एसीएससी ने किसान प्रदर्शन स्थल पर 'लिंचिंग' के दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को कहा

नई दिल्ली : राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने दिल्ली-हरियाणा सीमा के पास कुंडली में किसानों के प्रदर्शन स्थल पर एक शख्स की भीड़ द्वारा हत्या (लिंचिंग) के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ हरियाणा पुलिस से सख्त कार्रवाई करने को कहा है।


आयोग के प्रमुख विजय सांपला ने हरियाणा पुलिस से शुक्रवार को 24 घंटे के भीतर प्रारंभिक रिपोर्ट भी देने को कहा।


दिल्ली-हरियाणा सीमा के पास कुंडली में किसानों के प्रदर्शन स्थल पर एक व्यक्ति की भीड़ ने हत्या की, उसके हाथ काट दिए और शव को वहां लगे धातु अवरोधक से बांध दिया। इस निर्मम घटना के लिए निहंगों के समूह को जिम्मेदार ठहराया गया है।


सांपला ने कहा कि मृतक की पहचान लखबीर सिंह के तौर पर हुई है जिसका ताल्लुक अनुसूचित जाति के समुदाय से था।


सांपला ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा कि एनसीएससी ने हरियाणा पुलिस से 24 घंटे के भीतर प्रारंभिक रिपोर्ट मांगी है।


सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हुई एक वीडियो क्लिप में, कुछ निहंग जमीन पर खून से लथपथ पड़े व्यक्ति के पास खड़े दिख रहे हैं। क्लिप में निहगों को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि व्यक्ति को सिखों की पवित्र पुस्तक का अपमान करने की सजा दी गई है।


केंद्र के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाप दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि निहंगों के एक समूह ने इस निर्मम हत्या की जिम्मेदारी ली है।





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किसान आंदोलन : सिंघु बार्डर पर एक युवक की बेरहमी से हत्या, हाथ काटकर शव बैरिकेड से लटकाया

नई दिल्ली :  तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में लगातार 10 महीने से जारी किसानों के धरना प्रदर्शन के बीच दिल्ली-हरियाणा के सिंघु बार्डर पर एक हैरान करने वाली घटना सामने आई है। यहां पर एक युवक की पहले तो बेरहमी से हत्या की गई फिर उसके हाथ काटकर लटका दिया गया। इस बाबत शुक्रवार सुबह से ही इस घटना के बाबत कई तस्वीरें वायरल हैं, जिसमें इसमें साफ देखा जा सकता है कि सिंघु बार्डर पर एक युवक के दोनों हाथों को बांधकर लटकाया गया है और इस युवक की मौत की जानकारी सामने आ रही है। 

बृहस्पतिवार रात को दिल्ली-हरियाणा के सिंघु बार्डर पर कुछ लोगों ने एक अनजान व्यक्ति का दाहिना हाथ काट कर मार दिया। इसके बाद शव को किसानों के धरना स्थल के पास ले जाकर 'सूली' पर लटका दिया। युवक को मारने और हाथ काटकर सूली पर लटकाने का आरोप निहंगों पर लगा है। इनका कहना है कि इस युवक ने हमारे गुरु ग्रंथ साहिब का अंग भंग किया। हालांकि, जान गंवाने इस व्यक्ति की अभी शिनाख्त नहीं हुई है। 

निहंगों का यह भी कहना है कि इस शख्स को  30,000 रुपये देकर किसी ने ऐसा करने के लिए भेजा था। आरोप है कि बृहस्पतिवार रात में ही निहंगों ने इस कृत्य की वीडियो भी बनाई। फिर इसे शुक्रवार सुबह वायरल किया। बताया जा रहा है कि आरोपित निहंगों ने ऐसा जानबूझकर किया है।

कहा जा रहा है कि युवक की हत्या बृहस्पतिवार रात को ही की गई, उसके बाद शुक्रवार सुबह 5:30 बजे संयुक्त किसान मोर्चा की मुख्य स्टेज के पास करीब 100 किलोमीटर घसीट कर निहंगों के ठिकाने यानी फोर्ड एजेंसी के पास शव को लाया गया। इसके बाद सुबह 6:00 बजे शव को लटकाया गया है, ताकि लोग देख सकें। वहीं, प्रबंधक थाना रवि कुमार मौके पर पहुंच गए हैं। बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले की जांच शुरू कर दी गई है।

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आंदोलन की तैयारी में जुटे किसान

 नोएडा : जिले के तीनों प्राधिकरण को खिलाफ 18 अक्तूबर को होने वाले आंदोलन को लेकर किसान तैयारी में जुटे हैं। इस आंदोलन में अधिक से अधिक संख्या में लोगों की भीड़ जुटाने के लिए गांव-गांव जाकर जन जागरण अभियान चलाया जा रहा है। भाकियू के किसानों ने गुरुवार को ग्रेनो के कई गांवों में जाकर नुक्कड़ सभाएं कीं।


भाकियू के प्रदेश महासचिव पवन खटाना ने सफीपुर गांव में नुक्कड़ सभा कर किसानों को संबोधित किया। प्रदेश महासचिव पवन खटाना ने कहा जिले का किसान काफी समस्या से जूझ रहा है। प्रदेश महासचिव ने कहा कि 18 अक्तूबर को किसान अपने हक की लड़ाई के लिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में इकट्ठा हो। किसान 18 अक्टूबर को जीरो पॉइंट पर इकट्ठा होकर नोएडा के लिए कूच करेंगे। किसानों का आंदोलन तीनों प्राधिकरण के खिलाफ होगा। इस मौके पर सुनील प्रधान, राजे प्रधान, प्रमोद सफीपुर, अजीत चेची, अजीपाल नंबरदार, सुंदर खटाना, चंद्रपाल आदि किसान मौजूद रहे।






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संयुक्त किसान मोर्चा ने दशहरे पर मोदी, अजय मिश्रा का पुतला जलाने की चेतावनी दी

नई दिल्ली : लखीमपुर खीरी में तीन अक्टूबर को काफिले की गाड़ी से कुचले गए किसानों की आत्मा की शांति के लिए अंतिम अरदास के एक दिन बाद, बुधवार को संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र का पुतला जलाने की चेतावनी दी।


एसकेएम ने कहा कि मोदी और कई अन्य भाजपा नेता, जिनमें गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा शामिल हैं, जिनके बेटे आशीष मिश्रा इस मामले में मुख्य आरोपी हैं, के पुतले 15 अक्टूबर को दशहरा के अवसर पर फूंके जाएंगे।


अजय मिश्रा टेनी को तुरंत बर्खास्त और गिरफ्तार करने की अपनी मांग दोहराते हुए, एसकेएम ने एक बयान में कहा, काले झंडों के साथ विरोध कर रहे किसानों को अजय मिश्रा की धमकी के कई वीडियो मौजूद हैं, यह स्पष्ट है कि वह दुश्मनी, घृणा और वैमनस्य को बढ़ावा दे रहे थे। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री के रूप में उनकी निरंतरता न्याय से समझौता करती है, और यह अकल्पनीय है कि नरेंद्र मोदी सरकार उनका बचाव करना जारी रखे हुए है।


3 अक्टूबर को लखीमपुर खीरी हिंसा में किसानों और एक पत्रकार समेत नौ लोगों की मौत हो गई थी।


एसकेएम ने मंगलवार को शहीद किसान दिवस करार देते हुए मारे गए किसानों की आत्मा की शांति के लिए अंतिम अरदास की थी। बयान में कहा गया है कि पूरे भारत में हजारों किसानों ने मोमबत्ती की रोशनी में श्रद्धांजलि सभा की।




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संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत: न्यायालय ने जंतर-मंतर पर सत्याग्रह की इजाजत मांग रहे किसान संगठन से कहा

