पाकिस्तानी साजिश का पर्दाफाश आवश्यक

कश्मीर घाटी में आतंकवादियों द्वारा ताबड़तोड़ हत्याएं कर जिस तरीके से आतंक का माहौल पैदा किया जा रहा है, बेहद शर्मनाक है। हाल ही में जो यहां हत्याएं की गई हैं, उसमें प्रवासी मजदूरों अथवा अन्य प्रदेश से आए लोगों को टारगेट किया गया है। आतंकवादियों का इसके पीछे मुख्य उद्देश्य बाहरी लोगों में खौफ पैदा करना और विकास की धारा को बेपटरी करना है।


निस्संदेह, यह पाकिस्तान की बौखलाहट का नतीजा है। चूंकि जम्मू-कश्मीर में धारा 370 समाप्त करने के बाद जिस तरीके वहां अमन चैन बहाल हो रहा है, वह पाकिस्तान को रास नहीं आ रहा। हत्याओं के पीछे लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिद्दीन और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट-जम्मू कश्मीर जैसे आतंकी संगठनों का हाथ रहा है। स्पष्ट तौर पर इनको पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त है।


जैसा कि विदित है कि 5 अगस्त, 2019 जम्मू-कश्मीर के लिए ऐतिहासिक दिन सिद्ध हुआ। इसी दिन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और धारा 35-ए को समाप्त कर दिया गया था। इसी के साथ जम्मू-कश्मीर को जो वर्ष 1950 में भारतीय संविधान के अंतर्गत विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था, उसका अंत हो गया और यह एक देश, एक विधान और एक संविधान के दायरे में आ गया था। उसके पश्चात भारत सरकार ने स्थानीय लोगों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए विकास संबंधी कार्यों की रणनीति बनाई थी।


लेकिन पाकिस्तान को भारत का यह निर्णय शुरू से ही नहीं पच रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ जमकर दुष्प्रचार किया था। उन्होंने कहा था कि अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा और वहां नरसंहार शुरू हो जाएगा। लेकिन जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद सुरक्षा बलों ने जिस तरीके से आतंकियों का सफाया और दिशा विहीन हुए लोगों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए अभियान चलाया, वह काबिले तारीफ है। लेकिन पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में शांति की बहाली बिलकुल नहीं चाहता। यही कारण है कि उसने वहां अशांति फैलाने की रणनीति बदल दी है। अब उसने प्रवासी मजदूरों और अन्य प्रदेशों के प्रवासियों को टारगेट करना शुरू कर दिया है। अनेक प्रवासी मजदूर डर कर यहां से पलायन कर रहे हैं।


गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में वर्तमान में चल रही अनेक विकास परियोजनाओं में 90 फीसदी से अधिक प्रवासी मजदूर निर्माण कार्यों में लगे हुए हैं। अकेले कश्मीर घाटी पांच लाख प्रवासी मजदूर कार्यरत हैं। जम्मू-कश्मीर में विभिन्न राज्यों से तीन-से चार लाख मजदूर प्रत्येक वर्ष काम के लिए घाटी जाते हैं। उनमें से अधिकांश सर्दियों की शुरुआत से पहले चले जाते हैं, जबकि कुछ साल भर वहीं रहकर काम करते हैं। उनमें बिहार और उत्तर प्रदेश से आए मजदूरों की संख्या सर्वाधिक होती है।


पाकिस्तान की बौखलाहट का एक प्रमुख कारण यह है कि जम्मू कश्मीर को जो पहले विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त था, समाप्त हो चुका है। पहले वहां लोगों के पास दोहरी नागरिकता-जम्मू कश्मीर और भारत की थी, लेकिन अब देश के बाकी लोगों की तरह वहां भी एक ही नागरिकता है। इसके अलावा पहले यह प्रावधान था कि जम्मू कश्मीर की कोई युवती भारत के किसी राज्य के युवक से शादी करती है तो उसका उसके परिवार की संपत्ति में अधिकार खत्म हो जाता था और उसके बच्चों की भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता खत्म हो जाती थी, पर अब ऐसा नहीं है।


यही नहीं, जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा था, लेकिन अब तिरंगा ही पूरे जम्मू-कश्मीर का भी राष्ट्रीय ध्वज है। पहले जम्मू-कश्मीर में न अनुच्छेद 356 लागू था यानी वहां सरकार भंग होने पर राष्ट्रपति शासन नहीं लग सकता था और न ही वह अनुच्छेद 360 के दायरे में आता था, जिसके तहत राष्ट्रपति आर्थिक आपातकाल लागू करते हैं। लेकिन अब यहां पर अब भारत का संविधान पूरी तरह से लागू है।


दिलचस्प बात यह है कि पहले दूसरे राज्य के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते थे, लेकिन अब ये कानून नहीं है। अब यहां पर आरटीआई कानून लागू है और जहां पहले जम्मू-कश्मीर में सरकार का कार्यकाल 6 साल का होता था, अब वहां भी 5 साल के बाद चुनाव कराने का प्रावधान है। इसके अलावा पहले लद्दाख जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था, लेकिन अब लद्दाख अलग से केंद्र शासित प्रदेश है ।


यह सब ऐसे बदलाव हैं जिनको पाकिस्तान और उसके द्वारा समर्थित आतंकी संगठन पचा नहीं पा रहे हैं। सुरक्षा बलों की अत्यंत सख्ती के चलते उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए प्रवासी मजदूरों अथवा बाहरी प्रदेशों से आए निर्दोष लोगों का नरसंहार कर उनके अंदर खौफ पैदा करने की घिनौनी साजिश चल रही है। पाकिस्तान का उद्देश्य है कि जम्मू-कश्मीर एक बार पुन: अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन जाए। ऐसे में हर राजनैतिक दल और समाज के हर समुदाय को अपने निहितार्थों को त्यागकर देश और समाज हित में पाकिस्तान और आतंकियों के दुष्चक्र का पर्दाफाश करना चाहिए। इसके लिए न केवल हर नागरिक में सजगता जरूरी है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपना यथोचित योगदान कर पाकिस्तान और आतंकियों के मंसूबों को विफल करना चाहिये।


–अनिल निगम-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)




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अमित शाह की कश्मीर यात्रा

गृहमंत्री अमित शाह कश्मीर के दौर पर गए, यह अपने आप में बड़ी बात है। आजकल कश्मीर से जैसी खबरें आ रही हैं, वैसे माहौल में किसी केंद्रीय नेता का वहां तीन दिन का दौरा लगना काफी साहसपूर्ण कदम है। जो जितना बड़ा नेता होता है, उसे अपनी जान का खतरा भी उतना ही बड़ा होता है। अमित शाह ने ही गृहमंत्री के तौर पर दो साल पहले धारा 370 को खत्म किया था और कश्मीर को सीधे दिल्ली के नियंत्रण में ले आए थे।


उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने बदले हुए कश्मीर के नक्शे में कई नए रंग भरे और शासन को जनता से सीधे जोड़ने के लिए रचनात्मक कदम उठाए लेकिन पिछले दो-तीन सप्ताह में आतंक की ऐसी घटनाएं घट गईं, जिसने कश्मीर को फिर से चर्चा का विषय बना दिया। आतंकवादियों ने ऐसे निर्दोष लोगों पर हमले किए, जिनका राजनीति या फौज से कुछ लेना-देना नहीं है। इन लोगों में ठेठ कश्मीरी भी हैं और ज्यादातर वे लोग हैं, जो देश के दूसरे हिस्सों से आकर कश्मीर में रोजगार करते हैं।


ये घटनाएं बड़े पैमाने पर नहीं हुई हैं लेकिन इनका असर बहुत गंभीर हो रहा है। न केवल हिंदू पंडित, जो कश्मीर लौटने के इच्छुक थे, निराश हो रहे हैं बल्कि सैकड़ों गैर-कश्मीरी नागरिक भागकर बाहर आ रहे हैं। ऐसे डर के माहौल में अमित शाह श्रीनगर पहुंचे और उन्होंने जो सबसे पहला काम किया, वह यह कि वे परवेज अहमद दर के परिवार से मिले। वे सीधे हवाई अड्डे से उनके घर गए।


परवेज अहमद सीआईडी के इंस्पेक्टर थे। वे ज्यों ही नमाज़ पढ़कर मस्जिद से निकले आतंकियों ने उनकी हत्या कर दी थी। शाह ने उनकी पत्नी फातिमा को सरकारी नौकरी का नियुक्ति-पत्र दिया। परवेज अहमद के परिवारवालों से अमित शाह की मुलाकात के जो फोटो अखबारों में छपे हैं, वे बहुत ही मर्मस्पर्शी हैं। शाह ने राजभवन में पांच घंटे की बैठक करके कश्मीर की सुरक्षा पर विचार-विमर्श किया। उन्होंने आतंकवाद को काबू करने के लिए कई नए कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए।


यह ठीक है कि उन्होंने कश्मीर को राज्य का दर्जा लौटाने का कोई संकेत नहीं दिया लेकिन त्रिस्तरीय पंचायत के चुनावों को बड़ी उपलब्धि बताया। क्या ही अच्छा होता कि वे कश्मीर को राज्य का दर्जा लौटाने की बात कहते और यह शर्त भी लगा देते कि वे ऐसा तभी करेंगे, जबकि वहां आतंकवाद की एक भी घटना न हो। अभी जबकि पाकिस्तान में अफगानिस्तान को लेकर खलबली मची हुई है, यदि भारत के नेताओं में दूरंदेशी हो तो वे काबुल और कश्मीर, दोनों मुद्दों पर नई पहल कर सकते हैं। वे अटलजी के सपने- कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत को जमीन पर उतार सकते हैं।



–डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)





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कांग्रेस में नई हलचल- माजरा क्या है?

कांग्रेस के संकट पर चर्चा अब उबाऊ हो चला है, यह बहुत लम्बे समय से चला आ रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद उनका यह संकट गहराता ही गया है. 2019 में राहुल गाँधी के इस्तीफ़ा के बाद से तो यह संकट ही दिशाहीन सा लगने लगा है. लेकिन इधर कांग्रेस पार्टी में घटी दो घटनाएं ध्यान खीचने वाली है, एक पंजाब में नेतृत्व परिवर्तन और दूसरा कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी का पार्टी में शामिल होना. 


कांग्रेस पार्टी के लिए कैप्टेन अमरिंदर सिंह सरीखे नेता को मुख्यमंत्री पद से हटाना और कन्हैया, जिग्नेश जैसे ठोस विचारधारा वाले युवा नेताओं को पार्टी में शामिल करना कोई मामूली फैसला नहीं है. तो क्या इसे पार्टी पर राहुल और प्रियंका गांधी के नेतृत्व को स्थापित करने और उनके हिसाब के नयी कांग्रेस पार्टी गढ़ने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा सकता है? अगर ऐसा है तो कांग्रेस अपने इस अंतहीन से लगने वाले सकंट को एक मुकाम मिलने की उम्मीद कर सकती है. 


आज कांग्रेस पार्टी दोहरे संकट से गुजर रही है जो कि अंदरूनी और बाहरी दोनों हैं लेकिन अंदरूनी संकट ज्यादा गहरा है जिसके चलते पार्टी एक राजनीतिक संगठन के तौर पर काम नहीं कर पा रही है. पार्टी में लम्बे समय से चल रही पीढ़ीगत बदलाव की प्रक्रिया फंसी हुई है जिससे पार्टी के बैचैन युवा नेताओं में भगदड़ मची हुई है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के मुताबिक 2014 से 2021 के दौरान कांग्रेस पार्टी के करीब 399 नेता पार्टी छोड़ चुके हैं जिसमें 177 सांसद और विधायक शामिल हैं. दूसरी तरफ पुरानी पीढ़ी के नेता राहुल गाँधी के रास्ते का रोड़ा बने हुए हैं जिन्हें फिलहाल जी-23 समूह के रूप में जाना जा रहा है.


2019 की हार के बाद अपना इस्तीफ़ा देते समय राहुल गाँधी ने कांग्रेस नेताओं से जवाबदेही लेने, पार्टी के पुनर्गठन के लिये कठोर फ़ैसले लेने और गैर गांधी अध्यक्ष चुनने की बात कही थी. लेकिन इनमें से कुछ नहीं हो सका उलटे सबकुछ पहले से अधिक पेचीदा हो गया है. फिलहाल सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष हैं और राहुल गाँधी बिना कोई जिम्मेदारी लिये हुये पार्टी के सबसे बड़े और प्रभावशाली नेता बने हुये हैं. पार्टी में विचारधारा को लेकर भी भ्रम की स्थिति है. पार्टी नर्म हिन्दुतत्व व धर्मनिरपेक्षता/उदारवाद के बीच झूल रही है.


कांग्रेस के लिए बाहरी चुनौती के तौर पर मोदी-शाह की भाजपा और संघ परिवार तो पहले से ही हैं लेकिन अब कई क्षेत्रीय पार्टियां भी कांग्रेस के इस कमजोरी को अपने लिए एक मौके के तौर पर देख रही है, खासकर ममता बनर्जी की टीएमसी यानी अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस और अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जो कांग्रेस की जमीन पर अपने अखिल भारतीय मंसूबों के साकार होने की उम्मीद कर रही है. आम आदमी पार्टी तो पहले भी इस तरह के मंसूबे दिखाती रही है लेकिन इस बार ममता बनर्जी बहुत ही गंभीरता और योजनाबद्ध तरीके से इस दिशा में आगे बढ़ते हुए दिखाई पड़ रही हैं. इस काम में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर उनके सारथी के रूप में दिखलाई पड़ रहे हैं. पिछले कुछ महीनों मेंटीएमसी असम, गोवा और मेघालय के कई कांग्रेस नेताओं को अपने खेमे में शामिल करने में कामयाब रही है. 


कांग्रेस भी इन सबसे अनजान नहीं है,पिछले दिनों कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी पर हमला बोलते हुए कहा है कि वो कांग्रेस का स्थान लेकर खुद का “ममता” कांग्रेस बनाना चाहती हैं इसीलिए वे विभिन्न राज्यों के कांग्रेस नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर रही हैं. अधीर रंजन चौधरी द्वारा इस काम के लिए प्रशांत किशोर की संस्था आईपीएसी और टीएमसी के बीच मिलीभगत का आरोप भी लगाया गया है. गौरतलब है कि पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी छोड़ कर तृणमूल में शामिल हुए गोवा कांग्रेस वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री लुइजिन्हो फेलेरो ने बयान दिया था कि वे प्रशांत किशोर की सलाह पर टीएमसी में शामिल हुये हैं.


भारतीय राजनीति में अधिकतर समय विपक्ष मजबूत नहीं रहा है लेकिन मौजूदा समय की तरह कभी इतना निष्प्रभावी भी नहीं रहा है. इसमें कांग्रेस के कमजोरी की बड़ी भूमिका है. वैसे भी आज के दौर में विचारधारा के तौर पर भाजपा और संघ परिवार को असली चुनौती कांग्रेस और लेफ्ट से ही है. इस मामले में अन्य क्षेत्रीय पार्टियाँ भाजपा को कोई चुनौती पेश नहीं करती है. इसलिए आज कांग्रेस का संकट भारतीय राजनीति के विपक्ष का संकट बन गया है. 


आज विपक्ष के रूप में कांग्रेस का मुकाबला एक ऐसे दल से है जो विचारधारा के आधार पर अपनी राजनीति करती है.भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार अपने विचारधारा के आधार पर नया भारत गढ़ने में व्यस्त हैं. आजादी की विरासत और पिछले 75 वर्षों के दौरान प्रमुख सत्ताधारी दल होने के नाते कांग्रेस ने अपने हिसाब से भारत को गढ़ा था. अब उसके पास भाजपा के हिन्दुतात्वादी राष्ट्रवाद के मुकाबले कोई कार्यक्रम या खाका नजर नहीं आ रहा है. इसलिए कांग्रेस को अगर मुकाबले में वापस आना है तो उसे संगठन और विचारधारा दोनों स्तर पर काम करना होगा. उसे अपने जड़ों की तरफ लौटना होगा और आजादी के आन्दोलन के दौरान जिन मूल्यों और विचारों की विरासत उसे मिली थी उन्हें अपने एजेंडे में लाना होगा, उग्र और एकांकी राष्ट्रवाद के मुकाबले समावेशी और बहुलतावादी राष्ट्रवाद की अवधारणा को पेश करना होगा तभी जाकर वह अपनी खोई हुई जमीन दोबारा हासिल कर सकती है.


दूसरा बड़ा संकट लीडरशिप का है तमाम कोशिशों के बावजूद राहुल गाँधी पार्टी में अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर पाए हैं. पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने के बाद भी आज पार्टी के सारे फैसले वही ले रहे हैं. साथ ही वे देश के “इकलौते” विपक्ष के नेता के तौर पर अकेले ही मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करते रहते हैं. उनके इस कवायद में उनका पार्टी संगठन नदारद नजर आता है. जी-23 समूह के नेता राहुल गांधी के बिना किसी पद के इसी ऑथोरिटी पर सवाल उठा रहे हैं जिसे गैर-वाजिब भी नहीं कहा जा सकता है.


प्रशांत किशोर का इरादा भले ही कुछ भी रहा हो लेकिन पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी को लेकर उनके द्वारा किये गये ट्वीट से असहमत नहीं हुआ जा सकता है जिसमें उन्होंने लिखा था कि ‘जो लोग लखीमपुर खीरी की घटना को पुरानी पार्टी के पुनर्जीवित करने के तौर पर देख रहे हैं, उन्हें बड़ी निराशा ही हाथ लगनी है क्योंकि पार्टी की बड़ी समस्याओं और संरचनात्मक कमजोरियों का कोई तात्कालिक समाधान नहीं है.’ अगर कांग्रेस अपने संकट को एक मुकाम देना चाहती है तो सबसे पहले उसे अपने तीन अंदरूनी संकटों विचारधारा, लीडरशिप और सांगठनिक बिखराव को हल करना होगा. 


-जावेद अनीस-



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जयंती विशेषः सादगी की प्रतिमूर्ति थे डा. अब्दुल कलाम

देश के महान् वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति, प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम) सच्चे अर्थों में ऐसे महानायक थे, जिन्होंने अपना बचपन अभावों में बीतने के बाद भी अपना पूरा जीवन देश और मानवता की सेवा में व्यतीत कर दिया। छात्रों और युवा पीढ़ी को दिए गए उनके प्रेरक संदेश तथा उनके स्वयं के जीवन की कहानी देश की आने वाले कई पीढ़ियों को भी सदैव प्रेरित करने का कार्य करती रहेगी।


न केवल भारत के लोग बल्कि पूरी दुनिया मिसाइल मैन डॉ. कलाम की सादगी, धर्मनिरपेक्षता, आदर्शों, शांत व्यक्तित्व और छात्रों व युवाओं के प्रति उनके लगाव की कायल थी। डॉ. कलाम देश को वर्ष 2020 तक आर्थिक शक्ति बनते देखना चाहते थे। पढ़ाई-लिखाई को तरक्की का साधन बताने वाले डॉ. कलाम का मानना था कि केवल शिक्षा के द्वारा ही हम अपने जीवन से निर्धनता, निरपेक्षरता और कुपोषण जैसी समस्याओं को दूर कर सकते हैं। उनके ऐसे ही महान विचारों ने देश-विदेश के करोड़ों लोगों को प्रेरित करने और देश के लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने का कार्य किया। उनका ज्ञान और व्यक्तित्व इतना विराट था कि उन्हें दुनियाभर के 40 विश्वविद्यालयों ने डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि प्रदान की।


तमिलनाडु के एक छोटे से गांव में एक मध्यमवर्गीय परिवार में 15 अक्तूबर 1931 को जन्मे डॉ. कलाम छात्रों का मार्गदर्शन करते हुए अक्सर कहा करते थे कि छात्रों के जीवन का एक तय उद्देश्य होना चाहिए और इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि वे हरसंभव स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करें। छात्रों की तरक्की के लिए उनके द्वारा जीवन पर्यन्त किए गए महान् कार्यों को देखते हुए ही सन् 2010 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा उनका 79वां जन्म दिवस ‘विश्व विद्यार्थी दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया और तभी से डॉ. कलाम के जन्मदिवस 15 अक्तूबर को ही प्रतिवर्ष ‘विश्व विद्यार्थी दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है।


समय-समय पर युवाओं को दिए गए उनके प्रेरक संदेशों की बात करें तो वे कहा करते थे कि अगर आप सूरज की तरह चमकना चाहते हो तो पहले सूरज की तरह जलना सीखो। वे कहते थे कि अगर आप फेल होते हैं तो निराश मत होइए क्योंकि फेल होने का अर्थ है ‘फर्स्ट अटैंप्ट इन लर्निंग’ और अगर आपमें सफल होने का मजबूत संकल्प है तो असफलता आप पर हावी नहीं हो सकती। इसलिए सफलता और परिश्रम का मार्ग अपनाओ, जो सफलता का एकमात्र रास्ता है। डॉ. कलाम कहते थे कि आप अपना भविष्य नहीं बदल सकते लेकिन अपनी आदतें बदल सकते हैं और निश्चित रूप से आपकी आदतें आपका भविष्य बदल देंगी। वे हमेशा कहा करते थे कि महान सपने देखने वाले महान लोगों के सपने हमेशा पूरे होते हैं। उनका कहना था कि इंसान को कठिनाइयों की आवश्यकता होती है क्योंकि सफलता का आनंद उठाने के लिए कठिनाइयां बहुत जरूरी हैं। सपने देखना जरूरी है लेकिन केवल सपने देखकर ही उसे हासिल नहीं किया जा सकता बल्कि सबसे जरूरी है कि जिंदगी में स्वयं के लिए कोई लक्ष्य तय करें।


कलाम साहब कहते थे कि इस देश के सबसे तेज दिमाग स्कूलों की आखिरी बेंचों पर मिलते हैं। हम सबके पास एक जैसी प्रतिभा नहीं है लेकिन अपनी प्रतिभाओं को विकसित करने के अवसर सभी के पास समान हैं। सादगी की प्रतिमूर्ति डा. कलाम का व्यक्तित्व कितना विराट था, इसे परिभाषित करते कई किस्से भी सुनने को मिलते हैं।


ऐसी ही एक घटना उन दिनों की है, जब डीआरडीओ में ‘अग्नि’ मिसाइल पर काम चल रहा था और काम के दबाव के चलते उस प्रोजेक्ट से जुड़े हर व्यक्ति को अपने परिवार के साथ बिताने के लिए भी पर्याप्त समय नहीं मिलता था। उसी दौरान इसी प्रोजेक्ट से जुड़े डीआरडीओ में कार्यरत डॉ. कलाम के एक जूनियर वैज्ञानिक ने अपने बच्चों को एक प्रदर्शनी दिखाने ले जाने के लिए उनसे जल्दी घर जाने के लिए छुट्टी मांगी। डॉ. कलाम ने उसे इसकी अनुमति दे दी लेकिन उस दिन कार्य इतना ज्यादा था कि वह जूनियर वैज्ञानिक अपने काम में इस कदर लीन हो गया और उसे समय का पता ही न चला। दूसरी ओर कलाम साहब ने उसकी व्यस्तता को देखते हुए अपने प्रबंधक को बच्चों को प्रदर्शनी दिखाने के लिए भेज दिया। जब जूनियर वैज्ञानिक देर रात अपने घर पहुंचा, तब उसे कलाम साहब की इस महानता के बारे में ज्ञात हुआ। अगले दिन उनके समक्ष नतमस्तक होकर उसने इसके लिए उनका हृदय से आभार प्रकट किया।


डॉ. कलाम राष्ट्रपति जैसे देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन रहते हुए भी आम लोगों से मिलते रहे। एक बार कुछ युवाओं ने उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की और इसके लिए उन्होंने उनके कार्यालय को चिट्ठी लिखी। चिट्ठी मिलने के बाद डॉ. कलाम ने उन युवाओं को अपने पर्सनल चैंबर में आमंत्रित किया और वहां न केवल उनसे मुलाकात ही की बल्कि उनके विचार, उनके आइडिया सुनते हुए काफी समय उनके साथ गुजारा।


जिस समय डॉ. कलाम भारत के राष्ट्रपति थे, तब वे एक बार आईआईटी के एक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए पहुंचे। उनके पद की गरिमा का सम्मान करते हुए आयोजकों द्वारा उनके लिए मंच के बीच में बड़ी कुर्सी लगवाई गई। डॉ. कलाम जब वहां पहुंचे और उन्होंने केवल अपने लिए ही इस प्रकार की विशेष कुर्सी की व्यवस्था देखी तो उन्होंने उस कुर्सी पर बैठने से इनकार कर दिया, जिसके बाद आयोजकों ने उनके लिए मंच पर लगी दूसरी कुर्सियों जैसी ही कुर्सी की व्यवस्था कराई।


उनके मन में दूसरे जीवों के प्रति भी किस कदर करूणा और दयाभाव विद्यमान था, इसका अंदाजा इस घटनाक्रम से सहज ही लग जाता है। जब 1982 में वे डीआरडीओ के चेयरमैन बने तो उनकी सुरक्षा के लिए डीआरडीओ की सेफ्टी वाल्स पर कांच के टुकड़े लगाने का प्रस्ताव लाया गया लेकिन कलाम साहब ने यह कहते हुए उसके लिए साफ इनकार कर दिया था कि दीवारों पर कांच के टुकड़े लगाने से पक्षी नहीं बैठ पाएंगे और ऐसा करने की प्रक्रिया में पक्षी घायल भी हो सकते हैं। इस कारण उस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था।


राष्ट्रपति जैसे बड़े पद पर पहुंचने के बाद भी कलाम अपने बचपन के दोस्तों को नहीं भूलते थे। 2002 में राष्ट्रपति बनने के बाद जब एक बार वे तिरुअनंतपुरम के राजभवन में मेहमान थे, तब उन्होंने अपने स्टाफ को वहां के एक मोची और ढाबे वाले को खाने पर बुलाने का निर्देश दिया। सभी उनके इस निर्देश को सुनकर हैरान था। बाद में पता चला कि ये दोनों कलाम साहब के बचपन के दोस्त थे। दरअसल कलाम साहब ने अपने जीवन का बहुत लंबा समय केरल में ही बिताया था और उसी दौरान उनके घर के पास रहने वाले उस मोची तथा ढाबे वाले से उनकी दोस्ती हो गई थी। राष्ट्रपति बनने के बाद जब वे तिरुअनंतपुरम पहुंचे, तब भी वे अपने इन दोस्तों को नहीं भूले और उन्हें राजभवन बुलाकर उन्हीं के साथ खाना खाकर उन्हें इतना मान-सम्मान दिया।


डॉ. कलाम के जीवन के अंतिम पलों के बारे में उनके विशेष कार्याधिकारी रहे सृजन पाल सिंह ने लिखा है कि शिलांग में जब वह डॉ. कलाम के सूट में माइक लगा रहे थे तो उन्होंने पूछा था, ‘फनी गाय हाउ आर यू’, जिस पर सृजन पाल ने जवाब दिया ‘सर ऑल इज वेल’। उसके बाद डॉ. कलाम छात्रों की ओर मुड़े और बोले ‘आज हम कुछ नया सीखेंगे’ और इतना कहते ही वे पीछे की ओर गिर पड़े। पूरे सभागार में सन्नाटा पसर गया और इस प्रकार इस महान् विभूति ने दुनिया से सदा के लिए विदा ले ली।


-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)





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सावरकर पर हमला क्यों ?

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर पर एक पुस्तक का विमोचन करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सावरकर पर किए जानेवाले आक्षेपों का कड़ा प्रतिवाद किया है। उन्होंने सावरकर को बेजोड़ राष्ट्रभक्त और विलक्षण स्वातंत्र्य-सेनानी बताया है लेकिन कई वामपंथी और कांग्रेसी मानते हैं कि सावरकर माफी मांगकर अंडमान-निकोबार की जेल से छूटे थे, उन्होंने हिंदुत्व की संकीर्ण सांप्रदायिकता फैलाई थी।


गांधी-हत्याकांड में सावरकर को भी फंसा लिया गया था लेकिन उन्हें ससम्मान बरी करते हुए जस्टिस खोसला ने कहा था कि इतने बड़े आदमी को फिजूल ही इतना सताया गया। स्वयं गांधीजी सावरकर से लंदन के ‘इंडिया हाउस’ में 1909 में मिले और 1927 में वे उनसे मिलने रत्नागिरी में उनके घर भी गए। दोनों में अहिंसा और उस समय की मुस्लिम सांप्रदायिकता को लेकर गहरा मतभेद था। सावरकर अखंड भारत के कट्टर समर्थक थे लेकिन जिन्ना के नेतृत्व में खड़े दो राष्ट्रों की सच्चाई को वे खुलकर बताते थे। वे मुसलमानों के नहीं, मुस्लिम लीगियों के विरोधी थे।


हिंदू महासभा के अपने अध्यक्षीय भाषणों में उन्होंने सदा हिंदुओं और मुसलमानों के समान अधिकार की बात कही। उनके विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ ‘1857 का स्वातंत्र्य-समर’ में उन्होंने बहादुरशाह जफर, अवध की बेगमों तथा कई मुस्लिम फौजी अफसरों की बहादुरी का मार्मिक वर्णन किया है। जब वे लंदन में पढ़ते थे तो आसफ अली, सय्यद रजा हैदर, सिकंदर हयात खां, मदाम भिकायजी कामा वगैरह उनके अभिन्न मित्र होते थे। उन्होंने खिलाफत आंदोलन का विरोध जरूर किया। गांधीजी उसके समर्थक थे लेकिन वही आंदोलन भारत-विभाजन की नींव बना।


सावरकर की विचारधारा पर आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद और उनके भक्त श्यामजी कृष्ण वर्मा का गहरा प्रभाव था। वे ऐसे मुक्त विचारक और बुद्धिजीवी थे कि उनके सामने विवेकानंद, गांधी और आंबेडकर भी कहीं-कहीं फीके पड़ जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी उनके सभी विचारों से सहमत नहीं हो सकता। सावरकर के विचारों पर यदि मुल्ला-मौलवी छुरा ताने रहते थे तो पंडित-पुरोहित उन पर गदा प्रहार किया करते थे।


जहां तक सावरकर द्वारा ब्रिटिश सरकार से माफी मांगने की बात है, इस मुद्दे पर मैंने कई वर्षों पहले ‘राष्ट्रीय संग्रहालय’ के गोपनीय दस्तावेज खंगाले थे और अंग्रेजी में लेख भी लिखे थे। उन दस्तावेजों से पता चलता है कि सावरकर और उनके चार साथियों ने ब्रिटिश वायसराय को अपनी रिहाई के लिए जो पत्र भेजा था, उस पर गवर्नर जनरल के विशेष अफसर रेजिनाल्ड क्रेडोक ने लिखा था कि सावरकर झूठा अफसोस जाहिर कर रहा है। वह जेल से छूटकर यूरोप के आतंकवादियों से जाकर हाथ मिलाएगा और सरकार को उलटाने की कोशिश करेगा।


सावरकर की इस सच्चाई को छिपाकर उन्हें बदनाम करने की कोशिश कई बार की गई। अंडमान-निकोबार जेल से उनकी नामपट्टी भी हटाई गई लेकिन मैं तो उस कोठरी को देखकर रोमांचित हो उठा, जिसमें सावरकर ने बरसों काटे थे और जिसकी दीवारों पर गोदकर सावरकर ने कविताएं लिखी थीं।



-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)




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महबूबा मुफ्ती, आर्यन खान और भारत में मुसलमान

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का कहना कि आर्यन खान (अभिनेता शाहरुख खान के बेटे) को इसलिए परेशान किया जा रहा है क्योंकि वह मुसलमान है। केंद्रीय एजेंसियां 23 साल के लड़के के पीछे इस वजह से पड़ी हैं क्योंकि उसका उपनाम खान है। बीजेपी के कोर वोट बैंक की इच्छाओं को पूरा करने के लिए मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है। वास्तव में उनके इस भड़काऊ बयान ने आज यह सोचने पर विवश कर दिया है कि मुसलमानों को भ्रमित करने के लिए उनके बीच ऐसे नेता मौजूद हैं, फिर भारत को किसी बाहरी दुश्मन की आवश्यकता नहीं है।


महबूबा मुफ्ती ने सच पूछिए तो ऐसा कर भारत के संविधान और उसकी न्याय व्यवस्था का मजाक बनाया है। आश्चर्य है जिस देश ने उन्हें इतना सबकुछ दिया उसकी धर्मनिरपेक्षता पर वे प्रश्नचिन्ह खड़ा भी कैसे कर सकती है ? शायद वह भूल जाती हैं कि बहुसंख्यक हिन्दुओं के भारत में सबसे ज्यादा स्वतंत्रता एवं जन अधिकार तो अल्पसंख्यकों को ही दिए गए हैं, जितने की किसी अन्य देश में उन्हें नहीं मिले हैं, जहां बहुसंख्यक मुसलमान नहीं हैं। अच्छा होता वे आरोप लगाने के पहले यह भी देख लेतीं कि आर्यन खान अकेला नहीं है, जिस पर कानून का शिकंजा कसा है, उसके साथ जो अन्य जेल में हैं, वे मुसलमान नहीं धर्म से हिन्दू हैं। ध्यान रहे, भारत का कानून किसी के साथ नस्ल, जाति, धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता। अपराधी की कोई जाति या धर्म नहीं होता, वह अपराधी होता है, इसलिए कानून का उल्लंघन किया है तो सजा मिलेगी ही। कम से कम एक राज्य की जो मुख्यमंत्री रह चुकी हैं ऐसी महबूबा मुफ्ती को इतना तो पता ही होना चाहिए।


गौर करें, दिल्ली की तंग गलियों से निकला मध्यमवर्गीय परिवार का एक लड़का बॉलीवुड का किंग खान बन जाता है, यह केवल मुस्लिम दर्शकों की वजह से संभव नहीं हुआ है। आरोप लगाने के पहले मुफ्ती को यह भी ध्यान रखना था। फिर ऐसा पहली बार नहीं है कि बॉलीवुड में किसी की गिरफ्तारी इस तरह से हुई है, इसके पहले भी संजय दत्त जेल की यात्रा करके आ चुके हैं, उनके नाम के पीछे खान नहीं था। अभी हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एसीबी) द्वारा सूरज, भारती, हर्ष लिम्बाचिया, रिया चक्रवर्ती, शोभित चक्रवर्ती को गिरफ्तार किया था। भाजपा के बड़े नेता रहे प्रमोद महाजन के बेटे राहुल महाजन को भी ड्रग्स लेने के आरोप में जेल जाना पड़ा था। ऐसे अनेक मामले हैं जहां हिंदू आरोपी बने हैं।


एक केस यह भी है, जिसमें कि हिन्दू सनातन धर्म के ध्वजवाहक शंकराचार्य पर आरोप लगता है। 11 नवंबर 2004 को कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को एक हत्याकांड की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है। 27 नवंबर 2013 को इस मामले नियुक्त किए गए मुख्य जज सीएस मुरुगन ने अपना फैसला देते हुए शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती सहित सभी 24 आरोपियों को बरी कर दिया था, जयेंद्र सरस्वती को शंकर रमन हत्याकांड से नौ साल बाद बरी किया गया था। शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती अपराधी नहीं थे, फिर भी उन्होंने दो महीने जेल में बिताए। तब किसी मुफ्ती, नवाब मलिक की प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई थी, क्योंकि हिंदू भारत का बहुसंख्यक वर्ग है और संविधान तथा न्यायपालिका के सम्मान की जिम्मेदारी उसी ने ले रखी है ? जबकि यहां तो आर्यन खान के जेल में पहुंचने केवल तीन दिन बाद से ही अल्लाह हू अकबर का कार्ड खेला जाने लगा है।


यहां समझने की बात यह है कि जब किसी को योजना से आरोपित बना दिया जाए तब भी कानून उसकी तह में जाता है और सच का पता लगाने में जितना वक्त लग सकता है उतना समय लगाता ही है। फिर आर्यन के मामले में तो यह पूरी तरह से सच है कि जब तीन अक्टूबर को गोवा जा रहे क्रूज पर छापेमारी के दौरान एनसीबी ने प्रतिबंधित पदार्थ ड्रग्स बरामद किया तब वे वहां थे, उनके साथ मुनमुन धमेचा और अरबाज मर्चेंट मौजूद थे। इस मामले में दूसरे दिन पांच अन्य आरोपियों को भी अरेस्ट किया गया। सभी को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आर्यन को घर से नहीं मुंबई से गोवा जा रहे क्रूज शिप से गिरफ्तार किया था, ऐसे में इस पूरे मामले को धार्मिक रंजिश का रूप देने की कोशिश करना ठीक नहीं है। फिर वह चाहे महबूबा मुफ्ती हो या राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नवाब मलिक।


सरकार किसी की भी हो, पर यह ध्यान रहना चाहिए कि प्रशासनिक तंत्र और न्यायपालिका अपना कार्य करने के लिए स्वतंत्र हैं। अल्पसंख्यक होने का मतलब यह नहीं है कि आप गलत करें और सहानुभूति का दांव खेलकर आपको छोड़ दिया जाए। भारत में किसी को भी इस तरह से इजाजत नहीं दी जा सकती कि वे किसी भी सामान्य मामले का सांप्रदायिकरण करें। सच पूछा जाए तो यहां महबूबा मुफ्ती और नवाब मलिक के इस तरह के बयान कश्मीर घाटी में हिंदुओं के पहचान पत्र देखकर उन को मौत के घाट उतार देने जैसी विचारधारा के पक्ष को मजबूत करती दिखाई देती है। आज तक आतंकवादियों के कारण कश्मीर से केवल हिंदू विस्थापित हुए, मुस्लिम को तो वहां किसी प्रकार का डर नहीं लगता। एक धर्म विशेष की संख्या लगातार बढ़ रही है और एक धर्म के लोगों का वहां से पलायन हो रहा है । महबूबा मुफ्ती यहां क्यों नहीं कहतीं कि कश्मीर घाटी में हिन्दुओं पर मुसलमान अत्याचार कर रहे हैं, क्योंकि वे इस राज्य में अल्पसंख्यक हैं। पता है, महबूबा ऐसा कभी नहीं बोलेंगी, क्योंकि उन्हें मानवीयता की बात नहीं, उन्हें तो हिन्दू-मुसलमान करके अपना राजनीतिक लाभ लेना है।


आज यह यक्ष प्रश्न है, स्वाधीनता के संघर्ष के समय से लेकर आज तक भाईचारा बनाए रखने के लिए हिंदू ही अग्निपरीक्षा क्यों दें ? पश्चिम बंगाल में मोहर्रम और दुर्गा विसर्जन का एक ही दिन होने पर दुर्गा विसर्जन को रोक देने का सरकार का आदेश क्यों ? केवल मुस्लिमों को खुश करने के लिए। पर आज तो बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक का कार्ड खेलकर कार्यपालिका और न्यायपालिका पर दबाव बनाया जाना तो वास्तव में सत्ता पाने के लालच की पराकाष्ठा है। यह एक तरह से अप्रत्यक्ष रूप से धमकाना और ब्लैकमेलिंग भी है। यदि आने वाले समय में इस मामले में कहीं प्रदर्शन के दौरान दुर्घटना घटती है तो इसका जिम्मेदार नवाब मलिक और महबूबा मुफ्ती जैसे लोगों को ठहराया जाना चाहिए। क्योंकि ऐसे ही लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए किसी सामान्य से प्रकरण को भी हिन्दू-मुस्लिम बना देते हैं।


इस पूरे प्रकरण में शाहरुख का यह कहना कि वे शर्मिंदा हैं जो वह अपने बेटे को सही तरीके से परवरिश नहीं दे सके, यह दर्शाता है कि उनका बेटा जहां मिला वहां उसे नहीं होना चाहिए था और वह उसे सुधारने का प्रयत्न करेंगे। इसके पहले भी राज बब्बर का बेटा प्रतीक बब्बर, फिरोज खान का बेटा फरदीन खान, संजय खान का दामाद डीजे अकील, विजय राज आदि भी ड्रग्स लेते हुए पकड़े गए थे, लेकिन इन सभी ने अपनी गलती को राजनीतिक रंग देने की जगह इसे सुधारने के लिए प्रयास किए। नशामुक्ति केंद्र जाकर नशे से मुक्ति पाई और अपनी नई जिंदगी शुरू की। बेहतर होता कि राजनीतिक हस्तियां जो शासन चलाती हैं, वे सभी आर्यन जैसे अनेक नौजवानों को नशे के दलदल से बाहर निकालने के लिए नीतियां बनाएं, जिससे यह नौजवान ना केवल अपना भविष्य बनाएं बल्कि युवा ऊर्जा का उपयोग भारत के बेहतर कल के लिए भी करें ।


-डॉ. निवेदिता शर्मा-

(लेखिका किशोर न्याय बाल कल्याण समिति की पूर्व सदस्य हैं।)



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बिहारी के मारे जाने पर कौन बहाएगा आंसू

कश्मीर की वादियां फिर से मासूमों के खून से लाल हो रही हैं। वहां पर धरतीपुत्र कश्मीरी कैमिस्ट मक्खन लाल बिंद्रा से लेकर बिहार के भागलपुर से काम की खोज में आए गरीब वीरेन्द्र पासवान और दो अध्यापकों को भी गोलियों से भून दिया जाता है। पासवान के अलावा, सभी के मारे जाने पर तो पूरे देश में शोक व्यक्त किया जा रहा है, पर पासवान की मौत पर उसके घरवालों या कुछ अपनों के अलावा रोने वाला भी नहीं है।


बिहार के भागलपुर का रहने वाला वीरेंद्र पासवान आतंकियों की गोलियों का शिकार हो गया। उसका अंतिम संस्कार झेलम किनारे दूधगंगा श्मशान घाट पर कर दिया गया। श्रीनगर के मेयर जुनैद अजीम मट्टू के इस संवेदनहीन बयान को पढ़िए जिसमें वे कह रहे हैं कि “मैं भागलपुर में नहीं, यहीं श्रीनगर में उसके (पासवान) भाई व अन्य परिजनों के पास सांत्वना व्यक्त करने जाऊंगा।” कितना महान काम कर रहे हैं मट्टू साहब। यह सब बोलते हुए उनके जमीर ने उन्हें रोका तक नहीं। वे पासवान के श्रीनगर में रहने वाले संबंधियों से मिलने का वादा कर रहे थे। जो शायद ही शिर्नगर में ढूंढ़ने से मिलें। पासवान के घरवालों को मुआवजे के तौर पर सवा लाख रुपए की अनुग्रह राशि प्रदान कर दी गई है।


भागलपुर का रहने वाला वीरेंद्र पासवान अक्सर गर्मियों के दौरान कश्मीर में रोजी रोटी कमाने आता था। वह श्रीनगर के मदीनसाहब, लालबाजार इलाके में ठेले पर स्वादिष्ट गोल गप्पे बनाकर बेचता था। उसकी हत्या की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट आफ जम्मू कश्मीर नामक संगठन ने ली है। लेकिन, किसी मानवाधिकार संगठन या कांग्रेस, आप, सपा बसपा जैसे किसी दल ने अबतक मांग नहीं कि पासवान के घर के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी दे दी जाए। या उसे भी लखीमपुर खीरी के दंगाइयों की तरह पचासों लाखों की बौछार कर दी जाय। क्या आतंकियों के हाथों मारे गए पासवान के परिवार को सिर्फ सवा लाख रुपए की राशि देना ही पर्याप्त है ?


