शारदीय नवरात्र: महादेव को पति रूप में पाने के लिए महागौरी ने किया था कठोर तप

वाराणसी : शारदीय नवरात्र के आठवें दिन महाअष्टमी पर बुधवार को श्रद्धालुओं ने महागौरी अन्नपूर्णा के दरबार में मत्था टेका। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र स्थित दरबार में दर्शन पूजन के बाद महिलाओं ने परिवार में सुख, शान्ति, वंशवृद्धि के लिए माता रानी से गुहार लगाई।


दरबार में आधी रात के बाद से ही श्रद्धालु दर्शन के लिए कतारबद्ध होने लगे। मंदिर में दर्शन पूजन के दौरान श्रद्धालु महागौरी माता के प्रति श्रद्धा का भाव दिखाते रहे। कड़ी सुरक्षा के बीच बैरिकेडिग में कतारबद्ध श्रद्धालु अपनी बारी का इन्तजार मां का गगनभेदी जयकारा लगाकर करते रहे। इसके पहले रात तीन बजे से मंहत शंकर पुरी की देखरेख में माता के विग्रह को पंचामृत स्नान कराया गया। नवीन वस्त्र और आभूषण धारण कराने के बाद भोग लगाकर मां की मंगला आरती वैदिक मंत्रोच्चार के बीच की गई। अलसुबह मंदिर का पट खुलते ही पहले से ही कतार में प्रतीक्षारत श्रद्धालु मंदिर के प्रथम तल स्थित गर्भगृह के पास पहुंचे और दर्शन पूजन किया। इसके पहले श्रद्धालु गर्भगृह परिसर की परिक्रमा भी करते रहे। यह सिलसिला देर शाम तक चलता रहेगा। लाखों श्रद्धालु महाअष्टमी पर व्रत भी रखे हुए है।


महागौरी अन्नपूर्णा के दर्शन मात्र से ही पूर्व के पाप नष्ट हो जाते हैं। देवी की साधना करने वालों को समस्त प्रकार के अलौकिक सिद्धियां और शक्तियां प्राप्त होती हैं। मान्यता है कि माता रानी ने 8 साल की उम्र से ही भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप शुरू किया था। कठोर तप करने के कारण देवी कृष्ण वर्ण की हो गई थी। लेकिन उनकी तपस्या से देख महादेव ने गंगाजल से देवी की कांति को वापस लौटा दिया, इस प्रकार देवी को महागौरी का नाम मिला।


देवी भागवत पुराण के अनुसार भगवान शिव के साथ उनकी पत्नी के रूप में महागौरी सदैव विराजमान रहती है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी पाप धुल जाते हैं। उसके पूर्व संचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। महागौरी की चार भुजाएं हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे के बाएं हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं।





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कन्या पूजन के साथ घरों में मनाई गयी अष्टमी

हरिद्वार : शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर मां के आठवें स्वरूप के रूप में मां महागौरी की पूजा अर्चना की गई। इसी कड़ी में मंदिरों में अष्टमी तिथि पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। हरिद्वार में मां मंशा देवी मंदिर, चंडी देवी मदिर, काली मंदिर, सुरेश्वरी देवी मंदिर समेत तमाम देवी मंदिरों में भक्तों का सुबह से ही मां की पूजा अर्चना के लिए तांता लगा रहा।


इस बार 7 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ हुआ था। आज अष्टमी तिथि पर मां के आठवां स्वरूप देवी महागौरी की पूजा का विधान है। मां महागौरी की पूजा के विधान के तहत नवरात्रि के व्रत रखकर जो लोग अष्टमी तिथि को कन्या पूजन करते हैं। वह अष्टमी और नवमीं तिथि काे कन्या पूजन करने वाले नवमीं तिथि को नवरात्र का परायण करते हैं।


तीर्थनगरी में विभिन्न स्थानों पर मंदिरों में भक्तों ने पूजा अर्चना की और घरों में कन्या पूजन किया गया। इस मौके पर मां मंशा देवी मंदिर, चंडी देवी मंदिर, सुरेश्वरी देवी मंदिर, शीतला माता मंदिर, काली मंदिर समेत तमाम देवी मंदिरों में भक्तों का सुबह से ही मां की पूजा अर्चना के लिए तांता लगा रहा। कन्या पूजन के तहत घरों में मां के भक्तों ने नौ देवियों के रूप में छोटी-छोटी कन्याओं को प्रसाद स्वरूप भोजन कराया और उन्हें उपहार भी दिए। मां के स्वरूप में बैठी छोटी-छोटी कन्याओं ने मां के व्रत रखने वाले भक्तों को आशीर्वाद भी दिया।





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कोविंद ने देशवासियों को दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं दी

नई दिल्ली  : राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने सभी देशवासियों को दुर्गा पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं दी है। श्री कोविंद ने बुधवार को अपने ट्टीट संदेश में कहा, “दुर्गा पूजा के शुभ अवसर पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं! देवी दुर्गा अन्याय के दमन का प्रतीक व नारी शक्ति का दैवी स्वरूप हैं। हम सभी ऐसे समाज के निर्माण का संकल्‍प करें, जिसमें महिलाओं को और अधिक सम्‍मान मिले एवं राष्‍ट्र-निर्माण में उनकी बराबर की भागीदारी हो।”




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दुर्गा पूजा में उड़ने लगी कोरोना नियमों की धज्जियां

कोलकाता :  बंगाल में चतुर्थी के दिन से ही कोलकाता के साथ-साथ जिलों में दुर्गा पूजा को लेकर सड़कों पर भीड़ उमड़ने लगी है। इस भीड़ में कोरोना महामारी के नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। पूजा घूमने वाले अधिकांश लोग बिना मास्क के घूम रहे हैं और शारीरिक दूरी तो दूर की बात हो गई है। यह तस्वीर कोलकाता के साथ-साथ जिलों में देखी जा रही है।

बता दें कि हालांकि बंगाल में कोरोना फिलहाल नियंत्रण में है, लेकिन  24 घंटे के दौरान 776 लोग कोरोना पाजिटिव पाए गए हैं। केंद्र से लेकर राज्य सरकार की ओर से पूजा के दौरान लोगों को कोरोना नियमों के पालन को लेकर लगातार सतर्क किया जाता रहा है। बावजूद इसके लोग मानने को तैयार नहीं है। यदि पूजा के चौथे दिन ही यह हाल है तो महाष्ठी से क्या होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पिछले 24 घंटे के दौरान 36 हजार 429 लोगों के सैंपल जांचे गए हैं। इसके अलावा 24 घंटे के दौरान 755 लोग स्वस्थ हुए हैं। राज्यभर में अब तक इस महामारी की चपेट में आने वाले कुल 15 लाख 75 हजार 577 में से 15 लाख 49 हजार 49 लोग स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं। इसके अलावा 24 घंटे के दौरान 12 लोगों की मौत हुई है जिससे मरने वालों की कुल संख्या बढ़कर 18,894 पर जा पहुंची है। पूजा के चलते रेस्तरां का संचालन ‘सामान्य कामकाजी घंटों’ के लिए करने की इजाजत देने के बंगाल सरकार के फैसले का रेस्तरां मालिकों ने स्वागत किया। राज्य सरकार ने एक अधिसूचना में कहा कि रेस्तरां और दुकानों को ढील दी गई है कि वे 10 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक ‘सामान्य कामकाजी घंटों’ के मुताबिक काम कर सकेंगे।


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जब हनुमानजी की भगवान श्रीराम से हुई पहली-पहली भेंट

हनुमानजी सुग्रीव आदि वानरों के साथ ऋष्यमूक पर्वत की एक बहुत ऊंची चोटी पर बैठे हुए थे। उसी समय भगवान श्रीरामचंद्रजी सीताजी की खोज करते हुए लक्ष्मणजी के साथ ऋष्यमूक पर्वत के पास पहुंचे। ऊंची चोटी पर वानरों के राजा सुग्रीव ने उन लोगों को देखा। उसने सोचा कि ये बालि के भेजे हुए दो योद्धा हैं, जो मुझे मारने के लिए हाथ में धनुष-बाण लिये चले आ रहे हैं। दूर से देखने पर ये दोनों बहुत बलवान जान पड़ते हैं। डर से घबराकर उसने हनुमानजी से कहा-हनुमान! वह देखो, दो बहुत ही बलवान मनुष्य हाथ में धनुष-बाण लिये इधर ही बढ़े चले आ रहे हैं। लगता है, इन्हें बालि ने मुझे मारने के लिए भेजा है। ये मुझे ही चारों ओर खोज रहे हैं। तुम तुरंत तपस्वी ब्राह्मण का रूप बना लो और इन दोनों योद्धाओं के पास जाओ तथा यह पता लगाओ कि ये कौन हैं। यहां किसलिये घूम रहे हैं। अगर कोई भय की बात जान पड़े तो मुझे वहीं से संकेत कर देना। मैं तुरंत इस पर्वत को छोड़कर कहीं और भाग जाऊंगा।


सुग्रीव को अत्यन्त डरा हुआ और घबराया हुआ देखकर हनुमानजी तुरंत तपस्वी ब्राह्मण का रूप बनाकर भगवान श्रीरामचंद्र और लक्ष्मणजी के पास जा पहुंचे। उन्होंने दोनों भाइयों को माथा झुकाकर प्रणाम करते हुए कहा, प्रभो! आप लोग कौन हैं? कहां से आये हैं? यहां की धरती बड़ी ही कठोर है। आप लोगों के पैर बहुत ही कोमल हैं। किस कारण से आप यहां घूम रहे हैं? आप लोगों की सुंदरता देखकर तो ऐसा लगता है कि जैसे आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से कोई हों या नर और नारायण नाम के प्रसिद्ध ऋषि हों। आप अपना परिचय देकर हमारा उपकार कीजिये।


हनुमानजी की मन को अच्छे लगने वाली बातें सुनकर भगवान श्रीरामचंद्रजी ने अपना और लक्ष्मण का परिचय देते हुए कहा कि राक्षसों ने सीताजी का हरण कर लिया है। हम उन्हें खोजते हुए चारों ओर घूम रहे हैं। हे ब्राह्मणदेव! मेरा नाम राम तथा मेरे भाई का नाम लक्ष्मण है। हम अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के पुत्र हैं। अब आप अपना परिचय दीजिये। भगवान श्रीरामचंद्रजी की बातें सुनकर हनुमानजी ने जान लिया कि ये स्वयं भगवान ही हैं। बस, वे तुरंत ही उनके चरणों में गिर पड़े। राम ने उठाकर उन्हें गले से लगा लिया।


हनुमानजी ने कहा, प्रभो! आप तो सारे संसार के स्वामी हैं। मुझसे मेरा परिचय क्या पूछते हैं? आपके चरणों की सेवा करने के लिए ही मेरा जन्म हुआ है। अब मुझे अपने परम पवित्र चरणों में जगह दीजिये। भगवान श्रीराम ने प्रसन्न होकर उनके मस्तक पर अपना हाथ रख दिया। हनुमानजी ने उत्साह और प्रसन्नता से भरकर दोनों भाइयों को उठाकर कंधे पर बैठा लिया। सुग्रीव ने उनसे कहा था कि भय की कोई बात होगी तो मुझे वहीं से संकेत करना। हनुमानजी ने राम-लक्ष्मण को कंधे पर बिठाया-यही सुग्रीव के लिए संकेत था कि इनसे कोई भय नहीं है। उन्हें कंधे पर बिठाये हुए ही वह सुग्रीव के पास आये। उनसे सुग्रीव का परिचय कराया। भगवान ने सुग्रीव के दुःख और कष्ट की सारी बातें जानीं। उसे अपना मित्र बनाया और दुष्ट बालि को मारकर उसे किष्किन्धा का राजा बना दिया। इस प्रकार हनुमानजी की सहायता से सुग्रीव का सारा कष्ट दूर हो गया।






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हनुमान जी के सुमिरन से कट जाता है हर संकट : मनोज तिवारी

नई दिल्ली : सांसद मनोज तिवारी ने कहा कि हनुमान जी को बल, बुद्धि और विद्या के दाता कहा जाता है, इसलिए हनुमान चालीसा का प्रतिदिन पाठ करना आपकी स्मरण शक्ति और बुद्ध‍ि में वृद्ध‍ि करता है। साथ ही आत्मिक बल भी मिलता है। हनुमान चालीसा का पाठ आपको डर और तनाव से छुटकारा दिलाने में बेहद कारगर है। किसी भी प्रकार की समस्या या अनजाने में उपजा तनाव भी हनुमान चालीसा पाठ से दूर हो सकता है। मनोज तिवारी साढ़े तीन पुस्ता सोनिया विहार में आयोजित एक हनुमान चालीसा पाठ कार्यक्रम में बोल रहे थे हनुमान चालीसा पाठ का आयोजन विगत कई वर्षों से हो रहा है। इस अवसर पर महंत नवल किशोर दास हनुमान मंदिर जमुना बाजार के महंत वैभव शर्मा संघ विभाग प्रचारक श्रवण जी बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारी सांसद मनोज तिवारी, पूर्वांचल मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष कौशल मिश्रा, भाजपा उत्तर पूर्वी जिले के अध्यक्ष मोहन गोयल, महामंत्री संजय त्यागी, उपाध्यक्ष आनंद त्रिवेदी, बृजेश सिंह, सचिन मावी, निगम पार्षद सुषमा मिश्रा, सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र बाक्सर, अनुपम पांडे सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। मनोज तिवारी ने कहा कि भारतीय संस्कृति और धर्मावलंबियों में हनुमान चालीसा का विशेष महत्व है, और देश के करोड़ों लोगों की आस्था में हनुमान चालीसा के प्रति अटूट श्रद्धा समाहित है। आध्यात्मिक जानकारों के अनुसार हनुमान चालीसा का पाठ करने से जहां आस्थावान व्यक्ति के बल बुद्धि और विद्या का विकास होता है। जिससे उसके शौर्य को एक विशेष आत्म बल मिलता है, और इसी आत्म बल के सहारे मनुष्य किसी भी बड़े काम को आसानी से सिद्ध कर लेता है और इसी सिद्धि से कई बिगड़े काम बन जाते हैं इसलिए हम सब को नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए और अपनी संस्कृति का पहरेदार बन कर उसकी रक्षा का एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए।




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जनजातीय समाज में शारदीय नवरात्रि

हिन्‍दू धर्म से वनवासी समाज को अलग परिभाषित करने के सभी विभाजनकारी षड्यंत्र तब धवस्‍त हो जाते हैं, जब इनकी मान्‍यताएँ, पर्व, रहन-शैली, विचार मेल खाते हैं। बाघ देवी, ज्वाला देवी, गांव देवी और वन देवी की पूजा-अर्चना तथा अंचलों में मंदिर, पट, मढिया इसके ज्वलंत उदाहरण है। शारदीय नवरात्रि ऐसा पर्व है, जो वनवासी क्षेत्रों में भी धूमधाम से मनाया जाता है, यह सिद्ध करता है कि हम हिन्‍दू हैं, भले ही हमारे निवास स्‍थान, रहन-सहन अलग-अलग हैं। ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में शारदीय नवरात्रि दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। नौ दिनों तक मनाई जाने वाली इस पूजा में माँ दुर्गा के सभी नौ रूपों की पूजा होती है। वनवासी क्षेत्रों की नवरात्रि पूजा ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों से तनिक भिन्‍न है। इनके नामों व पूजा पद्धति में विविधता है। वनवासी देवी माँ से अच्‍छी फसल, वर्षा व प्रकृति संरक्षण की याचना करते हैं। भील समाज में नवणी पूजा, गोंड समाज में खेरो माता, देवी माई की पूजा, कोरकू समाज में देव-दशहरा के रुप में देवी माँ की पूजा होती है। भील समाज में नवणी पर्व नवणी में भील अपनी कुलदेवी व दुर्गा-भवानी का पूजन करते हैं। यह त्यौहार अश्विन (कुआर) माह में शुक्ल पक्ष की पड़वा से प्रारम्भ होता है। पूरे वर्षभर में हुई गलतियों के लिये सभी देवी-देवताओं से क्षमा याचना करते हैं। 


नवणी से पहले स्‍वच्‍छता की दृष्टि से घरों की गोबर व मिट्टी से लिपाई होती है। व्रती सागौन की पाटली (पटिया) सुतवार (बढ़ई) से बनवाकर उस पर चाँद व सूर्य उकेरवाता है। घर या आंगन में चौका पुराया जाता है। पाटली में शुद्ध धागा नौ बार लपेटा जाता है, उसी चौके पर पाटली की स्‍थापना कर पूजा की जाती है। जिस सागौन से पाटली काटी गयी होती है, उसे भी कच्‍चा सूत व नारियल भेंट किया जाता है। बाँस की छोटी-छोटी पाँच या सात टोकरियों में मिट्टी डालकर गेहूँ बोया जाता है, इसे बाड़ी, जवारा या माता कहते हैं। यह जवारा नवमी तिथि को संध्या की बेला में नदी में विसर्जित होता है। श्रद्धालु खप्पर, गीत गाते नदी तट पर जवारा लेकर जाते हैं। जिसे श्रद्धा स्वरूप एक दूसरे को देते हैं।


गोंड ही नहीं, कोरकू जनजाति में भी कई दशहरे मनाये जाते हैं, जिसमें से एक दशहरा कुआर की नवरात्रि है। गोंड समाज के लोग गाड़वा (वृत्‍ताकार में भूमि में धंसाये गई लकड़ी) के सामने ककड़ी को बकरे का प्रतीक मानकर काटते हैं। अपने ईष्‍ट से याचना करते हैं कि वर्षभर हमें कुल्‍हाड़ी, हंसिया चलाना पड़ता है, उसमें कोई हानि न हो। गोंड समाज में खेरो माता की पूजा होती है। गोंड समाज में खेरो माता को गाँव की मुख्य देवी का दर्जा प्राप्त है। कोरकू समाज में कुआर माह में देव-दशहरा मनाया जाता है। इस पूरे पर्व में मुठवा देव, हनुमान, पनघट देव, बाघ देव, नागदेव, खेड़ा देव आदि की पूजा होती है। कोरकू लोग अपने देवी-देवताओं के चबूतरे पर गाते-बजाते हैं, जिसे 'धाम' कहते हैं। कोरकू समाज में भी इस पर्व पर बलि देने की मान्‍यता है। इस पर्व से संबंधित कुछ निषेध भी हैं - दशहरे के पहले खलिहान नहीं लीपा जा सकता, अशुभ माना जाता है। दशहरा पर अस्त्र-शस्त्र पूजन के साथ प्रकृति के वाहक इस समुदाय में नीलकंठ दर्शन और सोने अर्थात शमी के पत्ते का अर्पण शुभकारी है।


त्‍यौहार सम्‍पन्‍न होने तक सागौन के पत्‍तों की पोटिया भी नहीं बनाए जा सकते बाँस काटना भी वर्जित है। सागौन के पत्‍तों की तह करके बंडल बनाने को पोटिया कहते हैं, ये पोटिया घर की छपरी आदि बनाने के लिए वाटर प्रूफ का काम करते हैं। मुठवा देव की पूजा से पहले हनुमान की पूजा करते हैं। हनुमान को लंगोट और नारियल चढ़ाया जाता है। हनुमान की पूजा सबसे पहले करने की मान्‍यता के पीछे इनका तर्क है कि हनुमान 'रगटवा सामान' अर्थात खून आदि स्‍वीकार नहीं करते। जबकि मुठवा देव को शराब व चूजा भेंट किया जाता है। मुठवा देव की पूजा के बाद पनघट देव, बाघ देव, नागदेव, खेड़ा देव की पूजा होती है। पूजा के बाद सागौन या खाखरा के पत्तों में भोजन कराया जाता है। भोजन से निवृत्त होने के बाद सभी सागौन के छह-छह पत्ते तोड़ते हैं। इन छह पत्तों से पोटिया बनाते हैं। इस नियम को पूरा करने के बाद लोग सागौन के पत्ते तोड़ सकते हैं। ये परम्पाराएं आज भी पुरातन भाव से चलायमान है।


सनातन-हिन्दू धर्म का जनजातीय समाज एक अभिन्न अंग अपने विकासकाल से ही रहा है, यह अलग बात है कि सभ्यताओं के विकास एवं लगातार आक्रमणों के कारण जनजातीय समाज के स्थान परिवर्तन एवं परम्पराओं, संस्कृति, विवाह, रीतिरिवाज, पूजा पध्दति, बोली एवं कार्यशैली में भले ही आंशिक अन्तर दिखता हो। किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष में सनातन हिन्दू समाज की जनजातीय एवं गैर जनजातीय इकाइयों का मूल तत्व एवं केन्द्र हिन्दुत्व की धुरी ही है।


-हेमेन्द्र क्षीरसागर-




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ये हैं शास्त्रों के अनुसार बताए गए भोजन करने के नियम

जब भूख सताती है तो व्यक्ति को खाना याद आता है। जाहिर है वक्त पर भोजन करना बहुत जरुरी भी है। मगर आजकल लोग ज्यादातर अपना वक्त अपने कामकाज करने या फिर घूमने-फिरने में बिताना पसंद करते हैं। वक्त पर भोजन न करना जहां हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक सिद्ध होता है वहीं अन्न का अपमान भी समझा जाता है। जी हां, शास्त्रों के मुताबिक सही वक्त और सही तरीके से भोजन करना घर में बरकत को बढ़ावा देता है। चलिए आज आपको बताते हैं भोजन से जुड़े कुछ खास टिप्स, जिन्हें शास्त्रों में भी बयान किया गया है। 


बिना स्नान किए भोजन करना: शास्त्रों में लिखा गया है कि जो व्यक्ति बिना स्नान के रसोईघर में प्रवेश करता है, उसके घर से बरकत धीरे-धीरे कम होने लगती है और बिना स्नान किए भोजन करना आपकी सेहत को नुकसान पहुंचाता है। ऐसे में जरुरी है स्वस्थ और सफल जीवन के लिए हमेशा स्नान के बाद ही खाना खाएं। इससे देवी-देवता प्रसन्न होंगे जिसका सीधा असर आप और आपके घरवालों की सेहत पर पड़ेगा।


जमीन पर बैठकर भोजन करना: शास्त्रों के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना बहुत शुभ माना जाता है। इससे एक तो आपका स्वास्थय ठीक रहेगा साथ ही जमीन पर बैठकर भोजन करने से अन्न का आदर समझा जाता है, जिससे आपके घर में अन्न की कभी कमी नहीं होती।


जमीन पर गिरा अन्न: कई बार भोजन करते-करते खाने का कुछ अंश जमीन पर गिर जाता है। जमीन पर गिरा भोजन पैरों के नीचे आना धार्मिक दृष्टि से गलत माना जाता है। जमीन पर गिरा भोजन कभी भी झाड़ू के साथ बाहर नहीं निकालना चाहिए। उसे उठाकर एक साइड पर चीटियों या फिर पक्षियों को डाल देना चाहिए।


झूठा खाना: कई बार लोग भूख से ज्यादा खाना प्लेट में डाल लेते हैं, जिस वजह से खाना प्लेट में बच जाता है। थाली में बचा झूठा भोजन देवी लक्ष्मी का अपमान माना जाता है। हमेशा जरुरत के अनुसार ही प्लेट में खाना लें। अगर बच्चे प्लेट में खाना छोड़ दें तो खाने को डस्टबिन में फेंकने की बजाय किसी जानवर को डाल दें।


भूखे व्यक्ति को खिलाएं खाना: अगर आप रोजाना किसी जरुरतमंद या भूखे व्यक्ति को खाना खिलाते हैं तो इसका असर आपके पूरे परिवार पर पड़ता है। भूखे व्यक्ति को खाना खिलाने का मतलब भगवान की सेवा है। जिस घर में रोजाना किसी भूखे का पेट या फिर प्यासे को पानी पिलाया जाता है उस घर से कभी भी बरकत खत्म नहीं हो सकती। 





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दिल्ली : सादे तरीके से मनाए जा रहे दुर्गा पूजा में बंगाली फूड फेस्टिवल से लोगों के चेहरे खिले

नई दिल्ली : कोविड पाबंदियों की वजह से दिल्ली में दुर्गा पूजा सादे तरीके से मनाया जा रहा है ऐसे में उत्सव की तड़क-भड़क की कमी महसूस कर रहे लोगों के लिए राष्ट्रीय राजधानी में दुर्गापूजा पंडाल की तरह बने स्थल पर शनिवार को बंगाली फूड फेस्टिवल की शुरुआत की गई जिसमें करीब 70 स्वादिष्ट व्यंजन उपलब्ध होंगे।


