें तो हमें मालूम पड़ेगा कि भारत के 140 करोड़ लोगों में से लगभग 100 करोड़ लोग वंचितों, गरीबों, कमजोरों और जरुरतमंदों की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। पता नहीं, इतने लोगों का उद्धार कैसे होगा और कौन करेगा?


-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-




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टमाटर से लाल हुआ घरेलू बजट

रंग में लाल, खाने को लजीज बनाने वाले और भारतीय सब्जी की तरी को क्लासिक बनाने वाले टमाटरों की महंगाई हर आदमी की जुबान पर है। देश की अधिकांश जगहों पर सर्दियों के दिनों में टमाटर के भाव 10 से 20 रुपए प्रति किलो तक होते हैं, लेकिन इस साल कुछ शहरों में टमाटर के भाव आसमान छू रहे हैं। कई जगहों पर खुदरा बाज़ार में इसकी क़ीमतें 80 रुपए प्रति किलो से ऊपर हैं। कुछ दक्षिण भारतीय शहरों में तो क़ीमतें 120 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई थीं।कहा जा रहा है कि बारिश के कारण टमाटर की सप्लाई बाधित हुई है जिसके कारण इसकी क़ीमतें बढ़ रही हैं। कर्नाटक का कोलार भी टमाटर के लिए जाना जाता है और देश भर में अधिकतर टमाटर कोलार से ही जाते हैं। या यह कहें कि नासिक और कोलार तो ऐसे हब हैं जो देश में टमाटर की जरूरत को पूरा करते हैं। ऐसे में क्या कारण है कि सोने की खान के लिए मशहूर कोलार में इन दिनों टमाटर सोने के भाव बिक रहा है? हिमाचल प्रदेश में भी पिछले वर्ष सब्जी मंडी सोलन में साढ़े सात लाख टमाटर क्रेट से तीन अरब 75 करोड़ का कारोबार हुआ था, जबकि इस बार साढ़े छह लाख क्रेट से एक अरब 95 करोड़ का ही कारोबार हो सका है। यानी, इस बार पिछले वर्ष की तुलना में कारोबार पौने दो अरब रुपए कम हुआ है। टमाटर विश्व में सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाली सब्जी है। इसका पुराना नाम लाइकोपोर्सिकान एस्कुलेंटम मिल है। वर्तमान समय में इसे सोलेनम लाइको पोर्सिकान कहते हैं। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो बिना टमाटर के खाना बनाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। इसकी उत्पत्ति दक्षिण अमेरिकी ऐन्डीज़ में हुई।


 मैक्सिको में इसका भोजन के रूप में प्रयोग आरंभ हुआ और अमेरिका के स्पेनिस उपनिवेश से होते हुए विश्वभर में फैल गया। टमाटर का पौधा दक्षिण अमरीका से दक्षिणी यूरोप होता हुआ इंग्लैंड पहुंचा था। 16वीं शताब्दी में इसे अंग्रेज भारत लाए थे। तबसे यह लोगों के जायके को बदल रहा है। स्वादिष्ट टमाटर से जुड़ा अर्थशास्त्र पेचीदा है। टमाटर के दाम कैसे तय होते हैं, कैसे उतार-चढ़ाव आता है? क्या दाम बढ़ने पर किसान का मुनाफा भी बढ़ जाता है, घटने पर घट जाता है? ये सब समझना होगा। मान लें एक किलो टमाटर को प्रोड्यूस करने की लागत आती है करीब तीन रुपए, लेकिन थाली तक जो टमाटर पहुंचता है, उसकी लागत हो जाती है करीब 6 से 7 रुपए। ट्रांसपोर्ट और टमाटर के लॉस (टूट-फूट) को मिलाकर। फिर रिटेलर से लेकर ठेले वाले तक का मार्जिन जुड़ता है। फिर भी टमाटर अगर आपको 9-10 रुपए में भी मिल रहा है, तो मान लीजिए पूरी-पूरी लागत तो निकल ही रही है। लेकिन बीच में ट्रेडर्स लॉबी कुछ फसलों में काफी सक्रिय रहती है। यही वजह है कि टमाटर में ज़रा भी सप्लाई कम हुई तो दाम बहुत ज़्यादा ऊपर-नीचे हो जाते हैं। रिसर्च बताती है कि टमाटर का उत्पादन पांच फीसदी बढ़ता है तो दाम 50 फीसदी गिर जाते हैं। ये स्टॉक मार्केट जैसा है। लेकिन हमारे यहां के सप्लाई चेन में दाम बढ़ने से किसान के पास मुनाफे का बड़ा हिस्सा आता ही नहीं है। सीधे खेत से उपभोक्ता तक फसल की थ्योरी अभी भी अमल में नहीं आ पाई है। इसलिए सब्जी का दाम बढ़ने पर भी किसान के हिस्से में बहुत कम ही मुनाफा आ पाता है। टमाटर की ही बात करें, तो इसकी खेती लागत भी बढ़ी है क्योंकि कीटनाशक का खर्चा काफी बढ़ गया है।


 तमाम पुराने कीड़ों ने पुरानी दवाइयों से प्रतिरोधक क्षमता डेवलप कर ली है। अब वो उससे मरते ही नहीं। किसान को नए किस्म के कीटनाशक लाने पड़ रहे हैं। एक कीटनाशक का दाम तो 550 से 600 रुपए प्रति 60 ग्राम है। सोचिए किसान की लागत कहने को तो लोग 2-3 रुपए प्रति किलो बताते हैं, लेकिन ये सारी लागत जोड़ना भी ज़रूरी है। टमाटर के व्यापार से जुड़ी आर्थिकता बताती है की आमतौर पर टमाटर अच्छा भाव हो, तब भी 300 रुपए प्रति क्रेट बिकता है। एक क्रेट में 25 किलो टमाटर होते हैं। इस समय एक क्रेट टमाटर एक हज़ार रुपए से लेकर 1400 रुपए तक बिक रहे हैं। सर्दियों में कभी टमाटर के दाम इतने ऊंचे नहीं गए हैं। ये समय आते-आते तो दस रुपए प्रति किलो तक टमाटर बिकना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि पैदावार बंपर होती थी। इस बार बारिश ने फसल ख़राब कर दी है। मंडी में माल नहीं है। इसलिए मांग बहुत ज़्यादा है। टमाटर की खेती करना आसान नहीं है। लागत बहुत लगानी पड़ती है। एक बीघा खेत में बीस हज़ार रुपए तक की लागत आ जाती है। ऐसे में किसान को दाम न मिले तो भारी नुक़सान होता है। नवंबर के पहले सप्ताह में बारिश होने की वजह से फसलें प्रभावित हुई हैं जिसकी वजह से दाम बढ़े हुए हैं। दाम बढ़ने की एक वजह परिवहन में देरी, डीज़ल के महंगे दामों को भी माना जा रहा है। भारी बारिश की वजह से तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में बारिश ने फसलों को ख़राब कर दिया है। इसकी वजह से आपूर्ति प्रभावित हुई है। एक तरफ जहां टमाटर के दाम बढ़ने से उपभोक्ताओं पर मार पड़ रही है, वहीं किसानों ने कुछ राहत की सांस ली है। दरअसल बेमौसम हुई बरसात ने टमाटर की फसल को ख़राब कर दिया था जिससे किसानों को भारी नुक़सान हुआ।


 बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के क्षेत्रों के बार-बार बनने या अरब सागर में चक्रवात के कारण नवंबर के पहले सप्ताह से पूर्वोत्तर मानसून के दौरान भारी बारिश के कारण टमाटर की फसल को नुकसान हुआ है, जिससे टमाटर की फसल खराब हो गई और आपूर्ति बाधित हुई। दक्षिण भारत में जबरदस्त बारिश होने से टमाटर को लेकर यह संकट आया है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में टमाटर की खेती वाले इलाके बारिश के कारण बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और देरी भी हुई है। आम तौर पर टमाटर की फसल बोने के लगभग दो से तीन महीने बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। ऐसा माना जा रहा है कि अभी तक आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक सहित टमाटर की खेती करने वाले प्रमुख राज्यों में कटाई चल रही है। इसके सप्लाई में आते ही परचून में टमाटर के दाम जायज हो सकते हैं। सरकार ने लोगों की चिंताओं के बीच कहा है कि देश के उत्तरी राज्यों से टमाटर की नई फसल की आवक के साथ दिसंबर से इसके भाव नरम पड़ने की उम्मीद है। टमाटर का अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य बेमौसमी बारिश के कारण पिछले वर्ष की तुलना में 63 प्रतिशत बढ़कर 67 रुपए प्रति किलो होने के साथ सरकार का यह बयान आया है। वहीं प्याज के मामले में, खुदरा कीमतें वर्ष 2020 और वर्ष 2019 के स्तर से काफी नीचे आ गई हैं। इस साल नवंबर में आवक 19.62 लाख टन थी, जो एक साल पहले की समान अवधि में 21.32 लाख टन थी। टमाटर की कीमतों में तेज वृद्धि देश भर के घरों के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि आम आदमी का बजट पहले ही महंगाई से बढ़ा है। कुल मिला कर टमाटर की बेलगाम कीमतों ने इस समय आम आदमी का घरेलू बजट बिगाड़ दिया है।


-डा. वरिंदर भाटिया-







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जातिवाद कैसे खत्म करें?

सर्वोच्च न्यायालय ने इधर जातीय भेदभाव के आधार पर होनेवाली हिंसा के बारे में कुछ बुनियादें बातें कह डाली हैं। जजों ने 1991 में तीन लोगों के हत्यारों की सजा पर मुहर लगाते हुए पूछा है कि इतने कानूनों के बावजूद देश में से जातीय घृणा का उन्मूलन क्यों नहीं हो रहा है?


अदालत की अपनी सीमाएं हैं। वह सिर्फ कानून लागू करवा सकती है। वह खुद कोई कानून बना नहीं सकती। वह कोई समाजसेवी संस्था भी नहीं है कि वह जातिवाद के विरुद्ध कोई अभियान चला सके। यह काम हमारी संसद और हमारे नेताओं को करना चाहिए लेकिन वे तो बेचारे दया के पात्र बने रहते हैं। उनका मुख्य काम है-वोट और नोट का कटोरा फैलाये रखना। उनमें इतना नैतिक बल कहां है कि उनके अनुरोध पर लोग अपने जातिवाद से मुक्त हो जाएं? उनकी दुकान चल ही रही है जातिवाद के दम पर! डाॅ. लोहिया ने जात-तोड़ो आंदोलन चलाया था लेकिन उनकी माला जपने वाले नेता ही आज जातिवाद के दम पर थिरक रहे हैं।


जातीय जन-गणना के शव को दफनाए हुए 90 साल हो गए लेकिन वे अब उसे फिर से जिंदा करने की मांग कर रहे हैं। 'मेरी जाति हिंदुस्तानी' आंदोलन की वजह से मनमोहन सिंह सरकार ने जातीय-गणना बीच में ही रुकवा दी थी लेकिन भारत में जातिवाद को जिंदा रखनेवाले 'जातीय आरक्षण' को खत्म करने की आवाज आज कोई भी दल या नेता नहीं लगा रहा है। इस देश में सरकारी नौकरी और शिक्षा में जब तक जातीय आधार पर भीख बांटी जाएगी, जातिवाद का विष-वृक्ष हरा ही रहेगा। मुट्ठीभर अनुसूचितों और पिछड़ों के मुंह में चूसनी लटकाकर देश के करोड़ों वंचितों और गरीबों को सड़ते रहने के लिए हम मजबूर करते रहेंगे।


इस समय देश में जातिवाद के विरुद्ध जबर्दस्त सामाजिक अभियान की जरूरत है। सबसे पहले जातिगत आरक्षण खत्म किया जाए। दूसरा, जातिगत उपनाम हटाए जाएं। तीसरा, किसी भी संस्था और संगठन जैसे अस्पताल, स्कूल, धर्मशाला, शहर या मोहल्ले आदि के नाम जातियों के आधार पर न रखे जाएं। चौथा, अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया जाए। पांचवां, आम चुनावों में किसी खास चुनाव-क्षेत्र से किसी खास उम्मीदवार को खड़ा करने की बजाय पार्टियां अपनी सामूहिक सूचियां जारी करें और अपने जीते हुए उम्मीदवारों को बाद में अलग-अलग चुनाव-क्षेत्र की जिम्मेदारी दे दें। इससे चुनावों में चलनेवाला जातिवाद अपने आप खत्म हो जाएगा। मतदाता अपना वोट देते समय उम्मीदवार की जाति नहीं, पार्टी की विचारधारा और नीति को महत्व देंगे। इसके कारण हमारे लोकतंत्र की गुणवत्ता तो बढ़ेगी ही, जातीय आधार पर थोक वोट कबाड़ने वाले अपराधियों, ठगों, अकर्मण्य और आलसी लोगों से भारतीय राजनीति का कुछ न कुछ छुटकारा होगा।


-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)



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उचित नहीं एड्स पीड़ितों के प्रति संवेदनहीनता

'एड्स' न केवल भारत बल्कि समस्त विश्व में लोगों के लिए आज भी एक भयावह शब्द है, जिसे सुनते ही भय के मारे पसीना छूटने लगता है।


एड्स (एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिन्ड्रोम) का अर्थ है शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता कम होने से अप्राकृतिक रोगों के अनेक लक्षण प्रकट होना। एचआईवी संक्रमण के बाद एक ऐसी स्थिति बन जाती है कि इससे संक्रमित व्यक्ति की मामूली से मामूली बीमारियों का इलाज भी दूभर हो जाता है और रोगी मृत्यु की ओर खिंचा चला जाता है। आज भी यह खतरनाक बीमारी दुनियाभर के करोड़ों लोगों के शरीर में पल रही है। एड्स महामारी के कारण अफ्रीका के तो गांव के गांव नष्ट हो चुके हैं। 'रॉयटर्स' की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1980 के दशक में एड्स महामारी शुरू होने के बाद से 77 मिलियन से भी अधिक लोगों में इसका वायरस फैल चुका है। वर्ष 2017 में विश्वभर में करीब 40 मिलियन लोग एचआईवी संक्रमित थे।


दरअसल 1981 में न्यूयार्क तथा कैलिफोर्निया में न्यूमोसिस्टिस न्यूमोनिया, कपोसी सार्कोमा तथा चमड़ी रोग जैसी असाधारण बीमारी का इलाज करा रहे पांच समलैंगिक युवकों में एड्स के लक्षण पहली बार मिले थे। चूंकि जिन मरीजों में एड्स के लक्षण देखे गए थे, वे सभी समलैंगिक थे, इसलिए उस समय इस बीमारी को समलैंगिकों की ही कोई गंभीर बीमारी मानकर इसे 'गे रिलेटेड इम्यून डेफिशिएंसी' (ग्रिड) नाम दिया गया था। इन मरीजों की शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता असाधारण रूप से कम होती जा रही थी लेकिन कुछ समय पश्चात् जब दक्षिण अफ्रीका की कुछ महिलाओं और बच्चों में भी इस बीमारी के लक्षण देखे जाने लगे, तब जाकर यह धारणा समाप्त हुई कि यह बीमारी समलैंगिकों की ही बीमारी है। तब गहन अध्ययन के बाद पता चला कि यह बीमारी एक सूक्ष्म विषाणु के जरिये होती है, जो रक्त एवं यौन संबंधों के जरिये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचती है। तत्पश्चात् इस बीमारी को एड्स नाम दिया गया, जो एचआईवी नामक वायरस द्वारा फैलती है।


यह वायरस मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पर हमला करके मानव रक्त में पाई जाने वाली श्वेत रक्त कणिकाओं को नष्ट करता है और धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह नष्ट हो जाती है। यही स्थिति 'एड्स' कहलाती है। अगर एड्स के कारणों पर नजर डालें तो मानव शरीर में एचआईवी का वायरस फैलने का मुख्य कारण हालांकि असुरक्षित सेक्स तथा अधिक पार्टनरों के साथ शारीरिक संबंध बनाना ही है लेकिन कई बार कुछ अन्य कारण भी एचआईवी संक्रमण के लिए जिम्मेदार होते हैं। शारीरिक संबंधों द्वारा 70-80 फीसदी, संक्रमित इंजेक्शन या सुईयों द्वारा 5-10 फीसदी, संक्रमित रक्त उत्पादों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया के जरिये 3-5 फीसदी तथा गर्भवती मां के जरिये बच्चे को 5-10 फीसदी तक एचआईवी संक्रमण की आशंका रहती है।


डब्ल्यूएचओ तथा भारत सरकार के सतत प्रयासों के चलते हालांकि एचआईवी संक्रमण तथा एड्स के संबंध में जागरूकता बढ़ाने के अभियानों का कुछ असर दिखा है और संक्रमण दर घटी है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2010 से अभी तक एचआईवी संक्रमण की दर में करीब 46 फीसदी की कमी आई है जबकि इस संक्रमण की वजह से होने वाली मौतों का आंकड़ा भी 22 फीसदी कम हुआ है। फिर भी भारत में एड्स के प्रसार के कारणों में आज भी सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता एवं जिम्मेदारी का अभाव, अशिक्षा, निर्धनता, अज्ञानता और बेरोजगारी प्रमुख कारण हैं। अधिकांशतः लोग एड्स के लक्षण उभरने पर भी बदनामी के डर से न केवल एचआईवी परीक्षण कराने से कतराते हैं बल्कि एचआईवी संक्रमित किसी व्यक्ति की पहचान होने पर उससे होने वाला व्यवहार तो बहुत चिंतनीय एवं निंदनीय होता है। इस दिशा में लोगों में जागरूकता पैदा करने के संबंध में सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा भले ही कितने भी दावे किए जाएं पर एड्स पीड़ितों के साथ भेदभाव के सामने आने वाले मामले विभिन्न राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटियों एवं सरकारी तथा गैर सरकारी प्रयासों की पोल खोलते नजर आते हैं।


कुछ समय पूर्व एचआईवी संक्रमित बच्चों के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में एड्स पीड़ितों को लेकर लोगों के नजरिये और समाज के रवैये के प्रति चिंता साफ देखने को मिली थी। कार्यक्रम में एचआईवी संक्रमित कई ऐसे बच्चे थे, जिन्हें एड्स होने का पता चलते ही उनके रिश्तेदारों ने उनसे संबंध तोड़ लिए और पड़ोसियों ने दूरी बना ली। ऐसे बच्चों के साथ उनके अभिभावकों को भी लोगों के ताने सुनने पड़े। ऐसे बच्चों और उनके अभिभावकों को अक्सर लोगों के भेदभाव का डर सताता है। 12 साल का एक बच्चा, एक साल की उम्र से ही एड्स से पीड़ित है। जब वह एक साल का था, तब निजी अस्पतालों में उसकी जांच के दौरान ही पता चला कि उसके माता-पिता भी एचआईवी संक्रमित हैं। अस्पताल ने उन्हें यह कहते हुए बाहर का रास्ता दिखा दिया कि उनका इलाज यहां नहीं हो सकता। जब बच्चे के रिश्तेदारों को उनके एचआईवी पॉजिटिव होने का पता चला तो उन्होंने भी इन सबसे बोलचाल बंद कर दी। 15 साल की एक बच्ची और उसके परिजनों का भी कमोबेश यही दुख है। उसकी इस बीमारी के बारे में परिवार को करीब 10 साल पहले पता चला और उसके बाद ही खुलासा हुआ कि बच्ची के माता-पिता और छोटी बहन भी एचआईवी संक्रमित हैं। जब रिश्तेदारों को पता चला तो एक-एक कर सब उनसे दूर हो गए। देशभर में ऐसे बहुत से एचआईवी संक्रमित व्यक्ति और उनके परिवार हैं, जिन्हें एचआईवी संक्रमण का खुलासा होने के बाद समाज और अपने ही लोग हिकारत भरी नजरों से देखते थे।