कड़वी सच्चाई तो यह है कि देश के किसी भी भाग में बिहार के नागरिक के मारे जाने या अपमानित किए जाने पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं होती। अफसोस कि यह नहीं देखा जाता कि बिहारी जहां भी जाता है वहां पूरी मेहनत से जी-जान लगाकर काम करता है। आप जम्मू-कश्मीर या अब केन्द्र शासित प्रदेश हो गए लद्दाख का भी एक चक्कर भर लगा लें। आपको दूरदराज के इलाकों में अंडमन से लक्षद्वीप, हिमाचल से अरुणाचल तक बिहारी मजदूर निर्माण कार्यों में लगे मिलेंगे। लेह- करगिल मार्ग पर सड़क और दूसरे निर्माणाधीन परियोजनाओं में बिहारी सख्त विपरीत जलवायु में भी काम करते मिलेंगे।


कुछ समय पहले मेरे कुछ मित्रों को लेह जाने का अवसर मिला था। वहां पर आम गर्मी के मौसम में भी काफी ठंडा होने लगा था। वहां दिन में भी तापमान 12 डिग्री के आसपास ही रहता है। सुबह-शाम तो पूछिये ही मत ! दिन में भी जैकेट या स्वेटर पहनना जरूरी है। इन कठिन हालातों में भी आपको अनेकों बिहारी गुरुद्वारा पत्थर साहब के आसपास मिल जाएंगे। उनके चेहरों पर उत्साह भरा रहता है। वे पराई जगहों को भी जल्द ही अपना ही मानने लगते हैं। गुरुद्वारा पत्थर साहब की बहुत महानता मानी जाती है क्योंकि यहाँ बाबा नानक आए थे। आपको लेह और इसके आसपास के होटलों और बाजारों में भी बहुत से बिहारी मेहनत मशक्कत करते हुए दिखाई दे जाएंगे। ये सुबह से लेकर देर शाम तक काम करते रहते हैं।


इन निर्दोषों पर हमला करने का क्या मतलब है। इन्हें या दूसरे मासूम लोगों को वे मार रहे हैं, जो अपने को किसी इस्लामिक संगठन का सदस्य बताते हैं। अब जरा देखिए कि कश्मीर में ताजा घटनाओं के बाद किसी भी मुस्लिम नेता या मानवाधिकार संगठन या कश्मीरियत की बात करने वाले राजनेताओं ने तेजी से बढ़ती हिंसक वारदातों की निंदा नहीं की। ये सब लोग भी यह अच्छी तरह समझ लें कि सिर्फ यह कहने से तो बात नहीं बनेगी कि इस्लाम भी अमन का ही मजहब है। यह तो इन्हें सिद्ध करना होगा। इन्हें अपने मजहब के कठमुल्लों से दो-दो हाथ करना होगा।


बहरहाल, वीरेंद्र पासवान तो कश्मीर में भी बिहार से रोजी रोटी कमाने ही आया था। उस गरीब ने किसी का क्या बिगाड़ा था। जब गोलियों से छलनी वीरेन्द्र पासवान का शव मिला तो उसके मुँह पर मास्क तक लगा हुआ था। अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर कश्मीर में आये पासवान के शरीर में कोरोना तो जा नहीं पाया, परआतंकियों के बुलेट ने शरीर को छलनी कर दिया।


पासवान परिवार, लालू यादव का परिवार, या किसी को भी इतनी फुर्सत नहीं है कि वे पासवान की मौत की निंदा भर ही कर दें। लेकिन, कोई दलित नेता, कोई बुद्धिजीवी या ह्यूमन राइट वाला आगे नहीं आया। यह कोई पहली बार नहीं हुआ जब अपने ही देश में किसी गरीब बिहारी के साथ सौतेला व्यवहार किया गया हो। कुछ साल पहले मणिपुर में भी बिहारियों के साथ मारपीट की घटनाएं बढ़ीं थीं। उन्हें मारा जाना देश के संघीय ढांचे को ललकारने के समान है। यह स्थिति हर हालत में रुकनी ही चाहिए।


इसी तरह से बिहारियों पर देश के अलग-अलग भागों में हमले होते रहे हैं। अगर बात असम की करें तो वहां पर इन हमलों के पीछे उल्फा आतंकवादियों की भूमिका होती है। दरअसल जब भी उल्फा को केंद्र के सामने अपनी ताकत दिखानी होती है, वह निर्दोष हिंदी भाषियों (बिहार या यूपी वालों) को ही निशाना बनाने लगता है। पूर्वोत्तर के दो राज्यों क्रमश: असम तथा मणिपुर में हिन्दी भाषियों को कई वर्षों से मारा जाता रहा है। ये हिन्दी भाषी पूर्वोत्तर में सदियों से बसे हुए हैं। असम तथा मणिपुर में हिन्दी भाषियों की आबादी लाखों में है। ये अब असमिया तथा मणिपुरी ही बोलते हैं। ये पूरी तरह से वहां के ही हो गए हैं। बस एक तरह से इनके अपने पुरखों के राज्यों से भावनात्मक संबंध भर ही बचे हैं।


दिल्ली में अपने मुख्यमंत्रित्वकाल के दौरान स्वर्गीय शीला दीक्षित ने भी एकबार राजधानी की समस्याओं के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार से आकर बसनेवाले लोगों को जिम्मेदार ठहरा दिया था। यह बात 2007 की है जब शीला दीक्षित ने कहा था कि दिल्ली एक संपन्न राज्य है और यहाँ जीवन-यापन के लिए बिहार तथा उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में लोग आते हैं और यहीं बस जाते हैं। इस कारण से यहां की मूलभूत सुविधाओं को उपलब्ध कराना कठिन हो रहा है। सवाल यह है कि क्या बिहारी देश के किसी भी भाग में रहने-कमाने के लिए स्वतंत्र नहीं है ? अब ऐसी ही बात केजरीवाल भी करने लगे हैं।


देखिए, बिहार को आप देश के ज्ञान का केन्द्र या राजधानी मान सकते हैं। महावीर, बुद्ध और चार प्रथम शंकराचार्यों में एक (मंडन मिश्र) और भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तक को बिहार ने ही दिया। ज्ञान प्राप्त करने की जिजीविषा हरेक बिहारी में सदैव बनी रहती है। बिहारी के लिए भारत एक पवि शब्द है। वह सारे भारत को ही अपना मानता है। वह मधु लिमये, आचार्य कृपलानी से लेकर जार्ज फर्नांडीज को अपना नेता मानता रहा है और बिहार से लोकसभा में भेजता रहा है । क्या बिहारी को भारत के किसी भी भाग में इस तरह से मारा-पीटा जाएगा ?



-आर.के. सिन्हा-

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)






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ये हैं 'जहन्नुम' के असली हक़दार

कश्मीर घाटी में गत 5 अक्टूबर को आतंकवादियों द्वारा की गयी गोलीबारी व हत्याओं की गूँज अभी ख़त्म भी न होने पायी थी कि गत 8 अक्टूबर (शु्क्रवार) को अफ़ग़ानिस्तान के कुंदूज़ राज्य के उत्तर पूर्वी इलाक़े में एक शिया मस्जिद पर बड़ा आत्मघाती हमला कर दिया गया जिसमें लगभग एक सौ नमाज़ियों को हलाक कर दिया गया व सैकड़ों ज़ख़्मी हो गए। इन दोनों ही हमलों में कुछ विशेषतायेँ समान थीं। कश्मीर में हुए हमले में जहां सिख समुदाय की एक स्कूल प्राध्यापिका सुपिंदर कौर की श्रीनगर के ईदगाह इलाक़े में हत्या कर दी गयी वहीं उसी स्कूल के एक अध्यापक दीपक चंद की भी गोली मार कर हत्या कर दी गयी। शहर के एक नामी केमिस्ट मक्खन लाल बिंद्रू की भी इससे पूर्व उन्हीं की केमिस्ट की दुकान पर गोली मारकर हत्या की जा चुकी है। गत एक सप्ताह में कश्मीर घाटी में सात लोगों की हत्या की जा चुकी है। इन हत्याओं में शहीद किये गये केमिस्ट व अध्यापक जैसे 'नोबल ' पेशे से जुड़े लोगों की हत्या कर देना, ऐसे लोगों को शहीद कर देना जिनका जीवन प्रत्येक कश्मीरियों के जीवन को सुधारने, सँवारने व बचाने के लिये समर्पित था, एक सिख महिला शिक्षिका जो घाटी में केवल सिखों को ही नहीं बल्कि हिन्दुओं, मुसलमानों सभी को ज्ञान का प्रकाश बांटती थी, केमिस्ट मक्खन लाल बिंद्रू जैसा समाजसेवी केमिस्ट जिसने पूरा जीवन मरीज़ों को पैसे होने या न होने की स्थिति में शुद्ध दवाएं वितरित करने में व्यतीत किया और जिसको अपनी जन्मभूमि से इतना लगाव था कि अपने ही समुदाय के हज़ारों कश्मीरियों के कश्मीर छोड़ने के बावजूद घाटी में ही रहने का फ़ैसला किया। ऐसे निहत्थे लोगों को जान से मार देना यह आख़िर कैसा 'युद्ध ' अथवा जिहाद है ?


अफ़ग़ानिस्तान एक शिया मस्जिद में हुए आत्मघाती हमले के समय भी ख़बरों के अनुसार शिया समुदाय के लगभग चार सौ लोग जुमे (शुक्रवार) की नमाज़ अदा कर रहे थे। कश्मीरी सिखों व कश्मीरी पंडितों की ही तरह शिया भी अफ़ग़ानिस्तान का अल्पसंख्यक समाज है। वे भी निहत्थे थे और मस्जिद में नमाज़ के दौरान अल्लाह की इबादत में मशग़ूल थे। किसी आत्मघाती हमलावर ने उन्हीं के बीच आकर ख़ुद को उड़ा दिया नतीजतन लगभग एक सौ नमाज़ी मारे गए। निहत्थे नमाज़ियों को मस्जिद में ही मारना यह तो उसी तरह का कृत्य है जैसे कि सुन्नी मुसलमानों के चौथे ख़लीफ़ा और शियाओं के पहले इमाम हज़रत अली को मस्जिद में इब्ने मुल्जिम नाम के स्वयं को 'मुसलमान' कहने वाले एक व्यक्ति के द्वारा हज़रत अली को नमाज़ के दौरान सजदे में होने की हालत में शहीद कर दिया गया था? आश्चर्य की बात है कि आतंकी विचारधारा रखने वाले कश्मीरी आतंकी हों या तालिबानी, यह सभी हज़रत अली को तो अपना ख़लीफ़ा ज़रूर मानते हैं परन्तु इनकी 'कारगुज़ारियां ' तो क़ातिल-ए-अली यानी इब्ने मुल्जिम वाली हैं ? यदि इन हत्यारों को धर्म व धर्मयुद्ध का ज़रा भी ज्ञान होता तो इन्हें मालूम होता कि निहत्थे पर वार करना तो दूर यदि युद्ध के दौरान किसी लड़ाके के हाथ की तलवार भी टूट जाती या हाथ से छूट जाती तो सामने वाला आक्रमणकारी अपनी तलवार को भी मियान में रख लेता क्योंकि निहत्थे पर हमला करना युद्ध नीति के विरुद्ध है। किसी मर्द द्वारा औरतों पर हमले करने का तो सवाल ही नहीं उठता था। कमज़ोर, अल्पसंख्यक, निहत्थे, नमाज़ी अथवा इबादत गुज़ार लोगों की हत्या का तो दूर तक इस्लाम से कोई वास्ता ही नहीं।


परन्तु जब जब इस्लाम पर साम्राज्यवाद हावी हुआ है तब तब इस तरह की नैतिकताओं को ध्वस्त होते भी देखा गया है। हज़रत अली की पत्नी व हज़रत मुहम्मद की बेटी हज़रत फ़ातिमा पर इसी मानसिकता के मर्दों ने हमला किया था। उनके घर के दरवाज़े में आग लगाकर जलता हुआ दरवाज़ा उनपर गिरा दिया गया था और उन्हें शहीद कर दिया गया। फिर हज़रत अली को मस्जिद में सजदे की हालत में इब्ने मुल्जिम द्वारा पीछे से सिर पर वार कर शहीद कर दिया गया। इसी तरह इराक़ स्थित करबला में हज़रत इमाम हुसैन के एक घुड़सवार के मुक़ाबले सैकड़ों यज़ीदी सैनिक लड़ते थे और तलवारें टूटने व छूटने के बाद भी लड़ते और हुसैन के भूखे प्यासे सैनिक को शहीद कर देते। औरतों को गिरफ़्तार करना, उनके हाथों व गलों में रस्सियां बांधना, उन्हें बे पर्दा बाज़ारों में फिराना यह सब यज़ीदी दौर-ए-हुकूमत का चलन था। करबला में भी यज़ीद इस्लामी साम्राजयवाद के अस्तित्व व विस्तार की लड़ाई लड़ रहा था और तालिबानी भी वही लड़ाई लड़ रहे हैं। गोया अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान से लेकर कश्मीर तक जहाँ भी ऐसी आतंकवादी घटनायें घटित हों जिनमें अल्पसंख्यकों की हत्याएं की जा रही हों, औरतों, बच्चों व बुज़ुर्गों को मारा जा रहा हो, निहत्थों पर हमले हो रहे हों तो यही समझना चाहिये कि यह मुसलमानों या इस्लामी समुदाय से जुड़े लोग नहीं बल्कि यह उस यज़ीदी विचारधारा के लोग हैं जिसने करबला में हज़रत मुहम्मद के नवासे हज़रत इमाम हुसैन के पूरे परिवार को इसी लिये क़त्ल कर दिया था क्योंकि वे यज़ीद के ज़ुल्म व अत्याचार के शासन के विरुद्ध थे और उस जैसे व्यक्ति को इस्लामी शासन के प्रतिनिधि होने के दावे को ख़ारिज करते थे।


विश्व के उदारवादी समाज को विशेषकर उदारवादी व प्रगतिशील मुसलमानों को यह समझना होगा कि आख़िर क्या वजह है और कौन सी वह विचारधारा है कौन लोग हैं जो आज भी गुरद्वारों, मंदिरों व मस्जिदों पर हमले करते हैं ? कौन हैं वह लोग जो आज भी इमामों के रौज़ों, पीरों फ़क़ीरों की दरगाहों, इमाम बारगाहों, मज़हबी जुलूसों, स्कूलों, बाज़ारों जैसी अनेक सार्वजनिक जगहों पर बेगुनाहों व निहत्थों का ख़ून बहाते फिरते हैं। इन सभी आतंकियों के आक़ाओं द्वारा इनको यही समझाया जाता है कि आतंकी मिशन को 'जिहाद' कहा जाता है और इस दौरान मरने वाले को 'शहादत ' का दर्जा हासिल होता है तथा बेगुनाहों व निहत्थों को मार कर वापस आने पर उन्हें 'ग़ाज़ी' के लक़ब से नवाज़ा जाता है और इन सब के बाद मरणोपरांत उन्हें जन्नत नसीब होगी।' परन्तु यह शिक्षा पूरी तरह ग़ैर इस्लामी व ग़ैर इंसानी है। ऐसे वहशी लोग तो जन्नत के नहीं बल्कि जहन्नुम के असली हक़दार हैं।


-तनवीर जाफ़री-





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जनजातीय समाज में शारदीय नवरात्रि

हिन्‍दू धर्म से वनवासी समाज को अलग परिभाषित करने के सभी विभाजनकारी षड्यंत्र तब धवस्‍त हो जाते हैं, जब इनकी मान्‍यताएँ, पर्व, रहन-शैली, विचार मेल खाते हैं। बाघ देवी, ज्वाला देवी, गांव देवी और वन देवी की पूजा-अर्चना तथा अंचलों में मंदिर, पट, मढिया इसके ज्वलंत उदाहरण है। शारदीय नवरात्रि ऐसा पर्व है, जो वनवासी क्षेत्रों में भी धूमधाम से मनाया जाता है, यह सिद्ध करता है कि हम हिन्‍दू हैं, भले ही हमारे निवास स्‍थान, रहन-सहन अलग-अलग हैं। ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में शारदीय नवरात्रि दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। नौ दिनों तक मनाई जाने वाली इस पूजा में माँ दुर्गा के सभी नौ रूपों की पूजा होती है। वनवासी क्षेत्रों की नवरात्रि पूजा ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों से तनिक भिन्‍न है। इनके नामों व पूजा पद्धति में विविधता है। वनवासी देवी माँ से अच्‍छी फसल, वर्षा व प्रकृति संरक्षण की याचना करते हैं। भील समाज में नवणी पूजा, गोंड समाज में खेरो माता, देवी माई की पूजा, कोरकू समाज में देव-दशहरा के रुप में देवी माँ की पूजा होती है। भील समाज में नवणी पर्व नवणी में भील अपनी कुलदेवी व दुर्गा-भवानी का पूजन करते हैं। यह त्यौहार अश्विन (कुआर) माह में शुक्ल पक्ष की पड़वा से प्रारम्भ होता है। पूरे वर्षभर में हुई गलतियों के लिये सभी देवी-देवताओं से क्षमा याचना करते हैं। 


नवणी से पहले स्‍वच्‍छता की दृष्टि से घरों की गोबर व मिट्टी से लिपाई होती है। व्रती सागौन की पाटली (पटिया) सुतवार (बढ़ई) से बनवाकर उस पर चाँद व सूर्य उकेरवाता है। घर या आंगन में चौका पुराया जाता है। पाटली में शुद्ध धागा नौ बार लपेटा जाता है, उसी चौके पर पाटली की स्‍थापना कर पूजा की जाती है। जिस सागौन से पाटली काटी गयी होती है, उसे भी कच्‍चा सूत व नारियल भेंट किया जाता है। बाँस की छोटी-छोटी पाँच या सात टोकरियों में मिट्टी डालकर गेहूँ बोया जाता है, इसे बाड़ी, जवारा या माता कहते हैं। यह जवारा नवमी तिथि को संध्या की बेला में नदी में विसर्जित होता है। श्रद्धालु खप्पर, गीत गाते नदी तट पर जवारा लेकर जाते हैं। जिसे श्रद्धा स्वरूप एक दूसरे को देते हैं।


गोंड ही नहीं, कोरकू जनजाति में भी कई दशहरे मनाये जाते हैं, जिसमें से एक दशहरा कुआर की नवरात्रि है। गोंड समाज के लोग गाड़वा (वृत्‍ताकार में भूमि में धंसाये गई लकड़ी) के सामने ककड़ी को बकरे का प्रतीक मानकर काटते हैं। अपने ईष्‍ट से याचना करते हैं कि वर्षभर हमें कुल्‍हाड़ी, हंसिया चलाना पड़ता है, उसमें कोई हानि न हो। गोंड समाज में खेरो माता की पूजा होती है। गोंड समाज में खेरो माता को गाँव की मुख्य देवी का दर्जा प्राप्त है। कोरकू समाज में कुआर माह में देव-दशहरा मनाया जाता है। इस पूरे पर्व में मुठवा देव, हनुमान, पनघट देव, बाघ देव, नागदेव, खेड़ा देव आदि की पूजा होती है। कोरकू लोग अपने देवी-देवताओं के चबूतरे पर गाते-बजाते हैं, जिसे 'धाम' कहते हैं। कोरकू समाज में भी इस पर्व पर बलि देने की मान्‍यता है। इस पर्व से संबंधित कुछ निषेध भी हैं - दशहरे के पहले खलिहान नहीं लीपा जा सकता, अशुभ माना जाता है। दशहरा पर अस्त्र-शस्त्र पूजन के साथ प्रकृति के वाहक इस समुदाय में नीलकंठ दर्शन और सोने अर्थात शमी के पत्ते का अर्पण शुभकारी है।


त्‍यौहार सम्‍पन्‍न होने तक सागौन के पत्‍तों की पोटिया भी नहीं बनाए जा सकते बाँस काटना भी वर्जित है। सागौन के पत्‍तों की तह करके बंडल बनाने को पोटिया कहते हैं, ये पोटिया घर की छपरी आदि बनाने के लिए वाटर प्रूफ का काम करते हैं। मुठवा देव की पूजा से पहले हनुमान की पूजा करते हैं। हनुमान को लंगोट और नारियल चढ़ाया जाता है। हनुमान की पूजा सबसे पहले करने की मान्‍यता के पीछे इनका तर्क है कि हनुमान 'रगटवा सामान' अर्थात खून आदि स्‍वीकार नहीं करते। जबकि मुठवा देव को शराब व चूजा भेंट किया जाता है। मुठवा देव की पूजा के बाद पनघट देव, बाघ देव, नागदेव, खेड़ा देव की पूजा होती है। पूजा के बाद सागौन या खाखरा के पत्तों में भोजन कराया जाता है। भोजन से निवृत्त होने के बाद सभी सागौन के छह-छह पत्ते तोड़ते हैं। इन छह पत्तों से पोटिया बनाते हैं। इस नियम को पूरा करने के बाद लोग सागौन के पत्ते तोड़ सकते हैं। ये परम्पाराएं आज भी पुरातन भाव से चलायमान है।


सनातन-हिन्दू धर्म का जनजातीय समाज एक अभिन्न अंग अपने विकासकाल से ही रहा है, यह अलग बात है कि सभ्यताओं के विकास एवं लगातार आक्रमणों के कारण जनजातीय समाज के स्थान परिवर्तन एवं परम्पराओं, संस्कृति, विवाह, रीतिरिवाज, पूजा पध्दति, बोली एवं कार्यशैली में भले ही आंशिक अन्तर दिखता हो। किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष में सनातन हिन्दू समाज की जनजातीय एवं गैर जनजातीय इकाइयों का मूल तत्व एवं केन्द्र हिन्दुत्व की धुरी ही है।


-हेमेन्द्र क्षीरसागर-




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गहरी नींद से पाएं प्राकृतिक सौन्दर्य


चेहरे पर प्राकृतिक आभा और आकर्षण के लिए महँगे सौन्दर्य उत्पादों के बजाय एक अच्छी और सुकून भरी नींद बेहद अहम होती है। भरपूर नींद लेने से दिमाग को शान्ति मिलती है, पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है, जिससे आप आंतरिक तौर पर स्वस्थ रहते हैं। इससे बाहरी खूबसूरती निखरने लगती है और आप सुन्दर, सौम्य और आकर्षक दिखने लगती हैं।


क्या आप जानती हैं कि गहरी नींद आपकी खूबसूरती को चार चाँद लगा सकती है। रोजाना 8-9 घण्टे गहरी नींद लेने से शरीर तरोताजा हो जाता है। जब आप गहरी नींद में होती हैं तो आपके शरीर में खून का संचार बढ़ता है, इससे आपके चेहरे की आभा बढ़ जाती है। गहरी नींद से आपके शरीर में कोलेजन का पुनर्निर्माण होता है तथा आपके चेहरे की मांसपेशियों को आराम मिलता है। जब हम नींद में होते हैं तो हमारे तनाव के हार्मोंस (कॉर्टिसॉल) कम हो जाते हैं तथा हमारी नींद के हार्मोंस (मीलाटोनिन) बढ़ जाते हैं। हमारी त्वचा और पूरा शरीर स्वयं का पुनर्निर्माण करता है या हम यह कह सकते हैं कि दिन में हमारी त्वचा को प्रदूषण या सूर्य की किरणों से हुए नुकसान की भरपाई रात की नींद करती है।


रात को पूरी नींद न आने पर आंखों में सूजन आ जाती है क्योंकि तनाव की वजह से कोर्टलिस का स्तर बढ़ जाता है। जिससे आपके शरीर में विद्यमान अम्ल का स्तर बदल जाता है और शरीर में पानी की मात्रा में अधिकता आ जाती है। यही वजह है कि चेहरे या आंखों के नीचे सूजन आ जाती है। जब आप सो रही होती हैं तो त्वचा की नई कोशिकाएं तेजी से विकसित होती हैं, जिससे सुबह उठते ही आपको ताजगी का अहसास होता है तथा आप सुंदर दिखाई देती हैं।


मेरा यह मानना है कि अगर जवान और आकर्षक दिखना चाहती है तो रात को 9 से 11 बजे तक हर हालत में सो जाइए। अपनी त्वचा को झुर्रियों से परे रखने के लिए पीठ के बल सोना सबसे उपयोगी होता है क्योंकि इससे त्वचा पर पड़ने वाले दबाव से क्रीजिंग हो जाती है, जिससे झुर्रियां रोकी जा सकती है। रात की गहरी नींद आपके बालों को काला, लम्बा तथा आकर्षक बनाए रखने में मदद करती है। गहरी नींद शरीर में प्रोटीन के उपयुक्त संश्लेषण के लिए अत्यंत आवश्यक होती है जो कि हार्मोंस को प्रभावित करती है जिससे आपके बालों की वृद्धि तथा चमक प्रभावित होती है।


अक्सर लोगों को यह कहते देख गया है कि आप थके-थके लग रहे हो। यह तब होता है जब हम पर्याप्त नींद नहीं ले पाते जिसकी वजह से चेहरे पर काले धब्बे उभर आते हैं तथा त्वचा अपनी प्राकृतिक आभा खो देती है। रात को पर्याप्त नींद से शरीर में विषैले पदार्थ खत्म हो जाते हैं एवं पुरानी कोशिकाएं हट जाती हैं। उनके स्थान पर नई कोशिकाएं पैदा हो जाती हैं और हम युवा दिखने लगते हैं। पर्याप्त नींद के अभाव में शरीर में रक्त का संचार कम हो जाता है, जिससे त्वचा मुरझाई तथा बेजान लगने लगती है।


बेहतर नींद के लिए प्रतिदिन रात्रि में सोने तथा सुबह उठने का समय नियमित रखें। रात्रि को सोने से पहले चाय, शराब, काफी या तामसिक पदार्थों से परहेड करें क्योंकि इससे मस्तिष्क की शिराएँ उत्तेजित हो जाती हैं जो अच्छी नींद में व्यवधान डालती हैं। हमेशा मध्य रात्रि यानि 11 बजे से पहले नींद ले लें।


पर्याप्त नींद न लेने की वजह से आप थके-थके महसूस कर सकते हैं जिससे आपका मनोबल गिर जाता है तथा आप तनावपूर्ण जीवन जीना शुरु कर देते हैं। एक ताजा अनुसंधान के अनुसार अनिंद्रा की वजह से लोग 10 गुना ज्यादा तनाव में रहते हैं। सोने से पहले अपने चेहरे, गर्दन, पांव को हल्के क्लीजर से धो डालिए। जिससे आपकी त्वचा पर दिनभर में मेकअप, गन्दगी, धूल-मिट्टी को हटाने में मदद मिले। अपनी नाइट क्रीम तथा आई जैल सोने से बीस मिनट पहले जरूर लगा लीजिए ताकि यह त्वचा में समा जाए तथा तकिया खराब ना हो। रात्रि में सोने से आधा घण्टा पहले गुनगुने पानी से नहाने से आपकी मांसपेशिओं और तंत्रिकाओं को आराम मिलता है, जिससे आपको अच्छी नींद आती है।


अगर आप पर्याप्त नींद नहीं लेते हैं तो निंद्रा के अभाव में शरीर में ‘घरेलिन’ तत्व बढ़ जाते हैं। इनकी वजह से भूख बढ़ जाती है और शरीर में फैट बढ़ने से वजन बढ़ना शुरू हो जाता है। यदि आप नियमित रूप में जिम जाती हैं या व्यायाम व योग कर रही हैं तथा इसके बावजूद आपका वजन बढ़ता है तो आप अपनी नींद पर ध्यान दें। रात्रि में सोते समय जल मिश्रित भोजन ग्रहण करें। रात को पानी पीने की जगह पानीयुक्त सब्जियाँ, फलों का सेवन करें। अगर आप रात में पर्याप्त नींद नहीं ले पाएं तो दिन में आधा घण्टा सोने से आपका मूड तरोताजा हो जायेगा और आपकी स्मरण शक्ति और एकाग्रता भी बढ़ेगी।


-शहनाज़ हुसैन-

(लेखिका अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्ति सौन्दर्य विशेषज्ञ हैं।)









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शिमला दूरदर्शन को ‘अच्छे दिनों’ का इंतजार

वर्ष 1994 में शिमला दूरदर्शन की स्थापना की गई थी। देश के अन्य सभी क्षेत्रीय दूरदर्शन केंद्रों की तर्ज पर इसका उद्देश्य भी हिमाचल की लोक संस्कृति, लोक परंपराओं, साहित्य, कला व संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन करना था। समाज के प्रत्येक वर्ग की हिस्सेदारी हो और उनकी समस्याएं व जन आकांक्षाएं इस केंद्र से प्रतिबिम्बित हों। लेकिन सच पूछें तो अनेक कारणों के चलते गत 27 सालों में यह केंद्र पंगु सा बना रहा। शुरू से ही प्रॉडक्शन स्टॉफ की यहां घोर कमी रही और कैज़ुअल स्टाफ के सहारे ये केंद्र धीमी गति के समाचारों की तरह रेंगता रहा। जालंधर या दिल्ली से दूरदर्शन केंद्रों से स्टाफ को जब-जब यहां ट्रांसफर किया गया, उन्हें शिमला की आबोहवा माफिक नहीं आई और वे यहां ज्वाइन बाद में करते और पुनः अपने पसंदीदी स्टेशन पर लौटने के लिए जुगत भिड़ाते रहते। यह केंद्र एक भी कार्यक्रम ऐसा प्रोडयूस नहीं कर पाया, जिसकी गूंज कई सालों तक सुनाई दी हो। यहां से प्रसारित होने वाले सायं 3 बजे से 7 बजे तक यानी 4 घंटे के कार्यक्रमों को केवल नैटवर्क के संचालक प्रसारित करने से गुरेज करते रहे। जब डीटीएच यानी डायरैक्ट टू होम डिश टीवी तकनीक ने पांव पसारने आरंभ किए तो हिमाचल में दर्शकों ने आमतौर पर दूरदर्शन केंद्र के कार्यक्रमों से किनाराकशी सी कर ली। प्राइवेट टीवी चैनलों का गत 25 सालों में कुकरमुत्तों की तरह जाल फैलता गया और दर्शक उनकी मनोरंजक छवि या चकाचौंध की गिरफ्त से न बच पाए। ऐसे में शिमला दूरदर्शन केंद्र सहित देश के अधिकांश केंद्र मृतःप्राय से होकर रह गए। बावजूद इसके कि इन केंद्रों ने विज्ञापन व कमर्शियल्स के रूप में करोड़ों रुपए कमाकर भारत सरकार के राजस्व कोष में इज़ाफा किया। लेकिन आलम यह है कि सरकार के एकतरफा प्रचार में संलग्न सभी दूरदर्शन केंद्र कभी भी स्वायत्त या पारदर्शी छवि का निर्माण नहीं कर पाए। ताज़ा खबर के अनुसार प्रसार भारती ने हिमाचल में फैले सात टावरों को बंद करने का निर्णय लिया है। शायद नई तकनीक के कारण। लेकिन 50 से अधिक तकनीकी अधिकारियों की नौकरी पर संकट आ गया।


1994 के बाद जब शिमला दूरदर्शन ने आंखें खोली थीं तो वह शैशव काल में था। बाद के सालों में इसके विस्तार व प्रसारण के लिए शिमला, कसौली व धर्मशाला में तीन एचपीटी टावर लगाए गए थे तो मनाली, कुल्लू, मंडी और बिलासपुर में चार एलपीटी टावर हैं। प्रसार भारती ने एंटीना पर दूरदर्शन के प्रसारण को बंद करने का निर्णय लिया है। 31 अक्तूबर 2021 से कुल्लू टावर के स्थानीय प्रसारण भी बंद हो जाएंगे। कोरोना काल में देशभर में दूरदर्शन केंद्रों की कार्यप्रणाली पर विपरीत प्रभाव पड़ा और ‘फील्ड’ में जाकर जनता के बीच बैठकर या उनकी समस्याओं, आकांक्षाओं के अनुसार जिन प्रोग्रामों का निर्माण किया जाता था, वे बंद हो गए। कलाकारों, लेखकों को मिलने वाला पारिश्रमिक या मानदेय भी बंद हो गया। अनेक कलाकार या लेखक तो दूरदर्शन से प्राप्त होने वाले पारिश्रमिक से ही अपनी गुजर बसर करते थे। उनकी बुकिंग बंद हो गई। शिमला दूरदर्शन केंद्र भी पंगु सा होकर रह गया। सरकार ने उसके बजट में भारी कटौती कर दी। केवल गीत-संगीत के प्रोग्राम चलते रहे और चल रहे हैं। कोरोना काल में दूरदर्शन केंद्रों को उन रोगियों से बातचीत कर प्रोग्राम तैयार करने चाहिए थे जो मौत के मुंह से स्वस्थ होकर घर लौटे। डाक्टरों, नर्सों, पुलिसकर्मियों या प्रशासन के अधिकारियों के अनुभव भी सांझा किए जाने चाहिए थे, ताकि वे जनता के लिए प्रेरक का काम करते। लेकिन मुट्ठी भर स्टाफ के सहारे रेंगने वाले शिमला दूरदर्शन केंद्र में लेखकों, कलाकारों व अन्य लोगों का प्रवेश वर्जित सा रहा और स्टाफ का फील्ड में जाकर रिकार्डिंग करना तो नामुमकिन सा प्रस्ताव था।


छिट-पुट प्रयास होते रहे लेकिन वे नाकाफी और असंतोषजनक थे। जिन संघर्षशील फिल्म निर्माताओं की लघु व शार्ट फिल्में दूरदर्शन रॉयल्टी पर प्रसारित करता था, उसका बजट भी समाप्त कर दिया गया। यानी रॉयल्टी पर दूरदर्शन अब किसी भी कलाकार या फिल्म निर्माता की फिल्म का प्रसारण नहीं कर सकता। दूरदर्शन को सरकार विज्ञापनों के ज़रिए नोट छापने वाली मशीनों के रूप में ही देखती है। जनता जनार्दन के प्रति अपने दायित्व और सरोकारों के प्रति मुक्त? सरकार ने दूरदर्शन केंद्रों को सुदृढ़ करने की बजाय उसके पर कतरने शुरू कर दिए। इस कड़ी में राज्य सभा व लोकसभा टीवी चैनलों को बंद कर संसद टीवी शुरू किया गया है जिसमें प्रोफैशनल स्टाफ नदारद बताया जाता है। हिमाचल में शिमला दूरदर्शन केंद्र को 24 घंटे के प्रसारण केंद्र के रूप में स्थापित करने का राग 20 साल से सुना जा रहा है। इसके प्रयास जब-जब किए गए, कतई निष्फल साबित हुए। राजनेता घोषणाओं से अखबारों में हैडलाइन्स बटोरते रहे बस। ओम गौरी दत्त शर्मा के कार्यकाल में इस केंद्र में कुछ सक्रियता देखने को मिलीं। लेकिन कल्पनाशीलता का अभाव यहां प्रोडयूस होने वाले प्रोग्रामों में बना रहा।


इस केंद्र ने हिमाचल की लोक संस्कृति, कला व साहित्य के संरक्षण की दिशा में गत 20 सालों में जितने भी प्रयास किए, उनका स्तर संभवतः काबिले-तारीफ नहीं रहा। जनसमस्याओं, जनशिकायतों के निवारण में यह दूरदर्शन केंद्र अहम भूमिका निभा सकता था। जनमंच के माध्यम से जनप्रतिनिधियों से संवाद स्थापित कर। लेकिन डीडी न्यूज़ के तहत केंद्र से प्रसारित होने वाले प्रादेशिक सामाचारों में मुख्यमंत्री, मंत्रियों या दीगर नेताओं के कार्यक्रमों की कवरेज या फिर ‘प्रेस नोट जरनेलिज़म’ की भरमार रहती है और जनसमस्याओं का दपर्ण धूमिल है। 24 घंटे तक किसी भी टीवी चैनल के संचालन के लिए एक बड़े ‘मास्टर प्लान’ की आवश्यकता होती है। बड़ी संख्या में स्टाफ की दरकार होती है। 1994 से लेकर 2021 तक 27 सालों में शिमला दूरदर्शन विज्ञापनों के ज़रिए तकरीबन 25 करोड़ से ज्यादा कमा कर राजस्व जुटा चुका है। 2020-21 के वित्तीय वर्ष में कोरोना संकट के दौरान इस केंद्र ने 1 करोड़ 30 लाख रुपए ‘कमर्शियल्स’ के रूप में कमाए। ऐसे में सूचना व प्रसारण मंत्रालय को इसके विस्तार यानी 24 घंटे के डीटीएच प्रसारण पर तुरंत निर्णय लेना चाहिए। हाल ही में जब हिमाचल के युवा व जुझारू सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का बतौर कैबिनेट मंत्री कार्यभार संभाला तो उन्होंने प्रोफेशनल अधिकारियों की टीम को दिल्ली स्थित दूरदर्शन निदेशालय से शिमला भेजा था, लेकिन संभवतः तकनीकी कारणों से अभी मंजिल दूर प्रतीत होती है। अनुराग ठाकुर अगर ठान लें तो यह सपना अवश्य साकार होगा।


-राजेंद्र राजन-








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विश्व डाक दिवस: 181 वर्ष पूर्व जारी हुआ था पहला डाक टिकट


विश्वभर में प्रतिवर्ष 9 अक्तूबर को ‘विश्व डाक दिवस’ मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य हमारे दैनिक जीवन में डाक के महत्व को दर्शाना तथा इसकी उपयोगिता साबित करना है। 9 अक्तूबर 1874 को स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में 22 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद ‘यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन’ का गठन किया गया था। भारत 1 जुलाई 1876 को यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बना, जो इसकी सदस्यता लेने वाला पहला एशियाई देश था।


1874 में हुई ‘यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन’ की याद में जापान के टोक्यो में 9 अक्तूबर 1969 को आयोजित विश्व डाक संघ के सम्मेलन में इसी दिन ‘विश्व डाक दिवस’ मनाए जाने की घोषणा की गई। तभी से प्रतिवर्ष 9 अक्तूबर को ही अंतरराष्ट्रीय डाक सेवा दिवस मनाया जा रहा है। विश्व डाक दिवस का उद्देश्य ग्राहकों के बीच डाक विभाग के उत्पादों के बारे में जानकारी देना, उन्हें जागरूक करना और डाकघरों के बीच सामंजस्य स्थापित करना है।


विश्व में डाक व्यवस्था की शुरुआत करीब चार सौ साल पहले ही हो गई थी। 1516 में ब्रिटेन में डाक विभाग की स्थापना हुई थी, जिसे रॉयल मेल के नाम से जाना जाता है। इसका मुख्यालय वहां की राजधानी लंदन में है। फ्रांस में डाक विभाग की शुरुआत 1576 में ‘ला पोस्ट’ के नाम से की गई थी, जिसका मुख्यालय वहां की राजधानी पेरिस में है। जून 1600 में जर्मन सरकार द्वारा ‘ड्यूूश्च पोस्ट’ नाम से डाक सेवा की शुरुआत की गई, जिसका मुख्यालय बॉन में है। अमेरिका में ‘यूएस मेल’ नाम से डाक विभाग की स्थापना 1775 में हुई थी। श्रीलंका में 1882 में ‘श्रीलंका पोस्ट’ के नाम से डाक विभाग की स्थापना हुई, जिसका मुख्यालय कोलंबो में है।


यह तो बात हुई डाक व्यवस्था की शुरुआत की, अब यदि बात करें डाक टिकटों की शुरूआत की तो विश्व में डाक टिकटों का इतिहास करीब 181 वर्ष पुराना है। आज लगभग हर देश में वहां के डाक टिकटों की एक बेहतरीन श्रृंखला मिल जाएगी। यही नहीं, कुछ लोग तो ऐसे भी मिलेंगे, जिन पर डाक टिकटों के संग्रह करने का ऐसा जुनून सवार रहता है कि उनके पास आरंभ से लेकर अबतक के अधिकांश डाक टिकटों की दुर्लभ श्रृंखला मिल जाएगी। डाक टिकटों के ऐसे शौकीनों की आज दुनिया भर में कोई कमी नहीं है। अमेरिका के जेम्स रूक्सिन नामक व्यक्ति के पास तो विश्व के प्रथम डाक टिकट से लेकर अबतक के लगभग तमाम दुर्लभ डाक टिकटों का संग्रह है और उनके संग्रह में 40 हजार से भी अधिक डाक टिकट शामिल हैं। डाक टिकट जितना पुराना और दुर्लभ होता है, उसकी कीमत भी उतनी ही बढ़ जाती है और डाक टिकटों के संग्रह के शौकीन तो उसे हासिल करने के लिए मुंहमांगी कीमत देने को भी तैयार रहते हैं।


डाक टिकटों की शुरुआत कब, क्यों और कैसे हुई, इसका भी दिलचस्प इतिहास है। डाक टिकटों की विधिवत शुरुआत 6 मई 1840 को हुई थी, जब एक पैनी मूल्य का विश्व का पहला डाक टिकट जारी किया गया था, जिसे ‘ब्लैक पैनी’ के नाम से जाना गया क्योंकि यह डाक टिकट काली स्याही से छापा गया था। इस डाक टिकट के अस्तित्व में आने से पूर्व डाक टिकटों के स्थान पर ‘ठप्पा टिकटों’ का प्रयोग होता था, जो आयताकार, गोलाकार, त्रिकोणाकार अथवा अंडाकार होते थे और इन ठप्पों पर ‘पोस्ट पेड’ अथवा ‘पोस्ट नोन पेड’ इत्यादि लिखा होता था।


प्राचीनकाल में डाक सेवा का उपयोग राजा-महाराजा अथवा शाही घरानों के लोग ही करते थे और उस वक्त पत्रों अथवा संदेशों को लाने-ले जाने का काम उनके विशेष संदेशवाहक या दूत अथवा कबूतर या अन्य पशु-पक्षी करते थे, जिन्हें बाकायदा इस काम के प्रशिक्षित किया जाता था। बाद में जब आम लोगों को भी इसकी जरूरत महसूस होने लगी तो तय किया गया कि पत्रों की आवाजाही के शुल्क का भुगतान या तो पत्र प्रेषक करेगा अथवा प्राप्तकर्ता से शुल्क लिया जाएगा लेकिन अक्सर होने यह लगा कि प्रेषक पत्रों को अग्रिम भुगतान किए बिना ही भेज देता और प्राप्तकर्ता उसे लेने के बजाय वापस लौटा देता और तब प्रेषक भी शुल्क के भुगतान से बचने के लिए उसे लेने से इनकार कर देता। इससे सरकार को अनावश्यक आर्थिक क्षति झेलनी पड़ती थी।


डाक व्यवस्था की खामियों की वजह से लगातार हो रहे आर्थिक नुकसान के मद्देनजर ब्रिटिश सरकार को प्रसिद्ध आर्थिक सलाहकार रोलेण्ड हिल ने सलाह दी कि वह डाक व्यवस्था में मौजूद दोषों अथवा खामियों को दूर करने के लिए इसमें कुछ अनिवार्य संशोधन करे और डाक शुल्क के अग्रिम भुगतान के रूप में डाक टिकट तथा शुल्क अंकित लिफाफे जारी करे ताकि इनके जरिये अग्रिम डाक शुल्क प्राप्त हो जाने पर सरकार को घाटा न झेलना पड़े। अंततः ब्रिटिश सरकार ने काफी जद्दोजहद के बाद उनका सुझाव स्वीकार कर लिया और तब तक चले आ रहे ठप्पा टिकटों के बजाय डाक टिकटें जारी करने का फैसला कर लिया गया। इस प्रकार 10 जनवरी 1840 को डाक टिकट का आविष्कार हो गया, जो एक पैनी मूल्य का था लेकिन इसको विधिवत 6 मई 1840 को ही जारी किया गया। इस तरह यह विश्व का पहला डाक टिकट बन गया।


आधा औंस वजन तक के पत्रों के लिए डाक टिकट का मूल्य एक पैनी और एक औंस वजन के लिए दो पैनी निर्धारित किया गया। इसके अलावा जो लोग निजी लिफाफों या रैपरों के बजाय डाक विभाग द्वारा मुद्रित सामग्री का ही प्रयोग करना चाहते थे, उनके लिए एक पैनी व दो पैनी मूल्य के लिफाफे जारी किए गए। इसके करीब तीन वर्ष बाद दुनिया के अन्य देशों में भी डाक टिकटों का प्रचलन शुरू हो गया। ब्राजील में 1843 में, अमेरिका में 1847 में, बेल्जियम में 1849 में और भारत में 1854 में पहली बार डाक टिकट जारी किए गए।


-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)





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अहिंसा की ताकत को पहचानें आंदोलनकारी किसान, बवाल से देश को नुकसान हो रहा है

अहिंसा ताकतवरों का हथियार है। दमनकारी के खिलाफ वही सिर उठाकर खड़ा हो सकता है, जिसे कोई डर न हो, जो अहिंसक हो एवं मूल्यों के लिये प्रतिबद्ध हो। इस कसौटी पर कसेंगे, तो आपको साफ-साफ समझ में आ जाएगा कि मौजूदा समय में कौन निडर है और कौन भयभीत। कौन कितना नैतिक है और कौन कितना भ्रष्ट। पिछले तीन सौ दिनों में भारतीय जनमानस ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आन्दोलन की हिंसक, अराजक, अनुशासनहीन एवं अलोकतांत्रिक गतिविधियों के बावजदू अभूतपूर्व संयम और आत्मबल का परिचय दिया है। हाल की लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा हो या बार-बार भारत बंद जनता के लिये परेशानियों का सबब बना। हाइवे रोके गये, रेल की पटरियों पर प्रदर्शनकारियों ने रेल यातायात को अवरूद्ध किया। जनजीवन अस्तव्यस्त हुआ, परेशानियों के बीच आम आदमी का जीवन थमा ही नहीं, कड़वे अनुभवों का अहसास बना। हिंसा का ताण्डव भी बार-बार देखने को मिला। जबकि अहिंसा सबसे ताकतवर हथियार है, बशर्ते कि इसमें पूरी ईमानदारी बरती जाए।

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लेकिन देश में किसान आन्दोलन हो या ऐसे ही अन्य राजनैतिक आन्दोलन, उनमें हिंसा का होना गहन चिन्ता का कारण बना है। हिंसा और आतंकवाद की स्थितियों ने जीवन में अस्थिरता एवं भय व्याप्त कर रखा है। अहिंसा की इस पवित्र भारत भूमि में हिंसा का तांडव सोचनीय है। महावीर, बुद्ध, गांधी एवं आचार्य तुलसी के देश में हिंसा को अपने स्वार्थपूर्ति का हथियार बनाना गंभीर चिंता का विषय है। इस जटिल माहौल में आचार्य श्री महाश्रमण द्वारा अहिंसा यात्रा के विशेष उपक्रम के माध्यम से अहिंसक जीवनशैली और उसके प्रशिक्षण का उपक्रम और विभिन्न धर्म, जाति, वर्ग, संप्रदाय के लोगों के बीच संपर्क अभियान चलाकर उन्हें अहिंसक बनने को प्रेरित किया जाना न केवल प्रासंगिक है, बल्कि राष्ट्रीय जीवन की आवश्यकता है।


आचार्य श्री महाश्रमण ने दिनांक 9 मार्च 2014 को राजधानी दिल्ली के लाल किला प्राचीर से अहिंसा यात्रा का शुभारंभ किया था। उन्होंने उन्नीस राज्यों एवं तीन पड़ोसी देशों की करीब सत्तर हजार किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए अहिंसा और शांति का पैगाम फैलाया। नेपाल में भूकम्प, कोरोना की विषम परिस्थितियों में इस यात्रा का नक्सलवादी एवं माओवादी क्षेत्रों में पहुंचना आचार्य महाश्रमण के दृढ़ संकल्प, मजबूत मनोबल एवं आत्मबल का परिचायक है। इस यात्रा का समापन समारोह राजधानी दिल्ली में 27 मार्च 2022 को होना एक सुखद संयोग है। आचार्य महाश्रमण का देश के सुदूर क्षेत्रों- नेपाल, भूटान एवं श्रीलंका जैसे पड़ोसी राष्ट्रों सहित आसाम, बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडू, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि में अहिंसा यात्रा करना और उसमें अहिंसा पर विशेष जोर दिया जाना अहिंसा की स्थापना के लिये सार्थक सिद्ध हुआ है। क्योंकि आज देश एवं दुनिया हिंसा के महाप्रलय से भयभीत और आतंकित है। जातीय उन्माद, सांप्रदायिक विद्वेष और जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं का अभाव- ऐसे कारण हैं जो हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं और इन्हीं कारणों को नियंत्रित करने के लिए आचार्य महाश्रमण प्रयत्नशील हैं। इन विविध प्रयत्नों में उनका एक अभिनव उपक्रम है- ‘अहिंसा यात्रा’। आज अहिंसा यात्रा एकमात्र आंदोलन है जो समूची मानव जाति के हित का चिंतन कर रहा है। अहिंसा की योजना को क्रियान्वित करने के लिए ही उन्होंने पदयात्रा के सशक्त माध्यम को चुना है। ‘चरैवेति-चरैवेति चरन् वै मधु विंदति’ उनके जीवन का विशेष सूत्र बन गया है।