इस सात दिन के फूड फेस्टिवल की मेजबानी क्राउन प्लाजा ओखला, नई दिल्ली ने की है और इसे ‘बॉन्ग कनेक्शन’ नाम दिया गया है। इस मौके पर बंगाली व्यंजनों की प्रमाणिकता बनी रहे यह सुनिश्चित करने के लिए मेहमान खानसामा के तौर पर कोलकाता से रंगनाथ मुखर्जी को बुलाया गया है।


नई दिल्ली के ओखला स्थित क्राउन प्लाजा के महाप्रबंधक शुवेंदु बनर्जी ने कहा, ‘‘आयोजन स्थल को लाल और सफेद रंग के पंडाल का स्वरूप दिया गया है और त्योहार का माहौल बनाने के लिए पृष्टभूमि में ढाक की थाप सुनाई देगी। हम सुनिश्चित कर रहे है कि लोग दुर्गा पूजा के उत्सव की कमी महसूस नहीं करें।’’


इस फूड फेस्टिवल में चिकन कबीराजी, गंधराज बत्तखी फ्राई, मोछार चॉप और चिंगरी मलाई करी, मटन डाक बंगला, चनार दालना और भापा इल्लिश जैसे प्रमुख बंगाली व्यंजन हैं। 







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जल्द शादी के बंधन में बंधना चाहती हैं तो अपनाएं ये उपाय

शिवजी की पूजा और व्रत करें

 

जिन लड़कियों की शादी की उम्र हो गई है और उन्हे मनचाहा वर नहीं मिल रहा है। उनके लिए शिवजी का व्रत रखना काफी लाभदायक होता है। इन्हें 16 सोमवार के व्रत रखने चाहिए। नए साल में आप पहले सोमवार से इसकी शुरुआत कर सकते हैं। हर सोमवार मंदिर जाएं और शिवलिंग पर जल चढ़ाएं। व्रत कथा पढ़कर भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद लें।


छुआरे सिरहाने रख कर सोएं

शुक्रवार की रात्रि में आठ छुआरे जल में उबाल कर जल के साथ ही अपने सोने वाले स्थान पर सिरहाने रख कर सोएं। तथा शनिवार को प्रात: स्नान करने के बाद किसी भी बहते जल में मनचाहे साथी का स्मरण करते हुए इन्हें प्रवाहित कर दें।


हल्दी पानी से करें स्नान

हल्दी पानी से करें स्नान जो लड़कियां विवाह योग्य हैं लेकिन अच्छे प्रस्ताव मिलने में देरी हो रही है वो अपने नहाने के पानी में जरा सी हल्दी मिला ले। रोज हल्दी मिले पानी से स्नान करने से शादी की संभावना बढ़ जाती है।

 

मंदिर में चढ़ाएं लाल गुलाब

मंगलवार के दिन देवी मंदिर में लाल गुलाब के फूल चढ़ाएं, पूजन करें एवं मंगलवार का व्रत रखें। यह नौ मंगलवार तक करें। गुलाब के फूलों के बीच अपने साथी का नाम लिखकर कागज छुपा दें।

 

लाल कपड़े पहने

लाल कपड़े पहने यदि लड़की के परिवार वाले किसी के यहां उसके रिश्ते की बात करने जा रहे हैं तो उस दिन कन्या को लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए। घर के सदस्यों को अपने हाथ से मीठा खिलाकर लड़के वालों के घर भेजना चाहिए। संभव हो तो कन्या को इस दिन अपने बाल खुले छोड़ देने चाहिए।

 

हल्दीयुक्त रोटियां गाय को खिलाएं

गुरुवार के दिन प्रात:काल हल्दीयुक्त रोटियां बनाकर प्रत्येक रोटी पर गुड़ रखें व उसे गाय को खिलाएं। 7 गुरुवार नियमित रूप से यह विधि करने से शीघ्र विवाह होता है। गाय के कान में धीरे से फुसफुसाकर साथी का नाम लें।

 

दुर्गा सप्तशती का पाठ करें

दुर्गा सप्तशती का पाठ करें शादी के लिए अच्छा घर परिवार ना मिल पा रहा हो तो ऐसे में प्रभु की शरण में जाना बेहतर उपाय है। लड़की को रोज सुबह जल्दी उठकर नहाना चाहिए और साफ़ वस्त्र धारण करने चाहिए। घर या फिर पास के मंदिर में जाकर धुप-बत्ती जलाना चाहिए। इसके बाद शांत मन से दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।

 

केले के पेड़ की पूजा करें

केले के पेड़ की पूजा करें हिंदू धर्म में केले के पेड़ को काफी पूजनीय माना गया है। मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए कन्या को गुरुवार के दिन भगवान बृहस्पति का स्मरण करना चाहिए और केले के पेड़ के पास शुद्ध देसी घी का दीपक जलाना चाहिए। इसके साथ ही केले के वृक्ष के सामने गुरु के 108 नामों का जप करना चाहिए। यदि संभव हो तो लड़की को गुरुवार के दिन व्रत भी रखना चाहिए।




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कौशल्या माता मंदिर, जहाँ श्रीराम विराजे है अपनी माँ की गोद में....

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 30 किलोमीटर दूरी पर चंदखुरी में भगवान श्रीराम की जननी कौशल्या माता का प्रसिद्ध मंदिर है। छत्तीसगढ़ की पावन भूमि में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जननी माता कौशल्या का मंदिर पूरे भारत में एक मात्र और दुर्लभ मंदिर तो है ही यह छत्तीसगढ़ राज्य की गौरवपूर्ण अस्मिता भी है। प्राकृतिक सुषमा के अनेक अनुपम दृश्य इस स्थल पर दिखाई देते हैं।


पौराणिक कथाएं 


रामायण काल में छत्तीसगढ़ का अधिकांश भाग दण्डकारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आता था। यह क्षेत्र उन दिनों दक्षिणापथ भी कहलाता था। यह रामवनगमन पथ के अंतर्गत है इस कारण श्रीरामचंद्र जी के यहां वनवास काल में आने की जनश्रुति मिलती है। उनकी माता की जन्मस्थली होने के कारण उनका इस क्षेत्र में आगमन ननिहाल होने की पुष्टि करता है।


वाल्मिकी रामायण के अनुसार अयोध्यापति युवराज दशरथ के अभिषेक के अवसर पर कोसल नरेश भानुमंत को अयोध्या आमंत्रित किया गया था। इसी अवसर पर युवराज द्वारा राजकुमारी भानुमति जो अपने पिता के साथ अयोध्या गयी थी, उनकी सुंदरता से मुग्ध होकर युवराज दशरथ ने भानुमंत की पुत्री से विवाह का प्रस्ताव रखा, तभी कालांतर में युवराज दशरथ एवं कोसल की राजकन्या भानुमति का वैवाहिक संबंध हुआ। कोसल की राजकन्या भानुमति को विवाह उपरांत कोसल राजदूहिता होने के कारण कौशल्या कहा जाने लगा। रानी कौशल्या को कोख से प्रभु राम का जन्म हुआ।


कौशल्या माता मंदिर


चंद्रखुरी स्थित माता कौशल्या मंदिर का जीर्णोद्धार 1973 में किया गया था। पुरातात्विक दृष्टि से इस मंदिर के अवशेष सोमवंशी कालीन आठवीं-नौंवी शती ईस्वीं के माने जाते हैं।यहां स्थित जलसेन तालाब के आगे कुछ दूरी पर प्राचीन शिव मंदिर चंद्रखुरी जो इसके समकालीन स्थित है, पाषण से निर्मित इस शिव मंदिर के भग्नावशेष की कलाकृति है।


इस तालाब में सेतु बनाया गया है। सेतु से जाकर इस मंदिर के प्रांगण में संरक्षित कलाकृतियों से माता कौशल्या का यह मंदिर जलसेन तालाब के मध्य में स्थित है, जहां तक पहुंचा जा सकता है। जलसेन तालाब लगभग 16 एकड़ क्षेत्र में विस्तृत है, इस सुंदर तालाब के चारों और लबालब जलराशि में तैरते हुए कमल पत्र एवं कमल पुष्प की सुंदरता इस जलाशय की सुंदरता को बढ़ाती है।


इस मंदिर की नैसर्गिक सुंदरता एवं रमणीयता और बढ़ जाती है।चंद्रखुरी सैंकड़ों साल तक चंद्रपुरी मानी जाती थी क्यूंकि चंद्रपुरी क अर्थ देवताओं की नगरी होता है। हालाँकि अब चंद्रपुरी से चंद्रखुरी हो गया। दरअसल तालाब के संबंध में कहावत है । यह इस क्षेत्र का सबसे बड़ा तालाब था। चूँकि इसके चारों ओर 126 तालाब होने की जनश्रुति मिलती है। किंतु अभी इस क्षेत्र में 20-26 तालाब ही बचे हैं ।



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नवरात्रि : नौ शक्तियों का मिलन पर्व


भारतीय समाज और विशेषकर हिन्दू समुदाय में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है, जो आदि शक्ति दुर्गा की पूजा का पावन पर्व है। नवरात्रि के नौ दिन देवी दुर्गा के विभिन्न नौ स्वरूपों की उपासना के लिए निर्धारित हैं और इसीलिए नवरात्रि को नौ शक्तियों के मिलन का पर्व भी कहा जाता है। प्रतिवर्ष आश्विन मास में शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्र का आरंभ होता है और लगातार नौ दिनों तक आदिशक्ति जगदम्बा का पूजन किया जाता है।


शारदीय नवरात्र इस वर्ष 7 अक्तूबर से शुरू हो रहे हैं और इनका समापन 15 अक्तूबर को होगा। प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तक चलने वाले नवरात्र नवशक्तियों से युक्त हैं और हर शक्ति का अपना-अपना अलग महत्व है। नवरात्र के पहले स्वरूप में मां दुर्गा पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में विराजमान हैं। नंदी नामक वृषभ पर सवार शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया। इन्हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक माना जाता है। दुर्गम स्थलों पर स्थित बस्तियों में सबसे पहले शैलपुत्री के मंदिर की स्थापना इसीलिए की जाती है कि वह स्थान सुरक्षित रह सके।


मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप ‘ब्रह्मचारिणी’ को समस्त विद्याओं की ज्ञाता माना गया है। माना जाता है कि इनकी आराधना से अनंत फल की प्राप्ति और तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम जैसे गुणों की वृद्धि होती है। ‘ब्रह्मचारिणी’ अर्थात् तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी श्वेत वस्त्र पहने दाएं हाथ में अष्टदल की माला और बाएं हाथ में कमंडल लिए सुशोभित है। कहा जाता है कि देवी ब्रह्मचारिणी अपने पूर्व जन्म में पार्वती स्वरूप में थीं। वह भगवान शिव को पाने के लिए 1000 साल तक सिर्फ फल खाकर रहीं और 3000 साल तक शिव की तपस्या सिर्फ पेड़ों से गिरी पत्तियां खाकर की। इसी कड़ी तपस्या के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया।


मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप है चंद्रघंटा। शक्ति के रूप में विराजमान मां चंद्रघंटा मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्रमा है। देवी का यह तीसरा स्वरूप भक्तों का कल्याण करता है। इन्हें ज्ञान की देवी भी माना गया है। बाघ पर सवार मां चंद्रघंटा के चारों तरफ अद्भुत तेज है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। यह तीन नेत्रों और दस हाथों वाली हैं। इनके दस हाथों में कमल, धनुष-बाण, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र हैं। कंठ में सफेद पुष्पों की माला और शीष पर रत्न जड़ित मुकुट विराजमान हैं। यह साधकों को चिरायु, आरोग्य, सुखी और सम्पन्न होने का वरदान देती हैं। कहा जाता है कि यह हर समय दुष्टों का संहार करने के लिए तत्पर रहती हैं और युद्ध से पहले उनके घंटे की आवाज ही राक्षसों को भयभीत करने के लिए काफी होती है।


चतुर्थ स्वरूप है कुष्मांडा। देवी कुष्मांडा भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त करके आयु, यश, बल और बुद्धि प्रदान करती हैं। यह बाघ की सवारी करती हुईं अष्टभुजाधारी, मस्तक पर रत्न जड़ित स्वर्ण मुकुट पहने उज्ज्वल स्वरूप वाली दुर्गा हैं। इन्होंने अपने हाथों में कमंडल, कलश, कमल, सुदर्शन चक्र, गदा, धनुष, बाण और अक्षमाला धारण की हैं। अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कुष्मांडा पड़ा। कहा जाता है कि जब दुनिया नहीं थी तो चारों तरफ सिर्फ अंधकार था। ऐसे में देवी ने अपनी हल्की-सी हंसी से ब्रह्मांड की उत्पत्ति की। वह सूरज के घेरे में रहती हैं। सिर्फ उन्हीं के अंदर इतनी शक्ति है, जो सूरज की तपिश को सहन कर सकें। मान्यता है कि वही जीवन की शक्ति प्रदान करती हैं।


दुर्गा का पांचवां स्वरूप है स्कन्दमाता। भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) की माता होने के कारण देवी के इस स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। यह कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। इन्हें कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है। यह दोनों हाथों में कमल दल लिए हुए और एक हाथ से अपनी गोद में ब्रह्मस्वरूप सनत कुमार को थामे हुए हैं। स्कन्द माता की गोद में उन्हीं का सूक्ष्म रूप छह सिर वाली देवी का है।


दुर्गा मां का छठा स्वरूप है कात्यायनी। यह दुर्गा देवताओं और ऋषियों के कार्यों को सिद्ध करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुईं। उनकी पुत्री होने के कारण ही इनका नाम कात्यायनी पड़ा। देवी कात्यायनी दानवों व पापियों का नाश करने वाली हैं। वैदिक युग में ये ऋषि-मुनियों को कष्ट देने वाले दानवों को अपने तेज से ही नष्ट कर देती थीं। यह सिंह पर सवार, चार भुजाओं वाली और सुसज्जित आभा मंडल वाली देवी हैं। इनके बाएं हाथ में कमल और तलवार व दाएं हाथ में स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा है।


दुर्गा का सातवां स्वरूप कालरात्रि है, जो देखने में भयानक है लेकिन सदैव शुभ फल देने वाला होता है। इन्हें ‘शुभंकारी’ भी कहा जाता है। ‘कालरात्रि’ केवल शत्रु एवं दुष्टों का संहार करती हैं। यह काले रंग-रूप वाली, केशों को फैलाकर रखने वाली और चार भुजाओं वाली दुर्गा हैं। यह वर्ण और वेश में अर्द्धनारीश्वर शिव की तांडव मुद्रा में नजर आती हैं। इनकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है। एक हाथ से शत्रुओं की गर्दन पकड़ कर दूसरे हाथ में खड़ग-तलवार से उनका नाश करने वाली कालरात्रि विकट रूप में विराजमान हैं। इनकी सवारी गधा है, जो समस्त जीव-जंतुओं में सबसे अधिक परिश्रमी माना गया है।


नवरात्र के आठवें दिन दुर्गा के आठवें रूप महागौरी की उपासना की जाती है। देवी ने कठिन तपस्या करके गौर वर्ण प्राप्त किया था। कहा जाता है कि उत्पत्ति के समय 8 वर्ष की आयु की होने के कारण नवरात्र के आठवें दिन इनकी पूजा की जाती है। भक्तों के लिए यह अन्नपूर्णा स्वरूप हैं, इसलिए अष्टमी के दिन कन्याओं के पूजन का विधान है। यह धन, वैभव और सुख-शांति की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनका स्वरूप उज्जवल, कोमल, श्वेतवर्णा तथा श्वेत वस्त्रधारी है। यह एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू लिए हुए हैं। गायन और संगीत से प्रसन्न होने वाली ‘महागौरी’ सफेद वृषभ यानी बैल पर सवार हैं।


नवीं शक्ति ‘सिद्धिदात्री’ सभी सिद्धियां प्रदान करने वाली हैं, जिनकी उपासना से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कमल के आसन पर विराजमान देवी हाथों में कमल, शंख, गदा, सुदर्शन चक्र धारण किए हैं। सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप हैं, जो श्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महाज्ञान और मधुर स्वर से भक्तों को सम्मोहित करती हैं।



-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)





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मां के जयकारे के साथ मंदिरों में जुटे श्रद्धालु, जानिए नवरात्र में किस राशि पर पड़ेगा क्या असर

नई दिल्‍ली :  मां के नौ स्वरूपों के गुणगान का पर्व नवरात्र गुरुवार से शुरू हो गया है। मंदिरों में मां भवानी का दरबार सज चुका है। प्रतिबंधों के साथ ही मां के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की पंक्ति लगनी शुरू हो गई हैं। सिद्धपीठ चौक की छोटी व बड़ी काली जी मंदिर के पास मेला नहीं लगाया गया है। वहीं मंदिर के आसपास दुकानों को भी लगने नहीं दी गई हैं। उधर, बाजार में कलश के साथ ही चुनरी व पूजन सामग्री की दुकानें भी सज गई हैं। लोग मंदिरों में दर्शन के लिए जुटने लगे हैं।

चौक के बड़ी व छोटी काली जी मंदिर में प्रवेश के लिए गोले बन गए हैं जिस पर खड़े होकर श्रद्धालु दर्शन करेंगे। वहीं दूसरी ओर मंदिरों में घंटा बजाने और ज्योति जलाने पर प्रतिबंध है। साथ ही मां के गर्भगृह में जाने पर रोक लगाई गई है। बड़ी काली जी मंदिर के व्यवस्थापक राजा पांडेय व रमेश रस्तोगी ने बताया कि पीछे का गेट खोल दिया गया है, जहां दर्शन के बाद श्रद्धालु वापस जाएंगे। रानीकटरा के संकटा देवी मंदिर में भी प्रतिबंधों के साथ दर्शन किए जा रहे हैं। मंदिरों में भक्‍तों की कतारें लगी हुई हैं। लोग कोविड प्रोटोकला का पालन कर रहे हैं। वहीं कई मंदिरों में भीड़ ज्‍यादा होने की वजह से गाइडलाइन का सही से पालन नहीं किया जा रहा। 

चौपटिया के संदोहन देवी मंदिर में भी प्रतिबंधों के बीच दर्शन होंगे। अध्यक्ष कमल मेहरोत्रा ने बताया कि पुजारी प्रसाद नहीं चढ़ाएंगे। शारीरिक दूरी के साथ श्रद्धालु मां के दर्शन करेंगे और खुद प्रसाद चढ़ाएंगे। बच्चों और बुजुर्गो के प्रवेश पर रोक रहेगी। आनंदी माता मंदिर, शास्त्रीनगर श्री दुर्गा मंदिर, मां पूर्वी देवी मंदिर ठाकुरगंज, संतोषी माता मंदिर के साथ ही पक्का पुल स्थित मरी माता मंदिर, राजेंद्र नगर के महाकाल मंदिर समेत राजधानी के सभी दुर्गा मंदिरों में नवरात्र पर सुरक्षा के साथ दर्शन के इंतजाम होंगे। 

आचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि राशि के अनुसार मां की कृपा बरसती । जैसी राशि होती है वैसी ही कृपा बरसती है। कुछ राशि वाले को फायदा होता तो कुछ को सतर्क रहने की जरूरत होती है। ऐसे में नवरात्र में किस राशि पर क्या असर पड़ेगा वह इस प्रकार है। 

  • मेष-आर्थिक हानि ।
  • वृष- धन लाभ ।
  • मिथुन- कुटुम्ब में मांगलिक कार्य व सुख की वृद्धि ।
  • कर्क- मानसिक कष्ट हो सकते है ।
  • सिंह- रोग भय शिव व शक्ति की आराधना करें ।
  • कन्‍या-शत्रुओं पर विजय व यश कीर्ति की वृद्धि ।
  • तुला-स्त्री सुख व व्यापार में वृद्धि
  • वृश्चिक - रोग भय व मानसिक कष्ट के योग ।
  • धनु- धर्म कार्य में रुचि व आकस्मिक धन लाभ ।
  • मकर-सन्तान प्राप्ति व व्यापार वृद्धि के योग ।
  • कुंभ- धन लाभ यात्रा के योग व व्यापार की वृद्धि ।
  • मीन-व्यय की अधिकता शारीरिक कष्ट हो सकते है ।


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हर महिला को बोलने चाहिए माँ दुर्गा के ये 4 मंत्र, घर-परिवार में होगी उन्नति

हर महिला को बोलने चाहिए माँ दुर्गा के ये 4 मंत्र, घर-परिवार में होगी उन्नति


हर महिला की यही कोशिश होती हैं कि उसके घर परिवार में सब कुछ अच्छा चले. माँ दुर्गा इस काम में आपकी मदद अवश्य कर सकती हैं. माता रानी के पास असीम शक्तियों का खजाना होता हैं. ऐसे में यदि आप माँ के समक्ष कुछ ख़ास मंत्रों का जाप करते हैं तो आपके घर की सभी परेशानियाँ समाप्त हो जाती हैं. 


पहला मंत्र


सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।


इस मंत्रा का उच्चारण आप मंगलवार की सुबह दुर्गा माँ की प्रतिमा के सामने करे. इस दौरान महिलाएं लाल या पीले रंग की साड़ी पहने और जमीन पर आसन बिछा उसपर बैठ जाए. इसके बाद माँ दुर्गा के सामने घी का दीपक प्रज्वलित करे. इसके साथ ही दीपक को हाथ में लेकर इस मंत्र का उच्चारण 7 बार करे.


दूसरा मंत्र


ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।


ये मंत्र आप सप्ताह में किसी भी दिन बोल सकते हैं. इसे आप माँ दुर्गा की आरती करने के पूर्व और आरती समाप्त होने के बाद दोनों समय बोले. ऐसा करने से आपके मन की मुराद माँ दुर्गा के पास शीघ्र पहुंचेगी.


तीसरा मंत्र


या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।


यह मंत्र आप मंगलवार या गुरुवार के दिन जपे. इसे आप सामान्य तरीके से माँ दुर्गा के समक्ष बैठकर दिन में कभी भी और कितनी भी बार जप सकते हैं.


चौथा मंत्र


नवार्ण मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै’ 


इस मंत्र का उच्चारण आपको कम से कम 51 बार करना हैं. इससे ज्यादा बार भी इसका जाप किया जा सकता हैं. इस मंत्र में बहुत शक्ति होती हैं. इसे महिलाओं के साथ घर के पुरुष भी जप सकते हैं. ये पुरे परिवार के हित में कार्य करता हैं.


इन चार मंत्र जिनका जाप आप सभी को अवश्य करना चाहिए. इन मंत्रों को आप एक ही दिन या अलग अलग समय पर दोनों ही तरीकों से जप सकते हैं. ये मंत्र आपके घर में पॉजिटिविटी बढ़ने का कार्य भी करेंगे. इनके प्रयोग से घर की बरकत भी बनी रहेगी. साथ ही धन अवाक के नए मार्ग खुल जाएंगे.