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे और यहां जंतर-मंतर पर ‘सत्याग्रह’ करने की अनुमति देने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने का अनुरोध कर रहे एक किसान संगठन से शुक्रवार को कहा, "आपने पूरे शहर को पंगु बना दिया है और अब आप शहर के भीतर आना चाहते हैं और यहां फिर से विरोध शुरू करना चाहते हैं।"


न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति सी टी रविकुमार की पीठ ने कृषकों के संगठन ‘किसान महापंचायत’ और उसके अध्यक्ष से कहा कि एक बार जब उन्होंने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ अदालत का रुख कर लिया था तो उन्हें न्यायिक व्यवस्था में भरोसा रखना चाहिए और मामले में फैसला होने देने चाहिए था।


शीर्ष अदालत ने कहा कि नागरिकों को भी बिना किसी डर के स्वतंत्र रूप से घूमने का समान अधिकार है और विरोध में उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।


अदालत ने कहा, “एक संतुलित दृष्टिकोण होना चाहिए।”


पीठ ने याचिकाकर्ताओं को एक हलफनामा दायर करने के लिए कहा कि वे उस विरोध का हिस्सा नहीं हैं, जो हो रहा है और जिसके तहत शहर की सीमाओं पर राष्ट्रीय राजमार्गों को अवरुद्ध किया गया है। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख चार अक्टूबर को निर्धारित कर दी।


कई किसान संगठन तीन कानूनों - किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020, आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 और मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम, 2020 पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता, 2020 के पारित होने का विरोध कर रहे हैं।


शुरुआत में, विरोध पिछले साल नवंबर में पंजाब से शुरू हुआ और बाद में मुख्य रूप से दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में फैल गया।




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भारत बंद के कारण 25 ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित : रेलवे

नई दिल्ली : केन्द्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ विभिन्न किसान यूनियन द्वारा आहूत ‘भारत बंद’ के कारण सोमवार को करीब 25 ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित हुई।


उत्तर रेलवे के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘‘दिल्ली, अंबाला और फिरोजपुर संभागों में 20 से अधिक स्थानों पर जाम हैं। इसके कारण करीब 25 ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित हुई है।’’


अधिकारियों ने बताया कि दिल्ली-अमृतसर शान-ए-पंजाब, नई दिल्ली-मोगा एक्सप्रेस, नई दिल्ली से कटरा जाने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस और अमृतसर शताब्दी आदि प्रभावित ट्रेनों में शामिल हैं।


किसान संगठनों ने तीन कृषि कानूनों के पारित होने के एक साल पूरा होने पर सोमवार को भारत बंद का आह्वान किया है। बंद सुबह छह बजे से शाम चार बजे तक प्रभावी रहेगा।




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संयुक्त किसान मोर्चा के 'भारत बंद' को सपा का पूर्ण समर्थन : अखिलेश यादव

लखनऊ : समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने केंद्र के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ संयुक्त किसान मोर्चा के आंदोलन और उनके 'भारत बंद' के आह्वान का समर्थन करते हुए सोमवार को कहा कि किसानों को सम्मान नहीं देने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया है।


सपा प्रमुख ने ट्वीट कर किसान आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा की। यादव ने ट्वीट किया, ''संयुक्त किसान मोर्चा के 'भारत बंद' को सपा का पूर्ण समर्थन है। देश के अन्नदाता का मान न करने वाली दंभी भाजपा सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार खो चुकी है। किसान आंदोलन भाजपा के अंदर टूट का कारण बनने लगा है।''


उन्होंने पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के निर्माण को लेकर भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, ''पूर्वांचल की गरीबी व पिछड़ेपन को दूर करने के लिए जिस समाजवादी पूर्वांचल एक्सप्रेस वे (लखनऊ-बलिया) का शिलान्यास किया गया था उसके पूरा होने की खुशी है, पर ये दुख भी है कि भाजपा ने इसके मूल स्वरूप व गुणवत्ता से समझौता किया है।'' यादव ने कहा, ''भाजपा विकास के रास्ते बनाना नहीं जानती है।





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किसान यूनियनों का भारत बंद, हमने कोई रास्ता सील नहीं किया हैः टिकैत

नई दिल्ली : केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानून का विरोध कर रहे किसान संगठनों का भारत बंद अभियान सुबह 6:00 बजे शुरू हुआ, जिसके चलते कई जगह से यातायात में रुकावट की सूचना मिल रही है। किसान संगठनों के भारत बंद के मद्देनजर उत्तर प्रदेश से दिल्ली में गाजीपुर बॉर्डर की ओर से प्रवेश करने वाला यातायात रोका गया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लाल किला क्षेत्र के आसपास चौकसी बढ़ा दी गई है और उधर जाने वाले कुछ रास्तों को बंद कर दिया गया है। इस बीच किसान नेता राकेश टिकैत ने एक बयान में कहा कि एंबुलेंस, डॉक्टर और आपातकालीन कारण से यात्रा करने वालों को गुजरने दिया जाएगा। हमने कोई रास्ता सील नहीं किया है। हम केवल एक संदेश देना चाहते हैं। हम दुकानदारों से अपील करते हैं कि वे अभी अपनी दुकानें बंद रखें और 4:00 बजे के बाद खोलें। वहीं, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने किसानों के आंदोलन के समर्थन में ट्विटर पर लिखा किसानों का अहिंसक सत्याग्रह आज भी अखंड है, लेकिन शोषण- कार सरकार को यह नहीं पसंद है....। गौरतलब है कि करीब 40 संगठनों के संयुक्त किसान मोर्चे ने सोमवार सुबह 6:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक देशभर में जगह-जगह धरने और प्रदर्शन का ऐलान किया है। कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने किसानों के भारत बंद का समर्थन किया है। वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसान से आंदोलन का रास्ता छोड़कर बातचीत से मुद्दे का समाधान निकालने की अपील की है। किसानों के आज के विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर जगह- जगह यातायात बाधित होने की आशंका है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली सहित कई अन्य राज्यों की पुलिस ने स्थिति से निपटने के लिए विशेष प्रबंध किए हैं। 









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भारत बंद : लाल किले के दोनों मार्ग बंद

नई दिल्ली : दिल्ली यातायात पुलिस ने प्रतिष्ठित लाल किले के दोनों मार्गों को बंद कर दिया है। एक अधिकारी ने सोमवार को यहां यह जानकारी दी।


अधिकारी ने कहा, छत्तरेल और सुभाष मार्ग को दोनों तरफ से बंद कर दिया गया है।


यह कदम संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा सोमवार को दिए गए भारत बंद के आह्वान के मद्देनजर उठाया गया है।


26 जनवरी को लाल किले की घटना कैसे एक गंभीर हिंसा में बदल गई, इस बात को ध्यान में रखते हुए इस बार पुलिस बल को अधिक सतर्क देखा गया।


26 जनवरी को, कृषि सुधार कानूनों का विरोध करने वाले हजारों किसानों ने सीमाओं पर सुरक्षा घेरा तोड़ दिया और अपने ट्रैक्टर मार्च के लिए ऐतिहासिक राजपथ तक पहुंचने के असफल प्रयास में राष्ट्रीय राजधानी में प्रवेश किया।


हालांकि, सैकड़ों प्रदर्शनकारी पुलिस सुरक्षा का उल्लंघन करते हुए लाल किले में प्रवेश करने में सफल रहे और स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराए जाने वाले पोल पर एक धार्मिक और कृषि संघ का झंडा लगाया।


इससे पहले सोमवार को विरोध के चलते उत्तर प्रदेश से गाजीपुर सीमा की ओर यातायात बंद कर दिया गया।


किसानों को बड़ी संख्या में सड़क पर बैठे और कृषि कानूनों के खिलाफ नारे लगाते देखा जा सकता है।


इस बीच, दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने पंडित श्री राम मेट्रो स्टेशन को बंद कर दिया है जो पश्चिमी दिल्ली में टिकरी सीमा के करीब है।