आचार्य महाश्रमण एक ऐसी आलोकधर्मी परंपरा का विस्तार है, जिस परंपरा को महावीर, बुद्ध, गांधी, आचार्य भिक्षु, आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ ने अतीत में आलोकित किया है। अतीत की यह आलोकधर्मी परंपरा धुंधली होने लगी, इस धुंधली होती परंपरा को आचार्य महाश्रमण एक नई दृष्टि प्रदान कर रहे हैं। यह नई दृष्टि एक नए मनुष्य का, एक नए जगत का, एक नए युग का सूत्रपात कही जा सकती है। वे आध्यात्मिक इन्द्रधनुष की एक अनूठी एवं सतरंगी तस्वीर हैं। उन्हें हम ऐसे बरगद के रूप में देखते हैं जो सम्पूर्ण मानवता को शीतलता एवं मानवीयता का अहसास कराता है। इस तरह अपनी छवि के सूत्रपात का आधार आचार्य महाश्रमण ने जहाँ अतीत की यादों को बनाया, वहीं उनका वर्तमान का पुरुषार्थ और भविष्य के सपने भी इसमें योगभूत बन रहे हैं। जीवन के छोटे-छोटे मसलों पर जब वे अपनी पारदर्शी नजर की रोशनी डालते हैं तो यूं लगता है जैसे कुहासे से भरी हुई राह पर सूरज की किरणें फैल गई। मन की बदलियां दूर हो जाती हैं और निरभ्र आकाश उदित हो गया है। आपने कभी देखा होगा ऊपर से किसी वादी को। बरसात के दिनों में अकसर वादियां ऐसी दिखाई देती हैं जैसे बादलों से भरा कोई कटोरा हो, और कुछ भी नजर नहीं आता। फिर अचानक कोई बयार चलती है और सारे बादलों को बहा ले जाती है और दृष्टिगत होने लगता है वृक्षों का चमकता हरा रंग। बस ऐसी ही बयार जैसे हैं आचार्य महाश्रमण के शब्द एवं कर्म। बादल छंटते हैं और जो जैसा है, वैसा ही दिखाई देने लगता है।


स्वल्प आचार्य शासना में आचार्य महाश्रमण ने मानव चेतना के विकास के हर पहलू को उजागर किया। श्रीकृष्ण, श्रीराम, महावीर, बुद्ध, जीसस के साथ ही साथ भारतीय अध्यात्म आकाश के अनेक संतों- आदि शंकराचार्य, कबीर, नानक, रैदास, मीरा आदि की परंपरा से ऐसे जीवन मूल्यों को चुन-चुनकर युग की त्रासदी एवं उसकी चुनौतियों को समाहित करने का अनूठा कार्य उन्होंने किया। जीवन का ऐसा कोई भी आयाम नहीं है जो उनके प्रवचनों-विचारों से अस्पर्शित रहा हो। योग, तंत्र, मंत्र, यंत्र, साधना, ध्यान आदि के गूढ़ रहस्यों पर उन्होंने सविस्तार प्रकाश डाला है। साथ ही राजनीति, कला, विज्ञान, मनोविज्ञान, दर्शन, शिक्षा, परिवार, समाज, गरीबी, जनसंख्या विस्फोट, पर्यावरण, हिंसा, जातीयता, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराधीकरण, भ्रूणहत्या और महंगाई के विश्व संकट जैसे अनेक विषयों पर भी अपनी क्रांतिकारी जीवन-दृष्टि प्रदत्त की है। जब उनकी उत्तराध्ययन और श्रीमद् भगवद गीता पर आधारित प्रवचन श्रृंखला सामने आई, उसने आध्यात्मिक जगत में एक अभिनव क्रांति का सूत्रपात किया है। एक जैनाचार्य द्वारा उत्तराध्ययन की भांति सनातन परम्परा के श्रद्धास्पद ग्रंथ गीता की भी अधिकार के साथ सटीक व्याख्या करना न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि प्रेरक भी है। इसीलिये तो आचार्य महाश्रमण मानवता के मसीहा के रूप में जन-जन के बीच लोकप्रिय एवं आदरास्पद है। वे एक ऐसे संत हैं, जिनके लिये पंथ और ग्रंथ का भेद बाधक नहीं बनता। आपके कार्यक्रम, विचार एवं प्रवचन सर्वजनहिताय होते हैं। हर जाति, वर्ग, क्षेत्र और सम्प्रदाय की जनता आपके जीवन-दर्शन एवं व्यक्तित्व से लाभान्वित होती रही है।


अपनी आवाज की डोर से कोई लाखों-करोड़ों में रूहानी इश्क का जुनून भर दे और यह अहसास दिलवा दे कि यह कायनात उतनी ही नहीं है जितनी हमने देखी है-सितारों से आगे जहां और भी हैं-आज के दौर में तो यह आवाज आचार्य महाश्रमण की ही है। महाश्रमणजी ने बहुत बोला है बोल रहे हैं और पूरी दुनिया ने सुना है और सुन रही है- किसी ने दिल थामकर तो किसी ने आस्थाशील होकर। लेकिन उनकी आवाज सब जगह गूंज रही है। पर जितना भी उन्होंने बोला है, मैं समझता हूं कि उसका निचोड़ बस इतना है कि आदमी अपनी असलियत के रूबरू हो जाए। शाम को जब आसमान पर बादल कई-कई रंगों से खिल जाते हैं तो वहां मैं भावों का नृत्य होते देखता हूं, समंदर की लहरों में, वृक्षों में, हवाओं में-भाव, भाव और भाव। आचार्य महाश्रमण को सुनना भी मेरे जैसे असंख्य लोगों के लिए ऐसा ही है जैसे कि हृदय को कई-कई भंगिमाओं से गुजरने का अवसर देना। यह आवाज हमारे वक्त की जरूरत है, आचार्य महाश्रमण हमारे वक्त की जरूरत है। आचार्य महाश्रमण के निर्माण की बुनियाद भाग्य भरोसे नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, पुरुषार्थी प्रयत्न, समर्पण और तेजस्वी संकल्प से बनी है। हम समाज एवं राष्ट्र के सपनों को सच बनाने में सचेतन बनें, यही आचार्य महाश्रमण की प्रेरणा है और इसी प्रेरणा को जीवन-ध्येय बनाना हमारे लिए शुभ एवं श्रेयस्कर है। इसी से किसान आन्दोलन जैसी समस्याओं का समाधान निकल सकता है।


-ललित गर्ग-

(लेखक, पत्रकार एवं समाजसेवी)

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शिक्षा संस्थानों में फिटनेस गतिविधियां हों

शिक्षा संस्थान में विद्यार्थी जीवन से ही अच्छे स्वास्थ्य की नींव रखी जाती है, परंतु क्या हमारे संस्थानों में विद्यार्थियों के लिए फिटनेस की  सुविधाएं उपलब्ध हैं। पिछले साल मार्च से हम कोरोना महामारी के कारण शिक्षा संस्थानों से दूर हैं। पढ़ाई  ऑनलाइन तो कभी ऑफलाइन हो ही जाती है, मगर फिटनेस के लिए घर पर भी कार्य नहीं हो रहा है। कोरोना के भयानक परिणामों को देखते हुए अब हर नागरिक की फिटनेस का आधार विद्यार्थी जीवन से ही मजबूत बनाना और अधिक जरूरी हो गया है। हवा में जब अधिक धूल-धुआं हो गया है और पृथ्वी पर जैसे-जैसे जीवन जीने की आवश्यक चीजें घटती जा रही हैं, वैसे-वैसे मानव को अब स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा सजग होना पडे़गा। अच्छे स्वास्थ्य की नींव बचपन से लेकर विद्यार्थी जीवन तक पक्की की जाती है। मगर हिमाचल प्रदेश के अधिकांश स्कूलों में प्रत्येक विद्यार्थी की स्वास्थ्य के लिए न तो सुविधा है और न ही पर्याप्त शिक्षक हैं। विद्यार्थी कितना फिट है, उसके लिए विद्यालय में कोई परीक्षा ही नहीं है। ऐसे में शिक्षा के कर्णधारों  के साथ-साथ अभिभावकों व विद्यालय प्रशासन को इस विषय पर अनिवार्य रूप से सोचना होगा कि हमारी आगामी पीढि़यों की फिटनेस व नैतिकता कैसे उन्नत हो सके। स्वास्थ्य के सिद्धांतों से नैतिकता का गहरा संबंध है। संयम, निरंतरता, निस्वार्थ सोच व ईमानदारी से कार्य निष्पादन हम खेल के मैदान में ही सही ढंग से सीख पाते हैं। किसी भी देश को इतनी क्षति युद्ध या महामारी से नहीं होती है जितनी तबाही नशे के कारण हो सकती है।


आज जब देश के अन्य राज्यों सहित हिमाचल प्रदेश में भी नशा युवा वर्ग पर ही नहीं किशोरों तक चरस, अफीम, स्मैक, नशीली दवाओं तथा दूरसंचार के माध्यमों के दुरुपयोग से शिकंजा कस रहा है, इसलिए विद्यालय व अभिभावकों को इस विषय पर सचेत हो जाना चाहिए। यदि विद्यार्थी  किशोरावस्था में नशे से बच जाता है तो वह फिर युवावस्था आते-आते समझदार हो गया होता है। इसलिए विद्यालय स्तर पर प्राथमिक से वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों को विभिन्न विधाओं में व्यस्त रखने के साथ-साथ शारीरिक फिटनेस  की तरफ मोड़ना बेहद जरूरी हो जाता है। विद्यार्थी के विकास के लिए खेलों के माध्यम से फिटनेस कार्यक्रम बहुत जरूरी हो जाते हैं, मगर कुछ विद्यार्थियों द्वारा बनी दो टीमें तो खेलने लग जाती हैं और सारा विद्यालय दर्शक बन जाता है। फिटनेस तो विद्यालय के हर विद्यार्थी को अनिवार्य रूप से चाहिए होती है। विद्यालय स्तर पर हर विद्यार्थी के लिए अभी तक कोई भी कार्यक्रम नहीं है। पिछले कुछ दशकों से हिमाचल प्रदेश के नागरिकों की फिटनेस में बहुत कमी आई है । इसके पीछे का प्रमुख कारण भी विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों के लिए किसी भी प्रकार के फिटनेस कार्यक्रम का न होना है। पढ़ाई की होड़ में हम विद्यार्थियों की फिटनेस को ही भूल गए हैं।


 हिमाचल प्रदेश की अधिकांश आबादी गांव में रहती है। वहां पर सवेरे-शाम  वर्षों पहले से ही विद्यार्थी अपने अभिभावकों के साथ कृषि व अन्य घरेलू कार्यों में सहायता करता था। विद्यालय आने-जाने के लिए कई किलोमीटर दिन में पैदल चलना पड़ता था। इसलिए उस समय के विद्यार्थी को किसी भी प्रकार के फिटनेस कार्यक्रम की कोई जरूरत नहीं थी। मगर अब घरेलू कार्यों से विद्यार्थी दूर हो गया है और विद्यार्थी घर के आंगन में बस पर सवार होकर विद्यालय के प्रांगण में उतरता है। पढ़ाई के नाम पर ज्यादा समय खर्च करने के कारण फिटनेस के लिए कोई समय नहीं बचता है। इस कॉलम के माध्यम से पहले भी कई  बार फिटनेस के बारे में सचेत किया जाता रहा है। जब अधिकतर स्कूलों के पास फिटनेस के लिए न तो आधारभूत ढांचा है और न ही कोई कार्यक्रम है तो फिर आज का विद्यार्थी फिटनेस व मनोरंजन के नाम पर दूरसंचार माध्यमों का कमरे में बैठ कर खूब दुरुपयोग कर रहा है। ऐसे में शिक्षा के द्वारा विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास की बात मजाक लगती है। आज के विद्यार्थी को अगर कल का अच्छा नागरिक बनाना है  तो हमें विद्यालय व घर पर उसके लिए सही फिटनेस कार्यक्रम देना होगा। तभी हम सही अर्थों में अपनी अगली पीढ़ी को शिक्षित करेंगे। बचपन से युवावस्था जैसे पढ़ाई का सही समय है, उसी प्रकार शारीरिक विकास का समय भी यही है। इस समय ही हमारे शरीर की रक्त वाहिकाओं के बढ़ने, मांसपेशियों व हड्डियों के मजबूत होने का समय है। इस सब के लिए भी फिटनेस कार्यक्रम अनिवार्य रूप से चाहिए क्योंकि एक उम्र बीत जाने के बाद भी हम इनका विकास नहीं कर सकते हैं।


 बिना फिटनेस कार्यक्रम के आज का विद्यार्थी अच्छा पढ़-लिख कर डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजर व अन्य बड़ा डिग्रीधारक तो बनकर नौकरी तो ले सकता है, मगर क्या वह साठ वर्ष की उम्र तक अपने कार्य का निष्पादन सही तरीके से कर सकता है। आज चालीस वर्ष पार करते ही बुढ़ापा आ रहा है। ऐसे में विद्यार्थियों को विद्यालय स्तर पर फिटनेस कार्यक्रम की बहुत जरूरत है। अमरीका व यूरोप के विकसित देशों के विद्यालयों में हर विद्यार्थी की सामान्य फिटनेस के लिए वैज्ञानिक आधार पर तैयार किए गए कार्यक्रम के साथ-साथ उचित आहार का भी प्रबंध  होता है। विद्यार्थी की फिटनेस कैसी है, इसके लिए साल में कई बार परीक्षा होती है। हमारे यहां कुछ स्तरीय विद्यालयों में फिटनेस कार्यक्रम तो हैं, मगर शारीरिक क्षमताओं को नापने के लिए कोई परीक्षण नहीं है। इस सबके लिए  विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों की सामान्य फिटनेस का मूल्यांकन कर उसमें सुधार के लिए सुझाव देकर सुधार करवाने के लिए ‘फिटनेस मूल्यांकन व सुझाव’ कार्यक्रम की शुरुआत जल्द ही करनी चाहिए। इस कार्यक्रम के अतंर्गत विद्यालय के हर विद्यार्थी का साल में तीन बार विभिन्न शारीरिक क्षमताओं का परीक्षण कर उनका मूल्यांकन किया जाए। पांच दशक पहले भी राष्ट्रीय स्तर से फिटनेस जागरूकता के लिए इस तरह के कार्यक्रम चले थे, मगर शिक्षा राज्य सूची का विषय होने के कारण बाद में धीरे-धीरे खत्म हो गए थे। अब फिर फाइलों में सीबीएसई फिटनेस टैस्टिंग की बात तो कर रही है, मगर धरातल पर तो अभी तक कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। शारीरिक स्वास्थ्य के सिद्धांतों को मद्देनजर रखकर फिटनेस विशेषज्ञों से कार्यक्रम बनवा कर उसे लागू करवाया जाए।


-भूपिंद्र सिंह-



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असाधारण ताकत से लबरेज भारतीय वायुसेना

सेनाएं देश की आन, बान, शान होती हैं, बिना इनके कोई देश खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता। इन्हीं की बदौलत हमारे जानमाल की रक्षा-सुरक्षा सुनिश्चित होती है। 8 अक्टूबर को भारतीय वायुसेना अपनी स्थापना की वर्षगांठ मनाती है। यह दिवस हम भारतवासियों को गौरवान्वित कराता है। वायुसेना की ये 89वीं वर्षगांठ है। वैसे वायुसेना के अलावा जल और थल की उपयोगिता और जरूरत हमारे लिए सब्जी में नमक जैसी है। लेकिन इंडियन एयर फोर्स की अहमियत कुछ अलहदा है। दैवीय आपदाएं हों, तूफान का कहर हो, विदेशों में आए संकट के दौरान फंसे अपने नागरिकों को एयरलिफ्ट करना हो या हमारे दूसरे सशस्त्र बलों की आसमानी सुरक्षा का जिम्मा, यह सब एयरफोर्स के कंधों पर ही होता है।


भारतीय वायुसेना से जुड़ा एक-एक जवान खुद को इसलिए भाग्यशाली मानता है कि उन्हें ऐसे तंत्र से जुड़ने का अवसर मिला जो देश की रक्षा में अपनी अग्रणी भूमिका निभाता है। वायुसेना के योगदान को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, जितना भी कहा जाए, कम होगा। मौजूदा खतरों के अंदेशों पर गौर करें तो पूर्वी लद्दाख में बीते कुछ दिनों से चीन के साथ हमारा तनातनी जैसा माहौल है। लेकिन वायुसेना विंग जिस मुस्तैदी के साथ मोर्च पर डंडा गाड़े खड़ा, उसे देखकर सीना चौड़ा होता है। दो-तीन दिन पहले बॉर्डर की सुरक्षा को लेकर वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने खुद कहा भी था कि कि चीन ने पूर्वी लद्दाख के पास तीन ठिकानों पर अपनी वायु सेना तैनात की है। उनका ये बयान पूर्वी लद्दाख और उत्तरी मोर्चे पर चीन द्वारा काफी संख्या में सैनिकों को तैनात करने के अलर्ट के बाद आया। दरअसल चीन भी हमारी तैयारियों को देखकर भयभीत है। वह इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि भारत की वायुसेना दूसरे मुल्कों के मुकाबले बहुत तगड़ी है। जबसे राफेल के बेड़े भारतीय वायुसेना में जुड़े हैं, वायुसेना की ताकत और बढ़ गई है।


पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक करके हमारी वायुसेना अपनी ताकत का लोहा मनवा चुकी है। भूल से भी दोबारा से पाकिस्तान भविष्य में कोई हिमाकत नहीं करेगा। हमारी एयरस्ट्राइक के बाद उन्होंने कई मर्तबा गीदड़भभकी दी थी कि वे भी देर-सवेर भारतीय सीमा में एयरस्ट्राइक करेंगे और अपने यहां तीन सौ से ज्यादा आतंकियों के मारे जाने का बदला लेंगे। खुदा न खास्ता गलती से भी उनकी ओर से कोई एयर स्ट्राइक हो जाती, तो उसके बाद पाकिस्तान का नामोनिशान मिट जाने का जिम्मेदार वह खुद होंगे। पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक करने के बाद दुनिया ने हमारी वायुसेना की ताकत को ठीक से भांपा, खासकर चीन ने। एयर चीफ ने आगे बताया कि चीन-पाक साझेदारी और दो मोर्चों पर युद्ध से भी हमें डरने की जरूरत नहीं है। दोनों मुल्क मिलकर भी हमारा बाल बांका नहीं कर सकते। दरअसल, वायुसेना में ऐसे लड़ाकू विमान शामिल हैं जिसकी मारक क्षमता पाकिस्तान के उस पार तक की है।


पिछले सप्ताह एयर चीफ मार्शल ने केंद्र सरकार विशेषकर प्रधानमंत्री को अपनी तैयारियों से अवगत कराते हुए बेफ्रिकी पर पूर्ण आश्वासन दिया था। सरकार का एक इशारा मात्र होगा पीओके हवाई मारक नहीं झेल पाएगा। पाकिस्तान अधिकृत पीओके में छोटे स्ट्रिप्स हैं जहां हेलीकॉप्टर जल्दी से उड़ान नहीं भर सकते हैं, वहां आबादी कम है, पहाड़ और जंगल ज्यादा हैं। उन जगहों पर भी लड़ाई लड़ने की भारतीय वायुसेना ने कमर कसी हुई है। कुछ मीडिया खबरों में आया है कि अफगानिस्तान में मालिबानियों के कब्जे के बाद चीन-पाक उनका इस्तेमाल कश्मीर में कर सकते हैं। उन खबरों को ध्यान में रखकर ही वायुसेना ने जबरदस्त तैयारियां की हुई हैं। सूचना कुछ ऐसी भी हैं कि चीन ने समूचे पूर्वी लद्दाख में बड़ी संख्या में फौज की तैनाती की है। लेकिन भारत भी हर खतरे से निपटने के लिए तैयार है।


गौरतलब है कि बीते कुछ ही दिनों के अंतराल में वायु सेना के अधिकारियों के बीच दर्जनों बार मीटिंग हो चुकी हैं। हमारे सीमा क्षेत्र से सटे उनकी अग्रिम मोर्चों पर हुई उनकी तैनाती वास्तविक रूप से हमारे लिए चिंता का विषय है, बावजूद इसके वायुसेना उनकी सभी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। हमारी वायुसेना इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ सैनिक संख्याओं में भी इजाफा कर रही हैं, जो किसी भी खतरे का सामना करने के लिए जरूरी भी है। ये आधुनिक भारत है, इससे टकराने का मतलब मुंह की खाना।


वायुसेना की 89वीं वर्षगांठ पर अधिकारियों की तरफ से गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस पर अपनी ताकत को दर्शाने के रूप में कई तरह की प्रदर्शनियों का आयोजन होगा, जिसे देखकर निश्चित रूप से दुश्मनों के दांत खट्टे होंगे। भारतीय वायुसेना अपने असाधारण सैन्य शक्ति के लिए जानी जाती है। एशियाई देशों में जब भी कोई संकट आया तो उन्होंने हमारी वायुसेना की मदद ली। ‘ऑपरेशन रेनबो’ को शायद ही कोई भूले।


ऑपरेशन के तहत श्रीलंका के लिए एयरलिफ्ट ऑपरेशन चलाया गया था। श्रीलंका सरकार के अनुरोध पर राहत कार्यों के लिए छह मध्यम लिफ्ट हेलिकॉप्टरों को श्रीलंका भेजा गया था। तीन हेलीकॉप्टरों ने 27 दिसंबर 2004 को और तीन ने 28 दिसंबर 2004 को अपनी पोजीशन लेकर काटुनायके और मिन्नी रिया बेस में हताहत निकासी, राहत सामग्री का वितरण, मेडिकल टीमों की तैनाती की और खाद्य सामग्री गिराई थी।


वहीं, ऑपरेशन ’कैस्टर’ जो मालदीव के लिए एयरलिफ्ट ऑपरेशन था जिसमें मालदीव सरकार के अनुरोध पर 02 पैराड्रॉप मॉडिफाइड, लंबी रेंज के एवीआरओ को 28 दिसंबर 04 को मालदीव में भेजा था। उन एयरक्राफ्टों ने विभिन्न छोटे रनवे पर लैंडिंग कर मालदीव के अंदर अंतरमहाद्वीपीय ऑपरेशन को अंजाम दिया था। इनके वायुयान से खाद्य सामग्री गिराना, जल और सामग्रियों की आपूर्ति और मेडिकल टीमों की तैनाती करना था।


यही कारण है ज्यादातर देश हमारी वायुसेना की तारीफ करते नहीं थकते। पलक झपकते ही कोसों मीलों की दूरी तय करने की अद्भुत क्षमता हमारी वायुसेना में ही विद्यमान है। ये ऐसे कारनामे हैं जिन्हें दुनिया ने देखे हुए हैं, इसलिए भारत पर हवाई हमला करने से पहले कोई भी देश सौ बार सोचेगा और मनन-मंथन करेगा। भारतीय वायुसेना के गठन की वर्षगांठ पर हमारी एयर शक्ति को दुनिया जरूरी देखेगी।


-डॉ. रमेश ठाकुर-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)




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कांग्रेस में नेहरू गाँधी परिवार का कोई विकल्प नहीं


स्वतंत्र भारत में जिन साम्प्रदायिक व विघटनवादी शक्तियों को कांग्रेस ने लगभग पचास वर्षों तक सत्ता के क़रीब आने का अवसर नहीं दिया वह भले ही कांग्रेस-मुक्त भारत की अवधारणा अपने दिल में लिये बैठे हों परन्तु हक़ीक़त तो यही है कि समयानुसार कांग्रेस पार्टी भी नए कलेवर,नए तेवर व नए नेतृत्व के साथ उभरती नज़र आ रही है। निश्चित रूप से इसी दौरान कांग्रेस कुछ ऐसे स्वार्थी नेताओं की वजह से आंतरिक उथल पुथल के दौर से भी गुज़र रही है जो सत्ता के भूखे होने के साथ साथ सिद्धांत व विचार विहीन भी हैं। परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि कांग्रेस इन चंद सत्ता लोभियों के पार्टी छोड़ने से समाप्त हो जायेगी। ब्रह्मानंद रेड्डी,देवराज अर्स जैसे कई विभाजन देखने व अनेकानेक दिग्गज नेताओं के किसी न किसी कारणवश पार्टी छोड़ने के बावजूद आज भी पार्टी देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में क़ायम है। और इसका श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ नेहरू-गाँधी परिवार को ही जाता है। 2014 में कांग्रेस कैसे सत्ता से बाहर हुई, कैसे पचास वर्षों तक दर्जनों हिंदूवादी संगठनों द्वारा हिंदुत्ववाद के विस्तार व धर्म-जागरण के नाम पर देश में साम्प्रदायिकता का प्रचार प्रसार कर,देश में ध्रुवीकरण की राजनीति कर तथा झूठ के रथ पर सवार होकर अन्ना आंदोलन के कंधे पर बैठकर, सत्ता हासिल की गयी यह पूरा देश देख रहा है।


इन परिस्थितियों में कांग्रेस नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता का प्रदर्शन करना चाहिए,अपने नेतृत्व पर विश्वास रखना चाहिये,संगठन का विस्तार करना चाहिए और देश को साम्प्रदायिक ताक़तों के चंगुल से मुक्त कराने के लिये समान विचार वाले संगठनों व नेताओं से तालमेल बनाना चाहिये। बजाये इसके कई राज्यों में सत्ता संघर्ष छिड़ा दिखाई दे रहा है। अनेक सिद्धांत व विचार विहीन तथाकथित कांग्रेसी नेता सत्ता की लालच में उसी दल में जा पहुंचे हैं जहां से कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया गया है। ऐसे तमाम दलबदलुओं को कुछ न कुछ 'लॉलीपॉप' दिया भी जा चुका है। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से पार्टी में ही कुछ ऐसे नेता अभी भी असंतुष्ट दिखाई दे रहे हैं जिनका अपना न तो कोई जनाधार है और सही मायने में तो ऐसे ही नेता पार्टी को कमज़ोर करने के ज़िम्मेदार भी हैं। इन 'असंतुष्टों' में कोई एक भी ऐसा नेता नहीं जो वर्तमान सरकार और उसकी जनविरोधी नीतियों का पूरी ताक़त के साथ विरोध करता दिखाई दे रहा हो। केवल नेहरू-गाँधी परिवार विशेषकर राहुल गांधी व प्रियंका गाँधी ही हैं जो हर उस जगह पहुँचती दिखाई दे रही हैं जहाँ लोग दुःख-पीड़ा या सरकार के दमनात्मक रवैय्ये से दुखी व परेशान हैं। सत्ता को उसके चुनावी वादों की याद भी केवल राहुल व प्रियंका गाँधी करवा रहे हैं।


बड़े आश्चर्य की बात है कि इन बातों का आंकलन वामपंथी युवा नेता कन्हैया कुमार व जिग्नेश मिवानी जैसे युवा नेता तो कर रहे हैं परन्तु कांग्रेस में रहने वाले नेता इस बात को या तो समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाह रहे। वामपंथी परिवेश में पला बढ़ा एक युवा नेता तो महसूस कर रहा है कि संविधान,लोकतंत्र तथा देश की रक्षा के लिये तथा गाँधी,अंबेडकर व भगत सिंह के सपनों के भारत के निर्माण के लिये कांग्रेस का शक्तिशाली होना ज़रूरी है परन्तु कांग्रेस में पले-बढ़े व सवार्थवश पार्टी में आयातित कुछ कांग्रेस नेताओं को उनका अहंकार,स्वार्थ,दंभ व अहम ही खाये जा रहा है। कांग्रेस के कमज़ोर होने के बावजूद जो लोग राहुल गाँधी के एक आक्रामक विपक्षी नेता के तेवरों से प्रभावित होकर तथा यह जानकर कि सत्ता की ऐश परस्ती व सुविधाओं से अभी कांग्रेस काफ़ी दूर है,उसके बावजूद कांग्रेस का दामन थाम रहे हैं वे कांग्रेस के हितैषी हैं या वह लोग जो दशकों तक सत्ता की मलाई खाने के बावजूद कांग्रेस के मात्र सात वर्षों के केंद्रीय सत्ता से बाहर रहने से घबरा कर अपनी सुविधानुसार उस दल में जा रहे हैं या जाने की फ़िराक़ में हैं जो सैद्धांतिक व वैचारिक रूप से कांग्रेस विरोधी है ?


रहा सवाल कांग्रेस में 'जी हुज़ूरी ' व ख़ुशामद परस्ती संस्कृति का तो यह विडंबना हमारे देश के सभी राजनैतिक दलों,संस्थाओं व संस्थानों की है। इसी संस्कृति को पहचानकर व इसका लाभ उठाकर अंग्रेज़ों ने हम पर हुकूमत की। सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का साहस हर एक व्यक्ति नहीं कर पाता। वर्तमान सत्ता के शीर्ष को ही देख लीजिये। पूरे मंत्रिमंडल से लेकर प्रशासन तक तथा बड़े बड़े मीडिया घराने तक एक ही व्यक्ति के समक्ष 'जी हुज़ूरी ' या ख़ुशामद परस्ती ही नहीं बल्कि 'साष्टांग दंडवत ' की मुद्रा में हैं। हमारे यहाँ तो पल भर में नेताओं को देवी-देवताओं का रूप तक दे दिया जाता है। उनके मंदिर तक बना दिये जाते हैं। इस मानसिक प्रवृति पर शीघ्र क़ाबू नहीं पाया जा सकता। निश्चित रूप से इस चाटुकार संस्कृति ने कांग्रेस को भी नुक़सान पहुँचाया है।


याद कीजिये 1987 में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के विरुद्ध कांग्रेस ने इलाहबाद उपचुनाव में सुनील शास्त्री जैसे कमज़ोर उम्मीदवार को प्रत्याशी बनाया था उस समय पार्टी की 'वर्तमान असंतुष्ट लॉबी' के इन्हीं नेताओं ने सुनील शास्त्री को प्रत्याशी बनाने की सलाह राजीव गाँधी को दी थी। अन्यथा यदि इलाहाबाद की जनता व पार्टी कार्यकर्ताओं की मांग पर अमिताभ बच्चन को ही विश्वनाथ प्रताप सिंह की कथित बोफ़ोर्स रिश्वत कांड के झूठे आरोपों की चुनौती स्वीकार करने के लिये उपचुनाव में उतारा गया होता तो कांग्रेस को आज यह दिन न देखने पड़ते। बड़ा आश्चर्य है कि नेहरू-गाँधी के चित्र व उनके नाम की बैसाखी के सहारे जिन लोगों ने विधायक,सांसद,मंत्री व मुख्यमंत्री पदों तक का सफ़र तय किया वही लोग आज सिर्फ़ इसलिये इस परिवार व इनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं क्योंकि पार्टी सत्ता से दूर है ?

कश्मीर से कन्याकुमारी तक कोई ऐसा कांग्रेस नेता नहीं जो अपने चुनाव क्षेत्र में नेहरू-गाँधी परिवार के सदस्यों के चित्र अपने चुनावी बैनर्स व पोस्टर्स में छपवाये बिना चुनाव लड़ता हो। इस परिवार ने स्वतंत्र संग्राम के समय व स्वतंत्र भारत में भी देश के लिये जो खोया है उसका मुक़ाबला कोई भी कांग्रेस नेता या उसका घराना नहीं कर सकता। आज भी देश के किसी भी राज्य में शहर से गांवों तक में जो आकर्षण इस परिवार के नेताओं के प्रति है वह किसी नेता में नहीं। अपनी सुविधापूर्ण ज़िन्दिगी को त्याग कर पार्टी को मज़बूत करने के लिये राहुल व प्रियंका गाँधी द्वारा जितनी मेहनत व मशक़्क़त की जा रही है वह देश देख रहा है। देश को यदि कांग्रेस से कोई उम्मीद दिखाई दे रही है तो वह राहुल व प्रियंका के युवा नेतृत्व में ही नज़र आ रही है। कहना ग़लत नहीं होगा कि कांग्रेस में नेहरू गाँधी परिवार का कोई विकल्प मौजूद नहीं है।





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दो हिस्सों में बंटी लोजपा

दो गुटों में बंटी लोक जनशक्ति पार्टी को लेकर चुनाव आयोग ने बड़ा फैसला सुनाया है। चुनाव आयोग ने लोकजनशक्ति पार्टी के दोनों गुटों को अलग-अलग पार्टी के तौर पर मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही चुनाव आयोग ने पुराना नाम और चुनाव चिह्न भी खत्म कर दिया है।आयोग ने चिराग पासवान के नेतृत्व वाले गुट को पार्टी का नया नाम लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) दिया है और चुनाव चिह्न हेलीकॉप्टर आवंटित किया है। वहीं, उनके चाचा पशुपति पारस को राष्ट्रीय जनशक्ति पार्टी और सिलाई मशीन चुनाव चिह्न प्रदान किया गया है। एलजेपी के संस्थापक और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के निधन के बाद पार्टी में दो गुट हो गया था। राम विलास के बेटे चिराग पासवान अकेले पड़ गए थे। वहीं, बाकी सांसद उनके चाचा पशुपति कुमार पारस के साथ चले गए थे। पार्टी के सिंबल को लेकर चाचा-भतीजा के बीच लगातार तनातनी का माहौल बना हुआ था। दोनों नेताओं की ओर से पार्टी के चिह्न हो लेकर दावा किया जा रहा था। लगातार इसको लेकर सियासत हो रही थी। पछले सप्ताह चुनाव आयोग ने लोजपा का चुनाव चिह्न जब्त कर लिया था। चाचा-भतीजा ने चुनाव आयोग से पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न जारी करने की मांग की थी। चुनाव आयोग ने दोनों नेताओं को पार्टी का नाम और चिह्न अलॉट कर दिया है। चिराग पासवान ने चुनाव आयोग को एक पत्र लिखकर इस मामले में पशुपति पारस गुट पर आरोप लगाया था कि पशुपति पारस का गुट जानबूझकर नामों और सिंबल का तीन विकल्प देने में देरी कर रहा है ताकि आयोग फैसला नहीं कर सके। चिराग ने आरोप लगाया था कि आयोग की ओर से फैसले में हो रही देरी से उनकी चुनावी तैयारियों पर भी असर पड़ रहा है। चिराग पासवान बिहार विधानसभा की दो सीटों पर 30 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव में अपने उम्मीदवार उतारना चाहते हैं। कुशेश्वरस्थान और तारापुर की सीट पर चिराग प्रत्याशी उतारेंगे।


पासवान के निधन के बाद छोटे भाई पशुपति कुमार पारस ने चार अन्य सांसदों की मदद से अपने भतीजे चिराग पासवान के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया, तो लोगों को हैरानी हुई थी। आखिकार, पासवान खानदान की मिसाल सियासत में पारिवारिक एकता बनाए रखने के कारण वर्षों से दी जाती रही। बिहार में इसकी पहचान ऐसे कुनबे के रूप में रही, जो अच्छे और बुरे वक्त में साथ रहा है। इसलिए इस चट्टानी एकता के टूटने से लोगों का हैरान होना लाजिमी था। एकता की इस डोर को रामविलास थामे रहे, वरना उनके जीवित रहते बगावत की नींव पड़ चुकी थी। रामविलास के कद के बराबर न तो चिराग थे और न ही पशुपति। लिहाजा साथ बने रहना दोनों की मजबूरी थी, मगर हसरतें जब-तब हिलारें मारती रहीं। पासवान ने हमेशा पार्टी से ज्यादा परिवार को अहमियत दी। परिवार से बाहर के नेता दल में आते और जाते रहे, लेकिन भाई-भतीजावाद के आरोपों से इतर, उनका आपसी प्यार उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं पर हमेशा भारी पड़ा। अब सब कुछ बदल गया है। चाचा पारस और भतीजे चिराग के बीच वर्चस्व की लड़ाई के कारण लोजपा दो टुकड़ों में टूट गई है। इस विभाजन से सबसे ज्यादा खुशी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को होगी। सियासी हलकों में चर्चा है कि लोजपा में जारी पारिवारिक जंग के पीछे उन्हीं का हाथ है। पिछले नवंबर में बिहार विधानसभा चुनावों में चिराग ने जनता दल-यू के सभी प्रत्याशियों के खिलाफ लोजपा के उम्मीदवार खड़े किए, जिससे नीतीश को करीब 35 सीटों का नुकसान झेलना पड़ा। साथ ही, भाजपा के साथ गठबंधन में उनकी हैसियत बड़े भाई से घटकर छोटे भाई की हो गई। नीतीश और जदयू के अन्य नेता सिर्फ इसलिए चिराग से खफा नहीं कि उन्होंने उनके खिलाफ बिहार चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने नीतीश पर सीधा प्रहार किया। जो भी हो आज लोजपा जहां है, वह रामविलास की देन है। अगला चुनाव पशुपति और चिराग का राजनीतिक भविष्य तय करेगा।


-सिद्वार्थ शंकर-





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बेटे के बिगड़ने का जिम्मेदार कौन

शाहरुख खान के पुत्र आर्यन को क्रूज पर ड्रग्स पार्टी के मामले में हिरासत में लिए जाने के बाद कई तरह की बातें हो रही हैं। कहा जा रहा है कि शाहरुख खान और उनकी पत्नी गौरी खान ने अपने बेटे आर्यन खान का लालन-पालन सही से नहीं किया जिससे वह एक बेहतर नागरिक बन पाता। बेशक, इस तरह की चर्चा करना फिलहाल सही नहीं है। अभी तो बस शाहरुख खान से देश इतनी भर उम्मीद करता है कि वे कानून को अपना काम करने देंगे। अगर आर्यन पर आरोप साबित नहीं होंगे तो वह रिहा हो ही जाएगा।


शाखरुख खान यकीनन भारत की महत्वपूर्ण शख्सियत हैं। सारा देश उन्हें कलाकार के रूप में चाहता है। उनका संबंध एक स्वाधीनता सेनानी परिवार से रहा है। उनके पिता ताज मोहम्मद खान स्वाधीनता सेनानी थे। मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम लीग का पृथक इस्लामी राष्ट्र का सपना 14 अगस्त 1947 को पूरा हो गया। लेकिन ताज मोहम्मद जैसे बहुत से मुसलमानों को जिन्ना का पाकिस्तान मंजूर नहीं था। इन्हें मुसलमान होने के बाद भी इस्लामी मुल्क का नागरिक बनना नामंजूर था। बस, इसीलिए ताज मोहम्मद पाकिस्तान छोड़कर भारत आ गए थे। ताज मोहम्मद खान सरहदी गांधी कहे जाने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान के शिष्य थे। उन्होंने इस्लामी राष्ट्र की बजाय धर्मनिरपेक्ष देश का नागरिक बनना पसंद किया। आप समझ सकते हैं कि शाहरुख खान कितने अहम परिवार से आते हैं। उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाना सरासर भूल होगी। उन्होंने करगिल की जंग के समय भारत के तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री राहत कोष के लिए 25 लाख रुपए भी दिए थे। यह सन 2000 की बात है।


बहरहाल, शाहरुख खान से पहले भी कई नामवर हस्तियों की अपनी संतानों की हरकतों के कारण शर्मसार होना पड़ा है। गांधीजी के सबसे बड़े पुत्र हरिलाल गांधी की कभी अपने पिता से नहीं बनी। उनके बापू से कई मसलों पर गहरे मतभेद रहे। वे उच्च शिक्षा लेने के लिए ब्रिटेन जाना चाहते थे। वे भी अपने पिता की तरह बैरिस्टर बनने का ख्वाब रखते थे। पर बापू नहीं चाहते थे कि हरिलाल पढ़ने के लिए ब्रिटेन जाएं। इन्हीं सब वजहों के चलते उनकी और बापू से दूरियां बढ़ती गईं। कहने वाले कहते हैं कि हरिलाल वेश्यागामी भी थे। नशा भी करते थे।


महात्मा गांधी और हरिलाल के संबंधों पर कुछ साल पहले एक फिल्म ‘गांधी, माई फादर’ भी आई थी। उसमें बापू और उनके विद्रोही बड़े बेटे के कलहपूर्ण रिश्तों को दिखाया गया था। फिल्म पिता और पुत्र के बीच आदर्शों की लड़ाई को दिखाती थी। फिल्म ‘गांधी, माई फ़ादर’ भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नहीं, बल्कि हरिलाल और उनके पिता मोहनदास करमचंद गांधी की कहानी है। गांधीजी ने हरिलाल की गलत हरकतों पर उन्हें संरक्षण नहीं दिया। इसलिए ही वे देश के आदर्श बने।


माफ करें, इस मोर्चे पर फिल्म अभिनेता सुनील दत्त कमजोर साबित हो गये थे। उनका पुत्र और खुद मशहूर एक्टर संजय दत्त 1993 के मुम्बई में हुए बम विस्फोटों का गुनाहगार था। मुंबई बम विस्फोट में 270 निर्दोष नागरिक मारे गए थे और सैकड़ों जीवन भर के लिए विकलांग हो गए थे। सैकड़ों करोड़ की संपत्ति नष्ट हो गई थी। देश की वित्तीय राजधानी मुंबई कई दिनों तक पंगु हो गई थी। उन धमाकों के बाद मुंबई में पहले वाली रौनक और बेखौफ जीवन कभी रही ही नहीं।


दरअसल 12 मार्च, 1993 को मुंबई में कई जगहों पर बम धमाके हुए थे। जब वो भयानक धमाके हुए थे तब मुंबई पुलिस के कमिश्नर एम.एन. सिंह थे। सरकार कांग्रेस की थी पर पुलिस कमिश्नर कड़क अफसर थे। उन्होंने एकबार कहा भी था कि यदि संजय दत्त अपने पिता सुनील दत्त को यह जानकारी दे देते कि उनके पास हथियार हैं तो मुंबई में धमाके होते ही नहीं। उनका कहना था कि यह जानकारी सुनील दत्त निश्चित रूप से पुलिस को दे देते। लेकिन संजय दत्त ने यह नहीं किया। काश! संजय दत्त ने उपर्युक्त जानकारी अपने पिता को बताई होती तो मुंबई तबाह होने से बच जाती। तब सैकड़ों मासूम लोग नहीं मरते, हजारों करोड़ की संपत्ति भी तबाह न होती।


मुंबई धमाकों के आरोपियों पर सुप्रीम कोर्ट तक में लम्बा केस चला था। उस केस की सुनवाई करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त को गुनाहगार माना था। संजय दत्त ने अपने बचाव में तमाम दलीलें दी, बड़े-बड़े नामी गिरामी वकीलों को लाखों की फीस देकर खड़ा किया, पर उनकी दलीलों को कोर्ट ने सिरे से खारिज किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त को छह बरस की कठोर कारावास की सजा सुनाई। संजय दत्त को अबू सलेम और रियाज सिद्दीकी से अवैध बंदूकें प्राप्त करने, उन्हें अपने घर में रखने और अंत में विस्फोट और दंगे के बाद नष्ट करने की कोशिश का दोषी माना गया था। कोर्ट में पेश साक्ष्यों के आधार पर ये हथियार उसी जखीरे का हिस्सा थे, जिन्हें बम धमाकों और मुंबई पर हमले के दौरान इस्तेमाल करने के लिए पाकिस्तानी आतंकियों के माध्यम से मंगवाया गया था।


संजय दत्त ने कोर्ट में दिए अपने बयान में कहा था, “मैं अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित था। इन अवैध और तस्करी कर लाये हथियारों को रखने का यही कारण था। मैं घबरा गया था और कुछ लोगों के कहने में आकर मैंने ऐसा किया।” अफसोस कि एक्टर से कांग्रेस के नेता और फिर यूपीए सरकार में मंत्री रहे सुनील दत्त ने भी अपने लाडले को बचाने के लिए हरचंद कोशिश की थी। उनका इस तरह का आचरण देशभर के अधिकांश लोगों को पसंद नहीं आया था। वे एक तरफ तो शांति और भाईचारे की बातें करते थे और दूसरी तरफ अपने तमाम गंभीर आरोपों में फंसे पुत्र को बचाने की कोशिश कर रहे थे।


अब शाहरुख खान को भी अपना उदाहरण पेश करना होगा। उन्हें इस सारे मामले में तटस्थ रवैया अपनाना होगा, ताकि कानून आर्यन के साथ न्याय करें। अगर वे यह करते हैं तो उनके प्रति देश का आदर का भाव बढ़ेगा ही। फिलहाल सारे देश की शाहरुख खान और उन अभिभावकों के साथ सहानुभूति तो जरूर ही है, जिनके बच्चे नशे का शिकार हो जाते हैं।


-आर.के. सिन्हा-

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)



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हिंदुओं पर अत्याचार

1947 में भारत विभाजन के बाद पाक के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने पहले भाषण में कहा था कि 'हमें अपने व्यवहार और विचार से अल्पसंख्यकों को यह जता देना चाहिए कि हम उनकी जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं और उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है।Ó लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत जिन्ना के वादे पर खरा नहीं रही है। जिन्ना के समय से ही पाकिस्तान में गैर-मुसलमानों विशेष रूप से हिंदुओं और सिखों पर कहर जारी है। गत रोज पहले जिस तरह ननकाना साहिब में गुरुद्धारा तंबू साहिब के ग्रंथी भगवान सिंह की नाबालिग