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देवताओं के तेज से प्रकट हुई थीं महादुर्गा, जानिए कहां से मिले उन्हें अस्त्र-शस्त्र

महादुर्गा पार्वती का दूसरा नाम है। हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। पुराण में महादुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। महादुर्गा असल में शिव की पत्नी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने लिया था। इस तरह महादुर्गा युद्ध की देवी हैं। देवी दुर्गा के स्वयं कई रूप हैं।

 

मुख्य रूप उनका गौरी है, अर्थात शान्तमय, सुन्दर और गोरा रूप। उनका सबसे भयानक रूप काली है, अर्थात काला रूप। विभिन्न रूपों में महादुर्गा भारत और नेपाल के कई मन्दिरों और तीर्थस्थानों में पूजी जाती हैं। कुछ दुर्गा मन्दिरों में पशुबलि भी चढ़ती है। भगवती दुर्गा की सवारी शेर है। 

 

एक बार महिषासुर नामक असुरों के राजा ने अपने बल और पराक्रम से देवताओं से स्वर्ग छिन लिया। जब सारे देवता भगवान शंकर व विष्णु के पास सहायता के लिए गए। पूरी बात जानकर शंकर व विष्णु को क्रोध आया तब उनके तथा अन्य देवताओं से मुख से तेज प्रकट हुआ, जो नारी स्वरूप में परिवर्तित हो गया। 

 

शिव के तेज से देवी का मुख, यमराज के तेज से केश, विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से वक्षस्थल, सूर्य के तेज से पैरों की अंगुलियां, कुबेर के तेज से नाक, प्रजापति के तेज से दांत, अग्नि के तेज से तीनों नेत्र, संध्या के तेज से भृकुटि और वायु के तेज से कानों की उत्पत्ति हुई।

 

इसके बाद देवी को शस्त्रों से सुशोभित भी देवों ने किया। देवताओं से शक्तियां प्राप्त कर महादुर्गा ने युद्ध में महिषासुर का वध कर देवताओं को पुनः स्वर्ग सौंप दिया। महिषासुर का वध करने के कारण उन्हें ही महादुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है।

 

देवताओं ने दिए माता दुर्गा को शस्त्र

देवी भागवत के अनुसार, शक्ति को प्रसन्न करने के लिए देवताओं ने अपने प्रिय अस्त्र-शस्त्र सहित कई शक्तियां उन्हें प्रदान की। इन सभी शक्तियों को प्राप्त कर देवी मां ने महाशक्ति का रूप ले लिया-


1. भगवान शंकर ने मां शक्ति को त्रिशूल भेंट किया।

2. भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र प्रदान दिया।

3. वरुण देव ने शंख भेंट किया।

4. अग्निदेव ने अपनी शक्ति प्रदान की।

5. पवनदेव ने धनुष और बाण भेंट किए।

6. इंद्रदेव ने वज्र और घंटा अर्पित किया।

7. यमराज ने कालदंड भेंट किया।

8. प्रजापति दक्ष ने स्फटिक माला दी।

9. भगवान ब्रह्मा ने कमंडल भेंट दिया।

10. सूर्य देव ने माता को तेज प्रदान किया।

11. समुद्र ने मां को उज्जवल हार, दो दिव्य वस्त्र, दिव्य चूड़ामणि, दो कुंडल, कड़े, अर्धचंद्र, सुंदर हंसली और अंगुलियों में पहनने के लिए रत्नों की अंगूठियां भेंट कीं।

12. सरोवरों ने उन्हें कभी न मुरझाने वाली कमल की माला अर्पित की।

13. पर्वतराज हिमालय ने मां दुर्गा को सवारी करने के लिए शक्तिशाली सिंह भेंट किया।

14. कुबेर देव ने मधु (शहद) से भरा पात्र मां को दिया।




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इन पांच लोगों को खिलाएं खाना, रहेगी स्थिर लक्ष्मी

हमारें जीवन में कई उतार चढ़ाव आते है जिससे की लोग बहुत दुखी होते है और कुछ लोग उस समस्या का निजात निकाल कर उससे निकल जाते है। इस दुनिया में बहुत कम लोग है जो अपने जीवन से खुशी है। किसी न किसी को की न कोई समस्या है।


अमीर के पास धन होते हुए भी और धन की ललसा और एक गरीब के पास धन न होते हुए सिर्फ पेट की भुख मिटाने तकी ललसा। हम माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए क्या नही करते है। तरह-तरह के उपाय अपनाते है जिससे कि माता लक्ष्मी हमारे घर से कभी न जाएं।


हिंदू धर्म के शास्त्रों में कई ऐसे उपाय बताए गें है जिनका आमरण करे तो हम सफलता ही हर ऊचांई को छूते चले जाएगे। शास्त्रों में दी गई बातें हमें कभी निराश नही कर सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में भोजन के बारें में की बातें बताई गई है। इसके अनुसार जब भोजन करते है तो उससे पहले हमें इन लोगों के लिए भोजन जरूर निकालना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से माता लक्ष्मी हमारें घर से कभी नही जाएगा। 


एक उपाय तो ये है कि हम अपनी मेहनत से और स्वयं की समझदारी से इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास करें और दूसरा उपाय यह है कि हम धार्मिक कर्म करें। शास्त्रों में पांच लोग ऐसे बताए गए हैं, जिन्हें खाना खिलाने से हमारे जीवन की सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं। जानिए वह कौन पांच लोग है। जिससे आपको अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी।


किन लोगों को खिलाना चाहिए खाना...


गाय को खिलाएं रोटी

हिंदू धर्म में गाय को माता समान माना जाता है। यह पुज्नीय भी है। हमारें शास्त्रों में कहा गया है कि जब भी हम खाना बनाएं उसके बाद सबसे पहले एक रोटी गाय को खिलाएं। माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति किसी गाय को रोटी या हरी घास रोज खिलाता है तो उसे जल्द ही कोई अच्छा फल मिलता है साथ ही कई गुना पुण्य भी मिलता है। साथ ही कुंडली में लगे कई दोष ही शांत हो जाते है। और घर में माता लक्ष्मी का वास हो जाता है। इसलिए एक रोटी जरुर खिलाना चाहिए।


कुत्तें को खिलाएं रोटी

अगर आपको अपने शत्रु का भय सता रहा हो जिसके कारण आप उससे डर कर रह रहे है। तो रोज एक रोटी कुत्ते को खिलाएं। इससे आपका शत्रु का भय खत्म हो जाएगा। और आप निडर हो कर रह सकेगे। साथ ही अगरा पकी कुंडली में शनि का दोष है तो शिवार के दिन काले रंग के कुत्तें को रोटी खिलाएं। इससे आपको जल्द फायदा मिलेगा। और शनि दोष शांत होगा। माता लक्ष्मी आपके घर हमेशा के लिए आ जाएगी।


मछली को खिलाएं आटे की गोली

शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि अगर आपकी पुरानी संपत्ति हाथ से निकल गई हो या फिर कोई मुल्यवान चीज खो गई हो तो रोज तालाब या नदी में जाकर मछलियों को आटे की गोलियां बनाकर खिलाएं। ऐसा करने से आपकी पुरानी संपत्ति वापस मिल जाएगी। साथ ही माता लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहेगी। जिसके कारण आपके घर में कभी भी धन की कमी नही होगी। साथ ही आपको अक्षय पुण्य की प्राप्त होगा।


चीटियों को डालें आटा

अगर आप बहुत ज्यादा परेशान है। आपको हर काम में असफलता मिल रही है जिसके कारण आप कर्ज में डूबते चले जा रहे है। जिसके कारण आप तनाव में चले जाते है। शास्त्रों में माना जाता है कि अगर आप अपने घर में निकलने वाली चीटियों को आटा या चीनी डालेगे। जो इससे आपको अधिक फायदा होगा। इससे हमें सभी कर्ज से मुक्ति मिल जाएगी। साथ ही घर में कभी भी धन की कमी नही होगी।


पक्षियों को खिलाएं अनाज

शास्त्रों के अनुसार माना गया है कि अगर आपके घर में आर्थिक लाभ न हो रहा हो। हर काम में असफलता प्राप्त हो रही हो तो इस समस्या से निजात आपको पक्षी दिला सकते है। इसके लिए रोज पक्षियों को दाना डालें जिससे महालक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहेगी। और काम में आपको सफलता प्राप्त होगी।




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सम्राट मिहिर भोज गुर्जर-प्रतिहार थे, लेकिन भाजपा ने उनकी जाति बदल दी : अखिलेश यादव

लखनऊ : समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रविवार को सम्राट मिहिर भोज की जाति को लेकर उपजे विवाद में दखल देते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर निशाना साधा और कहा कि सम्राट मिहिर भोज गुर्जर-प्रतिहार थे लेकिन पार्टी के नेताओं ने उनकी जाति ही बदल दी, यह निंदनीय है।


सपा प्रमुख ने रविवार को ट्वीट किया, '''इतिहास में पढ़ाया जाता रहा है कि सम्राट मिहिर भोज गुर्जर-प्रतिहार थे, पर भाजपाइयों ने उनकी जाति ही बदल दी है। निंदनीय!'' यादव ने कहा, ''छल वश भाजपा स्थापित ऐतिहासिक तथ्यों से जानबूझ कर छेड़छाड़ व सामाजिक विघटन कर किसी एक पक्ष को अपनी तरफ करती रही है। हम हर समाज के मान-सम्मान के साथ हैं!''


गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा 22 सितंबर को दादरी के मिहिर भोज पीजी कॉलेज में सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण के दौरान शिलापट्ट से गुर्जर शब्द हटाने को लेकर शुक्रवार को गुर्जर समाज के लोग विरोध में उतर आए।


दादरी के मिहिर भोज पीजी कॉलेज में सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण को लेकर गुर्जर और राजपूत (क्षत्रिय) समाज आमने सामने थे। हालांकि, मुख्यमंत्री के दौरे से पहले दोनों समुदाय के प्रतिनिधियों ने एक मंच पर आकर विवाद खत्म कर दिया था। इसके बाद प्रतिमा अनावरण के लिए लगने वाले शिलापट्ट पर गुर्जर शब्द को लेकर राजनीति शुरू हो गई।


मुख्यमंत्री योगी के जाने के बाद लोगों की भीड़ शिलापट्ट से गुर्जर शब्द हटा देखकर भड़क गई। आक्रोशित भीड़ ने जमकर हंगामा किया और दादरी विधायक तेजपाल नागर के खिलाफ नारेबाजी की। अब समुदाय के लोगों ने गुर्जर शब्द हटाने के विरोध में रविवार को महापंचायत का एलान किया है। अखिल भारतीय गुर्जर फ्रंट के अध्यक्ष नवीन भाटी ने बताया कि शिलापट्ट से गुर्जर शब्द हटाकर समुदाय के लोगों के साथ धोखा किया गया है।






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तो इस तरह भगवान बुद्ध ने अपने शिष्‍यों को ज्ञान का महत्‍व समझाया

एक दिन गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं को तंबाधातिका के बारे में बताया। तंबाधातिका 55 सालों तक एक राज्य का जल्लाद रहा। सेवानिवृत्ति के बाद एक दिन तंबाधातिका ने खिचड़ी बनाई और नहा-धोकर खिचड़ी थाली में डाली। वह खिचड़ी खाने ही वाला था कि दरवाजे पर भिक्षु सारिपुत्त पहुंचे। सारिपुत्त ध्यान से उठे ही थे और उन्हें जोरों की भूख लगी थी। तंबाधातिका ने सोचा कि जीवन भर उसने हत्याएं की हैं, आज पुण्य का मौका हाथ लगा है। उसने भिक्षु को अंदर बुलाया और उनके सामने खिचड़ी रख दी।


भोजन करने के बाद भिक्षु ने उसे धम्म का उपदेश दिया। लेकिन तंबाधातिका ने नहीं सुना, क्योंकि उस दौरान वह अपना जल्लाद का जीवन याद कर रहा था। भिक्षु सारिपुत्त ने उससे पूछा कि क्या वह चोरों को मारना चाहता था या इसलिए मारा क्योंकि राजा ने आदेश दिया था। तंबाधातिका ने कहा कि उसने बस आज्ञा का पालन किया अन्यथा उसकी उन्हें मारने की कोई इच्छा नहीं थी। तब भिक्षु ने पूछा, ‘अगर ऐसा है, तो आप दोषी होंगे या नहीं?’ तंबाधातिका ने सोचा कि चूंकि वह बुरे कामों के लिए जिम्मेदार नहीं था, तो वह दोषी नहीं था। इसके बाद वह शांत हो गया और भिक्षु ने उपदेश पूरा किया। जब वह भिक्षु को विदा करके लौटा तो उसकी मौत हो गई।


बुद्ध ने भिक्षुओं को बताया कि इस तरह से तंबाधातिका को मोक्ष प्राप्त हुआ। भिक्षु दुविधा में पड़ गए। उन्होंने बुद्ध से पूछा कि जीवन भर हत्याएं करने वाले को भला मोक्ष कैसे मिल सकता है? बुद्ध मुस्कुराए और बोले, ‘तंबाधातिका ने अंत समय में ज्ञान प्राप्त कर लिया था। भिक्षु सारिपुत्त ने उनके पूरे जीवन में पहली बार ज्ञान के शब्द कहे, जिसे उन्होंने समझ लिया था कि ज्ञान ही तो मोक्ष है।’ बुद्ध बोले, ‘बिना ज्ञान का हजार शब्दों का उपदेश बेकार है और जिस एक शब्द से मन शांत हो जाए, वह सबसे बड़ा ज्ञान है।’


संकलन : करुणा मौर्य




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नरेंद्र गिरि : बुधऊ से महंत बनने तक का सफर

प्रयागराज (यूपी) : नरेंद्र गिरि, जिन्हें प्यार से बुधऊ के नाम से जाना जाता था, का जन्म उत्तर प्रदेश के फूलपुर जिले के चटौना गांव में हुआ था। उनके पिता भानु प्रताप सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सक्रिय सदस्य थे।


उनके एक रिश्तेदार का कहना है कि उन्हें बचपन में मजाकिया अंदाज में बुद्धू बोला जाता था, जो कि समय के साथ बुधऊ में बदल गया। बुधऊ ने अपने शुरुआती साल गिरदकोट गांव में अपने नाना के यहां बिताए। वह अक्सर स्थानीय संतों और महंतों के साथ घुलमिल जाते थे।


एक दिन, वह घर से भाग गए और उन्हें वापस लाने के लिए उनके परिवार के सदस्यों की ओर से बहुत प्रयास किया गया। परिवार ने उन्हें हाई स्कूल पूरा करने के लिए मना लिया, जिसकी पढ़ाई उन्होंने पूरी की। बाद में उन्हें एक बैंक में नौकरी मिल गई।


जैसे ही उनकी शादी की चर्चा परिवार में होने लगी, तो बुधऊ जो कि अब नरेंद्र के नाम से जाने जाते थे, फिर से घर से भाग गए और फिर वापस नहीं आए।


उनके मामा, महेश सिंह ने याद करते हुए कहा, एक दिन हमारे पास एक फोन आया और फोन करने वाले ने कहा, मैं महंत नरेंद्र गिरी बोल रहा हूं। फिर हमने महसूस किया कि हमारा बुधऊ अब एक महंत बन चुका है।


एक महंत के रूप में, नरेंद्र गिरि केवल एक बार अपने घर आए और परिवार ने उन्हें एक संत के रूप में सम्मान दिया।


उनके चाचा ने कहा कि संत बनने के बाद नरेंद्र गिरि ने परिवार से अपने सभी संबंध तोड़ लिए।


महेश सिंह कहा, वह अक्सर पास के एक कॉलेज में होने वाले कार्यक्रमों में शामिल होते थे, लेकिन उन्होंने कभी घर जाने की जहमत नहीं उठाई। उन्होंने कभी भी अपने परिवार के सदस्यों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश नहीं की और वह अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति थे। निश्चित रूप से वह आत्महत्या करने वाले व्यक्ति तो नहीं थे।


2016 में नरेंद्र गिरि को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का प्रमुख नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने काफी प्रतिष्ठा पाई।


संतों के साथ-साथ सभी राजनीतिक नेताओं द्वारा उनका सम्मान किया जाता था।


अपने शिष्य आनंद गिरि के साथ उनका विवाद ही एकमात्र विवाद था, जिसने उनकी अन्यथा त्रुटिहीन छवि को प्रभावित किया।


सूत्रों के मुताबिक, विवाद कुछ जमीन सौदों का नतीजा था, जिसके कारण उनके शिष्यों के साथ झड़पें हुईं।


मौद्रिक मुद्दे भी सामने आए हैं, क्योंकि बाघंबरी मठ को सबसे धनी मठों में से एक माना जाता है, जिसके पास अपार संपत्ति है।

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पितृ पक्ष: पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का पर्व

अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन के साथ ही गणेशोत्सव का समापन हो जाता है और उसके अगले दिन से पितृ पक्ष शुरू होता है, जो प्रायः भाद्रपद माह की पूर्णिमा से शुरू होकर पितृमोक्षम अमावस्या तक कुल 15 दिनों का होता है। हालांकि हिन्दू पंचाग के अनुसार तृतीया तिथि बढ़ने और 26 सितम्बर को पितृ पक्ष की कोई तिथि नहीं होने के कारण इस बार पितृ पक्ष 17 दिन के हैं, 20 सितम्बर को शुरू होने के बाद जिनका समापन 6 अक्तूबर को अमावस्या के दिन होगा।


वैसे शास्त्रों में पितृ पक्ष का बढ़ना अच्छा नहीं माना जाता। हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष को बहुत अहम माना गया है लेकिन इस दौरान शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। पितृ पक्ष में सगाई, विवाह, मुंडन, गृहप्रवेश, परिवार के लिए महत्वपूर्ण चीजों की खरीददारी, नए कपड़े खरीदना, कोई नया कार्य शुरू करना इत्यादि कोई भी शुभ कार्य करना अच्छा नहीं माना जाता। पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद कर उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण करते हैं।


दरअसल हिन्दू धर्म में मृत्यु के पश्चात् पितरों की याद में श्राद्ध किया जाता है और उनकी मृत्यु की तिथि के अनुसार ही श्राद्ध की तिथि निर्धारित की जाती है। वैसे हिन्दू धर्म के अलावा ईसाई, इस्लाम और बौद्ध धर्म में भी अपने पूर्वजों को याद रखने की प्रथा है। पश्चिमी जगत में जहां पूर्वजों की स्मृति में मोमबत्तियां जलाने की प्रथा है, वहीं ईसाई धर्म में व्यक्ति के निधन के चालीस दिनों पश्चात् सामूहिक भोज की रस्म की जाती है। इस्लाम में चालीस दिनों बाद कब्र पर फातिहा पढ़ने और बौद्ध धर्म में भी पूर्वजों की याद में कुछ ऐसे ही प्रावधान देखने को मिलते हैं।


श्राद्ध का अर्थ होता है ‘श्रद्धापूर्वक’। हमारे संस्कारों और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने को ही श्राद्ध कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो दिवंगत परिजनों को उनकी मृत्यु तिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया जाना जाना ही श्राद्ध है। ब्रह्मपुराण के अनुसार उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम जो भी वस्तु उचित विधि द्वारा श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दी जाए, वह श्राद्ध कहलाता है। पितृ पक्ष को हिन्दू धर्म में महालय या कनागत के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान, तर्पण कर्म और ब्राह्मण को भोजन कराने से पूर्वज प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। पिंडदान करने के लिए हरिद्वार और गया को सर्वोत्तम माना गया है। प्राचीन हिन्दू धर्म ग्रंथों और धार्मिक परम्पराओं में पितृपक्ष के अलावा भी श्राद्ध का उल्लेख मिलता है। धर्मसिन्धु में तो श्राद्ध के लिए वर्षभर की सभी 12 अमावास्याओं, 4 पुणादि तिथियों, 14 मन्वादि तिथियों, 12 संक्रांतियों, 12 वैधृति योग, 12 व्यतिपात योग, 15 पितृपक्ष, 5 अष्टका, 5 अन्वष्टका और 5 पूर्वेद्यु अर्थात् 96 कालखंड का विवरण मिलता है किन्तु पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म करने का महत्व सर्वाधिक माना गया है। पूर्वजों के निधन की तिथि के अनुसार पितृपक्ष के दौरान उनका श्राद्ध कर्म किया जाता है लेकिन पारम्परिक अवधारणाओं के अनुसार अगर किसी पितर की मृत्यु तिथि मालूम नहीं है तो उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है, जिसे ‘सर्व पितृ अमावस्या’ भी कहा जाता है। जिन परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उन सभी का श्राद्ध इस दिन किया जा सकता है।


हिन्दू धर्म में मान्यता है कि पितृ पक्ष के दिनों में यमराज आत्मा को मुक्त कर देते हैं ताकि वे अपने परिजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। ऐसी ही मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दिनों में पितर नीचे पृथ्वी पर आते हैं और बिना किसी आह्वान के अपने वंशजों के घर किसी भी रूप में जाते हैं। ऐसे में यदि उन्हें तृप्त नहीं किया जाए तो उनकी आत्मा नाराज होकर अतृप्त लौट जाती है। माना गया है कि यदि पितर नाराज हो जाएं तो जिंदगी मुसीबतों से भर जाती है। इसलिए शास्त्रों में पितरों का श्राद्ध विधिपूर्वक करना जरूरी बताया गया है। मान्यता है कि यदि पितर खुशी-खुशी वापस जाते हैं तो अपने वंशजों को दिए गए उनके आशीर्वाद से घर-परिवार में सुख-समृद्धि में बढ़ोतरी होती है। जिंदगी में सफलता के लिए मेहनत, किस्मत, ईश्वरीय की कृपा के साथ-साथ पूर्वजों का आशीर्वाद भी बेहद जरूरी होता है और धर्म एवं ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पूर्वजों को सम्मान देने से वे प्रसन्न होते हैं तथा पूरे परिवार पर कृपा करते हैं। इसीलिए हमारे दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण-श्राद्ध किया जाता है। पितृ पक्ष में पितरों को जल देने की विधि को तर्पण कहा जाता है।


पितृ दोष को ज्योतिष शास्त्र में अशुभ फल देने वाला माना गया है और शास्त्रों के अनुसार पितृ पक्ष में पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष से आने वाली परेशानियां दूर होती हैं तथा पितरों का आशीर्वाद मिलता है। देव ऋण, ऋषि ऋण तथा पितृ ऋण का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है और पितृ पक्ष में माता-पिता के प्रति तर्पण करके श्रद्धा व्यक्त की जाती है क्योंकि पितृ ऋण से मुक्त हुए बिना जीवन निरर्थक माना जाता है। सनातन धर्म के अनुसार देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से मुक्ति पाए बिना व्यक्ति का पूर्ण कल्याण होना असंभव है। ऋषि ऋण से स्वाध्याय के जरिये, देवऋण से यज्ञ के जरिये और पितृ ऋण से श्राद्ध तथा तर्पण द्वारा मुक्ति प्राप्त हो सकती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितरों से संबंधित कार्य करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। महर्षि वेद व्यास के अनुसार जो व्यक्ति श्राद्ध द्वारा अपने पितरों को संतुष्ट करता है, वह पितृ ऋण से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है।


मत्स्य पुराण में नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य, इन तीन प्रकार के श्राद्ध का उल्लेख मिलता है जबकि यमस्मृति में नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पार्वण नामक पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है। भविष्य पुराण और विश्वामित्र स्मृति के अन्तर्गत बारह प्रकार के श्राद्धों का वर्णन हैं, जिनमें नित्य, नैमित्तिक, काम्यम, वृद्धि, सपिण्ड, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धयर्थ, कर्मांग, दैविक, यात्रार्थ और पुष्ट्यर्थ शामिल हैं। भविष्यपुराण के अनुसार प्रतिदिन किए जाने वाले श्राद्ध को ‘नित्य श्राद्ध’, वार्षिक तिथि पर किए जाने वाले श्राद्ध को ‘नैमित्तिक श्राद्ध’, किसी कामना के लिए किए जाने वाले श्राद्ध को ‘काम्य श्राद्ध’, किसी मांगलिक अवसर पर किए जाने वाले श्राद्ध को ‘वृद्धि श्राद्ध’, पितृपक्ष, अमावस्या एवं तिथि आदि पर किए जाने वाले श्राद्ध को ‘पार्वण श्राद्ध’, त्रिवार्षिक श्राद्ध, जिसमें प्रेतपिण्ड का पितृपिण्ड में सम्मिलन कराया जाता है, उसे ‘सपिण्ड श्राद्ध’, पारिवारिक या स्वजातीय समूह में किए जाने वाले श्राद्ध को ‘गोष्ठी श्राद्ध’, शुद्धि हेतु किए जाने वाले श्राद्ध को ‘शुद्धयर्थ श्राद्ध’, षोडष संस्कारों के निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध को ‘कर्मांग श्राद्ध’, देवताओं के निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध को ‘दैविक श्राद्ध’, तीर्थ स्थानों में किए जाने वाले श्राद्ध को ‘यात्रार्थ श्राद्ध’ तथा अपनी या पारिवारिक सुख-समृद्धि और उन्नति के लिए किए जाने वाले श्राद्ध को ‘पुष्ट्यर्थ श्राद्ध’ कहा गया है।