बाकी जगहों पर दिल्ली मेट्रो बिना किसी देरी के काम कर रही है।


एसकेएम ने कहा है कि सुबह छह बजे से शाम चार बजे तक बंद रहेगा, जिसके दौरान पूरे देश में सभी सरकारी और निजी कार्यालय, शैक्षणिक और अन्य संस्थान, दुकानें, उद्योग और वाणिज्यिक प्रतिष्ठान के साथ-साथ सार्वजनिक कार्यक्रम और समारोह बंद रहेंगे।



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दिल्ली में सामान्य रूप से चल रही हैं ऑटो, टैक्सी...दुकानें भी खुलीं

नई दिल्ली : केन्द्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ विभिन्न किसान यूनियन द्वारा सोमवार को आहूत 'भारत बंद' के बावजूद दिल्ली में ऑटो-रिक्शा तथा टैक्सी सामान्य रूप से सड़कों पर चलती नजर आईं और अधिकतर दुकानें भी खुली दिखीं। उनकी यूनियन तथा संघों ने किसानों के बंद को केवल ''सैद्धांतिक समर्थन'' देते हुए हड़ताल ना करने का फैसला किया है।


ऑटो, टैक्सी यूनियन और व्यापारी संघों का कहना है कि कोविड-19 वैश्विक महामारी और लॉकडाउन के कारण उनकी आजीविका पहले ही बुरी तरह प्रभावित हुई है, इसलिए वे किसी भी हड़ताल में शामिल नहीं हो रहे हैं।


दिल्ली ऑटो टैक्सी यूनियन के महासचिव राजेंद्र सोनी ने कहा, '' पहले भी हमने किसानों द्वारा भारत बंद का समर्थन किया था, लेकिन अपने ऑटो और टैक्सी को चलाना जारी रखा था। इस बार भी हम किसानों का समर्थन कर रहे हैं लेकिन हड़ताल नहीं कर हैं क्योंकि वैश्विक महामारी के समय कम हुई कमाई के कारण हमारे सदस्य काफी संकट में हैं।''


'कैब संघों' का प्रतिनिधित्व करने वाले दिल्ली के 'सर्वोदय ड्राइवर एसोसिएशन' ने भी किसानों का समर्थन किया, लेकिन हड़ताल में शामिल नहीं हुए।


एसोसिएशन के अध्यक्ष कमलजीत गिल ने कहा, '' हम किसानों के समर्थन में हैं, लेकिन वैश्विक महामारी के कारण हमारा काम प्रभावित हुआ है और हम उनके समर्थन में हड़ताल करके खुद नुकसान नहीं उठा सकते।''


अन्य ऑटो तथा टैक्सी यूनियन की भी यही राय है।


राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ऑटो चालक संघ के सचिव अनुज राठौड़ ने कहा, '' हम किसानों का पूरा समर्थन करते हैं। लेकिन कोविड-19 के कारण जो वित्तीय संकट हमने उठाया है, उसे देखते हुए....हम सामान्य रूप से काम करते हुए उन्हें और उनकी मांग को अपना नैतिक एवं सैद्धांतिक समर्थन दे रहे हैं।''


'चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री' (सीटीआई) के अध्यक्ष बृजेश गोयल ने कहा कि शहर में बाजार और दुकानें खुली हैं क्योंकि किसानों ने हड़ताल के लिए हमारे संघ से कोई सम्पर्क नहीं किया।


उन्होंने कहा, '' साथ ही, त्योहारों के नजदीक होने के चलते यह व्यापारियों का वैश्विक महामारी और लॉकडाउन के कारण हुए नुकसान से उबरने का समय है। हालांकि हम किसानों का पूरा समर्थन करते हैं और सरकार से उनकी मांग पूरी करने की अपील करते हैं।''


उन्होंने कहा कि व्यापारी, किसानों और उनकी मांगों का समर्थन करते हैं लेकिन वे दुकानें बंद करने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि वे अपने व्यापार एवं व्यवसायों पर वैश्विक महामारी के प्रतिकूल प्रभाव के कारण पहले से ही संकट में हैं।


गौरतलब है कि देश के विभिन्न हिस्सों, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान, पिछले साल नवंबर से दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी केन्द्र के तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। किसानों को भय है कि इससे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रणाली खत्म हो जाएगी, हालांकि सरकार इन कानूनों को प्रमुख कृषि सुधारों के रूप में पेश कर रही है। दोनों पक्षों के बीच 10 दौर से अधिक की बातचीत हो चुकी है,लेकिन इनका कोई नतीजा नहीं निकला है।

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भारत बंद: दिल्ली पुलिस ने सीमा पर सुरक्षा कड़ी की

नई दिल्ली : केन्द्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ विभिन्न किसान यूनियन द्वारा सोमवार को आहूत भारत बंद के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर सुरक्षा कड़ी कर दी है।


प्रदर्शन में शामिल 40 से अधिक किसान यूनियन का नेतृत्व कर रहे ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ (एसकेएम) ने लोगों से भी बंद में शामिल होने की अपील की थी।


पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राष्ट्रीय राजधानी में बंद के मद्देनजर कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं।


पुलिस के अनुसार, गश्त बढ़ा दी गई है, विशेष रूप से सीमा से लगे इलाकों में चौकियों पर अतिरिक्त बल तैनात किए गए हैं और राष्ट्रीय राजधानी आ रहे वाहनों की तलाशी ली जा रही है।


पुलिस उपायुक्त (नई दिल्ली) दीपक यादव ने कहा, ‘‘ भारत बंद के मद्देनजर, एहतियाती तौर पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं। सीमा से लगे इलाकों में चौकियों पर सुरक्षा कड़ी की गई है और इंडिया गेट, विजय चौक जैसे प्रमुख स्थानों पर पर्याप्त तैनाती की गई है।’’


अधिकारी ने कहा कि शहर की सीमाओं पर तीन प्रदर्शन स्थलों से किसी भी प्रदर्शनकारी को दिल्ली में दाखिल होने नहीं दिया जाएगा।


एक अन्य अधिकारी ने कहा, ‘‘ एहतियाती तौर पर सुरक्षा कड़ी की गई है और हम पूरी तरह सतर्क हैं। दिल्ली में भारत बंद का कोई आह्वान नहीं है, लेकिन हम घटनाक्रम पर नजर बनाए हैं और पर्याप्त कर्मी तैनात किए गए हैं।’’


उन्होंने बताया कि सीमा से लगे गांवों से दिल्ली आ रहे सभी रास्तों पर भी पुलिस कर्मी तैनात किए गए हैं और चौकियों पर वाहनों की तलाशी ली जा रही है।


एसकेएम ने सभी राजनीति दलों से भी ‘‘लोकतंत्र और संघवाद के सिद्धांतों की रक्षा के लिए किसानों का साथ देने की’’ अपील की है।


एसकेएम ने एक बयान में कहा, ‘‘ आंदोलन के दस महीने पूरे होने पर संयुक्त किसान मोर्चा ने सोमवार (27 सितंबर) को किसान विरोधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ भारत बंद बुलाया है।’’


बयान में कहा गया था, ‘‘एसकेएम हर भारतीय से इस देशव्यापी आंदोलन में शामिल होने और 'भारत बंद' को सफल बनाने की अपील करता है। विशेष रूप से, हम कामगारों, व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों, कारोबारियों, विद्यार्थियों, युवाओं और महिलाओं से इस दिन किसानों के साथ एकजुटता दिखाने की अपील करते हैं।’’


गौरतलब है कि देश के विभिन्न हिस्सों, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान, पिछले साल नवंबर से दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी केन्द्र के तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। किसानों को भय है कि इससे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रणाली खत्म हो जाएगी, हालांकि सरकार इन कानूनों को प्रमुख कृषि सुधारों के रूप में पेश कर रही है। दोनों पक्षों के बीच 10 दौर से अधिक की बातचीत हो चुकी है,लेकिन इनका कोई नतीजा नहीं निकला है।

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पूरा देश किसानो के साथ, कृषि कानून वापस लें मोदी: प्रियंका