वास्तविकता यही है कि लोगों में एड्स के संबंध में जागरूकता पैदा करने के लिए उस स्तर पर प्रयास नहीं हो रहे, जिस स्तर पर होने चाहिए। लोगों को जागरूक करने के लिए हमारी भूमिका अभी भी सिर्फ चंद पोस्टर चिपकाने और टीवी चैनलों या पत्र-पत्रिकाओं में कुछ विज्ञापन प्रसारित-प्रकाशित कराने तक सीमित है। शायद यही कारण है कि 21वीं सदी में जी रहे भारत के बहुत से पिछड़े ग्रामीण अंचलों में खासतौर से महिलाओं ने तो एचआईवी संक्रमण जैसे शब्द के बारे में कभी सुना तक नहीं। तमाम प्रचार-प्रसार के बावजूद आज भी बहुत से लोग इसे छूआछूत की बीमारी ही मानते हैं और इसीलिए वे ऐसे रोगी के पास जाने से भी घबराते हैं। तमाम दावों के बावजूद आज भी समाज में एड्स रोगियों को बहुत सी जगहों पर तिरस्कृत नजरों से ही देखा जाता है।


एड्स पर नियंत्रण पाने के लिए जरूरत है प्रत्येक गांव, शहर में इस संबंध में गोष्ठियां, नुक्कड़ नाटक, प्रदर्शनियां इत्यादि के आयोजनों की ताकि लोगों को सरल एवं मनोरंजक तरीकों से ही इसके बारे में पूरी जानकारी मिल सके। एड्स जैसे विषयों पर सार्वजनिक चर्चा करने से बचने की प्रवृत्ति तथा एड्स पीड़ितों के प्रति बेरुखी व संवेदनहीनता की प्रवृत्ति अब हमें त्यागनी ही होगी। इसके अलावा प्रचार एवं प्रसार माध्यमों को भी इस दिशा में अहम भूमिका निभानी होगी। विश्व भर में एड्स की महामारी पर अंकुश लगाने के लिए लोगों को सुरक्षित सेक्स एवं अन्य आवश्यक सावधानियों के लिए भी प्रेरित करना होगा।


-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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चिंताजनक है जीका वायरस का हमला

देश में कोरोना संक्रमण के मामलों में भले ही लगातार कमी देखी जा रही है लेकिन पिछले कुछ महीनों से देश के कई राज्यों में डेंगू के बढ़ते मामलों के साथ कुछ दिनों से जीका वायरस ने भी नई चिंता को जन्म दिया है।


उत्तर भारत और खासकर उत्तर प्रदेश में जीका वायरस के मामले जिस तेजी के साथ सामने आए हैं, उससे चिंता का माहौल बनना स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश के कानपुर, कन्नौज, लखनऊ, मथुरा सहित कई जिलों में जीका वायरस के मामले सामने आए हैं और अब फतेहपुर जिले में भी जीका वारयस का केस सामने आने के बाद वहां स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा है। उत्तर प्रदेश का कानपुर जिला तो जीका वायरस और डेंगू का हॉटस्पॉट बना हुआ है, जहां जीका का पहला मामला 24 अक्तूबर को सामने आया था और उसके बाद से वहां पिछले करीब एक महीने में ही इसके 140 से भी अधिक मरीज सामने आ चुके हैं।


जीका संक्रमण को लेकर चिंताजनक स्थिति यह है कि यह वायरस सामान्य लोगों के अलावा गर्भवती महिलाओं को भी संक्रमित कर रहा है। अब तक कई गर्भवती महिलाएं जीका वायरस से संक्रमित मिल चुकी हैं। इस वर्ष जीका वायरस का पहला मामला केरल में 8 जुलाई 2021 को सामने आया था, जिसके बाद केरल में जीका वायरस के मामले अचानक सामने आने लगे और ऐसे मामलों की संख्या 64 तक पहुंच गई थी। वहां जीका से एक मरीज की मौत की खबर सामने आई थी। महाराष्ट्र में भी जीका वायरस का मामला सामने आया था लेकिन अब उत्तर प्रदेश में जीका का प्रकोप चिंता का सबब बना है। केरल के बाद अब उत्तर प्रदेश में जीका के बढ़ते मामलों को देखते हुए स्पष्ट है कि बारिश के बाद मच्छरों को पनपने से रोकने के लिए सरकारी तंत्र द्वारा लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए समुचित प्रबंध नहीं किए गए। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जहां शहरी और महानगरीय क्षेत्रों में ही करीब 80 फीसदी लोगों को इस वायरस और इससे होने वाली बीमारी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, वहीं ग्रामीण परिवेश में तो लोग इससे पूरी तरह अनजान हैं, इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग द्वारा अब तक देशभर में कहीं ऐसा कोई अभियान नहीं चलाया गया है, जिससे लोगों में जीका वायरस संक्रमण के प्रति जागरूकता पैदा की जा सके।


आज भी देश में अधिकांश लोग नहीं जानते कि जीका आखिर है क्या, इससे क्या बीमारियां पैदा होती हैं और उनके क्या लक्षण सामने आते हैं। जीका एक खतरनाक वायरस है, जो उसी एडीज मच्छर के काटने से फैलता है, जो डेंगू, चिकनगुनिया, निपाह, जापानी इन्सेफेलाइटिस, फाइलेरिया, मलेरिया इत्यादि बीमारियों का जनक है, यह मच्छर प्रायः दिन के समय सक्रिय रहता है। अधिकांशतः गर्भवती महिलाएं इस वायरस की शिकार बनती हैं। इससे गर्भपात और मृत बच्चे के पैदा होने का भी खतरा रहता है। यह जन्म लेने वाले बच्चे के विकास पर बहुत दुष्प्रभाव डालता है, इससे पीडि़त महिलाओं के बच्चे अविकसित दिमाग के साथ पैदा होते हैं। करीब 70 से 80 फीसदी मामलों में जीका संक्रमित व्यक्ति में लक्षणों की पहचान नहीं हो पाती, इसलिए जीका वायरस से बचने के लिए सबसे बड़ा हथियार जागरूकता को ही माना गया है।


जीका वायरस पर नियंत्रण के लिए दुनियाभर में अब तक कोई कारगर वैक्सीन नहीं बनी है। जो उपाय डेंगू, चिकनगुनिया इत्यादि फैलाने वाले मच्छरों से बचने के लिए बताए जाते रहे हैं, वही उपाय जीका वायरस फैलाने वाले मच्छर से बचने के लिए भी किए जाते हैं, जैसे अपने आसपास साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना, कहीं भी पानी को ठहरने न देना, मच्छरदानी का प्रयोग, मच्छरों की अधिकता वाले क्षेत्रों में पूरे कपड़े पहनना, मच्छरनाशक चीजों का इस्तेमाल तथा बगैर जांच के रक्त शरीर में न चढ़वाना इत्यादि। जीका वायरस से संक्रमित होने पर दर्द तथा बुखार की सामान्य दवाएं दी जाती हैं किन्तु लक्षण प्रबल होने पर विशेषज्ञ से परामर्श करना अत्यावश्यक हो जाता है। जीका वायरस खतरनाक इसलिए माना जाता है क्योंकि इसके इंफैक्शन तथा उससे होने वाली बीमारियों का अभी तक कोई उपचार उपलब्ध नहीं है और कुछ मामलों में इससे लकवे के साथ मौत होने की संभावना भी रहती है।


जीका वायरस गर्भवती मां से बच्चे में तथा शारीरिक संबंधों से भी स्थानांतरित होते हैं। इससे प्रभावित लोगों को हल्का बुखार, आंखों में संक्रमण, सिरदर्द, मांसपेशियों व जोड़ों में दर्द, त्वचा पर चकते इत्यादि लक्षण सामने आते हैं, जो प्रायः 2-5 दिन तक रहते हैं। हालांकि कुछ लोगों में कई दिनों तक कोई लक्षण सामने नहीं आते। जीका वायरस से गुलियन-बार सिंड्रोम नामक नर्वस सिस्टम की बीमारी भी हो जाती है। इसकी अनुमानित मृत्यु दर 8 प्रतिशत से ज्यादा है। इस वायरस के संक्रमण से अस्थायी रूप से लकवा भी मार जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जीका वायरस वीर्य में पहुंच जाए तो यह करीब दो सप्ताह तक जीवित रह सकता है और यही कारण है कि जीका वायरस के संक्रमण से प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को सुरक्षित यौन संबंध बनाने की सलाह दी जाती है और ऐसे क्षेत्रों में रक्तदान भी प्रतिबंधित किया जाता है।


-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)




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कुपोषण से मुक्ति की राह दिखाता 'ओबरी'

रीवा जिले के जवा ब्लाक का सबसे आखिरी गांव है ओबरी। पहाड़ियों और जंगलों के बीच स्थित इस आदिवासी बाहुल्य गांव की ज़्यादातर जमीन असिंचित है। बुनियादी सुविधाओं की कमी से घिरे इस गांव की आबादी 860 है।


यहां गांव के लोगों की आजीविका का साधन मुख्य रूप से दिहाड़ी मजदूरी और वनोपज़ संग्रहण है। बच्चों को हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए गांव से 15 किमी दूर ग्राम कोटवा जाना पड़ता है। इस गांव मे सितंबर 2015 में जब दस्तक परियोजना की शुरुआत हुई, तब 0 से 5 वर्ष के 26 बच्चे मध्यम और 14 बच्चे अतिकम वजन के थे। उसके बाद से बाल सेवाओं की नियमित सामुदायिक निगरानी व सहयोग, पोषण खानपान संबंधी जागरूकता और पोषण बाड़ी के निरंतर उपयोग से कुपोषित बच्चों और एनीमिक माताओं की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। इस गांव मे स्थानीय समुदाय ने संस्था विकास संवाद के साथ मिलकर बाल स्वास्थ्य एवं पोषण प्रबंधन की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है।


ओबरी में कार्यरत सामुदायिक कार्यकर्ता सुरेश कुमार कोल बताते हैं कि गांव में बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य में बदलाव लाने के लिए समुदाय को अपने भरोसे में लेना जरूरी था, सो उन्होंने सबसे पहले स्थानीय स्तर पर मनरेगा योजना से रोजगार दिलाने के लिए ग्राम पंचायत बौसड़ के साथ समन्वित प्रयास किए। इसके साथ ही गांव मे दस्तक महिला, युवा और किशोरी समूह के जरिये समुदाय को एकजुट करने की पहल की गयी, जिनकी कुपोषण को कम करने मे अहम भूमिका रही है। महिलाओं और किशोरियों ने कुपोषण के कारणों की पहचान करते हुये गांव मे नियमित आंगनबाड़ी खुलने, बच्चों एवं माताओं को पोषण व टीकाकरण से जोड़ने का काम किया तो स्वयं भी एनीमिया और सही खानपान को लेकर अपने व्यवहार मे बदलाव किया। महिला समूह ने स्थानीय खाद्य सामग्री के उपयोग से स्वादिष्ट व्यंजन बनाने और सामूहिक प्रस्तुतीकरण के छह से अधिक बार आयोजन किए।आंगनबाड़ी कार्यकर्ता शिवकुमारी यादव के अनुसार दस्तक परियोजना से बच्चों के कुपोषण में कमी आयी है और उन्हें समुदाय का भी अपेक्षित सहयोग मिलने लगा है।


कुपोषण के कारणों को समझते हुये समुदाय ने यह भी देखा कि उनके खाद्यान्न का बड़ा हिस्सा खेती से आता है किन्तु असिंचित भूमि होने तथा रासायनिक खादों के बढ़ते उपयोग से चुनौतियां अधिक बढ़ती जा रही हैं। तब दस्तक परियोजना के साथियों ने गांव में जैविक खेती व स्थानीय जल प्रबंधन से जुड़े काम की शुरुआत की। आज ओबरी गांव के 150 परिवारों में पोषणबाड़ी विकसित हुई है, जिससे हरी पत्तेदार सब्जियाँ व पपीता, अमरूद आदि फल भोजन में नियमित रूप से उपभोग किया जाने लगा है।


गांव के दस्तक युवा समूह ने पंचायत एवं कृषि विकास विभाग से समन्वय करके अल्प पोषण से प्रभावित परिवारों को रोजगार व बीज उपलब्ध कराये जाने को समय - समय पर सुनिश्चित किया और जर्जर पड़े कुओं को श्रमदान से सुधार करते हुये लगभग 60 परिवारों के पेयजल समस्या को सुलझाया है। इसके साथ ही गांव मे नदी पर पुल व पक्की सड़क न होने के कारण जननी सुरक्षा की समस्या को लगातार प्रशासन के समक्ष उठाते हुये समस्या हल हुई है। इस सामुदायिक पहल मे जब सभी अपनी भूमिका निभाने लगे तो बच्चे कैसे पीछे रहते, सो दस्तक बाल समूह ओबरी के 15 बच्चों ने भी लगभग 95 पौधे लगाकर अपने आसपास हरियाली को बढ़ाने का प्रयास किया है। ये बच्चे अपने गांव व जंगल से जुड़े जैव विविधता को जानने- समझने की निरंतर कोशिश कर रहे हैं।


दस्तक महिला समूह सदस्य गुलाबकली यादव का कहना है कि - "गांव में जब से दस्तक परियोजना शुरू भइ ही ओकरे बाद से गांव के महिलन अपने-अपने बच्चन के देखभाल, साफ-सफाई अउर खान-पियन के ध्यान बहुत अच्छे से देइ लागे हन जेंहमा से अब गांव में कमजोर बच्चन बहुत कम बचे हैं." संगीता खैरगार का कहना है कि -"गाँव मा जननी एक्सप्रेस, एम्बुलेंस, जरूरत पडै पर समय से आबै लाग ही जेकरे कारण अब बच्चन के जनम अस्पताल मा होई लाग हइ."


गीता खैरगार, सोहागी खैरगार व प्रीतु यादव जैसी किशोरियां अब अपने स्वास्थ्य के बारे मे चर्चा करते हुये संकोच नहीं करतीं। वे बताती हैं कि कुछ साल पहले ऐसा नहीं था। गांव की किशोरियों के मन में विकास और पोषण को लेकर कई तरह की भ्रांतियां रहती थीं। उनको यह नहीं पता था कि उनका वजन कितना होना चाहिए, उनके शरीर में कितना खून होना चाहिए जिसके कारण से जाने-अनजाने उनको बीमारियां अपने चपेट में ले लेती थीं लेकिन अब किशोरियां अपने शारीरिक विकास व खानपान को लेकर काफी जागरूक हुई हैं। इस तरह सुविधाओं से वंचित ओबरी गांव ने स्वयंसेवी संस्था विकास संवाद द्वारा संचालित की जा रही दस्तक परियोजना के सहयोग, समुदाय की सक्रिय सहभागिता तथा प्रशासन के साथ बेहतर समन्वय से काम करते हुये कई गांवों को कुपोषण के सामुदायिक प्रबंधन की राह दिखाई है।


-रामकुमार विद्यार्थी-

(लेखक पर्यावरण व युवा मुद्दों से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

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किसान आन्दोलन सत्यमेव जयते की पुष्टि करता है

दिल्ली की फिजा में सर्द मौसम ने दस्तक दे दी है उधर दिल्ली दरबार की राजनीति के गलियारों में गुलाबी गर्माहट की चर्चा चारो ओर राजनीतिज्ञ पंडितों के जुबानो पर हो रही है।आज भारतीय राजनीति के इलिहास स्वर्णिम दिन है।आज के दिन यानि 26 नवम्बर भारतीय संविधान दिवस है।किसान आन्दोलन की आरम्भ का दिन ' व भारतीय राजनीति मे भष्टाचार उल्मूलन हेतू आम आदमी पार्टी का स्थापना दिवस है। मेरे लिए लिए भी यह स्वर्णिम दिवस है 1 आज मे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के विधान सभा के एक दिवसीय विशेष सत्र का साक्षी भाव से कवेरज करने मौका मिला है। चलिए आप भी मेरे साथ इस पल का साक्षी बने। आप को मै बता दे कि भारतीय राजनीति के इतिहास में संसद के मानसुन सत्र का आगाज सोमवार से होनी वाली है। इसके पुर्व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में दिल्ली विधान सभा का एक दिवसीय विशेष सत्र का विधान सभा के अध्यक्ष राम निवास गोयल की अध्यक्षता मे आहुत की गई। इस विशेषसत्र के दौरान माननीय अध्यक्ष ने 26 नवम्बर के ऐतिहासिक दिवस की महत्व पर अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय संविधान निर्माताओं ' को याद किया।अध्यक्ष महोदय ने दिवगंत पुर्व विधायकों को श्रद्धाजंली अर्पित कर ते हुए एक मिनट सदन मे मौन रखा गया। तदोपरान्त विधान सभा के सभी सदस्यो को संविधान के प प्रस्तावना को स्मरण दिलाते हुए सपथ दिलाई |जैसे ही सदन की कार्यवाही प्रारंभ हुई।अध्यक्ष द्वारा उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को सदन के पटल पर दस्तावेज रखने की आगह किया गया।इस पर विपक्ष ने नेताओ द्वारा प्रदूर्षण व शराब की नई नीति पर चर्चा कराने की मांग कर ने लगे। अध्यक्ष के बार बार मना करने व समझाने पर भी जब विपक्षी विधायकों द्वारा अपनी माँग पर अड़े रहे तथा सदन मे शोर गुल करते हुए सदन की कार्यवाही में व्यवधान करते है।इस पर अध्यक्ष जी ने कहा आप हरियाणा से गंदा पानी छोडना बंद कर दे,दिल्ली का प्रदूषण कम हो जायेगा। लेकिन विपक्ष के विधायक अपनी जिद पर अडे रहे शोर करते रहे। जितेन्द्र महाजन अशोक बाचपेयी मोहन सिंह बिष्ट को सदन से बाहर जाने का आदेश दिया। काफी शोर गुल के बीच मार्शल को बुलाकर मोहन सिंह बिष्ट बाहर निक्राल दिया गया।जिस पर सभी विपक्षी विधायकों ने सदन से वॉक आउट कर गये।विधान सभा परिसर महात्मा गाँधी जी की प्रतिमा के आगे घारणा पर बैठ गए।इधर सदन ने गोपाल राय जी लाये गये प्रस्ताव पर चर्चा व समर्थन सदन उपस्थित विधायकों द्वारा किया जा रहा था। 