महर्षि जाबालि के अनुसार अपने पितरों का श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को पुत्र, आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य और इच्छित फल की प्राप्ति होती है। श्राद्ध पक्ष के दौरान दिन में सोना, असत्य भाषण, रति क्रिया, सिर और शरीर पर तेल, साबुन, इत्र आदि लगाना, मदिरापान करना, लड़ाई-झगड़ा, वाद-विवाद, अनैतिक कृत्य तथा किसी भी जीवधारी को कष्ट पहुंचाना निषेध माना गया है। पितृपक्ष को लक्ष्मी और ज्ञान की साधना के लिए उत्तम काल माना गया है। पितरों के निमित्त आयोजित किए जाने वाले पितृ पक्ष को आत्मबोध के लिए भी अति उत्तम तथा जीवन के संघर्ष को उत्कर्ष में परिवर्तित करने का समय माना गया है। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार श्रद्धा से किया गया श्राद्ध पूर्वजों तक पहुंचे या न पहुंचे लेकिन यह जीवन में उन्नति और प्रगति के द्वार अवश्य खोल सकता है।




-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)



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गुर्जर और राजपूत एक ही वंश के लोग हैं: इतिहासकार आचार्य वीरेन्द्र विक्रम

 नोएडा : सम्राट मिहिर भोज के नाम को लेकर हुआ विवाद खत्म होने के लिए मंगलवार को अखिल भारतीय वीर गुर्जर महासभा ने ग्रेटर नोएडा प्रेस क्लब में प्रेस वार्ता की। इस दौरान इतिहासकार आचार्य वीरेन्द्र विक्रम ने कहा कि गुर्जर और राजपूत एक ही परिवार की शाखाएं है। दोनों के वंशज भी एक ही है। राजपूतों का उद्भव तेरहवीं शताब्दी के बाद हुआ है, जबकि गुर्जर छठवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक भारत की सत्ता में रहे।

आचार्य वीरेंद्र विक्रम ने बताया कि दादरी में गुर्जर विद्या सभा द्वारा सम्राट मिहिर भोज की प्रतीमा स्थापित की जा रही है। यह सभी के लिए गौरव की बात है। सम्राट मिहिर भोज रघुवंशी सम्राट और गुर्जर प्रतिहार वंश के सबसे प्रतापी सम्राट थे। उन्होंने 53 वर्षों तक अखंड भारत पर शासन किया। उनकी पहचान समाज में गुर्जर सम्राट के नाम से ही है। 851 ईसवीं में भारत भ्रमण पर आए अरब यात्री सुलेमान ने उन्हें गुर्जर राजा और उनके देश को गुर्जर देश कहा है। सम्राट मिहिर भोज के पौत्र सम्राट महिपाल को कन्नड़ कवि पंप ने गुर्जर राजा लिखा है। उन्होंने बताया कि प्रतिहारों को कदवाहा, राजोर , देवली, राधनपुर, करहाड़, सज्जन, नीलगुंड, बड़ौदा के शिलालेखों में गुर्जर जाति लिखा है। भारत के इतिहास में 1300 ईसवीं से पहले राजपूत नाम की किसी भी जाति का कोई उल्लेख नहीं है। क्षत्रिय कोई जाति नहीं है, क्षत्रिय एक वर्ण है, जिसमें जाट, गुर्जर, राजपूत, अहीर (यादव ), मराठा आदि जातियां आती हैं। उन्होंने बताया कि हमारे सारे प्रमाण मूल लेखों, समकालीन साहित्य और शिलालेखों पर आधारित हैं। गुर्जर समन्वय समिति के राष्ट्रिय कार्यकारी अध्यक्ष डॉक्टर रूप सिंह गुर्जर ने बताया कि देश में सर्वप्रथम स्वामीनारायण संप्रदाय के अक्षरधाम मंदिर दिल्ली के भारत उपवन में सम्राट मिहिर भोज की मूर्ति स्थापित करवाई गई थी, वहां उनके नाम के समक्ष पट्टिका पर महाराज गुर्जर सम्राट मिहिर भोज लिखा है। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने लक्सर हरिद्वार और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कोटला मुबारकपुर दक्षिण दिल्ली में सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा गुर्जर लिखकर स्थापित करवाई है। अखिल भारतीय वीर गुर्जर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग गुर्जर ने बताया कि ग्वालियर और चंबल संभाग में आज भी गुर्जर समाज के गांवों मे गुर्जर प्रतिहार कालीन मंदिरों के अवशेष मौजूद हैं। इनमें बटेश्वर, नरेश्वर, बरहावली, डांग सरकार प्रमुख हैं। इस मौके पर गौरव तंवर, सतीश बैंसला, अनिल कसाना, मनीष भाटी आदि उपस्थित थे।




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गाय, गंगा व गांव हमारी सांस्कृतिक व धार्मिक धरोहर- महामंडलेश्वर भवानीनन्दन यति

गाजीपुर : सिद्धपीठ हथियाराम मठ एक तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित हो चुका है। जहां निरंतर लगातार 2 माह तक चलने वाले चातुर्मास महानुष्ठान के दौरान सहस्त्र चंडी तथा अतिरुद्र महायज्ञ के मंत्रोच्चारण से समूचा क्षेत्र अलौकिक शक्ति के प्रकाश से विद्यमान हो चुका है। लगातार पिछले 5 वर्षों से सिद्धपीठ हथियाराम मठ में चतुर्मास में अनुष्ठान का आयोजन किया जा रहा है। जबकि इससे पूर्व देश के कोने-कोने में स्थित भूत भावन बाबा विश्वनाथ के द्वादश ज्योतिर्लिंग तीर्थ स्थल क्षेत्रों सहित पशुपतिनाथ नेपाल, परली वैद्यनाथ महाराष्ट्र व अनेक तीर्थ स्थल पर इस यज्ञ का आयोजन हुआ।


इसी क्रम में श्री यति जी के 26वें चातुर्मास अनुष्ठान का समापन सिद्धपीठ हथियाराम मठ पर वैदिक विद्वानों के आचार्यत्व व बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं की उपस्थिति में किया गया।


इस अवसर पर संबोधित करते हुए महामंडलेश्वर स्वामी भवानीनंदन यति जी महाराज ने कहाकि यह धरती भगवान राम कृष्ण की धरती है। विश्व में सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका माना जाता है लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्धशाली होने का गौरव भारत को प्राप्त हुआ। जहां माता गंगा का वास हुआ। गाय, गंगा व गांव हमारी सांस्कृतिक व धार्मिक धरोहर है। लगभग 700 वर्ष प्राचीन सिद्धपीठ हथियाराम मठ तमाम ऐतिहासिक व धार्मिक धरोहर सहेजे हुए हैं। मां गंगा द्वारा प्रदत्त कटोरा इस मठ की एक अलौकिक धरोहर है। इसके साथ ही उन्होंने वाराणसी में मुगल शासन के दौरान बाबा विश्वनाथ मंदिर पर सिद्धपीठ द्वारा संचालित टेकरा के धर्माचार्य द्वारा किए गए शास्त्रार्थ का उल्लेख करते हुए कहा सिद्धपीठ के ब्रह्मलीन गुरुजनों के तेज बल व पुण्य प्रताप से मठ आज आध्यात्मिक जगत में एक मजबूत स्तंभ के रूप में स्थापित हुआ है। हम सभी सौभाग्यशाली हैं जिन्हें इस मठ की मिट्टी अपने माथे से लगाने का सौभाग्य प्राप्त होता है।


उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए ब्रह्मचारी संत डॉ रत्नाकर त्रिपाठी ने कहाकि सिद्धपीठ के संतो के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आदिसन्त मुरारनाथ जी द्वारा दातुन को फाड़कर जमीन में दबा देने के बाद एक बड़ा वृक्ष बलियां जनपद के नगरा स्थित झाड़ी गांव व एक वृक्ष मोहनियां बिहार के करगहर में विशाल वटवृक्ष का स्वरुप रूप अख्तियार कर लिया है।


डॉक्टर त्रिपाठी ने कहाकि बुढ़िया माई की कृपा से लकवा जैसे असाध्य रोग से ग्रसित लोग भी अपने पैरों पर चलकर जाते हैं। वहीं देश के कोने-कोने से वर्ष पर्यंत दर्शनार्थियों का आना-जाना व सिद्धपीठ द्वारा लोक कल्याण निमित्त निरंतर अनुष्ठान व महायज्ञ का आयोजन सिद्धपीठ सार्थकता को साबित करता है।


इस अवसर पर शंभू जी पाठक सतना, गंगोत्री सेवा समिति वाराणसी किशोरी रमण दुबे, आचार्य सुरेश जी त्रिपाठी, आचार्य संजय त्रिपाठी, आचार्य रामानन्द त्रिपाठी, पंडित सर्वेश पाण्डेय, डॉ मंगला प्रसाद सिंह कथाकार, डॉ कौस्तुभ भट्टाचार्य, संत अमरजीत महाराज, संत देवराहा बाबा, ब्लाक प्रमुख संतोष यादव, पूर्व ब्लाक प्रमुख शारदानंद राय, डॉ सुरेंद्र नाथ सिंह, हरिश्चंद्र सिंह, गोविंद यादव, वरुण सिंह, काशी विद्यापीठ ब्लाक प्रमुख प्रवेश पटेल, लौटू प्रसाद, चंदौली से भरथ सिंह, विनोद सिंह, हृदयनारायण सिंह, यशवंत सिंह, शैलेष बागी, चन्दन पाण्डेय, अभयानन्द यति, महेन्द्र सिंह, निक्कू सिंह, डॉ उदयभान सिंह सहित काफी बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।


बालिकाओं ने समवेत स्वर में किया गीता पाठ


सिद्धपीठ के ब्रह्मलीन संत व जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामंडलेश्वर पवहारी श्री बालकृष्ण यति जी महाराज द्वारा स्थापित कन्या महाविद्यालय की सैकड़ों छात्राओं ने समवेत स्वर में गीता पाठ का वाचन कर पूर्णाहुति समारोह को भावविभोर कर दिया। महाविद्यालय की छात्राओं द्वारा गीता पाठ को कंठस्थ कर आयोजन में वाचन से प्रसन्न होकर श्री यति जी महाराज ने घोषणा किया कि अगले वर्ष के चातुर्मास समारोह में गीता पाठ के सभी अध्याय का वाचन करने वाली छात्रा को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जाएगा।

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सूर्यदेव को प्रसन्न करना हो, तो रविवार को करें इस मंत्र से पूजा

रविवार सूर्य देव की पूजा का विशेष दिन है। अगर आपकी कुंडली में सूर्य का दोष है तो इस मंत्र के साथ पूजा जरुर करनी चाहिए। सूर्य देव बहुत ही जल्द प्रसन्न हो जाते है। जिससे सूर्य की कृपा व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। साथ ही, नौकरी और भाग्य संबंधी परेशानियां भी सूर्य पूजा से दूर हो सकती हैं।


हिंदू धर्म के शास्त्रों में सूर्य पूजा के लिए कई मंत्र बताए गए हैं, इन मंत्रों का जप सुबह-सुबह करना चाहिए। रविवार से शुरू करके हर रोज सूर्य मंत्रों का जप करें और सूर्य को जल अर्पित करें। ये उपाय सभी सुख प्रदान करने वाला माना गया है और सूर्य नमस्कार करने से बल, बुद्धि, विद्या, वैभव, तेज, ओज, पराक्रम व दिव्यता आती है। आपकी सभी परेशानियों से जल्द ही निजात मिल जाता है। जानिए रविवार के दिन किस तरह पूजा करनी चाहिए जिससे कि सूर्य भगवान जल्द ही आप पर प्रसन्न हो जाए।


ऐसे करें सूर्य देव को प्रसन्न:- रविवार को सुबह जल्दी उठकर स्नान करें इसके बाद किसी मंदिर या घर में ही सूर्य को जल अर्पित करे इसके बाद पूजन में सूर्य देव के निमित्त लाल पुष्प, लाल चंदन, गुड़हल का फूल, चावल अर्पित करें। गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई का भोग लगाएं और पवित्र मन से नीचें दिए हुए सूर्य मंत्र का जाप कर सकते हैं। यह मंत्र राष्ट्रवर्द्धन सूक्त से लिए गए है। साथ ही अपने माथें में लाल चंदन से तिलक लगाए।


ऊं खखोल्काय शान्ताय करणत्रयहेतवे।

निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे।।

त्वमेव ब्रह्म परममापो ज्योती रसोमृत्तम्।

भूर्भुवः स्वस्त्वमोङ्कारः सर्वो रुद्रः सनातनः।।


आप चाहें तो इस दूसरें मंत्र का जाप कर सकती है....


प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यम् रूपं हि मण्डलमृचोथ तनुर्यजूंषि।

सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम्।।


या फिर इस मंत्र का जाप करे-


उदसौ सूर्यो अगादुदिदं मामकं वचः।

यथाहं शत्रुहोऽसान्यसपत्नः सपत्नहा।।

सपत्नक्षयणो वृषाभिराष्ट्रो विष सहिः।

यथाहभेषां वीराणां विराजानि जनस्य च।।


इन मंत्रो का जाप करनें से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाएगी और घर में सुख-शांति आएगी। साथ ही घर में शांति रहेगी जिससे घर में कभी धन की कमी नही होगी।





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शनिदेव को सरसों के तेल चढ़ाने के पीछें है पौराणिक कथा, जानिए

शनिवार आता नही कि हम हर शनि मंदिर में देखते है कि शनि भगवान में उनके भक्त सरसों का तेल चढ़ा रहे होते है। जिसके कारण शनि भगवान की मूर्ति सरसों के तेल से डूब जाती है। उस समय हमारें दिमाग में यह बात जरुर आती होगी कि आखिर शनि भगवान को सरसों का तेल क्यो चढ़ाया जाता है। वो भी केवल शनिवार के दिन ही क्यों।


हिंदू धर्म के अनुसार माना जाता है कि शनि भगवान को तेल चढ़ाने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। ऐसा माना जाता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि अगर आापको साढ़े सती या ढय्या लगी हो तो हर शनिवार के दिन शनि मंदिर में जाकर सरसों का तेल और कालें तिल चढ़ाने चाहिए। इससे आपको शनि का कृपा मिलती है। जानिए सरसों का तेल चढ़ाने की पौराणिक कथा के बारें।


रामायण के अनुसार पौराणिक कथा:- हिंदू धर्म की ग्रंथ रामायण में इस बारें में विस्तार से लिखा है। इसके अनुसार रामायण काल में एक बार शनि देव को अपने बल और पराक्रम पर घमंड हो गया था। लेकिन उस काल में भगवान हनुमान के बल और पराक्रम की कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई थी। जब शनि देव को भगवान हनुमान के बारें में पता चला तो वह भगवान हनुमान से युद्ध करने के लिए निकल पड़े। जब भगवान शनि हनुमान के पास पहुचें तो देखा कि भगवान हनुमान एक शांत स्थान पर अपने स्वामी श्रीराम की भक्ति में लीन बैठे है।


शनिदेव ने उन्हें देखते ही युद्ध के लिेए ललकारा। जब भगवान हनुमान ने शनिदेव की युद्ध की ललकार सुनी तो वह शनि देव को समझाने लगे कि यह सही नही है। लेकिन शनिदेव ने एक बात न मानी और युद्ध के लिए अड़ गए। इसके बाद भगवान हनुमान शनिदेव के साथ युद्ध के लिए तैयार हो गे। अंत में दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ।


इस युद्ध में शनिदेव भगवान हनुमान से बुरी तरह हार गए। भगवान हनुमान के प्रहारों से शनिदेव का पूरा शरीर चुटहिल हो गया जिसके कारण उसमें दर्द होने लगा। इसके बाद भगवान ने शनिदेव को तेल लगाने के लिए दिया। जिससे उनका पूरा दर्द गायब हो गया। इसी कारण शनिदेव ने कहा जो भी मनुष्य मुझे सच्चे मन से तेल चढ़ाएगा। उसकी सभी पीडा हर लूंगा और सभी मनोकामनाएं पूर्ण करुगा।


इसीकारण तब से शनिदेव को तेल चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत हुई और शनिवार का दिन शनिदेव का दिन होता है। जिसके कारण इस दिन तेल चढ़ानें से जल्द आपकी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।




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विश्‍वास का तरीका बदलना होगा तभी भगवान को जान पाएंगे

मेरे आसपास के सभी लोग भगवान को मानते हैं, इसलिए मैं भी भगवान को मानता हूं। सब भगवान में अटूट विश्वास रखते हैं, इसलिए मैं भी रखता हूं। सब मंदिर जाते हैं, इसलिए मैं भी जाता हूं। जो सब कह रहे होते हैं या फिर जो सब कर रहे होते हैं, उसमें आपकी खोज तो कुछ भी नहीं, इसमें तो कोई गहरी बात नहीं। जिसने भगवान को अनुभव किया, उसने भगवान में श्रद्धा और विश्वास रखा! यदि उसने भी भेड़चाल की तरह दूसरों के कहने में आकर बिना भगवान को अनुभव किए उनके प्रति श्रद्धा अनुभव की या विश्वास किया तो यह ज्ञान सहित विज्ञान नहीं। फिर यह केवल मान्यता है, और मान्यता दौड़ाती बहुत है, पहुंचाती कहीं भी नहीं।


मानना और जानना, दोनों में बड़ा अंतर है। सब मानते हैं, इसलिए हम भी मानेंगे की प्रवृत्ति सही नहीं है। मानने से ऊपर उठकर हमें जानने में आना होगा। यदि हमने ईश्वर को दूसरों की देखा-देखी ही माना तो उनमें हमारा विश्वास आने-जाने वाला ही होगा। वह विश्वास हमेशा एक जैसा रहने वाला नहीं होगा। उस विश्वास में स्थायित्व की भावना का अभाव होगा। जब जीवन में सब ठीक चल रहा होता है तो मन में जो भी बनावटी विश्वास होते हैं, वे ठीक हैं और वे चल भी जाते हैं। लेकिन जब जीवन में परिस्थितियां उलटी-पुलटी हों, विपरीत हों, जो सोच कर चल रहे हों, वह हो ही न रहा हो तो उस समय यह जो ऊपर वाला विश्वास है, वह डगमगा जाएगा। इस ऊपर-ऊपर वाले विश्वास में कोई गहराई नहीं होती। इसकी सीधी वजह यह है कि यह विश्वास अनुभव के आधार पर नहीं होता, बल्कि सुनी-सुनाई बातों के कारण हो रहा होता है।


वैसे भी जो देखा न जा सके, उसमें विश्वास करना कठिन ही होता है। लेकिन उस परमात्मा को अनुभव करने की शक्ति भी हमारे ही अंदर निहित है। हम सब में परमात्मा का निवास है। तो सबसे पहले अपने विश्वास को नए तरीके से स्थापित करना होगा। उसको अपने अनुभव के आधार पर नया जन्म देना होगा और यह तब होगा जब यह भाव पक्का होगा कि कोई शक्ति तो है जो सारे विश्व को बड़ी बारीकी से और व्यवस्थित तरीके से चला रही है। कोई तो ताकत है जो हमारे शरीर को निरंतर गति दे रही है। कोई तो है, जिससे मेरे सहित पूरा ब्रह्मांड चल रहा है।


इस सार को अपने अंतरतम के भीतर उतर कर ही जाना जा सकता है। इसके लिए ध्यान है। ध्यान का अभ्यास अपने भीतर स्थित उसी ब्रह्म को जानने की प्रक्रिया है, जिससे हम चल रहे हैं, यह जगत चल रहा है। अपने अंदर उतरने के लिए हमें ध्यान करना होगा क्योंकि निरंतर ध्यान और प्रार्थना आपको उस शक्ति को अपने भीतर अनुभव करा देती है। तब किसी के कहने से विश्वास करने की जरूरत नहीं रह जाती है, बल्कि तब तो अपने अंदर खुद-ब-खुद विश्वास उत्पन्न हो जाता है!


जब विश्वास अंदर से अनुभव के आधार पर जन्म लेता है तो भारी से भारी दुख हो या कितनी भी उलटी-पुलटी परिस्थितियां हों, वह सबमें अडिग बना रहता है। इसलिए पहला कार्य और सारी कोशिश अपने भीतर उतरने की होनी चाहिए। फिर जैसा अंदर की आवाज कहे, वैसा करो। फिर जो भी घटेगा वह उचित होगा और वही हमारी जीवन यात्रा में सहायक होगा।


-सुरक्षित गोस्वामी-




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आपको कंगाल बना सकती हैं आपकी ही ये गलतियां

वास्तु जहां घर में खुशहाली, धन और वैभव बढ़ाता है वहीं इससे जुड़ी कुछ गलतियां कंगाली, दुख व दरिद्रता का कारण भी बन सकती हैं। जी हां, आपके द्वारा की गई कुछ गलतियां ही घर में वास्तु दोष का कारण बनते हैं, जिससे आपको कई तरह की समस्याओं को सामना करना पड़ता है और आज हम आपको उन्हीं के बारे में बताएंगे।


ना रखें खंडित मूर्ति: घर में भगवान की कोई ऐसी प्रतिमा ना रखें, जो खंडित हो या जिसका कोई अंग भंग हो चुका है। इसे नदी में विसर्जित कर दें। नहीं तो इससे धन संबंधित परेशानियां बढ़ जाएंगी।


तवा और कढ़ाई: इस्तेमाल करने के बाद तवा और कढ़ाई को सीधा ना रखें इससे राहुदोष बढ़ता है, जिससे न सिर्फ पैसों की किलल्त आती है बल्कि घर में भी कलह-कलेश का माहौल बना रहता है। हमेशा यूज के बाद इसे उलटा करके रखें।


शाम को झाड़ू लगाना गलत: सूरज डूबने के बाद झाड़ू ना लगाएं। इससे मां लक्ष्मी नाराज हो जाती है और घर की बरकत गायब हो जाती है। इसके अलावा झाड़ू को हमेशा ऐसी जगह रखें, जहां से वो किसी को नजर ना आए।


खराब नल भी है कारण: घर में कोई पानी नल या पाइप खराब से तो उसे ठीक करवाएं क्योंकि इससे धन संपति की हानि होती है। वहीं नहाने के बाद बाथरूम साफ जरूर करें। इससे राहू सही रहता है।


गलत दिशा में रखी अलमारी: घर के उत्तर-पूर्व कोने में अलमारी या तिजोरी रखने से भी धन हानि होने लगती है। अलमारी को हमेशा दक्षिण दिशा की दीवार से लगाकर रखें। इससे उसका मुंह उत्तर की ओर खुलेगा, जिससे धन में बढ़ौतरी होगी।


जूठे बर्तन ना रखें: बेडरूम में जूठे बर्तन ना रखें। इससे कंगाली के साथ परिवार की सेहत खराब होती है। बेड के नीचे जूते भी ना रखें। वहीं रात के समय भी शैंक में झूठे बर्तन नहीं रखने चाहिए क्योंकि इससे मां लक्ष्मी नाराज हो जाती है।


टूटा शीशा रखना गलत: अगर आपके घर में कोई शीशा टूटा हुआ है, उसमें दरार आ गई है या फिर खिड़की का कांच टूट गया है, तो इसे तुरंत बदल दीजिए। इससे न सिर्फ धन हानि होती है बल्कि इससे घर में नेगेटिव एनर्जी भी आती है।


कांटेदार पौधे लगाना: घर में ऐसे पौधे बि‍ल्कुल न लगाएं जो कांटेदार हो या फिर जिनमें से दूध निकलता हो। इस तरह के पौधे धन संबंधी परेशानियों के साथ-साथ अन्य समस्याओं का भी कारण बनते हैं।





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क्या हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म एक ही हैं?

गत 10 से 12 सितंबर तक एक ऑनलाइन वैश्विक संगोष्ठी आयोजित की गई जिसका विषय था "डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिन्दुत्व" (वैश्विक हिन्दुत्व का विनिष्टीकरण). इस संगोष्ठी को दुनिया भर के ऐसे 15 कार्यकर्ताओं और अध्येताओं ने संबोधित किया जो अपने-अपने देशों में हिन्दू राष्ट्रवाद के विभिन्न पहलुओं और उससे उपजी असहिष्णु राजनीति के विरूद्ध संघर्षरत हैं. इस संगोष्ठी के आयोजन में अमरीका के 52 विश्वविद्यालयों के 70 से अधिक विभागों ने भागीदारी की. पन्द्रह हजार से ज्यादा लोगों ने इस ऑनलाइन संगोष्ठी की कार्यवाही को देखने के लिए अपना पंजीकरण करवाया. जहां मुख्यधारा के भारतीय मीडिया ने इस बड़े कार्यक्रम का संज्ञान ही नहीं लिया वहीं सोशल मीडिया पर इसकी खूब चर्चा हुई.