लखनऊ : नये कृषि कानूनों के विरोध में किसान संगठनों के भारत बंद का समर्थन करते हुये कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने दावा किया कि उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिये लागू किये गये कृषि कानूनों के विरोध में पूरा देश अन्नदाताओं के साथ खड़ा है। श्रीमती वाड्रा ने सोमवार को ट्वीट किया “ खेत किसान का,मेहनत किसान की, फसल किसान की लेकिन भाजपा सरकार इन पर अपने खरबपति मित्रों का कब्जा जमाने को आतुर है।” उन्होने दावा किया कि पूरा हिंदुस्तान किसानों के साथ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी काले क़ानून को वापस लें। गौरतलब है कि संयुक्त किसान मोर्चा ने कृषि कानूनों के विरोध में आज भारत बंद का आवाहन किया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों को छोड़ कर समूचे राज्य में हालांकि बंद का कोई असर नहीं दिख रहा है।

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उप्र : कृषि कानून के विरोध में आज भारत बंद , विपक्षी दलों का समर्थन, प्रशासन अलर्ट

लखनऊ : कृषि कानून के विरोध में सोमवार को संयुक्त किसान मोर्चा ने भारत बंद की घोषणा की है। इसे यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने समर्थन दिया है। जबकि बंदी को लेकर उत्तर प्रदेश में अलर्ट जारी किया गया है।


प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल सपा ने ट्वीट के माध्यम से लिखा ,भाजपा सरकार के काले कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलित किसानों द्वारा कल बुलाए गए भारत बंद का समाजवादी पार्टी पूर्ण समर्थन करती है। किसान विरोधी काले कानूनों को वापस ले सरकार।


बसपा प्रमुख मायावती ने भी ट्वीट कर आज को होने वाले किसानों के भारत बंद को समर्थन देने का एलान किया।


उन्होंने ट्वीट किया, केंद्र द्वारा जल्दबाजी में बनाए गए तीन कृषि कानूनों से असहमत व दुखी देश के किसान इनकी वापसी की मांग को लेकर लगभग 10 महीने से पूरे देश व खासकर दिल्ली के आसपास के राज्यों में तीव्र आन्दोलित हैं व कल (सोमवार) भारत बंद का आह्वान किया है जिसके शांतिपूर्ण आयोजन को बसपा का समर्थन।


उन्होंने आगे कहा कि साथ ही, केन्द्र सरकार से भी पुन: अपील है कि किसान समाज के प्रति उचित सहानुभूति व संवेदनशीलता दिखाते हुए तीनों विवादित कृषि कानूनों को वापस ले तथा आगे उचित सलाह-मशविरा व इनकी सहमति से नया कानून लाए ताकि इस समस्या का समाधान हो।


एडीजी कानून व्यवस्था प्रशांत कुमार ने बताया, अधिकारियों को कहा गया है कि वह भारत बंद को देखते हुए भ्रमणशील रहें। आमजन को कोई समस्या न हो पाए। जो भी कार्यक्रम हो उसकी वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी जरूर कराएं। रेलवे, बस अड्डे पर सतर्कता बरतें। पश्चिमी यूपी के चप्पे चप्पे में कड़ी सुरक्षा रखी जाए। कहीं कोई शांति न बिगड़ने के आदेश दिए हैं।


संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि बंद के दौरान सभी सरकारी और निजी दफ्तर, शिक्षण और अन्य संस्थान, दुकानें, उद्योग और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद रहेंगे। बंद से सभी आपात प्रतिष्ठानों, सेवाओं, अस्पतालों, दवा की दुकानों, राहत एवं बचाव कार्य और निजी इमरजेंसी वाले लोगों को बाहर रखा गया है। बंद के दौरान एंबुलेंस और इमरजेंसी सर्विसेज को नहीं रोका जाएगा।


गौरतलब है कि केंद्र सरकार के तीन नये कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले नौ माह से आंदोलन कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा ने पांच सितंबर को मुजफ्फरनगर की किसान महापंचायत में 27 सितंबर को भारत बंद का ऐलान किया था।




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27 सितम्बर के भारत बंद को भाकियू ने कसी कमर, जाम की तैयारी

मेरठ : कृषि कानूनों के विरोध में संयुक्त किसान मोर्चा के 27 सितम्बर के भारत बंद को सफल बनाने के लिए भाकियू ने पूरी ताकत झोंक दी है। भारत बंद को सफल बनाने के लिए भाकियू ने रेल यातायात, हाईवे और एक्सप्रेस वे पर जाम लगाने की योजना बनाई है।


भारत बंद को लेकर मेरठ में रविवार को भाकियू की अगुवाई में कई किसान संगठनों की बैठक हुई। जिसमें भारत बंद को सफल बनाने की रणनीति बनाई गई। वक्ता कर्नल जयवीर सिंह ने कहा कि भारत बंद के दौरान रेल यातायात, हाईवे, एक्सप्रेस वे पर जाम लगाया जाएगा। इसके लिए पूरे पश्चिम उप्र में जाम के प्वाइंट तय किए गए हैं। कृषि कानूनों की सच्चाई समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को बताई जाएगी। भाकियू नेताओं ने इस दौरान सरकारी व निजी कार्यालय, सभी शैक्षणिक संस्थान, बाजार, उद्योग व वाणिज्यिक संस्थान और सार्वजनिक कार्यकर्ताओं को बंद कराने का निर्णय लिया गया है। अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, राहत व बचाव कार्य से जुड़ी सेवाओं को भारत बंद के दायरे से बाहर रखा गया है।


जय किसान आंदोलन के प्रदेश अध्यक्ष मानवेंद्र वर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ, देश की सम्पत्तियों को बचाने के लिए व लोकतंत्र की बहाली के लिए देश के सभी वर्गों का किसानों का साथ देना चाहिए। मनीष भारती ने कहा कि किसान की खुशहाली से ही देश की खुशहाली सम्भव है। देश के हर वर्ग को किसान के साथ खड़ा होना चाहिए। बैठक में डीपी सिंह, अशोक पंवार, राहुल चौधरी भटीपुरा, आशीष चौधरी, मनीष यादव, रामकुमार प्रधान, सुदेश आदि मौजूद रहे।







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किसानों के 'भारत बंद' को बसपा का समर्थन : मायावती

लखनऊ : बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ संयुक्त किसान मोर्चा के 'भारत बंद' का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार से इन कानूनों को वापस लेने की मांग की है।


बसपा प्रमुख ने रविवार को ट्वीट किया, ''केन्द्र द्वारा जल्दबाजी में बनाए गए तीन कृषि कानूनों से असहमत और दुखी देश के किसान इनकी वापसी की मांग को लेकर लगभग 10 महीने से पूरे देश व खासकर दिल्ली के आसपास के राज्यों में आन्दोल कर रहे हैं और उन्होंने सोमवार को 'भारत बंद' का आह्वान किया है जिसके शांतिपूर्ण आयोजन को बसपा का समर्थन।''


अपने सिलसिलेवार ट्वीट में मायावती ने कहा, ''साथ ही, केन्द्र सरकार से पुनः अपील है कि वह किसान समाज के प्रति उचित सहानुभूति व संवेदनशीलता दिखाते हुए तीनों विवादित कृषि कानूनों को वापस ले तथा आगे उचित सलाह-मशविरा व इनकी सहमति से नया कानून लाए ताकि इस समस्या का समाधान हो। अगर किसान खुश व खुशहाल होंगे तो देश खुश व खुशहाल होगा।''


गौरतलब है कि कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा ने पांच सितंबर को मुजफ्फरनगर की किसान महापंचायत में 27 सितंबर को 'भारत बंद' का एलान किया था। संयुक्त किसान मोर्चा ने पहले 25 सितंबर को 'भारत बंद' की घोषणा की थी।