बेटी को अगवा कर जबरन धर्मांतरण कराकर बलपूर्वक निकाह किया गया, उससे साफ है कि पाकिस्तान अपने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा करने में विफल है। यह उचित है कि इन घटनाओं को लेकर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कुछ महीने पहले सिंध प्रांत में अल्पसंख्यक समुदाय की दो नाबालिग हिंदू बहनों रवीना और रीना के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था। पाक में हर साल 1000 से अधिक हिंदू लड़कियों को अगवा कर जबरन धर्मांतरण करा शादी की जाती है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष की मानें तो सिर्फ सिंध राज्य में ही हर महीने 20 से 25 हिंदू लड़कियों का जबरन धर्मांतरण कराकर मुसलमानों से शादी कराई जाती है। याद होगा जनवरी माह में अनुषा कुमारी का अपहरण किया गया था और फिर मुस्लिम युवक से उसका जबरन निकाह कराया गया। 2017 में दो हिंदू लड़कियों रवीता मेघवार और आरती कुमारी तथा सिख युवती प्रिया का जबरन निकाह कराया गया। गत वर्ष पहले ही सिंध प्रांत के जैकोबाबाद में एक नाबालिग हिंदू लड़की मनीषा का अपहरण कर उसे जबरन इस्लाम कबूलवाया गया। सुनील नाम के एक हिंदू किशोर को एआरवाई डिजिटल चैनल के स्पेशल रमजान लाईव शो में इस्लाम धर्म स्वीकार करते दिखाया गया। 19 वर्षीय हिंदू लड़की रिंकल कुमारी और भारती का अपहरण कर जबरन इस्लाम धर्म कबूल कराया गया। गौर करें तो पाकिस्तान में हिंदू और सिख लड़कियों का जबरन धर्मांतरण कोई नई बात नहीं है। भारत विभाजन के बाद से ही पाकिस्तान में हिंदुओं को खत्म करने की साजिश चल रही है। विभाजन के समय पाकिस्तान में 15 फीसद हिंदू थे जो आज उनकी आबादी घटकर 1.6 फीसद रह गई है। गौर करें तो पाक की हुकूमत और कट्टरपंथी ताकतें अल्पसंख्यक हिंदुओं व सिखों को खत्म करने के लिए दो रास्ते अपना रही हैं। एक उनकी हत्या और दूसरा जबरन धर्मांतरण। यह खेल पूरा पाकिस्तान में चल रहा है। पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत और ब्लूचिस्तान में स्थिति कुछ ज्यादा ही भयावह है। यहां अल्पसंख्यक हिंदू-सिख समुदाय से जबरन जजिया वसूला जा रहा है। जजिया न चुकाने वाले हिंदू-सिखों की हत्या कर उनकी संपत्ति लूट ली जाती है। मंदिरों और गुरुद्वारों को जला दिया जाता है। 1947 में पाक में 428 हिंदू मंदिर थे। आज सिर्फ 26 मंदिर शेष बचे हैं। यानी अन्य मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में हिंदू और सिख समुदाय के लोगों की स्थिति भयावह है। वे गरीबी एवं भुखमरी के दंश से जूझ रहे हैं। आर्थिक रूप से विपन्न और बदहाल हैं। वे आतंक, आशंका और डर के साये में जी रहे हैं। एचआरसीपी की रिपोर्ट से भी उद्घाटित हो चुका है कि हिंदू लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। धर्म परिवर्तन का ढंग भी बेहद खौफनाक औैर अमानवीय है। हिंदू लड़कियों का पहले अपहरण कर उनके साथ रेप किया जाता है और फिर उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य किया जाता है। त्रासदी यह कि जब मामला पुलिस के पास पहुंचता है तो पुलिस भी बलात्कारियों पर कार्रवाई करने के बजाए हिंदू अभिभावकों को ही प्रताडि़त करती है। उन्हें मानसिक संताप देने के लिए बलात्कार पीडि़त नाबालिग लड़की को उनके संरक्षण में देने के बजाए अपने संरक्षण में रखती है। पुलिस संरक्षण में एक अल्पसंख्यक लड़की के साथ क्या होता होगा सहज अनुमान लगाया जा सकता है। बाद में पुलिस कहानी गढ़ देती है कि लड़की ने इस्लाम कबूल कर लिया और वह अपने पुराने धर्म में लौटना नहीं चाहती। गौर करने वाली बात यह है कि सरकार व पुलिस ने बलात्कारियों और मजहबी कट्टरपथियों को संरक्षण और धर्मांतरण कराने की पूरी छूट दे रखी है। लिहाजा उनके मन में कानून का भय नहीं है। पाक का अल्पसंख्यक समुदाय एक अरसे से अपनी सुरक्षा और मान-सम्मान की रक्षा की गुहार लगा रहा है। कुछ सामाजिक संगठन अल्पसंख्यकों के पक्ष में आवाज उठाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कट्टरपंथी संगठन उन्हें डरा धमकाकर चुप करा देते हैं। पाक सीनेट की स्थायी समिति बहुत पहले ही हिंदुओं पर अत्याचार की घटनाएं रोकने के लिए सरकार को ताकीद कर चुकी है। लेकिन किसी सरकार ने ठोस पहल नहीं की। इमरान सरकार भी हाथ पर हाथ धरी बैठी है। जाहिर है कि अल्पसंख्यकों को लेकर उसकी भी मंशा और नीयत में खोट है। सरकार को डर है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने पर कट्टरपंथी ताकतें नाराज हो जाएंगी। यही वजह है कि पाक में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति दोयम दर्जे की हो गयी है। अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के नाम पर महज एक ईसाई सांसद तय किया जाता है। इसके अलावा कानूनी तौर पर भी धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव होता है।


-सिद्धार्थ शंकर-




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जयंती विशेषः ऐसे थे लाल बहादुर शास्त्री


वर्ष 1964 में प्रधानमंत्री बनने से पहले लाल बहादुर शास्त्री विदेश मंत्री, गृहमंत्री और रेल मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाल चुके थे। ईमानदार छवि और सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले लाल बहादुर शास्त्री नैतिकता की मिसाल थे। जब शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने, उन्हें सरकारी आवास के साथ इंपाला शेवरले कार भी मिली थी लेकिन उसका उपयोग वे बेहद कम किया करते थे। किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही वह गाड़ी निकाली जाती थी।


एकबार शास्त्री जी के बेटे सुनील शास्त्री किसी निजी कार्य के लिए यही सरकारी कार उनसे बगैर पूछे ले गए और अपना काम पूरा करने के पश्चात कार चुपचाप लाकर खड़ी कर दी। जब शास्त्री जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि गाड़ी कितने किलोमीटर चली ? ड्राइवर ने बताया कि गाड़ी कुल 14 किलोमीटर चली है। उसी क्षण शास्त्री जी ने उसे निर्देश दिया कि रिकॉर्ड में लिख दो, ‘चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज।’ उसके बाद उन्होंने पत्नी ललिता देवी को बुलाकर निर्देश दिया कि निजी कार्य के लिए गाड़ी का इस्तेमाल करने के लिए वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें।


प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्री जी पहली बार अपने घर काशी आ रहे थे, तब पुलिस-प्रशासन उनके स्वागत के लिए चार महीने पहले से ही तैयारियों में जुट गया था। चूंकि उनके घर तक जाने वाली गलियां काफी संकरी थी, जिसके चलते उनकी गाड़ी का वहां तक पहुंचना संभव नहीं था, इसलिए प्रशासन द्वारा वहां तक रास्ता बनाने के लिए गलियों को चौड़ा करने का निर्णय लिया गया। शास्त्री जी को यह पता चला तो उन्होंने तुरंत संदेश भेजा कि गली को चौड़ा करने के लिए कोई भी मकान तोड़ा न जाए, मैं पैदल ही घर जाऊंगा।


स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1940 के दशक में लाला लाजपत राय की संस्था ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ द्वारा गरीब पृष्ठभूमि वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को जीवनयापन हेतु आर्थिक मदद दी जाती थी। उसी समय की बात है, जब लाल बहादुर शास्त्री जेल में थे। उन्होंने उस दौरान जेल से ही पत्नी ललिता देवी को एक पत्र लिखकर पूछा कि उन्हें संस्था से पैसे समय पर मिल रहे हैं या नहीं और क्या इतनी राशि परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त है ? पत्नी ने उत्तर लिखा कि उन्हें प्रतिमाह पचास रुपये मिलते हैं, जिसमें से करीब चालीस रुपये ही खर्च हो पाते हैं, शेष राशि वह बचा लेती हैं। पत्नी का यह जवाब मिलने के बाद शास्त्री जी ने संस्था को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने धन्यवाद देते हुए कहा कि अगली बार से उनके परिवार को केवल चालीस रुपये ही भेजे जाएं और बचे हुए दस रुपये से किसी और जरूरतमंद की सहायता कर दी जाए।


रेलमंत्री रहते हुए शास्त्री जी एक बार रेल के एसी कोच में सफर कर रहे थे। उस दौरान वे यात्रियों की समस्या जानने के लिए जनरल बोगी में चले गए। वहां उन्होंने अनुभव किया कि यात्रियों को कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इससे वे काफी नाराज हुए और उन्होंने जनरल डिब्बे के यात्रियों को भी सुविधाएं देने का निर्णय लिया। रेल के जनरल डिब्बों में पहली बार पंखा लगवाते हुए रेलों में यात्रियों को खानपान की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए पैंट्री की सुविधा भी उन्होंने शुरू करवाई।


2 अक्तूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में जन्मे भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की आज हम 117वीं जयंती मना रहे है। उनके बाद कई प्रधानमंत्रियों ने देश की बागडोर संभाली लेकिन उनके जितना सादगी वाला कोई दूसरा प्रधानमंत्री देखने को नहीं मिला। सही मायनों में शास्त्री जी को उनकी सादगी, कुशल नेतृत्व और जनकल्याणकारी विचारों के लिए ही स्मरण किया जाता है और सदैव किया भी जाता रहेगा। उनके पदचिह्नों पर चलने का संकल्प लेना ही सच्चे अर्थों में उन्हें हमारी श्रद्धांजलि होगी।


-श्वेता गोयल-

(लेखिका शिक्षिका हैं।)






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कांग्रेस की यात्रा के नए पड़ाव

पंजाब कांग्रेस में जो कुछ हो रहा है, उसकी आशंका तो उसी दिन हो गई थी जिस दिन राहुल-प्रियंका वाड्रा ने सुनील जाखड़ को हटा कर नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष मनोनीत किया था। लेकिन यह सारा ड्रामा इतनी जल्दी शुरू हो जाएगा, इसकी किसी को आशा नहीं थी। सीमावर्ती पंजाब में सोनिया कांग्रेस के इस नए प्रयोग से जो अस्थिरता पैदा हो गई है, उसको लेकर कांग्रेस के अनेक नेता अपनी-अपनी समझ और राजनीति के अनुसार टिप्पणी कर रहे हैं, लेकिन सबसे मज़ेदार टिप्पणी कांग्रेस के जाने-माने वकील कपिल सिब्बल ने की है। वे कह रहे हैं कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि कांग्रेस में निर्णय कौन ले रहा है? इतने दशकों से सोनिया कांग्रेस के मुक़द्दमे लड़ते हुए भी यदि उन्हें पता नहीं चला कि इस पार्टी में निर्णय कौन ले रहा है तब या तो वे झूठ बोल रहे हैं या फिर इस उम्र में ‘भोले’ बनने का असफल प्रयास कर रहे हैं। जिस रहस्य को कपिल सिब्बल दशकों में नहीं समझ पाए, उसे नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस में शामिल होते ही समझ गए थे। इसलिए उन्होंने पहले दिन से ही राहुल और प्रियंका वाड्रा की शान में क़सीदे पढ़ने शुरू कर दिए थे। अमरेंद्र सिंह और कपिल सिब्बल की दिक्कत यही है कि वे अपने राजनीतिक फायदे के लिए इतना नीचे तो नहीं गिर सकते थे कि सार्वजनिक रूप से राहुल और प्रिंयका की जी हुज़ूरी में जुट जाएं। अमरेंद्र सिंह की एक और दिक्कत भी है। वे जानते हैं कि पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्य में राजनीतिक अस्थिरता देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा कर सकती है, ख़ासकर तब जब पाकिस्तान इसी अस्थिरता की प्रतीक्षा में बैठा हो।


सिद्धू को लेकर ऐसी आशंका उन्होंने जताई भी।  लेकिन  कैप्टन शायद समझते रहे कि राहुल और प्रियंका को भी इसकी चिंता जरूर होगी, इसलिए वे ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे पंजाब में राजनीतिक अराजकता पैदा हो जाए। सोनिया परिवार को समझने में कैप्टन यहीं धोखा खा गए। यही कारण था कि उन्हें अपमानजनक तरीके से बाहर जाना पड़ा। राहुल और प्रियंका समझते रहे कि सिद्धू और चरणजीत सिंह चन्नी की जोड़ी पंजाब के मतदाताओं को सोनिया परिवार की झोली में डाल देंगे। एक जाट चेहरा और दूसरा दलित चेहरा। दोनों का कम्बीनेशन कांग्रेस को विजय माला डलवा सकता था। लेकिन इस सारी दौड़धूप में से सिद्धू को क्या मिलेगा? यदि पंजाब में कांग्रेस जीत गई तो मुख्यमंत्री तो चन्नी ही बनेगा क्योंकि दलित चेहरे के नाम पर चुनाव जीत कर किसी जाट को मुख्यमंत्री बनाने का जोखिम तो नहीं उठाया जा सकता था। और यदि कांग्रेस हार गई तब तो सिद्धू के मुख्यमंत्री बनने का प्रश्न अपने आप दफन हो जाएगा। अब ले-देकर सिद्धू को यह संतोष दिलाया जा सकता था कि उनके चेले चपाटों को अच्छे पदों पर बिठा दिया जाए और नए मुख्यमंत्री की नकेल भी सिद्धू के हाथ में ही दे दी जाए। सिद्धू यहां भी धोखा खा गए। राजनीति में सभी के अपने-अपने चेले चपाटे होते हैं। किसी दूसरे के चेलों को गले में लटकाकर कोई नहीं चलता। जहां तक चन्नी की नकेल पकड़ने की बात है, इसकी शुरू के कुछ दिनों में सिद्धू ने आभास देने की कोशिश भी की। लेकिन शायद सिद्धू चन्नी को भी अच्छी तरह पहचान नहीं पाए। चन्नी को जानने वाले जानते हैं कि वे राजनीति की सीढि़यां अपने बलबूते चढ़े हैं, सिद्धुओं या रंधावाओं के बल पर नहीं। यह ठीक है कि अंतिम सीढ़ी इन दोनों की लड़ाई में वे चुपचाप चढ़ गए।


अब सिद्धू के पास इस्तीफा देने के सिवाय क्या विकल्प था? अब वे कांग्रेस में बैठ कर ‘ओटन लगे कपास’ का काम तो नहीं कर सकते थे। लेकिन न तो सिद्धू ने और न ही राहुल-प्रियंका ने एक बार भी यह सोचा कि सीमावर्ती पंजाब में वे जो नए प्रयोग कर रहे हैं, इससे सिवा राजनीतिक अराजकता के और कुछ नहीं मिलेगा। अलबत्ता पाकिस्तान इससे जरूर ख़ुश होगा क्योंकि वह पिछले कुछ समय से फिर पंजाब में आतंकवाद को बढ़ाने के प्रयास कर रहा है, जिसके रास्ते में अमरेंद्र सिंह बाधा थे। कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी ने, जिन्होंने अपने पिता को आतंकवादियों के हाथों खोआ है, ठीक ही कहा है कि इस सारे घटनाक्रम से कोई ख़ुश है तो पाकिस्तान है। सोनिया परिवार के इस प्रयोग ने पंजाब कांग्रेस को टुकड़े-टुकड़े कर दिया है। लेकिन लगता है राहुल-प्रिंयका ने अपनी नई कांग्रेस के लिए यही रास्ता चुना है। यही कारण है कि पंजाब में सिद्धू को स्थापित करने के बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के टुकड़े-टुकड़े गैंग के सरगना और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे हज़ार’ की अभिलाषा के नायक, ‘अफज़ल गुरु की सोच पर पहरा देने’ के लिए संकल्पित, सीपीआई के कन्हैया कुमार का पार्टी कार्यालय में अभिनंदन करते हुए उसे सोनिया परिवार में शामिल किया।


आलम यह था कि वहां सभी के सामने कन्हैया कुमार ने कहा कि कांग्रेस डूबता हुआ जहाज़ है, मैं इसे बचाने आया हूं। उसका पूरा भाषण यह संकेत दे रहा था कि कांग्रेस बहुत महान है, लेकिन इसके वर्तमान नेतृत्व ने इस जहाज़ को जर्जर कर दिया है। लेकिन अब मैं इसे बचाऊंगा। इस संबंध में कांग्रेस के इतिहास का पुराना कि़स्सा याद आ रहा है। कुमारमंगलम जाने-माने कम्युनिस्ट थे। लेकिन जब कम्युनिस्टों को लगा कि अपने बलबूते भारत में उनका कोई भविष्य नहीं है, तब उन्होंने रणनीति के तौर पर कांग्रेस पार्टी के भीतर चले जाने का निर्णय किया। इंदिरा गांधी कम्युनिस्टों की इस साजि़श को जानती थीं। परंतु कांग्रेस के भीतर के विरोधियों से लड़ने के लिए उन्हें कम्युनिस्टों की जरूरत थी जो उनके चेहरे को प्रगतिवादी रंग में बेच सकें। जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय भी इसी रणनीति से उपजा था। लेकिन यह इंदिरा गांधी की दूरदृष्टि थी कि उन्होंने कम्युनिस्टों के लिए यूज एंड थ्रो की नीति का पालन किया। अब लगता है जेएनयू से निकली कम्युनिस्ट लॉबी अपने लाभ के लिए  कांग्रेस पर ही क़ब्ज़ा करना चाहती है। लगता है यह कांग्रेस के कम्युनिस्टकरण की शुरुआत है। राहुल-प्रियंका के इर्द-गिर्द इस प्रकार के तत्त्वों का घेरा कसता जा रहा है। मनीष तिवारी ने भी इसका संकेत किया है।


-कुलदीप चंद अग्निहोत्री-





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कम्युनिस्टों के लिए भस्मासुर साबित हुए कन्हैया कुमार

कन्हैया कुमार से कम्युनिस्टों की बहुत उम्मीद थी, कम्युनिस्टों ने कन्हैया कुमार को अपना आईकॉन मान लिया था, मास लीडर मान लिया था, अपने खोये जनाधार और आकर्षण को फिर से प्राप्त करने की शक्ति मान ली थी। इतना ही नहीं, जब कभी कन्हैया कुमार नरेन्द्र मोदी के खिलाफ आग उगलता था, आलोचना की हदें पार करता था तब कम्युनिस्ट काफी खुश होते थे। कहते थे कि कन्हैया कुमार ने नरेन्द्र मोदी को धो दिया, अब जनता नरेन्द्र मोदी को खारिज कर देगी आदि-आदि।


कन्हैया कुमार भी बेलगाम और शिष्टाचार के सभी मापदंड और परंपरा को तोड़ते हुए अपमानजनक टिप्पणियां करने की राजनीति को सफलता का मूल मंत्र मान लिया था। उसे अहंकार हो गया था कि जेएनयू का अध्यक्ष क्या निर्वाचित हुआ, बहुत बड़ा तीसमार खां बन गया है, उसकी छवि सरदार भगत सिंह और सुभाषचन्द्र बोस सरीखी बन गयी है। ऐसी गलतफहमी जिस भी राजनीतिज्ञ की होती है उसकी राजनीति चौपट होनी निश्चित है, उसकी छवि पर आंच आनी निश्चित है, जनता का समर्थन घटना निश्चित है, जनता के बीच जगहंसाई होनी निश्चित है। गलतफहमी, खुशफहमी और अति महत्वाकांक्षा का दुष्परिणाम यह निकला कि कन्हैया कुमार धीरे-धीरे अप्रासंगिकता की ओर बढ़ने लगे, उनकी बातें फालतू और बेअर्थ लगने लगी, कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए कन्हैया कुमार की बातें आत्मघाती भी बनती गयीं।


अमीरी की कब्र पर जन्मी गरीबी की घास बहुत जहरीली होती है। इसी तरह चमकने के बाद धूमिल होने की पीड़ा असहनीय होती है। खास होने के बाद गुमनाम होने का दर्द बहुत ज्यादा होता है। कन्हैया कुमार के साथ ऐसा ही हुआ है। हर राजनीतिक चुनाव में उसे जीत की उम्मीद बढ़ गयी, अपनी पार्टी में उसे आईकॉन बनने का भूत सवार हो गया, उसकी मानसिकता पार्टी को मुट्ठी में बांधकर चलने की हो गयी। पार्टी का अनुशासन और परंपरा उसके लिए कोई अर्थ नहीं रह गया। उस पर अराजकता और स्वच्छंदता हावी हो गयी।


राजनीतिक अराजकता और राजनीतिक स्वच्छंदता हर जगह नहीं चल सकती है, हर पार्टी में नहीं चल सकती है। यह वंशवादी और जातिवादी राजनीतिक घरानों में चल सकती है, जातिवादी और वंशवादी राजनीतिक घरानों में जन्म लेने वाले लोग ही राजनीति में अराजकता और स्वच्छंदता पर सवार हो सकते हैं। सभी को एक लाठी से हांक सकते हैं, अपनी बात को पार्टी का कानून बना सकते हैं, जो मर्जी हो वह कर सकते हैं। जैसे कांग्रेस की वंशवादी राजनीति में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, राजद में तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव , सपा में अखिलेश यादव, अकाली दल सुखबीर सिंह बादल, द्रमुक मे स्टालिन आदि हैं।


राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, यशस्वी यादव, अखिलेश यादव, सुखबीर सिंह बादल, स्टालिन आदि राजनीति में कुछ भी कर सकते हैं, क्योंकि उनकी पार्टी वंशवादी है और जातिवादी है, जिन पर एक ही खानदान का वर्चस्व होता है। कन्हैया कुमार किसी वंशवादी और जातिवादी पार्टी की उपज नहीं हैं और न ही कन्हैया कुमार अपने आप को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव, अखिलेश यादव, सुखबीर सिंह बादल और स्टालिन की श्रेणी में खड़े समझ समझ सकते हैं। कन्हैया कुमार उस राजनीतिक विचारधारा की उपज हैं जो कहने के लिए अंतरराष्ट्रीय है और देश की संस्कृति और सभ्यता से उसे कोई सरोकार नहीं है, जिन पर आयातित संस्कृति और मुल्लावाद हावी रहता है।


कन्हैया कुमार के अंदर वैचारिक दृढ़ता और गहरायी कभी थी नहीं। कन्हैया कुमार को अपना आइकॉन मान लेने वाले कम्युनिस्टों के पास भी वैचारिक प्रागढ़ता थी नहीं। इन सभी के पास राजनीति की न तो समझ थी और न ही कन्हैया कुमार जैसों पर राजनीतिक दांव खेलने की कला की समझ थी। कन्हैया कुमार के पास वैचारिक दृढ़ता होती तो निश्चित तौर पर वह कांग्रेस का दामन थामने के लिए लालायित नहीं होते। राजनीतिक परिपक्वता कोई हंसी-खेल नहीं है। राजनीतिक परिपक्वता तभी हासिल होती है जब कोई राजनीतिज्ञ सालों से मेहनत करता है, वैचारिक दृढ़ता पर आंच नहीं आने देता। कन्हैया की अभी उम्र ही क्या थी, उसके पास अनुभव ही क्या था ? अभी तो उसे राजनीति की दांव-पेंच सीखने की जरूरत थी। लंबे संघर्ष की जरूरत थी, जनता की उपयोगी नीतियों पर काम करने की जरूरत थी। अगर ऐसा करने में कन्हैया कुमार सही में सक्षम होते तो निश्चित मानिये कि वह एक परिपक्व राजनीतिज्ञ बन सकते थे।


माना कि कन्हैया कुमार नासमझ है, नासमझी में उसने अपने ऊपर गिरगिट वाली कहावत को बोझ बना डाला। लेकिन कन्हैया कुमार की भूतपूर्व पार्टी सीपीआई और अन्य कम्युनिस्ट की राजनीतिक समझदारी कैसे पराजित हो गयी ? कम्युनिस्ट पाटियां और सभी प्रकार के कम्युनिस्ट अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा विद्वान और दुनिया का सबसे बड़ी समझ वाले समझते हैं। वे यह समझते हैं कि उनकी समझ को कोई चुनौती दे ही नहीं सकता है, उनकी समझ कभी भी पराजित हो नहीं सकती है। सोवियत संघ के विघटन और माओत्से तुंग की चीन में अर्थी निकलने और पूंजीवाद की स्थापना के बाद भी कम्युनिस्ट अपनी इस खुशफहमी से बाहर निकलने की कोशिश ही नहीं करते हैं। उनको समझाने वाले या फिर उनसे सहमत नहीं रहने वालों पर वह फौरन बिफर पड़ते हैं, ये सामने वाले को तुरंत उपनिवेशवाद का दलाल, शोषण करने वाला सामंत और दंगाई-सांप्रदायिक घोषित कर अछूत बना डालेंगे।


अबतक मान्य परंपरा यह थी कि कम्युनिस्ट पार्टियों मे कोई रातोंरात आईकॉन नहीं बनता है, रातोंरात किसी को पार्टी का बड़ा नेता नहीं स्वीकार कर लिया जाता। पर कन्हैया कुमार के प्रसंग में कम्युनिस्ट पार्टियों ने इस अपनी मान्य परंपरा को तोड़ा, रातोंरात कन्हैया कुमार के पीछे खड़े हो गये। जेएनयू से बाहर नहीं निकलने वाले कन्हैया कुमार को बिहार के बेगुसराय से लोकसभा का टिकट थमा दिया गया। बेगुसराय में भारत के बड़े-बड़े कम्युनिस्टों ने डेरा जमा लिया, कम्युनिस्ट लड़के-लड़कियों की गीत, नाच और संगीत का ऐसा वातावरण बना दिया गया था कि कन्हैया कुमार की जीत तो सुनिश्चित है। नतीजा आया तब कन्हैया कुमार और कम्युनिस्ट पूरी तरह बेनकाब हो चुके थे, उनकी उम्मीदें पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी थी, उनकी उड़ान की चाहत की कब्र बनी थी।


कम्युनिस्टों ने महात्मा गांधी की लंगोटी और लाठी की ताकत को नहीं समझा था। महात्मा गांधी को उपनिवेशवाद का दलाल तक कह डाला था। महात्मा गांधी का 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध कर कम्युनिस्टों ने देश की आजादी में गद्दारी की थी और अंग्रेजों का साथ दिया था। इसका दुष्परिणाम कम्युनिस्टों ने झेला, ये कभी देश पर राज करने के लायक नहीं समझे गये। फिर आप भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का नारा देकर भारत पर कैसे शासन करने का अधिकार पा सकते हैं ? कम्युनिस्ट पार्टियां हों या फिर कांग्रेस, यह समझ लें कि भारत की जनता भारत के टुकड़े करने वाली मानसिकता का कभी समर्थन नहीं कर सकती।


-विष्णुगुप्त-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)




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मोबाइल वरदान हैं या अभिशाप!

आवश्यकता ही आविष्कार की जननी हैं और कभी कभी परिस्थितियों के कारण भी वह पराधीन हो जाता हैं। जब मोबाइल का चलन शुरू हुआ लगभग २५ वर्ष पुर्व तो यह सामाजिक क्रांति का प्रतीक था ,दुनिया मुठ्ठी में हो गयी थी.पहले धनियों का खिलौना रहा फिर धीरे धीरे जान सामान्य तक इसने पहुँच बनाई और आज इसके बिना जीवन शून्य होता जा रहा हैं। आज औसतन या बहुतायत में इसकी उपलब्धता सामान्य हो गयी।


विगत २ वर्षों में कोरोना काल में इसकी उपयोगिता बहुत बढ़ी कारण आवागमन और मिलना जुलना कम होने से यह बहुत माकूल माध्यम रहा। पर इस वर्ष पढ़ाई का माध्यम ऑनलाइन होने से लेपटॉप ,मोबाइल ,आदि का चलन अनिवार्य हुआ। इससे हम आभासी दुनिया से जुड़े और बच्चों की पढाई की औपचारिकता शुरू हुई। अब इसमें अपर के. जी। शिशुओं को भी मोबाइल लेपटॉप टेबलेट आदि से पढ़ाई कराना शुरू किया यानी शिशुओं में मोबाइल का बीजारोपण शुरू किया उसके बाद वे उसमे उलझे ,और यदि आपने उनसे जबरदस्ती कीया छुड़ाने का प्रयास किया तो उनका मचल जाना स्वाभाविक हैं कारण कोरोना काल में बाह्य संपर्क कम या टूटने से एकाकीपन का क्या इलाज़। इस द्वन्द में मात पिता उन्हें मोबाइल या टी वी देखने को बाध्य होते हैं और उनका अधिकतम समय उसी में बीतता हैं।


इसके बाद उससे आगे की पढ़ाई भी अधिक समय यानी ५ -६ घंटे होने के बाद उससे फिर होम वर्क ,नोट्स बनाने में भी उसी का उपयोग होने से वे फिर अन्य सामग्री देखने लगते हैं और यह एक मीठा जहर उनको मिलना शुरू हो जाता हैं। या न केवल बच्चों की कॉलेज की पढाई ,कोचिंग भी मोबाइल से। माँ बाप का काम भी वर्क फ्रॉम होम के कारण 12-12 घंटे लेपटॉप पर बैठकर कार्य सम्पादित करते हैं। घर में सब सदस्य होते हुए भी एक दूसरे से अनजान हैं।


आजकल आपने जिसकी भी स्वतंत्रता में बाधा पहुंचाई वह आपका दुश्मन। सब को सब प्रकार की छूट चाहिए। आज आप एक साल के शिशु से मोबाइल या टी वी रिमोट नहीं ले सकते। वह मचल जाता हैं। इससे ज्ञानार्जन कितना हो रहा हैं यह किसी को नहीं मालूम पर आज सब इसके नशे के आदी के साथ व्यस्त होते जा रहे हैं।


हर वस्तु का सेवन या उपयोग सीमित हो तो बहुत सीमा तक मान्य हैं पर यदि वह असीमित हो जाए तो वह रोग बनने लगता हैं। आज हम क्या सभी जिनके हाथ में मोबाइल ,लेपटॉप टेबलेट हैं वे व्यसनी हो चुके और अब उनको रोक पाना खतरनाक है.एक दादी ने अपनी नातिन को मोबाइल उपयोग करने पर रोक या कम देखने पर जोर दिया तब बारह वर्ष की बच्ची ने अपने घर में फांसी लगा ली और वह मर गयी.


क्या सीमित देखने के लिए कहना अपराध हैं या न कहना उचित हैं। इसके लिए हमारी व्यवस्था अधिक गुनहगार हैं। स्कूल कॉलेज की शिक्षा ऑनलाइन कराना कितना उचित हैं ?बच्चे एक कोरी स्लेट होते हैं जैसा बीजारोपण करो वैसे फसल होती हैं। इस रोग से सभी वर्ग और सभी उम्र के लोग प्रभावित हो चुके हैं। भविष्य अब अंधकारमय दिख रहा हैं। इस पर कैसे अंकुश लगाया जाय ? कोई मार्ग नहीं दिख रहा हैं। 


-विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन-





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कांग्रेस क्लीन बोल्ड

पंजाब में दलित को सीएम बनाने के बाद जिस मास्टर स्ट्रोक की बात की जा रही थी, उसने ही पार्टी को क्लीन बोल्ड कर दिया। कांग्रेस के पंजाब में खेवनहार कैप्टन अमरिंदर सिंह को किनारे लगाने के बाद नवजोत सिंह सिद्धू ने प्रदेश कांग्रेस के प्रधान पद से अचानक इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया। कल तक सिद्धू 2022 में पंजाब में कांग्रेस को सत्ता दिलाने का दम भर रहे थे। आज अचानक कुर्सी छोड़ दी। असल में सिद्धू का इस्तीफा अचानक नहीं है। इसकी पटकथा कैप्टन के कुर्सी से हटते ही तैयारी होनी शुरू हो गई थी। सिद्धू असल में कांग्रेस को कैप्टन की तरह चलाना चाहते थे। वह संगठन से लेकर सरकार तक सब कुछ अपने कंंट्रोल में चाहते थे। ऐसा हुआ नहीं और सिद्धू को स्थानीय नेताओं से लेकर हाईकमान तक की चुनौती से गुजरना पड़ा। इस वजह से सिद्धू करीब सवा 2 महीने में ही कुर्सी छोड़कर चले गए। इस घटनाक्रम के बाद कहा जा रहा है कि कांग्रेस पंजाब में आत्महत्या का मन बना चुकी है।


अगर ताजा घटनाक्रम पर नजर डालें तो पता चलेगा कि कैप्टन अमरिंदर के हटने के बाद सिद्धू खुद सीएम बनना चाहते थे। हाईकमान ने सुनील जाखड़ को आगे कर दिया। सिद्धू मन मसोस कर रह गए। वो राजी हुए तो पंजाब में सिख सीएम ही होने का मुद्दा उठा। सिद्धू ने फिर दावा ठोका, लेकिन हाईकमान ने उन्हें नकार सुखजिंदर रंधावा को आगे कर दिया। इसके बाद सिद्धू नाराज हो गए। अंत में चरणजीत चन्नी सीएम बन गए। चन्नी के सीएम बनने के बाद सिद्धू उनके ऊपर हावी होना चाहते थे। सिद्धू लगातार उनके साथ घूमते रहे। कभी हाथ पकड़ते तो कभी कंधे पर हाथ रखते। इसको लेकर सवाल होने लगे कि सिद्धू सुपर सीएम की तरह काम कर रहे हैं। आलोचना होने लगी तो सिद्धू को पीछे हटना पड़ा। चन्नी सरकार में सिद्धू अपने करीबियों को मंत्री बनवाना चाहते थे। इसमें सिद्धू की मनमानी नहीं चली। कैप्टन के करीबी रहे ब्रह्म मोहिंदरा, विजय इंद्र सिंगला से लेकर कई पुराने मंत्री वापस शामिल हुए। इसके अलावा राणा गुरजीत पर रेत खनन में भूमिका के बावजूद उन्हें मंत्री पद दिया गया।


 ऐसे ही 4 नामों को लेकर सिद्धू नाराज थे। इन्हें रोकने में उनकी नहीं चली। कांग्रेस हाईकमान ने मंत्रियों के नाम पर अंतिम मुहर लगाने के लिए बुलाई बैठक में सिर्फ चरणजीत चन्नी को बुलाया। सिद्धू को इसमें शामिल नहीं किया गया। सिद्धू की बताई लिस्ट को हाईकमान ने फाइनल नहीं किया। इसकी वजह से वो नाराज हो गए। कांग्रेस में यह परंपरा रही है कि जब भी कांग्रेस की सरकार बनती है तो कैबिनेट बैठक से पहले प्रधान को भी वहां बुलाया जाता है। मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ। सिद्धू ने कांग्रेस हाईकमान पर दबाव डालकर सुखजिंदर रंधावा को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया। सिद्धू जानते थे कि अगर रंधावा सीएम बने तो वो अगले साल कांग्रेस का चेहरा नहीं होंगे। चरणजीत चन्नी के सहारे वो अगली बार कुर्सी पाने में कामयाब होने की उम्मीद में थे। हरीश रावत के जरिए उन्होंने यह बात भी कही कि अगला चुनाव सिद्धू की अगुआई में लड़ा जाएगा, तब विवाद शुरू हो गया कि यह तो पंजाब के सीएम चरणजीत चन्नी की भूमिका पर सवाल खड़े करने जैसा है। इसके बाद हाईकमान को सफाई देनी पड़ी कि अगले चुनाव में सिद्धू के साथ चन्नी भी चेहरा होंगे। सिद्धू समझ गए कि अगली बार कांग्रेस सत्ता में आ भी गई तो उनके लिए सीएम की कुर्सी पाना इतना आसान नहीं है।


-सिद्वार्थ शंकर-





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इलाज-पत्र की नई पहल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिसे ‘आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन’ कहकर शुरू किया है, उसे मैं हिंदी में ‘इलाज-पत्र’ कहता हूँ। यह ‘इलाज पत्र’ भारत की आम जनता के लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध होगा। भारत सरकार की इस पहल का स्वागत इस रफ्तार से होना चाहिए कि यह कोरोना के टीके से भी जल्दी सबके हाथों तक पहुंच जाए।


यह ‘इलाज पत्र’ ऐसा होगा, जो मरीजों और डॉक्टरों की दुनिया ही बदल देगा। दोनों को यह मगजपच्ची से बचाएगा और इलाज को सरल बना देगा। अभी तो होता यह है कि कोई भी मरीज अपनी तबियत बिगड़ने पर किसी अस्पताल या डॉक्टर के पास जाता है तो दवाई देने के पहले डॉक्टर उसके स्वास्थ्य का पूरा इतिहास पूछता है। जरूरी नहीं है कि मरीज को याद रहे कि उसे कब क्या तकलीफ हुई थी और उस समय डॉक्टर ने उसे क्या दवा दी थी। अब जबकि यह इलाज-पत्र उसके जेबी फोन में पूरी तरह से भरा हुआ मिलेगा तो मरीज तुरंत वह डॉक्टर को दिखा देगा और उसको देखकर डॉक्टर उसे दवा दे देगा। जरूरी नहीं है कि मरीज और डॉक्टर आमने-सामने बैठकर बात करें और अपना समय खराब करें। यह सारी पूछ-परख का काम घर बैठे-बैठे मिनटों में निपट जाएगा।


अस्पताल और डॉक्टरों के यहां भीड़-भड़क्का भी बहुत कम हो जाएगा। चिकित्सा के धंधे में ठगी का जो बोलबाला है, वह भी घटेगा, क्योंकि उस ‘इलाज-पत्र’ में हर चीज अंकित रहेगी। दवा-कंपनियों के साथ प्रायः डॉक्टरों की सांठ-गांठ के किस्से भी सुनने में आते हैं। इन कंपनियों से पैसे लेकर या कमीशन खाकर कुछ डॉक्टर और दवा-विक्रेता मरीजों को नकली या बेमतलब दवाएं खरीदने को मजबूर कर देते हैं। अब क्योंकि हर दवा का इस ‘इलाज-पत्र’ में नाम और मूल्य दर्ज रहेगा, इसलिए फर्जी इलाज और लूट-पाट से मरीजों की रक्षा होगी। भारत में इलाज इतना मंहगा और मुश्किल है कि बीमारी से वह ज्यादा जानलेवा बन जाता है। एक मरीज तो जाता ही है, उसके कई घरवाले जीते जी मृतप्रायः हो जाते हैं। उनकी जमीन-जायदाद बिक जाती है और वे कर्ज के कुएं में डूब जाते हैं।


ऐसा नहीं है कि भारत की स्वास्थ्य-व्यवस्था में यह ‘इलाज-पत्र’ क्रांति कर देगा लेकिन उसमें कुछ महत्वपूर्ण सुधार जरूर करेगा। देश की स्वास्थ्य-सेवाओं में समग्र सुधार के लिए बहुत-से बुनियादी कदम उठाए जाने की जरूरत अभी भी ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। यदि भारत की परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों में नए अनुसंधान को बढ़ाया जाए तो निश्चिय ही वे एलोपेथी से अधिक प्रभावशाली और सस्ती सिद्ध होंगी। वे जनता को भी शीघ्र स्वीकार्य होंगी। घरेलू इलाज से डॉक्टरों का बोझ भी कम होगा।


इसका अर्थ यह नहीं कि हम ऐलोपैथी के फायदे उठाने में चूक जाएं। मेरा अभिप्राय सिर्फ यही है कि भारत के 140 करोड़ लोगों को समुचित चिकित्सा और शिक्षा लगभग उसी तरह उपलब्ध हो, जैसे हवा और रोशनी उपलब्ध होती है। यदि ऐसा हो सके तो भारत को कुछ ही समय में संपन्न, शक्तिशाली और खुशहाल होने से कोई रोक नहीं सकता।


-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं जाने-माने स्तंभकार हैं।)







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भारत में महिला जजों की कमी

भारत के मुख्य न्यायाधीश न.व. रमन ने पिछले हफ्ते भारत की न्याय व्यवस्था को भारतीय भाषाओं में चलाने की वकालत की थी, इस हफ्ते उन्होंने एक और कमाल की बात कह दी है। उन्होंने भारत की अदालतों में महिला जजों की कमी पर राष्ट्र का ध्यान खींचा है। उन्होंने कहा है कि भारत के सभी न्यायालयों के जजों में महिलाओं की 50 प्रतिशत नियुक्ति क्यों नहीं होती ? देश में कानून की पढ़ाई में महिलाओं को क्यों नहीं प्रोत्साहित किया जाता ? महिला वकीलों की संख्या पुरुष वकीलों के मुकाबले इतनी कम क्यों है ?


उनकी राय है कि देश की न्याय व्यवस्था में महिलाओं की यह कमी इसलिए है कि हजारों वर्षों से उन्हें दबाया गया है। न्यायमूर्ति रमन ने मांग की है कि राज्य सरकारें और केंद्र सरकार इस गलती को सुधारने पर तुरंत ध्यान दें। यदि भारत के नेताओं और लोगों को यह बात ठीक से समझ में आ जाए तो हमारी अदालतों की शक्ल ही बदल जाएगी।


सबसे पहले हम यह समझें कि आंकड़े क्या कहते हैं। हमारे सर्वोच्च न्यायालय में इस समय 34 जज हैं। उनमें से सिर्फ चार महिलाएं हैं। अभी तक सिर्फ 11 महिलाएं इस अदालत में जज बन सकी हैं। छोटी अदालतों में महिला जजों की संख्या ज्यादा है लेकिन वह भी 30 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। इस समय देश की अदालतों में कुल मिलाकर 677 जज हैं। इनमें से महिला जज सिर्फ 81 हैं याने सिर्फ 12 प्रतिशत ! प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में 1098 जज होने चाहिए लेकिन 465 पद खाली पड़े हैं। इन पदों पर महिलाओं को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती ? प्राथमिकता देने का यह अर्थ कतई नहीं है कि अयोग्य को भी योग्य मान लिया जाए। महिलाओं को या किसी को भी जो 50 प्रतिशत आरक्षण मिले, उसमें योग्यता की शर्त अनिवार्य होनी चाहिए। देश के वकीलों में सुयोग्य महिलाओं की कमी नहीं होगी लेकिन दुर्भाग्य है कि देश के 17 लाख वकीलों में मुश्किल से 15 प्रतिशत महिलाएं हैं। राज्यों के वकील संघों में उनकी सदस्यता सिर्फ दो प्रतिशत है और भारत की बार कौंसिल में एक भी महिला नहीं है।


देश में कुल मिलाकर 60 हजार अदालतें हैं लेकिन लगभग 15 हजार में महिलाओं के लिए शौचालय नहीं हैं। हमारे इस पुरुष प्रधान देश की तुलना जरा हम करें, यूरोप के देश आइसलैंड से ! वहाँ कल हुए संसद के चुनाव में 63 सांसदों में 33 महिलाएँ चुनी गई हैं याने 52 प्रतिशत। वहां की प्रधानमंत्री भी महिला ही हैं- श्रीमती केटरीन जेकबस्डोटिर। उसके पड़ोसी देश स्वीडन की संसद में 47 प्रतिशत महिलाएँ हैं और अफ्रीका के रवांडा में 61 प्रतिशत हैं। दुनिया के कई छोटे-मोटे और पिछड़े हुए देशों में भी उनकी संसद में भारत के मुकाबले ज्यादा महिलाएँ हैं।


भारत गर्व कर सकता है कि उसके राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष पद पर महिलाएं रह चुकी हैं लेकिन देश के मंत्रिमंडलों, संसद और अदालतों में महिलाओं को समुचित प्रतिनिधित्व मिले, यह आवाज अब जोरों से उठनी चाहिए। इस स्त्री-पुरुष समता का समारंभ हमारे राजनीतिक दल ही क्यों नहीं करते ?