संगोष्ठी के आयोजन की घोषणा होते ही हिन्दू राष्ट्रवादियों के अमरीकी संगठनों ने आयोजकों पर हल्ला बोल दिया. उनकी पूरी कोशिश थी कि यह आयोजन हो ही न सके. आयोजकों में शामिल अमरीकी विश्वविद्यालयों को हजारों ईमेल भेजे गए. यहां तक कि ईमेलों की इस बाढ़ के कारण एक विश्वविद्यालय का सर्वर ही ठप्प हो गया. इस संगोष्ठी के वक्ताओं की जमकर ट्रालिंग हुई. महिला वक्ताओं को यौन हमले की धमकियां दीं गईं. यहां यह महत्वपूर्ण है कि अमरीका में विश्व हिन्दू परिषद ऑफ अमेरिका सहित अनेक ऐसी संस्थाएं हैं जो आरएसएस से जुड़ी हुई हैं और जिनका वहां खासा प्रभाव है. 


संगोष्ठी के विरोधियों का तर्क था कि यह आयोजन हिन्दुओं पर हमला है. संगोष्ठी का असली ध्येय क्या है इस पर प्रकाश डालते हुए प्रतिष्ठित कवयित्री और लेखिका मीना कंडासामी ने कहा, "यह संगोष्ठी हमें यह समझने में मदद करने के लिए आयोजित की गई है कि किस तरह हिन्दुत्व, हिन्दू धर्म से अलग है और उसके लिए ही एक बड़ा खतरा है और कैसे इस कारण भारत की पहचान एक ऐसे देश के रूप में बन रही है जहां अप्रजातांत्रिक और असहिष्णु शक्तियों का बोलबाला है. हिन्दुत्व आज भारतीय राज्य की आधिकारिक विचारधारा बन गया है और इसके महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों और असहमति के अधिकार के लिए गंभीर निहितार्थ हैं."


संगोष्ठी के अधिकांश वक्ता विभिन्न अमरीकी विश्वविद्यालयों से थे. भारत से जाने-माने फिल्म निर्माता आनंद पटवर्धन और दलित कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने कार्यक्रम में महत्वपूर्ण योगदान दिया. जो लोग इस कार्यक्रम पर हमलावर थे उनका मुख्य तर्क यह था कि इसका उद्धेश्य हिन्दुओं का दानवीकरण करना है. बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग अमरीका में बस गए हैं और अलग-अलग प्रकार की नौकरियां और व्यापार-व्यवसाय कर रहे हैं. अमरीका में रह रहे हिन्दुओं का एक बड़ा तबका अलगाव के भाव से ग्रस्त है और इसी के चलते वह अपनी हिन्दू पहचान का ज्यादा से ज्यादा प्रदर्शन करना चाहता है. अप्रवासी भारतीयों के बीच संघ और उससे जुड़े संगठन अतिसक्रिय हैं. इन भारतीयों में से अनेक न केवल संघ की विचारधारा के जबरदस्त समर्थक हैं वरन् वे इन संगठनों को भारी धनराशि दान में देते हैं.


एनआरआई का यही तबका हाउडी मोदी जैसे आयोजनों के पीछे था. उनकी आपत्ति यह थी कि इस संगोष्ठी के जरिए हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है. यह साफ है कि इस संगोष्ठी का आयोजन हिन्दू धर्म का विरोध करने के लिए नहीं बल्कि हिन्दुत्व की राजनीति की समालोचना और विवेचना करने के लिए किया गया था. हिन्दुत्व एक राजनैतिक शब्द और अवधारणा है जिसका हिन्दू धर्म से कोई संबंध नही है. हिन्दुत्व शब्द को सन् 1890 के दशक में चन्द्रनाथ बसु ने गढ़ा था और इसे सबसे पहले चर्चा में लाने वाले थे वी. डी. सावरकर, जिन्होंने अपनी पुस्तक 'हिन्दुत्व ऑर हू इज ए हिन्दू' में इसकी विवेचना की थी.


सन् 1890 में इस शब्द के पहली बार प्रयोग किए जाने से हमें यह पता चलता है कि हिन्दू राष्ट्रवाद ने इसी काल में अंगड़ाई लेना शुरू किया था. यह वह काल था जब सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के चलते दलितों और महिलाओं ने सार्वजनिक जीवन में आना प्रारंभ किया था. इन दोनों तबकों की शिक्षा तक पहुंच बनने से समाज की सोच में परिवर्तन आने शुरू हुए. तब तक भारतीय समाज में सामंतवादी मूल्यों का बोलबाला था और महिलाओं व दलितों के बारे में तरह-तरह के जातिगत और लैंगिक पूर्वाग्रह व्याप्त थे. जैसे-जैसे सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया आगे बढ़ती गई वैसे-वैसे इन वर्गों का प्रभाव भी बढ़ता गया और अंततः इसी प्रक्रिया के नतीजे में सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अस्तित्व में आई. कांग्रेस, उदयीमान भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करती थी.


तेजी से हो रहे सामाजिक परिवर्तनों के कारण जिन वर्गों के रूतबे और शक्तियों में कमी आ रही थी उन्होंने धर्म के नाम पर राजनीति शुरू कर दी ताकि अपने धर्म के गौरव के बहाने वे उस पुराने सामाजिक ढ़ांचे को पुनर्स्थापित कर सकें जिसमें उनका बोलबाला था. यही वह समय था जब भारत में हिन्दू राष्ट्रवाद और मुस्लिम राष्ट्रवाद की विचारधाराओं ने जड़ पकड़ना शुरू किया. समय के साथ उनकी ताकत और प्रभाव में बढ़ोत्तरी होने लगी.


सावरकर, जिन्होंने हिन्दुत्व शब्द को लोकप्रिय बनाया, काफी हद तक उहापोह के शिकार थे. एक ओर वे समाज में समानता स्थापित करने वाले आंदोलनों के खिलाफ थे तो दूसरी ओर वे मुसलमानों के प्रति भी बैरभाव रखते थे. इन दोनों पूर्वाग्रहों के संश्लेषण से हिन्दुत्व की विचारधारा जन्मी जिसे सावरकर ने आर्य नस्ल, ब्राम्हणवादी संस्कृति और भारत भूमि से जोड़ा.


इसके कुछ समय बाद भारत के राजनैतिक क्षितिज पर महात्मा गांधी का उदय हुआ. गांधी अपने समय के महानतम हिन्दू थे. परंतु वे हिन्दू धर्म में सुधार की आवश्यकता से परिचित थे और उन्हें भारत के बहुधार्मिक चरित्र के कारण होने वाली समस्याओं का अंदाजा था. हिन्दू धर्म को परिभाषित करना कठिन है क्योंकि इसका न तो कोई पैगंबर है और ना ही कोई एक किताब. इसके पुरोहित वर्ग का कोई सुस्थापित ढ़ांचा भी नहीं है. हिन्दू धर्म में अनेक विविधताएं हैं और अनेकानेक पंथ हैं जिनमें से कुछ हैं ब्राम्हणवाद, नाथ, तंत्र, भक्ति, शैव और सिद्धांत.


हिन्दुत्व मुख्यतः ब्राम्हणवादी मानदंडों को बनाए रखना चाहता है. परंतु उसके साहित्य में वह जानबूझकर इनकी चर्चा नहीं करता. हिन्दू राष्ट्रवाद भारतीय राष्ट्रवाद की खिलाफत में उभरा था. गांधी, नेहरू और पटेल के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रवाद हिन्दू धर्म की विविधता को स्वीकार करता था और देश को औपनिवेशिक दासता से मुक्त करवाना चाहता था. हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति, हिन्दुत्व, ने स्वाधीनता संग्राम से दूरी बनाए रखी. वह दलितों और महिलाओं के सशक्तिकरण और उनकी समानता के खिलाफ था.


पिछले तीन दशकों में इस संकीर्ण राष्ट्रवाद ने हिन्दुत्व शब्द को लोकप्रिय और स्वीकार्य बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. अब तो इसके पैरोकार कहते हैं कि हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व एक ही हैं. हिन्दुत्व के नाम पर लोगों की पीट-पीटकर हत्या की जा रही है. आनंद पटवर्धन ने हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व की अत्यंत सहज और उपयुक्त तुलना करते हुए कहा कि "अगर हिन्दू धर्म हिन्दुत्व है तो कू क्लक्स क्लेन ईसाई धर्म है".


मेरा जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ था जिसमें हिन्दू रीतिरिवाजों का पालन होता था और हिन्दू त्यौहार मनाए जाते थे. परंतु अपने बचपन में मैंने हिन्दुत्व का नाम कभी नहीं सुना. इन दावों कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था और यह कि हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म में कोई अंतर नहीं है, का प्रचार-प्रसार पिछले कुछ दशकों में हुआ है. हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म के बीच के अंतर को मैं इस तरह परिभाषित करना चाहूंगा कि जहां गांधी हिन्दू थे वहीं गोडसे हिन्दुत्ववादी था. 


-राम पुनियानी-






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शिवलिंग पर ऐसे चढ़ाए बेलपत्र, खत्म होगी धन संबंधी दिक्कत

श्रावण माह में भगवान शिव को प्रसन्न करना है तो श्रावण सोमवार को शिव कि विशेष पूजा की जाती है। भगवान शिव बड़े ही दयालु है वे अपने भक्त की मुराद जल्द ही सुन लेते है। श्रावण माह कोई आम महीना नहीं है। हिन्दू धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माह माना गया है। आप श्रावण के हर सोमवार को शिव पूजा अवश्य करतें होंगे। अनेक प्रकार से शिव की पूजा की जाती है जिससे शिव प्रसन्न होते है। लेकिन श्रावण माह के सोमवार को आप बेलपत्र से भगवान शिव की विशेष पूजा करें। जिससे आपके धन की दिक्कतें हमेशा के लिए दूर हो जाएगी। साथ ही आपको अनेकों फायदे भी मिलेंगे। 


शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने के फायदे- 

भगवान शिव की अनेक प्रकार से पूजा होती है। जिससे भगवान अलग-अलग कामनाओं को पूरा करते है। लेकिन शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से आपकी धन संबंधित परेशानियां बिल्कुल ही खत्म हो जाएगी। इस श्रावण सोमवार को आप खास विधि के तहत भगवान शिव की बेलपत्र से पूजा-अर्चना करें। क्योंकि भगवान शिव की विशेष पूजा करने का दिन श्रावण का सोमवार रहता है और शिवजी को बेलपत्र अत्यधिक पसंद है। शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से वैवाहिक जीवन सुखमय बनता है, बड़े से बड़ा रोग दूर होता है, संतान सुख प्राप्त होता है तथा कोर्ट के मुकदमों में जीत हासिल होती है।

 

ऐसे चढ़ाई शिवलिंग पर बेलपत्र-

भगवान शिव की बेलपत्र से पूजा करने की खास विधि आज हम आपको बता रहें है। श्रावण सोमवार को अगर आप इस विधि से शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाएंगे तो आपकी धन संबंधित समस्या खत्म हो जाएगी। सबसे पहले आप वृक्ष से बेलपत्र ले आइए। इनमें सें बिना कटे-फटे 11 या 21 बेल पत्र को शुद्ध पानी से साफ कर लीजिए। जिसके बाद एक कटोरे में गाय का दूध लीजिए। जिसमें आपके स्वच्छ बेलपत्र डाल दीजिए। इतने आप जिस विधि से शिवलिंग पर पूजा करते है वह कर लीजिए। अब आप दूध के कटोरे से बेलपत्र निकाल लीजिए और उन्हें गंगाजल से स्वच्छ कर दीजिए। 11 या 21 बेलपत्र जो आपने स्वच्छ किए है उनके हर पत्ते पर चंदन से ॐ बना दीजिए और इत्र छिड़ककर शिवलिंग पर "ॐ नमः शिवाय" मंत्र  का जाप करते हुए सभी बेल पत्र चढ़ा दीजिए। इसके एक हफ्ते बाद ही आपको इसका परिणाम दिखाई देगा। यह एक प्रकार का टोटका भी है जो श्रावण सोमवार को किया जाता है। आप चाहे तो बेलपत्र की माला भी इस विधि से शिवलिंग पर चढ़ा सकते है। 


इसलिए भगवान को पसंद है बेलपत्र-

बताया जाता है कि भगवान शिव को पति रूप में पाने हेतु माता पार्वती ने कई प्रकार के जतन किए थे। कई व्रत भी शिवजी को पाने के लिए माता पार्वती ने किए थे। एक दिन भगवान शिव जंगल में बेलपत्र के वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या कर रहें थे। माता पार्वती जब शिवजी की पूजा के लिए सामग्री लाना भूल गई तो उन्होने नीचे गिरे हुए बेलपत्र से शिवजी को पूरी तरह ढक दिया। जिससे शिवजी अत्यधिक प्रसन्न हुए। तब से भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाया जाने लगा और माता पार्वती जब भी शिवजी की पूजा करती तो वे शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाना बिल्कुल नही भूलती।




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मुंबई में गणपति उत्सव के पांचवें दिन 66,000 से अधिक प्रतिमाओं का विसर्जन

मुंबई : गणपति उत्सव के पांचवें दिन में मुंबई में समुद्र, नदियों, झीलों और अन्य जल निकायों में देवी गौरी की 5,953 प्रतिमाओं समेत कुल 66,299 प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया।


महानगरपालिका के अधिकारियों ने बुधवार को बताया कि मंगलवार को विसर्जन के पांचवें दिन कोई अप्रिय घटना दर्ज नहीं की गयी।


कोविड-19 महामारी को फैलने से रोकने के लिए लगायी गई पाबंदियों के कारण 10 दिन तक चलने वाला गणेश उत्सव लगातार दूसरे साल सादगी से मनाया जा रहा है।


बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के एक अधिकारी ने बताया कि मंगलवार को उत्सव के पांचवें दिन शहर के विभिन्न हिस्सों में कुल 66,299 प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया जिनमें से 34,299 प्रतिमाओं का विसर्जन कृत्रिम जलाशयों में किया गया।


गत शुक्रवार को गणेश उत्सव की शुरुआत के मौके पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने नागरिकों से कोरोना वायरस के खिलाफ कड़ा अभियान चलाने का अनुरोध किया था।




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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- श्रदालुओं के धार्मिक स्थल पर आने का निर्णय राज्य सरकार करे

नई दिल्ली : दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार को कहा कि वह श्रद्धालुओं को कोविड-19 संबंधी नियमों का सख्ती से पालन करते हुए धार्मिक स्थानों पर जाने की अनुमति देने संबंधी याचिका पर फैसला करे। यह याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि इस पर निर्णय राज्य सरकार करेगी।


चीफ जस्टिस डी.एन. पटेल एवं जस्टिस ज्योति सिंह की बेंच ने गैर सरकारी संगठन ''डिस्ट्रेस मैनेजमेंट कलेक्टिव'' की याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया है कि बेंच संबंधित प्रतिवादी प्राधिकारियों को मामले में लागू कानून, नियमों, नियमनों और सरकारी नीति के अनुसार 25 जुलाई 2021 याचिका पर राज्य सरकार को फैसला करने का निर्देश देती है।


याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वकील ने कहा कि कोविड-19 के मामलों में अच्छी-खासी कमी को देखते हुए प्राधिकारियों ने मॉल, जिम और स्पा समेत कई स्थानों को खोलने की अनुमति दे दी, लेकिन दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) के 30 अगस्त के ताजा आदेश में भी धार्मिक स्थानों को नहीं खोला गया। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थान खुल सकते हैं, लेकिन आम जनता को आने की अनुमति नहीं है। याचिकाकर्ता ने कहा कि श्रद्धालुओं को आने की अनुमति देने का आग्रह पत्र 40 दिन पहले भेजा गया था। दलीलों पर सुनवाई के बाद बेंच ने कहा कि वह सरकार इस मुद्दे पर फैसला करने का निर्देश दे रही है।


वकील रॉबिन राजू के जरिए दायर की याचिका में याचिकाकर्ता ने कहा कि ऑनलाइन पूजा करने की सेवा देने से वैसा अनुभव नहीं मिल सकता जो शारीरिक रूप से जाकर दर्शन करने में मिलता है। श्रद्धालुओं पर जारी पाबंदी से ऐसा लगता है कि प्राधिकारी धार्मिक स्थलों को केवल पूजा स्थलों के तौर पर देखते हैं न कि जरूरत के तौर पर। साथ ही याचिका में कहा गया है कि धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं के आने पर पाबंदी लगाना गैर कानूनी और मनमाना है तथा यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। 




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किसी नए कार्य के शुरू होने से पहले छींक आए तो होता हैं शुभ संकेत

छींक का आना एक आम बात है। यह आपको कभी भी किसी वक्त आ सकती है। लोगों की छींक आने पर बनी सोच के अनुसार यह अशुभ संकेत या उन्हें नजर लगने की ओर इशारा करती है। वहीं डाक्टरों के मुताबिक जब नाक के अंदर कुछ कचरा फंस जाता है तो छींक आने से आपके नाक से कचरा अपने आप साफ हो जाता है। मगर वहीं  वास्तु के अनुसार छींक आना हर बार अशुभ नहीं बल्कि कई बार शुभ भी माना जाता है। 


छींक का पीछे से सुनाई देना : अक्सर लोग घर से बाहर निकलते वक्त यदि किसी व्यक्ति की छींक सुन लें तो उनके मन में भ्रम पैदा हो जाता है। मगर वास्तु के अनुसार यदि आपको छींक पीछे से सुनाई दे तो यह अशुभ नहीं बल्कि शुभ संकेत हैं। इसका मतलब आप जिस काम के लिए भी जा रहे हैं तो वह काम बिना किसी विघ्न के पूरा हो जाएगा।


खरीरदारी : उसी तरह बाजार में खरीरदारी करते वक्त अगर किसी की छींक सुनाई दे तो आपके द्वारा खरीदी गईं वस्तुएं आपके लिए शुभ साबित होंगी। ऐसे ही अगर आप नए कपड़े ट्राई करते वक्त किसी की छींक सुनें तो समझ लें आपकी अलमारी नए कपड़ों से भरने वाली है।


बीमार व्यक्ति : अगर आप घर में बीमार पड़े किसी व्यक्ति के लिए दवा खरीदने निकलने पर किसी व्यक्ति की छींक सुने तो समझ जाएं कि वह व्यक्ति जल्द ठीक होने वाला है।


नया कारोबार : नया कारोबार या फिर डील शुरु करने जाते वक्त अगर आपको छींक आए तो इसे भी खुद के लिए शुभ मानें। सुबह के वक्त गल्ले पर बैठते वक्त छींक आना भी शुभ माना जाता है। ऐसा होने से आपका दिन शुभ निकलने वाला है।


तो ये थी छींक से जुड़ी कुछ शुभ बातें। अब आपको बताते हैं भला छींक आना कब अशुभ माना जाता है...


धार्मिक कार्यों की शुरुआत करते वक्त छींक आना अशुभ माना जाता है। रात को सोने से पहले और सुबह उठते ही छींक आना या फिर सुनना अशुभ माना जाता है। परीक्षा देते जाते वक्त छींक आना भी अशुभ बात की तरफ संकेत देता है। किसी यात्रा की शुरुआत से पहले भी छींक सुनना गलत माना जाता है। अगर नए घऱ में प्रवेश करते वक्त छींक का एहसास हो तो वहीं रुक जाएं। भोजन से पूर्व भी छींक आना अशुभ माना जाता है, इसका असर आपके स्वास्थ पर पड़ता है। 




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वह चीज़े जिनका टूटनाअशुभ नहीं, शुभ माना जाता है

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई अपने काम जल्दबाजी में करता है। मगर अक्सर जल्दबाजी में किया गया आपका काम और भी बढ़ा देता है। जैसे कि रसोई में जल्दबाजी करते वक्त हाथ से कुछ गिर जाना या फिर खाना पकाते वक्त जल जाना, ऐसी कई बाते हैं जिन्हें लेकर न चाहते हुए भी लोगों के मन में वहम जाग जाता है। मगर वास्तु के अनुसार हाथ से किसी चीज का गिरना या फिर हाथ से गिरकर टूट जाना हर बार अशुभ नहीं माना जाता।


वास्तु के अनुसार चीजों का हाथ से गिरकर टूट जाना हमारे ऊपर या हमारी जिंदगी में अशुभ की बजाएं शुभ प्रभाव भी डालता हैं। अब इन चीजों में कितनी सच्चाई हैं, ये तो कोई नहीं जानता। फिर भी आज हम आपको कुछ चीज़ों के गिरने या टूटने पर होने वाले हमपर प्रभाव के बारे में बताएंगे जो इस प्रकार हैं...


दूध का उबलना - अक्सर लोग दूध के उबल कर गिर जाने पर चिंता करने लगते है और परेशान हो जाते हैं लेकिन इसके लिए एक धारणा है कि दूध अगर उबलकर सीधा जमीन पर गिरे तो उसे शुभ माना जाता है और अगर गैस की फ्लैम को छुएं तो वो अशुभ माना जाता है।


शीशे का टूटना - कांच टूटने पर लोग इसे अपशगुन समझने लगते है। वहीं वास्तु शास्त्र के अनुसार कांच का टूट कर गिरना शुभ माना जाता है। वास्तु शास्त्र के मुताबिक कांच आप पर आने वाली बला को खुद पर लेकर टूट जाता है लेकिन याद रखें कि टूटे हुए कांच को जितना जल्दी हो सके बाहर फेंक दे क्योंकि ऐसा करने से कांच के साथ-साथ आप पर आने वाली बला भी कांच के साथ ही घर से बाहर चली जाएगी।


नमक का गिरना - नमक खाना बनाने के साथ-साथ नज़र उतारने के भी काम आता है लेकिन किसी कारणवश यह हाथों से गिर जाएं तो इसे अपशगुन माना जाता है मगर इंग्लैंड में लोकविश्वास है कि गिरे नमक में से एक चुटकी लेकर बाएं कंधे की ओर से पीछे फेंक देने पर अपशगुन नहीं होता।


चप्पल का टूटना - अगर आपकी चप्पल बहुत पुरानी या आम भाषा में कहें कि घिस कर टूट गई है तो इसे शुभ माना जाता है। लोगों की इस बारे में सोच है कि चप्पल के घिसकर टूटने से उनके दुख भी टूट कर नष्ट हो जाते हैं।


हाथ से चीज़ों का गिरना - अगर हाथों और पर्स से रूपए-पैसे गिर जाते है तो इसे अशुभ और धन की देवी लक्ष्मी का रुठ जाना मानते हैं। ये आर्थिक नुकसान का संकेत देता है। इससे बचने के लिए गिरे हुए रूपए-पैसों को तुरंत उठाकर सिर से लगाकर धन की देवी लक्ष्मी से क्षमा याचना करके उसे जेब में रखना चाहिए। इससे आर्थिक नुकसान से बचाव होगा।



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घर के मंदिर में ऐसे नहीं रखनी चाहिए भगवान की मूर्ति, वास्तु के अनुसार इन 5 बातों से बचें

अक्सर ऐसा होता है कि हम घर के इंटीरियर पर तो बहुत ध्यान देते हैं लेकिन घर में बने पूजा वाले मंदिर की ओर ध्यान नहीं देते। वास्तुशास्त्र के अनुसार पूजा घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने के लिए कुछ उपाय करने बेहद जरुरी है, जैसे मंदिर में भगवान की मूर्ति किस तरह से रखी है, इस बात का भी खास ख्याल रखा जाना चाहिए। आइए, जानते हैं- 


-मंदिर में भगवान की मूर्तियों को सामने की तरफ रखना चाहिए। मंदिर या घर की किसी और जगह पर भी भगवान की मूर्ति कभी भी इस तरह नहीं रखनी चाहिए कि उसके पीछे का भाग, यानी पीठ दिखाई दे। मूर्ति बिल्कुल सामने से दिखनी चाहिए। 


-पूजा घर में कभी भी गणेश जी की दो से अधिक मूर्तियां या तस्वीर नहीं रखनी चाहिए। अन्यथा यह शुभ फलदायी नहीं होता। 


-घर की दो अलग-अलग जगहों पर एक भगवान की दो तस्वीर हो सकती हैं, लेकिन एक ही जगह पर एक भगवान की दो तस्वीरें नहीं रखनी चाहिए। 


-भगवान की ऐसी मूर्ति या तस्वीर भी मंदिर में नहीं रखनी चाहिए, जो युद्ध की मुद्रा में हो या जिसमंं भगवान का रौद्र रूप हो। 