किसान मोर्चा ने कहा है कि 27 सितंबर को 'भारत बंद' के दौरान देश में सब कुछ बंद रहेगा। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने महापंचायत को संबोधित करते हुए कहा कि तीन कृषि कानूनों के वापस लिए जाने तक वह अपना आंदोलन समाप्त नहीं करेंगे।



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श्रीराम बीजेपी और आरएएस के नहीं वो सबके राम हैं: फारूख अबदुल्ला

जींद : जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला ने कहा कि किसान किसी का घर नहीं चाहता, किसी की हकूमत नहीं चाहता है वो तो केवल अपना हक चाहता है। किसान कहता है जो कानून बनाए हैं वो गलत हैं लेकिन सरकार नहीं सुन रही है। क्योंकि सरकार उद्योगपतियों के चुंगल में फंसी हुई है। इसलिए कानून रद्द नहीं किए जा रहे हैं। वे शनिवार को जींद में आयोजित सम्मान दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे।


फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि श्रीराम सबके लिए हैं, लेकिन बीजेपी ने राम को अपना बना लिया है। इन्हीं के लिए राम है और किसी के लिए राम नहीं है। राम सबके राम हैं वो बीजेपी और आरएएस के राम नाम नहीं है। वो हमें तोडऩा चाहते हैं ओर अपने तख्त को बचाना चाहते हैं। कश्मीर पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कश्मीर कब हिंदुस्तान का हिस्सा नहीं रहा। हमने गांधी का हिंदुस्तान पकड़ लिया, जबकि जिन्ना के पाकिस्तान का नहीं पकड़ा। उनका रहना और मरना भारत में है। उन्होंने कहा कि किसानों के हक में काले कानून खत्म करने होंगे। भारत को मजबूत करो और एक दूसरे से हाथ मिला कर चलो। भारत को मजबूत करना हमारा पहला काम होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सरकार वादे करती है लेकिन आज दो साल हो गए हैं। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म किए हुए, पर आज तक कुछ भी नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा देश को बांट रही है। आतंकवाद ये लोग कर रहे हैं और उस देश के लोगों के लिए झगड़े खड़े कर रहे हैं, इसलिए इन्हें बंद किया जाना चाहिए।


सरकार के खिलाफ आंदोलन करना है लेकिन आंदोलन पत्थरों से नहीं लकडिय़ों से नहीं बल्कि गांधी की तरह करना है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई दिन नहीं जाता है जब ये लोग कोई झूठ न बोलते हों। ये लोग कहते हैं कि जब से जम्मू-कश्मीर में धारा 370 खत्म हुई तब से आतंकवाद खत्म हो गया। पर जब तक दिल नहीं जीतें जाएंगें तब तक झगड़े खत्म नहीं होंगे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कहा था कि हमें दिल जोडऩे हैं और दिल जोड़ कर ही भारत को बचा सकते हैं। इसलिए आज वो इन लोग से अपील करते हैं कि दिल जोडऩे की बात करें, झगड़े छोड़ दें। पड़ोसी कैसा भी हो, दोस्ती करोगो तो ही तरक्की होगी। अगर ऐसा नहीं किया तो हम पीछे रह जाएंगे। आज नेपाल, भूटान, बांगला देश के साथ हमारे रिश्तों को लेकर सभी जानते हैं। जिस अफगानिस्तान के लिए तीन अरब डॉलर खर्च किया क्या आज वो हमारा दोस्त है। हमें सबसे दोस्ती करनी है। तभी देश आगे जाएगा। 



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आप ने किसानों के भारत बंद के आह्वान का किया समर्थन

नई दिल्ली  : आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्डा ने शनिवार को कहा कि उनकी पार्टी 27 सितंबर को संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा आहूत भारत बंद के आह्वान का पुरजोर समर्थन करती है।


उन्होंने कहा कि आप के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हमेशा ‘‘काले कानूनों’’ के खिलाफ किसानों के साथ खड़े रहे हैं।


चड्डा ने ट्वीट किया, ‘‘ आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल हमेशा इन काले कानूनों के खिलाफ किसानों के साथ खड़े रहे हैं। आम आदमी पार्टी, संयुक्त किसान मोर्चा के 27 सितंबर के भारत बंद के आह्वान का पुरजोर समर्थन करती है।’’


गौरतलब है कि किसान संघ ने केन्द्र के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ 27 सितंबर को भारत बंद करने का ऐलान किया है।



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केंद्र सरकार के साथ बातचीत को लेकर राकेश टिकैत ने किया बड़ा एलान

नई दिल्ली :  तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसानों के धरना प्रदर्शन के बीच दिल्ली-हरियाणा के सिंघु बार्डर से राहत भरी खबर भी आ रही है। संयुक्त किसान मोर्चा के अग्रणी नेताओं में शुमार  भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा है कि बातचीत केंद्रीय सरकार को शुरू करनी है। वे लोग इसके लिए तैयार हैं। उन्होंने अपनी ओर से सकारात्मक पक्ष रखते हुए यह भी कहा कि अगर केंद्र सरकार बातचीत की शुरुआत करेगी तो संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य इसमें जरूर जाएंगे। वे शुक्रवार को कुंडली बार्डर पर आयोजित एक सभा को संबोधित कर रहे थे।

अमेरिका से रह रहे भारतीयों से की अपील, उठाएं किसान आंदोलन का मुद्दा

इस दौरान उन्होंने कहा कि 27 सितंबर के भारत बंद के बाद किसान मोर्चा देशभर में बैठकें करेगा और लोगों को आंदोलन से जोड़ने का प्रयास करेगा। सभा को संबोधित करते हुए भाकियू नेता टिकैत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अमेरिका दौरे को लेकर कहा कि वहां बसे भारतीयों, वहां के नेताओं से भी गुजारिश की गई है कि वे प्रधानमंत्री के समक्ष कृषि कानून के विरोध में चल रहे आंदोलन का मुद्दा उठाएं। उन्होंने इसको लेकर ट्वीट कर वहां बसे भारतीयों व अन्य लोगों से इस संबंध में अपील की है।

भाकियू नेता राकेश टिकैत ने यह भी कहा कि कुंडली बार्डर पर विशाल सभा की जा रही है, जिसमें देशभर से साधु-संत व बुद्धिजीवी लोग पहुंचे हैं। कई दिनों से बातचीत रुकी हुई थी, इसीलिए यहां बातचीत के लिए सभी पहुंचे हैं। ये सब तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ केंद्र सरकार की खामियों को उजागर करते हुए हमारे संघर्ष के बारे में बातचीत कर रहे हैं।

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प्रधानमंत्री मोदी के कार्यक्रम के दौरान अमेरिका में विरोध प्रदर्शन करें भारतीय : राकेश टिकैत

गाजियाबाद :  भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के नेता राकेश टिकैत ने अमेरिका में रह रहे भारतीयों से शुक्रवार को कहा कि वे 10 महीने से चल रहे किसान आंदोलन के समर्थन में शनिवार को न्यूयॉर्क में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम के दौरान विरोध प्रदर्शन करें।


उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से भी आग्रह किया कि वह मोदी से मुलाकात के दौरान भारतीय किसानों की चिंताओं पर ध्यान दें।


अमेरिका में भारतीयों से समर्थन करने की अपील करते हुए बीकेयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने दावा किया कि विवादास्पद नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन के दौरान 750 से अधिक किसान अपनी जान गंवा चुके हैं, लेकिन केंद्र अभी भी कानूनों पर पुनर्विचार करने को तैयार नहीं है।


मोदी बुधवार को तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर अमेरिका पहुंचे, जहां वह बाइडन सहित अन्य नेताओं के साथ बैठक करेंगे। मोदी शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 76वें सत्र को संबोधित करेंगे।


टिकैत ने एक वीडियो संदेश में कहा, 'हम अमेरिका में रहनेवाले सभी भारतीयों से अपील करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री 25 सितंबर को न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम के लिए वहां होंगे। अमेरिका में सभी भारतीयों को अपने वाहनों पर 'किसानों' का झंडा और 'नो फार्मर नो फूड' का बैनर लगाना चाहिए तथा किसानों के समर्थन में अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए।