-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)




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भारत बंद -विरोधाधिकार-चुनौती- जनसंकट और समाधान

संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा तीन नए कृषि कानूनों के विरुद्ध दूसरी बार आहूत ‘भारत बंद’ का गत 27 सितंबर को राष्ट्रव्यापी प्रभाव देखने को मिला। सत्ता अर्थात भारतीय जनता पार्टी प्रवक्ता ने इसे ‘अराजक तत्वों’ द्वारा किया गया अराजकता पूर्ण विरोध प्रदर्शन तथा विपक्षी दलों द्वारा किसानों के कंधे पर बंदूक़ रखकर चलाना आदि बताया तो किसानों ने इसे अपने आंदोलन की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता, सफलता व आंदोलन को पूरे देश से मिलने वाले व्यापक समर्थन के रूप में देखा। इससे पूर्व किसानों ने इसी वर्ष 26 मार्च को भी इसी विषय को लेकर भारत बंदका आह्वान किया था जिसका प्रभाव पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश इलाक़ों में पड़ा था। उस समय सरकार के नुमाइंदों ने इसे ‘असफल‘ भारत बंद बताया था। सत्ता पक्ष के लोग अक्सर यह कहते रहे हैं कि कृषि क़ानूनों के विरुद्ध कुछ मुट्ठी भर किसानों द्वारा यह विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। हालांकि भाजपा के संरक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबंधित भारतीय मज़दूर संघ सहित सत्ता से संबंधित अनेक नेता, मंत्री, सांसद, विधायक यहां तक कि राज्यपाल द्वारा भी किसानों के पक्ष में अपने विचार रखे जा रहे हैं।


किसानों द्वारा गत दस महीनों से लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन के अपने अधिकारों के नाम पर गत दिनों दूसरी बार ‘भारत बंद ‘ का जो आह्वान किया गया था वह 26 मार्च के भारत बंद की तुलना में कहीं ज़्यादा सफल व व्यापक रहा। जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा से लेकर राजस्थान, दिल्ली, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, ओड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु सहित देश के 25 से भी अधिक राज्यों में भारत बन्द का व्यापक प्रभाव देखा गया। देश के अधिकांश राष्ट्रीय राजमार्ग प्रातः 6 बजे से लेकर शाम चार बजे तक बन्द अथवा बाधित रहे। देश में कई स्थानों पर रेलवे सेवायें भी बाधित रहीं। निःसंदेह इस 27 सितंबर के भारत बंद को अभूतपूर्व सफलता मिलने का कारण यही था कि न केवल इस आंदोलन का अब राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार हो चुका है बल्कि इसबार इसे लगभग सभी विपक्षी दलों, मज़दूरों, कामगारों व छात्रों का भी पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ।


किसानों द्वारा अपने लोकतान्त्रिक विरोधाधिकार के नाम पर किये जाने वाले इस बंद की सफलता को लेकर यह कहा गया कि यह सत्ता की उस चुनौती का जवाब है जिसमें वह कहा करती है कि यह सीमित क्षेत्र के मुट्ठी भर सरमायेदार किसान आंदोलनरत हैं। राष्ट्रविरोधी, ख़ालिस्तानी व मवाली क़िस्म के किसान जैसी उपाधियों से नवाज़ने वाली सत्ता को इस बंद के माध्यम से जवाब दिया गया है। धर्म जाति व क्षेत्र के नाम पर किसानों व आंदोलन को कमज़ोर करने की कोशिश करने वाली सरकार को इस बंद के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गयी है कि यह आंदोलन देश के ‘अन्नदाताओं’ का राष्ट्रव्यापी आंदोलन है जो तीनों कृषि क़ानूनों के वापस लिये बिना समाप्त नहीं होने वाला। जिस आंदोलन में दुधमुंहे बच्चे से लेकर सौ वर्ष से अधिक उम्र वाले अनेक बुज़ुर्ग डटकर सत्ता को चुनौती दे रहे हों, बहुमत के नशे में चूर सत्ता द्वारा उस आंदोलन को कमज़ोर या हल्का समझना निश्चित रूप से उसकी बड़ी भूल है। 


परन्तु इस प्रकार के भारत बंद से आम जनता को भी भारी परेशानी व जनसंकट का सामना करना पड़ता है। देश अब तक किसानों के इस भारत बंद के अलावा भी विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा जनसमस्याओं को लेकर या सत्ताविरोधी स्वर बुलंद करने के लिये सैकड़ों बार भारत बंद का सामना कर चुका है। और हर बार जनता को ट्रैफ़िक या जाम में फंसकर परेशानी का सामना करना पड़ा है। कई कई घंटों के जाम तो दिल्ली व आसपास के शहरों, महानगरों तथा देश के प्रमुख शहरों में बिना भारत बंद के ही आये दिन लगते रहते हैं। बारिश में भी जगह जगह लंबे समय तक जाम लगने की ख़बरें अक्सर सुनाई देती हैं। उस समय मीडिया आंशिक रूप से ऐसे जाम की ख़बरें तो ज़रूर देता है परन्तु उसके कारण व उनका ज़िम्मेदार कौन है इन बातों पर रौशनी नहीं डालता। जबकि किसानों द्वारा अपने व देश की जनता के हितों के मद्देनज़र किये जा रहे ऐसे आंदोलनों में ‘गोदी मीडिया’ किसानों पर दोष मढ़ने की कोशिश करता है तथा इस किसान आंदोलन को ‘शाहीन बाग़ ‘ आंदोलन के धरने से जोड़ने की कोशिश करता है।


भारत बंद की सफलता और इसे मूक दर्शक बने रहकर देखने की देश व राज्य सरकारों की मजबूरी यह साबित करती है कि पूर्ण बहुमत की यह सरकार उसके अनुसार ‘मुट्ठी भर किसानों’ के भारत बंद रुपी राष्ट्रव्यापी विरोध के आगे शक्तिहीन व असहाय रही। सरकार उस विपक्ष की रणनीतियों के आगे भी असफल दिखाई दी जिसपर वह किसानों को भड़काने व गुमराह करने का भी आरोप लगाती है साथ साथ उसी विपक्ष को मृत प्राय, कमज़ोर और कांग्रेस के लिये तो ख़ासकर ‘कांग्रेस मुक्त भारत ‘ जैसे शब्दों का भी प्रयोग करती रहती है। कांग्रेस के अतिरिक्त बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, वामपंथी दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(एन सी पी ) आम आदमी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल समेत दक्षिण भारत के कई राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता बंद के दौरान भारत बंद को सफल बनाने के लिये सड़कों पर उतरे नज़र आए। भारत बंद की सफलता ने यह साबित कर दिया कि देश का किसान भी संगठित है और विपक्ष का भी किसानों को सर्वसम्मत व पूर्ण समर्थन हासिल है।


सरकार को इस भारत बंद से सबक़ लेने की ज़रुरत है। अपने किसान विरोधी व जनविरोधी फ़ैसलों को संसद में बहुमत के आंकड़ों व रणनीतिपूर्ण चुनावी परिणामों से जोड़कर देखना सत्ता की भूल है। सरकार को महसूस करना चाहिये कि जहाँ सी ए ए व एन आर सी तथा तीन तलाक़ जैसे उसके क़ानून भारतीय समाज में उसकी सामाजिक विघटन की सोच को उजागर करते हैं उसी तरह तीन नए कृषि क़ानून व राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) द्वारा निर्मित अनेक नियम क़ानून पूर्णतयः कृषक विरोधी हैं और यह सरकार की पूंजीवाद सोच को भी प्रतिबिंबित करते हैं। सरकार को यह भी सोचना चाहिये कि क्या वजह है कि सत्ता में आने के बाद उसके द्वारा एक के बाद एक लिये जा रहे नोटबंदी व जी एस टी जैसे तानाशाही पूर्ण फ़ैसले आख़िर क्योंकर जनता को बेचैन कर रहे हैं। टीकाकरण अभियान का ढिंढोरा पीट व इसके कथित कीर्तिमान को लेकर अपनी पीठ थपथपा कर सरकार नदियों किनारे तैरती लाशों व ऑक्सीजन की कमी से तड़प कर मरने व चीख़ने चिल्लाने वाले दृश्य देशवासियों की नज़रों से ओझल नहीं कर सकती। किसान संगठन बार बार कह रहे हैं कि जब तक किसान विरोधी तीनों कानून वापस नहीं लिए जाते और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम एस पी ) की गारंटी देने वाला क़ानून नहीं बन जाता तब तक उनका आंदोलन व संघर्ष जारी रहेगा। ऐसे में अब सरकार को तय करना है कि वह किसानों से टकराने की अपनी झूठी-सच्ची रणनीति पर क़ायम रहना ही पसंद करती है या अपने अहंकार को समाप्त कर किसी सर्वमान्य निष्कर्ष पर पहुँच कर देश को धरने, प्रदर्शनों व जाम तथा बंद आदि से निजात दिलाने की दिशा में यथाशीघ्र कोई सार्थक क़दम उठती है। 


-निर्मल रानी-




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तेल के ऊंचे दाम : लाभ व संकट


वर्ष 2015 में विश्व बाजार में तेल के दाम उछल रहे थे और 111 अमरीकी डालर प्रति बैरल के स्तर पर थे। इसके बाद 2020 में कोविड संकट के दौरान इनमें भारी गिरावट आई और दाम केवल 23 डालर प्रति बैरल रह गए। वर्तमान में पुनः इसमें कुछ वृद्धि हुई है और ये मूल्य आज 76 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गए हैं। इसी अवधि में देश के घरेलू बाजार में पेट्रोल के दाम की चाल बिल्कुल अलग रही है। 2015 में घरेलू बाजार में पेट्रोल के दाम 70 रुपए प्रति लीटर थे। जब 2020 में विश्व बाजार में तेल के दाम घटकर 23 डालर प्रति बैरल हो गए थे, उस समय हमारे बाजार में तेल के दाम घटे नहीं, बल्कि 70 रुपए प्रति लीटर के लगभग ही बने रहे। कारण यह कि जैसे-जैसे विश्व बाजार में तेल के दाम में गिरावट आई, उसी के समानांतर हमारी केंद्र सरकार ने तेल पर वसूल की जाने वाली एक्साइज ड्यूटी एवं राज्य सरकारों ने तेल पर वसूल किए जाने वाले सेल टैक्स में वृद्धि की। नतीजा यह हुआ कि विश्व बाजार में जितने दाम में गिरावट आई, उतना ही घरेलू टैक्स में वृद्धि हुई और बाजार में पेट्रोल का दाम 70 रुपए प्रति लीटर पर ही टिका रहा। इसके बाद इस वर्ष 2021 में विश्व बाजार में तेल के दाम पुनः बढ़े हैं और जैसा कि ऊपर बताया गया है, वर्तमान में ये 76 डालर प्रति बैरल पर आ गए हैं। लेकिन इस समय घरेलू दाम स्थिर नहीं रहे। विश्व बाजार में तेल के दाम के समानांतर घरेलू बाजार में पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं।


2020 के 70 रुपए से बढ़कर आज ये दिल्ली में 102 रुपए प्रति लीटर हो गए हैं। इस वर्ष में जैसे-जैसे विश्व बाजार में ईंधन तेल के दाम बढ़े, उस समय हमारी सरकार ने तेल पर वसूल किए जाने वाले टैक्स में कटौती नहीं की है और घरेलू बाजार में तेल के दाम बढ़ते जा रहे हैं। केंद्र सरकार मालामाल हो रही है। वर्ष 2015 में केंद्र सरकार को तेल से 72 हजार करोड़ रुपए का राजस्व मिला था जो वर्तमान वर्ष में 300 हजार करोड़ रुपए होने का अनुमान है। यानी 2015 और आज की तुलना करें तो विश्व बाजार में तेल के दाम उस समय के 111 डालर से घट कर वर्तमान में 76 डालर रह गया है, लेकिन केंद्र सरकार का राजस्व 72 हजार करोड़ से बढ़कर 300 हजार करोड़ हो गया है। बिल्कुल स्पष्ट है कि सरकार ने वर्तमान में ईंधन तेल पर भारी टैक्स वसूल किया है। तेल के ऊंचे दाम का एक विशेष प्रभाव यह है कि महंगाई में वृद्धि होती है। पेट्रोल के साथ डीजल के दाम बढ़ते हैं जिससे माल की ढुलाई महंगी हो जाती है और बाजार में प्रत्येक माल महंगा हो जाता है। लेकिन केयर रेटिंग के अनुसार पेट्रोल के दाम का हमारे थोक मूल्य सूचकांक में 1.6 प्रतिशत का हिस्सा होता है और डीजल का 3.1 प्रतिशत का।


 यानी पेट्रोल के दाम में 100 प्रतिशत की वृद्धि हुई तो थोक मूल्य सूचकांक में केवल 1.6 प्रतिशत की वृद्धि होगी। वर्तमान में पेट्रोल के दाम में 2015 की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, 70 रुपए से बढ़ कर यह 102 रुपए हो गए हैं। इस वृद्धि से थोक मूल्य सूचकांक में मात्र 0.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई होगी, ऐसा माना जा सकता है। डीजल के दाम में जो 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, उसका हमारे थोक मूल्य सूचकांक में प्रभाव 1.5 प्रतिशत माना जा सकता है। दोनों का सम्मिलित प्रभाव मात्र 2.5 प्रतिशत माना जा सकता है। तुलना में 2015 से 2021 के बीच में महंगाई इससे कहीं ज्यादा बढ़ी है। इससे स्पष्ट है कि महंगाई पर पेट्रोल के दाम में वृद्धि का प्रभाव कम और अन्य कारकों का प्रभाव ज्यादा है। इसलिए हम कह सकते हैं कि पेट्रोल के दाम में वृद्धि का महंगाई पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। पेट्रोल के दाम में वृद्धि का दूसरा संभावित प्रभाव मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों पर पड़ सकता है। लेकिन अपने देश में अधिकतर मैन्युफैक्चरिंग उद्योग बिजली से चलते हैं जिसका दाम बीते कुछ वर्षों में लगातार गिर रहा है। इसलिए उद्योगों पर भी पेट्रोल के बढ़े दाम का नकारात्मक प्रभाव नहीं दिखता है। पेट्रोल के दाम में वृद्धि का एक लाभ यह है कि हमारी आर्थिक संप्रभुता की रक्षा होती है। हम अपनी खपत का 85 प्रतिशत पेट्रोल आयात करते हैं जिससे कि हमारी अर्थव्यवस्था आयातों पर निर्भर हो जाती है। किसी भी वैश्विक संकट के समय हम दबाव में आ सकते हैं। जब घरेलू बाजार में पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो लोग ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों का उपयोग ज्यादा करते हैं, जैसे बस से यात्रा ज्यादा करना चाहेंगे जिसमें ईंधन की खपत कम होती है, अथवा बिजली की कार अथवा मेट्रो का उपयोग करेंगे।


इसलिए तेल के दाम बढ़ने से देश में पेट्रोल की खपत कम होगी। हमारी आयातों पर निर्भरता कम होगी और हमारी आर्थिक संप्रभुता की रक्षा होगी। तेल के ऊंचे दाम का दूसरा लाभप्रद प्रभाव पर्यावरण का है। तेल के जलने से कार्बन डाईआक्साइड का भारी मात्रा में उत्सर्जन होता है, फलस्वरूप धरती का तापमान बढ़ रहा है। बाढ़ आदि प्राकृतिक प्रकोप बढ़ रहे हैं। इसलिए तेल के ऊंचे मूल्य मूल रूप से देश के लिए लाभप्रद हैं। लेकिन संकट यह दिखता है कि तेल के ऊंचे मूल्य से वसूल किए गए राजस्व का उपयोग सरकार अपनी खपत को पोषित करने के लिए कर रही है। वर्तमान वर्ष 2021-22 में सरकार के पूंजी खर्च में 115 हजार करोड़ की वृद्धि हुई, जबकि पूंजी की बिक्री से 142 हजार करोड़ की प्राप्ति का अनुमान है। यानी तेल से अर्जित अतिरिक्त आय का उपयोग पूंजी खर्चों को बढ़ाने में नहीं किया गया है। इसी क्रम में जनकल्याण योजनाओं में भी खर्च में वृद्धि नहीं हुई है। उदाहरणतः मनरेगा में 34 प्रतिशत की कटौती हुई है और प्रधानमंत्री किसान योजना में 10 हजार करोड़ की कटौती हुई है। इससे स्पष्ट है कि तेल से अर्जित अतिरिक्त राजस्व का उपयोग सरकार अपने कर्मियों को वेतन देने अथवा अन्य खपत में कर रही है जो कि अनुचित है। अतः सही नीति यह है कि तेल दामों में वृद्धि की जाए। मेरे अनुमान से यदि और भी वृद्धि की जाए तो भी सही होगा, लेकिन शर्त यह है कि उससे अर्जित रकम का उपयोग नए निवेश के लिए किया जाए, न कि सरकार की खपत को पोषित करने में।


-भरत झुनझुनवाला-

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ये पॉलिटिक्स है प्यारे


कांग्रेस में अल्पसंख्यकों को मिला साथ


कांग्रेस के अल्पसंख्यक धड़े में चल रही उठापटक के बाद दो गुट बन गए हैं। शुक्रवार रात आरएनटी मार्ग स्थित होटल श्रीमाया में एक गुट ने डिनर पार्टी रखी थी। इसमें वे अल्पसंख्यक पूर्व पार्षद शामिल हुए, जो पूर्व पार्षद शेख अलीम से अलग होकर नया गुट बना रहे हैं। इस गुट को तब और मजबूती मिल गई, जब कुछ दूसरे पूर्व पार्षद और कांग्रेस के पदाधिकारी भी वहां पहुंचे। ऊपरी तौर पर भले ही बताया जा रहा है कि कांग्रेस अल्पसंख्यक नेता एक हैं, लेकिन अंदर ही अंदर दो गुट बन गए हैं। यह बात शनिवार को हुए धरने में रूबीना खान और शेख अलीम के बीच हुए विवाद से साबित भी हो गई।


एमजी रोड की ही इतनी चिंता क्यों


कांग्रेस और भाजपा के नेता तथा जनप्रतिनिधि बार-बार बड़ा गणपति से कृष्णपुरा तक बनने वाली सडक़ को लेकर दौरा कर रहे हैं। एक बार संजय शुक्ला घूमे, दो बार सुदर्शन गुप्ता तो तीसरी बार में सांसद शंकर लालवानी को भी याद आई कि उन्हें भी लोगों के बीच जाना चाहिए। उनके साथ स्थानीय नेताओं ने भी दौरा किया। नेताओं की चिंता समझ नहीं आ रही है। वे दर्द दूर करने जा रहे हैं या मरहम लगाने, क्योंकि किसी के भी दौरे के बाद यहां न तो सडक़ की चौड़ाई कम हुई और न ही लोगों को किसी प्रकार की राहत मिली। लोग रोज अपने आशियाने और दुकानें अपने हाथों से तोड़ते हुए नेताओं को कोस रहे हैं।


न खिलाफत की और न ही समर्थन


उमा भारती के समर्थक जबलपुर के शरद अग्रवाल पिछले दिनों इंदौर में थे। उन्हें वीडी शर्मा ने व्यापारिक प्रकोष्ठ का संयोजक बनाया है। वे प्रदेश का दौरा कर रहे हैं। इंदौर पहुंचे तो सवाल उठा कि उमा भारती के शराबबंदी व ब्यूरोक्रेसी को चप्पलों में रखने वाले बयान से वे कितना इत्तेफाक रखते हैं? लेकिन उन्होंने सवाल टाल दिया। कई बार इस मुद्दे पर बात हुई, पर मजाल है कि उमा के दोनों बयानों पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया दी हो। वे खिलाफत कर न तो उमा को नाराज करना चाहते न ही समर्थन कर संगठन को, क्योंकि अभी तो उन्हें संगठन ने बनाया है और फिर उनकी हां में हां मिलाना ही है।


राजनीतिक आंदोलन मजबूरी है


कांग्रेस नेता राजू भदौरिया पर जिलाबदर की कार्रवाई को लेकर सबसे ज्यादा तकलीफ दो नंबरी कांग्रेसियों को हुई। मोहन सेंगर के भाजपा में जाने के बाद जिस तरह से चिंटू चौकसे दो नंबर में किला लड़ा रहे हैं, उससे उनके दांये हाथ राजू भदौरिया को जिलाबदर करने के मामले में राजनीतिक आंदोलन मजबूरी बन गया है। कल होने वाले इस आंदोलन में ऐतिहासिक भीड़ का दावा किया जा रहा है। शहर कांग्रेस ने भी मदद का भरोसा दिया है, क्योंकि जिस तरह से एक-एक कांग्रेसी पर प्रकरण दर्ज होता जा रहा है, उसने कांग्रेसियों की नींद उड़ाकर रख दी है। इसलिए अब सब ‘हम साथ-साथ हैं’ का दावा कर रहे हैं।


अल्पसंख्यक अध्यक्ष के लिए नए समीकरण


भाजपा में अल्पसंख्यक मोर्चा सबसे ज्यादा चर्चा में है। अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल कई दावेदार रोज दीनदयाल भवन के चक्कर तो लगा रहे हैं, लेकिन उनकी दाल नहीं गल रही है। किसने एनआरसी और सीएए के विरोध में काम किया, इसको लेकर अखबारों की कटिंग और सोशल मीडिया के स्क्रीन शॉट खूब चलाए जा रहे हैं। जो इन आरोपों से बचे हैं वे अपनी सफाई भोपाल तक देकर आ चुके हैं, लेकिन पिछले दिनों दावेदारों को लेकर हुई एक चाय पार्टी चर्चा में है। बताया जा रहा है कि इसी चाय पार्टी के बहाने पार्टी के एक नेता ने नए समीकरण बना लिए हैं।


अतिक्रमण को लेकर भाजपा नेताओं में ठनी


जिला प्रशासन ने कनाडिय़ा रोड पर जो अतिक्रमण हटाया है, उसको लेकर भाजपा के एक पूर्व पार्षद और पार्षद पति में ठनी हुई थी। एक पूर्व एमआईसी सदस्य भी इस बीच में थे और लगातार बड़े नेताओं के माध्यम से कार्रवाई नहीं होने का दबाव बना रहे थे, लेकिन भाजपा के ही एक पूर्व पार्षद को ये नागवार गुजर रहा था। हालांकि कई बार पार्षद महाशय को साधा भी गया, लेकिन दूसरे नेताओं को तवज्जो मिलती गई तो उनकी नाराजगी संगठन तक भी पहुंचा दी गई और संगठन का साथ मिलने के बाद ये कार्रवाई की गई।


पार्टी से महत्वूपर्ण विधायकों के निजी काम


कांग्रेस के धरने में कांग्रेसी विधायकों का नहीं पहुंचना चर्चा का विषय रहा, जबकि दिल्ली से ही इस धरने में सबको शामिल करने के आदेश हुए थे। जानकारी निकाली गई तो मालूम पड़ा कि शहर के एक विधायक के किसी परम मित्र का जन्मदिन था और वे इसके लिए शहर से बाहर गए हुए थे तो दूसरे गांव के विधायक ने पहले ही कह दिया था कि वे 25 और 28 तारीख के आंदोलन में शामिल नहीं हो पाएंगे। इसका कारण उन्होंने नहीं बताया तो तीसरे विधायक तथा पूर्व मंत्री भी धरने में नहीं पहुंचे। नेताओं और कार्यकर्ताओं में कानाफूसी होने लगी कि एक तरफ तो ये लोग कांग्रेस को मजबूत करने की बात कहते हैं और दूसरी ओर जब मजबूती दिखाने की बात आती है तो गायब हो जाते हैं।


कहा जा रहा है कि गणपति प्रतिमा विसर्जन मामले में निगम अधिकारियों ने जो एक्शन अपने ही कर्मचारियों के खिलाफ लिया, वह हिंदूवादी नेताओं के डर से लिया, ऊपर से संघ प्रमुख मोहन भागवत भी इंदौर में थे। कार्रवाई नहीं होती तो वे सरकार के निशाने पर आ जाते और फिर किसी बड़े अधिकारी की बलि ही इस मामले को ठंडा कर पाती।


-संजीव मालवीय-






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हिन्दू धर्म सनातन क्यों है?

हिन्दू धर्म में ऐसा क्या है जिसके कारण वह सनातन है, वह न तो खतरे में पड़ सकता है और न ही नष्ट हो सकता है। सनातन का अर्थ है जो सदैव से है और सदैव रहेगा। जिसका न प्रारंभ है और न ही अंत है और जो सदैव नवीन बना रहता है। जब फारस की ओर से लोग भारत आए तो सिंधु नदी के इस पार रहने वालों को उन्होंने हिंदू कहना शुरू कर दिया और उनके धर्म को हिंदू धर्म कहने लगे। इसलिए भौगोलिक आधार पर नामकरण ‘हिंदू धर्म’ हो गया। इसके पहले, इस धर्म की विशेषताओं के कारण इसका नाम सनातन धर्म था, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यह धर्म सदैव से है और सदैव रहेगा। हर धर्मावलम्बी अपने धर्म पर गर्व करते हुए उसे सर्वोत्कृष्ट मानते हैं। इसलिए प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि आर्यों ने भी अपनी आस्था और विश्वास के कारण अपने धर्म को सनातन कहना शुरू कर दिया होगा, परन्तु गहराई से विचार करने पर पता चलता है कि हिन्दू् धर्म जिन तथ्यों और सिद्धांतों पर आधारित है वे मानव निर्मित नहीं हैं, वे इस सृष्टि में स्वमेव अस्तित्व में आए हैं। यह सृष्टि का स्वाभाविक धर्म है, इसलिए सनातन है।


पहले विज्ञान की बात करें। प्रकृति के नियम स्वमेव पैदा हुए हैं। प्रकृति उन्हीं नियमों से चलती है, भले ही हम उन्हें जाने या न जानें। प्रकृति के इन्हीं नियमों की खोज विज्ञान है। जब हम गुरुत्वाकर्षण नियम नहीं जानते थे तब भी पेड़ से टूटा फल जमीन पर ही गिरता था। नियम जाने बिना भी पक्षी आसमान में उड़ते थे। विज्ञान के नियम इस ब्रह्माण्ड में सार्वभौमिक हैं। अमेरिका और भारत का भौतिक विज्ञान एक है। अफ्रीका और यूरोप का रसायन शास्त्र भी एक है। पूरी पृथ्वी पर जीव विज्ञान एक ही है। कोई यह नहीं कह सकता कि मुझे वर्तमान भौतिकी के नियमों पर विश्वास नहीं है, मैं तो अपनी भौतिकी अलग से बनाऊँगा। यह विश्वास की बात नहीं है, अनुभव की बात है कि विज्ञान सर्वत्र एक सा है।


प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग ने अपनी विख्यात पुस्तक ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ में लिखा है कि आज से लगभग 1350 करोड़ वर्ष पूर्व हुए महाविस्फोट (बिग बैंग) से हमारे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई। इसके साथ ही समय का जन्म हुआ, पदार्थ और ऊर्जा प्रकट हुई और प्रकृति के नियम अस्तित्व में आये। उन्हीं नियमों के अनुसार विभिन्न आण्विक व रासायनिक क्रियाऍं होने लगीं, पिंड आपस में गुरुत्वाककर्षण से आकर्षित होने लगे, नाभिकीय और विद्युत-चुम्बकीय बल अपना कार्य करने लगे आदि। नोवा हरारी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सेपियन्स’ में लिखते हैं कि बिग बैंग के 3 लाख साल बाद पदार्थ और ऊर्जा संयुक्त होकर परमाणु बने यह रसायन शास्त्र का जन्म था। इसके 380 करोड़ वर्ष बाद पृथ्वी पर जीवन की प्रारंभिक जटिल संरचनाऍं बनीं। इस प्रकार जीव विज्ञान का जन्म हुआ। अब वैज्ञानिक निर्विवाद रूप से मानते हैं कि विज्ञान का जन्म इसी ब्रह्माण्ड में हुआ, उसके नियम इसी ब्रह्माण्ड से संबंधित हैं। इसलिए जब कभी यह ब्रह्माण्ड समाप्त होगा तो यह नियम भी समाप्त हो जाऍंगे। इस ब्रह्माण्ड के बाहर के जो ब्रह्माण्ड हैं अर्थात् जिनका जन्म हमारे बिग बैंग से नहीं हुआ वहॉं स्थितियॉं भिन्न होंगी और हमारी विज्ञान वहॉं लागू नहीं होगी।


अब हम चेतना की बात करें। जीवित और मृतक का फर्क तो सभी समझते हैं और मानते हैं कि जीवित में कुछ तो ऐसा है जो मरने पर बाकी नहीं बचा। जो समाप्त हो गया उसे चेतना कहते हैं। कुछ व्यक्ति मानते हैं कि चेतना प्रकृति के तत्त्वों से उसी प्रकार बनी है जैसे शरीर बना है। उनके मत से ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है। विज्ञान ही सबकुछ है। उनकी खोज विज्ञान तक ही सीमित हो जाती है। परंतु ध्यान रहे इतनी प्रगति के बाद भी विज्ञान चेतना को नहीं समझ सका है। दूसरे वे व्यक्ति होते हैं जो इस चेतना की खोज में आकर्षित होते हैं। इस चेतना या अस्तित्व का स्वभाव ही आध्यात्म है। इस परम चेतना की खोज या अनुभव करने का रास्ता बताने के लिए धर्मों का उदय हुआ। यह प्रक्रिया विभिन्न धर्मों ने अपने-अपने तरीकों से बताई है और इस परम चेतना को अलग-अलग नाम जैसे ब्रह्म, ईश्वर, परमपिता, गॉड, अल्लाह आदि दिये हैं।


जैसे प्रकृति के नियम (विज्ञान) सर्वत्र एक से हैं वैसे ही चेतना के नियम भी सर्वत्र एक से होते हैं। अंतर यह है कि विज्ञान, प्रकृति पर आधारित है इसलिए हमारे ब्रह्माण्ड तक ही लागू हैं, वहीं चेतना, अभौतिक है, सृष्टि से अलग है इसलिए ब्रह्माण्ड की सीमा से परे सर्वत्र व्याप्त है। अब प्रश्न यह है कि इस चेतना का अनुभव कैसे करें ? हमारा मस्तिष्क उन्हीं तत्त्वों से बना है जो प्रकृति के अंश हैं। लिहाजा मस्तिष्क की पहुँच इसी ब्रह्माण्ड तक सीमित है। इसीलिए वह तर्क और विज्ञान तो समझ लेता है परंतु चेतना का अनुभव उसके पल्ले नहीं पड़ता। हमारा मस्तिष्क काल और दिक् (टाइम और स्पेश) के परे नहीं जा पाता। दूसरे शब्दों में कहें तो इस ब्रह्माण्ड के त्रिविमीय तत्वों से बना मस्तिष्क ब्रह्माण्ड से बाहर तक फैली किसी चीज का भान नहीं कर सकता इसलिए परम चेतना या ईश्वर विचार, बुद्धि या पांडित्य (जो कि मस्तिष्क के विषय हैं) से जाना नहीं जा सकता।


सनातन धर्म कहता है कि वह चेतना हम सब के अंदर है। उसका अनुभव इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि मस्तिष्क के उत्पाद – मन, बुद्धि और अहंकार – चेतना को घेरे हैं। इस घेरे को ही माया कहा गया है। सनातन धर्म मानता है कि जब यह घेरा टूटता है तो परम चेतना प्रकाशित होने लगती है। सनातन धर्म इस घेरे को तोड़ने की जो प्रक्रिया बताता है वह सृष्टि में स्वयं उद्भुत तत्त्वों व सिद्धांतों पर आधारित है इसलिए सभी मनुष्यों के लिए समान है चाहे वह किसी भी रंग, जाति या नस्ल के हों।


सनातन धर्म किसी कल्पना लोक में नहीं विचरता। वह मनुष्य के शरीर से शुरू करता है। मनुष्य के शरीर में संसार को अनुभव करने के लिए 5 अंग- ऑंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा हैं, जिन्हें ज्ञानेंन्द्रियॉं कहते हैं। इसी प्रकार से संसार में काम करने के लिए 5 ही अंग हैं जिन्हें कर्मेन्द्रियॉं कहते हैं। वह हैं- हाथ, पैर, मुँह, लिंग और गुदा। इन इंद्रियों का नियंत्रण मन के पास होता है। इसलिए वह शरीर के माध्यम से मन पर नियंत्रण (मनोनिग्रह) की बात करता है। वह शरीर के नियंत्रण के लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि तरीके बताता है। नियंत्रित शरीर में ही जीव प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के माध्यम मन, बुद्धि और अहंकार को पार कर परम चेतना का अनुभव कर सकता है।


सनातन धर्म, प्रकृति को पंच महाभूतों- पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से बना हुआ मानता है। प्रकृति का विश्लेषण विज्ञान करती है और परमाणु और अब क्वांटम भौतिकी तक जा पहुँची है। परंतु जब हम प्रकृति को सम्पूर्णता में (संश्लेषण) देखते हैं तो भौतिक पदार्थों के आधार यही पंच महाभूत हैं। संसार के किसी भी कोने में कोई भी चर-अचर बस्तु होगी वह इन्हीं पंचमहाभूतों पर आधारित होगी।


सनातन धर्म ईश्वर प्राप्ति के लिए संसार को बाधा नहीं बल्कि सहायक मानता है। इसलिए जीवन जीने की ऐसी व्यवस्था बताता है जिससे संसार का अनुभव हो और जब इस अनुभव से संसार की निरर्थकता समझ में आ जाए तब मनुष्य की चेतना अगले स्तर पर पहुँचाने की व्यवस्था की जाए। इसलिए जीवन को चार आश्रमों- ब्रह्मचर्य (विद्याध्यन तथा शरीर सौष्ठव हेतु), गार्हस्थ (पारिवारिक जीवन, परस्पर सहयोग हेतु), वानप्रस्थ (संसार के दायित्वों से मुक्ति की शनै: शनै: तैयारी) तथा संन्यास (संसार से दूर होकर पूरी तरह परम चेतना के अनुभव हेतु) – बॉंटा गया। जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गये- अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। यहॉं धर्म से तात्पर्य समाज के नैतिक नियमों से है। यदि धर्म के अनुरूप अर्थ और काम का सेवन किया जाए तो अंतिम लक्ष्य मोक्ष अर्थात् परम चेतना का साक्षात्कार हो जाएगा।


सनातन धर्म में व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से अलग अलग धार्मिक कृत्य बताए गए हैं। सबसे प्रारंभिक स्तर के व्यक्ति के लिए कर्मकाण्ड है, मूर्ति पूजा है जिसमें वह ईश्वर के प्रति एकाग्र होकर समर्पण सीखता है। ऊपरी स्तर वालों के लिए उपासना, ध्यान, ज्ञान आदि हैं। हर व्यक्ति का मूल स्वभाव होता है जो प्रकृति प्रदत्त है। वह अपने मूल स्वभाव के अनुरूप कार्य को ही सर्वाधिक कुशलता से कर सकता है। सनातन धर्म में व्यक्ति के मूल स्वभाव को पहचान कर उसे शिक्षा, राजकाज, वाणिज्य व्यवसाय या सेवा का कार्य सौंपने की व्यवस्था है। इसी प्रकार मनुष्य की वृत्ति समय समय पर बदलती रहती है। कभी सात्विक होती है, कभी राजसिक तो कभी तामसिक। अलग-अलग समय पर व्यक्ति में अलग-अलग तत्त्व प्रबल होते हैं परंतु सामान्यत: इनमें कोई एक प्रधान रहता है। तामसिक को राजसिक से होते हुए सात्विक वृत्ति तक ले जाने और फिर उसके भी पर जाने का रास्ता सनातन धर्म बताता है।


गहराई से विचार करने पर हम पाते हैं कि प्रकृति प्रदत्त पॉंच ज्ञानेन्द्रियों, पॉंच कर्मेन्द्रियों, पंच महाभूत, प्रकृति प्रदत्त स्वभाव, तीन गुण सत् रज और तम, मस्तिष्क के उत्पाद मन, बुद्धि और अहंकार और चेतना सभी मुनष्यों में एक सी है चाहे वह किसी भी रंग, जाति या नस्ल का क्यों न हो। जब से संसार बना है मनुष्य का जन्म हुआ है यह सब रहे हैं और जब तक सृष्टि रहेगी तब तक यह मनुष्य के साथ रहेंगे। यदि चेतना का साक्षात्कार करना होगा तो रास्ते अलग हो सकते हैं पर उनका मूल आधार तो यही होगा। सनातन धर्म इन्हीं के आधार पर आगे का रास्ता बताता है। यह सब सनातन हैं इसलिए यह धर्म भी सनातन है।


समय के साथ समाज का जीवन यापन का तरीका, रहन-सहन, विचार बदलते हैं उसी के अनुसार धार्मिक प्रक्रियाऍं भी बदलना चाहिए। नये विचार अपनाने के लिए सनातन धर्म पूरी तरह से खुला है। इसीलिए सनातन धर्म अपना स्वयं का अनुभव करने के लिए अनुयायियों को प्रेरित करता है। सनातन धर्म के महापुरुष अपनी बात तो कहते हैं परंतु अपना निर्णय किसी पर नहीं थोपते। इसलिए सनातन धर्म में न तो कोई अंतिम उपदेश है और न ही कोई अंतिम पुस्तक। यह तो चिरंतन परम्परा है, समय के साथ नए ऋषि आऍंगे, अपना अनुभव करेंगे, उपदेश देंगे, शास्त्र लिखेंगे परंतु अंत में वही कहेंगे जो गीता का उपदेश देने के बाद कृष्ण ने अर्जुन से कहा था जैसी तेरी इच्छा हो वैसा कर (यथेच्छसु तथा कुरु) । अपने सत्य का अनुभव स्वयं करो।


इसलिए जब कोई कहता है कि हिन्दू धर्म खतरे में है तो वह हिन्दू धर्मावलम्बियों की संख्या के रूप में, आर्थिक समृद्धि के रूप में, भौतिक शक्ति के रूप में सही हो भी सकता है परंतु धर्म के रूप में हिन्दू धर्म अर्थात् सनातन धर्म न कभी खतरे में था न कभी रहेगा क्योंकि यह उन तत्वों व सिद्धांतों पर आधारित है जो सृष्टि के उदय के साथ स्वमेव पैदा हुए हैं और सदैव रहेंगे। समाज की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप प्रक्रियाओं को बदलने की परम्परा सनातन धर्म को नवीन बनाए रखती है। इसका न आदि है, न अंत है, यह चिर नवीन है इसीलिए तो सनातन है।


-ओमप्रकाश श्रीवास्तव-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है।)







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पीएम का दौरा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन दिवसीय अमेरिका दौरे से भारत वापस आ गए हैं। प्रधानमंत्री जो हाथ भरा लेकर लौटे हैं उसमें कारोबार, सामरिक और रणनीतिक साझेदारी को विश्वसनीयता की गहराइयों तक ले जाने और सहयोग का अमेरिकी भरोसा है। इसके अलावा जापान, आस्ट्रेलिया के साथ बढ़ रहा सहयोगात्मक रिश्ता तथा क्वॉड के फोरम का मजबूत होना है। अमेरिका की कंपनियों के सीईओ ने भी प्रधानमंत्री से मुलाकात में अच्छे संकेत दिए हैं। पीएम मोदी ने अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से व्हाइट हाउस में मुलाकात कर एक बड़े मिथक को तोड़ दिया। पहले ऐसा कहा जाता था कि कमला हैरिस और जो बाइडेन का पीएम मोदी के प्रति नजरिया उतना अच्छा नहीं है। लेकिन, इस मुलाकात के बाद जो तस्वीरें दिखाई दी, उससे न केवल मोदी विरोधियों बल्कि पाकिस्तान के लिए भी कड़ा संदेश माना गया। कमला हैरिस ने पीएम मोदी से मुलाकात के बाद आतंकवाद पर पाकिस्तान को लताड़ भी लगाई। पीएम मोदी ने कमला हैरिस को भारत आने का निमंत्रण भी दिया। पीएम मोदी ने व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ द्विपक्षीय बैठक भी की। जो बाइडेन खुद पीएम मोदी को कुर्सी तक लेकर गए और उन्हें बैठाया। इस दौरान बाइडेन ने भारत-अमेरिका संबंधों के दशकों तक चलने वाली रूपरेखा को स्पष्ट किया। उन्होंने यहां तक कहा कि 2006 में मैंने उपराष्ट्रपति रहते हुए ऐलान किया था कि 2020 के बाद भारत-अमेरिका के संबंध नई ऊंचाइयों पर पहुंचेंगे। बाइडेन ने कमला हैरिस के भारतीय मूल के होने का जिक्र भी किया। ऐसे में यह तय माना जा रहा है कि भारत और अमेरिका के बीच आपसी संबंध अब नई ऊंचाइयों को छुएंगे। 


पीएम मोदी ने व्हाइट हाउस में आयोजित क्वाड की पहली प्रत्यक्ष बैठक में हिस्सा भी लिया। इस बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, जापानी प्रधानमंत्री योशिहिडे सुगा और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने भी हिस्सा लिया। सभी नेताओं ने स्वतंत्र और सुरक्षित इंडो-पैसिफिक को लेकर अपनी प्रतिबद्धताओं को उजागर किया। साथ में अप्रत्यक्ष रूप से चीन की विस्तारवादी और आक्रामक नीतियों की आलोचना भी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 76वें सत्र को संबोधित करते हुए आतंकवाद और कोरोना महामारी पर दो टूक बातें सुनाई। उन्होंने सख्त लहजे में अफगानिस्तान की जमीन का किसी भी देश के खिलाफ इस्तेमाल न करने की बात की। इसके अलावा उन्होंने कोरोना महामारी की उत्पत्ति जैसे मुद्दे को उठाकर चीन की दुखती रग पर हाथ रख दिया। पीएम मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में सुधारों में हो रहे विलंब को लेकर भी खरी-खरी सुनाई। मोदी ने अपने भाषण के दौरान भारत में विकास की गाथा को पूरी दुनिया के सामने भी रखा। संयुक्त राष्ट्र महासभा के फोरम से लेकर क्वॉड और अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन से चर्चा के दौरान अपनी चिंताओं को मजबूती के साथ साझा किया। आतंकवाद, कट्टरवाद को लेकर भी अपना पक्ष रखा। पाकिस्तान के अफगानिस्तान में बढ़ रहे दखल को लेकर भी भारत ने अपनी चिंताओं का साझा किया। भविष्य में इसके कारण क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बढऩे वाली चिंताओं और आतंकवाद की संभावना तथा खतरे से आगाह किया। कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री का यह दौरा सार्थक रहा। बदली परिस्थितियों में दुनिया भारत की बातों को कितना गंभीरता से लेगी, यह देखने वाला होगा क्योंकि प्रधानमंत्री की बातों में न सिर्फ भारत के हित रहे, बल्कि संभावित खतरे से दुनिया को चेताना भी रहा।


-सिद्वार्थ शंकर-





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अशोक सिंहल: श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के सूत्रधार

बीसवीं इक्कीसवीं सदी का संधि काल इतिहास के पन्नों में हिंदू समाज के नवजागरण के काल खण्ड के रूप में अंकित होगा। यह वह कालखंड है जब शताब्दियों से पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े जाने से उत्पन्न आत्मविस्मृति एवं आत्महीनता की भावना को तोड़कर हिंदू समाज ने विश्वपटल पर हुंकार भरी थी।


हिंदू समाज के सोए हुए पौरुष को जगाने का आधार बना श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन। यह केवल एक मंदिर निर्माण का आन्दोलन नहीं था अपितु राष्ट्रीय स्वभिमान के जागरण का आन्दोलन था। विदेशी आक्रान्ता द्वारा राष्ट्र के स्वाभिमान पर किये गए कुठाराघात का परिमार्जन कर राष्ट्र के सांस्कृतिक स्वतंत्रता के उद्घोष का आन्दोलन था। चार सौ नब्बे वर्ष के अहर्निश संघर्ष के पश्चात् अब श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के सभी अवरोध समाप्त हो चुके हैं और भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण कार्य का भी शुभारम्भ हो चुका है।


इस आन्दोलन के नायकों में जो नाम प्रमुखता से उभरकर सामने आता है वह है श्रद्धेय अशोक सिंहल का। अशोक सिंहल जी उन महापुरुषों में थे जिन्होंने राष्ट्र की सुप्त पड़ी विराट चेतना को श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के माध्यम से झकझोर कर रख दिया। प्रांत, भाषा, क्षेत्र के भेदभाव सुप्त पड़ गए। वास्तव में यह आन्दोलन भारत की राष्ट्रीय एकात्मता का महायज्ञ था। यह वह महायज्ञ था जिसमें न केवल लद्दाख से कन्याकुमारी और अरुणाचल से गुजरात तक अपितु सम्पूर्ण विश्व में कहीं भी निवास करने वाला भारत प्रेमी श्रीराम भक्त एकता के सूत्र में एकाकार हो गया।


इस सम्पूर्ण आन्दोलन की रीढ़ भारत की संत शक्ति रही और इस संत शक्ति को एकजुट करने में श्रद्धेय अशोक सिंहल जी की अद्वितीय भूमिका रही। अशोक जी की संतों के प्रति असीम श्रद्धा थी और संतों का अशोक जी के प्रति अटूट विश्वास और प्रेम। इस अन्दोलन में शैव, वैष्णव, शाक्त हों या जैन, सिख और बौद्ध सभीं का कहीं न कहीं स्नेह और सौहार्द प्राप्त होता रहा| चाहे संन्यास परंपरा के दशनामी संन्यासी हों या वैष्णव परम्परा के रामानुज, रामानंद संप्रदाय के आचार्य हों या वल्लभ, निम्बार्क, मध्व व गौणीय वैष्णव मत के आचार्य हों या असम के सत्राधिकार हों या राजस्थान के रामस्नेही और महाराष्ट्र के वारकरी और रामदासी हों भारत में उद्भुत सभी मत-पंथ के धर्माचार्यों का अद्भुत सहयोग इस आन्दोलन को प्राप्त हुआ। यह भारत की आध्यात्मिक एकाकारता का अद्भुत उदहारण था और इस महान कार्य के सूत्रधार थे श्रद्धेय अशोक सिंहल।


यह आन्दोलन न केवल राष्ट्रीय एकात्मता अपितु सामाजिक समरसता का भी अद्भुत प्रेरक था, इस आन्दोलन में वर्ण, जाति, पंथ, संप्रदाय सभी का भेद एकाकार होकर श्रीराम मय हो गया। भारत राम का और राम इस भारत के बस यही एकमात्र सत्य बाकी सब कुछ ओझल हो चुका था। गली, गाँव, चौराहे पर बस एक ही धुन “रामलला हम आएंगे, मंदिर भव्य बनायेंगे।” कण-कण में बसने वाले राम विराट रूप में साकार हो गए थे। अबाल-वृद्ध सभी श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के लिए ऐसे व्याकुल थे जैसे त्रेता युग में बनवास के समय शबरी प्रतीक्षा कर रही थी और अयोध्या वापसी के समय भरत।


युगों-युगों से भारत श्रीराम पर किये गए किसी भी प्रकार के अघात-प्रतिघात से व्यथित और व्याकुल हो जाता है, क्योंकि श्रीराम भारत की लोक-चेतन के न प्रतिबिम्ब है और न ही प्रतिनिधि हैं अपितु वे स्वयं भारत की लोक-चेतना हैं, इसलिए सदैव भारत के लोक को श्रीराम की परंपरा की कसौटी पर कसा जाता रहा है। अब भारत के वर्तमान को भी श्रीराम की कसौटी पर कसने का समय आ गया है। यह भारत के आत्मसाक्षात्कार का समय है। श्रीराम हमारी परम्पराओं में नहीं बंध सकते अपितु हमें श्रीराम की परम्पराओं में ही बंधने का समय है। वह परंपरा है भारत की मर्यादा की, इसलिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। वहा परंपरा है भारत के राज्य व्यवस्था की, इसीलिए वे राजाराम हैं। वह परंपरा है भारत की सुरक्षा की, इसलिए धनुर्धारी राम हैं। वह परंपरा है भारत के लोकानुरंजन की, इसलिए वे लोकात्मा लोकभावन राम हैं। वह परंपरा है दीनजन के संताप हरण की, इसलिए दीनदयाल राम हैं। वह परंपरा है भक्त के भाव की, इसलिए वह भक्तवत्सल राम हैं।


श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण का अभिप्राय केवल मंदिर निर्माण नहीं भारत के निर्माण से है। श्रीराम के जन्मस्थान का अपमान भारत की लोकचेतना का अपमान था। अब भारत उसका परिमार्जन कर रहा है, लेकिन इसका पूर्ण सुफल तभी होगा जब श्रीराम का निवास केवल मंदिर में ही नहीं लोक-चेतना और लोक-जीवन में इस प्रकार स्थापित हो कि कोई आक्रान्ता श्रीराम की जन्मभूमि ही नहीं इस पवित्र भारत राष्ट्र की तरफ भी वक्र दृष्टि से देखने का साहस न कर सके। श्रीराम की परम्परा ही भारत की भावना है। जब यह भावना कमजोर होती है तब भारत कमजोर होता है, इसलिए यदि भारत को शक्तिशाली बनाना है तो राम के भाव को शक्तिशाली बनाना होगा।


इस आंदोलन की पूर्णाहुति अभी बाकी है जो श्रीरामजन्मूभमि पर भव्य मंदिर निर्माण के साथ ही भारत के जन-जन में श्रीराम के चरित्र के आधान से पूर्ण होगी। श्रद्धेय अशोक जी का मानना था कि यह आंदोलन भारत के सांस्कृतिक स्वतंत्रता का आंदोलन है। श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण द्वारा इस आंदोलन का द्वितीय चरण पूर्ण होगा। परंतु यह आंदोलन अपनी पूर्णता को तब प्राप्त करेगा जब संपूर्ण भारत श्रीराम के आदर्शों पर चलते हुए एक आध्यात्मिक राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित होगा। जब इस राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक अपने राष्ट्र की अस्मिता आदर्श एवं मानबिंदु के प्रति जागरूक रहते हुए अपना आचरण करेगा। जब इस देश में कोई अशिक्षित वंचित, भूखा एवं लाचार नहीं होगा।


अब वह समय आ गया है जब श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के साथ ही राष्ट्र इस आंदोलन के तृतीय चरण में प्रवेश कर दुनिया के सामने एक समर्थ शक्तिशाली एवं समृद्ध भारत के रूप में खड़ा हो। तभी श्रद्धेय अशोक सिंहल जी का स्वप्न साकार होगा।



–डॉ. चंद्रप्रकाश सिंह-

(लेखक अंरुधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ, प्रयाग के निदेशक हैं एवं श्री अशोक सिंहल जी के निजी सचिव रहे हैं।)






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तेजी से बढ़ रही हैं दुष्कर्म की घटनाएँ, नारी कब तक बेचारगी का जीवन जीयेगी?