-खंडित मूर्तियों को भी घर में नहीं रखना चाहिए। उन्हें तुरंत विसर्जित कर देना चाहिए। घर में हमेशा सौम्य, सुंदर और आशीर्वाद की मुद्रा वाली भगवान की मूर्तियां ही लगानी चाहिए। इससे घर या मन्दिर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।



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घर-घर विराजे गजानंदी, घरों और मंदिरों में गणेश पूजन

नई दिल्ली : घर में पधारो गजानंदी मेरे घर में पधारो। ऐसी ही सुंदर गीतों की ध्वनियां वक्रतुण्ड भगवान गणेश के आगमन पर राजधानी दिल्ली के अधिकतर घरों से आती हुई सुनाई दीं। दरअसल गणेश चतुर्थी पर डीडीएमए व दिल्ली सरकार ने कोविड गाइडलाइंस के अनुसार सार्वजनिक पूजा पंडालों पर रोक लगा दी है ताकि कोरोना के प्रसार को रोका जा सके। लेकिन गजानन के भक्त कहां मानने वाले हैं, उन्होंने अपने घरों में छोटी-छोटी गणपति जी की मूर्तियों को खरीदकर विधिपूर्वक स्थापना की।


गणपति भक्तों ने जहां ढोल-नगाडों के साथ गणपति जी की स्थापना अपने घरों में की और जमकर सडकों पर नाचते दिखाई दिए। वहीं परंपरागत तरीकों को अपनाते हुए लोगों ने अपने घरों को फूलों व अशोक के पत्तों से बंदनवार बनाकर सजाया। यही नहीं गणपति आगमन पर घरों के बाहर बनाई गई रंगोलियों में भरे रंग उनकी खुशियों को साफ जाहिर कर रहे थे।


सार्वजनिक रोक के चलते लोगों के गणपति जी की बढी मूर्तियों के खरीदार तो नहीं आए लेकिन छोटी-छोटी मूर्तियां हाथों-हाथ बिक गईं, जिससे मूर्तिकारों के चेहरे खिल उठे थे। एशिया की सबसे बडी कुम्हार काॅलोनी में गणपति मूर्ति बनाने वाले सुभाष प्रजापति ने बताया कि उन्होंने 400 से लेकर 25 हजार तक की मूर्तियां बनाई थीं, जिनमें सभी छोटी मूर्तियां सुबह-सुबह ही बिक गई हैं। वहीं गणपति जी के श्रृंगार का सामान भी लोगों ने खरीदा। हालांकि पिछली बार की तरह ही इस बार भी भक्तों ने इको फ्रेंडली मूर्तियों की मांग अधिक की।


गणपति जी का प्रिय भोग मोदक भी अब बाजारीकरण का शिकार तो हो गया है लेकिन सच्चाई यह भी है कि मोदक की विभिन्न वेरायटी को लोग बेहद पसंद भी कर रहे हैं। खासकर बच्चों में चाॅकलेट, वेनिला व ड्राईफ्रूटस मोदक का काफी क्रेज देखने को मिला। हालांकि खोए व नारियल के मोदक की भी काफी डिमांड हैं। 






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धर्मांतरण पर रोक लगाए सरकार : विष्णुदेव

रायपुर : छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के मुद्दे को लेकर सियासत गरमाई हुई है। लगातार इस मुद्दे को लेकर पक्ष और विपक्ष के नेता एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णदेव साय ने कहा कि प्रदेश के आदिवासियों का धर्मांतरण किया जा रहा है। उनके पिछड़ेपन और निरक्षरता का लाभ उठाकर धर्मांतरण किया जा रहा है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि धर्मांतरण पर रोक लगाई जाए।

वहीं, इस दौरान पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा है कि प्रदेश सरकार छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण कराने में लगी है। लोभ,लालच देकर धर्मांतरण कराना अपराध है। भाजपा कल 3 बजे धर्मांतरण को लेकर राज्यपाल को ज्ञापन सौंपेगी, जिसमें विधायक, सांसद, बड़े पदाधिकारी इसमें शामिल होंगे। हमारे कार्यकर्ताओं के घरों पर पुलिस जा कर उन्हें प्रताड़ित कर रही है। पुरानी बस्ती की घटना में जो गैर जमानती धाराएं लगाई गई। क्या वह दिल्ली के निर्देश पर किया गया? 12 और 15 सितंबर को प्रदेशभर में भाजपा विरोध कार्यक्रम करेगी।

नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने इस दौरान कहा कि छत्तीसगढ़ में हिंदुत्व विरोधी सरकार चल रही है। गरीब,बीमार और अशिक्षा का फायदा उठाकर धर्मांतरण किया जा रहा है। धर्मांतरण से मतांतरण का काम हो रहा है। सोची समझी रणनीति के तहत सरकार यह काम कर रही है।



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अखंड सुहागिन रहने की कामना को लेकर महिलाओं ने की शिव-पार्वती की पूजा

देवघर : तीज पर्व को लेकर सुबह से ही महिलाएं बाबा मंदिर एवं आसपास स्थित शिवालयों में शिव और पार्वती की पूजा पति के दीर्घायु को लेकर किया। जिसमें राम मंदिर रोड के समीप स्थित हरि शरणम बाबा कुटिया में बड़ी संख्या में महिलाओं ने मंदिर में स्थापित शिवलिग की पूजा अर्चना के साथ-साथ व्रत कथा सुना। बाबा मंदिर के आसपास स्थित ठाकुरबाड़ी एवं कच्ची बाड़ी में व्रत सुनने के लिए महिलाएं अपनी बारी का इंतजार करते हुए दिखी। राज्य सरकार के आदेशानुसार मंदिर में आम श्रद्धालुओं का प्रवेश वर्जित है जिसमें आज के दिन मंदिर प्रांगण में महिलाएं कथा सुनने के लिए आती थी और मंदिर में पैर रखने तक का जगह नहीं होती थी। मगर मंदिर बंद रहने से व्रती महिलाएं मंदिर के बाहर ही परंपरा का निर्वाह करती हुई नजर आई। जिला प्रशासन की ओर से सुबह से ही बाबा मंदिर के सभी द्वार पर अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई थी ताकि राज्य सरकार के द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुपालन किया जा सके एवं मंदिर में अतिरिक्त भीड़ व बाहरी श्रद्धालु का प्रवेश ना हो सके।


अखंड सुहाग की रक्षा को किया हरितालिका व्रत मधुपुर शहर के लगभग सभी जगहों पर गुरुवार शाम महिलाओं ने हरितालिका तीज व्रत का उपवास रखा।बता दें कि भाद्रपद मास में हस्त नक्षत्र से युक्त शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को इस अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है। आज के दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु तथा सभी तरह के पापों से मुक्ति के लिए इस पर्व को निष्ठा पूर्वक करती है। आज के दिन दिन भर के उपवास के बाद सायं काल में किसी पवित्र स्थान पर भगवान शंकर और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र को प्रतिष्ठित कर उसकी पूजा की जाती है। इस दौरान हरितालिका तीज व्रत कथा भी सुनी जाती है। इस अवसर पर विशेषकर मंदिरों में दर्जनभर से अधिक महिलाएं उपस्थित होकर इस कथा का श्रवण करती है तथा उचित दान दक्षिणा भी देती है। इस वर्ष भी पंच मंदिर सहित कई अन्य मंदिरों और व्यक्तिगत घरों में इस तरह की पूजा का आयोजन हुआ। जिसमें महिलाओं ने पूरे साज-सज्जा के साथ अनुष्ठान में भाग लिया।कथा के अनुसार इस व्रत कथा को मात्र सुन लेने से प्राणी को एक हजार अश्वमेध और सैकड़ों यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं है कि व्रत को करने से प्राणी सब पापों से छूट जाता है। कल प्रात :काल व्रत का समापन होगा जिसमें पूजा अर्चना के बाद महिलाएं पारण करेंगी। इसी आशा और विश्वास के साथ हर वर्ष महिलाएं इस पर्व को करती है साथ ही पूरे घर परिवार के लिए मंगल कामनाएं करती है।


सारठ बाजार समेत पूरे क्षेत्र में त्योहार को लेकर धार्मिक माहौल बना रहा। सुहागिनों ने निर्जला व्रत रखा तथा अपने नजदीकी शिवालयों में पहुंचकर भगवान भोले नाथ की पूजा अर्चना की। इस दौरान सारठ के दुखहरण नाथ मंदिर, शक्तिनाथ मंदिर खैरबनी, शिव मंदिर सबेजोर, शिव मंदिर माहपुर, समेत क्षेत्र के सभी शिव मंदिरों में महिलाओं की भारी भीड़ देखी गई।



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विघ्नहर्ता गणेश : बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता

हर वर्ष की भांति मंगलमूर्ति गणेश एकबार फिर गणेशोत्सव अर्थात् गणेश चतुर्थी के अवसर पर घर-घर पधार रहे हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश का जन्म हुआ था। इसी चतुर्थी से आरंभ होकर गणेशोत्सव पूरे दस दिनों तक चलता है और विध्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर घरों में छोटी-बड़ी प्रतिमाओं के अलावा कई प्रमुख स्थानों पर भी भगवान गणेश की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, जिनका लगातार नौ दिनों तक पूजन किया जाता है। दस दिन पश्चात् अनंत चतुर्दशी के दिन पूरे जोश के साथ गणेश प्रतिमा को तालाब इत्यादि किसी जलस्रोत में विसर्जित कर दिया जाता है।


गणपति विसर्जन को लेकर मान्यता है कि हमारा शरीर पंचतत्व से बना है और एक दिन उसी में विलीन हो जाएगा। इसी आधार पर अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन किया जाता है। इस वर्ष कोरोना के चलते अधिकांश लोग ऐसे पंडालों या सार्वजनिक स्थलों के बजाय अपने-अपने घरों में ही गणपति की पूजा करेंगे और अधिकांश जगहों पर मूर्तियों का जलस्रोतों में विसर्जन भी नहीं होगा।


गणेशोत्सव हालांकि वैसे तो पूरे देश में मनाया जाता है और लोग अपने घरों में गणपति बप्पा की पूजा करते हैं लेकिन महाराष्ट्र में इस पर्व की विशेष धूम दिखाई देती है। जगह-जगह बड़े-बड़े आकर्षक पंडाल सजाए जाते हैं, जहां लोग एकजुट होकर भक्ति रस में सराबोर होकर भगवान गणेश की पूजा करते हैं। महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की परम्परा की शुरुआत के संबंध में कहा जाता है कि यह पेशवाओं द्वारा की गई थी और तब पुणे के प्रसिद्ध शनिवारवाड़ा नामक राजमहल में भव्य गणेशोत्सव मनाया जाता था। सार्वजनिक रूप से महाराष्ट्र में गणेशोत्सव को बड़े पैमाने पर मनाए जाने की शुरूआत 1893 में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बालगंगाधर तिलक द्वारा आजादी की लड़ाई में लोगों को एकजुट करने के उद्देश्य से की गई थी।


गणेश बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता हैं और मान्यता है कि गणेश चतुर्थी पर गणपति बप्पा की पूजा करने से वे भक्तों के सारे कष्ट हर लेते हैं। सच्चे मन से उनकी पूजा करने से शुभ-लाभ की प्राप्ति तथा समृद्धि के साथ धन-धान्य की वृद्धि होती है। श्रीगणेश के अनेक प्रचलित नामों में से गजानन. लम्बोदर, विघ्ननाशक, विनायक, गणाध्यक्ष, एकदन्त, चतुर्बाहु, गजकर्णक, भालचन्द्र, कपिल, विकट, धूम्रकेतु, सुमुख इत्यादि काफी प्रसिद्ध हैं। बुद्धि, विवेक, धन-धान्य और रिद्धि-सिद्धि के कारक भगवान गणेश की पूजा गणेश चतुर्थी के दिन प्रायः दोपहर के समय ही की जाती है। इसके पीछे मान्यता है कि विध्नहर्ता गणेश का जन्म मध्यान्ह के समय हुआ था, इसीलिए गणेश चतुर्थी पर उनकी पूजा के लिए यही समय सर्वोत्तम माना गया है। माना जाता है उनकी पूजा करने से शनि की वक्रदृष्टि तथा ग्रहदोष से भी मुक्ति मिलती है। गणेश जी की कृपा से समस्त कार्य बगैर किसी बाधा के पूर्ण होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।


रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा पीतवस्त्रधारी भगवान गणेश की पूजा सभी देवी-देवताओं में सबसे सरल मानी जाती है। वैसे तो देश में 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा की जाती है लेकिन हिन्दू धर्म में गणेश जी को सभी देवों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त है और प्रत्येक पूजा या कोई भी शुभ कार्य करने से पहले उनकी पूजा करने का विधान है। दरअसल उन्हें उनके पिता भगवान शिव ने ही यह विशेष वरदान दिया था कि हर पूजा या शुभ कार्य करने से पहले उनकी पूजा अनिवार्य होगी।


शिवपुराण के अनुसार एकबार माता पार्वती ने स्नान से पूर्व अपने मैल से एक बालक उत्पन्न कर उसे अपना द्वारपाल बना दिया। जब पार्वती जी स्नान करने लगी, तब अचानक भगवान शिव वहां आए लेकिन द्वारपाल बने बालक ने उन्हें अंदर प्रवेश करने से रोक दिया। उसके बाद शिवगणों ने बालक से भयंकर युद्ध किया लेकिन कोई भी उसे पराजित नहीं कर सका तो क्रोधित शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब पार्वती को यह पता चला तो आगबबूला हो उन्होंने प्रलय करने का निश्चय कर लिया। इससे देवलोक भयाक्रांत हो उठा और देवताओं ने उनकी स्तुति कर उन्हें शांत किया। भगवान शिव ने निर्देश दिया कि उत्तर दिशा में सबसे पहले जो भी प्राणी मिले, उसका सिर काटकर ले आएं। विष्णु उत्तर दिशा की ओर गए तो उन्हें सबसे पहले एक हाथी दिखाई दिया। वे उसी का सिर काटकर ले आए और शिव ने उसे बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। पार्वती उसे पुनः जीवित देख बहुत खुश हुई और तब समस्त देवताओं ने बालक गणेश को अनेकानेक आशीर्वाद दिए। भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि कोई भी शुभ कार्य यदि गणेश की पूजा करके शुरू किया जाएगा तो वह निर्विघ्न सफल होगा। उन्होंने गणेश को अपने समस्त गणों का अध्यक्ष घोषित करते हुए आशीर्वाद दिया कि विघ्न नाश करने में गणेश का नाम सर्वोपरि होगा। इसीलिए भगवान गणेश को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है।


एक प्रचलित लोककथा के अनुसार भगवान शिव का एकबार त्रिपुरासुर से भीषण युद्ध हुआ। युद्ध शुरू करने से पहले उन्होंने गणेश का स्मरण नहीं किया, इसलिए वे त्रिपुरासुर से जीत नहीं पा रहे थे। उन्हें जैसे ही इसका अहसास हुआ, उन्होंने गणेश जी का स्मरण किया और उसके बाद आसानी से त्रिपुरासुर का वध करने में सफल हुए।


देवों के देव भगवान गणेश के देशभर में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनमें सबसे लोकप्रिय मुम्बई के प्रभादेवी में श्री सिद्धिविनायक मंदिर है, जहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। वर्ष 2014 में गुजरात के मेहमदाबाद में छह लाख वर्गफुट में बना सिद्धिविनायक मंदिर भगवान गणेश का सबसे बड़ा मंदिर माना जाता है। जमीन, अचल सम्पति और चढ़ावे के आधार पर इन्दौर स्थित खजराना गणेश मंदिर सबसे धनी गणपति मंदिर है। हालांकि संचित धन के हिसाब से पुणे का दगडुशेठ गणपति मंदिर देश का सबसे धनी गणपति मंदिर है। वैसे प्रतिदिन चढ़ावे के हिसाब से मुम्बई का सिद्धिविनायक मंदिर सबसे आगे है।


-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)






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विधानसभा में नमाज कक्ष का औचित्य

झारखण्ड विधानसभा के नमाज कक्ष की वैधानिकता, मंशा और उसकी उपयोगिता को लेकर इन दिनों पूरे देश में विरोध और चर्चा हो रही है। इस समय पूरा देश कोरोना महामारी से निपटने के लिए टीकाकरण अभियान और देश की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। जहाँ सभी राज्य विद्यार्थियों के भविष्य और सुरक्षा की चिंता में लगे हुए हैं, वहीं झारखंड विधानसभा ने अपने नव निर्मित भवन में नमाज कक्ष का आवंटन कर न केवल खुद की जगहँसाई कराई है अपितु तुष्टिकरण के लिए एक और मार्ग खोल दिया है।


बहुसंख्यक हिन्दुओं का आरोप है कि उन्हें हतोत्साहित करने के लिए ही धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दी जाती है किन्तु मुस्लिम अल्पसंख्यकों को प्रसन्न करने या कहें कि उनके वोट बटोरने के लिए तथाकथित सेकुलर दल किसी भी हद तक चले जाते हैं। झारखण्ड विधानसभा के उप सचिव नवीन कुमार द्वारा जारी अधिसूचना को लेकर अब बहुसंख्यक वर्ग स्पष्ट आरोप लगा रहा है कि इसके पीछे सत्ताधारी दल की तुष्टिकरण की नीति है। इसमें संदेह नहीं कि उप सचिव ने बिना विधानसभा अध्यक्ष के आदेश या परामर्श के यह अधिसूचना जारी की हो। इस अधिसूचना में अन्य सभी धर्मों के अनुयायिओं की उपेक्षा करते हुए विधानसभा भवन में कक्ष क्रमांक टीडब्लू 348 नमाज कक्ष के रूप में आवंटित किया गया है। इस घटना से यह प्रश्न उठाने लगा है कि यदि लोकतंत्र की विधायी संस्थाएँ भी तुष्टीकरण का केंद्र बन जाएँ तो फिर शेष संस्थाओं से क्या उम्मीद की जाए। यद्यपि राज्य के धर्मनिरपेक्ष होने के कारण धार्मिक आधार पर इस प्रकार का आवंटन असंवैधानिक है।


देशभर में इस बात की भी चर्चा है कि यदि आज झारखंड विधानसभा में एक कक्ष में नमाज को प्रोत्साहित किया जाता है तो कल देश की सभी विधानसभाओं में इस प्रकार की व्यवस्था बनाने की मांग उठेगी। संभव है इस तुष्टिकरण की प्रतिक्रिया में अन्य लोग भी सामानांतर मंदिर, चर्च आदि बनाने की माँग करें, तो परिणाम क्या होगा ? भाजपा ने वहाँ हनुमानजी का मंदिर बनाने या इस आदेश को वापस लेने के लिए अभियान भी आरंभ कर दिया है। अब यदि वहाँ एक कक्ष में हनुमान मंदिर भी बना दिया जाए तो फिर लगभग पंद्रह बीस कक्षों को धार्मिक स्थलों के रूप में ही आवंटित करना पड़ेगा। फिर वहां मौलवी और पुजारी आदि की भी व्यवस्था करनी पड़ेगी। बाबा साहब अम्बेडकर जब संविधान बना रहे थे तब संसद और विधानसभाओं में इस प्रकार की माँग क्यों नहीं उठी ? क्या झारखण्ड के विधायकों ने ऐसा करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया है या सत्ताधारी दल समाज को बाँटने की नीयत से ऐसा कर रहा है ?


हमारी विधानसभाएँ और संसद लोकतंत्र के स्तम्भ हैं। यहाँ आनेवालों को सभी धर्मों की जनता चुनकर भेजती है। वे यहाँ जनसेवक बनकर आते हैं धर्म सेवक नहीं। जनतंत्र में जनता मालिक है, जनता जनार्दन है और संविधान ही जनतंत्र का मार्गदर्शक ग्रन्थ है। अतः जिस किसी को जनप्रतिनिध के रूप में काम करना है वह संविधान का जप करे और जनता के मुद्दों पर चिंतन करे। इसके लिए जनता पर्याप्त वेतन, आवास और अनेक सुख-सुविधाएँ देती है। जिन्हें व्यक्तिगत रूप से नमाज पढ़नी हो वे मस्जिदों में जाएँ और जिन्हें पूजा करनी हो वे मंदिरों में जाएँ, किसने रोका है।


अब देखना यह है कि झारखण्ड विधानसभा अध्यक्ष इस आवंटन को रद्द कर भूल सुधार करते हैं या इसे राजनीतिक रंग देकर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकों के मध्य वैमनस्यता का कारण बनने देते हैं। यद्यपि अब यह नमाज कक्ष उनके दल और राज्य के लिए एक नई समस्या को जन्म दे सकता है। सभी राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर संविधान सम्मत विचार ही रखने चाहिए ताकि देश में धर्म के आधार पर टकराव की स्थिति न बने।


-डॉ. रामकिशोर उपाध्याय-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)



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समूचे विश्व में पूजा होती है गणेश की

किसी भी शुभ कार्य से पूर्व गणपति का पूजन भारतीय परम्परा की विशिष्टता है। गणपति को विघ्नेश, एकदन्त, गणपति, गजानन, गणनायक, गणाधिपति, गणाध्यक्ष तथा लम्बोदर इत्यादि अनेकानेक नामों से पूजा जाता है। गणेश जी का स्वरूप गणपति का आदर्श माना जाता है। यही वजह है कि लोक-चेतना में उनका यह स्वरूप इतना समाया हुआ है कि प्रत्येक मांगलिक कार्य तथा विधि-विधान उन्हीं के पावन स्मरण, आह्वान तथा पूजा-अर्चना से शुरू होता है। 


ऋद्धि-सिद्धि के देव

ऋद्धि-सिद्धि के देव गणेशजी न केवल भारत में, अपितु तिब्बत, चीन, बर्मा, जापान, जावा तथा बाली इत्यादि तमाम देशों में भी विभिन्न रूपों में पूजे जाते हैं। यही नहीं, इन देशों में गणेशजी की प्रतिमाएं भी चप्पे-चप्पे पर देखने को मिल जायेंगी। सफलता समृद्धि की सहचरी है, इसलिए बिना किसी व्यवधान के कार्य संपन्न कराने हेतु स्वयमेव सफलता प्राप्ति की दृष्टि से ही गणेश लाभ व लक्ष्य के स्वामी होकर सर्व पूजनीय हो गये। भारतीय पुराणों में, गणेश जी की अनेकों कथाएं समाहित हैं बल्कि गणेश-पुराण तक भी देखने को मिलता है। गणेशजी की महिमा सीमाओं की संकीर्णता से परे है, इसलिए पश्चिमी देशों की प्राचीन संस्कृतियों में भी गणेश की अवधारणा विद्यमान है। 


पश्चिम में रोमन देवता जेनस को गणपति के ही समकक्ष माना गया है, ऐसा माना जाता है कि जब भी इतालवी व रोमन इष्ट जेनस का नाम लेते थे। 18वीं शताब्दी के संस्कृत के प्रकांड विद्वान विलियम जोन्स ने जेनस व गणपति की पारम्परिक तुलना करते हुए माना है कि गणेश में जो विशेषताएं पाई गयी हैं वे सभी जेनस में भी हैं। यहां तक कि रोमन व संस्कृत शब्दों के उच्चारण में भी इतनी समानता है कि इन दोनों देवों में अंतर नहीं किया जा सकता।


भारत से बाहर विदेशों में बसने वाले भारतीयों ने भारतीय संस्कृति की जड़ों को काफी गहराई तक फैलाने का प्रयास किया और इन पर भारतीय देवताओं की पूजा उपासना का स्पष्ट प्रभाव था, जो आज भी है। विदेशों में प्रकाशित पुस्तक गणेश ए मोनोग्राफ आफ द एलीफेन्ट फेल्ड गाड में जो तथ्य उजागर किये गये हैं, उससे इस बात का स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि विश्व के कई देशों में गणेश प्रतिमाएं बहुत पहले से पहुंच चुकी हैं और विदेशियों में भी गणेश के प्रति श्रद्धा और अटूट विश्वास रहा है। 


विदेशों में पाई जाने वाली गणेशजी की प्रतिमाओं में इनके विभिन्न स्वरूप अलग-अलग देखे गये हैं। जावा में गणेश की मूर्तियों में वे पालथी मार कर बैठे दिखाए गये हैं, उनके दोनों पैर जमीन पर टिके हुए हैं व उनके तलुए आपस में मिले हुए हैं। हमारे देश में, गणेशजी की मूर्तियों में उनकी सूंड प्रायः बीच में दाहिनी या बाई ओर मुड़ी हुई है किन्तु विदेशों में वह पूर्णतया सीधी, सिरे पर मुड़ी हुई है। 