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केंद्र सरकार तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करे: चन्नी

चंडीगढ़ : पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने सोमवार को कहा कि केंद्र सरकार को तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों को निरस्त करना चाहिए।


शपथ ग्रहण करने के बाद अपने पहले संवाददाता सम्मेलन में चन्नी ने यह भी कहा कि रेत माफिया के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और सभी मुद्दों का समाधान होगा।


उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व की ओर से तय 18 सूत्री कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि वह राज्य के लोगों का भरोसा दिलाते हैं कि आने वाले दिनों में सभी मसलों का हल होगा।


मुख्यमंत्री के मुताबिक, रेत माफिया और अवैध खनन पर अंकुश लगाने को लेकर आज ही बड़ा कदम उठाएंगे।


किसान आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि केंद्र सरकार को केंद्रीय कृषि कानूनों को निरस्त करना चाहिए।


उन्होंने कहा, ‘‘पंजाब की एकता, अखंडता और भाईचारा को कायम रखना है। हम सबको मिलकर रहना है। पंजाब को आगे बढ़ाना है।’’


चन्नी ने खुद के गरीब परिवार में पैदा होने का उल्लेख किया और कहा कि वह इस बड़ी जिम्मेदारी देने के लिए कांग्रेस नेतृत्व का धन्यवाद करते हैं।



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अब राकेश टिकैत ने ओवैसी को कहा चाचा जान

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में अब्बा जान के बाद अब चाचा जान की चर्चाएं हो रही हैं। इस बार किसान नेता राकेश टिकैत ने एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी को चाचा जान का नाम दिया है।


भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के नेता राकेश टिकैत ने एआईएमआईएम नेता ओवैसी को उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ने के फैसले पर पर निशाना साधते हुए ये नया नाम चाचा जान दिया है।


टिकैत ने बुधवार को दावा किया कि ओवैसी भाजपा के साथ हैं और उन्हें भगवा पार्टी का चाचा जान कहा।


बागपत में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, भाजपा के चाचा जान, असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर गए हैं। अगर वह (ओवैसी) उन्हें (भाजपा) गाली देंगे, तो वे उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं करेंगे क्योंकि वे एक टीम हैं।


एआईएमआईएम द्वारा माफिया से नेता बने अतीक अहमद को टिकट देने का जिक्र करते हुए टिकैत ने कहा, प्रज्ञा ठाकुर (भोपाल से भाजपा सांसद) और उनकी साख का क्या?


तीन विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे टिकैत, इन दिनों चल रहे आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने के लिए उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों का दौरा कर रहे हैं।

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किसानों के आंदोलन के बीच किसान कांग्रेस का अध्यक्ष पद 21 महीनों से खाली, गतिविधियां भी ठप्प

नई दिल्ली : केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसान आंदोलन का पुरजोर समर्थन और केंद्र सरकार पर हमले कर रही कांग्रेस की किसान इकाई का अध्यक्ष पद पिछले 21 महीनों से खाली पड़ा है और करीब छह महीनों से इसकी गतिविधियां भी ठप्प हैं।


हालांकि, पार्टी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस में विभिन्न स्तरों पर बदलाव एवं नियुक्तियों का सिलसिला चल रहा है और ‘अखिल भारतीय किसान कांग्रेस’ के अध्यक्ष की नियुक्ति भी जल्द होने की उम्मीद है। नाना पटोले के दिसंबर, 2019 में इस्तीफा देने के बाद से कांग्रेस की किसान इकाई का नया अध्यक्ष अब तक नियुक्त नहीं हो सका है। अब महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे पटोले ने एक दिसंबर, 2019 को महाराष्ट्र विधानसभा का अध्यक्ष बनने के बाद किसान कांग्रेस के प्रमुख पद से इस्तीफा दिया था। कांग्रेस ने 21 महीनों से किसान प्रकोष्ठ का अध्यक्ष भले ही नियुक्त नहीं किया हो, लेकिन पिछले कुछ महीनों में पार्टी ने संगठन और कई प्रदेश इकाइयों में कई बदलाव किए। उत्तराखंड, झारखंड, केरल, तेलंगाना, मणिपुर, गोवा और कई अन्य राज्यों के प्रदेश संगठनों में बदलाव किये गए। यही नहीं, कांग्रेस के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष पद से नदीम जावेद को हटा कर इमरान प्रतापगढ़ी को जिम्मेदारी सौंपी गई। किसान कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं होने की स्थिति में संगठन के उपाध्यक्ष सुरेंद्र सोलंकी पिछले कई महीनों से संगठन का काम देख रहे थे, लेकिन अपने पिता के निधन के बाद गत मई महीने में उन्होंने दिल्ली में ‘पालम 360’ खाप के प्रधान की जिम्मेदारी संभाल ली।


सूत्रों ने बताया कि सोलंकी के नेतृत्व में किसान कांग्रेस ने तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के आवास से बाहर मार्च महीने में प्रदर्शन किया था जो संगठन का आखिरी कार्यक्रम था और इसके बाद से इसकी गतिविधियां बंद हैं।


कांग्रेस से जुड़े एक सूत्र ने बताया, ‘‘पिछले दिनों संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने सुरेंद्र सोलंकी से किसान कांग्रेस का काम आगे बढ़ाने के लिए कहा जिस पर सोलंकी ने कहा कि वह मौजूदा समय में अपने खाप के प्रधान की जिम्मेदारी निभा रहे हैं और ऐसे समय किसान कांग्रेस के उपाध्यक्ष के तौर पर काम करना उनके लिए मुश्किल होगा।’’


उल्लेखनीय बात यह भी है कि मौजूदा समय में किसान कांग्रेस के पास कांग्रेस मुख्यालय में दफ्तर भी नहीं है। पिछले साल बड़ी संख्या में कांग्रेस प्रभारियों की नियुक्ति होने के बाद किसान कांग्रेस समेत पार्टी के कुछ विभागों को अपने दफ्तर खाली करने पड़े थे।


किसान कांग्रेस के अध्यक्ष के पद खाली होने के बारे में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता नेता ने कहा, ‘‘संगठन में बदलाव लगातार हो रहे हैं। आशा है कि किसान कांग्रेस का नया अध्यक्ष भी जल्द नियुक्त हो जाएगा।’’


सूत्रों के मुताबिक, कुछ महीने पहले किसान कांग्रेस के अध्यक्ष पद को लेकर पार्टी में चर्चा हुई थी। कांग्रेस के कुछ नेता किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष पद के लिए महाराष्ट्र के पूर्व सांसद सुभाष वानखड़े के नाम की पैरवी कर रहे थे, जबकि पार्टी नेताओं का एक समूह किसान आंदोलन के मद्देनजर उत्तर भारत के किसी नेता को यह जिम्मेदारी सौंपने के पक्ष में थे।


किसान कांग्रेस का अध्यक्ष पद ऐसे समय में खाली है जब मुख्य विपक्षी पार्टी नये कृषि कानूनों के मुद्दे पर कई महीनों से सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए है। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इस मुद्दे को लेकर कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले कर चुके हैं। उन्होंने पिछले साल पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में ‘ट्रैक्टर रैली’ भी निकाली थी और पिछले संसद सत्र में वह ट्रैक्टर चलाकर संसद भवन तक पहुंचे थे।






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राकेश टिकैत ने यूपी गेट पर संभाला मोर्चा, भारत बंद को सफल बनाने की तैयारी तेज

नई दिल्ली : तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर आगामी 27 सितंबर को भारत बंद का एलान किया गया है। इस बाबत संयुक्त किसान मोर्चा के साथ-साथ भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत की सक्रियता भी बढ़ गई है। पिछले कई दिनों से किसान नेता राकेश टिकैत यूपी गेट पर धरनारत किसान प्रदर्शनकारियों के बीच मौजूद हैं और 27 सितंबर को आयोजित भारत बंद को सफल बनाने की रणनीति पर काम हो रहा है।