दिल्ली विधानसभा एक दिवसीय सत्र मे सदन को संबोधित करते हुए उप मुख्य मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि किसान आन्दोलन एक वर्ष देश के लोक तंत्र के इतिहास मे एक नया अध्याय बन आया है।जिसे आने वाली पीढ़ी को पढ़ना चाहिए। बहस के अन्तिम चरण मे मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल ने संबोधित करते हुए कहा कि तीन काले कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन की जीत पर सभी देशवासियों को बधाई दी। इस आन्दोलन मै मेरे देश के किसान ने अपने सत्याग्रह से यह दिखा दिया कि अन्याय के खिलाफ सच्चाई और मज़बूत इरादों की जीत ज़रूर होती है। इसके पहले 1907 मे पंजाब के किसान द्वारा आन्दोलन किया गया जो कि 9 महीने तक चला था।दुनिया के इतिहास में यह सबसे लंबा आंदोलन रहा, जो देश के किसानों को अपनी ही चुनी हुई सरकार के खिलाफ करना पड़ा और 12 महीने तक चला। कभी किसी ने सोचा नहीं था कि आजाद भारत में किसानों को राष्ट्र विरोधी,खालिस्तानी,चीन-पाकिस्तान के एजेंट समेत तमाम गंदी-गंदी गालियां दी जाएंगी। मुख्य मंत्री ने सवाल किया कि अगर देश के सारे किसान राष्ट्र विरोधी हैं, तो जो कल किसानो को गालियां दे रहे थे, वो स्वयं मे क्या हैं? पिछले कुछ वर्षों से लोगों का जनतंत्र पर से भरोसा उठता जा रहा था। किसान आन्दोलन मे 700 से अधिक्र किसानो की शहीद होना पड़ा है।यह जनतंत्र की जीत है, इससे लोगों का जनतंत्र में भरोसा बढ़ा है। मुख्य मंत्री ने किसानों की एमएसपी समेत अन्य लंबित मांगों का हम पूरा समर्थन करते हैं और किसानों पर लगाए गए सभी झूठे मुकदमें को वापस लेने की मांग करते हैं।


विधानसभा अध्यक्ष राम निवास गोयल की अध्यक्षता में संपन्न सत्र में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, कृषि मंत्री गोपाल राय, कैलाश गहलोत समेत दिल्ली सरकार के सभी मंत्री और विधायक मौजूद रहे। इस दौरान दिल्ली के शहरी विकास मंत्री गोपाल राय ने किसान आंदोलन की जीत को लेकर सदन में रखे गए संकल्प पत्र का प्रस्ताव रखा गया। सबसे पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आज से एक साल पहले किसान आंदोलन शुरू हुआ था। केंद्र सरकार द्वारा बिना किसानों से पूछे, बिना जनता से पूछे अपने अहंकार में तीन काले कानून पास किया था। लोकसभा इनका बहुमत है और राज्यसभा में भी इनकी काफी सीटें हैं। उसका इन्हें अहंकार है कि हम तो कुछ भी पास करा लेंगे। उस अहंकार के चलते इन्होंने ये काले कानून पास किए। इनको लगता था कि किसाना आएंगे, थोड़े दिन आंदोलन करेंगे, चीखेंगे, चिल्लाएंगे और फिर घर चले जाएंगे। पिछले साल 26 नवंबर को दिल्ली के बॉर्डर पर यह आंदोलन शुरू हुआ। आज पूरा एक साल हो गया और उनका आंदोलन सफल रहा। सबसे पहले मैं इस देश के किसानों को तहे दिल से बहुत-बहुत बधाई देना चाहता हूं। इस आंदोलन में सब लोग शामिल हुए। कोई प्रत्यक्ष रूप से कोई अपने-अपने घर से दुआएं भेज रहे थे। जो भी इस देश का भला चाहते हैं, सबने इस आंदोलन का समर्थन किया। महिलाओं, व्यापारियों, छात्रों, पत्रकारों, बुजुर्गों, युवाओं और बच्चों के साथ सभी धर्म-जाति के लोगों ने इसका समर्थन किया और सबने इसकी सफलता के लिए दुआएं दी। मैं सभी देश वासियों को इसकी सफलता पर बधाई देना चाहता हूं। मुख्यमंत्री के बाद विधान सभा अध्यक्ष द्वारा सदन मे प्रस्ताव को सदन मे पारित करने हेतू सदन के पटल रखने की प्रक्रिया पुरी की गई जिसे सदन ने ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। दिल्ली विधान सभा की आज पुराना सचिवालय मे एक दिवसीय विधान सभा के विशेष सत्र मे सता पक्ष - विपक्ष के सभी विधायक के साथ मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, कृषि मंत्री गोपाल राय ' कैलास गहलोत 'राजेन्द्र पाल गौतम समेत सभी मंत्री दिल्ली सरकार मौजूद थे ! दिल्ली विधान सभा का यह पत्रकारिता जीवन के इतिहास मे एक स्वर्णिम यादो के सुनहरे पन्नों में सिमट कर रह गई। फिल हाल मै आप से यह कहते हुए - ना ही काहूँ से दोस्ती ना ही काहूँ से बैर। खबरी लाल तो माँगे सबकी खैर ॥ विदा लेते है। फिर आपके समक्ष तीरक्षी नजर से तीखी खबर के संग उपस्थित होगे 


-विनोद तकिया वाला-



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रस्सी तो जल गयी मगर ऐंठन नहीं गयी

स्वतंत्र भारत के इतिहास में चले सबसे बड़े व संयुक्त किसान आंदोलन ने आख़िरकार केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को घुटने टेकने के लिये मजबूर कर ही दिया। देश का एक बड़ा 'भोंपू वर्ग ' जो बहुमत की मोदी सरकार तथा इसपर पड़ रही पूंजीपतियों की गहरी छाया,साथ साथ प्रधानमंत्री के सख़्त स्वभाव पर विश्वास किये बैठा था वह ज़रूर इस मुग़ालते में था कि तीनों कृषि क़ानून वापस नहीं होने वाले। परन्तु इसी देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसे देश के किसानों की ताक़त पर पूरा भरोसा था,वह जानता था कि किसान, सरकार से अपनी मांगे पूरी करवाये बिना दिल्ली की सरहदों से 'घर वापसी ' करने वाले नहीं हैं। और आख़िरकार जीत देश की अन्नदाताओं की ही हुई। एक वर्ष तक चले इस आंदोलन में तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी के बावजूद किसान अब फ़सल के न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी,तथा आंदोलन के दौरान उपजी अनेक परिस्थितिजन्य मांगों को लेकर अभी भी 'दिल्ली द्वार ' पर डटे हुये हैं। तीनों कृषि क़ानूनों पर सरकार के पीछे खिसकने के बाद अब किसानों का मानना है कि यदि इसी झटके में उनकी तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी के अतिरिक्त न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी व अन्य मांगें पूरी हो गयीं तो निकट भविष्य में उन्हें कोई नया आंदोलन छेड़ने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी।


तरह तरह के आरोप-प्रत्यारोप व लांछन झेलने व आंदोलन के दौरान किसानों के कष्ट उठाने की पराकाष्ठा के दौर से गुज़रने वाले आंदोलन का हालांकि अभी अंत नहीं हुआ है। परन्तु तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी तक का सफ़र भी अच्छा नहीं रहा। यहाँ तक कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु पर्व के दिन देश को संबोधित करते हुये जिन शब्दावली व वाक्यों का प्रयोग किया वे भी यही संकेत दे रहे थे कि 'क़ानून तो अच्छा था परन्तु कुछ किसानों को समझाया नहीं जा सका'। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री के संबोधन के इन अंशों को ही देखिये - 'किसानों की स्थिति को सुधारने के इसी महाअभियान में देश में तीन कृषि क़ानून लाए गए थे। मक़सद ये था कि देश के किसानों को, ख़ासकर छोटे किसानों को, और ताक़त मिले, उन्हें अपनी उपज की सही क़ीमत और उपज बेचने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा विकल्प मिले। बरसों से ये मांग देश के किसान, देश के कृषि विशेषज्ञ, देश के कृषि अर्थशास्‍त्री, देश के किसान संगठन लगातार कर रहे थे। पहले भी कई सरकारों ने इस पर मंथन भी किया था। इस बार भी संसद में चर्चा हुई, मंथन हुआ और ये क़ानून लाए गए। देश के कोने-कोने में कोटि-कोटि किसानों ने, अनेक किसान संगठनों ने, इसका स्वागत किया, समर्थन किया। मैं आज उन सभी का बहुत-बहुत आभारी हूं, धन्‍यवाद करना चाहता हूं।'


प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि -'हमारी सरकार, किसानों के कल्याण के लिए, ख़ासकर छोटे किसानों के कल्याण के लिए, देश के कृषि जगत के हित में, देश के हित में, गांव ग़रीब के उज्जवल भविष्य के लिए, पूरी सत्यनिष्ठा से, किसानों के प्रति पूर्ण समर्पण भाव से, नेक नीयत से ये क़ानून लेकर आई थी। लेकिन इतनी पवित्र बात, पूर्ण रूप से शुद्ध, किसानों के हित की बात, हम अपने प्रयासों के बावजूद कुछ किसानों को समझा नहीं पाए हैं। भले ही किसानों का एक वर्ग ही विरोध कर रहा था, लेकिन फिर भी ये हमारे लिए महत्‍वपूर्ण था। कृषि अर्थशास्त्रियों ने, वैज्ञानिकों ने, प्रगतिशील किसानों ने भी उन्हें कृषि क़ानूनों के महत्व को समझाने का भरपूर प्रयास भी किया। हम पूरी विनम्रता से, खुले मन से उन्‍हें समझाते रहे। अनेक माध्‍यमों से व्‍यक्तिगत और सामूहिक बातचीत भी लगातार होती रही। हमने किसानों की बातों को, उनके तर्क को समझने में भी कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं छोड़ी। मैं आज देशवासियों से क्षमा मांगते हुए सच्‍चे मन से और पवित्र हृदय से कहना चाहता हूं कि शायद हमारी तपस्‍या में ही कोई कमी रही होगी जिसके कारण दिए के प्रकाश जैसा सत्‍य ख़ुद किसान भाइयों को हम समझा नहीं पाए। आज गुरु नानक देव जी का पवित्र प्रकाश पर्व है। ये समय किसी को भी दोष देने का नहीं है। आज मैं आपको, पूरे देश को, ये बताने आया हूं कि हमने तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने का, 'रिपील ' करने का निर्णय लिया है। इस महीने के अंत में शुरू होने जा रहे संसद सत्र में, हम इन तीनों कृषि क़ानूनों को 'रिपील ' करने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा कर देंगे'।


प्रधानमंत्री के इस संबोधन के बाद अब बारी थी उस चाटुकार मीडिया तथा काले कृषि क़ानून समर्थकों की। इस वर्ग को प्रधानमंत्री की क़ानून वापसी की घोषणा में भी 'प्रधानमंत्री का मास्टर स्ट्रोक ' दिखाई देने लगा। इस फ़ैसले को उत्तर प्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों से जोड़कर देखा जाने लगा। परन्तु प्रधानमंत्री के संबोधन में कृषि क़ानूनों की वकालत करने के साथ ही इन्हें वापस लेने की घोषणा भी करना,यह स्थिति सरकार व किसानों के मध्य ऐसे अविश्वासपूर्ण हालात को जन्म दे गयी जो पहले कभी नहीं देखे गये। जब प्रधानमंत्री जी फ़रमाते हैं कि -'इतनी पवित्र बात, पूर्ण रूप से शुद्ध, किसानों के हित की बात, हम अपने प्रयासों के बावजूद कुछ किसानों को समझा नहीं पाए हैं ' उस समय उन्हें यह भी याद रखना चाहिये कि वे इतनी पवित्र,पूर्ण रूप से शुद्ध तथा किसानों के हित की बात केवल किसानों को ही नहीं बल्कि मेघालय के राज्यपाल सतपाल मलिक को भी नहीं समझा सके? वे अपनी बात अपनी ही पार्टी के सांसद वरुण गांधी व वीरेंद्र सिंह जैसे कई नेताओं को भी नहीं समझा सके ?


प्रधानमंत्री भले ही इसे 'थोड़े से किसानों' और 'किसानों के छोटे से वर्ग' का आंदोलन जैसे शब्दों का प्रयोग कर इस आंदोलन की व्यापकता को संकुचित करने का प्रयास क्यों न करें परन्तु वास्तव में यह किसान आंदोलन की व्यापकता,दृढ़ता व उनके संकल्पों की ही जीत थी जिसने सरकार को घुटने टेकने के लिये मजबूर कर दिया। अन्यथा यह आंदोलन अभी और भी व्यापक व तीव्र हो सकता था। क्योंकि यह राजनैतिक दलों द्वारा बुलाई गयी 'भाड़े की भीड़' पर आधारित आंदोलन नहीं बल्कि देश के समर्पित 'अन्नदाताओं ' का आंदोलन था और यह शक्ति उन्हीं आनंदताओं की जीत है। जो लोग सरकार के फ़ैसले में 'मास्टर-स्ट्रोक' जैसा कुछ देख रहे हैं उनकी स्थिति दरअसल -'रस्सी तो जल गयी मगर ऐंठन नहीं गयी' जैसी ही है। 


-तनवीर जाफ़री-


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चिंताजनक है महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा

विश्वभर में प्रतिवर्ष 25 नवम्बर को महिलाओं पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए 'अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस' मनाया जाता है।


इस दिन महिलाओं के विरुद्ध हिंसा रोकने के ज्यादा से ज्यादा प्रयास करने की आवश्यकता को रेखांकित करने वाले कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पैट्रिया मर्सिडीज मिराबैल, मारिया अर्जेंटीना मिनेर्वा मिराबैल तथा एंटोनिया मारिया टेरेसा मिराबैल द्वारा डोमिनिक शासक रैफेल ट्रुजिलो की तानाशाही का कड़ा विरोध किए जाने पर उस क्रूर शासक के आदेश पर 25 नवम्बर 1960 को उन तीनों बहनों की हत्या कर दी गई थी। वर्ष 1981 से उस दिन को महिला अधिकारों के समर्थक और कार्यकर्ता उन्हीं तीनों बहनों की मृत्यु की पुण्यतिथि के रूप में मनाते आए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 17 दिसम्बर 1999 को एकमत से हर साल 25 नवम्बर का दिन ही महिलाओं के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय हिंसा उन्मूलन दिवस के रूप में मनाने के लिए निर्धारित किया गया। सरकारों, निजी क्षेत्र और प्रबुद्ध समाज से यौन हिंसा और महिलाओं के उत्पीड़न के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाने का आग्रह करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस का कहना है कि महिलाओं के प्रति हिंसा विश्व में सबसे भयंकर, निरंतर और व्यापक मानवाधिकार उल्लंघनों में शामिल है, जिसका दंश विश्व में हर तीन में से एक महिला को भोगना पड़ता है।


महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के क्षेत्र में कार्य करने के लिए वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 'संयुक्त राष्ट्र महिला' का गठन किया गया था। संयुक्त राष्ट्र महिला के आंकड़ों के अनुसार विश्वभर में 15-19 आयु वर्ग की करीब डेढ़ करोड़ किशोर लड़कियां जीवन में कभी न कभी यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं। करीब 35 फीसदी महिलाओं और लड़कियों को अपने जीवनकाल में शारीरिक एवं यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। हिंसा की शिकार 50 फीसदी से अधिक महिलाओं की हत्या उनके परिजनों द्वारा ही की जाती है। वैश्विक स्तर पर मानव तस्करी के शिकार लोगों में 50 फीसदी व्यस्क महिलाएं हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन तीन में से एक महिला किसी न किसी प्रकार की शारीरिक हिंसा का शिकार होती है।


भारत के संदर्भ में महिला हिंसा को लेकर आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति काफी चिंताजनक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने कुछ दिनों पहले जो आंकड़े जारी किए हैं, उनके मुताबिक वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के कारण राष्ट्रीय तालाबंदी के महीनों के रूप में चिह्नित एक वर्ष में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ पारंपरिक अपराधों में भले कुछ कमी देखी गई लेकिन देश में अपराध के मामले 28 प्रतिशत बढ़ गए। जबकि लॉकडाउन के बाद महिलाओं और बच्चों के खिलाफ आपराधिक मामलों में तेजी आई है। एनसीआरबी के अनुसार देशभर में 2020 में बलात्कार के प्रतिदिन औसतन 77 मामले दर्ज किए गए और कुल 28046 मामले सामने आए। वर्षभर में पूरे देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 371503 मामले दर्ज किए गए, जो 2019 में 405326 और 2018 में 378236 थे। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019 में महिलाओं के खिलाफ 405326 मामले सामने आए थे, जिनमें प्रतिदिन औसतन 87 मामले बलात्कार के दर्ज किए गए। रिपोर्ट के अनुसार देशभर में वर्ष 2018 के मुकाबले 2019 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में 7.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी।


एनसीआरबी के अनुसार देश की राजधानी दिल्ली में वर्ष 2020 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 10093 मामले दर्ज किए गए। जबकि 2019 में ऐसे 13395 मामले सामने आए थे अर्थात् 2019 की तुलना में 2020 में महिलाओं के खिलाफ 24.65 फीसदी अपराध कम हुए। 2019 के मुकाबले दिल्ली में 2020 में भले ही महिलाओं के खिलाफ अपराध करीब 25 प्रतिशत घट गए लेकिन कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के कारण जब देश की अधिकांश आबादी अपने घरों में थी, स्कूल-कॉलेज बंद थे, वर्क फ्रॉम होम चल रहा था, ऐसे में भी 2020 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 10093 मामले सामने आना कम चिंताजनक नहीं है। 2020 में दिल्ली में महिलाओं के अपहरण के 2938, बलात्कार के प्रयास के 9 और बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या का एक मामला दर्ज किया गया। यही नहीं, इस दौरान देशभर में साइबर अपराध 2019 के मुकाबले 11.8 फीसदी बढ़ा है। भारत में 2020 में साइबर अपराध के 50035 मामले दर्ज किए गए जबकि 2019 में साइबर अपराध के 44735 और 2018 में 27248 मामले दर्ज हुए थे।


वर्ष 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद देशभर में सड़कों पर महिलाओं के आत्मसम्मान के प्रति जिस तरह की जन-भावना और युवाओं का तीखा आक्रोश देखा गया था, यौन हिंसा रोकने के लिए जिस प्रकार कानून सख्त किए गए थे, उसके बाद लगने लगा था कि समाज में इससे संवदनशीलता बढ़ेगी और ऐसे कृत्यों में लिप्त असामाजिक तत्वों के हौसले पस्त होंगे किन्तु विडंबना है कि समूचे तंत्र को झकझोर देने वाले निर्भया कांड के बाद भी हालात यह है कि कोई दिन ऐसा नहीं बीतता, जब महिला हिंसा से जुड़े अपराधों के मामले देश के कोने-कोने से सामने न आते हों। होता सिर्फ यही है कि जब भी कोई बड़ा मामला सामने आता है तो हम पुलिस-प्रशासन को कोसते हुए संसद से लेकर सड़क तक कैंडल मार्च निकालकर या अन्य किसी प्रकार से विरोध प्रदर्शन कर रस्म अदायगी करके शांत हो जाते हैं और पुनः तभी जागते हैं, जब ऐसा ही कोई बड़ा मामला पुनः सुर्खियां बनता है, अन्यथा महिला हिंसा की छोटी-बड़ी घटनाएं तो बदस्तूर होती ही रहती हैं। ऐसे अधिकांश मामलों में प्रायः पुलिस-प्रशासन का भी गैरजिम्मेदाराना रवैया ही सामने आता रहा है।