जापान और चीन में

जापान में गणेश को कांतिगेन नाम से पुकारा जाता है। यहां पर बनी गणेशजी की मूर्तियों में दो या चार हाथ दिखाये गये हैं। सन् 804 में जब जापान का कोबो दाइशि धर्म की खोज करने हेतु चीन गया तो उसे वहां व्रजबोधि और अमोधवज नामक भारतीय आचार्य विद्वानों द्वारा मूल ग्रंथों का चीनी अनुवाद करने का मौका मिला तो चीन की मंत्र विद्या प्रणाली में गणेशजी की महिमा को भी वर्णित किया गया। सन् 720 में चीन की राजधानी लो-यांग पहुंचा अमोध्वज, जो भारतीय मूल का ब्राह्मण था जिसे चीन के कुआंग-फूं मंदिर में पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था। बाद में अमोह वज्र से एक चीनी धर्म परायण व्यक्ति हुई-कुओ ने पहले दीक्षा ली, फिर उसने कोषो-दाइशि को दीक्षा दी जिसने वहां के विभिन्न मठों से संस्कृत की पांडुलिपियां एकत्र की व सन् 806 में जब वह जापान लौटा तो वज्र धातु के महत्वपूर्ण सूत्रों के साथ ही गणेशजी के चित्र भी साथ ले गया जिसे सुख-समृद्धि परब्रहम की जानमयी शक्ति के रूप में माना गया। जापान के कोयसान सन्तसुजी विहार में गणेश की चार चित्रावलियां रखी गयी हैं जिनमें युग्म गणेश, षड़भुज गणेश, चतुर्भुज गणेश तथा सुवर्ण गणेश प्रमुख हैं।


तिब्बत में गणेश पूजन

तिब्बत के हरेक मठ में भी गणेश पूजन की परम्परा काफी पुरानी है। यहां गणपति अधीक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। नौवीं शताब्दी के पूर्वार्ध्द में ही तिब्बत के अनेक स्थानों में गणेश पूजा का प्रचलन शुरू हो गया था। चीन के तुन-हु-आंग में एक पहाड़ी गुफा की दीवार पर गणेश की प्रतिमा उकेरी गयी है तो साथ ही सूर्य, चंद्र व कामदेव की मूर्तियां भी अंकित हैं। ये मूर्तियां सन् 644 में स्थापित की गयी थीं। गणेश की मूर्ति के नीचे चीनी भाषा में लिखा हुआ है कि ये हाथियों के अमानुष राजा है। चीन में भी गणपति कांतिगेन कहलाते हैं।


कम्बोडिया की प्राचीन राजधानी अंगकोखाट में जो मूर्तियों का खजाना मिला है, उसमें भी गणेश के विभिन्न रंग-रूप पाये गये हैं। वैसे यहां कांसे की मूर्तियों का प्रचलन है। स्याम देश जहां पर बसे भारतीयों ने वैदिक धर्म को कई सौ वर्ष पूर्व ही प्रचारित कर दिया था, के कारणवश यहां पनपी धार्मिक आस्था के फलस्वरूप यहां निर्मित की गयी गणेश की मूर्तियां अयूथियन शैली में दिखाई देती है। स्याम देश में वैदिक धर्म राजधर्म के रूप में प्रसिद्ध था जिसके कारण यहां आज भी धार्मिक अनुष्ठान वैदिक रीति से ही सम्पन्न होते हैं।


अमेरिका में तो लंबोदर गणेश की प्रतिमाएं बनायी जाती हैं। वैसे अमेरिका की खोज करने वाले कोलम्बस से पूर्व ही वहां सूर्य, चंद्र तथा गणेश की मूर्तियां पहुंच गयीं थी। विश्व के कई देश ऐसे भी हैं जहां खुदाई के दौरान भारतीय देवताओं की मूर्तियां मिली हैं लेकिन विशेषता यह रही कि इनमें गणेशजी हर जगह विद्यामान थे। ये मूर्तियां हजारों वर्ष पूर्व की होने का अनुमान लगाया गया है। 


कुल मिलाकर विघ्नहरण विनायक, जहां समूचे विश्व में पूजा जा रहे हैं, वहीं भारत में भी विभिन्न प्रांतों में 10वीं शताब्दी की प्राचीन मूर्तियों में भी गणेशजी के अनेकानेक रूप मिले हैं जिन्हें प्रदेशों की स्थानीय बोली में विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। 




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तो यह है जीवन का परमआनंद

हमारे धर्म ग्रंथों में अमूमन इस बात का उल्लेख मिलता है कि ईश्वर की शरण में जाने से मनुष्य को परम आनंद की प्राप्ति होती है। आखिर ये परम आनंद क्या है? ये कहां मिलता है? एक आम आदमी को इन दोनों प्रश्नों का उत्तर कभी नहीं मिल पाता और इसीलिए उसकी अध्यात्म के पथ पर उन्नति नहीं हो पाती।


परम आनंद के बारे में भगवान ने गीता में बताया है कि वह स्थिति जिसमें मनुष्य सुख, दुख, हानि, लाभ, क्रोध, मोह और अहंकार आदि से मुक्त होकर स्वयं में स्थापित हो चुका हो। यानी मन का पूर्णतया निग्रह। मन, इंद्रियों द्वारा मनुष्य को संसार में लिप्त करके उसकी प्रवृत्ति को वाह्य बनाता है और वह संसार में इंद्रियों के द्वारा सुख की खोज में भटकता रहकर जीवन-मरण का चक्कर लगाता रहता है।


इसीलिए परमानंद की प्राप्ति के लिए सबसे पहले मन की प्रवृत्ति को अपने अंदर की ओर मोड़ना चाहिए। अज्ञानवश लोग मन को बलपूर्वक संसार से विरक्त करने की कोशिश करते हैं जो पूर्णतया निर्थक व गलत मार्ग है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ऐसी स्थिति में जब भी मन का नियंत्रण ढीला पड़ता है वह दोबारा इंद्रिय भोग द्वारा संसार के भोगों में लिप्त हो जाता है।


आनंद के लिए पहले कदम के रूप में सर्वप्रथम मनुष्य को संसार का लेन-देन समाप्त करना चाहिए। लेन-देन केवल धन तक ही सीमित नहीं है बल्कि भावनात्मक पहलू धन से भी ज्यादा अहम व आवश्यक है।


नकारात्मक भावों के कारण वह कामना रूपी प्रेम, अहंकार, जलन, ईर्ष्याऔर बदले की भावना व क्रोध से पीड़ित रहता है। नकारात्मक भावों के कारण ही उसे शारीरिक रोगों जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदयरोग होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।


भगवान का गीता में बताया गया यह कथन कि विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध से विवेक समाप्त होकर बुद्धि भी नष्ट हो जाती है। इस प्रकार मनुष्य का पतन हो जाता है।


सनातन धर्म में मनुष्य के जीवन चक्र को नियंत्रित करने के लिए आश्रम व्यवस्था है। वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य को धीरे-धीरे अपने आपको गृहस्थ आश्रम व दुनियादारी के लेन-देन से मुक्त कर लेना चाहिए और जीवन के शेष भाग को सम स्थिति में रहकर परमानंद में स्थित हो जाना चाहिए।




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मिनी वृंदावन के हर गलियों में गूंज उठा है ''हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की''

बेगूसराय : भगवान श्रीकृष्ण के जन्म उत्सव जन्माष्टमी को लेकर बेगूसराय सोमवार रात मिनी वृंदावन में तब्दील हो गया है। यहां की हर गलियां भगवान श्रीकृष्ण के भक्तिरस से सराबोर हो गई है। मध्य रात ठीक 12 बजे रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म होते ही विशेष पूजा-अर्चना करने के बाद श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए पट खोल दिए गए और वातावरण नंद के घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की से गूंज उठा है। 


बिहार का सबसे बड़ा जन्माष्टमी मेला लगने के कारण तेघड़ा के चप्पे-चप्पे में श्रीकृष्ण भजन की धूम मची हुई है तथा लोग कृष्ण की भक्ति में रम गए हैं। रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य होते ही पंडालों, ठाकुरबारी, घरों और मंदिरों में घंटे-घड़ियाल गूंजने लगे, पटाखों की आवाजों के साथ भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों से वातावरण गूंज उठा और भक्त भावविभोर होकर झूम उठे हैं। रात में श्रद्धालुओं की भीड़ श्रीकृष्ण की झांकियों का एक झलक पाने के लिए आतुर रही। जन्म काल पूरा होने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भगवान का स्नान, अभिषेक, पंचोपचार पूजन, षोडषोपचार पूजन किया गया। ऐसा लग रहा था भगवान श्रीकृष्ण बांसुरी बजा रहे हैं और गोपियां और ग्वाल भाव नृत्य कर रहा हो। जगह जगह भजन और भाव नृत्य का आयोजन किया गया। 


हालांकि इस वर्ष मेले का आयोजन सादे तौर पर ही किया गया लेकिन भक्तों की आस्था कोरोना पर भारी पड़ रही है, भक्तों का उत्साह सर चढ़ कर बोल रहा है। जगह-जगह भजन, कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का सिलसिला लगातार जारी है। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के लिए देशभर में चर्चित तेघड़ा के सभी 15 पंडाल समेत बरौनी गढ़हरा से चकिया तक और जिले के सभी 18 प्रखंड क्षेत्रों में एक सौ से अधिक जगह पर पंडालों में बाल रूप राधा कृष्ण की प्रतिमाएं सुशोभित हो गई है।


मध्य रात में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म होने के बाद से विशेष पूजा अर्चना कर लोग परिवार, समाज और देश के कल्याण की कामना कर रहे हैं। मेला में लगाए गए झूले जहां बच्चों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं, वही बुजुर्गों के लिए प्रसाद का दुकान ठहराव है। तमाम जगहों पर विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन किए जा रहे हैं। जिला प्रशासन द्वारा सुरक्षा के व्यापक बंदोबस्त करते हुए करीब एक सौ जगहों पर मजिस्ट्रेट के नेतृत्व में पुलिस बल तैनात किए गए हैं। बेगूसराय जिले में वैसे तो मेला तीन-चार दिनों का लगता था लेकिन देर से कोरोना का अनलॉक देर से किए जाने के कारण मेला समिति और व्यवसायियों को विस्तारित मेला लगाने का मौका नहीं मिला तथा सामान्य स्तर पर मेला लगाया गया है। पंडाल भी भव्य नहीं बनाया जा सका और अधिकतर प्रतिमा का विसर्जन एक सितंबर को किया जाएगा।






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श्रीकृष्ण की बताई गई ये 4 बातें, कलियुग में जिंदगी आसान बना सकती है

आधुनिक जीवन में सफलता का अर्थ पैसों और सुख-सुविधा की चीजों से जुड़ा हुआ है. आप जितना भी धन कमा लेंगे दुनिया आपको उतना ही कामयाबी कहेगी, अंधाधुध पैसे कमाने की होड़ में कोई व्यक्ति ये नहीं सोचता कि उससे भौतिक दुनिया की सुख-सुविधा कमाने के कारण कितने पाप हो गए हैं. श्रीमद्भागवत गीता में भगवान कृष्ण ने कई नीतियों के उपदेश दिए हैं. इसमें बताए गए एक श्लोक के अनुसार, जो मनुष्य ये 4 आसान काम करता है, उसे निश्चित ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है. ऐसे मनुष्य के जाने-अनजाने में किए गए पाप कर्म माफ हो जाते हैं और उसे नर्क नहीं जाना पड़ता. आइए, जानते हैं उन कामों के बारे में. 


दान 

दान करने का अर्थ है किसी जरूरतमंद को वो चीज निशुल्क उपलब्ध करवाना, जिसे पाने में वो अक्षम है. दान करने से पहले या बाद किसी को भी दान के बारे में नहीं बताना चाहिए. दान को हमेशा गुप्त ही रखना चाहिए. 


आत्म संयम 

कई बार ऐसा होता है कि हमारा मन और दिमाग दोनों विपरीत दिशा में चलते हैं और हम अधर्म कर बैठते हैं. गीता में दिए गए ज्ञान के अनुसार मन को वश में कर लेने से व्यक्ति द्वारा किसी पाप को करने की संभावना रहती है. 


सत्य बोलना 

कलियुग में सत्य और असत्य का पता लगाना मुश्किल हो गया है. किसी भी व्यक्ति की बात को सुनने मात्र से ये नहीं कहा जा सकता कि वो झूठ बोल रहा है या सच. अगर आपने भूतकाल में कोई गलत काम किया है, तो आप शेष बचे जीवन में हमेशा सत्य बोलकर पापों का प्रायश्चित कर सकते हैं. 


ध्यान या जप 

आधुनिक युग में ऐसे लोग बहुत कम बचे हैं, जो रोजाना ध्यान करते हो. पूजा-पाठ भगवान को प्रसन्न करने के लिए नहीं बल्कि स्वंय का स्वंय से मिलन करवाने के लिए की जाती है. आत्मध्यान करके हम आत्मसाक्षात्कार कर सकते हैं. नियमित रूप से स्वच्छ मन से जप या ध्यान करने से भूल से हुई गलतियों से पार पाया जा सकता है.



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जब गुरु नानक देवजी के चमत्कार से लोगों को मिला मीठा जल

वैसे तो हर गुरुद्वारा अपने आप में खास है लेकिन नानक प्याऊ गुरुद्वारे की स्थापना खुद श्री गुरु नानक देवजी ने की थी। 1505 में दिल्ली में आगमन हुआ तो वह जी.टी. रोड के ऊपर सब्जी मण्डी के बाहर एक बाग में रुके। लोगों ने ऐसे पैगंबर के दर्शन किए जो अपना उपदेश कविता और संगीत के माध्यम से देते थे। कहते हैं उस समय इस इलाके में पाने का पानी नसीब नहीं होता था। जमीन से खारा पानी निकलता था, जिसके कारण लोग परेशान हो रहे थे। तभी गुरु नानक देव जी ने अपनी शक्ति से, अपनी दृष्टि से, जमीन से मीठा पानी निकाला। जिसके बाद यहां रहने वाले तमाम लोगों ने यहां पानी पिया। बाग के मालिक ने यह बाग गुरु के चरणों में भेंट कर दिया। वहां यादगारी स्थान बनवा दिया जो ‘श्री गुरु नानक प्याऊ दी संगत’ करके प्रसिद्ध हो गया। यहां गुरु जी ने अनेक यात्रियों की आत्मक प्यास बुझाई। गुरु साहिब द्वारा कायम की गई सेवा व दान की परंपरा 514 साल से यानि आज भी लगातार चल रही है। जहां से पानी निकला वहां कुआं आज भी बना हुआ है। इसके साइड में बने एक प्याऊ से लोगों को पानी पिलाया जाता है।


दिल्ली के बड़े गुरुद्वारों में से एक है नानक प्याऊ। गुरुद्वारा बंगला साहिब के अलावा सिर्फ नानक प्याऊ में ही सरोवर बना हुआ है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (डीएसजीपीसी) गुरुद्वारे का पूरा ख्याल रखती है। कमिटी के प्रेजिडेंट मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि हाईवे के पास होने से गुरुद्वारे में रोजाना लाखों लोग आते हैं। यहां पर इनके रहने से लेकर खाने तक का पूरा इंतजाम होता है। सिरसा के मुताबिक नानक प्याऊ गुरुद्वारे में सबसे पहले लंगर खुद गुरु नानक देवजी ने शुरू किया था और तब से अब तक यहां लंगर इसी तरह चलता आ रहा है। रोजाना ही हजारों लोग यहां खाना खाने आते हैं। कोई भी भूखा नहीं जाता। सिरसा ने बताया कि गुरुपूरब पर यहां एक लाख से ज्यादा लोग पहुंतचे हैं। यहां डिस्पेंसरी, स्कूल, इंस्टिट्यूट और मैरिज हॉल भी बना हुआ है। बाहर से आने वाले लोगों के लिए डिस्पेंसरी में रोजाना स्पेशल डॉक्टर्स बैठते हैं।


प्रकाश पर्व की तैयारियां

सिरसा ने बताया नानक प्याऊ में ग्रैंड सेलिब्रेशन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। हाल ही में गुरुद्वारा साहिब को पूरी तरह से रेनोवेट किया गया है। इसके कपाट 7 नवंबर को अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह आकर खोलेंगे। वहीं 9 से समागम शुरू होंगे। 3 दिन ऐतिहासिक कार्यक्रम होंगे साथ ही 12 नवंबर को रकाबगंज साहिब गुरुद्वारे में मेन समागम कराया जाएगा। नानक प्याऊ गुरुद्वारे को पूरा नया लुक दिया गया है। गुरुद्वारे के आसपास एनवायरनमेंट को देखते हुए ग्रीनरी का पूरा ख्याल रखा गया है। कई हजार पौधे लगाए गए हैं।




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पवित्र हाजीब शक्करबार शाह की दरगाह कौमी एकता की जीवन्त मिसाल

राजस्थान में झुंझुनू जिले के नरहड़ में स्थित पवित्र हाजीब शक्करबार शाह की दरगाह कौमी एकता की जीवन्त मिसाल है। इस दरगाह की सबसे बड़ी विशेषता हैं कि यहां सभी धर्मो के लोगों को अपनी-अपनी धार्मिक पद्धति से पूजा अर्चना करने का अधिकार है। कौमी एकता के प्रतीक के रुप मे ही यहां प्राचीन काल से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशाल मेला भरता है। जिसमे देश के विभिन्न हिस्सों से हिन्दुओं के साथ मुसलमान भी पूरी श्रद्धा से शामिल होते हैं।


श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर नरहड़ में भरने वाला विशाल मेला और अष्टमी की रात होने वाला रतजगा सूफी संत हजरत शकरबार शाह की इस दरगाह को देशभर में कौमी एकता की अनूठी मिसाल का अद्भुत आस्था केंद्र बनाता है। जहां हर धर्म-मजहब के लोग हर प्रकार के भेदभाव को भुलाकर बाबा की बारगाह में सजदा करते हैं। दरगाह के खादिम एवं इंतजामिया कमेटी करीब सात सौ वर्षों से अधिक समय से चली आ रही सांप्रदायिक सद्भाव को प्रदर्शित करने वाली इस अनूठी परम्परा को सालाना उर्स की माफिक ही आज भी पूरी शिद्दत से पीढ़ी दर पीढ़ी निभाते चले आ रहे हैं। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की छठ से शुरू होने वाले इस तीन दिवसीय धार्मिक आयोजन में दूर-दराज से नरहड़ आने वाले हिंदू जात्री दरगाह में नवविवाहितों के गठजोड़े की जात एवं बच्चों के जड़ूले उतारते हैं।


जन्माष्टमी पर यहां भरने वाले तीन दिवसीय मेले में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, दिल्ली, आंध्रप्रदेश व महाराष्ट्र के लाखों जायरीन शरीक होते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर भरने वाले इस मेले में हिंदू धर्मावलंबी भी बड़ी तादाद में शिरकत कर अकीदत के फूल भेंट करते हैं। जायरीन यहां हजरत हाजिब की मजार पर चादर, कपड़े, नारियल, मिठाइयां और नकद रुपया भी भेंट करते हैं।


दरगाह के वयोवृद्ध खादिम हाजी अजीज खान पठान बताते हैं कि यह कहना तो मुश्किल है कि नरहड़ में जन्माष्टमी मेले की परम्परा कब और कैसे शुरू हुई? लेकिन इतना जरूर है कि देश विभाजन एवं उसके बाद और कहीं संप्रदाय, धर्म-मजहब के नाम पर भले ही हालात बने-बिगड़े हों पर नरहड़ ने सदैव हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल ही पेश की है।


अजीज खान बताते हैं कि जन्माष्टमी पर जिस तरह मंदिरों में रात्रि जागरण होते हैं ठीक उसी प्रकार अष्टमी को पूरी रात दरगाह परिसर में चिड़ावा के प्रख्यात दूलजी राणा परिवार के कलाकार ख्याल (श्रीकृष्ण चरित्र नृत्य नाटिकाओं) की प्रस्तुति देकर रतजगा कर पुरानी परम्परा को आज भी जीवित रखे हुए है। नरहड़ का यह वार्षिक मेला अष्टमी एवं नवमी को पूरे परवान पर रहता है। दरगाह परिसर में गोगा पीर का स्थान बना हुआ है जहां दरगाह में आने वाले श्रद्धालु श्रद्धा से शीश झुकाते हैं। दरगाह परिसर में हाजी बाबा की मजार के पास स्थित गोगापीर का स्थान कौमी एकता का संदेश देता हैं।


मान्यता है कि पहले यहां दरगाह की गुम्बद से शक्कर बरसती थी इसी कारण यह दरगाह शक्करबार बाबा के नाम से भी जानी जाती हैं। शक्करबार शाह अजमेर के सूफी संत ख्वाजा मोइनुदीन चिश्ती के समकालीन थे तथा उन्ही की तरह सिद्ध पुरुष थे। शक्करबार शाह ने ख्वाजा साहब के 57 वर्ष बाद देह त्यागी थी। राजस्थान व हरियाणा मे तो शक्करबार बाबा को लोक देवता के रुप मे पूजा जाता है। शादी, विवाह, जन्म, मरण कोई भी कार्य हो बाबा को अवश्य याद किया जाता है इस क्षेत्र के लोगों की गाय, भैंसों के बछड़ा जनने पर उसके दूध से जमे दही का प्रसाद पहले दरगाह पर चढ़ाया जाता हैं तभी पशु का दूध घर में इस्तेमाल होता है।


हाजिब शक्करबार साहब की दरगाह के परिसर में जाल का एक विशाल पेड़ हैं जिस पर जायरीन अपनी मन्नत के धागे बांधते हैं। मन्नत पूरी होने पर गांवो मेंर रतजगा होता है जिसमें महिलाएं बाबा के बखान के लोकगीत जकड़ी गाती हैं। दरगाह में बने संदल की मिट्टी को खाके शिफा कहा जाता हैं। जिन्हें लोग श्रद्धा से अपने साथ ले जाते। लोगों की मान्यता है कि इस मिट्टी को शरीर पर मलने से पागलपन दूर हो जाता हैं। दरगाह में ऐसे दृश्य देखे जा सकते हैं।


हजरत के अस्ताने के समीप एक चांदी का दीपक हर वक्त जलता रहता हैं। इस चिराग का काजल बड़ा ही चमत्कारी माना जाता है। इसे लगाने से आंखो के रोग दूर होने का विश्वास हैं। दरगाह के पीछे एक लम्बा चौड़ा तिबारा है जहां लोग सात दिन की चौकी भरकर वहीं रहते हैं। नरहड़ दरगाह मे कोई सज्जादानसीन नहीं हैं। यहां के सभी खादिम अपना अपना फर्ज पूरा करते हैं।


दरगाह मे बाबा के नाम पर देश -विदेश से प्रतिदिन बड़ी संख्या मे खत आते हैं जिनमें लोग अपनी-अपनी समस्याओं का जिक्र कर बाबा से मदद की अरदास करते हैं। दरगाह कमेटी के पूर्व सदर मास्टर सिराजुल हसन फारुकी बताते थे कि जिस प्रकार ख्वाजा मोइनुदीन चिश्ती को ‘सूफियों का बादशाह ‘ कहा गया है। उसी प्रकार शक्करबार शाह बागड़ के धणी के नाम से प्रसिद्ध हैं।


नरहड़ गांव कभी राजपूत राजाओं की राजधानी हुआ करता था। उस समय यहां 52 बाजार थे। पठानों के जमाने यहां के लोदी खां गर्वनर थे। राजपूतों के साथ चले युद्घ में उनकी लगातार पराजय हुई। किंवदंति है कि एक बार हार से थक कर चूर हुए लोदी खां और उनकी सेना मजार के निकट विश्राम कर रही थी, तभी पीर बाबा की दिव्य वाणी हुई कि मेरी मजार तक घोड़े दौड़ाने वाले तुम कैसे विजयी हो सकते हो? यदि मजार से हटकर लड़ोगे तो तुम्हारी जीत होगी। इसके बाद लोदी खां ने फिर से आक्रमण किया जिसमें उनकी जीत हुई। उसी समय से यहां हजरत शकरबार पीर बाबा का आस्ताना कायम है। उसी समय यहां मजार व दरगाह का निर्माण करवाया गया। जायरीन में प्रवेश करने वाले प्रत्येक जायरीन को यहां तीन दरवाजों से गुजरना पड़ता है। पहला दरवाजा बुलंद दरवाजा है, दूसरा बसंती दरवाजा और तीसरा बगली दरवाजा है। इसके बाद मजार शरीफ और मस्जिद है।