भारत बंद को सफल बनाने की रणनीति के तहत भारतीय किसान यूनियन और संयुक्त किसान मोर्चा ने बैठकों का दौर तेज कर दिया है। पिछले दिनों गाजीपुर बार्डर पर आंदोलन कमेटी की बैठक में निर्णय लिया गया कि गाजीपुर बार्डर पर किसानों की संख्या को सुनिश्चित करने के लिए उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के जिलों में ब्लॉक स्तर पर बैठक करके रोटेशन व्यवस्था लागू की जाएगी। इसके साथ ही इस व्यवस्था को और मजबूत किया किया जाएगा। 


बताया जा रहा है कि भारत बंद को सफल बनाने के लिए एक बार फिर यूपी गेट पर किसानों की संख्या में इजाफा हो सकता है। अब तक जितने भी भारत बंद हुए हैं, वह दिल्ली-एनसीआर में बेअसर साबित हुए हैं। बीकेयू और एसकेएम ने भी दिल्ली में भारत बंद कराने पर जोर नहीं दिया है। ऐसे में माना जा रहा है कि किसान दिल्ली को भारत बंद से मुक्त रख सकते हैं। वहीं, भारत बंद के मद्देनजर यूपी बार्डर के अलावा शाहजहांपर,टीकरी और सिंघु बार्डर पर किसान प्रदर्शनकारियों में इजाफा हो सकता है। 


इस बाबत संयुक्त किसान मोर्चा के गाजीपुर बॉर्डर पर मौजूद प्रवक्ता किसान नेता जगतार सिंह बाजवा ने बताया कि उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के जिलों में 11 तारीख से ही बैठकों का दौर प्रारंभ हो गया है, जिसमें किसानों मजदूरों ने सरकार के रवैये को देखते हुए लंबी लड़ाई का मन बना लिया है। उन्होंने जानकारी दी है कि आंदोलन के साथ-साथ खेती भी जारी रहे, इसलिए क्षेत्रवार रोटेशन व्यवस्था बनाई गई है। 


जगतार सिंह बाजवा की मानें तो संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर भारत बंद शांतिपूर्वक होगा। इस दौरान यानी 27 सितंबर को किसी भी तरह की हिंसा भारत बंद के दौरान नहीं हो, इसका भी पुख्ता इंतजाम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत बंद के दौरान आंदोलन को बदनाम करने के उद्देश्य से साजिशन हिंसा कराने की फिराक में जो लोग होंगे उन पर कड़ी नजर रखी जाएगी।



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अकाली दल 17 सितंबर को मनाएगी काला दिवस

चंडीगढ़ : पार्टी के एक नेता ने रविवार को कहा कि शिरोमणि अकाली दल (शिअद) तीन केंद्रीय कृषि कानूनों को लागू करने के एक साल पूरे होने पर 17 सितंबर को काला दिवस के रूप में मनाएगा।


किसानों के साथ पार्टी कार्यकर्ता उस दिन नई दिल्ली में गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब से संसद तक कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग करते हुए विरोध मार्च निकालेंगे।


पार्टी अध्यक्ष सुखबीर बादल की अध्यक्षता में शनिवार को हुई बैठक में इस संबंध में निर्णय लिया गया।


पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष दलजीत चीमा ने मीडिया को बताया कि पंजाब के किसानों के साथ पार्टी के नेता और कार्यकर्ता विरोध मार्च में हिस्सा लेंगे।


पिछले साल इसी दिन पार्टी नेताओं, हरसिमरत कौर बादल और सुखबीर बादल ने संसद में तीन कृषि कानूनों के पारित होने का विरोध किया था और वे केवल दो सांसद थे जिन्होंने विधेयकों के खिलाफ मतदान किया था।


उसके बाद अकाली दल की प्रतिनिधि हरसिमरत कौर ने केंद्रीय मंत्रालय से इस्तीफा दे दिया और पार्टी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) छोड़ दिया और भाजपा के साथ अपना 24 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया था।





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एमएसपी बढ़ाने से किसानों की नाराजी दूर नहीं होगी

केंद्र सरकार ने किसानों के हित में कुछ अनाज पर एक बार फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ा दिया है। सबसे ज्यादा 400 रुपये प्रति क्विंटल मसूर और सरसों पर बढ़ाई गई है। गेहूं पर 40, सूरजमुखी पर 114 और चने पर 130 रुपये बढ़ाई गई है। सरकार ने यह फैसला ऐसे समय लिया है, जब किसानों ने करनाल में बड़ा अंदोलन खड़ा करके तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग बुलंद कर दी है। सरकार ने खरीफ और रबी दोनों मौसमों की 23 फसलों पर एमएसपी तय की है। हालांकि हरियाणा और पंजाब के किसानों को ये बढ़ी दरें रास नहीं आ रही हैं। लिहाजा इन दोनों राज्यों में आंदोलन और तेज होता जा रहा है। हालांकि नरेन्द्र मोदी सरकार ने अन्य राज्यों में एमएसपी के औजार से आंदोलन के विस्तार पर अंकुश जरूर लगा दिया है।


पिछले डेढ साल से चल रहे कोरोना संकट ने तय कर दिया है कि आर्थिक उदारीकरण अर्थात पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की पोल खुल गई है। देश आर्थिक एवं भोजन के संकट से मुक्त है तो उसमें केवल खेती-किसानी का सबसे बड़ा योगदान है। भारत सरकार ने इस स्थिति को समझ लिया है कि बड़े उद्योगों से जुड़े व्यवसाय और व्यापार जबरदस्त मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। वहीं किसानों ने 2019-20 में रिकॉर्ड 29.19 करोड़ टन अनाज पैदा करके देश की ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था को तो तरल बनाए रखा है, साथ ही पूरी आबादी का पेट भरने का इंतजाम भी किया है। 2019-2020 में अनाज का उत्पादन आबादी की जरूरत से सात करोड़ टन ज्यादा हुआ था। 2020-2021 में भी 350 मिलियन टन आनाज पैदा करके किसानों ने देश की अर्थव्यवस्था में ठोस योगदान दिया है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और किसानों को इसलिए भी बढ़ावा देने की जरूरत है, क्योंकि देश से किए जाने वाले कुल निर्यात में 70 प्रतिशत भागीदारी केवल कृषि उत्पादों की है। यानि सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा कृषि उपज निर्यात करके मिलती है। सकल घरेलू उत्पाद दर में भी कृषि का 45 प्रतिशत योगदान है।


भारतीय अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में अमर्त्य सेन और अभिजीत बनर्जी सहित थॉमस पिकेटी दावा करते रहे हैं कि कोरोना से ठप हुए ग्रामीण भारत पर जबरदस्त अर्थ-संकट गहराएगा। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2017-18 के निष्कर्ष ने भी कहा था कि 2012 से 2018 के बीच एक ग्रामीण का खर्च 1430 रुपये से घटकर 1304 रुपये हो गया है। जबकि इसी समय में एक शहरी का खर्च 2630 रुपये से बढ़कर 3155 रुपये हुआ है। अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांत में यही परिभाषित है कि किसी भी प्राकृतिक आपदा में गरीब आदमी को ही सबसे ज्यादा संकट झेलना होता है। इस कोरोना संकट में पहली बार देखने में आया है कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के पैरोकार रहे बड़े और मध्यम उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारी भी न केवल आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं, बल्कि उनके समक्ष रोजगार का संकट भी पैदा हुआ है। लेकिन बीते दो कोरोना कालों में खेती-किसानी से जुड़ी उपलब्धियों का मूल्यांकन करें तो पता चलता है कि देश को कोरोना संकट से केवल किसान और पशु-पालकों ने ही उबारे रखने का काम किया है। फसल, दूध और मछली पालकों का ही करिश्मा है कि पूरे देश में कहीं भी खाद्यान्न संकट पैदा नहीं हुआ।


यही नहीं, जो प्रवासी मजदूर ग्रामों की ओर लौटे, उनके लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था का काम भी गांव-गांव किसान एवं ग्रामीणों ने ही किया। वे ऐसा इसलिए कर पाए, क्योंकि उनके घरों में अन्न के भंडार भरपूर थे। इस दौरान यदि सरकारी महकमों चिकित्सा, पुलिस, बैंक और राजस्व को छोड़ दिया जाए तो 70 फीसदी सरकारी कर्मचारी न केवल घरों में बंद रहे, बल्कि मजदूरों के प्रति उनका सेवाभाव भी देखने में नहीं आया। यदि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री राहत कोषों का आकलन करें तो पाएंगे कि इनका आर्थिक योगदान ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर रहा है। सरकारी कर्मचारियों की इस बेरुखी से भी जरूरी हो जाता है कि अब अनुत्पादक लोगों की बजाय, उत्पादक समूहों को प्रोत्साहित किया जाए?