अहम प्रश्न यही है कि निर्भया कांड के बाद कानूनों में सख्ती, महिला सुरक्षा के नाम पर कई तरह के कदम उठाने और समाज में आधी दुनिया के आत्मसम्मान को लेकर बढ़ती संवेदनशीलता के बावजूद आखिर ऐसे क्या कारण हैं कि बलात्कार के मामले हों या छेड़छाड़ अथवा मर्यादा हनन या फिर अपहरण अथवा क्रूरता, 'आधी दुनिया' के प्रति अपराधों का सिलसिला थम नहीं रहा है? इसका एक बड़ा कारण यही है कि कड़े कानूनों के बावजूद असामाजिक तत्वों पर वह कड़ी कार्रवाई नहीं होती, जिसके वे हकदार हैं। इसके अभाव में हम ऐसे अपराधियों के मन में भय पैदा करने में असफल हो रहे हैं। हैदराबाद की बेटी दिशा का मामला हो या उन्नाव पीड़िता का अथवा हाथरस या बुलंदशहर की बेटियों का, लगातार सामने आते इस तरह के तमाम मामलों से स्पष्ट है कि केवल कानून कड़े कर देने से ही महिलाओं के प्रति हो रहे अपराध थमने वाले नहीं हैं। इसके लिए सबसे जरूरी है कि तमाम सरकारें प्रशासनिक मशीनरी को चुस्त-दुरुस्त करने के साथ ऐसे अपराधों के लिए प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करें और ऐसे मामलों में कोताही बरतने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं।


-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)





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कोरोनाः यूरोप से भारत बेहतर


अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक का दावा है कि कोरोना के तीसरे हमले से डरने की जरूरत नहीं है। भारतीय कोवैक्सीन का असर लोगों को काफी सुरक्षा दे रहा है।


यह तो उनकी तकनीकी राय है लेकिन भारत की आम जनता का बर्ताव भी यही बता रहा है कि उसे अब कोरोना का डर ज्यादा नहीं रह गया है। दिल्ली में मैं देख रहा हूं कि नेता लोग बड़ी-बड़ी सभाएं करने लगे हैं, ब्याह-शादियों में सैकड़ों लोग इकट्ठे होने लगे हैं, बाजारों में भीड़ जुटने लगी है और होटलों में लोग खाना भी खाने लगे हैं लेकिन ज्यादातर लोग न तो मुखपट्टी लगा रहे हैं और न ही शारीरिक फासला रख रहे हैं। जिन लोगों ने दो टीके लगवा लिए हैं, वे तो बेफिक्र हो गए हैं। अभी भी 20 करोड़ से ज्यादा टीके अस्पतालों में पड़े हुए हैं। रेल्वे स्टेशनों और हवाई अड्डों पर भी भीड़ बढ़ गई है लेकिन आप जरा यूरोपीय देशों का हाल देखें तो आप थर्रा उठेंगे।


यूरोप के जर्मनी, फ्रांस, हालैंड, स्पेन आदि देशों में कोरोना का हमला तीसरा और चौथा है और वह इतना तेज है कि कुछ राष्ट्रों ने कड़ी तालाबंदी घोषित कर दी है। स्कूल, कालेज, होटल, सभा-स्थल, सिनेमा घर जैसे सब सार्वजनिक स्थल बंद कर दिए हैं। जो कोरोना का टीका नहीं लगवाएगा, उस पर कुछ देशों ने हजारों रुपए का जुर्माना ठोक दिया है। हालैंड में इतने मरीज़ बढ़ गए हैं कि उसके अस्पतालों में उनके लिए जगह ही नहीं है। उन्हें बसों और रेलों में लिटाकर जर्मनी ले जाया जा रहा है। यूरोपीय देश अपने यहां फैली तीसरी और चौथी लहर से इतने घबरा गए हैं कि वे पड़ोसी देशों के नागरिकों को अपने यहां घुसने नहीं दे रहे हैं। अगले कुछ माह में वहां मरनेवालों की संख्या 7 लाख तक पहुंचने का अंदेशा है। यूरोपीय महाद्वीप में कोरोना से अगले साल तक शिकार होनेवालों की संख्या 22 लाख तक जा सकती है।


भारत में कोरोना से मरनेवालों की संख्या 5 लाख के आसपास है जबकि उसकी आबादी सारे यूरोपीय देशों से लगभग दुगुनी है। भारत के मुकाबले यूरोपीय देश कहीं अधिक साफ-स्वच्छ हैं और वहां चिकित्सा सुविधाएं भी कहीं बेहतर हैं। यूरोपीय देश में शिक्षितों की संख्या भी भारत से ज्यादा है। फिर भी उसका हाल इतना बुरा क्यों हो रहा है? इसका एक मात्र कारण जो मुझे दिखाई पड़ता है, वह यह है कि यूरोपीय लोग अहंकारग्रस्त हैं। वे अपने डाॅक्टरों और नेताओं से भी खुद को ज्यादा प्रामाणिक मानते हैं। वे समझते हैं कि दुनिया में सबसे अधिक सभ्य और स्वस्थ कोई हैं तो वे हैं। इसीलिए तालाबंदी और टीके के विरुद्ध वे प्रदर्शन कर रहे हैं, अपने नेताओं को कोस रहे हैं और अपने डाक्टरों के इरादों पर संदेह कर रहे हैं।


क्या भारत में कोई राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष या कोई बड़ा नेता कोरोनाग्रस्त हुआ? नहीं, लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस के प्रधानमंत्रियों को नजरबंदी (एकांतवास) झेलनी पड़ गई है। भारत में सत्तारूढ़ और विपक्षी नेता कितनी ही राजनीतिक तू-तू मैं-मैं करते रहें लेकिन कोरोना की महामारी से लड़ने में सब एक थे। भारत की जनता ने महामारी के दौरान अद्भुत अनुशासन का परिचय दिया है। वह अब भी सावधान रहे, यह जरूरी है।


-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)




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आधुनिक व धर्मनिरपेक्ष संविधान और सनातन भारत

26 नवंबर 1949 को हम भारतीयों का संविधान बनकर तैयार हुआ था। आज 72 वर्ष बाद हमारा संविधान क्या अपनी उस मौलिक प्रतिबद्धता की ओर उन्मुख हो रहा है जिसे इसके रचनाकारों ने भारतीयता के प्रधान तत्व को आगे रखकर बनाया था।


आज इस सवाल को सेक्युलरिज्म और आधुनिकता के आलोक में विश्लेषित किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि मूल संविधान की इबारत में यह अवधारणा कहीं थी नहीं, इसे तो 1976 में प्रस्तावना में जोड़ा गया है। यहां सवाल यह भी उठाया जाना चाहिये कि जिस दलित चेतना के नाम पर अक्सर संविधान को बाबा साहब अंबेडकर की अस्मिता के साथ जोड़ा जाता है क्या उसके साथ बुनियादी खिलवाड़ 1976 में ही नहीं हो गया है। दलित वर्ग को यह भय अक्सर दिखाया जाता रहा है कि कतिपय मनुवादी मानसिकता आरक्षण को खत्म कर बाबा साहब के बनाये संविधान को बदलना चाहती है लेकिन कभी इस प्रश्न को नहीं उठाया जाता कि मूल संविधान के साथ बुनियादी छेड़छाड़ क्यों और किस मानसिकता के साथ की गई?


आज इस बात पर संवाद होना चाहिये कि क्या मौलिक रूप से भारत का संविधान उस सनातन जीवन दृष्टि से शासन और राजनीति को दूर रहने की हिदायत देता है क्या, जिसको आधार बनाकर पिछले 75 वर्षो में इस देश की संसदीय राजनीति और प्रशासन को परिचालित किया जा रहा है। अगर हम मूल संविधान की प्रति उठाकर पन्नों को पलटते हैं तो हमें उसके अंदर सुविख्यात चित्रकार नंदलाल बोस की कूची से बनाये हुए कुल 22 चित्र नजर आते हैं। इन चित्रों के आधार पर ही हम समझ सकते हैं कि हमारे संविधान निर्माताओं के मन और मस्तिष्क में कैसे आदर्श भारतीय समाज की परिकल्पना रही होगी। इन चित्रों की शुरुआत मोहनजोदड़ो से होती है और फिर वैदिक काल के गुरुकुल, महाकाव्य काल के रामायण में लंका पर प्रभु राम की विजय, गीता का उपदेश देते श्री कृष्ण, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म का प्रचार, (मौर्य काल), गुप्त वंश की कला जिसमें हनुमानजी का दृश्य है, विक्रमादित्य का दरबार, नालंदा विश्वविद्यालय, उड़िया मूर्तिकला, नटराज की प्रतिमा, भागीरथ की तपस्या से गंगा का अवतरण, मुगलकाल में अकबर का दरबार, शिवाजी और गुरु गोविंद सिंह, टीपू सुल्तान और महारानी लक्ष्मीबाई, गांधी जी का दांडी मार्च, नोआखली में दंगा पीड़ितों के बीच गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, हिमालय का दृश्य, रेगिस्तान का दृश्य, महासागर का दृश्य शामिल है।


इन 22 चित्रों के जरिये भारत की महान परंपरा की कहानी बयां की गई है। इनमें राम, कृष्ण, हनुमान, बुद्ध, महावीर, विक्रमादित्य, अकबर,टीपू सुल्तान, लक्ष्मीबाई, गांधी, सुभाष क्यों हैं? क्या केवल संविधान की किताब को कलात्मक कलेवर देने के लिये? शायद बिल्कुल नहीं।असल में यह चित्र भारत के लोकाचार और मूल्यों का प्रतिनिधित्व देने के लिये नंदलाल बोस से बनवाये गए। यही चित्र संविधान की इबारत के जरिये शासन और सियासत के अभीष्ट निर्धारित किये गए थे। सवाल यह है कि इन्हीं 22 चित्रों में नंदलाल बोस ने रंग क्यों भरा है संविधान की पुस्तक में? इसका बहुत ही सीधा और सरल जवाब यही है कि ये सभी चित्र भारत के महान सांस्कृतिक जीवन और विरासत के ठोस आधार हैं। ये सभी चित्र भारत की अस्मिता के प्रामाणिक दस्तावेज हैं जिनके साथ हर भारतवासी एक तरह के रागात्मक अनुराग जन्मना महसूस करता है। राम, कृष्ण, हनुमान, गीता, बुद्ध, महावीर, नालंदा, गुरु गोविंद सिंह असल में हजारों साल से भारतीय लोकजीवन के दिग्दर्शक हैं।


जाहिर है संविधान की मूल रचना में इन्हें जोड़ने के पीछे यही सोच थी कि भारत की आधुनिकता और विकास की यात्रा इन जीवन मूल्यों के आलोक में ही निर्धारित किया जाना चाहिये। लेकिन दुःखद अनुभव यह है कि पिछले कुछ दशकों ने भारतीय संविधान निर्माताओं की भावनाओं के उलट देश के शासन तंत्र और चुनावी राजनीति के माध्यम से भारत के लोक जीवन को धर्मनिरपेक्षता के शोर से दूषित करने का प्रयास किया गया है। यही धर्मनिरपेक्षता की राजनीति भारत के आधुनिक स्वरूप की समझ और स्वीकार्यता को खोखला साबित करने के लिये पर्याप्त इसलिये है क्योंकि परंपरागत भारत और आधुनिक भारत के मध्य जिस संविधान के प्रावधानों को अलगाव का आधार बनाया जाता है, असल में वे आधार तो कहीं संविधान के दर्शन में हैं ही नहीं।


इसलिए सवाल यह है कि क्या 75 साल से संविधान की विकृत व्याख्या के जरिये इस देश की सियासत और प्रशासन को परिचालित किया जा रहा है? जिस राम, कृष्ण, हनुमान को शासन के स्तर पर सेक्युलरिज्म के शोर में अछूत मान लिया गया क्या वे संविधान निर्माताओं के लिये भी अश्पृश्य थे? क्या राम की मर्यादा, कृष्णा का गीता ज्ञान, हनुमान का शौर्य, बोस की वीरता, गुरुकुल की शैक्षणिक व्यवस्था, गांधी का राम राज्य, अकबर का सौहार्द, बुद्ध की करुणा, महावीर की शीलता, गुरुगोविंद सिंह का बलिदान, टीपू और लक्ष्मीबाई के शौर्य का अक्स भारत के साथ समवेत होने से हमारी आधुनिकता में कोई ग्रहण लगाने का काम करता है? हमारे पूर्वजों ने तो ऐसा नहीं माना इसीलिए मूल संविधान में इन सभी प्रतीकों का समावेश डंके की चोट पर किया है क्योंकि भारत कोई जमीन पर उकेरी गई या जीती गई या समझौता से बनाई गई भौगोलिक सरंचना मात्र नहीं है, यह तो एक जीवंत सभ्यता है जो सृष्टि के सर्जन के समानांतर चल रही है।


26 नवंबर 1949 को जिस संविधान सभा ने नए विलेख को आत्मार्पित,आत्मसात किया है असल में वह परंपरा और आधुनिक भारत के सुमिलन का उदघोष मात्र था। लेकिन कालांतर में यह धारणा मजबूत हुई कि आधुनिक भारत का आशय सिर्फ पश्चिमी नकल, परंपरागत भारत के विसर्जन के साथ हिन्दू जीवन शैली को अपमानित करने से ही है। इसी बुनियाद पर भारत के शासन तंत्र को बढ़ाने की कोशिशें की गई। जबकि यह भुला दिया गया कि जिस सनातनी संस्कार से परंपरागत भारत भरा है वही आधुनिक भारत को वैश्विक स्वीकार्यता दिला सकता है। दुनिया में शांति, सहअस्तित्व, पर्यावरण सरंक्षण जैसे आज के ज्वलंत संकटों का समाधान आखिर किस सभ्यता और सेक्युलरिज्म के पास है? सिवाय हमारे उन आदर्शों के जिन्हें आधुनिक लोग पिछड़ेपन की निशानी मानते हैं।


हमें यह याद रखना चाहिये कि जब तक सनातन सभ्यता की व्याप्ति सशक्त नहीं होगी भारत दुनिया में अपनी वास्तविक हैसियत हासिल नहीं कर सकता है।दुर्भाग्य से इसी आधार को शिथिल करने में एक बहुत बड़ा वर्ग लगा हुआ है। हमारे पूर्वजों के पास अद्भुत दिव्यदर्शन था इसलिए उन्होंने भारत को धर्मनिरपेक्ष नहीं बनाया बल्कि धर्म चित्रों को आगे रखकर लोक कल्याण के निर्देश स्थापित किये। धर्म हमारी विरासत में इस्लाम या ईसाइयत की तरह पूजा पद्धति नहीं कर्तव्य का विस्तार है। कर्तव्य भी किसी धर्म विशेष तक सीमित नहीं है, इसे समझने के लिये भारत की संसद के द्वार पर उकेरी गई पंक्ति को देखिये-


लोक देवेंरपत्राणर्नु


पश्येम त्वं व्यं वेरा


(मतलब-लोगों के कल्याण का मार्ग का खोल दो, उन्हें बेहतरीन संप्रभुता का मार्ग दिखाओ।)


संसद के सेंट्रल हाल के द्वार पर लिखा है-


अयं निज:परावेति गणना लघुचेतसाम


उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम


भारत सरकार का ध्येय वाक्य "सत्यमेव जयते" है। इन उद्घोष में सम्पूर्ण मानव के कल्याण और सद्गुणों की चर्चा है इसलिए संविधान निर्माताओं की गहरी अंतर्दृष्टि को हमें समझना होगा।


आज योग दुनिया में लोक स्वास्थ्य का मंत्र बन रहा है। अयोध्या में राम की प्रामाणिकता को सर्वोच्च अदालत स्वीकृति दे चुकी है। करोड़ों भारतीय समरस होकर अपनी वैभवशाली विरासत पर गर्व कर रहे हैं। डेटा की ताकत ने आज हमारे युवाओं को राम, कृष्ण, गांधी और गीता के प्रति सजग किया है तो यह उन पूर्वजों के सपने को साकार करने की चहलकदमी ही है जिसे आज के दिन दस्तावेजों में कल्पित किया था। आशा कीजिये कि आने वाले भारत में नंदलाल बोस के उकेरे गए चित्र आमजन और नेतृत्व को अनुप्राणित और आत्मप्रेरित करते रहेंगे। एक भारत श्रेष्ठ भारत के निर्माण के एकमात्र उत्प्रेरक होंगे।


-डॉ. अजय खेमरिया-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)






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किन्नर कल्याण की दिशा में जो कदम योगी ने उठाया, उससे सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए

उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रदेश में किन्नर कल्याण बोर्ड गठित कर उसके लिए किन्नर सदस्य नामित किए हैं। सरकार चाहे तो किन्नर समाज को प्रदेश के अंचलों और आदिवासी लोक नृत्य सिखा कर प्रदेश की लुप्त होती कला को जीवित कर सकती है। प्रदेश के कई किन्नर इन कलाओं का सीखकर पद्म पुरस्कार पाने वाले मजम्मा जोगाठी की तरह सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश में किन्नर कल्याण बोर्ड के गठन का उद्देश्य समाज के विकास की मुख्यधारा से वंचित किन्नरों को आगे लाने की जद्दोजहद है। सरकार ने सोनम चिश्ती को इस बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया है। उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया है। गठित किन्नर कल्याण बोर्ड में इनके अलावा चार किन्नर सदस्य पद के लिए प्रयागराज की कौशल्या नन्द गिरी उर्फ टीना मां, गोरखपुर की किरन बाबा, जौनपुर की मधु उर्फ काजल व कासगंज की मोहम्मद  आरिफ पूजा किन्नर शामिल हैं।


उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश में कहा गया है कि बोर्ड किन्नरों की आवश्यकताओं, मुद्दों व समस्याओं पर काम करते हुए नीति व संस्थागत सुधारों के लिए सरकार को सुझाव देगा। बोर्ड के अध्यक्ष समाज कल्याण मंत्री होंगे। जबकि मुख्यमंत्री द्वारा नामित किन्नर उपाध्यक्ष होगा। समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव संयोजक होंगे। किन्नर संबंधी विभाग के अधिकारियों के अनावा पांच किन्नर व एनजीओ के प्रतिनिधियों को मंत्री नामित करेंगे। गैर-आधिकारिक सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्षों होगा। बोर्ड का सदस्य सचिव, निदेशक समाज कल्याण होगा। बोर्ड को तीन महीने में बैठक करना जरूरी होगा। विभागीय प्रमुख सचिव के. रविन्द्र नायक ने बताया कि सभी के नामित होते ही बोर्ड की बैठक होगी। बोर्ड का काम किन्नर नीति को विभागों में लागू करने के साथ ही किन्नरों का शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक विकास करने, समानता व समता के लिए दिशा-निर्देश जारी कर उनका क्रियान्वयन कराने तथा जिला स्तरीय समिति या किन्नर सहायता इकाई के प्रकरणों पर निर्णय करना होगा।