बुलंद दरवाजा 75 फिट ऊंचा और 48 फिट चौड़ा है। मजार का गुंबद चिकनी मिट्टी से बना हुआ है, जिसमें पत्थर नहीं लगाया गया है। कहते है कि इस गुंबद से शक्कर बरसती थी, इसलिए बाबा को शकरबार नाम मिला। नरहड़ के इस जोहड़ में दूसरी तरफ पीर बाबा के साथी दफन है जिन्हें घरसों वालों का मजार के नाम से जाना जाता है।


इतना महत्तवपूर्ण स्थल होने के उपरान्त भी राजस्थान वक्फ बोर्ड की उदासीनता के चलते यहां का समुचित विकास नही हो पाया है इस कारण यहां आने वाले जायरीनो को परेशानी उठानी पड़ती हैं। झुंझुनू जिला प्रशासन, राजस्थान वक्फ बोर्ड को इस प्रसिद्व दरगाह परिसर का योजनाबद्ध ढ़ंग से समुचित विकास करवाना चाहिये ताकि यहां आने वाले श्रृद्धालुओं को असुविधाओं का सामना नहीं करना पड़े।



-रमेश सर्राफ धमोरा-


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चांद बीबी ने छोड़ दिया इस्लाम, हिंदू धर्म कबूल कर राजीव के संग मंदिर में रचाई शादी

बेगूसराय : दुनिया में सभी लोग अपने धर्म के लिए जीते-मरते हैं, इस्लाम धर्म लोगों को अपने संप्रदाय के सभी लोगों को हर तरह से सुरक्षित रखने की बात करता है लेकिन बिहार के बेगूसराय में मुस्लिम समुदाय की एक लड़की अपने धार्मिक कट्टरवादिता से इतनी परेशान हो गई कि उसने ना केवल इस्लाम धर्म को त्याग कर हिंदू धर्म कबूल कर लिया बल्कि, शुक्रवार की रात मंदिर में जाकर अपने प्रेमी राजीव के साथ पूरे वैदिक रीति रिवाज के साथ शादी के बंधन में बंध गई। जिसमें विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने भरपूर सहयोग किया तथा मौके पर बजरंग दल के प्रांतीय सह संयोजक शुभम भारद्वाज और विश्व हिंदू परिषद के जिला मंत्री विकास भारती समेत बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद थे।


चांद बीबी से चंदा कुमारी बनकर अपने प्रेमी राजीव के संग सात फेरे लेने के बाद काफी खुश नजर आ रही चंदा ने शनिवार को यहां बताया कि वह अपने पांच साल पुराने प्रेमी के साथ रहना चाहती थी लेकिन मजहब की दीवार बाधा उत्पन्न कर रही थी, मजहब की पट्टी आंख पर बांध कर उसके परिजनों ने प्रेमी की जमकर पिटाई की थी। इसके बाद प्रेमिका ने प्रेम के बीच मजहब के उस दीवार को तोड़कर हिंदू धर्म कबूल किया और अब वे चंदा बनकर अपने पति राजीव के साथ सुखमय जिंदगी गुजारेगी। साहेबपुर कमाल थाना क्षेत्र के अहमदगंज बखड्डा निवासी अब्दुल सत्तार की पुत्री चंदा ने बताया कि पांच साल पहले डिजनीलैंड मेला देखने के दौरान उसकी दोस्ती बलिया थाना क्षेत्र के सतीचौरा निवासी कैलाश पासवान के टेंपो चालक पुत्र राजीव कुमार से हो गई। उसके बाद दोनों के बीच प्रेम संबंध प्रगाढ़ होता चला गया। 


वह अभी पढ़ाई कर रही है, तीन दिन पहले जब उसका प्रेमी राजीव किताब देने घर आया तो मेरे परिजनों ने उसके साथ जमकर मारपीट की। मजहब की दीवार में अंधे मेरे परिजन प्रेमी से दूर करना चाहते थे, जब मेरे प्रेमी की पिटाई का विरोध किया तो हम पर भी दबाव बनाया गया। आक्रोशित होकर उसने जहर खाकर जान देने की कोशिश की। इसी दौरान हमारी जान बचाने के लिए विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता सामने आए तथा अस्पताल में इलाज कराया लेकिन परिजन काफी दबाव बना रहे थे, हालत के मद्देनजर उसे इस्लाम धर्म पसंद नहीं आया और उसने इस्लाम धर्म को त्याग कर हिंदू धर्म कबूल कर लिया। ईश्वर को साक्षी मानकर अग्नि के सात फेरे लिए, मैं हिंदू रीति रिवाज के साथ अपने प्रेमी पति राजीव के संग रहूंगी।


विश्व हिंदू परिषद के युवा एवं बजरंग दल के प्रांतीय सह संयोजक शुभम भारद्वाज ने आज शनिवार को बताया कि चांद बीबी को उसके परिजन काफी परेशान कर रहे थे। उसके प्रेम कहानी और जान देने की कोशिश की जानकारी मिलने तथा प्रेमी के संग रहने की इच्छा के बावजूद, पुलिस ने परिजनों पर कार्रवाई करने के बदले उसके प्रेमी राजीव को हिरासत में ले लिया। जानकारी मिलने के बाद हम लोग जब पहुंचे तो उसने इस्लाम धर्म त्याग कर हिंदू धर्म कबूल ने की बात कही। विश्व हिंदू परिषद के पहल पर राजीव को पुलिस से मुक्त करवा कराया गया। हिंदू धर्म कबूल करने के बाद शुक्रवार की रात हिन्दू रीति रिवाज से से गढ़हरा स्थित आर्य समाज मंदिर में शादी कराया गया है, दोनों पति-पत्नी काफी खुश हैं। फिलहाल हर ओर लड़की के इस जज्बे और शादी की जबरदस्त चर्चाएं हो रही है।





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मंदिरों पर लगाई धर्म ध्वजा, गोविंददेवजी मंदिर में तुलसी वितरण जारी

जयपुर : राजधानी जयपुर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का उल्लास परवान चढ़ता जा रहा है। आराध्यदेव गोविंददेवजी मंदिर में बधाइयों के बैनर और बांदरवाल लग चुकी है। इसके अलावा चारदीवारी के विभिन्न मंदिरों के शिखरों पर पचरंगी धर्म ध्वजा लगनी भी प्रारंभ हो गई। वहीं श्री अग्रवाल समाज सेवार्थ ट्रस्ट ने जन्माष्टमी पर्व के उपलक्ष्य में सभी प्रमुख मंदिरों पर धर्म ध्वजा लगाने का बीड़ा उठाया है।


ट्रस्ट के अध्यक्ष चंद्र प्रकाश भाडेवाले ने बताया कि बड़ी चौपड़ के ध्वजाधीश गणेश, चांदपोल के परकोटा गणेश मंदिर के शिखर पर पचरंगी ध्वज लगाया गया। ये ध्वज चारदीवारी के अन्य मंदिरों पर भी लगाए जा रहे। इसके तहत अब तक 1 हजार 500 से अधिक मंदिरों को पचरंगी धर्म ध्वजा वितरण भी किया जा चुका है।


ट्रस्ट के व्यवस्थापक रमेश नारनौली ने बताया गोविंददेवजी मंदिर में तुलसी की पौध का वितरण किया जा रहा है। अब तक करीब पचास हजार पौध वितरित की जा चुकी है। तुलसी पौध वितरण जन्माष्टमी तक चालू रहेगा। दिल्ली रोड बंगाली बाबा गणेश मंदिर में रोजाना तुलसी की पौधे निशुल्क वितरित किए जा चुके है। वहीं इससे पूर्व विभिन्न संस्थाओं,कॉलोनियों की विकास समितियों और व्यक्तिगत रूप से करीब पांच हजार बड़ और पीपल के दस फीट लंबे पौधे भी निशुल्क वितरित किए गए। झण्डे वितरण में आर्ष संस्कृति दिग्दर्शक ट्रस्ट का भी सहयोग रहा।






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हिंदूधर्म की कुछ आवश्यक बातें

विश्व इतिहास में दुनिया का सबसे पुराना धर्म सनातन धर्म यानी हिंदू धर्म को माना गया है। आदिकाल से इस धर्म को मानने वाले लोग इस पृथ्वी पर मौजूद हैं। हिंदू धर्म के बाद ही अन्य धर्मों का जन्म हुआ। लेकिन हिंदूधर्म की कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें विज्ञान भी 101 प्रतिशत सही मानता है। अमूमन हम इस तरह के क्रियाकलाप से हर दिन रू-ब-रू होते हैं लेकिन इनके पीछे के विज्ञान को नहीं जानते इस क्रम में पहले भाग में हम कुछ बातों को जानते हैं।


इसीलिए दोनों हाथ जोड़ कर करते हैं नमस्कारः भारत में विशेष तौर पर हिंदू धर्म के लोग जब आपस में मिलते हैं तो हाथ जोड़कर अभिवादन करते हैं। हालांकि यह चलन में नहीं हैं। इसका वैज्ञानिक कारण है। जब हम अपने दोनों हाथों को जोड़ते हैं तो अंगुलियां पर दबाव बनता है। ये अंगुलियां आंख, कान और मस्तिष्क से जुड़ी होती हैं। जो लंबे समय तक उन्हें बेहतर रखने में सहायक होता है।


भारतीय महिलाएं पैरों में इसलिए पहनती बिछूड़ी (रिंग): पैरों में रिंग पहनना विवाह का प्रतीक माना जाता है। विज्ञान कहता है कि पैरों के अंगूठे के पास की अंगुली गर्भाशय की विशेष तंत्रिका से जुड़ी होती है, और इसके पास की अंगुली हदय के पास होती है। इसलिए इन दोनों में रिंग पहनने से मासिक धर्म के समय रक्त प्रवाह, और हदय से रक्त का प्रवाह संतुलित रहता है।


नदी में इसलिए फेंकते हैं सिक्केः आमतौर पर ऐसा कहा जाता है कि ऐसा शुभ सूचक होता है। लेकिन विज्ञान कहता है कि पुराने समय में सिक्के तांबे और चांदी के हुआ करते थे। नदी में फेंकने पर उसके पानी में इन तत्वों का समावेश होता था। इन तत्वों की शरीर को भी जरूरत होती है। ऐसे में ये जल के द्वारा मिल जाया करते थे।


इसलिए माथे पर लगाते हैं कुमकुम और तिलक: विज्ञान कहता है कि मस्तिष्क मानव शरीर का सबसे मुख्य अंग है। और मस्तिष्क में भी माथा मुख्य है। ऐसे में यदि हम चंदन का तिलक या लाल कुमकुम लगाते है तो हमारे मस्तिष्क की ऊर्जा एक जगह केंद्रित रहती है। यह क्रम सदियों से चल रहा है।


मंदिर में घंटा-घंटी इसलिए हैं बजाते: जब भी हम मंदिर जाते हैं से सबसे पहले मंदिर का घंटा बजाते हैं। विज्ञान कहता है ऐसा करने पर जब हम घंटा बजाते हैं तो हमारा मन एकाग्र हो जाता है। घंटाध्घंटियां की आवाज एक तरह की ध्वनि उत्पन्न करती है जो हमारे दिमाग एकता पैदा करती है। घंटी की ध्वनि बहुत कम समय के लिए हो लेकिन गूंज हमारे मन से तमाम तरह की नकारात्मक ध्वनियों को दूर करती है।



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अयोध्या में राम मंदिर जाने वाले मार्ग सहित पांच जिलों में मंदिर आंदोलन के नायक कल्याण सिंह के नाम सड़क

लखनऊ :  देश में आदर्श तथा मूल्यों की राजनीति करने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राजस्थान व हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल कल्याण सिंह के कद का लोगों को अब अहसास हो रहा है। शनिवार को उनके निधन के बाद से अब तक लोगों की आंखों में आंसू थमने का नाम नहीं रहे हैं। उनके अंतिम दर्शन के साथ ही श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा है। इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़ा काम किया है।

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पांच जिलों में सड़कों का नाम पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह मार्ग करने का फैसला किया है। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री तथा लोक निर्माण विभाग के मंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि पांच जिलों राजधानी लखनऊ के साथ अयोध्या, प्रयागराज, अलीगढ़ तथा बुलंदशहर में एक-एक सड़क अब कल्याण सिंह के नाम पर होगी। इसके साथ ही अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर तक जाने वाली सड़क का नाम कल्याण सिंह मार्ग होगा।

राम मंदिर आंदोलन में स्वर्गीय कल्याण सिंह का बलिदान किसी से छिपा नहीं है। राम मंदिर के लिए उन्होंने सीएम की कुर्सी तक छोड़ दी थी। राम मंदिर आंदोलन में उनके योगदान को देखते हुए सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। अब उनके इस बलिदान के लिए सरकार ने उन्हें खास सम्मान दिया है। यूपी की कई सड़कें अब कल्याण सिंह मार्ग के नाम से जानी जाएंगी। 

केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर तक जाने वाले सड़क का नाम कल्याण सिंह मार्ग रखा जायेगा। उन्होंने बताया कि इसको लेकर अब लोक निर्माण विभाग जल्द कागजी प्रक्रिया को पूरी करेगा। अधिकारियों को भी इस बाबत जल्द प्रस्ताव प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार कल्याण सिंह की कर्मभूमि माने जाने वाले अलीगढ़ में एयरपोर्ट का नामकरण भी कल्याण सिंह एयरपोर्ट कर सकती है। 

केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि स्वर्गीय बाबू जी ने राम मंदिर के लिए सत्ता छोड़ दी परंतु कारसेवकों पर गोली नहीं चलाई। राम भक्त बाबू जी श्री कल्याण सिंह सदैव अमर रहेंगे। उनका निधन भारतीय राजनीति एवं भाजपा के लिए अपूरणीय क्षति है। 



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धर्म की आड में सियासत का खेल

जीवन के सत्य को स्वीकारने के लिए समसामयिक परिस्थितियों की भूमिका बेहद महात्वपूर्ण होतीं है। वर्तमान में अफगानस्तान के हालातों ने जहां विश्व के आम लोगों को चौंका दिया है वहीं अमेरिका की नीतियों और नियत पर एक बार फिर समीक्षाओं का दौर चल निकला है। नोटो की भूमिका पर प्रश्न चिंह अंकित होने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ को भी अफगाकियों की चीखें सुनाई नहीं दे रहीं है। रूस, चीन जैसे राष्ट्र तालिबान को मान्यता देन-दिलाने में ही नहीं बल्कि पूरा सहयोग करने में जुटे हैं। अमेरिका का समर्थन तो उसे पहले ही एग्रीमेन्ट के तहत मिल चुका था। बाकी के देश भी आतंक के ठहाके के मध्य सहमे हुए हैं। लोग खामोशी से तालिबान के अगले कदम की प्रतीक्षा कर रहे हैं, उसकी घोषणाओं पर एकाग्र हैं और सुखद भविष्य के लिए दुआयें मांग रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि स्वयं की परिधि से बाहर न तो देश निकले हैं, और न ही लोग। जब किसी देश पर कोई सक्षम दल आक्रमण कर देता है, तब ही वह मानवता की दुहाई का शोर मचाने लगता है। बाकी के समय में आंखों के सामने हो रहे जुल्म पर भी आंखें फेरकर बांसुरी बताता है। यही हाल लोगों का है। 


पडोसी पर होते अत्याचार पर खामोश रहने वाले स्वयं के उत्पीडन पर हाय-तोबा मचाने लगते हैं। आंकडों के आधार पर तालिबानियों की संख्या अफगानी सेना से बहुत कम थी, ऊंचे मनोबल के साथ यदि वह लडती तो निश्चय ही तालिबानी नस्तनाबूत हो जाते। अगर अफगान की आवाम आतिताइयों के विरुध्द एकजुट होकर खडी हो जाती तो तो हथियारों का जखीरा और आतंक की इबारत दौनों ही रसातल में चले जाते। मगर आत्मविश्वास की कमी, राष्ट्रभक्ति का अभाव और समर्पण की शून्यता के कारण ही मुट्ठी भर लोगों ने मनमानियों का तांडव मचा रखा है। ऐसा ही तांडव कभी हिन्दुस्तान में भी गजनी, गौरी जैसे लुटेरों नें मचाया था। तब पुरुषार्थ करने के स्थान पर भगवान के सहारे सोमनाथ को छोडने वालों की पीठें, चाबुकों की मार से लुटेरों ने लाल कर दीं थीं। ऐसा केवल हिन्दुस्तान या अफगानस्तान में ही नहीं हुआ बल्कि कफन बांधकर निकले लुटेरों ने अनेक देशों को अपने जुल्म का शिकार बनाया। कारण केवल इतना ही था कि हम स्वयं तक सीमित होकर रह गये। शासन, शासक और शासित को अलग-अलग मानते रहे, जबकि वास्तविकता तो यह है कि वे जिस व्यवस्था को बनाने हेतु चन्द लोगों को पूर्णकालिक बनाया जाता हैं हम भी उसी व्यवस्था के अंशकालिक अंग हैं। जब तक ऐसी सोच, मनोभूमि और विचार स्थाई रूप से स्थापित नहीं हो जाते, तब तक आतंक जैसे शब्दों को विश्वकोश से हटाया नहीं जा सकता। 


हमें स्वयं की परिधि से बाहर निकलना होगा। पूरे राष्ट्र ही नहीं बल्कि पूरी सृष्टि को स्वयं में निहित मानना होगा तभी इस तरह की समस्याओं से निदान हो सकेगा। इस संदर्भ में वैदिक ग्रंथों का व्यवस्थायें स्वमेव ही समाचीन हो जातीं है। पेडों की पूजा, नदियों को मां, पर्वतों को गिरिराज, पशुओं का पालन, पक्षियों के दर्शन को शुभ, पडोसी को परिजन और आगंतुक को भगवान के रूप में स्वीकारने जैसी अनगनित मान्यतायें हमारे पुरातन साहित्य में भरी पडी है। मगर हमने ही विश्वगुरु की उपाधि से विभूषित होने के बाद आत्म चिन्तन को तिलांजलि दे दी थी। कालान्तर में वसुधैव कुटुम्बकम् का अवधारणायें संचय की प्रवृति और शोषण की मानसिता में बदल गई। चापलूसी और चाटुकारिता से भौतिक संसाधन जुटाने वाले लोग स्वजनों-परिजनों की परिधि से बाहर ही नहीं निकल पाये। जयचन्द जैसें का बाढ में राष्ट्रीय आदर्श कहीं बह से गये। अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक पू्ज्यवर पंडित श्रीराम शर्मा जी ने एक नारा दिया था कि हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा। इस नारे के साथ एक लाइन जोडना आज आवश्यक हो गई है कि हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा की गूंज के बाद कब सुधरोगे भी स्वयं से पूछना होगा तभी सकारात्मक परिणाम सामने आ सकेंगे। अन्यथा दूसरों को उपदेश देने वाले स्वयं उनका अनुशरण न करके शिक्षक-परीक्षक जैसे पदों पर स्वयं आसीत हो जाते हैं। मानवता के नाम पर मनमानी करने वाली चालें हमेशा से ही चली जातीं रहीं है। 


अधिकांश देश इस दिशा में कीर्तिमान बनाने की होड में लगे रहते हैं जब कि उन्हीं के देश में नागरिकों पर खासी पाबंदिया लगी होतीं है, मानवाधिकार की खुले आम धज्जियां उडाई जातीं हैं और किया जाता है लोगों पर जुल्म। इन सब के बाद भी वह दूसरों के घरों में झांक कर चौधरी बनने की फिराक में हमेशा रहते हैं। ऐसे देशों की संख्या में गत दिनों खासी बढोत्तरी हुई है। अफगानस्तान के हालातों में भविष्य की आहट स्पष्ट सुनाई दे रही है। हथियार, ताकत और कुटिलता की दम पर आंतकियों का बोलबाला पूरी दुनिया में होने वाला है। धर्म की आड में सियासत का खेल खुलकर खेला जा रहा है। प्रजातंत्र, जनतंत्र, लोकतंत्र, गुटनिरपेक्ष, धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्द बोलने वालों को कट्टरता के विरुध्द मानवता के लिए एक जुट होना चाहिए, अन्यथा कट्टरता का दावानल दहाडता हुआ एक-एक करके समूची सभ्यता को अपने आगोश में ले लेगा और हम केवल ऊपर बाले से सलामती की दुआ मांगते रहेंगे। हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि ऊपर वाला भी उसी की मदद करता है जो स्वयं की मदद करता है। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी। 


-डा. रवीन्द्र अरजरिया-



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छह वर्ष बाद आया मौका, मथुरा में एक ही दिन मनेगा लाला का जन्मोत्सव

आगरा : जन-जन के आराध्य नटवर नागर श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की तैयारियां तेज हो गई हैं। संयोग ऐसा ही इस बार मथुरा के मंदिरों में एक ही दिन में ब्रजवासी अपने लाला का जन्मोत्सव मनाएंगे। श्रीकृष्ण जन्मस्थान और प्राचीन केशव देव मंदिर में छह वर्ष बाद ऐसा संयोग आया है, तो नंदगांव में भी छह वर्ष बाद एक ही दिन जन्म का उत्सव मनेगा।


भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इस वर्ष ये तिथि 30 अगस्त को पड़ रही है। ये तिथि 29 अगस्त की रात 11.25 बजे से 30 अगस्त की रात 1.59 बजे तक रहेगी। 30 अगस्त की सुबह 6.38 बजे से 31 अगस्त सुबह 9.43 बजे तक रोहिणी नक्षत्र रहेगा। ज्योतिषाचार्य कामेश्वर चतुर्वेदी कहते हैं कि अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र एक साथ पड़ रहे हैं, इसे जयंती योग मानते हैं और इसलिए ये संयोग और बेहतर है। द्वापरयुग में जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, तब भी जयंती योग पड़ा था। श्रीकृष्ण जन्मस्थान के साथ प्राचीन केशवदेव मंदिर, नंदगांव के नंदबाबा मंदिर में भी जन्माष्टमी 30 अगस्त को ही मनाई जाएगी।


दरअसल, श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर जन्माष्टमी की तिथि में जिस दिन सूर्योदय पड़ता है, उस दिन जन्मोत्सव मनता है। जबकि प्राचीन केशव देव मंदिर में जन्माष्टमी की तिथि शुरू होने के दिन जन्मोत्सव मनाया जाता है। ऐसे में हर साल प्राचीन केशव देव में एक दिन पहले जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस बार एक ही दिन तिथि पड़ेगी। ऐसे में इन दोनों मंदिरों में 30 अगस्त को ही जन्मोत्सव मनाया जाएगा। ऐसा वर्ष 2015 में और उसके पहले 2001 में हुआ था। छह वर्ष बाद फिर ऐसा संयोग बना है। उधर, नंदगांव के नंदभवन मंदिर में रक्षाबंधन के आठ दिन बाद कान्हा का जन्मोत्सव मनाय जाता है। इस बार रक्षाबंधन के आठ दिन बाद ही जन्माष्टमी की तिथि पड़ रही है। इसलिए नंदगांव में भी छह साल बाद इसी दिन जन्मोत्सव मनाया जाएगा।


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 30 अगस्त को मनाई जाएगी। जन्मस्थान पर उत्सव अष्टमी के सूर्योदय के दिन मनाया जाता है जो तीस अगस्त को पड़ेगा।


गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी-सदस्य, श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान


जिस तारीख को अष्टमी लगती है, उसी तारीख में जन्माष्टमी का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष अष्टमी की तिथि 30 अगस्त को है। इसलिए 30 अगस्त को जन्माष्टमी मनाई जा रही है।


नारायण शर्मा-मीडिया प्रभारी, प्राचीन केशवेदव मंदिर


धार्मिक मान्यता है कि नंदबाबा भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन रक्षाबंधन के आठ दिन बाद मनाते थे। इस कारण नंदगांव में जन्मोत्सव भी इस बार 30 अगस्त को ही मनाया जाएगा।


दानबिहारी गोस्वामी-सेवायत, नंदबाबा मंदिर






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