हम तालिबान-अफगानिस्तान में बच्चियों एवं महिलाओं पर हो रही क्रूरता, बर्बरता शोषण की चर्चाओं में मशगूल दिखाई देते हैं लेकिन भारत में आए दिन नाबालिग बच्चियों से लेकर वृद्ध महिलाओं तक से होने वाली छेड़छाड़, बलात्कार, हिंसा की घटनाएं पर क्यों मौन साध लेते हैं? इस देश में जहां नवरात्र में कन्या पूजन किया जाता है, लोग कन्याओं को घर बुलाकर उनके पैर धोते हैं और उन्हें यथासंभव उपहार देकर देवी मां को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं वहीं इसी देश में बेटियों को गर्भ में ही मार दिये जाने एवं नारी अस्मिता एवं अस्तित्व को नोंचने की त्रासदी भी है। इन दोनों कृत्यों में कोई भी तो समानता नहीं बल्कि गज़ब का विरोधाभास दिखाई देता है।


दुनियाभर में महिलाओं के अस्तित्व एवं अस्मिता के लिये जागरूकता एवं आन्दोलनों के बावजूद महिलाओं पर अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। हमारे देश में भी महिलाओं की स्थिति, कन्या भ्रूण हत्या की बढ़ती घटनाएं, लड़कियों की तुलना में लड़कों की बढ़ती संख्या, तलाक के बढ़ते मामले, गांवों में महिला की अशिक्षा, कुपोषण एवं शोषण, महिलाओं की सुरक्षा, महिलाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाएं, अश्लील हरकतें और विशेष रूप से उनके खिलाफ होने वाले अपराधों पर प्रभावी चर्चा एवं कठोर निर्णयों से एक सार्थक वातावरण का निर्माण किये जाने की अपेक्षा है। क्योंकि एक टीस-सी मन में उठती है कि आखिर नारी कब तक भोग की वस्तु बनी रहेगी? उसका जीवन कब तक खतरों से घिरा रहेगा? बलात्कार, छेड़खानी, भ्रूण हत्या और दहेज की धधकती आग में वह कब तक भस्म होती रहेगी? कब तक उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को नोचा जाता रहेगा? 


दरअसल छोटी लड़कियों या महिलाओं की स्थिति अनेक मुस्लिम और अफ्रीकी देशों में दयनीय है। जबकि अनेक मुस्लिम देशों में महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के लिये सख्त सजा का प्रावधान है, अफगानिस्तान-तालिबान का अपवाद है। वहां के तालिबानी शासकों ने महिलाओं को लेकर जो फरमान जारी किए हैं वो महिला-विरोधी होने के साथ दिल को दहलाने वाले हैं। नये तालिबानी फरमानों के अनुसार महिलाएं आठ साल की उम्र के बाद पढ़ाई नहीं कर सकेंगी। आठ साल तक वे केवल कुरान ही पढ़ेंगी। 12 साल से बड़ी सभी लड़कियों और विधवाओं को जबरन तालिबानी लड़ाकों से निकाह करना पड़ेगा। बिना बुर्के या बिना अपने मर्द के साथ घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं को गोली मार दी जाएगी। महिलाएं कोई नौकरी नहीं करेंगी और शासन में भागीदारी नहीं करेंगी। दूसरे मर्द से रिश्ते बनाने वाली महिलाओं को कोड़ों से पीटा जाएगा। महिलाएं अपने घर की बालकनी में भी बाहर नहीं झांकेंगीं। इतने कठोर, क्रूर, बर्बर और अमानवीय कानून लागू हो जाने के बावजूद अफगानिस्तान की पढ़ी-लिखी और जागरूक महिलाएं बिना डरे सड़कों पर जगह-जगह प्रदर्शन कर रही हैं। दुनिया की बड़ी शक्तियों को इन महिलाओं के स्वतंत्र अस्तित्व को बचाने के लिये आगे आना चाहिए।


तमाम जागरूकता एवं सरकारी प्रयासों के भारत में भी महिलाओं की स्थिति में यथोचित बदलाव नहीं आया है। भारत में भी जब कुछ धर्म के ठेकेदार हिंसात्मक और आक्रामक तरीकों से महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं तो वे भी तालिबानी ही नजर आते हैं। विरोधाभासी बात यह है कि जो लोग नारी को संस्कारों की सीख देते हैं, उनमें से बहुत से लोग, धर्मगुरु, राजनेता एवं समाजसुधारक महिलाओं के प्रति कितनी कुत्सित मानसिकता का परिचय देते आए हैं, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। इनके चरित्र का दोहरापन जगजाहिर हो चुका है। कोई क्या पहने, क्या खाए, किससे प्रेम करे और किससे शादी करें, सह-शिक्षा का विरोधी नजरिया- इस तरह की पुरुषवादी सोच के तहत महिलाओं को उनके हकों से वंचित किया जा रहा है, उन पर तरह-तरह की बंदिशें एवं पहरे लगाये जा रहे हैं। वक्त बीतने के साथ सरकार को भी यह बात महसूस होने लगी है। शायद इसीलिए सरकारी योजनाओं में महिलाओं की भूमिका को अलग से चिह्नित किया जाने लगा है।


आये दिन कोई न कोई महिला अत्याचार, बलात्कार एवं शोषण की घटना सुनाई देती है जो दिल को दर्द से भर देती है और बहुत कुछ सोचने को विवश कर देती है। देश के किसी एक भाग में घटी कोई घटना सभी महिलाओं के लिए चिंता पैदा कर देती है। यूं तो महिलाओं के संरक्षण के लिए बहुत सारे कानून बने हैं लेकिन अपराधियों को इनका ज़रा भी खौफ क्यों नहीं? जब देश में ऐसी कोई घटना घटित होती है तो क्यों लंबे समय तक तारीख पर तारीख लगती रहती हैं? तुरंत फैसला क्यों नहीं हो जाता इन हैवानों एवं महिला अत्याचारियों का? इन आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए क्या हमें भी कुछ मुस्लिम देशों के जैसी क्रूर सज़ा का प्रावधान करना चाहिए? एक अपराधी से कानून को क्यों हमदर्दी हो जाती है जो उसे अपना पक्ष रखने का अवसर सालों साल मिलता रहता है। आश्चर्य इस बात का होता है कि इन अपराधियों के माता-पिता भी इन्हें बचाने के लिए जी जान से जुड़ जाते हैं। इस तरह कानून का संरक्षण नहीं मिलने से औरत संघर्ष के अंतिम छोर पर लड़ाई हारती रही है। लेकिन महिलाओं के प्रति एक अलग तरह का नजरिया इन सालों में बनने लगा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नारी के संपूर्ण विकास की संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए अनेक योजनाएं लागू की हैं, जिनमें अब नारी सशक्तीकरण और सुरक्षा के अलावा और भी कई आयाम जोड़े गए हैं। सबसे अच्छी बात इस बार यह है कि समाज की तरक्की में महिलाओं की भूमिका को आत्मसात किया जाने लगा है।


एक कहावत है कि औरत जन्मती नहीं, बना दी जाती है और कई कट्टर मान्यता वाले औरत को मर्द की खेती समझते हैं। इसीलिये आज की औरत को हाशिया नहीं, पूरा पृष्ठ चाहिए। पूरे पृष्ठ, जितने पुरुषों को प्राप्त हैं। पर विडम्बना है कि उसके हिस्से के पृष्ठों को धार्मिकता के नाम पर ‘धर्मग्रंथ’ एवं सामाजिकता के नाम पर ‘खाप पंचायतें’ घेरे बैठे हैं। पुरुष-समाज को उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं एवं कट्टरताओं को अलविदा कहना ही होगा जिनका हाथ पकड़कर वे उस ढलान में उतर गये जहां रफ्तार तेज है और विवेक अनियंत्रित है जिसका परिणाम है नारी पर हो रहे नित-नये अपराध और अत्याचार। पुरुष-समाज के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने एवं बेचारगी को जीने को विवश होना पड़ता है। पुरुषवर्ग नारी को देह रूप में स्वीकार करता है, लेकिन नारी को उनके सामने मस्तिष्क बनकर अपनी क्षमताओं का परिचय देना होगा, उसे अबला नहीं, सबला बनना होगा, बोझ नहीं शक्ति बनना होगा।


‘यत्र पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता’- जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। किंतु आज हम देखते हैं कि नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है। उसे ‘भोग की वस्तु’ समझ कर आदमी ‘अपने तरीके’ से ‘इस्तेमाल’ कर रहा है, यह बेहद चिंताजनक बात है। आज अनेक शक्लों में नारी के वजूद को धुंधलाने की घटनाएं शक्ल बदल-बदल कर काले अध्याय रच रही हैं। देश में गैंग रेप की वारदातों में कमी भले ही आयी हो, लेकिन उन घटनाओं का रह-रह कर सामने आना त्रासद एवं दुःखद है। आवश्यकता लोगों को इस सोच तक ले जाने की है कि जो होता आया है वह भी गलत है। महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों को रोकने के लिए कानूनों की कठोरता से अनुपालना एवं सरकारों में इच्छाशक्ति जरूरी है। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के विरोध में लाए गए कानूनों से नारी उत्पीड़न में कितनी कमी आयी है, इसके कोई प्रभावी परिणाम देखने में नहीं आये हैं, लेकिन सामाजिक सोच में एक स्वतः परिवर्तन का वातावरण बन रहा है, यहां शुभ संकेत है।


-ललित गर्ग-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




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तालिबानों पर जब अफ़ग़ानी नागरिकों को भरोसा नहीं तो दुनिया भरोसा कैसे करे?


इस्लामी शरीया क़ानून वैसे तो सऊदी अरब सहित दुनिया के और भी अनेक देशों में लागू है। ऐसे लगभग सभी देशों से भारत व दुनिया के अन्य देशों के बेहतर रिश्ते यहाँ तक कि उनसे व्यवसायिक रिश्ते भी हैं। उन देशों के धर्म व शरीया क़ानूनों की स्वीकार्यता के चलते दुनिया ऐसे किसी देश पर न तो कोई आपत्ति जताती है न ही उनके आपसी संबंधों पर कोई फ़र्क़ पड़ता है। परन्तु तालिबान,उनकी तर्ज़-ए-सियासत,उनके द्वारा इस्लामी शरीया क़ानूनों का हिमायती बनने का ढोंग,और शरीया के ही नाम पर दर्शाई जा रही क्रूरता,इस्लाम के नाम पर दुनिया के मुस्लिम देशों से समर्थन जुटाए जाने के लिये अपनाया जाने वाला दोहरापन,अफ़ग़ानिस्तान में ही महिलाओं सहित एक बड़े शांतिप्रिय व प्रगतिशील वर्ग द्वारा किया जा रहा उनका विरोध और यहाँ तक कि स्वयं कट्टरपंथी तालिबानी सर्वोच्च नेताओं के मध्य सत्ता की खींच तान को लेकर काबुल के राष्ट्रपति भवन में कथित तौर पर हुई मार-पीट तथा उनसे सहमति न रखने वालों,महिलाओं व पत्रकारों पर ढहाये जाने वाले ज़ुल्म इस बात के पुख़्ता सुबूत हैं कि उपद्रवी,अतिवादी,पूर्वाग्रही तथा कट्टरपंथी सोच रखने वाले यह लोग कम से कम अफ़ग़ानिस्तान पर शासन करने योग्य तो हरगिज़ नहीं हैं।


तालिबानों द्वारा विगत 15 अगस्त को दहशत फैलाकर व हथियारों के बल पर काबुल के सत्ता केंद्र पर क़ब्ज़ा जमाया गया और उनकी दहशत के चलते ही किसी बड़ी अनहोनी को टालने की ग़रज़ से राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी को आनन फ़ानन में देश छोड़कर भागना भी पड़ा। राष्ट्रपति ग़नी के अनुसार यदि वे देश छोड़कर न भागते तो ख़ूनी हिंसा हो सकती थी इसी को टालने के लिये वे काबुल छोड़ कर भाग निकले। ज़ाहिर है जिस संभावित ख़ूनी हिंसा का वे ज़िक्र कर रहे थे उसकी पूरी संभावना तालिबानी लड़ाकों की तरफ़ से ही थी। कोई भी सभ्य समाज इसे न तो सत्ता परिवर्तन मान सकता है न ही इसे जनभागीदारी की सरकार कहा जा सकता है। ख़ासकर तब जबकि दुनिया के 'मोस्ट वांटेड' आतंकी सत्ता पर क़ाबिज़ हों। हालांकि तालिबानियों द्वारा इसे आज़ादी के तौर पर पेश किया जा रहा है। जबकि इसमें आज़ादी जैसा कोई मसअला था ही नहीं। फ़रवरी 2020 में अफ़ग़ानिस्तान में हुए चुनावों में राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी लगभग 51 प्रतिशत मत प्राप्त कर अफ़ग़ानी जनता द्वारा दूसरी बार राष्ट्रपति चुने गए थे। यानी वहां अफ़ग़ानी जनता द्वारा निर्वाचित सरकार ही कार्यरत थी और उसी की देखरेख में अफ़ग़ानिस्तान में अनेक विकास परियोजनायें चल रही थीं। रहा सवाल अमेरिकी फ़ौजों की अफ़ग़ानिस्तान से वापसी का तो इसमें भी तालिबानों की सशस्त्र मुहिम की कोई भूमिका नहीं थी। क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सत्ता में आते ही स्वयं 31 अगस्त 2021 तक सभी अमेरिकी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ देने की समय सीमा निर्धारित कर दी थी। लिहाज़ा तालिबानों द्वारा 'आज़ादी ' हासिल करने जैसा प्रोपेगंडा करना दुनिया की आँखों में धूल झोंकने जैसा ही है। तालिबानी नेता यह भी भली भांति जानते हैं कि यदि वे चुनाव के रास्ते से अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता हासिल करना चाहें तो यह उनके लिए टेढ़ी खीर साबित होगी। क्योंकि वहां की शांतिप्रिय आम जनता ख़ासकर उदारवादी वर्ग व महिलायें तालिबानियों के वहशीपन तथा धर्म के नाम पर अपनाई जाने वाली अधर्मिता,उनके क्रूर बर्ताव तथा संकीर्ण मानसिकता से बख़ूबी वाक़िफ़ है। 


अफ़ग़ानिस्तान से आने वाली तस्वीरों में जिस तरह मंहगे से मंहगे व अति आधुनिक हथियारों से लैस तालिबानी लड़ाके राष्ट्रपति भवन से लेकर वहां की सड़कों तक जिस अंदाज़ में घूमते दिखाई देते हैं उसे देखकर तो यह समझना ही मुश्किल है कि कौन तालिबानी लड़ाका है तो कौन सुरक्षा कर्मी। ज़ाहिर है इसतरह की तस्वीर किसी अराजक व असभ्य देश की ही हो सकती है। एक मशहूर कहावत है 'लुच्चे सबसे ऊँचे ',इसी कहावत के तहत आज हाथों में हथियार धारण कर तथा शरीया क़ानून लागू करने का भय फैलाकर तालिबानों ने दुनिया को यह दिखने का प्रयास किया है कि वे ही देश की आवाज़ हैं और पूरा देश उनके साथ है। परन्तु दरअसल अफ़ग़ानिस्तान में दिखाई देने वाला तालिबानी वर्चस्व महज़ एक धोखा और छलावा के सिवा और कुछ भी नहीं। सही मायने में अफ़ग़ानिस्तान में दिखाई दे रहे घटनाक्रम का न तो इस्लाम से कोई वास्ता है न ही इसमें दुनिया के मुसलमानों के हितों जैसी कोई बात है। यह शुद्ध रूप से सत्ता व साम्राजयवाद का खेल है जो चंद कट्टरपंथियों द्वारा अफ़ग़ानिस्तान के जाहिल व बेरोज़गार लोगों को 'धर्म की अफ़ीम' खिलाकर धर्म और शरीया के नाम पर खेला जा रहा है। इस्लाम की उत्पत्ति के समय से ही ऐसी शक्तियां सक्रिय हो चुकी थीं जो धर्म और सत्ता का घालमेल कर आम लोगों को धोखे में रखकर मुफ़्त में स्वयं सत्ता का भरपूर आनंद लेती रही हैं। इसी सोच के तमाम आक्रांता भी थे जिनके मुंह पर तो इस्लाम और मुसलमान होता था मगर उनके कृत्य ग़ैर इस्लामी तो क्या बल्कि ग़ैर इंसानी हुआ करते थे। जिस तरह दुनिया में उन अनेक लुटेरे आक्रांताओं ने इस्लाम का नाम बदनाम किया है ठीक उसी तरह यह तालिबानी भी अपनी क्रूरता का परिचय देकर पूरी दुनिया में इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम व रुस्वा कर रहे हैं। दुनिया के मुसलमानों से कथित तालिबानी प्रेम इनकी चीन नीति से भी स्पष्ट है जिसके अंतर्गत चीन के वीगर मुसलमानों के साथ बड़े पैमाने पर होने वाली ज़्यादतियों के बावजूद इन्होंने उस मसअले पर ख़ामोश रहने का निर्णय लिया है। पाकिस्तान द्वारा तालिबानों को कथित तौर पर दिया जाने वाला नैतिक व सामरिक समर्थन भी 'हम तो डूबे हैं सनम तुमको भी ले डूबेंगे ' नीति पर आधारित लगता है। पाकिस्तान से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक बच्चे बच्चे को यह पता चल चुका है कि तालिबानों की वापसी में पाकिस्तान की अहम भूमिका है। जबकि इससे पहले अफ़ग़ानिस्तान के विकास में तथा उसे पुनः खड़ा करने में भारत जो भूमिका अदा कर रहा था उसे पाकिस्तान पचा नहीं पा रहा था। कुल मिलाकर अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा ऐसी राजनैतिक स्थिति में जबकि सत्ता क्रूर व अपराधी मानसिकता के लोगों के हाथों में हो और स्वयं अफ़ग़ानी नागरिकों को ही तालिबानों पर भरोसा न हो तो दुनिया आख़िर इनपर कैसे भरोसा करे ?


-तनवीर जाफ़री-





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बच्चों का टीका

कोरोना की तीसरी लहर की आहट के बीच देश में 12-18 साल के बच्चों का वैक्सीनेशन अगले महीने शुरू हो जाएगा। कैडिला हेल्थकेयर अगले महीने बच्चों की वैक्सीन जायकोव-डी लॉन्च कर देगी। इसके इमरजेंसी यूज के लिए ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने पिछले महीने मंजूरी दे दी थी। जायडस कैडिला अक्टूबर से हर महीने एक करोड़ डोज बनाना शुरू कर देगी। दूसरी तरफ भारत बायोटेक भी बच्चों पर कोवैक्सिन का तीसरे फेज का ट्रायल पूरा कर चुकी है। कंपनी ने कहा है कि वह अगले हफ्ते थर्ड फेज के डेटा डीजीसीआई को सौंप देगी। अभी थर्ड फेज के डेटा का एनालिसिस किया जा रहा है। वहीं सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भी 2 से 12 साल की उम्र के बच्चों पर कोवावैक्स का दूसरे-तीसरे फेज का ट्रायल कर रही है। कोविड-19 वैक्सीनेशन पर सरकार को सलाह देने वाली कमेटी ने पिछले महीने राय दी थी कि शुरुआत में 12 साल से ज्यादा उम्र के उन बच्चों का वैक्सीनेशन किया जाए, जिन्हें गंभीर बीमारियां हैं। कमेटी का कहना था कि देश में 40 करोड़ बच्चे हैं और सभी का वैक्सीनेशन शुरू किया जाता है तो पहले से चल रहे 18+ के वैक्सीनेशन पर असर पड़ेगा। कमेटी के चेयरमैन एनके अरोड़ा ने कहा था कि पूरी तरह से स्वस्थ बच्चों को वैक्सीनेशन के लिए अभी इंतजार करना होगा। कमेटी की सलाह के मुताबिक पहले उन बच्चों का वैक्सीनेशन किया जाएगा जो किडनी ट्रांसप्लांट, जन्म से कैंसर या हार्ट संबंधी बीमारी के शिकार हैं। दूसरी लहर में जैसी तबाही हुई, उसका सबक यही है कि पूरी आबादी को टीका जल्द से जल्द लग जाए। इस बात पर लगातार गौर करने की जरूरत है कि दूसरी लहर में रोजाना संक्रमण और मौतों के आंकड़ों ने सारे रिकार्ड तोड़ डाले। महामारी का खतरा अभी जस का तस है। फिलहाल बस संक्रमण की दर ही घटी है। दूसरी लहर में भी बच्चों के काफी मामले देखने को मिले। लेकिन गंभीर स्थिति वाले मामलों की संख्या कम रही। फिर, देशी-विदेशी विशेषज्ञों ने यह कह कर चिंता बढ़ा दी कि अक्टूबर-नवंबर तक तीसरी लहर भी आ सकती है। और यह बच्चों के लिए खतरनाक होगी। जाहिर है, बच्चों को बचाना अब पहली प्राथमिकता हो गई है। इसलिए ज्यादातर राज्यों ने अभी से ऐसे इंतजाम शुरू कर दिए हैं कि अगर तीसरी लहर में बच्चे संक्रमण की चपेट में आते हैं तो उन्हें तत्काल इलाज मिल सके। बच्चों का मामला ज्यादा ही संवेदनशील है। दो से छह साल तक के बच्चे तो अपनी तकलीफ बयां भी नहीं कर पाते। परीक्षणों और इलाज की जटिल प्रक्रियाओं के दौर से गुजरना बच्चों के लिए कितना पीड़ादायक होता होगा, यह कल्पना से परे है। बच्चों पर महामारी का खतरा इसलिए भी बना हुआ है कि अगर घर में किसी एक या उससे ज्यादा सदस्य संक्रमण से ग्रस्त हो जाएं तो बच्चों को इसकी जद में आते देर नहीं लगती। दूसरी लहर में ऐसे मामले देखे भी गए। जाहिर है, अगर बच्चों को टीका लगा होगा तो काफी हद तक बचाव रहेगा। कोरोना के फिर से बढ़ते मामलों ने नींद उड़ा दी है। सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि महामारी से निपटने में जिस केरल राज्य को एक मॉडल के रूप में देखा जा रहा था, वहीं आज हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। पिछले कुछ दिनों से केरल में संक्रमण के रोजाना तीस हजार से ज्यादा मामले मिलना गंभीर स्थिति का संकेत है। इससे तो लग रहा है कि राज्य में महामारी ने फिर से पैर पसार लिए हैं। हालांकि महाराष्ट्र, मिजोरम, तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्यों में भी स्थिति कोई अच्छी नहीं है। महाराष्ट्र में तो रोजाना संक्रमितों की संख्या पांच हजार के आसपास चल रही है। इसलिए महामारी को जरा भी हल्के में लिया गया तो फिर से गंभीर संकट में पडऩे में जरा देर नहीं लगने वाली। हकीकत तो यह है कि दूसरी लहर गई नहीं है। तीसरी का खतरा सामने है। विशेषज्ञ चेता रहे हैं कि अक्टूबर में तीसरी लहर जोरों पर होगी और रोजाना संक्रमितों का आंकड़ा तीन-साढ़े लाख तक पहुंच जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। केरल, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर राज्यों की अभी जो स्थिति है, उससे तो लगता है कि लोगों की बेरोकटोक आवाजाही देश में तीसरी लहर का कारण आसानी से बन सकती है। इसके अलावा बाजारों में भीड़ से लेकर जन आशीर्वाद यात्रा जैसे राजनीतिक आयोजनों तक में कोरोना व्यवहार के नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं। ऐसे में संक्रमण को फैलने से कौन रोक पाएगा?


सिद्वार्थ शंकर-




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राष्ट्र-समाज सेवा का दूसरा नाम एनएसएस

राष्ट्रीय सेवा योजना, ऊर्जा से परिपूर्ण एक ऐसा नाम, जो युवाओं में निःस्वार्थ भाव, सेवा संकल्प, सच्चाई व नेतृत्व जैसे गुणों का विकास कर देता है, यानी राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़े युवाओं के लिए एनएसएस स्वयंसेवी नाम होने से ही उन्हें प्रेरणा व ऊर्जा का गर्वमयी आभास होने लगता है। राष्ट्रीय सेवा योजना भारत सरकार के युवा मामले व खेल मंत्रालय का एक संगठित कार्यक्रम है जोकि राष्ट्र के युवाओं में नेतृत्व, सामूहिक एकता व सेवा भाव लाने में आधुनिक समय में एक बहुत बड़ा सशक्त साधन सिद्ध हो रहा है। राष्ट्रीय सेवा योजना को इसके स्थापना के उद्देश्य से समझने का प्रयास करंे तो धरती पर कुछ भी निश्चित नहीं है। प्रकृति कभी न कभी अपना विराट रूप दिखाती ही है और आपदाओं को जन्म देती है जिससे जान-माल को भारी नुकसान होने की संभावना बनी रहती है। ऐसी स्थिति में सरकारी और गैर-सरकारी संगठन सहायता और रोग-उपचार के लिए अनेक समुदाय व संस्थाएं सामने आती हैं, लेकिन यह सदा संभव नहीं होता कि वे समय पर पहुंचें। कई कारक ऐसे होते हैं जिनकी वजह से इनके कार्यों में रुकावट आना लाजमी है। इसलिए अनेकों स्वयंसेवी संस्थाएं अस्तित्व में आईं और सामाजिक कल्याण के लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा कार्य में जुट गइर्ं। इन्हीं स्वयंसेवी संस्थाओं में मुख्य नाम आता है छात्रों व युवाओं की संस्था राष्ट्रीय सेवा योजना का। एनएसएस एक ऐसी स्वयंसेवी संस्था है जो 24 सितंबर सन 1969 को अस्तित्व मंे आई जिसमें प्रत्येक वर्ष लाखों स्वयंसेवी पंजीकृत होते हैं तथा सामाजिक कार्यों का हिस्सा बनते हैं। देश में कहीं भी बाढ़, आग, सूखा, भुखमरी, महामारी या अन्य कोई आपदा आती है तो सर्वप्रथम एनएसएस के स्वयंसेवी ही सक्रिय तौर पर सेवा व बचाव राहत कार्यों में बिना बोले जुट जाते हैं।


ये स्वयंसेवी किसी के आदेश का इंतजार नहीं करते बल्कि स्वयं ही स्वयंसेवी होने का कर्त्तव्य निभाकर सेवा कार्यों में जुट जाते हैं। यहां तक कि कई बार पर्याप्त साधनों के अभाव में भी अपने स्तर पर बचाव कार्यों को पूरा करते हैं। बचाव कार्यों के अलावा स्वयंसेवी स्वच्छता कार्यक्रम, पौधारोपण कार्यक्रम, रक्तदान शिविर, सांस्कृतिक सम्मेलन, नेतृत्व की पहचान व परख, नशा निवारण जागरूकता कार्यक्रम भी चलाते हैं तथा लोगों तक सरकार की विभिन्न जनहितकारी निर्मल ग्राम योजना व स्वच्छ भारत मिशन जैसी नीतियों को भी जमीनी स्तर पर पहुंचाते हैं तथा लोगों को विभिन्न शिविरों, रैलियों व अन्य माध्यमों से जागरूक करते हैं। एनएसएस हिमाचल प्रदेश ने भी समाजसेवा में अनेक अभियान ऐसे चलाए हंै जिनसे राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवियों के कार्य समाज में सराहे गए हैं। इनमें मिशन डिजिटल कोरोअवेयर, ज्ञान दान एनएसएस मेरी पाठशाला, घरै हिमाचली खरै हिमाचली, इंच वन टीच वन, इंच वन वन हण्डरड वन, बुजुर्गों की देखरेख व कोरोना काल में भ्रामकता को दूर कर स्वस्थ जानकारी समाज तक पहुंचाने के अनेक मुख्य अभियान चलाए गए हैं। एनएसएस सुनने को तो नाम एक छोटा है लेकिन इसके पीछे छिपे 1969 स्थापना वर्ष से लेकर आज तक के अध्याय की बात करंे तो यह एक बहुत बड़ा व्यापक अध्याय सामने आ जाता है। आज स्कूलों, महाविद्यालयों में युवाओं की पहली पंसद एनएसएस बनती जा रही है। एनएसएस युवाओं में नेतृत्व की क्षमता को निखार रही है तथा राष्ट्र को नेतृत्ववान व बहुमुखी प्रतिभा से परिपूर्ण युवा भेंट कर रहा है। राष्ट्रीय सेवा योजना में स्वयंसेवक को दो साल की अवधि में कुल 240 घंटे की सामाजिक सेवा समर्पित करना आवश्यक होता है। राष्ट्रीय सेवा योजना स्वयंसेवक को प्रति वर्ष 20 घंटे उन्मुखीकरण और 100 घंटे सामुदायिक सेवा में देना पड़ता है। एनएसएस में युवाओं के कार्य उद्देश्यों की बात करें तो एक एनएसएस स्वयंसेवी का कार्य जिस समुदाय में काम कर रहे हैं, उसे समझना, समुदाय की समस्याओं को जानना और उन्हें हल करने के लिए उनको शामिल करना, सामाजिक और नागरिक जिम्मेदारी की भावना का विकास करना, समूह स्तर पर जिम्मेदारियों को बांटने के लिए आवश्यक क्षमता का विकास करना, आपातकाल और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए उनको विकसित करना व राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता का अभ्यास करना इत्यादि प्रमुख कार्य हैं जिन्हें एक एनएसएस स्वयंसेवी इस संस्था में रहकर करता है।


वर्तमान कोरोना काल की बात करंे तो भी अगर आकलन युवा स्वयंसेवी संस्थाओं के सेवा व जागरूकता कार्यों का करें तो केवल राष्ट्रीय सेवा योजना के युवा स्वयंसेवी ही नजर आते हैं जिनके कार्यों की समाज में सराहना भी होती है। इसके अलावा एनएसएस प्रत्येक वर्ष अपने उद्देश्यों के अनुरूप सामाजिक सेवा कार्य करता है तथा मानसिक व सामाजिक रूप से एक स्वस्थ समाज की स्थापना करता है। शिक्षा के साथ व्यक्ति का संपूर्ण सामाजिक, मानसिक, शारीरिक व शैक्षणिक विकास करना ही एनएसएस की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य है। 24 सितंबर 1969 को स्थापित इस स्वयंसेवी संस्था ने समाज में अपनी एक अलग आदर्श पहचान कायम की है तथा आने वाले समय में भी युवा स्वयंसेवी एनएसएस को एक आदर्श स्थान तक पहुंचाने में अपना संपूर्ण योगदान दे रहे हैं। एनएसएस से जुड़कर युवाओं के व्यक्तित्व, चरित्र व आत्मिक का विकास होता है। राष्ट्रीय सेवा योजना का स्थापना वर्ष 1969 से लेकर आज तक का 51 वर्षों का सफर एक गर्वमयी सफर रहा है। इन 51 वर्षों में एनएसएस ने देश व समाज को असंख्य नेतृत्वान युवा प्रदान किए हैं जिनके प्रयासों से समाज का सार्वभौमिक विकास हुआ है तथा इन एनएसएस स्वयंसेवियों ने राष्ट्र निर्माण में भी अपनी अग्रणी भूमिका अभिनीत की है। इन 51 वर्षों मंे एनएसएस ने निःस्वार्थ भाव से ‘स्वयं से पहले आप’ आदर्श वाक्य के साथ समाज सेवा के क्षेत्र में एक विशेष आयाम प्राप्त कर लिया है। यह पहचान आगे भी इसी प्रकार रहेगी, यह विश्वास स्वयंसेवियों के प्रयासों को देख कर दृढ़ होता है। सरकार को भविष्य में भी इस प्रकार के कार्यक्रमों के विषय में गहन चिंतन कर उन्हें क्रियान्वित करना चाहिए। व्यक्ति के संपूर्ण विकास का यह साधन सही मायने में एक आदर्श संस्था है जो राष्ट्र व समाज की सेवा में शानदार भूमिका निभा रही है।


-प्रो. मनोज डोगरा-






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तो इस तरह भगवान बुद्ध ने अपने शिष्‍यों को ज्ञान का महत्‍व समझाया

एक दिन गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं को तंबाधातिका के बारे में बताया। तंबाधातिका 55 सालों तक एक राज्य का जल्लाद रहा। सेवानिवृत्ति के बाद एक दिन तंबाधातिका ने खिचड़ी बनाई और नहा-धोकर खिचड़ी थाली में डाली। वह खिचड़ी खाने ही वाला था कि दरवाजे पर भिक्षु सारिपुत्त पहुंचे। सारिपुत्त ध्यान से उठे ही थे और उन्हें जोरों की भूख लगी थी। तंबाधातिका ने सोचा कि जीवन भर उसने हत्याएं की हैं, आज पुण्य का मौका हाथ लगा है। उसने भिक्षु को अंदर बुलाया और उनके सामने खिचड़ी रख दी।


भोजन करने के बाद भिक्षु ने उसे धम्म का उपदेश दिया। लेकिन तंबाधातिका ने नहीं सुना, क्योंकि उस दौरान वह अपना जल्लाद का जीवन याद कर रहा था। भिक्षु सारिपुत्त ने उससे पूछा कि क्या वह चोरों को मारना चाहता था या इसलिए मारा क्योंकि राजा ने आदेश दिया था। तंबाधातिका ने कहा कि उसने बस आज्ञा का पालन किया अन्यथा उसकी उन्हें मारने की कोई इच्छा नहीं थी। तब भिक्षु ने पूछा, ‘अगर ऐसा है, तो आप दोषी होंगे या नहीं?’ तंबाधातिका ने सोचा कि चूंकि वह बुरे कामों के लिए जिम्मेदार नहीं था, तो वह दोषी नहीं था। इसके बाद वह शांत हो गया और भिक्षु ने उपदेश पूरा किया। जब वह भिक्षु को विदा करके लौटा तो उसकी मौत हो गई।


बुद्ध ने भिक्षुओं को बताया कि इस तरह से तंबाधातिका को मोक्ष प्राप्त हुआ। भिक्षु दुविधा में पड़ गए। उन्होंने बुद्ध से पूछा कि जीवन भर हत्याएं करने वाले को भला मोक्ष कैसे मिल सकता है? बुद्ध मुस्कुराए और बोले, ‘तंबाधातिका ने अंत समय में ज्ञान प्राप्त कर लिया था। भिक्षु सारिपुत्त ने उनके पूरे जीवन में पहली बार ज्ञान के शब्द कहे, जिसे उन्होंने समझ लिया था कि ज्ञान ही तो मोक्ष है।’ बुद्ध बोले, ‘बिना ज्ञान का हजार शब्दों का उपदेश बेकार है और जिस एक शब्द से मन शांत हो जाए, वह सबसे बड़ा ज्ञान है।’


संकलन : करुणा मौर्य




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पितृ पक्ष: पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का पर्व

अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन के साथ ही गणेशोत्सव का समापन हो जाता है और उसके अगले दिन से पितृ पक्ष शुरू होता है, जो प्रायः भाद्रपद माह की पूर्णिमा से शुरू होकर पितृमोक्षम अमावस्या तक कुल 15 दिनों का होता है। हालांकि हिन्दू पंचाग के अनुसार तृतीया तिथि बढ़ने और 26 सितम्बर को पितृ पक्ष की कोई तिथि नहीं होने के कारण इस बार पितृ पक्ष 17 दिन के हैं, 20 सितम्बर को शुरू होने के बाद जिनका समापन 6 अक्तूबर को अमावस्या के दिन होगा।


वैसे शास्त्रों में पितृ पक्ष का बढ़ना अच्छा नहीं माना जाता। हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष को बहुत अहम माना गया है लेकिन इस दौरान शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। पितृ पक्ष में सगाई, विवाह, मुंडन, गृहप्रवेश, परिवार के लिए महत्वपूर्ण चीजों की खरीददारी, नए कपड़े खरीदना, कोई नया कार्य शुरू करना इत्यादि कोई भी शुभ कार्य करना अच्छा नहीं माना जाता। पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद कर उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण करते हैं।


दरअसल हिन्दू धर्म में मृत्यु के पश्चात् पितरों की याद में श्राद्ध किया जाता है और उनकी मृत्यु की तिथि के अनुसार ही श्राद्ध की तिथि निर्धारित की जाती है। वैसे हिन्दू धर्म के अलावा ईसाई, इस्लाम और बौद्ध धर्म में भी अपने पूर्वजों को याद रखने की प्रथा है। पश्चिमी जगत में जहां पूर्वजों की स्मृति में मोमबत्तियां जलाने की प्रथा है, वहीं ईसाई धर्म में व्यक्ति के निधन के चालीस दिनों पश्चात् सामूहिक भोज की रस्म की जाती है। इस्लाम में चालीस दिनों बाद कब्र पर फातिहा पढ़ने और बौद्ध धर्म में भी पूर्वजों की याद में कुछ ऐसे ही प्रावधान देखने को मिलते हैं।


श्राद्ध का अर्थ होता है ‘श्रद्धापूर्वक’। हमारे संस्कारों और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने को ही श्राद्ध कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो दिवंगत परिजनों को उनकी मृत्यु तिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया जाना जाना ही श्राद्ध है। ब्रह्मपुराण के अनुसार उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम जो भी वस्तु उचित विधि द्वारा श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दी जाए, वह श्राद्ध कहलाता है। पितृ पक्ष को हिन्दू धर्म में महालय या कनागत के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान, तर्पण कर्म और ब्राह्मण को भोजन कराने से पूर्वज प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। पिंडदान करने के लिए हरिद्वार और गया को सर्वोत्तम माना गया है। प्राचीन हिन्दू धर्म ग्रंथों और धार्मिक परम्पराओं में पितृपक्ष के अलावा भी श्राद्ध का उल्लेख मिलता है। धर्मसिन्धु में तो श्राद्ध के लिए वर्षभर की सभी 12 अमावास्याओं, 4 पुणादि तिथियों, 14 मन्वादि तिथियों, 12 संक्रांतियों, 12 वैधृति योग, 12 व्यतिपात योग, 15 पितृपक्ष, 5 अष्टका, 5 अन्वष्टका और 5 पूर्वेद्यु अर्थात् 96 कालखंड का विवरण मिलता है किन्तु पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म करने का महत्व सर्वाधिक माना गया है। पूर्वजों के निधन की तिथि के अनुसार पितृपक्ष के दौरान उनका श्राद्ध कर्म किया जाता है लेकिन पारम्परिक अवधारणाओं के अनुसार अगर किसी पितर की मृत्यु तिथि मालूम नहीं है तो उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है, जिसे ‘सर्व पितृ अमावस्या’ भी कहा जाता है। जिन परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उन सभी का श्राद्ध इस दिन किया जा सकता है।


हिन्दू धर्म में मान्यता है कि पितृ पक्ष के दिनों में यमराज आत्मा को मुक्त कर देते हैं ताकि वे अपने परिजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। ऐसी ही मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दिनों में पितर नीचे पृथ्वी पर आते हैं और बिना किसी आह्वान के अपने वंशजों के घर किसी भी रूप में जाते हैं। ऐसे में यदि उन्हें तृप्त नहीं किया जाए तो उनकी आत्मा नाराज होकर अतृप्त लौट जाती है। माना गया है कि यदि पितर नाराज हो जाएं तो जिंदगी मुसीबतों से भर जाती है। इसलिए शास्त्रों में पितरों का श्राद्ध विधिपूर्वक करना जरूरी बताया गया है। मान्यता है कि यदि पितर खुशी-खुशी वापस जाते हैं तो अपने वंशजों को दिए गए उनके आशीर्वाद से घर-परिवार में सुख-समृद्धि में बढ़ोतरी होती है। जिंदगी में सफलता के लिए मेहनत, किस्मत, ईश्वरीय की कृपा के साथ-साथ पूर्वजों का आशीर्वाद भी बेहद जरूरी होता है और धर्म एवं ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पूर्वजों को सम्मान देने से वे प्रसन्न होते हैं तथा पूरे परिवार पर कृपा करते हैं। इसीलिए हमारे दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण-श्राद्ध किया जाता है। पितृ पक्ष में पितरों को जल देने की विधि को तर्पण कहा जाता है।


पितृ दोष को ज्योतिष शास्त्र में अशुभ फल देने वाला माना गया है और शास्त्रों के अनुसार पितृ पक्ष में पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष से आने वाली परेशानियां दूर होती हैं तथा पितरों का आशीर्वाद मिलता है। देव ऋण, ऋषि ऋण तथा पितृ ऋण का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है और पितृ पक्ष में माता-पिता के प्रति तर्पण करके श्रद्धा व्यक्त की जाती है क्योंकि पितृ ऋण से मुक्त हुए बिना जीवन निरर्थक माना जाता है। सनातन धर्म के अनुसार देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से मुक्ति पाए बिना व्यक्ति का पूर्ण कल्याण होना असंभव है। ऋषि ऋण से स्वाध्याय के जरिये, देवऋण से यज्ञ के जरिये और पितृ ऋण से श्राद्ध तथा तर्पण द्वारा मुक्ति प्राप्त हो सकती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितरों से संबंधित कार्य करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। महर्षि वेद व्यास के अनुसार जो व्यक्ति श्राद्ध द्वारा अपने पितरों को संतुष्ट करता है, वह पितृ ऋण से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है।


मत्स्य पुराण में नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य, इन तीन प्रकार के श्राद्ध का उल्लेख मिलता है जबकि यमस्मृति में नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पार्वण नामक पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है। भविष्य पुराण और विश्वामित्र स्मृति के अन्तर्गत बारह प्रकार के श्राद्धों का वर्णन हैं, जिनमें नित्य, नैमित्तिक, काम्यम, वृद्धि, सपिण्ड, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धयर्थ, कर्मांग, दैविक, यात्रार्थ और पुष्ट्यर्थ शामिल हैं। भविष्यपुराण के अनुसार प्रतिदिन किए जाने वाले श्राद्ध को ‘नित्य श्राद्ध’, वार्षिक तिथि पर किए जाने वाले श्राद्ध को ‘नैमित्तिक श्राद्ध’, किसी कामना के लिए किए जाने वाले श्राद्ध को ‘काम्य श्राद्ध’, किसी मांगलिक अवसर पर किए जाने वाले श्राद्ध को ‘वृद्धि श्राद्ध’, पितृपक्ष, अमावस्या एवं तिथि आदि पर किए जाने वाले श्राद्ध को ‘पार्वण श्राद्ध’, त्रिवार्षिक श्राद्ध, जिसमें प्रेतपिण्ड का पितृपिण्ड में सम्मिलन कराया जाता है, उसे ‘सपिण्ड श्राद्ध’, पारिवारिक या स्वजातीय समूह में किए जाने वाले श्राद्ध को ‘गोष्ठी श्राद्ध’, शुद्धि हेतु किए जाने वाले श्राद्ध को ‘शुद्धयर्थ श्राद्ध’, षोडष संस्कारों के निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध को ‘कर्मांग श्राद्ध’, देवताओं के निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध को ‘दैविक श्राद्ध’, तीर्थ स्थानों में किए जाने वाले श्राद्ध को ‘यात्रार्थ श्राद्ध’ तथा अपनी या पारिवारिक सुख-समृद्धि और उन्नति के लिए किए जाने वाले श्राद्ध को ‘पुष्ट्यर्थ श्राद्ध’ कहा गया है।


महर्षि जाबालि के अनुसार अपने पितरों का श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को पुत्र, आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य और इच्छित फल की प्राप्ति होती है। श्राद्ध पक्ष के दौरान दिन में सोना, असत्य भाषण, रति क्रिया, सिर और शरीर पर तेल, साबुन, इत्र आदि लगाना, मदिरापान करना, लड़ाई-झगड़ा, वाद-विवाद, अनैतिक कृत्य तथा किसी भी जीवधारी को कष्ट पहुंचाना निषेध माना गया है। पितृपक्ष को लक्ष्मी और ज्ञान की साधना के लिए उत्तम काल माना गया है। पितरों के निमित्त आयोजित किए जाने वाले पितृ पक्ष को आत्मबोध के लिए भी अति उत्तम तथा जीवन के संघर्ष को उत्कर्ष में परिवर्तित करने का समय माना गया है। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार श्रद्धा से किया गया श्राद्ध पूर्वजों तक पहुंचे या न पहुंचे लेकिन यह जीवन में उन्नति और प्रगति के द्वार अवश्य खोल सकता है।




-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)



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असमानता का आधार बनी डिजिटल शिक्षा