जिलों में डीएम की अध्यक्षता में भी 13 सदस्यीय समिति होगी। इसकी प्रतिमाह बैठक होगी। इसमें अधिकारियों के अलावा डीएम द्वारा नामित मनोवैज्ञानिक व किन्नर समुदाय के दो प्रतिनिधि सदस्य और जिला समाज कल्याण अधिकारी सदस्य सचिव होंगे। यह भी कहा गया है कि किन्नरों को पहचान पत्र मिलेंगे। किन्नरों को मनोवैज्ञानिक परामर्श के लिए केंद्र भी बनेंगे। किन्नर समाज अब तक बिल्कुल उपेक्षित हैं। समाज उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं है। लोग बाग इनसे बात करने से बचते हैं। किन्नरों का भी रवैया ठीक नहीं। वह त्योहारों के नाम पर व्यापारियों से, दुकानदारों से कई बार जबरदस्ती वसूली करते हैं। बस और ट्रेन में हंगामा करते हैं। परिवार में बच्चा होने और शादी के बाद दुल्हन के परिवार में तो उनकी उद्दंडता देखते बनती है। मनमानी राशि मांगते हैं। न देने पर हुड़दंग करते हैं। परिवार अपनी बेइज्जती से बचने  के लिए, अपनी इज्जत बचाने के लिए इनकी नग्नता और गुंडई को देख कर चुप हो जाते हैं। हालात न होने पर भी इन्हें मनमानी रकम देते हैं। कई बार तो वे परिवार उधार भी उठाते हैं। देहात में तो इनके श्राप देने का भी आतंक है। कुछ लोग कहते हैं कि ये नए विवाहित जोड़े और शिशु को आशीर्वाद देते हैं। मांगी रकम न दिए जाने पर श्राप भी देते हैं। इनका श्राप दिया जाना ठीक नहीं।


सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर गठित इस बोर्ड के गठन से किन्नरों की समस्याओं पर विचार हो सकेगा। उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा में लाने, समाज के विकास कार्यों में लगाने का कार्य किया जाएगा। उनकी समस्याओं पर विचार होगा। उन्हें बताया जाना चाहएि कि उनका रवैया समाज में उन्हें घृणा का पात्र बनाता है यदि वे थोड़ी सरलता−उदारता का प्रयोग करें समाज में उनकी छवि निखर सकती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इनकी संख्या डेढ़ लाख बताई गई है जबकि वास्तव में काफी ज्यादा है। क्योंकि ये अपना परिचय बताना नहीं चाहते।


सरकार की योजना किन्नरों को परिचय कार्ड जारी करने की है। इससे किन्नरों को बहुत लाभ मिलेगा। नकली किन्नरों की गतिविधियों को रोका जा सकेगा। कुछ व्यक्ति नकली किन्नर बनकर वसूली करते हैं। इससे नकली और असली किन्नरों में झगड़े होते हैं। मारपीट होती है। कई बार कत्ल हो जाते हैं। परिचय पत्र मिलने के बाद नकली किन्नरों की वसूली बन्द हो सकेगी। अगर इनकी समस्या को समझा जाता, इन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का काम होता तो इनके व्यवहार में बड़ा परिवर्तन होता। इनके साथ समाज को भी इनके बारे में जागरूक किया जाता तो देश के हालत बिल्कुल अलग होते। ये भी समाज का जिम्मेदार हिस्सा होते। वैसे आज कई किन्नर समाजहित के लिए काम कर रहे हैं। बिजनौर के एक किन्नर ने अपने पास से पैसा लगाकर एक गरीब परिवार की लड़की की शादी की है। अब समाज कल्याण के कार्य सरकार कराने लगी। पहले सेठ, सम्पन्न और जमींदार ये कार्य करते थे। आजादी के पूर्व में बने कई कुएं ऐसे हैं जो किन्नरों ने बनवाए। पुराने लोग बताते भी हैं। ये कुएं हिजड़े का कुआं के नाम से प्रसिद्ध भी हैं। ये चुनाव का समय है। सब दल कहेंगे कि भाजपा ने इसे चुनावी लाभ के लिए गठन किया है। लगता भी ऐसा ही है। भाजपा को इसका लाभ भी मिलना निश्चित है।


सरकार किन्नर कल्याण बोर्ड के माध्यम से किन्नरों को प्रदेश की क्षेत्रीय नृत्य और नाट्य कला, प्रदेश में बसने वाली जनजातियों के नृत्य सिखाकर इन कलाओं से जोड़ने का बड़ा काम कर सकती है। इन्हीं कलाओं में भनेड़ा (बिजनौर) के नक्काल, अरब से भारत आई और बिजनौर के चांदपुर, अमरोहा और रामपुर जनपद में गाई जाने वाली चाहरबैत को इनसे गवाकर जिंदा और रोचक बनाया जा सकता है। चाहरबैत पुरुषों द्वारा ढप (एक तरह का साज) पर गाई जाने वाली कला है। यदि इसे महिलाओं के परिधान में किन्नर गायें तो ये कला ज्यादा रुचिकर और लोकप्रिय होगी। ऐसे ही 'अगरही' (पूर्वांचल के आदिवासियों का एक प्रमुख नृत्य) पूर्वांचल के देवरिया, गोरखपुर और बलिया जिलों में 'गोड़उ' नृत्य, अहीर (वीरों की संस्कृति) की कला, नृत्य सिखाकर इनसे मंचित कराए जा सकते हैं। कुछ समय पूर्व सारंगी वादक जगह−जगह दिखाई देते थे, यदि कुछ जीवित सारंगी वादकों से इन्हें शिक्षा दिलाई जाए तो समाप्त होती क्षेत्रीय, आदिवासी और परम्परागत कला को जीवित किया जा सकता है। किन्नर मजम्मा ने तो अपने आप लोक कला सीखकर पद्म पुरस्कार पाया। अगर सरकारी स्तर से प्रदेश के किन्नरों के साथ ईमानदारी से मेहनत की गई तो उत्तर प्रदेश देश को किन्नर मजम्मा जैसे कई प्रसिद्ध कलाकार दे सकेगा।



-अशोक मधुप-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




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कोरोना ने यूरोप में नये रूप में पाँव पसार लिया, हमें बेहद सतर्क रहना होगा

पूरी दुनिया कोरोना महामारी से पिछले काफी लंबे समय से जूझती रही है। समूची दुनिया ने चुस्ती और सावधानी बरतते हुए इस महामारी से मुक्ति दिलाने में सफलता भी हासिल की है, लेकिन अभी कोरोना महामारी का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। रह-रह कर यह महामारी विश्व के कई देशों में उभर रही है। कोरोना महामारी से निजात को लेकर अभी भी बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं। वैश्विक स्तर पर सबसे चिंताजनक स्थिति यूरोपीय देशों की है। यूरोप में कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रसार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी चिंता जता चुका है। ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि टीकों की पर्याप्त आपूर्ति के बावजूद यूरोप महामारी का केंद्र बना हुआ है। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सतर्कता एवं सावधानी से हम इस बड़े खतरे को नियंत्रित करने एवं सौ करोड़ से अधिक टीकाकरण का लक्ष्य हासिल करके निश्चिंत बने हैं, लेकिन इसके संभावित खतरे से पूरी तरह निश्चिंत हो जाना, हमारी भूल होगी। हमें अभी भी पूरी सावधानी एवं सतर्कता बरतने की अपेक्षा है।


यूरोप में नये रूप में कोरोना महामारी के पांव पसारने से पूरी दुनिया चिन्तित है, ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि टीकों की पर्याप्त आपूर्ति के बावजूद यूरोप महामारी का केंद्र बना हुआ है। बहुत सारे टीकों का उपलब्ध होना ही नहीं, बल्कि वहां टीकों का उपयोग समान होना भी जरूरी है। इसलिए कोरोना मामलों की संख्या फिर से करीब-करीब रेकार्ड स्तर तक बढ़ने लगी है। करीब तिरपन देशों में कोरोना संक्रमण की वजह से अस्पताल में भर्ती होने की दर अगर एक हफ्ते की तुलना में दोगुनी से अधिक हुई है तो आशंका यही है कि यह महामारी की नई लहर का संकेत है। यदि ऐसा ही चला तो इस क्षेत्र में अगले साल फरवरी 2022 तक पांच लाख लोगों को इस महामारी के कारण जान गंवानी पड़ सकती है।


भारत के कई राज्यों में कोरोना वायरस के बढ़ते प्रसार को देखते हुए कोविड प्रोटोकॉल को अभी जारी रखने का फैसला लिया गया है। केंद्र सरकार ने कोरोना रोकथाम उपायों को 30 नवंबर तक बढ़ा दिया है। गृह सचिव के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नियमित रूप से हर जिले के अस्पताल और आईसीयू में भर्ती मरीजों की संख्या की बारीकी से निगरानी करने की सलाह दी जा रही है। टीकाकरण का अभियान जारी रखते हुए अन्य हिदायतों का भी जिम्मेदारी से पालन करने की जरूरत है। जैसा कि हम जानते हैं कि लोग शीघ्र ही अच्छा देखने एवं स्वच्छंद जीवन जीने के लिये बेताब रहे हैं। भले ही उनके सब्र का प्याला भर चुका था, लेकिन कोरोना महामारी जैसे महासंकट को परास्त करने के लिये सब्र ही चाहिए। यह सत्य है कि आज की आबादी भगवान श्रीराम की तरह 14 वर्षों का वनवास एवं भगवान महावीर की तरह 12 वर्षों की कठोर तपस्या का इंतजार नहीं कर सकती। लेकिन जीवन रक्षा के लिये ऐसा करना पड़ता है।


कोरोना महामारी जैसे महासंकट से निताज दिलाने के लिये कोई फरिश्ता नहीं, बल्कि जन-जन को ही फरिश्ता बनने की अपेक्षा थी और है। भले ही नरेन्द्र मोदी जैसे सशक्त शासकों ने अपनी प्रभावी भूमिका अदा कर लोगों के स्वास्थ्य एवं जीवन की रक्षा की है। 130 करोड़ से अधिक आबादी वाले राष्ट्र में हर व्यक्ति को तत्परता से निःशुल्क टीके उपलब्ध कराना साहस एवं सूझबूझ का काम है। देश, काल एवं स्थिति के अनुरूप उन्होंने विरल शासक का किरदार निभाते हुए एक अनूठा एवं विलक्षण इतिहास रचा है। लेकिन इससे जनता की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती, अभी भी खतरा बना हुआ है, इसलिये सावधानी, संयम एवं स्व-अनुशासन जरूरी है। यूरोपीय देशों में कोरोना की नयी उभरती स्थिति हमें अधिक सावधानी बरतने को प्रेरित कर रही है।


समृद्ध एवं शक्तिशाली यूरोप में टीकाकरण की रफ्तार अलग-अलग एवं असंतुलित रही है। अभी तक औसतन सैंतालीस फीसद लोगों का टीकाकरण पूरा हो पाया है। महज आठ देश ऐसे हैं, जहां पर सत्तर फीसद आबादी टीके की सभी खुराक ले चुकी है। इस दौरान वे दृश्य लोगों ने टेलीविजन पर खूब देखे हैं जिनमें कई यूरोपीय देशों में कोरोना पाबंदियों को सरकारों ने या तो न्यूनतम कर दिया, या फिर ऐसी सख्ती के खिलाफ वहां जनता विरोध में सड़कों पर उतरी। इस स्थिति को वैज्ञानिकों और चिकित्सकों के कई समूहों के अलावा डब्लूएचओ भी गंभीर मानता रहा है। डब्ल्यूएचओ ने चेतावनी दी है कि टीकों की उपलब्धता के बावजूद यूरोप में संक्रमण के मामले अगर बढ़ रहे हैं तो यह केवल यूरोप के लिये ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए खतरे की एक और घंटी से कम नहीं है।

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साफ है कि कोरोना संक्रमण के खिलाफ तनिक भी लापरवाही या गैरजिम्मेदाराना व्यवहार होगा तो इस महामारी के खतरे से आसानी से मुक्ति संभव नहीं है। भारत उन देशों में शामिल है जो पहले दिन से यह कहता रहा है कि इस महामारी के खिलाफ न सिर्फ वैश्विक पहल की स्पष्ट रूपरेखा तय होनी चाहिए बल्कि इस पर साझा अमल भी होना चाहिए। भारत ने इसमें सार्थक पहल की एवं सकारात्मक भूमिका भी निभाई है। असल में कोरोना एक संक्रमण वाला महारोग है, इसलिये एक देश में उसके फैलने का असर पूरी दुनिया में फैल जाने के खतरे की घंटी है। इसलिये मौजूदा हालात में यूरोप में अब ऐसी स्थिति बन रही है कि वहां टीकाकरण की अनिवार्यता पर बड़े फैसले लिए जाने की अपेक्षा है। इसकी शुरुआत आस्ट्रिया ने कर भी दी है। अलबत्ता यूरोपीय संघ में टीकाकरण अनिवार्य करने वाला आस्ट्रिया इकलौता देश जरूर है, लेकिन बाकी देशों की सरकारें भी सख्त पाबंदियां लगा रही हैं।


यूरोपीय देशों का नया उभर रहा संकट भारत के लिये एक चेतावनी एवं बड़ा सबक है। क्योंकि भारत एक बड़ी आबादी वाला देश है, यहां पर स्वास्थ्य सुविधाओं का आनुपातिक अभाव है, शिक्षा का अभाव है। टीकाकरण और जरूरी सावधानी के जरिए ही इस महामारी को कारगर तरीके से रोका जा सकता है। टीका लगवाने के साथ मास्क पहनने और आने-जाने के लिए कोविड पास का इस्तेमाल करने से स्थिति से निपटने में मदद मिल सकती है। जब तक पूरी तरह कोरोना पर नियंत्रण न हो जाये, भीड़-भाड़ से बचने की जरूरत है, जहां तक हो सके घरों पर ही रहकर काम किये जाये, शादी-विवाह, धार्मिक आयोजनों, राजनीतिक जलसों में भीड़ को नियंत्रित रखा जाये। स्कूलों, सिनेमाघरों, स्विमिंग पूल आदि पर पूरी तरह अनुशासन एवं प्रोटोकॉल कायम रहे। जहां अपेक्षित हो आंशिक लॉकडाउन लगाया जाये। सामाजिक दूरी का पालन किया जाये। यह समझ एवं सोच यूरोप सहित दुनिया के लिए तो जरूरी है ही, विश्व समाज को भी समझ की इस दरकार पर पक्के तौर पर खरा उतरना होगा।


जीवन-रक्षा के लिये लगाये जा रहे प्रतिबंधों को लेकर विरोध की मानसिकता घातक है। ऑस्ट्रिया, क्रोएशिया और इटली में भी नये प्रतिबंधों के खिलाफ हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर निकल आए। ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में सरकार की ओर से नये राष्ट्रीय लॉकडाउन की घोषणा और फरवरी 2022 तक टीका लगाना अनिवार्य किये जाने के बाद हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। क्रोएशिया की राजधानी ज़ाग्रेब में सार्वजनिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए वैक्सीन अनिवार्य करने के खिलाफ हजारों लोगों ने मार्च किया। इटली में भी ग्रीन पास प्रमाण पत्र अनिवार्य किये जाने के विरोध में हजारों लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। दुनिया में कोई भी कोरोना से मरने को विवश न हो, इसके लिये संतुलित एवं स्व-शासित व्यवहार एवं जीवनशैली ही सबको जीवन-रोशनी दे सकती है।





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हरियाणा में आरक्षण बना बेहतर

हरियाणा की भाजपा सरकार ने आरक्षण के मामले में साहसिक निर्णय किया है, जो देश की सभी सरकारों के लिए अनुकरणीय है। जब समाजवादी नेता डाॅ. लोहिया कहा करते थे कि 'पिछड़े पावें सौ में साठ' तो मेरे-जैसे नौजवान उनका डटकर समर्थन करते थे और फिर प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब आरक्षण का कानून बनाया तो उसका समर्थन भी बड़ी-बड़ी जनसभाओं में हमने किया लेकिन हमने महसूस किया कि हमारे समाज के जिन लोगों के साथ सदियों से अन्याय हुआ है उन्हें जातीय आधार पर आरक्षण देने से सिर्फ मुट्ठीभर लोगों को न्याय मिलेगा लेकिन जो वास्तव में पिछड़े हैं, गरीब हैं, ग्रामीण हैं, अशिक्षित हैं और मेहनतकश हैं वे सब सदियों से जहां पड़े हुए हैं, वहीं पड़े रहेंगे।


उन सबका उद्धार होना बेहद जरूरी है।


सर्वोच्च न्यायालय ने हमारे इस विचार पर मुहर लगाई और फैसला किया कि आरक्षित जातियों में जो मलाईदार परत है, उसके लोगों को आरक्षण की जरूरत नहीं है। हरियाणा सरकार ने इस मलाईदार परत की नई व्याख्या की है और उसे और चौड़ा कर दिया है। 1993 में नरसिंह राव सरकार ने तय किया था कि जिस परिवार की आमदनी एक लाख रु. वार्षिक या उससे ज्यादा है, उसे सरकारी नौकरियों में आरक्षण नहीं मिलेगा। 2004 में यह सीमा ढाई लाख, 2008 में छह लाख और 2017 में केंद्र सरकार ने इसे आठ लाख रुपये कर दिया है लेकिन हरियाणा सरकार की नौकरियों में यह सीमा 6 लाख घोषित की गई है। याने हरियाणा सरकार की आरक्षित नौकरी उसे ही मिलेगी, जिसकी आमदनी 50 हजार रु. महीने से कम हो। साथ ही सांसदों, विधायकों, क्लास-1, क्लास-2, सेना के मेजर रेंक और उससे ऊपर के अधिकारियों और उनके परिवारवालों को भी आरक्षण नहीं मिलेगा। आरक्षण का यह प्रावधान संवैधानिक पदों पर बैठे सभी लोगों पर भी लागू होगा।


दूसरे शब्दों में आरक्षण का मूल चरित्र ही बदल रहा है। इसका आधार जाति तो अब भी है लेकिन उसमें भी जरूरत ऊपर है और जाति नीचे है। मेरा तर्क यह है कि जाति के आधार पर आरक्षण को पूर्णरूपेण खत्म किया जाना चाहिए। उसका आधार जन्म नहीं, जरूरत होना चाहिए। जातीय आरक्षण देकर सरकार क्या करती है? पिछड़ों और अनुसूचितों की आर्थिक स्थिति बेहतर बनाती है लेकिन उसके चलते देश में जातिवाद के जहरीले सांप को दूध पिलाती है। जन्मना जातिवाद ने देश की राजनीति का गला घोंट रखा है। लोकतंत्र का मजाक बना रखा है। लोकतंत्र को भेड़तंत्र बना रखा है। यदि जातीय आरक्षण खत्म कर दिया जाए और जो सचमुच पिछड़ें हों, गरीब हो और वे चाहे किसी भी जाति या मजहब के हों, यदि उन्हें और उनके बच्चों को शिक्षा और चिकित्सा में आरक्षण मिले तो उन्हें नौकरियों में आरक्षण के लिए भीख का कटोरा नहीं फैलाना पड़ेगा। वे अपनी योग्यता के दम पर पदासीन होंगे, उनका स्वाभिमान सुरक्षित रहेगा और उनका व्यवहार सबके लिए उत्तम कोटि का होगा।


-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)




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युक्तिसगंत बनानी होगी एमएसपी व्यवस्था

केंद्र सरकार ने कृषि कानूनों को वापस ले लिया है पर किसान अभी भी एमएसपी को लेकर डटे हुए हैं। आजादी के 75 साल बाद भी एमएसपी पर खरीद कुछ फसलों तक सीमित है।


वहीं एमएसपी व्यवस्था को युक्ति संगत बनाना आज भी आवश्यक है। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसानों को मुख्यधारा में लाने के लिए एमएसपी व्यवस्था कारगर सिद्ध हो सकती है।


अन्नदाता को आर्थिक विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लाख दावे किए जाते रहे हों पर वह दिन अभी दूर की कौड़ी है जब देश का अन्नदाता अपनी मेहनत से तैयार उपज का भाव स्वयं तय कर सके। कई दशकों से चली आ रही एमएसपी व्यवस्था के बावजूद अभी एमएसपी के नाम पर ले देकर किसान गेहूं, चावल, कपास, गन्ना, सरसो, सोयाबीन, मूंगफली और अब पिछले कुछ सालों की बात करें तो मूंग-उड़द की बात की जा सकती है। दुनिया आज मोटे अनाज को लेकर गंभीर हुई है और मोटे अनाज को बढ़ावा देने की बात की जा रही है, वहीं बाजरा आदि मोटे अनाज की खरीद कोसो दूर है।


नेशनल सैंपल सर्वे की हालिया रिपोर्ट के अनुसार 2019 के दौरान देश में सिर्फ पांच फसलों की खरीद ही दस प्रतिशत से ज्यादा रही है। गेहूं, चावल, गन्ना और कपास की खरीद अधिक मात्रा में होती रही है। पिछले सालों में एमएसपी दरों में अच्छी खासा बढ़ोतरी हुई है तो दूसरी और कृषि लागत में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। इसलिए एमएसपी बढ़ने के बावजूद अधिक लाभ वाली बात नहीं है। यही कारण है कि नए कृषि कानूनों के चलते सबसे मुखर आवाज उभर कर आई है तो वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की व्यवस्था को लेकर हुई है। सरकार का दावा है कि नए कानूनों के बावजूद एमएसपी पर खरीद व्यवस्था जारी है और जारी रहेगी। वहीं, किसानों की पैरवी करने वाले सभी संगठन एमएसपी को लेकर अधिक मुखर हैं। एमएसपी को लेकर देश में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। हालांकि एमएसपी को लेकर लाख संदेहों के बावजूद देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद जारी है।


यह सही है कि पिछले कुछ सालों से फसल की बुवाई के समय या उसके आसपास ही फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाने लगी है। इससे पहले देरी से एमएसपी की घोषणा को लेकर विवाद होता रहता था और यह कहा जाता था कि समय पर एमएसपी की घोषणा नहीं होने से किसान अच्छे मूल्य वाली फसलों की बुवाई से वंचित रह जाता था। अब हालात में सुधार आया है। पर सवाल अभी भी वहीं का वहीं है। अभी भी एमएसपी को लेकर वह जागरुकता नहीं है जो उसमें होनी चाहिए। इसका एक बड़ा कारण देश में खेती के लिए चली आ रही संस्थागत ऋण व्यवस्था है। देश की संस्थागत वित्तदायी संस्थाएं आजादी के सात दशक बाद भी सभी किसानों की खेती के लिए आवश्यक वित्त व्यवस्था करने में विफल रही हैं। यही कारण है कि आज भी बड़ी संख्या में काश्तकारों के रुपयों-पैसों की जरूरत पूरी करने के लिए गैर संस्थागत ऋण दाताओं खासतौर से साहूकारों पर निर्भरता बनी हुई है। लाख दावे किए जाते हों पर सहकारी ऋण व्यवस्था में झोल आज भी बना हुआ है। वैसे सहकारी बैंक संसाधनों की कमी के चलते सभी किसानों की ऋण जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही है। इस कारण किसानों की निर्भरता अन्य स्रोतों पर बनी हुई है। किसानों से ही खरीद का दावा करने के बावजूद किसानों की मेहनत का बहुत बड़ा हिस्सा इन साहूकारों या गैर संस्थागत ऋणदाताओं की झोली में चला जाता है और किसान अपने आपको ठगा महसूस करता है।


सरकार द्वारा खरीफ और रबी के लिए फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर घोषणा की जाती है। गेहूं आदि खाद्यान्नों की खरीद की जिम्मेदारी जहां भारतीय खाद्य निगम के पास है तो दलहनी और तिलहनी फसलों की खरीद की जिम्मेदारी नेफैड ने संभाल रखी है। कपास की खरीद कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा तो गन्ने की खरीद गन्ना मिलों द्वारा की जा रही है। कुछ प्रदेशों में राज्य की संस्थाओं द्वारा भी वाणिज्यिक दरों के साथ ही बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत खरीद की जाती है पर यह नाममात्र की ही हो पाती है। भारतीय खाद्य निगम और नेफैड, बदली परिस्थितियों में दोनों ही संस्थाएं खरी नहीं उतरी हैं और यही कारण है कि नेफैड जहां लड़खड़ाती हुई जैसे-तैसे चल रही हैं वहीं भारतीय खाद्य निगम के पुनर्गठन पर भी विचार की चर्चा यदाकदा चलती रही है। ले देकर देश में गेहूं और चावल की ही एमएसपी पर अधिक व समय पर खरीद होती है।


इसकी खरीद के पीछे भी एक दूसरा बड़ा कारण सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की बाध्यता भी है। सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गेहूं और चावल आदि उपलब्ध कराने होते हैं। इसके लिए सरकार के पास बड़ा सहारा एमएसपी पर खरीद व्यवस्था ही है। कोरोना महामारी के दौर में खाद्यान्नों की उपलब्धता व्यवस्था पूरी तरह से खरी उतरी है। सरकारी गोदामों में गेहूं-चावल के भंडार के चलते केन्द्र व राज्य सरकारों ने जरूरतमंद लोगों को मुफ्त राशन सामग्री उपलब्ध कराने में कोई कोताही नहीं बरती। परिणाम सामने है कि देश में कोरोना लॉकडाउन व उसके अलावा भी राशन सामग्री उपलब्ध कराने में किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। पूरी निष्पक्षता के साथ कहा जा सकता है कि इसका श्रेय अन्नदाता की मेहनत और सरकार की एमएसपी व्यवस्था को ही जाता है।


आज भी देश की एमएसपी खरीद व्यवस्था गेहूं, धान, कपास, गन्ना, सरसों आदि तक सीमित है। जबकि 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष मनाने की तैयारियां जोरों से चल रही है। मोटे अनाज का महत्व समझा जाने लगा है। ऐसे में मोटे अनाज का लाभकारी मूल्य मिले यह सुनिश्चित करना भी सरकारों की जिम्मेदारी हो जाती है ताकि किसान स्वयं आगे आकर मोटे अनाज की पैदावार लेने के प्रति प्रेरित हो। सरकारों को इस ओर सोचना होगा। आज राजस्थान सहित उत्तरी भारत के राज्यों में बाजरे की समर्थन मूल्य पर खरीद की मांग की जा रही है। होना तो यह चाहिए कि जिस भी फसल का समर्थन मूल्य घोषित हो उसके भाव बाजार में कम होते ही खरीद आरंभ हो जाए तो समस्या का समाधान बहुत आसानी से हो सकता है।


-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)






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अब कृषि विकास का नया अध्याय

19 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान करते हुए कहा कि मैं अपने सभी आंदोलनरत किसान साथियों से आग्रह कर रहा हूं कि गुरुपर्व के पवित्र दिन अपने-अपने घर लौटें, अपने खेतों में लौटें, अपने परिवार के बीच लौटें। उन्होंने देशवासियों से क्षमा मांगते हुए कहा कि शायद हमारी तपस्या में ही कोई कमी रह गई होगी, जिसके कारण दीये के प्रकाश जैसा सत्य कुछ किसान भाइयों को हम समझा नहीं पाए। पीएम ने कहा कि कृषि कानूनों को वापस लेने की प्रक्रिया भी इसी संसद सत्र में पूरी कर दी जाएगी। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कृषि को प्रभावी बनाने, विकास की नई रणनीति और जीरो बजट खेती की तरफ प्रभावी कदम बनाने के लिए एक कमेटी के गठन का फैसला भी घोषित किया। उन्होंने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, देश की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर क्रॉप पैटर्न के वैज्ञानिक तरीके, एमएसपी को और अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने जैसे विभिन्न महत्त्वपूर्ण विषयों पर भविष्य को ध्यान में रखते हुए नई कमेटी के द्वारा प्रभावी निर्णय लिए जाने की बात कही।


 निःसंदेह अब तीनों कृषि कानूनों की वापसी के बाद कृषि के विकास के लिए देश के सभी किसानों की सहभागिता और कृषि के विकास के लिए गठित होने वाली नई कमेटी को जो विषय सौंपे जा रहे हैं, उनकी प्रभावी रणनीति से देश में कृषि एवं ग्रामीण विकास का नया अध्याय लिखा जा सकेगा। इसमें कोई दो मत नहीं कि कोविड-19 की चुनौतियों के बाद इस समय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार का परिदृश्य दिखाई दे रहा है। इस समय जहां देश के रोजगार सूचकांक ग्रामीण भारत में तेजी से रोजगार बढ़ने का ग्राफ प्रस्तुत कर रहे हैं, वहीं ग्रामीण उपभोक्ता सूचकांक भी लगातार ऊंचाई पर पहुंचते दिखाई दे रहे हैं। मानसून के अनियमित रहने और बुआई में हुई देरी के बावजूद खरीफ सत्र में अच्छी फसल की संभावना से ग्रामीण भारत का आशावाद भी ऊंचाई पर है। इस समय देश में कृषि एवं ग्रामीण विकास की मजबूती के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने के चार महत्त्वपूर्ण आधार उभरकर दिखाई दे रहे हैं। एक, जन-धन योजना के माध्यम से छोटे किसानों और ग्रामीण गरीबों का सशक्तिकरण। दो, कृषि क्षेत्र में उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के कार्यक्रम। तीन, कृषि संबंधी नवाचार एवं शोध से कृषि उन्नयन तथा चार, ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए नई स्वामित्व योजना की शुरुआत।  सचमुच देश ही नहीं, दुनिया में भी यह रेखांकित हो रहा है कि जन-धन योजना के माध्यम से सरकार ने आक्रामक वित्तीय समावेशन कार्यक्रम चलाया है जिसकी वजह से सरकार छोटे किसानों और ग्रामीण भारत में गरीबों की मदद करने में सफल रही है। 25 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के 76वें सत्र को संबोधित करते हुए दुनिया को जन-धन योजना के महत्त्व से परिचित कराया है। कहा गया है कि देश के छोटे किसानों की मुठ्ठियों में वित्तीय समावेशन की खुशियां तेजी से बढ़ी हैं। पीएम किसान योजना के अंतर्गत अगस्त 2021 तक 11.37 करोड़ किसानों के बैंक खातों में डायरेक्ट बेनिफेट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिये 1.58 लाख करोड़ रुपए जमा किए जा चुके हैं। निःसंदेह न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ खरीद प्रक्रिया में भी सुधार किया गया है ताकि अधिक से अधिक किसानों को इसका लाभ मिल सके। किसानों को पानी की सुरक्षा देने के लिए बड़ी संख्या में सिंचाई परियोजनाएं शुरू की गई हैं। दशकों से लटकी करीब-करीब 100 सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने का अभियान चलाया जा रहा है।


किसानों की जमीन को सुरक्षा देने के लिए, उन्हें अलग-अलग चरणों में 11 करोड़ सॉयल हेल्थ कार्ड दिए गए हैं। 2 करोड़ से ज्यादा किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड दिए गए हैं। एक लाख करोड़ रुपए का एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड, सोलर पावर से जुड़ी योजनाएं खेत तक पहुंचाने, 10 हजार नए किसान उत्पादन संगठन और देश के 70 से ज्यादा रेल रूटों पर किसान रेल चलने से छोटे किसानों के कृषि उत्पाद कम ट्रांसपोर्टेशन के खर्चे पर देश के दूरदराज के इलाकों तक पहुंच रहे हैं। विगत 11 अक्तूबर को केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 15 राज्यों के 343 चिन्हित जिलों में किसानों को मुफ्त 8.20 लाख हाईब्रिड बीज मिनीकिट कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए कहा कि पिछले 6-7 वर्षों में कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के कार्यक्रमों के अच्छे परिणाम दिखाई देने लगे हैं। हाल ही में कृषि मंत्रालय द्वारा जारी खरीफ सत्र के प्रारंभिक अनुमानों के मुताबिक देश में इस बार खरीफ सत्र में करीब 15.05 करोड़ टन रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन होने की संभावना है। पिछले वर्ष खरीफ सत्र में करीब 14.95 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ था। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि वर्ष 2020-21 में कुल खाद्यान्न उत्पादन करीब 30.86 करोड़ टन की रिकॉर्ड ऊंचाई पर रहा है। निःसंदेह कृषि एवं ग्रामीण विकास के इन नए आयामों के साथ अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए स्वामित्व योजना एक नई आर्थिक शक्ति के रूप में दिखाई दे रही है।


 विगत 6 अक्तूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्यप्रदेश के हरदा में आयोजित स्वामित्व योजना के शुभारंभ कार्यक्रम में वर्चुअली शामिल होते हुए देश के 3000 गांवों के 1.71 लाख ग्रामीणों को जमीनों के अधिकार पत्र सौंपते हुए कहा कि स्वामित्व योजना गांवों की जमीन पर बरसों से काबिज ग्रामीणों को अधिकार पत्र देकर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने वाली महत्त्वाकांक्षी योजना है। गौरतलब है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सशक्तिकरण और गांवों में नई खुशहाली की इस महत्त्वाकांक्षी योजना के सूत्र मध्यप्रदेश के वर्तमान कृषि मंत्री कमल पटेल के द्वारा वर्ष 2008 में उनके राजस्व मंत्री रहते तैयार की गई मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास अधिकार योजना से आगे बढ़ते हुए दिखाई दिए हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में 8 अक्तूबर 2008 को श्री पटेल के गृह जिले हरदा के मसनगांव और भाट परेटिया गांवों में पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में 1554 भूखंडों के मालिकाना हक के पट्टे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा ग्रामीण आवास अधिकार पुस्तिका के माध्यम से दोनों गांवों के किसानों और मजदूरों को सौंपे गए थे। इस अभियान से ग्रामीणों के सशक्तिकरण के आशा के अनुरूप सुकूनभरे परिणाम प्राप्त हुए हैं। ऐसे में देशभर के गांवों में स्वामित्व योजना के लागू होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चमकीली स्थिति दिखाई दे सकेगी। हम उम्मीद करें कि सरकार के द्वारा तीन नए कृषि कानूनों की वापसी के बाद जहां सभी किसान सामूहिक रूप से कृषि विकास के लिए हरसंभव योगदान देंगे, वहीं सरकार भी विभिन्न कृषि विकास कार्यक्रमों और खाद्यान्न, तिलहन व दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए लागू की गई नई योजनाओं के साथ-साथ डिजिटल कृषि मिशन के कारगर क्रियान्वयन की डगर पर तेजी से आगे बढ़ेगी।


-डा. जयंतीलाल भंडारी-









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नकारात्मक आंदोलन से हुआ किसानों का अहित

अंततः प्रधानमन्त्री मोदी ने कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान कर दिया। सहसा इस खबर पर यकीन करना कठिन था। क्योंकि नरेंद्र मोदी की इमेज कठोर निर्णयों के लेने एवं उन पर अडिग रहने की है यदि यह निर्णय उनकी समझ में देश हित में हैं।


किसी भी दबाव में मोदी अपने फैसले बदलने के लिए नहीं जाने जाते। कृषि कानूनों की वापसी अत्यधिक निराश जनक है। यह राजनीति की अर्थशास्त्र पर जीत है। मोदी ने कृषि कानूनों की वापसी के समय अपने सम्बोधन में जैसा कहा कि यह कानून सच्ची नीयत से लाए गए और दिए की लौ की तरह सत्य थे परन्तु कुछ लोगों को हम समझा नहीं सके,अतः उनकी भावनाओं को देखते मैं इन तीनों कृषि कानूनों को वापस लेता हूँ।


यह सत्य है कि स्वतंत्रता के बाद पहली बार किसी सरकार ने कृषि क्षेत्र में मूलभूत सुधार लाने एवं किसानों को शोषण एवं बन्धनों से निजात दिलाने के लिए सही कदम उठाते हुए इन तीनों कृषि कानूनों के रूप में महत्वपूर्ण कदम उठाया था जो विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस एवं वामपंथियों के मोदी विरोध के एजेंडे एवं उनकी कुत्सित राजनीति की भेंट चढ़ गया। निकट भविष्य में अब शायद ही कोई कृषि क्षेत्र एवं किसानों की माली हालत सुधारने के लिए कोई क्रान्तिकारी कदम उठाने के विषय में सोचेगा। अपने देश में कृषि क्षेत्र की उत्पादकता एवं आय का स्तर बहुत नीचा है और देश के चौरासी प्रतिशत किसान लघु एवं सीमान्त कृषक हैं जिनके पास दो हेक्टेअर या कम ही भूमि है। इन कृषि कानूनों का लक्ष्य इन छोटी जोत के किसानों का उद्धार ही था जिनके पास न तो निवेश के लिए पूंजी है और न ही इतना विपणन आधिक्य कि वे गरीबी के दुष्चक्र से बाहर आ सकें। सरकारी विपणन मंडियों में बिचौलियों के द्वारा एक लम्बे समय से इनका शोषण सर्वविदित है। इन कृषि कानूनों के माध्यम से किसानों को अपनी फसल कहीं भी बेचने का अधिकार दिया गया और उनके विकल्पों को बढ़ाने के लिए कृषि उपज की खरीद के लिए निजी क्षेत्र को भी भागीदारी देने की व्यवस्था की गई। इन कृषि कानूनों की वापसी का मतलब है कि देश के किसानों को पुनः उन्हीं राज्य मंडियों में बिचौलियों के वर्चस्व के तहत अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होना होगा। अब किसानों के लिए लाभदायक कीमत की कल्पना पुनः एक सपना हो जाएगी।


निजी निवेश को कृषि क्षेत्र में प्रोत्साहित करने के लिए इन कृषि कानूनों में एक संविदा खेती को बढ़ावा देने के लिए था जिसमें किसान फसल के पूर्व निजी उद्योगपतियों से संविदा कर सकते थे और अपनी फसल सीधे बेचकर अच्छी कीमत प्राप्त कर सकते थे। कानून में प्रावधान किए गए थे कि छोटे किसानों का किसी प्रकार से शोषण उद्योगपतियों द्वारा न किया जा सके। यह प्रावधान किए गए कि किसान जब चाहे संविदा से हट सकता है और इसके लिए उस पर कोई दण्ड या जुर्माना नहीं लगाया जा सकता। यह स्पष्ट तौर पर प्रावधान था कि संविदा केवल फसल के लिए होगा। किसानों की भूमि की खरीद बिक्री या पट्टे को संविदा खेती के दायरे से पूर्णतया प्रथक रखा गया था। यदि कृषि कानून लागू होते तो इस निजी निवेश का फायदा किसानों को मिलता परन्तु कानूनों की वापसी ने छोटे किसानों को इस अवसर से वंचित कर दिया।


देश में पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश जैसे दस से अधिक राज्यों में संविदा खेती लागू है परन्तु इनके नियम कानूनों में एकरूपता नहीं है और किसानों के हित भी संरक्षित नहीं हैं। मोदी जी द्वारा लाए गए कानून का उद्देश्य था कि एक ही नियम कानून के तहत देश के सभी किसानों को इसका लाभ मिले परन्तु कृषि कानूनों के विरोधी वामपंथियों एवं कांग्रेस के किसान संगठनों ने झूठा दुष्प्रचार किया कि मोदी किसानों की जमीन अडानी अम्बानी के हाथ देने के लिए यह कानून लाए हैं। इनमें से कोई यह बता सकता है कि जिन राज्यों में दशकों से संविदा खेती है, वहाँ कितनी किसानों की जमीन निजी उद्योगपतियों ने हड़प ली।