यह अच्छी बात है कि देश में विद्यालय खुलने शुरू हो गए हैं और भौतिक रूप से छात्रों की उपस्थिति बढ़ने लगी है। यदि अक्टूबर में कोरोना की तीसरी लहर का प्रकोप नहीं आता है तो सभी शालेय कक्षाएं सामान्य रूप में चलने लगेंगी। इससे अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी और निजी विद्यालयों के बेरोजगारी का दंश झेल रहे शिक्षक भी रोजगार से लग जाएंगे। हालांकि देश में ऑनलाइन पढ़ाई का सिलसिला चल रहा था, लेकिन इसका लाभ आर्थिक रूप से संपन्न अभिभावकों के बच्चे ही उठा पा रहे थे। इस डिजिटल बंटवारे के परिणामस्वरूप ऑनलाइन शिक्षा असमानता का कारण तो बनी ही, जो छात्र ऑनलाइन शिक्षा ले रहे थे, उनमें सीखने की क्षमता भी घट गई। यह हकीकत यूनीसेफ और कुछ स्वयंसेवी संगठन सर्वेक्षण से सामने आई है।


1400 घरों में किए सर्वे से खुलासा हुआ है कि शहरी क्षेत्रों में नियमित ऑनलाइन पढ़ाई करने वाले छात्र महज 24 फीसदी हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या घटकर मात्र 8 फीसदी रह गई है। केवल तीन चौथाई शहरी छात्रों और 50 फीसदी ग्रामीण छात्रों के पास ही स्मार्ट मोबाइल फोन हैं। इंटरनेट कनेक्टविटी और रिचार्ज कराने के लिए पैसे का अभाव भी रहा। गोया, इस असमानता के चलते करोड़ों बच्चे शिक्षा में पिछड़ गए। इसकी भरपाई विद्यालय अतिरिक्त कक्षाएं लगाकर करें तो बेहतर होगा।


कोरोना महामारी के दौरान अधिकांश विद्यालयों में ऑनलाइन कक्षाएं चल रही हैं, परंतु इससे 80 प्रतिशत बच्चों में सीखने की क्षमता घट गई है। सबसे ज्यादा 4 से 18 साल के बच्चे व किशोर प्रभावित हुए हैं। बच्चों में नई चीजों को सीखने की जिज्ञासा और उत्साह भी कम हुआ है। जबकि यही उम्र सीखने और सीखे हुए को स्मृति में रखने की दृष्टि से सबसे ज्यादा उपयुक्त होती है। देश के छह राज्यों में यूनीसेफ ने इन कक्षाओं पर सर्वे किया है। इस रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि पांच से 13 वर्ष आयु समूह के छात्रों के 73 फीसदी माता-पिता, 14 से 18 वर्ष के 80 फीसदी किशोरों के माता-पिता और 67 प्रतिशत शिक्षकों का कहना है कि बच्चे विद्यालय जाने की तुलना में कम सीख रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार 8 प्रतिशत शिक्षकों के पास स्मार्टफोन या लैपटॉप नहीं हैं और 33 प्रतिशत शिक्षकों का कहना है कि इन आभासी कक्षाओं से विद्यार्थियों को कोई फायदा नहीं है। इन कक्षाओं में 30 से 40 फीसदी शहरी छात्र शिक्षकों के संपर्क में ही नहीं आए। ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति और बदतर रही।


ऑनलाइन यानी, डिजिटल शिक्षा का हश्र सिर मुड़ाते ओले पड़ने की शक्ल में दिखाई देने लगा है। लॉकडाउन के बीच शुरू हुई ऑनलाइन पढ़ाई का चलन स्कूली बच्चों पर भारी पड़ रहा है। नतीजतन उन्हें कई-कई घंटे कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल उपकरणों पर आंखें गड़ानी पड़ती और दिमाग पर ज्यादा जोर डालना पड़ रहा है। इससे विद्यार्थी अनावश्यक रूप से एकांगी और चिंतित दिखाई देने लगे हैं। अपने बच्चों में अचानक आए इन लक्षणों की बड़ी संख्या में शिकायत अभिभावकों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय और केंद्रीय विद्यालय संगठन से भी की हैं।


बिना विचार किए डिजिटल माध्यम से विवश किए बच्चों को इस मानसिक तनाव से उबारने के लिए अब मंत्रालय ने इस परिप्रेक्ष्य में मानक क्रियाशील प्रक्रिया (स्टेंडर्ड ऑपरेटिव प्रोसीजर) अपनाने का निर्णय लिया है। संक्षिप्त में एसओपी नाम से जाने, जाने वाले इस मंत्र का इस्तेमाल कंपनियों में विफलता को कम करते हुए दक्षता, गुणवत्ता, प्रदर्शन और उत्पादन में वृद्धि व एकरूपता लाने के लिए किया जाता है। अब पहली बात तो यह कि बच्चों का मस्तिष्क कोई कारखाने की भट्टी नहीं है कि आप संख्या में वस्तु का उत्पादन बढ़ाने का काम कर रहे हों ? जबकि विवेकानंद ने शिक्षा को जीवन के विकास का मंत्र बताते हुए कहा था कि मात्र सूचना प्राप्त करना, पुस्तकों से सीखना या इच्छाओं पर बलपूर्वक रोक लगाकर यांत्रिक बना देना शिक्षा नहीं है। शिक्षा वह है, जो मनुष्य को साहसी और चरित्रवान बनाती है।


देश में शिक्षा और शिक्षण पद्धति को लेकर एक विचित्र विरोधाभास और दुविधा की स्थिति बनी हुई है। एक आदर्श और गुणकारी शिक्षा व्यवस्था में कौन से तत्व शामिल होने चाहिए इस संदर्भ में पिछले 74 साल में भी कोई एक निश्चित धारणा नहीं बन पाई है। फलतः इस अनिश्चितता का दंड हर नई पीढ़ी भोगती है। ऑनलाइन शिक्षा वर्तमान पीढ़ी को दंड के रूप में मानसिक प्रताड़ना झेलने का सबब बन रही है।


मानव संसाधन मंत्रालय को अभिभावकों को जो थोक में शिकायतें मिली हैं, उनमें कहा है कि 'बच्चों को विद्यालयों की ओर से घंटों ऑनलाइल पढ़ाया जा रहा है। होमवर्क भी उसी अनुपात में दिया जा रहा है। परिणामस्वरूप बच्चे दिन-दिन भर कंप्युटर, लैपटॉप और मोबाइल से चिपके रहते हैं। इस अनावश्यक व्यस्तता के चलते उनका व्यवहार बदल रहा है। सीखने की क्षमता घट गई है और उनमें चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। वे हठी और गुस्सैल भी हो रहे हैं। मानसिक बोझिलता से जुड़ा यह एकांगीपन निकट भविष्य में उनके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। वे मानसिक अवसाद में आकर उल्टा-सीधा या कोई भयानक कदम उठा सकते हैं। कई बच्चे अश्लील कहानी पढ़ते, सुनते या देखते भी अभिभावकों ने पकड़े हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब दिल्ली में 27 किशोर-किशोरी मित्र छात्र-छात्राएं इंस्टाग्राम पर समूह बनाकर पोर्न फिल्में देखते हुए अपनी सहपाठी छात्राओं से दुष्कर्म की षड्यंत्रकारी योजना बनाते हुए पकड़े गए थे। शायद ऐसे ही मामलों की निगाह में उच्च न्यायालय, दिल्ली के न्यायाधीश डीएन पटेल और हरिशंकर ने कहा है कि ऑनलाइन शिक्षा कोई बच्चों का खेल नहीं है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट ने भी कमोबेश यही जताया गया है।


दरअसल शैक्षणिक उपकरण कंप्युटर, लैपटॉप और मोबाइल निर्माता व इंटरनेट प्रदाता कंपनियां कोरोना विपत्ति काल को व्यापारिक लाभ की दृष्टि से देख रही हैं। इसलिए प्रसार-प्रचार माध्यमों के जरिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि शालेय और उच्च शिक्षा के अध्ययन-अध्यापन में कोरोना के चलते जो खलल पड़ा है, उसकी भरपाई तकनीकी माध्यमों से आसानी से की जा सकती है ? इस लिहाज से यह नारा भी गढ़ लिया कि 'धीरे-धीरे चलो स्कूल से, पढ़ो ऑनलाइन से।' हालांकि कंपनियों ने इस दिशा में पहल बहुत पहले से ही कर दी है। नतीजतन कई ऑनलाइन प्रारूपों में ई-लर्निंग सामग्री बाजार में उपलब्ध है। वह भारत ही है, जिसमें सबसे विशाल 'के-12 शिक्षा पद्धति एक दशक के पहले विकसित कर ली है।' इसे किंगर गार्डन और 12 वर्षीय बेसिक शिक्षा के नाम से जाना जाता है। यह सामग्री सीडी, एप और सीबीएसई पाठयक्रम की बेवसाइटों पर उपलब्ध है। लेकिन अभी इसका प्रयोग सीमित है। लेकिन इसका कोई खास लाभ नहीं हुआ है। दरअसल ऑफलाइन शिक्षा पद्धति में विद्यार्थी की बुद्धि की परख का परीक्षा का जो तरीका इसमें है, वही इस के-12 शिक्षा प्रणाली में है। महज पुस्तकों के पाठ्यक्रमों को डिजिटल प्रारूप में बदल दिया है। इसलिए यह प्रणाली भी विद्यार्थी के मनोविज्ञान व मन:स्थिति को समझने में सक्षम नहीं है। दरअसल, प्रत्येक विद्यार्थी की बौद्धिक क्षमता और रुचियां भिन्न-भिन्न होती हैं, इसलिए पढ़ाई का एक पाठ्यक्रम और एक जैसा तरीका हरेक छात्र पर कारगर साबित नहीं होता।


दरअसल भारत में ही नहीं दुनिया में छात्र को पूर्व से सुनिश्चित कर दिए गए अध्ययन-अध्यापन तक ही सीमित रखा जाता है। आज का शिक्षक हो या फिर प्राध्यापक वह भी विविधतापूर्ण अध्ययनशीलता से दूर है। इसलिए शिक्षक और छात्र निर्धारित शिक्षा से आगे की बात सोच ही नहीं पाते। कमोबेश यही मानसिकता अभिभावकों की है। वे भी अपनी संतान को चिकित्सा, अभियंता, सरकारी अधिकारी, कर्मचारी या फिर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी पा लेने का लक्ष्य निर्धारित कर देते हैं। जबकि देश के लिए किसान, सैनिक, लेखक-पत्रकार और आदर्श मूल्यों के प्रवचनकर्ता भी सामाजिक ताने-बाने के लिए आवश्यक होते हैं। करीब सात दशक बीतने के बाद यह वास्तविकता एक बार फिर से मुखर होकर स्थापित हुई है कि कोरोना संकट काल में अर्थव्यवस्था को आधार केवल खेती-किसानी के बूते मिला हुआ है। जबकि बीते 70 सालों में सबसे ज्यादा तिरस्कार व अवमूल्यन इसी व्यवसाय का हुआ है। आज अपने बालक को अन्नदाता बनाने की बात शिक्षक और अभिभावक में से कोई नहीं करता।


शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन द्वार खोलने की बड़ी तैयारी है। लेकिन न तो इसकी विषमताओं को समझने की कोशिश हो रही है और न ही यह कोशिश हो रही है कि इस माध्यम से स्थापित कर दी गईं संकीर्ण शिक्षा की दीवारें टूटना संभव है ? गुरु से दूर एक कोने में मोबाइन स्क्रीन के सामने बैठे शिष्य के मन-मस्तिष्क में क्या है ? यह जब ठीक से आज का शिक्षक नहीं समझ पा रहा तो तकनीक कैसे समझेगी ? क्योंकि तकनीकी शिक्षा में न तो मौलिकता है और न ही पहले से ही लोड कर दिए पाठों से इतर या आगे जाने की क्षमता ? गोया, कृत्रिम तरीके से दी गई शिक्षा, नैसर्गिक या जिज्ञासु प्रतिभा का स्थान ले पाएगी ? या फिर नैसर्गिक शिक्षा को कुंठित करने का काम करेगी ? दरअसल किसी उपकरण में भर दिए गए ज्ञान की एक सीमा होती है और वह तय कर दिए गए प्रोग्रामिंग के अनुसार चलती है। उसमें कोई लचीलापन नहीं होता। जबकि विद्यार्थी की बुद्धि के विकास का क्रम कोई एक सीधी रेखा में नहीं चलता। ज्ञान नदी की धारा की तरह प्रवाहमान है। उसमें नए-नए रूप लेते हुए, जीवन-मूल्यों को देखते हुए, वैचारिक बदलाव आता है। नई सोच विकसित होती है। यह बदलाव प्रतिभा के नैसर्गिक विकास का मूल आधार है, क्योंकि किसी उपकरण में सोच या विचार पनपाने की उर्वरा शक्ति नहीं होती है।


उपरोक्त कथन के सत्यापन के लिए दुनिया के अत्यंत सफल और आविष्कारक व्यक्ति बिल गेट्स की जीवनी पर दृष्टि डालते हैं। हम सब जानते हैं कि आज बिल गेट्स दुनिया के अमीर लोगों में से एक हैं। बिल गेट्स ने उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज में प्रवेश तो लिया था, लेकिन शिक्षा पूरी नहीं कर पाए थे। वे कॉलेज से आकर अपने घर के गैरेज में घुस जाते थे और कोरे कागजों पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचकर किसी दार्शनिक के लहजे में धीर-गंभीर वैचारिक तल्लीनता में खो जाते थे। उनकी परेशान मां कभी स्कूल के कपड़े बदलने को आवाज लगातीं, तो कभी भोजन के लिए पुकारतीं। लेकिन धुनि बिल अपनी ही धुन में रमा रहता। अंत में गैरेज की दहलीज पर आकर डपटते हुए पूछतीं, 'आखिर तू कर क्या रहा है ?' बिल कहता, सोच रहा हूं मां।' वात्सल्मयी मां सहम गईं। अनुभव किया, बेटा अवसाद में आ रहा है, कहीं पगला न जाए ? सो, मनोचिकित्सक को दिखाया। लेकिन अस्वस्थ होता, तब न कोई बीमारी निकलती ?


बहरहाल, मां हार गई और बेटा आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने में लगा रहा। इस गैरेज में कंप्यूटर नहीं था, लेकिन जिज्ञासा थी, सोच थी। आखिरकार बिल की सोच ने आकार लिया और कंप्यूटर की बुद्धि अर्थात सॉफ्टवेयर का आविष्कार कर डाला। मतलब वास्तविक बुद्धि ने कृत्रिम बुद्धि की सजीव रचना कर दी। लेकिन हम हैं कि ऑनलाइन शिक्षा के बहाने नैसर्गिक बुद्धि पर अंकुश लगाने के उपाय तलाश रहे हैं ? डिजिटल शिक्षा से जुड़ा यह एक बड़ा प्रश्न है, जो विचारनीय है।



-प्रमोद भार्गव-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)






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हाईवे पर एयर फोर्स का रनवे

हाल ही में बाड़मेर में हाईवे पर एयरफोर्स के रनवे का रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी ने उद्घाटन किया है। पाकिस्तान की सीमा से सिर्फ 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नेशनल हाईवे 925 ए पर उतरते भारतीय लड़ाकू विमान देखकर पाकिस्तान का कलेजा कांप गया होगा, क्योंकि जब हाईवे ही रनवे का काम करते हैं तो निश्चित ही दुश्मन थर्राते हैं। हाईवे वाले रनवे पर उतरे सुपर हरक्यूलिस विमान में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी सवार थे। जालोर की हाईवे वाली इस हवाई पट्टी की कई विशेषताएं हैं और भारत के लिए इसका खास महत्व है। ये हवाई पट्टी भारत पाकिस्तान बॉर्डर के नजदीक है। इसे इमरजेंसी ऑपरेशन में इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत के पश्चिमी सेक्टर में ये सेना के लिए एक बड़ा रणनीतिक बूस्टर है। युद्ध की स्थिति में इसे बैकअप रनवे की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। फाइटर जेट्स को बहुत ही कम समय की नोटिस पर ऑपरेशन के लिए तैयार किया जा सकता है और दुश्मन पर स्ट्राइक करने के लिए भी ये बहुत मददगार है।


पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा से सिर्फ 40 किलोमीटर दूर ये सड़क जो भारतीय वायुसेना के लिए हवाई पट्टी बन गई है, इसने भारत की वायु शक्ति को नई धार दी है और पाकिस्तान को साफ संदेश दे दिया है। पहली बार कोई राष्ट्रीय राजमार्ग वायुसेना के विमानों की इमरजेंसी लैंडिंग के लिए खासतौर पर बनाया गया है। हाईवे वाली हवाई पट्टी पर लैंडिंग की शुभ शुरुआत भारत की वायु सेना के दमदार विमान सुखोई 30 एमके आई ने किया। इसके बाद वायुसेना के सी 130 जे सुपर हरक्यूलिस ने भी यहां टच डाउन किया। साथ ही वायुसेना के जगुआर जेट ने अपना दमखम दिखाते हुए जालोर के हाईवे पर दौड़ लगाई। भारतीय वायुसेना के लिए बना ये हाईवे भारत के लिए सरहद पर शक्ति पथ जैसा है।


वास्तव में ये इमरजेंसी लैंडिंग स्ट्रिप है। मेन ऑपरेशन तो रनवे से ही होगा, लेकिन जंग की स्थिति में कभी-कभी दुश्मन देश रनवे पर बम गिरा कर चले जाते हैं, तब तीन चार घंटे के लिए रनवे प्रयोग में नहीं लाया जा सकता, तो उस समय जो हवाई जहाज हवा में होते हैं, उन्हें उतारने के लिए ये इमरजेंसी लैंडिंग स्ट्रिप बनाई जा रही हैं। जालोर के हाईवे पर हवाई पट्टी की रणनीतिक अहमियत बहुत है। पाकिस्तान की सरहद से सिर्फ 40 किलोमीटर दूर होने की वजह से ये हाईवे संवेदनशील वेस्टर्न सेक्टर में भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाता है। युद्ध जैसी परिस्थितियों में ये हवाई पट्टी आपात इस्तेमाल और प्रभावी रनवे बैकअप का काम कर सकती है। यहां से वायुसेना के विमानों को तत्काल उपयोग में लाया जा सकता है और अचूक निशानों और विशेष उड़ानों में ये मददगार साबित हो सकती है।


वायुसेना के इमरजेंसी और रणनीतिक इस्तेमाल के लिए भारत का प्लान सिर्फ एक हाईवे वाली हवाई पट्टी बनाने भर का नहीं है। सरकार देश भर में 28 ऐसे हाईवेज़ तैयार कर रही है, जो वायुसेना के विमानों के लिए रनवे का काम कर सकेंगे। जालोर में बनी ये 3 किलोमीटर लंबी हवाई पट्टी एनएचएआई ने वायुसेना के साथ मिलकर 45 करोड़ रुपयों की लागत से तैयार की है। 2017 में लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे पर वायुसेना के मिराज 2000 विमान ने इमरजेंसी लैंडिंग का रिहर्सल किया था, इसी के बाद जालोर हाईवे जैसी सुविधा के निर्माण को लेकर राष्ट्रीय प्लान ने जोर पकड़ा।


इस हवाई पट्टी का उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सड़क परिवहन एवं राज्यमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने किया, लेकिन इसके एक दिन पहले भारतीय वायु सेना के कुछ लड़ाकू विमानों का हाईवे पर ट्रायल कराया गया, यही नहीं पाकिस्तान सीमा के करीब बनाई गई हाईवे पट्टी से उड़ान भरने के बाद इन लड़ाकू विमानों ने हवा में फ्लाईपास्ट भी किया। जिन लड़ाकू विमानों ने इस हाईवे पर लैंडिंग की उनमें सुखोई थर्टी एमकेआई और जगुआर शामिल रहे। देश की सुरक्षा के लिहाज से इस तरह की हवाई पट्टियां बेहद अहम हैं, खासतौर पर तब जब कि वो पाकिस्तान जैसे पड़ोसी की सीमा के इतने करीब हों। देश के किसी नेशनल हाईवे पर सेना के विमानों के उतरने का यह पहला मामला है, इससे पहले 2017 में यमुना एक्सप्रेस वे पर सेना के विमानों की लैंडिंग करवाई गई थी लेकिन पहली बात तो ये कि वो नेशनल हाईवे नहीं है, दूसरी बात वो किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास नहीं है और सबसे अहम बात ये कि वो एक ड्रिल थी, जिसका मकसद केवल ये देखना था कि नागरिकों के इस्तेमाल में आने वाले हाईवे भी इमरजेंसी के वक्त सेना के काम आ सकते हैं या नहीं।


अगर कभी भी युद्ध के बीच हालात बिगड़े तो ये हाईवे बहुत काम आने वाला होगा। इस नेशनल हाईवे 925 ए का करीब 4 किलोमीटर का एक हिस्सा पहले ही तय कर दिया गया कि ये एक इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड होगा। मतलब ये एक ऐसी हवाई पट्टी है, जिसका इस्तेमाल देश की सेना किसी इमरजेंसी के वक्त में कर पाएगी। सेना के लिए इमरजेंसी जंग या जंग जैसी स्थिति हो सकती है।


1971 की लड़ाई में 3 दिसंबर को सबसे पहले पाकिस्तान ने भारत के एयर बेसेज़ पर हमला किया था। कश्मीर में अवंतीपुरा से लेकर पूरे पंजाब के और राजस्थान के कई एयरबेसेज़ उत्तरलाई, जैसलमेर, जोधपुर बाड़मेर आदि पर हमले किए थे। ऐसी स्थिति में रनवे क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और फिर एयर ऑपरेशंस रुक जाते हैं, इसलिए हमेशा दूसरी जगहों यानी वैकल्पिक जगहों की व्यवस्था की जाती है, जहां से एयर ऑपरेशंस को जारी रखा जा सके। यही इनका सबसे बड़ा सामरिक महत्व होता है।


फाइटर एयरक्राफ्ट तो बहुत छोटे होते हैं लेकिन ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट को उतरने के लिए बड़ी जगह की जरूरत होती है। इस 5 किलोमीटर के स्ट्रेच व साढ़े 3 किलोमीटर के लैंडिंग स्पेस में ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट्स भी उतारे जा सकते हैं और फाइटर जेट्स भी। फाइटर जेट्स हमेशा हमला करने की सबसे पहली चीज होते हैं, वहीं ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट्स के जरिए अपनी सेनाओं को सपोर्ट किया जाता है, अपनी सेनाओं को सप्लाई पहुंचाई जाती है और उनको लड़ाई के लिए तैयार किया जाता है।


रनवे रिपेयर होने तक वायु सेना बिल्कुल विवश हो जाती है, ऐसा कभी भी किसी भी देश के साथ जंग के दौरान हो सकता है। इसलिए इस तरह के इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड बनाए जाते हैं, जो आम नागरिकों की इस्तेमाल की सड़कों पर होते हैं, ऐसा इसलिए ताकि जंग के दौरान जब सेना के ठिकानों पर हमले हों तो आम नागरिकों के इस्तेमाल की सड़कों का इस्तेमाल सेना कर पाए और दुश्मन को माकूल जवाब दे पाए, जंग के दौरान भी आम नागरिकों पर हमले की इजाजत अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं देता।


इस इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड को सिर्फ 19 महीने में तैयार किया गया है। इस हाईवे पर इतनी जगह और इस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है कि जरूरत पड़े तो यहां पर विमान लैंड भी कर सकते हैं, उनकी रिफ्यूलिंग हो सकती है और कंट्रोल करने के लिए एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर भी यहां मौजूद है। रनवे पर कभी सुखोई की दहाड़ सुनाई देती थी, कभी जगुआर की आवाज से धरती कांपती थी, कभी हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट होने लगती थी तो कभी हिंदुस्तान का महा विध्वंसक फाइटर मंडराने लगता था। पाकिस्तान की सीमा के बेहद करीब राजस्थान के जिस इलाके में शांति रहती है, वहां भारतीय वायु वीर अपने विमानों के साथ आसमान में चक्कर काट रहे थे। बॉर्डर के उस पार पाकिस्तान के रडार खतरे का सिग्नल दे दे रहे थे। इस्लामाबाद से रावलपिंडी तक खलबली मची थी।आसमान में उड़ रहे विमानों ने लैंडिंग शुरू की तो पाकिस्तान हैरान रह गया क्योंकि विमान जहां उतरे थे, उसकी लोकेशन के बारे में पाकिस्तान की किसी एजेंसी को भनक तक नहीं थी। भारतीय वायुसेना के विमान जिस एयरस्ट्रिप पर उतर रहे थे, वो न तो भारत का कोई एयरबेस है, न ही कोई हवाई अड्डा। राजस्थान के बाड़मेर में विमानों की लैंडिंग एक हाईवे पर कराई गई थी। बॉर्डर के इस पार हर विमान की लैंडिंग के साथ तालियां बज रही थीं तो वहीं बॉर्डर के उस पार इस्लामाबाद से रावलपिंडी तक हिंदुस्तान की ये कामयाबी तनाव का सबब थी। इमरान खान और बाजवा भारत की शक्ति और उपलब्धि का सीधा प्रसारण देख रहे थे। पाकिस्तान को लग रहा था कि भारत के फाइटर विमान सिर्फ टचडाउन लैंडिंग करेंगे, लेकिन जब हवा को चीरते हुए हर्कुलस सी-17 ने लैंडिंग की तो पाकिस्तान को एहसास हो गया कि भारत में सिर्फ हाईवे ही नहीं बल्कि पाकिस्तान के करीब एयरबेस जैसा रनवे बना दिया गया है।


साल 2015 में दिल्ली-आगरा यमुना एक्सप्रेसवे पर मथुरा के करीब मिराज-2000 की लैंडिंग हुई थी। इसके बाद आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर 2016 में मिराज और सुखोई फाइटर जेट्स ने लैंडिंग की थी, लेकिन अब पहली बार मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की लैंडिंग कराई गई है। देश के अलग-अलग हिस्सों में 12 हाईवे पर एयर स्ट्रिप बनाने की योजना है। हिंदुस्तान की तैयारी पाकिस्तान के साथ ही चीन के मोर्चे पर भी है। अब अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद पाकिस्तान आतंक को नए सिरे से एक्टिव करने का प्लान बना रहा है। चीन ने कुछ दिन पहले ही भारत से लगने वाली सीमा के लिए कमांडर बदला था, अब पाकिस्तान ने भी यही किया है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान और चीन तालिबान को भारत के खिलाफ भड़का सकते हैं, इससे बॉर्डर और एलओसी पर तनाव बढ़ना तय है। यही वजह है कि चीन और पाकिस्तान कमांडर बदलकर पहले से तैयारी कर रहे हैं।


सुखोई और जगुआर की गर्जना सुनकर यकीनन देश के दुश्मनों के दिल दहल गए होंगे। ये देश के इतिहास का सबसे गौरवशाली दृश्य था, ये हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देने वाला लम्हा था, ये भारतीय वायुसेना के दमखम व देश के हाईवे की सबसे जानदार तस्वीर थी। जिस हाईवे पर लोग हवा से बातें करते अपनी गाड़ियां दौड़ाते हैं, उस हाईवे को भारतीय वायु सेना के सुखोई और जगुआर विमानों ने चूमकर सबको अभिभूत कर दिया।


-रंजना मिश्रा-

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)



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क्या किसान आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ”वोट की चोट“ कर पायेंगे?

एक किसान परिवार से संबंध होने के नाते मैंने 70 के दशक से उत्तर भारत के किसान आन्दोलनों और किसान राजनीति को बहुत करीब से देखने और समझने की कोशिश की है। इस दौरान चौधरी चरण सिंह और चौधरी देवीलाल जैसे बड़े नेता होते थे जो किसान राजनीति करते थे। 80 के दशक में चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत बड़े किसान नेता थे। उनके नेतृत्व में वर्ष 1987 में दिल्ली के वोट क्लब पर किसानों व्दारा दिया गया धरना आज तक चर्चा में रहता है। तत्समयचौधरी चरण सिंह और चौधरी देवीलाल जैसे बड़े राजनेताओं के कारण संसद के अंदर और चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत जैसे किसान नेताओं के कारण संसद के बाहर किसान और किसानी हमेशा बड़ा मुद्दा होता था। उन दिनों खेती से जुड़ी जो भी किसान जातियां थी, उन जातियों के किसान अपनी जाति के रूप में नहीं अपितु किसान के नाम से अपनी पहचान बनाते थे।


90 के दशक से किसान राजनीति के हालात बदल गये। इस दौरान जैसे ही मण्डल और मंदिर की राजनीति परवान चढ़ी, त्यों ही किसान जाति और धर्म में बटकर किसान के रूप में अपनी सशक्त पहचान को खोते चले गये। भाजपा जैसी साम्प्रदायिक पार्टी ने जहां मंदिर के नाम पर धर्म का कार्ड खुलकर खेला वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय के नाम से बनी सपा, राजद, जदयू, बसपा जैसी पाटियों ने जातियों के नाम से राजनीति करने में कोई कोताही नही बरती। कुछ समय बाद भाजपा ने धर्म के साथ-साथ जातियों की भी महीन राजनीति प्रारम्भ कर दी। ऐसा होने से किसानों ने किसान के रूप में अपनी पहचान खो दी और धर्म और जाति के आधार पर बटते चले गये। पिछले एक दशक से भाजपा ने जातियों को लेकर बहुत महीन राजनीति की है। ऐसा होने से गैर यादव ज्यादातर किसान जातियां भाजपा के साथ हो हो गई जिससे सामाजिक न्याय के नाम से राजनीति करने वाली तमाम पार्टियां आज हाशिए पर आ गई हैं।


जैसा कि सर्वविदित है कि दिल्ली के 3 बॉर्डरों पर किसान विगत 9 माह से धरने पर बैठे हैं। किसानों की मांग है कि केन्द्र सरकार किसानों के हित के विरुद्ध लाये गये 3 कानूनों को रद्द करे जिन्हें किसान काले कानून कहते हैं। इसके साथ ही किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनन गारन्टी भी चाहते हैं। इन मांगों को लेकर लगभग 40 किसान संगठन विगत 9 माह से आन्दोंलनरत हैं। विगत कई माहों से वे जगह-जगह किसान महापंचायतें भी कर रहे हैं। अभी तक ज्यादातर किसान महापंचायत पंजाब, हरियाणा ओर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रही हैं। ऐसा नहीं है कि इन प्रदेशों के बाहर किसान महापंचायत नहीं हो रही हैं लेकिन वो इतनी प्रभावशाली नहीं रही जितनी इन 3 प्रदेशों में रही हैं। ये सभी पंचायते संयुक्त किसान मोर्चा के तत्वाधान में हुई हैं।इसी 5 सितम्बर को उत्तर प्रदेश के मुजफरनगर में एक बहुत बड़ी किसान महापंचायत हुई जिसमें किसान नेताओं के व्दारा 5-10 लाख किसानों के शामिल होने का दावा किया गया है। हालांकि मीडिया में किसानों की संख्या पर मतभेद है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि यह अभी तक की सबसे बड़ी किसान रैली हो सकती है। रैली में किसान नेताओं के व्दारा अपनी मांगों को मनवाने के लिए पुरजोर आवाज उठाने के साथ-साथ भाजपा पर ”वोट की चोट“ देने का भी आव्हान किया गया है। किसानों व्दारा ऐसी ही महापंचायतें उत्तर प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी करने की बात कही गई है। आगामी कुछ माह में प्रदेश के हर हिस्से में ऐसी अनेक महापंचायतें होने जा रही हैं। इन पंचायतों में भी ठीक-ठाक संख्या में किसानों के भाग लेने की उम्मीद है। यहां एक बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि क्या इन महापंचायतों में आने वाली भीड़ आगामी उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव में भाजपा के वोट पर भी प्रभावी चोट कर सकेगी? आज की तारीख में कहना मुश्किल है। भाजपा जिस तरह से जाति की महीन राजनीति करती है उससे तो यही लगता है कि जब विधान सभा चुनाव होंगे तो भाजपा अपने उम्मीदवारों की जातियों की गोटी इस तरह से फेंटेगी कि किसान एकता कायम नहीं रह सकेगी और किसान अपनी-अपनी जातियों में बटकर अपने जाति उम्मीदवारों को वोट डालेंगे। किसान आन्दोंलन में प्रमुख तौर से शामिल जाट जाति के उम्मीदवारों के सामने जाट समाज के अतिरिक्त अन्य जातियों को गोलबंद करेगी जैसा की उसने हरियाणा प्रदेश में किया है। कुछ प्रभावशाली जाट समाज के नेताओं को भी टिकट देकर भाजपा अपना मकसद हल करेगी।


गौरतलब है कि किसी भी आन्दोंलन के 3 चरण होते हैं। पहला गोलबंदी, दूसरा राजनैतिक प्रभाव और तीसरा इसे वोट में तब्दील करना। आज की तारीख में किसान नेता किसानों की गोलबंदी करने में तो सफल हो गये हैं लेकिन यह गोलबंदी राजनैतिक रूप से कितनी प्रभावी होगी और चुनाव के समय क्या यह वोट में तब्दील होगी, इसमें मुझे संदेह है। उत्तर प्रदेश का चुनाव अभी 5-6 माह दूर है। मुझे लगता है कि कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार गन्ना किसानों का बकाया भुगतान, जो लगभग 12 से 14 हजार करोड़ है, का अधिकतर भुगतान कर देगी। आगामी कुछ दिनों में ही गन्ने का रेट भी बढ़ाये जाने की सम्भावना है। अगर ऐसा होता है तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बहुसंख्यक गन्ना किसानों को भाजपा अपने पक्ष में करने में कमयाब हो सकती है। मुझे तो यह भी लगता है कि आगामी महापंचायतों में जुड़ने वाली भीड़ का आंकलन करने के बाद केन्द्र सरकार आन्दोंलनरत किसानोंकी मांगों का भी समाधान कर सकती है। अगर ऐसा हुआ तो किसान आन्दोंलन स्वयं समाप्त हो जायेगा और भाजपा अपना राजनैतिक मकसद हासिल कर लेगी। यहां यह भी गौरतलब है कि आज किसानों के बीच न तो चौधरी चरण सिंह और चौधरी देवीलाल जैसे कद्दावर नेता हैं और ना ही राकेश टिकैत अपने पिता महेन्द्र सिंह टिकैत जैसे वसूल वाले हैं। राकेश टिकैत की पूर्व में भाजपा नेताओं से नजदीकी जगजाहिर है। आज की किसान राजनीति कल चुनाव के पूर्व कौनसी करवट ले ले, इसका अंदाजा लगाना बहुत कठिन है। उम्मीद की जाना चाहिए कि किसान नेता चुनाव तक एकजुट रह कर भाजपा को उत्तर प्रदेश में ही नहीं अपितु अन्य प्रदेशों में भी हरायेंगे लेकिन मुझे लगता है कि चुनाव के समय भाजपा की ”नोट की चोट“ किसानों के ”वोट की चोट“पर भारी पड़ सकती है ! 


-आजाद सिंह डबास-





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कैप्टन की विदाई

कैप्टन अमरिंदर सिंह को पंजाब की कुर्सी छोडऩे के लिए मजबूर करना यकायक नहीं था। इसकी पटकथा तो एक साल पहले ही तैयार हो चुकी थी। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस हाईकमान की चुनौती बन चुके थे। वो जब कांग्रेस के प्रधान बने तो हाईकमान की नहीं सुनी। जब मुख्यमंत्री रहे तो पंजाब में संगठन को दरकिनार कर दिया। इसके बाद ही कांग्रेस हाईकमान ने हरीश रावत को इसका जरिया बनाया। रावत पंजाब आए और कैप्टन के सबसे बड़े मुखर विरोधी नवजोत सिद्धू को फिर सक्रिय राजनीति में लेकर आए। उनका पंजाब में कांग्रेस प्रधान बनाने का रास्ता तैयार किया। इसी वजह से कैप्टन को अपमानित होकर पंजाब के सीएम की कुर्सी छोडऩी पड़ी। 2017 में जब पंजाब में कांग्रेस सरकार बनी तो नवजोत सिद्धू स्थानीय निकाय मंत्री बनाए गए। सिद्धू ने जिस अंदाज में मंत्रालय चलाया, उसने कैप्टन के लिए मुश्किल खड़ी कर दी। नतीजा, कैप्टन ने कैबिनेट में बदलाव कर दिया। सिद्धू को स्थानीय निकाय से हटा बिजली मंत्री बना दिया। सिद्धू नाराज हो गए और सियासी वनवास पर चले गए। सिद्धू सिर्फ सोशल मीडिया पर ही एक्टिव रहे। कांग्रेस ने हरीश रावत को पंजाब का प्रभारी बनाया। वो पंजाब आए और कैप्टन के बाद पटियाला जाकर सिद्धू से मिले। वहां सिद्धू को संदेश मिल गया कि कैप्टन को निपटाने के लिए हाईकमान उनके साथ है। बाहर आकर उन्होंने सिद्धू को कांग्रेस का भविष्य बता दिया। इसके बाद सिद्धू तेजी से एक्टिव होते गए। उन्होंने नशा, बेअदबी, महंगी बिजली समझौते के मुद्दे पर कैप्टन को घेरना शुरू कर दिया। कांग्रेस हाईकमान कैप्टन की छुट्टी के मूड़ में था। जरूरत थी तो एक ऐसे कांग्रेसी की, जो कैप्टन के सियासी कद को टक्कर दे सके। इसके लिए सिद्धू बढिय़ा विकल्प मिल गए। हाईकमान ने सुनील जाखड़ की विदाई की तैयारी कर ली। अभी पंजाब प्रधान को लेकर मंथन जारी ही था कि रावत ने कह दिया कि सिद्धू अगले पंजाब प्रधान होंगे। कैप्टन के लिए यही बड़ा संकेत था लेकिन वो समझ नहीं पाए। कांग्रेस हाईकमान से स्पष्ट संदेश था तो सिद्धू ग्रुप ने बगावत शुरू कर दी। दो बार विधायक दिल्ली गए। कांग्रेस ने खडग़े कमेटी बना दी। कैप्टन की भी पेशी होती गई लेकिन वो अड़े रहे। इसके बाद बगावत हुई तो हाईकमान ने मंत्रियों पर कोई कार्रवाई नहीं की। कैप्टन इसे समझ न सके और इसके बाद गुपचुप लेटर निकलवा विधायक दल बैठक बुलाने को कह दिया गया। अंत में उन्हें अपमानजनक विदाई लेनी पड़ी। मुख्यमंत्री बनने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पंजाब में अपने हिसाब से काम किया। संगठन में रहे तो हाईकमान के आदेश नहीं सुने। कैप्टन अक्सर बॉर्डर स्टेट की वजह से राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा लेकर दिल्ली में पीएम नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह से मिलते रहे। कांग्रेस हाईकमान ने इसे फ्रेंडशिप माना। हाल ही में अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग के नवीनीकरण का राहुल गांधी ने कड़ा विरोध किया। इसके उलट कैप्टन अमरिंदर ने कहा कि सब कुछ ठीक बना है। ऐसा पहली बार नहीं है, राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भी कैप्टन हमेशा केंद्र के साथ रहे। 2017 के विधानसभा चुनाव में कैप्टन के नेतृत्व में कांग्रेस को 70 से ज्यादा सीटों पर जीत मिली। लिहाजा पार्टी सत्ता में आई। 2019 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कैप्टन की सिद्धू से अनबन हो गई और उसके बाद धीरे-धीरे सिद्धू ने कैप्टन से नाराज धड़े के साथ मिलकर अंतत: उनका इस्तीफा करवा ही दिया। विधानसभा चुनाव से 6 महीने पहले कैप्टन का सीएम पद से इस्तीफा देने से किसे कितना फायदा या नुकसान होगा, यह 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा।


-सिद्वार्थ शंकर-





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यूपी चुनाव और कसौटी पर हिंदुत्व मॉडल

देश की राजनीति की दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के लिए छह महीनों से भी कम समय बचा है। लेकिन अगले साल होने वाले इन चुनावों के नतीजे भाजपा और संघ की भी राजनैतिक दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के हिसाब से सबसे संवेदनशील इस राज्य के जनादेश के आधार पर इस बात का अनुमान आसानी से लगाया जा सकेगा कि भाजपा के कोर मतदाताओं को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रखर हिन्दुत्व ज्यादा पसंद आ रहा है या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपेक्षाकृत नरम हिन्दुत्व।


राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार से पहले भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों में घिरी कांग्रेस सरकार जनता की नजरों से बुरी तरह उतर चुकी थी। इसके अलावा हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा गढ़ने और साम्प्रदायिक हिंसा बिल जैसे प्रयासों के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज कांग्रेस से खासा नाराज था। इसके बाद 2013 के मुजफ्फर नगर दंगों के दौरान उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की पक्षपातपूर्ण कार्रवाइयों से हिन्दू समाज बुरी तरह आहत हुआ। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों से नाराजगी तथा नरेंद्र मोदी की हिन्दुत्ववादी छवि के कारण बहुसंख्यक हिन्दू मतदाता एक बार फिर ज्यादा मजबूती से भाजपा के खेमे में आ गए। नतीजतन देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकारें बन गईं।


लेकिन विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों के नतीजों से एक बात साफ दिख रही है कि मतदाताओं का जितना समर्थन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हासिल है उतना क्षेत्रीय नेतृत्व को नहीं। इसीलिए भाजपा को लोकसभा चुनाव में मिले वोट उसके व्यापक जनाधार वाले राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिले वोटों की तुलना में भी 10 से 20 प्रतिशत तक ज्यादा होते हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा को लोकसभा चुनाव के मुकाबले तकरीबन 12 प्रतिशत कम वोट मिले। उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों के आंकड़े बताते हैं कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में 41.3 प्रतिशत और 49.56 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली भाजपा 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में 39.67 प्रतिशत वोट हासिल कर सकी।


हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में भाजपा और संघ के मुख्य एजेण्डा से जुड़े मुद्दों को लेकर कदम नहीं बढ़ाया लेकिन पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पहली बार सीमा पार करके सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक करके देश की सामरिक नीतियों में बदलाव का स्पष्ट संदेश पाकिस्तान और दुनिया को दिया। इसके अलावा खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए उन्होंने कोई अनावश्यक अतिरिक्त प्रयास भी नहीं किए। इसीलिए नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पहले के मुकाबले बढ़ गई। लोकसभा चुनाव 2019 में पहले के मुकाबले ज्यादा सीटें जीत कर सत्ता में पहुंचे मोदी ने सरकार बनने के बाद चंद महीनों के भीतर ही धारा 370 को निष्प्रभावी करते हुए धारा 35ए को समाप्त कर दिया, धार्मिक प्रताड़ना का शिकार गैर मुस्लिमो को भारत की नागरिकता प्रदान करने के लिए नागरिकता संशोधन कानून बना दिया। कट्टरपंथियों और शरीयत की परवाह किए बिना मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के खिलाफ कानून बना दिया।


प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी की कार्यशैली में लोग स्पष्ट अन्तर महसूस कर रहे हैं। सीएए के खिलाफ होने वाले शाहीन बाग जैसे प्रदर्शन या किसान आंदोलन के नाम पर लाल किला पर अराजकता करने वालों के खिलाफ मोदी सरकार कार्रवाई से बचती रही और न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा करती रही जबकि योगी सरकार ने सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए आन्दोलनकारियों की सम्पत्ति तक कुर्क करवा दी। किसान नेता जुबानी जमा खर्च तो करते रहे लेकिन लखनऊ बॉर्डर पर दिल्ली बार्डर जैसी अराजकता फैलाने की हिम्मत नहीं जुटा सके।


योगी सरकार ने भारत माता को डायन कहने वाले आजम खां के पूरे परिवार को जेल में ठूंस दिया। योगी सरकार ने वैचारिक और राजनैतिक विरोधी हों या शत्रु उन्हें उनकी ही भाषा में जवाब दिया है। माफिया डॉन मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद और विकास दुबे जैसे लोगों पर बिना भेदभाव के कार्रवाई की गई। आलोचनाओं को दरकिनार कर इलाहाबाद, फैजाबाद के नाम बदलकर सनातन संस्कृति के अनुरूप प्रयागराज और अयोध्या कर दिया।


इस तरह इस बार के विधानसभा चुनाव में विरोधियों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने वाला प्रखर हिन्दुत्व होगा। यदि विधानसभा चुनावों में भाजपा लोकसभा चुनावों के मुकाबले अधिक मत हासिल कर लेती है या विधानसभा चुनावों के मुकाबले 10 प्रतिशत के अन्तर में उल्लेखनीय कमी कर लेती है तो पूरी संभावना है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की नीतियों में परिवर्तन होगा।



-विकास सक्सेना-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)





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पंजाब में जो हुआ तय था, आगे क्या होगा यह अनिश्चित है ?