इन कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा के समय नरेंद्र मोदी ने जो तर्क दिया कि हमारी तपस्या में ही शायद कोई कमी रही कि हम कुछ लोगों को अपनी बात समझा नहीं सके। एक लोकतंत्र में आप किसी भी नीति या कानून के लिए शत प्रतिशत समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकते। यदि कोई कानून अधिकतर लोगों के हित में है और वह चौरासी प्रतिशत किसानों को फसल बेचने के विकल्प देने के साथ साथ उन्हें निजी निवेश के माध्यम से आय बढ़ाने का अवसर भी प्रदान करता है तो कुछ विपक्षी दलों की किसान संगठनों द्वारा प्रायोजित धरना प्रदर्शन एवं विरोध के समक्ष समर्पण की नीति एक तरह से उन लोगों के लिए मायूस करने वाला कदम है जो प्रधानमन्त्री के द्वारा लाए इन कानूनों से कृषि क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन आने एवं लघु सीमान्त कृषकों के अच्छे दिन आने की उम्मीद कर रहे थे।


यह भी सही है कि कृषि कानूनों के विषय में विपक्ष का दुष्प्रचार इतना अधिक था और इस विषय को एक चुनावी मुदा बनाकर जिस तरह सभी राजनीतिक दल भाजपा एवं मोदी जी को किसान विरोधी साबित करने में लगे थे उससे सरकार के लिए भी चुनौती खड़ी हो गई थी कि वह किस तरह इस दुष्प्रचार से बचे कि उसके लिए किसानों के हितों से अधिक अपनी जिद एवं हठधर्मिता है। अधिकांश किसान इन कानूनों की बारीकियों एवं प्रावधानों को समझते नहीं ,अतः आन्दोलन करने वाले नेताओं एवं विपक्ष के लिए किसानों को झूठे दुष्प्रचार से भी समझाना आसान रहा कि यदि नए कानूनों को लागू किया गया तो किसानों की जमीन चली जाएगी एवं सरकारी मण्डियाँ समाप्त हो जाएगी। किसान निजी उद्योगपतियों की कृपा पर निर्भर हो जाएगा जिनका कृषि उपज की खरीददारी में अहम भूमिका होगी।


निकट भविष्य में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड सहित पांच राज्यों के चुनाव ने सरकार को ऐसा आत्मघाती एवं अदूरदर्शी कदम उठाने के लिए मजबूर किया। ऐसा मैं इस कारण से कह रहा हूँ कि इन कानूनों की वापसी से प्रधानमन्त्री की देश एवं कमजोर व्यक्ति के साथ खड़ा रहने की छवि कमजोर हुई है। इसके साथ ही इन कानूनों की वापसी से एक गलत संदेश यह भी गया कि देश में किसी भी झूठे दुष्प्रचार के सहारे भीड़तंत्र जुटाकर इस सरकार को किसी भी देशहित एवं बहुजन हिताय निर्णय को वापस लेने के लिए मजबूर किया जा सकता है। यदि निकट भविष्य में अनुच्छेद 370 समर्थक एवं सीएए विरोधी पुनः सक्रिय हों तो कोई ताज्जुब नहीं। यही बात सीएए पर भी लागू होती है।


मेरा मानना है कि मोदी जी की छवि देश के जनमानस में यह है कि वह जो भी निर्णय लेंगे वह देशहित में ही होगा। इस स्थिति में मोदी जी द्वारा राकेश टिकैत, हन्नान मुल्ला, योगेन्द्र यादव जैसे तथाकथित किसान नेताओं के दबाव में ऐसा निर्णय लेना समझ से परे है। सरकार वस्तुतः असमंजस की स्थिति में रही। सामान्य किसानों के हितों से बेपरवाह इस तथाकथित किसान आन्दोलन का प्रारम्भ से ही मक़सद किसानों की आड़ में मोदी को घेरना एवं देश में अराजकता फैलाना था जिसका सबसे बड़ा सबूत गणतंत्र दिवस पर सामने आया जब अराजक तत्वों की मदद से इन नेताओं ने दिल्ली में लाल किले तक ट्रैक्टर रैली एवं लाल किले का झण्डा उतारने से लेकर पुलिस पर हमला भी किया। गणतंत्र दिवस पर जो नंगा नाच किया गया वह देश का किसान करने की सोच भी नहीं सकता परंतु अफसोस है कि कानून वापसी के साथ ही घटना के लिए जिम्मेदार लोग मुखर होकर दर्ज मुकदमों की वापसी की मांग उठा रहे हैं।


हकीकत यह है कि यह आन्दोलनकारी अब भी सरकार पर ही सभी घटनाओं की जिम्मेदारी डाल रहे हैं और अब भी आन्दोलन समाप्त कर घर वापसी को तैयार नहीं हैं। अब भी वह चुनाव तक किसी न किसी बहाने आन्दोलन जीवित रखना चाहते हैं और सरकार पर उन्हें आन्दोलनजीवी, खालिस्तानी एवं न जाने क्या क्या कहे जाने का आरोप लगा रहे हैं। एम एस पी के लिए अनिवार्य कानून बनाने को अब वो अपनी मुख्य मांग बताने लगे हैं। अब जब सरकार ने पहल की है और आन्दोलन को समाप्त करने के लिए कृषि क्षेत्र के लिए उठाए गए अपने महत्वपूर्ण कदम पीछे खींच लिए है तो उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि अब आन्दोलन शीघ्रातिशीघ्र खत्म हो। किसान नेताओं को भी प्रधानमन्त्री मोदी के इस कदम की सार्थकता के लिए आन्दोलन को समाप्त करने के विषय में सोचना चाहिए।


-राकेश कुमार मिश्र-

(लेखक अर्थशास्त्री हैं।)





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आंदोलन बनाम किसान-सत्ता का घमासान!

अब किसान आंदोलन समाप्त होना निश्चित है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने कानून वापस लेने की घोषणा कर दी आने वाले सत्र में जिस पर मोहर भी लग जाएगी। देश में खुशी का माहौल है। खुशी का माहौल होना भी स्वाभाविक है। क्योंकि राजनीति में पक्ष और विपक्ष दोनों का होना जरूरी होता है। और ऐसा होता भी है क्योंकि बिना विपक्ष के सत्ता पक्ष निश्चित ही बेलगाम हो जाएगा। पक्ष के कार्यों पर विपक्ष उंगलियां उठाता है तथा अपनी कसौटी पर सरकार के द्वारा लिए गए फैसलों की आलोचना करते हुए उन्हें जन विरोधी साबित करने का पैतरा अपनाता है। राजनीति के क्षेत्र में पक्ष और विपक्ष दोनों का अपना-अपना कार्य है।


किसान कानून बिल वापसी की घोषणा होते ही विपक्षी पार्टियों की वैचारिक जीत हुई जिसे सभी विपक्षी पार्टियाँ अपने-अपने अनुसार गढ़ने का प्रयास कर रही हैं। साथ ही किसानों के प्रति सहानुभूति दिखाकर किसानों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करती हुई दिखाई दे रही हैं। विपक्षी पार्टियों को अवसर भी बैठे बैठाए मिल गया जिसे नकारा नहीं जा सकता। क्योंकि सरकार अगर बिल न लाती तो किसान आंदोलनरत न होते जब किसान आंदोलनरत न होते तो विपक्ष को यह मुद्दा न मिलता। परन्तु यह राजनीति का रूप है यह तो चलता रहेगा। परन्तु विरोध का मुख्य कारण और भी घातक है क्योंकि भाजपा के कुछ नेताओं के द्वारा गैर जिम्मेदाराना रवैया जिस प्रकार से अपनाया गया वह बहुत ही चिंताजनक है। कुछ नेताओं के द्वारा जिस प्रकार से मुँह खोला गया वह जगजाहिर है। किसानों को कभी खालिस्तानी तो कभी आंदोलन जीवी कहा गया। लाल किले पर हुए अमर्यादित उपद्रव को भी देश ने देखा जिसका दृश्य अत्यंत दुखद है। भले ही इसके पीछे कोई भी व्यक्ति अथवा रूप हो परन्तु लालकिला हमारी राष्ट्रीय धरोहर है। इसका हृदय की आंतरिम आत्मा से सदैव सम्मान करना चाहिए। न कि देश के गौरव एवं मान-सम्मान के प्रतीक का इस तरह राजनीतिक दुष्प्रयोग। इस प्रकार का राजनीतिक दुरुपयोग किया जाना अत्यन्त घिनौना कार्य है। ऐसा कदापि नहीं करना चाहिए। सियासत, सत्ता, राजनीति होती रहेगी। आंदोलन भी सत्ता का ही एक हिस्सा है। जब सरकार बनेगी, फैसले लेगी तो सहयोग तथा विरोध दोनों होते रहेंगे। हमें राष्ट्र के गौरव को प्रथमिकता देनी चाहिए। राजनीति के भी मानक तय होने चाहिए। 


परन्तु किसान बिल वापसी पर जहाँ विपक्ष ढ़ोल-नगाड़े बजा रहा है। सरकार की नीति को फेल होने की बात विपक्ष कह रहा है। विपक्ष की खुशी यह ज्यादा दिन टिकने वाली नहीं है। विपक्ष को यह समझ लेना चाहिए कि सरकार ने किस उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह कार्य किया है। सरकार के द्वारा उठाए गए कदम को समझने की जरूरत है। किसी भी क्षेत्र में बुद्धिजीवियों के द्वारा अधिक उत्सुकता हानिकारक साबित हो सकती है। मैं अपने अनुभव तथा समझ के अनुसार स्पष्ट कर दूँ कि सरकार के द्वारा उठाया गया यह कदम एक तीर से कई निशाने को साधता हुआ दिखाई दे रहा है। जिसके परिणाम भविष्य में धरातल पर एक के बाद एक दिखाई देंगे।


राजनीति में जहाँ तक मेरी समझ है तो मेरी समझ के अनुसार सरकार ने बिल वासपी का फैसला लेकर उत्तर प्रदेश के चुनाव में विपक्षी पार्टियों के हाथ से मुद्दा छीन लिया। यह अलग बात है कि बिल भाजपा सरकार के द्वारा ही लाया गया और भाजपा सरकार ने ही बिल को वापस लिया जिससे नीति पर प्रश्न चिन्ह विपक्ष लगा सकता है। विपक्ष के द्वारा नीति पर प्रश्न चिन्ह उठाकर उसे चुनावी मुद्दा बनाना स्वाभाविक है। विपक्ष बिलकुल यह कह सकता है कि सरकार ने चुनाव में हार के डर से अपने कदमों को पीछे खीच लिया। परन्तु यह भी सत्य है कि सरकार के द्वारा उठाए गए कदम से भाजपा का वोट बैंक अब बिखरने से बच सकता है। खास करके स्वयं भाजपा पार्टी के अंदर भी इस बिल को लेकर दबी जुबन में एक स्वर उठ रहा था निश्चित ही अब उस पर भी पूर्ण विराम लग गया। अब उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा मजबूती के साथ जाएगी। ऐसा निश्चित है।


इस बिल के वापसी को लेकर भाजपा का निकट भविष्य में सबसे बड़ा दाँव यह होने जा रहा है। जिसका मुख्य टारगेट पंजाब चुनाव में दिखाई देगा। पंजाब के चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने एक बड़ा फैसला लिया है। भापजा कांग्रेस के हाथ से पंजाब को मुक्ति दिलाकर कमल खिलाना चाह रही है। जिसमें सिख समुदाय मुख्य भूमिका में है। बिना बिल वापसी के सिखों को अपने साथ जोड़ा नहीं जा सकता साथ ही नए गठबंधन के रूप में अगर पंजाब में भाजपा को प्रवेश करना है। तो सिख समुदाय को साथ लेकर चलना पंजाब की सियासत में बहुत ही आवश्यक है बिना सिख समुदाय के पंजाब में कमल खिला पाना भापजा के लिए पूरी तरह से नामुमकिन है। इसलिए देश के प्रधानमंत्री ने सही टाईमिंग की प्रतीक्षा की। टाईमिंग के अनुसार आने वाले समय का इंतेजार किया। सिख समुदाय के सबसे बड़े दिन प्रकाश पर्व के दिन यह घोषणा की जिससे के संदेश पूरी तरह से सही टाईमिंग के साथ सही जगह तक पहुँच जाए। निश्चित प्रधानमंत्री के द्वारा प्रयोग की गई हुई टाईमिंग पूरी तरह से साफ एवं स्पष्ट है जिसे समझने की आवश्यकता है। इसलिए विपक्ष को हो हल्ला करने के साथ-साथ बुद्धि का भी प्रयोग करना चाहिए अन्यथा उत्तर प्रदेश तथा पंजाब के चुनाव में विपक्ष की रणनीति फेल होना तय है। क्योंकि अधिक उत्साह एवं जोश अधिक दिन टिकने वाले नहीं होते। 


नाराज पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपनी अलग लाईन खींच ली है। जिसमें कैप्टन तथा भाजपा की अपनी जरूरत एवं सियासी हित सामने हैं। कैप्टन अकेले दम पर कांग्रेस को पंजाब की सत्ता से पूरी तरह से बेदखल नहीं कर सकते क्योंकि कैप्टल कांग्रेस से निकलकर आए हैं। तो कैप्टन जो भी सियासी सेंधमारी करेंगे वह सेंधमारी कांग्रेस पार्टी में कर पाएंगे। अगर भाजपा की बात की जाए तो भाजपा भी अकाली के साथ जाकर पंजाब में अपनी किस्मत आजमा चुकी है। इसलिए भाजपा को भी पंजाब में अमरेन्दर सिंह के रूप में एक बड़ा चेहरा मिलता हुआ दिखाई दे रहा है। जोकि पंजाब के चुनाव में सबसे बड़ा टर्निंग प्वाईन्ट हो सकता है। जिसके कई रूप हैं एक बिन्दु तो यह कि कैप्टन सरदार बिरादरी से आते हैं। दूसरा यह कि कैप्टन भाजपा का मुख्य मुद्दा राष्ट्रवाद की गणित पर फिट बैठते हैं। तीसरा सबसे बड़ा मुद्दा यह कि कैप्टन एक बड़ा चेहरा हैं जिनकी छवि पंजाब में एक धाकड़ मुख्यमंत्री के रूप में है। चौथा सबसे बड़ा टर्निगं प्वाइंट यह है कि कैप्टन मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस से आते हैं। जोकि पंजाब की मौजूदा सरकार में है। इसलिए कैप्टन भाजपा के लिए प्रत्येक बिंदु पर पूरी तरह से फिट बैठते हुए दिखाई दे रहे हैं। अमरेन्दर पंजाब के सियासी वातावरण में भाजपा के लिए पूरी तरह से फिट बैठेंगे।    


अवगत करा दें कि जिस दिन कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि वह कांग्रेस छोड़ रहे हैं लेकिन भाजपा में शामिल नहीं होंगे, उसी दिन यह संकेत मिल गया था कि अब कृषि कानूनों पर मोदी सरकार का पुनर्विचार करना स्वाभाविक है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के पंजाब का मुख्यमंत्री रहते हुए खुद भाजपा ने उन पर आरोप लगाया था कि दिल्ली की सीमाओं पर पंजाब के किसानों को भेजने के पीछे कैप्टन ही हैं। इसलिए भाजपा के कृषि कानूनों की वापसी के पीछे कैप्टन को अगर खुल कर श्रेय दिया जाए तो हैरानी नहीं होगी। इसी मुद्दे पर बीजेपी से अलग हुए अकाली दल के लिए भी अब भाजपा के साथ वापस आने में ज्यादा परेशानी नहीं होगी, खासतौर से चुनाव के बाद जरूरत पड़ने पर भाजपा अकाली दल के साथ भी आसानी से पुनः जा सकती है। क्योंकि सियासत में कोई न दुश्मन होता है और न ही कोई दोस्त। सियासत में सारा खेल समीकरण पर ही निर्भर करता है। इसलिए भाजपा कैप्टन अमरेन्दर सिंह के साथ पुनः अकाली दल के साथ आसानी के साथ जा सकती है जिससे पंजाब की राजनीति में भारी बदलाव दिखाई दे रहा है।


अतः प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा किसान बिल वापसी के क्षेत्र में उठाया गया यह कदम उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पंजाब की धरती पर नई बिसात बिछाता हुआ दिखाई दे रहा है। जिसे समझने की आवश्यकता है। क्योंकि राजनीति में जब बड़े लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं तो निश्चित ही छोटे लक्ष्यों को दरकिनार करना पड़ता है। इसलिए प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पंजाब का लक्ष्य निर्धारित कर दिया है। किसान बिल वापसी से कैप्टन अमरेंदर सिंह को भाजपा के साथ जनता के बीच जाने में किसी तरह की हिचक नहीं होगी। साथ ही अकाली दल भी गठबंधन का पुनः हिस्सा बन सकता है। 

-सज्जाद हैदर-

(वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्र चिंतक)






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देशव्यापी हुआ अश्लीलता का कारोबार

बच्चों के यौन शोषण और उससे संबंधित सामग्री को सोशल मीडिया पर परोसने और प्रसारित करने के मामले में 83 लोगों के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो ने बड़ी कार्यवाही की है।


देश के 14 राज्यों के 76 ठिकानों पर सघन तलाशी अभियान चलाया गया। इस मुहिम से पता चला है कि लगभग पूरे देश में अश्लीलता का यह जंजाल नशे के कारोबार की तरह फैल गया है। यही नहीं अनेक महाद्वीपों में फैले सौ देशों के नागरिक इस गोरखधंधे में शामिल हैं। शहर तो शहर मध्य-प्रदेश के डबरा तहसील के ग्राम अकबई में भी बाल यौन शोषण से जुड़ी अश्लील फिल्में बनाने का कारोबार फैल चुका है। यह अत्यंत चिंता का विषय है। 31 सदस्यों वाला व्हाट्सएप समूह जांच का मुख्य केंद्र बिंदु है। इन आरोपियों को सूचीबद्ध तो कर लिया है, किंतु ताकतवर होने के कारण कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। यही लोग यौन फिल्में बनाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करते थे, निर्माताओं को शुल्क देने के साथ सामग्री को प्रसारित व साझा करने का काम भी करते थे।


पोर्न फिल्में बनाने और उन्हें अनेक सोशल साइट व एप पर अपलोड करने के मामले में पिछले दिनों प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा को भी मुंबई पुलिस ने हिरासत में लिया था। वे अश्लील फिल्में बनाने, बेचने और इससे धन कमाने के धंधे में शामिल थे। तीन महिलाओं ने उनके विरुद्ध शिकायत की थी। किराए के बंगले में राज कुंद्रा की कंपनी और उनके सहयोगी फिल्में बनाते थे। कुंद्रा की कंपनी ने एप बनाया और इसे ब्रिटेन में एक रिश्तेदार के नाम से रजिस्टर्ड कंपनी केनरिन को बेच दिया था। कुंद्रा के साथ काम करने वाली कुछ लड़कियां अंतरराष्ट्रीय पोर्नोग्राफी गिरोह के शिकंजे में भी पाई गई थीं। इस मामले में कुंद्रा को पोर्न फिल्म रैकेट का मुख्य साजिशकर्ता माना है। इससे पता चलता है कि फिल्म, टीवी, सोशल मीडिया और आईटी कंपनियों की अनेक हस्तियां इस नीले कारोबार से जुड़ी हैं।