पंजाब में लंबे समय से सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था। सच तो यह है कि काँग्रेस में ही कुछ भी ठीक दिख नहीं रहा है। कभी राजस्थान तो कभी छत्तीसगढ़ में दिखने वाले विरोध के स्वर धीमे भी नहीं पड़ते हैं कि पंजाब का उफान जब-तब सामने आ जाता है। आज तो एकाएक राजनीतिक विस्फोट-सा हो गया।


अभी पंजाब जरूर चर्चाओं में है लेकिन इस घटनाक्रम के पहले थोड़ा पीछे जाना होगा। मध्य प्रदेश की भी चर्चा जरूरी है। वहाँ भी हाथ आई सत्ता अंर्तकलह का शिकार गई। न केवल कमलनाथ सरकार के मंत्रियों ने साथ छोड़ा बल्कि कई वरिष्ठ विधायकों ने भी साथ छोड़ दिया था। 2 विधायकों के निधन से और बाकी में इस्तीफों से खाली कुल 28 सीटों पर 11 नवंबर 2019 को आए उपचुनावों के नतीजों में भाजपा ने 19 सीटों पर अपना कब्जा जमाया और काँग्रेस महज 9 सीट ही जीत बैकफुट पर आ गई। मप्र में सत्ता खो चुकी कांग्रेस ने कर्ज माफी के साथ राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए विधायकों की सौदेबाजी को मुख्य मुद्दा बनाया था जो काम नहीं आया। मध्य प्रदेश में फिर भाजपा काबिज हुई और शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री बने।


पंजाब की स्थिति थोड़ी अलग है। यहाँ पर भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का 20 साल पुराना गठबन्धन ठीक एक साल पहले 17 सितंबर 2020 को केन्द्रीय कृषि मंत्री हरसिमरत कौर बादल के इस्तीफे के बाद टूट गया। ऐसे में तमाम नए समीकरणों के कयास जरूर लगाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में पंजाब के हालिया हालातों पर लोगों के अपने-अपने अनुमान हैं। लेकिन काँग्रेस के दिग्गजों के ट्वीट वार को नजरअंदाज भी तो नहीं किया जा सकता। पंजाब काँग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ का ट्वीट जिसमें सभी तरह की दिक्कतें खत्म होने का भरोसा जताया गया है। साफ है पंजाब में काँग्रेस गुटों में बंटी हुई है। पंजाब को लेकर शशि थरूर का ट्वीट भी काफी कुछ कहता है।


अभी हालात कुछ भी हो लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में कांग्रेस ने पंजाब में कुल 117 सीटों में से 77 सीटों पर जीत हासिल कर सत्ता में 10 साल बाद वापसी की थी। पंजाब में कांग्रेस ने वापसी कर जो कामयाबी हासिल की उसमें अमरिंदर सिंह ही भाजपा के विजय रथ को रोकने वाले नेताओं में शुमार थे। लेकिन पंजाब काँग्रेस में सत्ता और संगठन दोनों में ही विरोध की चिंगारी सुलगती रही। कैप्टन के लाख न चाहने के बाद नवजोत सिंह सिध्दू का प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना राजनीति के नब्ज को टटोलने वालों के लिए कुछ और ही इशारा कर रहा था। जाहिर है चिंगारी अन्दर ही अन्दर ज्वाला बनती गई जिसको रोकने या बुझाने में काँग्रेस आलाकमान पूरी तरह विफल रहा और नतीजा आज के हालात के रूप में हैं।


पंजाब के आज के घटनाक्रम के बाद यह तो साफ समझ आ रहा है कि काँग्रेस में शीर्ष स्तर पर भी धड़ेबाजी साफ दिख रही है। सुनील जाखड़ का एक बयान राजनीतिक गलियारे में बेहद चर्चाओं में है जिसमें उनका कहना ‘पंजाब कांग्रेस में जटिल हो रही समस्या के बीच राहुल गांधी के रवैये की प्रशंसा करता हूं। आश्चर्यजनक रूप से पार्टी नेतृत्व की तरफ से लिए गए फैसले से पंजाब कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में जोश आया है और साथ ही अकाली दल को भी स्पष्ट संदेश गया है।'


साफ है पार्टी शुरू से ही बंटी हुई थी और ऐसा नहीं होता तो 10 जून 2019 का लिखा सिध्दू का इस्तीफा 14 जुलाई 2019 को ट्वीट क्यों किया जाता। 16 मार्च 2017 को कैप्टेन अमरिन्दर सिंह के मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद तीसरे क्रम पर शपथ लेने वाले सिध्दू महज दो बरस में इतने बगावती कैसे हो गए? जबकि वह तेरह साल तक भारतीय जनता पार्टी में रहने के बाद साल 2017 में ही काँग्रेस में आए थे। लेकिन बहुत ही जल्दी राजनीतिक वनवास जैसे हालातों का सामना करने लगे। एक बार तो यह भी लगने लगा था कि सिध्दू फिर उसी तिराहे पर खड़े दिख रहे हैं जहाँ से एक तरफ काँग्रेस, दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी और तीसरी ओर भाजपा थी। लेकिन यह सब कयास ही रह गए। इस बार बाजी सिध्दू के पक्ष में जाती दिख रही है। वह मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं यह तो वक्त बताएगा लेकिन उनके पक्ष में हाईकमान विशेषकर राहुल-प्रियंका के विश्वास पात्र होने का इनाम मिलते ही कैप्टन अमरिन्दर सिंह के भविष्य पर अनिश्चितता जरूर दिखने लगी थी जो आज सच साबित हुई।


इतना तो तय है कि सोनिया गाँधी से बात कर नाराजगी जताने के बाद अमरिन्दर सिंह चुप बैठने वालों में नहीं है। काँग्रेस आलाकमान के तमाम सुलह के प्रयासों के बाद भी सुलझ न पाना बताता है कि खुद काँग्रेस के अन्दर भी अभी काफी कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पंजाब में कल मुख्यमंत्री कौन होगा यह अहम नहीं है, अहम यह है कि संगठनात्मक तरीके से कौन कितना अनुशासित रह पाएगा। वैसे भी पंजाब की राजनीति की तासीर देश में अलग ही तरह की है। जिस तरह पहले सिध्दू और भाजपा का 13 साल पुराना साथ छूटा, फिर 20 साल पुराने शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का गठबन्धन टूटा और अब राजीव गाँधी के स्कूल के दौर से दोस्त रहे अमरिन्दर सिंह का काँग्रेस से दोबारा बगावत यह बताती है पंजाबी सियासत में उठापटक नई नहीं है।


41 साल के अपने राजनीतिक सफर में कैप्टन कई मुश्किल दौर से गुजर चुके हैं। कई पार्टी अध्यक्षों से कैप्टन का पंगा रहा है। इन सबके बाद भी पार्टी आलाकमान का कैप्टन पर ही विश्वास बना रहा जिसे उन्होंने 2002 और 2017 दिखाया भी। पंजाब काँग्रेस की धुरी माने जाने वाले कैप्टन 1980 में राजीव गाँधी के द्वारा काँग्रेस में लाए गए थे और उसी साल पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता। 1984 में मतभेदों के चलते उन्होंने केवल 4 साल में संसद और काँग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। 1985 में शिरोमणि अकाली दल में शामिल हुए, विधानसभा चुनाव जीते और सुरजीत सिंह बरनाला का सरकार में मंत्री बने। 1987 में बरनाला सरकार के आतंकवाद के दौर में बर्खास्त होने के बाद 1992 में वो फिर अलग हुए और अकाली दल (पंथिक) का गठन किया। 1998 में इसका काँग्रेस में विलय हुआ और पंजाब काँग्रेस की कमान सम्हाली। 2002 में काँग्रेस की फिर पंजाब में सत्ता वापसी हुई जो 2007 तक रही। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अमृतसर से भाजपा नेता अरुण जेटली को एक लाख से अधिक वोटों से हराया। इसके बाद कांग्रेस ने कैप्टन को लोकसभा में पार्टी के संसदीय दल का उपनेता नियुक्त किया, लेकिन अमरिंदर का मन पंजाब में ही रहा। अंततः आलाकमान ने 2017 में फिर उन्हीं पर दांव खेला और बाजी अपने पक्ष में कर ली।


माना जा रहा है कि दिल्ली में कैप्टन अमरिन्दर की कमजोर पैरवी के चलते उनका रसूख घटता गया। उनके मजबूती साथी और सोनिया गाँधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल और मोतीलाल वोरा के निधन के बाद से दिल्ली में उनकी लॉबिंग करने वाला कोई नहीं था। बस यहीं से पंजाब के नए चेहरों को एँट्री मिली। राजनीति में कब कौन-सा समीकरण बदल जाए कोई नहीं जानता। लेकिन काँग्रेस के हाथ पंजाब में मजबूत होंगे या कमजोर यह बड़ा, अबूझ और भविष्य की गर्त में छुपा सवाल है।


इस कड़े फैसले को गुजरात से जोड़कर देखना भी काँग्रेस के लिए भूल होगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है जो सोचना ही होगा कि पंजाब में काँग्रेस संगठन में बदलाव के साथ सत्ता में बदलाव जरूरी लगता है तो क्या पूरे देश में लोगों यह नहीं लगता होगा ? वाकई नए दौर में काँग्रेस को जोखिम भरे फैसले लेते देखना कितना फायदेमंद होगा यह नहीं पता पर इतना जरूर पता है कि 65 प्रतिशत आबादी वाली नई पीढ़ी नए चेहरों को पढ़ना, देखना, समझना जरूर चाहती है।


-ऋतुपर्ण दवे-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)







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घातक साबित होती डेंगू के प्रकोप की अनदेखी

उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र इत्यादि कई राज्य इस समय वायरल बुखार और डेंगू के कहर से जूझ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में तो रहस्यमयी मानी जा रही बीमारी के अधिकांश मामलों में बहुत से मरीजों में डेंगू की पुष्टि भी हुई है। डेंगू और वायरल बुखार से विभिन्न राज्यों में सैंकड़ों मरीजों की मौत हो चुकी है। देश में प्रायः मानसून के समय जुलाई से अक्तूबर के दौरान डेंगू के सर्वाधिक मामले सामने आते हैं। दरअसल मानसून के साथ डेंगू और चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छरों के पनपने का मौसम भी शुरू होता है, इसीलिए इस बीमारी को लेकर लोगों में व्यापक जागरूकता की जरूरत महसूस की जाती रही है लेकिन इस मामले में सरकारी तंत्र का हर साल बेहद लचर रवैया सामने आता रहा है, जिस कारण देखते ही देखते डेंगू का प्रकोप कई राज्यों को अपनी चपेट में ले लेता है। डेंगू प्रतिवर्ष खासकर बारिश के मौसम में लोगों को निशाना बनाता है और पिछले साल भी इसके कारण सैंकड़ों लोगों की मौत हुई थी। देश के अनेक राज्यों में अब हर साल इसी प्रकार डेंगू का कहर देखा जाने लगा है, हजारों लोग डेंगू से पीडि़त होकर अस्पतालों में भर्ती होते हैं, जिनमें से कई दर्जन लोग मौत के मुंह में भी समा जाते हैं। दरअसल डेंगू आज के समय में ऐसी बीमारी बन गया है, जिसके कारण प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो जाती है। यह घातक बीमारियों में से एक है, जिसका यदि समय से इलाज न मिले तो यह जानलेवा हो सकता है।


डेंगू के कई राज्यों में बढ़ते मामलों को देखते हुए मौजूदा समय में डेंगू से बचाव को लेकर अत्यधिक सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि कोविड काल में डेंगू सहित अन्य बीमारियों के जोखिम को नजरअंदाज करना काफी खतरनाक हो सकता है। डेंगू का प्रकोप अब पहले के मुकाबले और भी भयावह इसलिए होता जा रहा है क्योंकि अब डेंगू के कई ऐसे मरीज भी देखे जाने लगे हैं, जिनमें डेंगू के अलावा मलेरिया या अन्य बीमारियों के भी लक्षण होते हैं और इन बीमारियों के एक साथ धावा बोलने से कुछ मामलों में स्थिति खतरनाक हो जाती है। डेंगू बुखार हमारे घरों के आसपास खड़े पानी में ही पनपने वाले ऐडीस मच्छर के काटने से होने वाला एक वायरल संक्रमण ही है। ऐडीस मच्छर काले रंग का स्पॉटेड मच्छर होता है, जो प्रायः दिन में ही काटता है। डेंगू का वायरस शरीर में प्रविष्ट होने के बाद सीधे शरीर के प्रतिरोधी तंत्र पर हमला करता है। इस मच्छर का सफाया करके ही इस बीमारी से पूरी तरह से बचा जा सकता है। वैसे बीमारी कोई भी हो, उसके उपचार से बेहतर उससे बचाव ही होता है और डेंगू के मामले में तो बचाव ही सबसे बड़ा हथियार माना गया है।


डेंगू प्रायः दो से पांच दिनों के भीतर गंभीर रूप धारण कर लेता है। ऐसी स्थिति में प्रभावित व्यक्ति को बुखार आना बंद हो सकता है और रोगी समझने लगता है कि वह ठीक हो गया है लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है बल्कि यह स्थिति और भी खतरनाक होती है। अतः बेहद जरूरी है कि आपको पता हो कि डेंगू बुखार होने पर शरीर में क्या-क्या प्रमुख लक्षण उभरते हैं। डेंगू के अधिकांश लक्षण मलेरिया से मिलते-जुलते होते हैं लेकिन कुछ लक्षण अलग भी होते हैं। तेज बुखार, गले में खराश, ठंड लगना, बहुत तेज सिरदर्द, थकावट, कमर व आंखों की पुतलियों में दर्द, मसूडों, नाक, गुदा व मूत्र नलिका से खून आना, मितली व उल्टी आना, मांसपेशियों व जोड़ों में असहनीय दर्द, हीमोग्लोबिन के स्तर में वृद्धि, शरीर पर लाल चकते (खासकर छाती पर लाल-लाल दाने उभर आना), रक्त प्लेटलेट (बिम्बाणुओं) की संख्या में भारी गिरावट इत्यादि डेंगू के प्रमुख लक्षण हैं।


डेंगू से बचाव के लिए लोगों का इसके बारे में जागरूक होना बेहद जरूरी है क्योंकि उचित सावधानियां और सतर्कता बरतकर ही इस जानलेवा बीमारी से बचा जा सकता है। घर की साफ-सफाई का ध्यान रखा जाना बहुत जरूरी है। घर या आसपास के क्षेत्र में डेंगू का प्रकोप न हो, इसके लिए जरूरी है कि मच्छरों के उन्मूलन का विशेष प्रयास हो। डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का पनपना रोकें। कुछ अन्य जरूरी बातों पर ध्यान देना भी आवश्यक है। जैसे, अपने घर में या आसपास पानी जमा न होने दें। जमा पानी के ऐसे स्रोत ही डेंगू मच्छरों की उत्पत्ति के प्रमुख कारक होते हैं। यदि कहीं पानी इकट्ठा हो तो उसमें केरोसीन ऑयल या पैट्रोल डाल दें ताकि वहां मच्छरों का सफाया हो जाए। पानी के बर्तनों, टंकियों इत्यादि को अच्छी प्रकार से ढ़ककर रखें। कूलर में पानी बदलते रहें। यदि कूलर में कुछ दिनों के लिए पानी का इस्तेमाल न कर रहे हों तो इसका पानी निकालकर कपड़े से अच्छी तरह पोंछकर कूलर को सुखा दें। खाली बर्तन, खाली डिब्बे, टायर, गमले, मटके, बोतल इत्यादि में पानी एकत्रित न होने दें। बेहतर यही होगा कि ऐसे कबाड़ और इस्तेमाल न होने वाले टायर इत्यादि को नष्ट कर दें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि कहीं भी पानी जमा होकर सड़ न रहा हो। घर के दरवाजों, खिड़कियों तथा रोशनदानों पर जाली लगवाएं ताकि घर में मच्छरों का प्रवेश बाधित किया जा सके। पूरी बाजू के कपड़े पहनें। हाथ-पैरों को अच्छी तरह ढ़ककर रखें। मच्छरों से बचने के लिए मॉस्कीटो रिपेलेंट्स का प्रयोग कर सकते हैं लेकिन सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करना मच्छरों से बचाव का सस्ता, सरल, प्रभावी और हानिरहित उपाय है। डेंगू के लक्षण उभरने पर तुरंत योग्य चिकित्सक की सलाह लें।


किसी व्यक्ति को डेंगू हो जाने पर उसे पौष्टिक और संतुलित आहार देते रहना बेहद जरूरी है। तुलसी का उपयोग भी काफी लाभकरी है। आठ-दस तुलसी के पत्तों का रस शहद के साथ मिलाकर लें या तुलसी के 10-15 पत्तों को एक गिलास पानी में उबाल लें और जब पानी आधा रह जाए, तब पी लें। नारियल पानी पीएं, जिसमें काफी मात्रा में इलैक्ट्रोलाइट्स होते हैं, साथ ही यह मिनरल्स का भी अच्छा स्रोत है, जो शरीर में ब्लड सेल्स की कमी को पूरा करने में मदद करते हैं। विटामिन सी शरीर के इम्यून सिस्टम को सही रखने में मददगार होता है। इसलिए आंवला, संतरा, मौसमी जैसे विटामिन सी से भरपूर फलों का सेवन करें। बुखार होने पर पैरासिटामोल का इस्तेमाल करें और ध्यान रखें कि बुखार किसी भी हालत में ज्यादा न बढ़ने पाए लेकिन ऐसे मरीजों को एस्प्रिन, ब्रूफिन इत्यादि दर्दनाशक दवाएं बिल्कुल न दें क्योंकि इनका विपरीत प्रभाव हो सकता है। हां, उल्टियां होने पर रोगी को नसों द्वारा ग्लूकोज चढ़ाना अनिवार्य है। स्थिति थोड़ी भी बिगड़ती देख तुरंत अपने चिकित्सक से सम्पर्क करें। फिलहाल डेंगू से बचाव के उपाय ही सबसे अहम हैं क्योंकि अभी तक इसकी कोई वैक्सीन नहीं बनी है।


-योगेश कुमार गोयल-





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बलात्कार की घटनाओं पर अंकुश लगाना जरुरी

हिंदुस्तान की संस्कृति ऋग्वेद जितनी पुरानी है। ऋग्वेद की रचना ईसा मसीह के जन्म लेने के 2500 वर्ष पूर्व की है। सफल जीवन के चार सूत्र हैं-जिज्ञासा,धैर्य,नेतृत्व की क्षमता और एकाग्रता। जिज्ञासा का मतलब जानने की इक्षा। धैर्य का मतलब विषम परिस्थितयों में अपने को सम्हाले रहना। नेतृत्व की क्षमता का मतलब जनसमूह को अपने कार्यों से आकर्षित करना। एकाग्रता (एक+अग्रता)का अर्थ है एक ही चीज पर ध्यान केन्द्रित करना। यही चारो सूत्र आपके ज्ञान को विशेष स्वरूप प्रदान करता है। ज्ञान,शान्ति का प्रतीक है। अज्ञानता,अशांति का प्रतीक है।


विश्व में शान्ति वही कायम कर सकता है,जो ज्ञानी है। अज्ञानी तो अशांति का कारक होता है। बलात्कारी अज्ञानी होते हैं। अज्ञानता ही सारे अपराधों की जननी है। ज्ञान संस्कारों की जननी है। किसी भी देश की संस्कृति व संस्कार,उस देश में शान्ति को स्थापित करने में अहम् भूमिका निभाती है। भारत जैसे देश को अपनी वैदिक संस्कृति व सभ्यता में लौटना होगा तभी इस देश में शान्ति कायम हो सकती है। सत्य, अहिंसा विरोधी रथ पर सवार हो सत्ता के चरम शिखर पर पहुँचने वाले सुधारकों की मनोदशा ठीक नहीं है। सुधारकों की प्रवृत्ति ठीक होती तो देश में सत्य,अहिंसा का प्रवाह होता। बलात्कार, भारत में महिलाओं के खिलाफ चौथा सबसे आम अपराध है।


राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक साल 2019 में भारत में करीब 32 हजार रेप के मामले दर्ज हुए थे। देश के हर राज्य से ऐसी घटनाएं आए दिन हो रही हैं। इस प्रकार की घटनाएं समाज के बदलते स्वरुप,नेताओं के कोरे वादे और इंसानियत के साथ खिलवाड़ का वीभत्स रूप दर्शाती है। सरकार को हायर एजुकेशन,प्राइमरी एजुकेशन,मिडिल एजुकेशन सिस्टम में नैतिक शिक्षा के विषय का प्रावधान करना चाहिए। भारत सरकार को प्रत्येक जिले के बस स्टैंड,रेलवे स्टेशन,टैक्सी स्टैंड,टोल प्लाजा,हाई वे आदि मुख्य जगहों पर नैतिक मूल्यों से सम्बंधित कोटेशन के बैनर और पोस्टर लगवाने चाहिए। समाज वहशीपन का शिकार हो रहा है। समाज में असहिष्णुता का विकास हो रहा है। समाज में बढ़ती बेरोजगारी,अशिक्षा,नैतिक मूल्यों का पतन आदि बुराइयां ही दरिंदगी और वहशीपन का कारण हैं।


-डॉ शंकर सुवन सिंह-






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अन्ततः कौन उड़ायेगा एयर इंडिया


सरकारी एयरलाइन कंपनी एयर इंडिया को कब्जा करने के लिए टाटा ग्रुप और स्पाइस जेट के प्रमोटर अजय सिंह ने अपने –अपने दावे पेश किये हैं। अजय सिंह एक तरह से टाटा ग्रुप के आगे डटकर खड़े हो गए हैं। वे खुली चुनौती दे रहे हैं टाटा ग्रुप को। हालांकि इस बात का फैसला भी जल्दी ही हो जाएगा कि आखिर एयर इंडिया आखिरकार किसे मिलेगी। फिर भी यह तो स्वीकार करना ही होगा कि जब देश और दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियां एयर इंडिया पर स्वामित्व जमाने के इरादे से पीछे हट गईं, तब टाटा ग्रुप के अलावा एक पहली पीढ़ी का आंत्रप्योनर मैदान में कूदा। उसके सपनों की उड़ान तो देखिए। दरअसल, कारोबार की दुनिया में सफलता उसे ही मिलती है जो बेखौफ होकर आगे बढ़ता है। जो हौसलेपूर्वक आगे बढ़ते हुए सारी तैयारी भी कर लेता है। अजय सिंह ने भी एयर इंडिया जैसी प्रतिष्ठित एयरलाइन को खरीदने का इरादा करने से पहले ही सब कुछ सोच –विचार तो कर ही लिया होगा। यूं तो कोई भी एयर इंडिया जितनी विशाल कंपनी को खरीदने के बारे में सोच भी नहीं सकता है। एयर इंडिया को जेआरडी टाटा ने ही 1932 में टाटा एयरलाइन के नाम से शुरू किया था। हालांकि बाद में इस कंपनी का राष्ट्रीयकरण हो गया और यह सरकार के पास आ गई। अब देखिए कि एयर इंडिया फिर से टाटा ग्रुप का हिस्सा बनती है या फिर यह अजय सिंह के चेयरमैनशिप वाली स्पाइस जेट को मिलती है।


बहरहाल, जिसे भी एयर इंडिया मिलेगी उसे घरेलू हवाई अड्डों पर चार हजार,400 घरेलू और एक हजार,800 अंतरराष्ट्रीय लैंडिंग एवं पार्किंग स्लाटों के साथ-साथ विदेशी हवाई अड्डों पर 900 स्लाटों का नियंत्रण हासिल होगा। टाटा ग्रुप ने पहले ही दो एयरलाइन कंपनियों में हिस्सेदारी ले रखी है। इनमें एयर एशिया इंडिया है। यह लो कॉस्ट एयरलाइन है। दूसरी फुल सर्विस एयरलाइन “विस्तारा” है।


स्पाइसजेट के चेयरमेन और मैनेजिंग डायरेक्टर अजय सिंह पहली पीढ़ी के उधमी हैं। कहा जाता है कि उनके परिवार में उनसे पहले किसी ने बिजनेस नहीं किया है। यह बात कम लोगों को मालूम होगी कि वे 1996 में दिल्ली में डीटीसी का कायाकल्प कर रहे थे। तब दिल्ली में मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार में परिवहन मंत्री राजेन्द्र गुप्ता ने अजय सिंह को डीटीसी के काम में सुधार की जिम्मेदारी दी। अजय सिंह ने उस दौरान डीटीसी के बेड़े का बड़े स्तर पर विस्तार किया था और नए-नए रूट शुरू करवाए थे। उन्होंने बाहरी दिल्ली और ग्रामीण दिल्ली में भी डीटीसी बसों के रूट चालू करवाए थे। वे दूरदर्शन से भी जुड़े रहे। उनकी सरपरस्ती में ही डीडी स्पोर्ट्स और डीडी न्यूज शुरू हुआ। यानी अजय सिंह ने बहुत से क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है।


दरअसल, अजय सिंह के बहाने बात हो रही थी पहली पीढ़ी के कारोबारियों की। सच ही कहा जाता है कि पहली पीढ़ी के उद्यमी ज्यादा अच्छे भविष्यद्रष्टा , लगनशील और अद्भुत मेहनती होते हैं। देखिए अजय सिंह से पहले और बाद में भी पहली पीढ़ी के उद्यमी बने हैं और बनते भी रहेंगे। अब ओला के फाउंडर भाविश अग्रवाल, जोमैटो के दीपेन्द्र अग्रवाल, एचसीएल टेक्नोलॉजीज के शिव नाडार जैसे पहली पीढ़ी के कई आंत्रप्योनर लगातार सामने आ ही रहे हैं। इनमें से अधिकतर पहली पीढ़ी के उद्यमी बेहतर कर रहे हैं। ये रोजगार दे रहे हैं और नौजवानों को लगातार प्रेरित कर रहे हैं। देश के सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तो हजारों इस तरह के युवा एक्टिव हैं, जिनके परिवारों में उनसे पहले कभी किसी ने कोई बिजनेस ही नहीं किया। देश में यह समय अपना धंधा करने के लिहाज से उत्तम है। आपको बैंकों और वित्तीय संस्थानों से आसान शर्तों पर लोन भी मिल जाता है। यकीन मानिए कि यह स्थिति बीसेक साल पहले तक नहीं थी। उस दौर में लोन के लिए बहुत धक्के खाने पड़ते थे। आज के दिन अगर आपके पास कोई बढ़िया आइडिया है तो आपकी सफलता तय है।


ऐसे में भी एक बात वे सब गांठ बांध लें, जो कारोबारी बनना चाहते हैं। सफलता शॉर्ट-कट से नहीं मिल सकती। सफल होने के बाद जो पैसे के मामले में किसी भी तरह की धोखेबाजी करते हैं, वे जो कमाते हैं उसे भी गंवा देते हैं। अब रीयल एस्टेट कंपनी यूनिटेक को ही लें। इस कम्पनी के प्रमोटरों की हवस ने एक बेहतर कंपनी को तबाह कर दिया। अब इसके दो बड़े प्रमोटर क्रमश: संजय चंद्रा और उनके अनुज अजय चंद्रा जेल में हैं। कुछ साल पहले तक संजय चंद्रा रीयल एस्टेट की दुनिया के सबसे खास नाम थे। वे राजधानी के डीपीएस स्कूल, आर.के पुरम में पढ़े थे। उनके पिता सिविल इंजीनियर थे। संजय चंद्रा ने यूनिटेक को बुलंदियों पर पहुंचा दिया था। वे दिल्ली-एनसीआर में एक के बाद एक आवासीय और कर्मिशयल प्रोजेक्ट लेकर आ रहे थे। सफलता ने उन्हें न जाने क्यूं, दुर्भाग्यवश लालची बना दिया। वे खूब ग़ड़बड़ करने लगे। उन्होंने अपनी छत का ख्वाब देखने वालों हजारों लोगों के विश्वास की हत्या की और करोड़ों- अरबों रुपये की जमकर हेराफेरी की। इसी के चलते उन पर अनेक केस दर्ज हो गए। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद संजय चंद्रा और उनके भाई अजय चंद्रा को तिहाड़ जेल से मुंबई की ऑर्थर रोड जेल और तलोजा केंद्रीय जेल में शिफ्ट कर दिया गया है, क्योंकि, वे तिहाड़ जेल से भी अपनी गलत योजनाओं को अंजाम देने से बाज नहीं आ रहे थे. ऐसी शिकायत सुप्रीम कोर्ट को मिली थी।


इस तरह का एक और उदाहरण लें। भाई मोहन सिंह देश के बंटवारे के बाद रावलपिंडी से दिल्ली आए थे। उन्होंने रैनबैक्सी लेबोट्ररीज नाम की एक कंपनी खरीद ली। यह 1952 की बात है। वह उनके चचेरे भाइयों की ही थी। फिर उनकी सरपरस्ती में रैनबेक्सी देश की प्रमुख फार्मा कंपनी बन गई। पर भाई मोहन सिंह और उनके बड़े पुत्र डॉ. परविंदर सिंह की मृत्यु के बाद रैनबैक्सी का प्रबंधन आ गया परविंदर सिंह के पुत्रों मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह के पास। इन दोनों ने रैनबैक्सी को जापान की दाइची नाम की कंपनी को बेच ही डाला। उस सौदे में भी बहुत सी गड़बड़ियां भी हुईं। अफसोस कि भाई मोहन सिंह के दोनों पौत्रों को पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा द्वारा सैकड़ों करोड़ की धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार किया गया। लालच के कारण, इन भाइयों ने एक बेहतरीन फार्मा कंपनी को अकारण बेच डाला।


तो बात यह है कि अंततः बिजनेस में सफल तो वहीं होंगे, जिनके पास कुछ अलग आइडिया होगा और वे अपने बिजनेस को मेहनत और ईमानदारी से चलाएंगे। टाटा समूह एक सदी से भी अधिक समय से देश की सेवा कर रहा है। स्पाइसजेट ने भी अपने छोटे से सफर में अपनी योग्यता और क्षमता से लोगों को प्रभावित किया है। ये दोनों सीधे रास्ते पर चलकर बिजनेस करते हैं। अब एयर इंडिया चाहे टाटा समूह के पास जाए या फिर अजय सिंह की स्पाइसजेट के पास, फायदा तो देश को ही होगा।


-आर.के. सिन्हा-

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं) 




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इन मंत्रियों से देश सीखे!

अपने देश के मंत्रियों और नेताओं का व्यवहार कुछ ऐसा बन गया है, कि कभी-कभी हमें उनकी कड़ी आलोचना करनी पड़ती है इसके विपरीत अभी-अभी हमारे दो मंत्रियों और एक मुख्यमंत्री के ऐसे किस्से सामने आए हैं, जो हमें इतिहास-प्रसिद्ध महाराजा सत्यवादी हरिश्चंद्र और सम्राट विक्रमादित्य के आदर्श- आचरण की याद दिला देते हैं। सबसे पहले लें केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को! गडकरी ने गुरुवार 16 सितंबर को दिल्ली-मुंबई महापथ के निर्माण-कार्य का निरीक्षण करते हुए अपना एक किस्सा सुनाया। उस समय वे महाराष्ट्र सरकार में लोक निर्माण मंत्री थे। उनकी शादी जल्द ही हुई थी। नागपुर के रामटेक में सरकार सड़क बनवा रही थी। उस सड़क के बीचोंबीच उनके ससुर का मकान भी खड़ा था। उन्होंने अपनी पत्नी को भी नहीं बताया और उस मकान को गिरवा दिया। गडकरी जैसे कितने मंत्री अपने देश में हुए हैं ? इसीलिए गडकरी को गदगदकरी कहता हूँ।


जब हम लोग बच्चे थे तो इंदौर में महारानी अहिल्याबाई के किस्से सुना करते थे। उसमें एक किंवदती यह थी कि उन्होंने अपने राजपुत्र को किसी संगीन अपराध के कारण भरे दरबार में हाथी के पांव के नीचे दबवा दिया था। सच्चा राजा वही है, सच्चा जन-सेवक वही है, जो अपने-पराए के भेदभाव से ऊपर उठकर निष्पक्ष न्याय करे। ऐसी ही कथा सत्यवादी हरिश्चंद्र के बारे में हम बचपन से सुनते आए हैं। वे अपना राज-पाट त्यागने के बाद जब एक श्मशान घाट में नौकरी करने लगे तो उन्होंने अपने बेटे रोहिताश्व की अंत्येष्टि के पहले अपनी पत्नी तारामती से नियमानुसार शुल्क मांगा। उनके पास पैसे नहीं थे। इस पर हरिश्चंद्र ने कहा ‘अपनी आधी साड़ी ही फाड़कर दे दो। यही शुल्क हो जाएगा।’ इन आदर्शों का पालन हमारे नेता करें तो यह कलियुग सतयुग में बदल सकता है। कुछ इसी तरह का काम छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कुछ दिन पहले कर दिखाया। उनके पिता ने ब्राह्मणों के विरुद्ध कोई आपत्तिजनक बयान दे दिया था। उन्होंने कोई लिहाज-मुरव्वत नहीं दिखाई। उन्होंने अपने पिता को गिरफ्तार करा दिया। भूपेश स्वयं पितृभक्त और मित्रभक्त हैं लेकिन उन्होंने अपना राजधर्म निभाया।


ताजा खबर यह है कि नए स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया साधारण मरीज बनकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल पहुंच गए। वे एक बेंच पर जाकर बैठ गए। चौकीदार ने डंडा मारा और उन्हें वहां से उठा दिया। यह बात उन्होंने जब नरेंद्र मोदी को बताई तो नरेंद्र भाई ने उनसे पूछा कि ‘उसे मुअत्तिल कर दिया गया?’ तो मनसुख भाई ने कहा ‘नहीं, क्योंकि वह व्यवस्था को बेहतर बना रहा था।’’ अद्भुत है, यह प्रतिक्रिया, एक मंत्री की! देश में कितने मंत्री हैं, जो साधारण वेश पहनकर इस तरह जन-सुविधाओं की निगरानी करते हैं? यदि हमारे मंत्री और नेता (और प्रधानमंत्री भी) इस तरह का सत्साहस करें तो उनके डर के मारे ही बहुत-सी अव्यवस्था और भ्रष्टाचार से देश को मुक्ति मिल सकती है।


-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)





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भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी होने के मायने


भारत 'नवनिर्माण' की अमृत बेला से गुजर रहा है। 'अंत्योदय' के दर्शन में विकास को ढाल कर 'राष्ट्रोदय' की स्वर्णिम संकल्पना को साकार करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस युगांतरकारी 'नव निर्माण' के वास्तुकार हैं। वंचितों, शोषितों, उपेक्षितों, उपहासितों, किसानों और महिलाओं के सर्वांगीण उत्थान को समर्पित यह 'निर्माण प्रक्रिया' भारत के पुरातन गौरव की पुनर्स्थापना की चिर उत्कंठा का परिणाम है। अभिलाषा महान किंतु अनेकानेक व्यवधान। लेकिन जब नेतृत्वकर्ता नरेंद्र मोदी जैसा दृढ़ संकल्पी हो तो समस्याओं के समाधान निकल ही आते हैं।


दशकों से देश में अलगाव की आग धधकाने वाले अनुच्छेद 370 और धारा 35 A जैसे नासूर के शांतिपूर्ण निर्मूलन से मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति को बखूबी समझा जा सकता है। ऐसे ही सदियों से मजहबी आतंकवाद व राजनीतिक तुष्टीकरण की कुचेष्टाओं के कारण सप्रयास लम्बित किए गए श्रीरामजन्मस्थान विवाद का शांतिपूर्ण एवं विधि सम्मत समाधान निकाल कर शताब्दियों से आहत सनातन आस्था को उसका गौरव वापस लौटने का अनिर्वचनीय कार्य भी नरेंद्र मोदी की प्रबल तेजस्विता का अप्रतिम उदाहरण है।


यही नहीं मजहबी पुरुषवादी कट्टरवाद की अपमानजनक आग में 1400 वर्षों से मातृशक्ति को जला रही तीन तलाक की 'कुप्रथा' का अंत कर हव्वा की बेटियों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर उपलब्ध करा कर नरेंद्र मोदी ने भारतीय लोकतंत्र को नई ऊंचाइयां दीं और समतामूलक समाज की स्थापना में मील का पत्थर स्थापित किया। इन सबके मध्य, ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के माध्यम से घर-घर बने शौचालयों ने स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ-साथ जो नारी शक्ति के “सम्मान” संरक्षण का जो अतुल्य कार्य किया है, उसके लिए तो मानव सभ्यता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सदैव ऋणी रहेगी।


मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि वैश्विक महामारी कोरोना की क्रूर विभीषिका के कारण 'आस व विश्वास' की टूटती डोर पर असहाय और असहज स्थिति में बैठे भारत के जन गण मन में एकाएक ‘जान, जहान एवं जीविका’ के सुरक्षित होने के सुखद अहसास से उत्पन्न अनिर्वचनीय 'आत्मविश्वास' का नाम हैं नरेंद्र मोदी। यही कारण है कि “इदं राष्ट्राय इदं न मम” जैसे राष्ट्र साधना के पुनीत मंत्र को चरितार्थ करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज, राष्ट्रीय आशा, अपेक्षा और अभिलाषा का केंद्र बन गए हैं।


‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ की कार्य संस्कृति को मूर्तरूप प्रदान करते ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के शिल्पकार मोदी, “नए भारत” के विश्वकर्मा हैं। नया भारत, जो शत्रु को घर में घुस कर मारता है। जो, डिजिटल इण्डिया की तरंगों पर थिरकता है। जिसका प्रगति पथ, अंतिम व्यक्ति से अंतरिक्ष तक है। जहां राष्ट्र रक्षा ही धर्म है। जहां “अंत्योदय से राष्ट्रोदय” एक राष्ट्रीय संकल्प है। जहां, आतंक और अनियमितता का निर्मूलन राष्ट्रीय विचार है।


मां और मातृभूमि के प्रति अगाध श्रद्धा से पूरित और पं. दीनदयाल उपाध्याय की राष्ट्रवादी विचारधारा में दीक्षित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय जनमानस के ऐसे महानायक हैं जो आस्था और आधुनिकता के संगम तथा परंपरा और प्रगतिशीलता के सेतुबंध हैं। वह एक तरफ भारत की सकल आस्था के केंद्र प्रभु श्रीरामजन्मस्थान पर बन रहे दिव्य-भव्य राम मंदिर के निर्माण, पावन संगमस्थली प्रयागराज में विश्व प्रसिद्ध कुम्भ के आयोजन और हजारों वर्षों पूर्व भारतीय मनीषियों द्वारा मानवता को भेंट की गई अतुल्य विधा योग से सम्पूर्ण जगत का साक्षात्कार कराने जैसे दुसाध्य कार्य को निर्णायक दिशा देते हैं वहीं दूसरी तरफ मुद्रा योजना, स्टार्ट अप इण्डिया, स्टैण्ड-अप इण्डिया जैसी योजनाओं द्वारा भारतीय उद्यमशीलता एवं नवाचार को नए आयाम प्रदान करते हैं।


यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है कि भारत जैसा विकासशील राष्ट्र एक नहीं दो प्रकार की स्वदेशी कोविड वैक्सीन का निर्माण कर सम्पूर्ण विश्व को हतप्रभ कर देता है। ऐसी ही अभूतपूर्व उपलब्धियों को राजनीतिक जगत 'मोदी मैजिक' की संज्ञा देता है। यही नहीं अनेक मित्र राष्ट्रों को निःशुल्क कोविड वैक्सीन उपलब्ध करवाकर भारत की महान 'वसुधैव कुटुंबकम' संस्कृति से दुनिया को परिचित कराया। हर भारतीय को निःशुल्क कोरोना वैक्सीन लगवाने का निर्णय और उसे सफलतापूर्वक पूर्ण करने का कार्य सिर्फ मोदी जैसा स्टेट्समैन ही कर सकता है। डिजिटल होता इण्डिया, मोदी की दूरदृष्टि का ही सुफल है। “लोकल के लिए वोकल” होकर मोदी ने स्वदेशी से स्वशासन की संकल्पना को स्वर प्रदान कर “आत्मनिर्भर भारत” की बुनियाद रखने का कार्य किया है।


भारतीय लोकतंत्र में गरीबी उन्मूलन के लिए 'नारे' तो बड़े क्रांतिकारी बने लेकिन गरीबी हटाने के लिए फैसलाकुन प्रयासों की हमेशा कमी रही। अतः गरीबी सुरसा की तरह बढ़ती गई और निर्धन समुदाय बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी मोहताज हो गया। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने विकास को अंत्योदय की अवधारणा से जोड़कर शताब्दियों की पीड़ा को हरने का ऐतिहासिक कार्य किया है। अब देखिए, संसाधनहीनता के चलते दशकों से चूल्हे के धुएं से अपना स्वास्थ्य खोने को विवश महिला शक्ति को उज्ज्वला योजना के माध्यम से निःशुल्क रसोई गैस कनेक्शन प्रदान कर उसे वंचना से मुक्ति दिलाने का कार्य किया।


निर्धन समाज को 05 लाख रुपए तक निःशुल्क चिकित्सा सुविधाओं से लाभान्वित करने हेतु शुरू की गई 'आयुष्मान भारत' योजना ने इलाज के लिए गरीबों के खेत और मकानों को बिकने से बचाने का कार्य किया है। अन्नदाता किसानों की आत्महंता बनने की विवशता समझते हुए प्रारम्भ की गई, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना आदि के माध्यम से करोड़ों अन्नदाता किसानों के जीवन में आय का वर्धन और मौसम जनित अस्थिरता का अंत करने का कार्य सम्पन्न हुआ। आज, ‘प्रधानमंत्री जनधन योजना’ के कारण ही करोड़ों लाभार्थी, सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं से सीधे जुड़ पाए हैं।


हरि अनन्त, हरि कथा अन्नता की भांति ‘नए भारत’ का निर्माण करती प्रधानमंत्री मोदी द्वारा संचालित योजनाओं की अगणित श्रंखला के विषय में जितना लिखा जाए, कम है। अधिकांश योजनाओं का जिक्र यहां नहीं हो पाया है लेकिन निश्चित रूप से वह आमजन के मानस पर अवश्य अंकित होंगी। कह सकते हैं कि ग्रामोदय से भारत उदय तक, प्रधानमंत्री आवास योजना से किसान सम्मान निधि तक, धारा-370 से तीन तलाक की कुप्रथा हटाने तक मोदी के हर निर्णय ने भारत और भारतीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की है। इन सबके दरम्यान अनेक सियासी जमातें और बहुत सारे लोग विभिन्न कारणों से मोदी से असहमत भी हैं लेकिन इन तमाम असहमतियों और चुनौतियों के मध्य “मोदी” आज भारतीय राजनीति के केंद्र भी हैं, परिधि भी हैं।


दरअसल, भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी होने के अनेक मायने हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंद की सियासत में “अंत्योदय” का प्रतीक हैं। उनकी उपस्थिति भारतीय लोकतंत्र को परिवारवाद, जातीय अधिनायकवाद तथा कुलीन श्रेष्ठताबोध की जड़ता से मुक्ति का अहसास कराती है। इतनी विराटता कि कभी वीजा देने से इंकार करने वाला महाबली अमेरिका 'हाउडी मोदी' के जयघोष के साथ उनका नागरिक अभिनंदन करता है। सरलता इतनी कि पतितपावनी मां गंगा के तीर, वह स्वच्छताकर्मियों के चरण धोकर कृष्ण-सुदामा की स्मृति को जीवंत कर देते हैं। प्रत्येक स्थिति में मित्रता निभाने के लिए प्रसिद्ध नरेंद्र मोदी, शत्रुओं को सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक का “उपहार” देकर हतप्रभ कर देते हैं। यह “मोदी इफेक्ट” ही है जिसके कारण हम सभी ने पाक और चीन के मुद्दे पर विश्व जनमत को ‘भारतपक्षीय’ होते हुए अनेक बार देखा है।


भारतीय राजनीति में “जीवित किंवदंती” बन चुके “अपराजेय” छवि वाले मोदी के विषय में जितनी अधिक बात उनके समर्थक करते हैं, उससे कहीं अधिक चिंतन उनके विरोधी करते हैं। मतलब समर्थक और विरोधी दोनों के मन पर “मन की बात” करने वाले मोदी का कब्जा है। यह ‘कब्जा’ हमेशा बरकरार रहे। ताकि लोकतंत्र आबाद रहे। फिलहाल, सहमति और असहमति दोनों स्थितियों में भारतीय लोकतंत्र को सात्विक मर्यादाओं का पुनर्पाठ कराने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी 71वीं वर्षगांठ पर दिली मुबारकबाद।


-प्रणय विक्रम सिंह-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)





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आत्मनिर्भर भारत का मंत्र

मोदी जी के नेतृत्व में वैश्विक क्षितिज पर उभरते और तेजी से बढ़ते हुए भारत के समक्ष कोविड-19 महामारी एक विपत्ति की भाँति आई। यद्यपि यह वैश्विक समस्या है फिर भी आबादी के दृष्टि से विश्व के दूसरे बड़े देश के लिए यह बड़ी चुनौती है। पहले ही दिन से मोदी जी ने इस विपत्ति को संजीदगी के साथ लिया और जनजन में कोरोना से लड़ने का हौसला भरा। परिणाम यह कि कोरोना से होने वाली मृत्युदर अन्य विकसित देशों के मुकाबले भारत में बहुत कम है। आज हमारे वैज्ञानिकों ने स्वदेशी वैक्सीन की खोज कर ली, हमारी फर्मा कंपनियों ने उसका उत्पादन शुरू किया है। 70 करोड़ से ज्यादा लोग वैक्सिनेट हो चुके हैं।


औसत एक दिन में ही इतना टीकाकरण होता है जो किसी यूरोपीय देश की आबादी से ज्यादा है। इस विस्मयकारी अभियान को आज दुनिया देख और सराह रही है। कोरोना ने विश्व की तमाम अर्थव्यवस्थाओं को ध्वस्त किया है..अपना देश भी अछूता नहीं। लेकिन हम देश की कृषि व्यवस्था के दमपर अपने पाँवों में खड़े हैं। मोदीजी ने कृषि क्षेत्र को सबसे संभावनाओं वाले क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया है। वे खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने की दिशा में कटिबद्ध हैं। कोरोना की सबसे ज्यादा मार श्रमिकों, सीमांत किसानों व फुटपाथ व्यापारियों पर पड़ा है। सभी फिर से सँभले और समाज की मुख्यधारा में बने रहें, इसके लिए 20 लाख करोड़ का बजट दिया है। साथ ही ‘आत्मनिर्भर भारत का मंत्र भी।


विश्वास की पुनर्प्रतिष्ठा


जो कश्मीर स्वतंत्रता के बाद से ही नासूर की तरह लहकता था उस नासूर से अब मुक्ति मिल चुकी है। अनुच्छेद 370 इतिहास का विषय बन चुका है। जम्मू कश्मीर और लद्दाख अब एक राज्य के रूप में पुष्पित पल्लवित हैं। मुस्लिम माताओं-बहनों को तीन तलाक जैसे नारकीय रिवाजों से मुक्ति मिल चुकी है। सभी देशवासी एक हैं, एक-सा उनका अधिकार हो, सभी के लिए एक विधान हो, इस दिशा में भी देश आगे बढ़ चुका है। सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा हमारे स्वाभिमान, आस्था व विश्वास की पुनर्प्रतिष्ठा का रहा है। रामजन्म भूमि में भगवान राम का विशाल और गरिमामयी मंदिर अब आकार लेने को है। यह सब मोदीजी के लौह व्यक्तित्व और अटल इच्छाशक्ति का परिणाम है। ईश्वर नरेंद्र भाई मोदी को इतना सामर्थ्य दे कि विजयी विश्व तिरंगा प्यारा-गीत की पंक्तियों से उतरकर यथार्थ के धरातल पर फलीभूत हो।



(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)










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