मोबाइल व कंप्यूटर पर इंटरनेट की घातकता का दायरा निरंतर बढ़ रहा है। कुछ समय पहले सीबीआई ने बच्चों के अश्लील वीडियो और फोटो बेचने वाले एक अंतरराष्ट्रीय रैकेट का पर्दाफाश किया था। इस मामले में मुंबई के एक टीवी कलाकार को भी गिरफ्तार किया गया था। जांच एजेंसी के अनुसार आरोपी ने अमेरिका, यूरोप और दक्षिण एशियाई देशों में एक हजार से अधिक लोगों को ग्राहक बनाया हुआ था। वह अश्लील सामग्री को सोशल साइट इंस्टाग्राम पर भेजकर मोटी कमाई करता था। किशोर बच्चों को अपने जाल में फंसाने के लिए फिल्मी स्टार के रूप में पेश आता था। ये गतिविधियां ऑनलाइन जुड़कर अंजाम तक पहुंचाई जाती थी। सीबीआई ने इसे पास्को एक्ट व अन्य धाराओं के अंतर्गत गिरफ्तार किया है। दिल्ली में भी इसी प्रकार की घटी एक घटना में 27 किशोर दोस्त सोशल मीडिया के इंस्टाग्राम पर एक समूह बनाकर अपने साथ पढ़ने वाली छात्राओं के साथ सामूहिक बलात्कार की षड्यंत्रकारी योजना बना रहे थे। ये सभी दक्षिण दिल्ली के महंगे विद्यालयों में पढ़ते थे। 11वीं व 12वीं के छात्र होने के साथ अति धनाढ्य परिवारों से थे। साफ है, स्मार्ट मोबाइल में इंटरनेट और सोशल साइट्स बच्चों का चरित्र खराब करने का बड़ा माध्यम बन रही हैं और इस कारोबार में सेलिब्रिटीज शामिल हैं।


अंतर्जाल की आभासी व मायावी दुनिया से अश्लील सामग्री पर रोक की मांग सबसे पहले इंदौर के जिम्मेदार नागरिक कमलेश वासवानी ने सर्वोच्च न्यायालय से की थी। याचिका में दलील दी गई थी कि इंटरनेट पर अवतरित होने वाली अश्लील वेबसाइटों पर इसलिए प्रतिबंध लगना चाहिए, क्योंकि ये साइटें स्त्रियों एवं बालकों के साथ यौन दुराचार का कारण तो बन ही रही हैं, सामाजिक कुरूपता बढ़ाने और निकटतम रिश्तों को तार-तार करने की वजह भी बन रही हैं। इंटरनेट पर अश्लील सामग्री को नियंत्रित करने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं होने के कारण जहां इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, वहीं दर्शक संख्या भी बेतहाशा बढ़ रही है। ऐसे में समाज के प्रति उत्तरदायी सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह अश्लील प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण की ठोस पहल करें। लेकिन पिछले 15 साल से इस समस्या का कोई हल नहीं खोजा जा सका है।


वस्तुस्थिति इंटरनेट पर अश्लीलता का तिलिस्म भरा पड़ा है। वह भी दृश्य, श्रव्य और मुद्रित तीनों माध्यमों में। ये साइटें नियंत्रित या बंद इसलिए नहीं होती, क्योंकि सर्वरों के नियंत्रण कक्ष विदेशों में स्थित हैं। ऐसा माना जाता है कि इस मायावी दुनिया में करीब 20 करोड़ अश्लील वीडियो एवं क्लीपिंग चलायमान हैं, जो एक क्लिक पर कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल, फेसबुक, ट्यूटर, यूट्यूब और वाट्सअप की स्क्रीन पर उभर आती हैं। लेकिन यहां सवाल उठता है कि इंटरनेट पर अश्लीलता की उपलब्धता के यही हालात चीन में भी थे। परंतु चीन ने जब इस यौन हमले से समाज में कुरूपता बढ़ती देखी तो उसके वेब तकनीक से जुड़े अभियतांओं ने एक झटके में सभी वेबसाइटों को प्रतिबंधित कर दिया। गौरतलब है, जो सर्वर चीन में अश्लीलता परोसते हैं, उनके ठिकाने भी चीन से जुदा धरती और आकाश में हैं। तब फिर यह बहाना समझ से परे है कि हमारे इंजीनियर इन साइटों को बंद करने में क्यों अक्षम साबित हो रहे हैं ? चीन यही नहीं रुका, उसने अब गूगल की तरह अपने सर्च-इंजन बना लिए हैं। जिन पर अश्लील सामग्री अपलोड करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।


इस तथ्य से दो आशंकाएं प्रगट होती हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में एक तो हम भारतीय बाजार से इस आभासी दुनिया के कारोबार को हटाना नहीं चाहते, दूसरे इसे इसलिए भी नहीं हटाना चाहते क्योंकि यह कामवर्धक दवाओं व उपकरणों और गर्भ निरोधकों की बिक्री बढ़ाने में भी सहायक हो रहा है। जो विदेशी मुद्रा कमाने का जरिया बना हुआ है। कई सालों से हम विदेशी मुद्रा के लिए इतने भूखे नजर आ रहे हैं कि अपने देश के युवाओं के नैतिक पतन और बच्चियों व स्त्रियों के साथ किए जा रहे दुष्कर्म और हत्या की भी परवाह नहीं कर रहे ? अमेरिका, जापान और चीन से विदेशी पूंजी निवेश का आग्रह करते समय क्या हम यह शर्त नहीं रख सकते कि हमें अश्लील वेबसाइटें बंद करने की तकनीक और गूगल की तरह अपना सर्च-इंजन बनाने की तकनीक दे ? लेकिन दिक्कत व विरोधाभास यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन, कोरिया और जापान इस अश्लील सामग्री के सबसे बड़े निर्माता और निर्यातक देश हैं। लिहाजा वे आसानी से यह तकनीक हमें देने वाले नहीं है। गोया, यह तकनीक हमें ही अपने स्रोतों से विकसित करनी होगी।


ब्रिटेन में सोहो एक ऐसा स्थान है, जिसका विकास ही पोर्न वीडियो फिल्मों एवं पोर्न क्लीपिंग के निर्माण के लिए हुआ है। यहां बनने वाली अश्लील फिल्मों के निर्माण में ऐसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने धन का निवेश करती हैं, जो कामोत्तेजक सामग्री, दवाओं व उपकरणों का निर्माण करती हैं। वियाग्रा, वायब्रेटर, कौमार्य झिल्ली, कंडोम, और सैक्सी डॉल के अलावा कामोद्दीपक तेल बनाने वाली ये कंपनियां इन फिल्मों के निर्माण में बड़ा पूंजी निवेश करके मानसिकता को विकृत कर देने वाले कारोबार को बढ़ावा दे रही हैं। राज कुंद्रा की कंपनी भी ब्रिटेन में पोर्न फिल्में बेच रही थी। यह शहर 'सैक्स उद्योग' के नाम से ही विकसित हुआ है।


बाजार को बढ़ावा देने के ऐसे ही उपायों के चलते ग्रीस और स्वीडन जैसे देशों में क्रमशः 89 और 53 फीसदी किशोर निरोध का उपयोग कर रहे हैं। यही वजह है कि बच्चे नाबालिग उम्र में काम-मनोविज्ञान की दृष्टि से परिपक्व हो रहे हैं। 11 साल की बच्ची राजस्वला होने लगी है और 13-14 साल के किशोर कमोत्तेजाना महसूस करने लगे हैं। इस काम-विज्ञान की जिज्ञासा पूर्ति के लिए अब वे फुटपाथी सस्ते साहित्य पर नहीं, इंटरनेट की इन्हीं साइटों पर निर्भर हो गए हैं और उनकी मुट्ठियों में मोबाइल थमाकर हम गर्व का अनुभव कर रहे हैं।


-प्रमोद भार्गव-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)





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गणित गजब लेकिन सियासत अजब!

वाह रे सियासत तेरा रूप निराला तेरी गणित अजब और सियासत गजब। आजकल उत्तर प्रदेश की धरती पर सियासत का चित्र बड़ी ही सरलता के साथ देखा जा सकता। क्योंकि उत्तर प्रदेश की धरती पर सियासी शंखनाद हो चुका। सभी सियासतदान अपने-अपने हुनर आजमा रहें हैं। क्योंकि सत्ता की चेष्टा और कुर्सी का सुख भला कौन नेता नहीं भोगना चाहेगा बस इसी क्रम में अब नई-नई रूप रेखा गढ़ी जानी आरम्भ हो चुकी है। जिसमें कोई घोषणाएं कर रहा है तो कोई भविष्य की रूप रेखा की योजना का चित्र झोले में टांगकर जनता के बीच घूम रहा है। जिसे जनता भी बड़े ध्यानपूर्वक सभी सियासी फार्मूलों को निहार रही है।


मजे की बात तो यह कि आज के राजनेता किसी वैज्ञानिक से कम नहीं हैं। क्योंकि वह अनेकों प्रकार की खोज करते रहते हैं। सियासत की प्रयोगशाला में ऐसे-ऐसे वैज्ञानिकों का उदय हो गया है जोकि प्रयोगशाला में बैठकर भरपूर प्रयोग करते हैं। अब यह प्रयोग कितना सफल होगा यह अलग बात है। परन्तु प्रयोगशाला के वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में बनाए गए जादूई मुद्दों को सियासी युद्ध के मैदान में झोंकने के लिए आतुर रहते हैं। तथा मौका पाते ही लपकर झोंक देते हैं। बाकी काम क्षमता पर निर्भर करता है। यदि मुद्दा रूपी उपकरण जोरदार होगा तो वह अपनी क्षमता के अनुसार विरोधियों की रणनीति को धाराशायी करेगा। अन्यथा फुस हो जाएगा। 


मैं प्रयोगशाला शब्द का प्रयोग क्यों कर रहा हूँ यह समझने की जरूरत है। क्योंकि प्रयोगशाला तथा धरातल में आकाश एवं पृथ्वी से भी अधिक दूरी है। प्रयोगशाला में गढ़े गए मुद्दे धरातल पूरी तरह टिक पाएं यह बड़ा सवाल है। क्योंकि सियासत के धरातल तथा प्रयोगशाला की रूप रेखा एक दूसरे के ठीक विपरीत है। क्योंकि वैज्ञानिकीय व्यवस्था जोकि प्रयोगशाला के बंद कमरों की रूप रेखा पर आधारित होती है वहीं सियासत की दुनिया धरालत पर पूरी तरह से आधारित होती है। क्योंकि सियासत का सरोकार आम जनता से सीधा-सीधा होता है। जिसमें जनता के मुद्दें उसकी मूल समस्या से जुड़े होते हैं। अब अगर जनता से मत अपने पक्ष में लेना है तो जनता को अपने ओर आकर्षित करना होगा। अब यह आकर्षण का केन्द्र प्रयोगशाला वाले वैज्ञानिक पर निर्भर करता है वह किन-किन मानकों को आधार मानकर सियासत की रुप रंग एवं आधार को समझ पाया है। क्योंकि सियासत के क्षेत्र में अधिकतर वैज्ञानिक फेल हो जाते हैं। इसका बहुत बड़ा कारण है। इस क्षेत्र का मूल कारण यह है कि इस सियासी ज्ञान की कोई भी थ्योरी लिखित रूप में नहीं होती। न ही किसी प्रकार का कोई फार्मूला निर्धारित होता है जिसके पढ़ लेने से अथवा रट लेने से कोई भी सियासतदान सियासी वैज्ञानिक सफलता की सीढ़ीयों पर चढ़ जाए ऐसा कदापि नहीं है। इसीलिए अधिकतर बंद कमरों वाले लोग सियासत के क्षेत्र में फेल हो जाते हैं।    यदि कोई राजनेता प्रयोगशाला रूपी बंद कमरों से बाहर निकलकर धरातल की पगडंडियों पर गतिमान होता है तो वह जनता के वास्तविक मुद्दों से भलिभाँति अवगत हो पाता है। क्योंकि राजनिति की पुस्तक पढ़कर तथा पॉलिटिकल साईन्स में डिग्री प्राप्त कर लेने से कोई भी राजनेता नहीं बन सकता। यह सत्य है। राजनीति में यदि सफल होना है तो बंद कमरों से बाहर निकलना होगा। बड़ी-बड़ी गाड़ियों से नीचे उतरना होगा। संकरी गलियों की ओर गतिमान होना पड़ेगा। क्योंकि सत्ता की चमक-धमक एवं चकाचौंध का रास्ता उन बंद गलियों से हो करके ही गुजरता है जहाँ तक गाड़ियों की पहुँच संभव ही नहीं है। सत्ता की ऊँची कुर्सी का पैर गरीब-वंचित तथा मजदूर वर्ग पर ही टिका होता है जहाँ तक प्रयोगशाला रूपी राजनेता सीधे नहीं पहुँच पाते।


उत्तर प्रदेश के चुनाव में एक नया मुद्दा बहुत ही चरम पर इस बार नजर आने वाला है वह यह कि इस बार कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश के चुनाव में महिलाओं को टिकट प्रदान करने में 40 प्रतिशत की भागीदारी का खाका तैयार किया है। अब देखना यह है कि क्या यह खाका कुछ रंग रूप दिखाएगा अथवा एक सगूफा ही साबित होगा। यह तो समय ही बताएगा कि उत्तर प्रदेश की जनता इस फार्मूले को किस प्रकार से लेती है। क्योंकि यह उत्तर प्रदेश है। यहाँ कि राजनीति दूसरे प्रदेशों की राजनीति से पूरी तरह से भिन्न है। क्योंकि महिला समर्थन की रूप रेखा बिहार की धरती पर नितीश कुमार ने भी अपनाई थी जोकि शाराब बंदी के रूप में थी जोकि सफल रही। बिहार की राजनीति में महिला मतदाता को साधने के लिए नितीश कुमार ने महिला मतदाता कार्ड खेला था। उसके बाद बंगाल की धरती पर भी यह कार्ड खेला गया। जिसमें तृणमूल तथा भाजपा के बीच महिला मतदाता को साधने का प्रयास किया गया जिसकी रस्साकशी बंगाल चुनाव में खूब देखने को मिली। जिसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा बंगाल की धरती पर नंबर दो कि पार्टी बनने मे कामयाब रही और तृणमूल कांग्रेस सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने में सफल रही। परन्तु बिहार तथा बंगाल से उत्तर प्रदेश का वातावरण पूरी तरह से भिन्न है।


उत्तर प्रदेश की राजनीति को यदि बारीक नजरों से समझने एवं परखने का प्रयास किया जाए तो कई  चित्र उभर कर सामने आते हैं। जोकि अन्य राज्यों से उत्तर प्रदेश को अलग करते हुए दिखाई देते हैं। खास करके उत्तर प्रदेश का चुनाव जाति आधारित धुरी पर होने की आशंका बहुत अधिक होती है क्योंकि राजनेताओं के द्वारा इस प्रकार से मुद्दों को गढ़ कर तैयार किया जाता है जिससे कि चुनाव जातीय धुरी पर जाकर टिक जाता है। खास करके जब कि इस बार का चुनाव तो और नए प्रयोग से गुजरेगा तो इस बार महिला मतदाता क्या अपने आपको को इस ज्वलन्त वातावरण से अलग कर पाएंगी...? यह बड़ा सवाल है।


क्योंकि जातीय धुरी पर आधारित चुनाव से महिलाओं का अलग क्षेत्र में जाकर मतदान करना अपने आपमें किसी बड़े बदलाव से कम नहीं होगा। जोकि एक नए संघर्ष का रूप होगा। तो क्या महिला मतदाता अपने परिवारिक पुरुष से इतर जाकर अपनी अलग राय एवं पहचान बना पाएंगी...? यह बड़ा सवाल है। क्योंकि उत्तर प्रदेश की सियासी हकीकत यह है कि यह प्रदेश अधिकतर ग्रामीण क्षेत्र है। अन्य प्रदेश के अनुपात में यहाँ कि महिलाएं अपने आपको पुरुषों से अलग नहीं ले जाती। यह किसी से भी छिपा हुआ नहीं है।


दूसरा बिन्दु यह है कि जब चुनाव जातीय आधार पर आधारित हो जाएगा जोकि नेताओं के द्वारा गढ़कर तैयार किया जाएगा जिसमें सियासी हवाएं गर्म की जाएंगी। यह किसी से भी छिपा हुआ नहीं है। खास करके उत्तर प्रदेश के राजनेता इसमें खूब माहिर हैं। तो क्या उस गर्म हवाओं से महिला मतदाता अपने आपको अलग रख पाने की क्षमता में होगी...? यह भी एक बड़ा सवाल होगा जोकि आने वाले समय में दिखाई देगा।


तीसरा बिन्दु यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अधिकतर महिला फिर चाहे वह प्रत्यासी हो अथवा मतदाता अपने आपसे अकेले स्वतन्त्र रूप से फैसला कितना ले पाती है यह भी किसी से भी छिपा हुआ नहीं है। जब इस प्रकार की रूप रेखा जिस प्रदेश की होगी वहाँ पर महिला प्रत्यासी अधिक मात्रा में उतारकर क्या कोई बड़ा बदलाव हो पाएगा इसके ठोस दृश्य नहीं दिखाई देते। क्योंकि जब तक महिला अपने आपमें डिसीजन मेकर न हो तब तक सियासत की दुनिया में यह कह पाना अपने आपमें पूरी तरह से सही नही होगा।


अर्थात कांग्रेस का यह चुनावी दाँव कि महिला प्रत्यासियों को इस बार 40 प्रतिशत की साझेदारी दी जाएगी यह एक नया प्रयोग होगा। क्योंकि उत्तर प्रदेश का चुनावी वातावरण इस दिशा में चलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा। अभी चुनाव तो दूर है जोकि आने वाले नए वर्ष में होगा लेकिन उसकी बानगी अभी से दिखाई देने लगी है। जिस चुनाव में जिन्ना और जैम जैसे मुद्दे सियासी बोतल से बाहर खींचकर लाए जाएंगे तो उस चुनाव की रूप रेखा को समझ लेना चाहिए। प्रदेश के राजनेता इस चुनाव को किस क्षेत्र में ले जाना चाहते हैं। यह पूरी तरह से साफ है। इसलिए कांग्रेस के द्वारा यह दाँव जोकि महिला उम्मीदवार को 40 प्रतिशत की भागीदारी के रूप में लेकर आना यह अपने आपमें एक प्रयोगशाला वाला मुद्दा दिखाई दे रहा है न कि धरातल पर स्थापित होने वाला मुद्दा। इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस ने एक नई और अच्छी शुरुआत की है जिसकी उत्तर प्रदेश की धरती को जरूरत है। लेकिन फिलहाल यह मुद्दा आने वाले चुनाव में जमीन पर टिकता हुआ नहीं दिखाई दे रहा। क्योंकि चुनाव का दृश्य स्पष्ट रुप से दिखाई दे रहा है।


-सज्जाद हैदर-

(वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्र चिंतक।)

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