अन्नदाता की आमदनी सुरक्षित करने की जरूरत है। क्योंकि समय पर किसान द्वारा उपजाई फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाने के कारण अन्नदाता के सामने कई तरह के संकट मुंह बाए खड़े हो जाते हैं। ऐसे में वह न तो बैंकों से लिया कर्ज समय पर चुका पाते हैं और न ही अगली फसल के लिए वाजिब तैयारी कर पाते हैं। बच्चों की पढ़ाई और शादी भी प्रभावित होती हैं। यदि अन्नदाता के परिवार में कोई सदस्य गंभीर बीमारी से पीड़ित है तो उसका इलाज कराना भी मुश्किल होता है। इन वजहों से उबर नहीं पाने के कारण किसान आत्मघाती कदम उठाने तक को मजबूर हो जाते हैं। यही वजह है कि पिछले तीन दशक से प्रत्येक 37 मिनट में एक किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है। इसी कालखंड में प्रतिदिन करीब 2052 किसान खेती छोड़कर शहरों में मजदूरी करने चले जाते हैं। कोरोना ने अब हालात को पलट दिया है। इसलिए खेती-किसानी से जुड़े लोगों की गांव में रहते हुए ही आजीविका कैसे चले, इसके पुख्ता इंतजाम करने की जरूरत है।


नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी। इसी क्रम में ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय सरंक्षण नीति’ लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपये देना शुरू किए गए थे। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जाहिर है, किसान की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है। यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे, इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है।


बीते कुछ समय से पूरे देश में ग्रामों से मांग की कमी दर्ज की गई है। निसंदेह गांव और कृषि क्षेत्र से जुड़ी जिन योजनाओं की श्रृंखला को जमीन पर उतारने के लिए 14.3 लाख करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया है, उसका उपयोग अब सार्थक रूप में होता है तो किसान की आय सही मायनों में 2022 तक दोगुनी हो पाएगी। इस हेतु अभी फसलों का उत्पादन बढ़ाने, कृषि की लागत कम करने, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने की भी जरूरत है। दरअसल, बीते कुछ साल में कृषि निर्यात में सालाना करीब 10 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं कृषि आयात 10 अरब डॉलर से अधिक बढ़ गया है। इस दिशा में यदि नीतिगत उपाय करके संतुलन बिठा लिया जाता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश की धुरी बन सकती है।


केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में ‘ए-2’ फॉमूर्ला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि भविष्य में ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो किसान की खुशहाली बढ़ने का रास्ता खुल जाएगा। यह उपाय कृषि कानून विरोधी आन्दोलनों को समाप्त करने की दिशा में भी एक सार्थक पहल हो सकती है।


–प्रमोद भार्गव-

(लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)








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'अन्नदाता' की ताक़त का आंकलन करने में विफल है सरकार

देश का 'अन्नदाता' गत नौ महीने से भी अधिक समय से आंदोलनरत है। आंदोलन का समाधान निकलने के बजाय धीरे धीरे इस किसान आंदोलन की तीव्रता और तल्ख़ी दोनों ही बढ़ती जा रही है। सरकार व सरकारी पक्षकारों,नेताओं व प्रशासन द्वारा अपनाया जाने वाला ग़ैर ज़िम्मेदाराना रवैय्या किसान आंदोलनकारी नेताओं व सरकार के मध्य बातचीत में आये  लंबे गतिरोध का कारण है। न जाने क्यों सरकार को यह ग़लतफ़हमी हो चुकी है कि चूँकि वह पूर्ण बहुमत की जनप्रतिनिधि सरकार है और विपक्ष अपने स्वार्थों के चलते विभाजित है इसलिये वह बेरोकटोक जब और जैसे चाहे क़ानून या अध्यादेश पारित करा सकती है। और संभवतः उसकी इसी ग़लतफ़हमी के चलते कोरोना काल के दौरान तीन नए कृषि अध्यादेश संसद में पारित कराये गये । इन अध्यादेशों के पारित होने से पहले ही उन उद्योगपतियों द्वारा देश में सैकड़ों विशाल गोदाम बनाये गये,विशेष रेलवे लाइनें बिछाकर उन गोदामों को रेलवे लाइनों से जोड़ा गया,इस सब कामों के लिये हर जगह राज्य सरकारों ने गुपचुप तरीक़े से उन्हें पूर्ण सहयोग दिया। सरकार सोच रही थी कि जिस तरह वह दूसरे अन्य वर्गों व आंदोलनों को धर्म-जाति का रंग देकर या उसपर अन्य तरह के गंभीर आरोप गढ़-मढ़ कर कुचल देती रही है उसी तरह किसानों के इन विरोध  स्वरों को भी कुचल देगी। परन्तु दरअसल सरकार के लिये यह कृषि क़ानून तो उसी समय अशुभ संकेत देने लगे थे जबकि इन के पास होते ही भाजपा के पुराने सहयोगी व केंद्र सरकार में शिरोमणि अकाली दल बादल की प्रतिनिधि मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इसी कृषि अध्यादेश के विरुद्ध त्याग पात्र दे दिया। इतना ही नहीं बल्कि पंजाब में अकाली दल ने भाजपा से अपना 24 वर्ष पुराना मज़बूत गठबंधन भी तोड़ लिया।


यह अकेली घटना ही इस नतीजे पर पहुँचने के लिये काफ़ी है कि मोदी सरकार विशेषकर स्वयं प्रधानमंत्री को एक तो अपने राज्य के उद्योगपति मित्रों के हितों की चिंता अपने पुराने राजनैतिक सहयोगियों से भी अधिक है। दूसरी बात यह कि जब सरकार अपने ही मंत्री को यह समझा पाने में विफल रही कि कृषि अध्यादेश किसानों के लिये हितकारी व उनकी आय में बढ़ोतरी करने वाले हैं वह आख़िर अरबों रूपये का विज्ञापन देकर या किसान को मार पीट कर या उनपर तरह तरह के लांछन लगा उन्हें अपमानित कर आख़िर उन्हें कृषि अध्यादेशों के फ़ायदे क्यों और कैसे समझा सकती है ? बजाय इसके यह ज़रूर देखा जा रहा है कि आंदोलन कुचलने के सभी सरकारी हथकंडे सरकार पर ही भारी पड़ते जा रहे हैं। और किसान आंदोलन आये दिन तीव्र और तल्ख़ होता जा रहा है। सरकार शायद इन आंदोलनकारी किसानों के तेवर व इनके समर्पण को सही ढंग से आंक नहीं पा रही है। यहां मझे यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि यदि भाजपा -कांग्रेस सहित देश के सभी राजनैतिक दल मिलकर भी इतना बड़ा,अनुशासित व सुचारु आंदोलन चलाना चाहें तो भी न तो इतनी मानव शक्ति जूटा सकती हैं न इतना पैसा ख़र्च कर सकते हैं न ही इतनी तकलीफ़ सहन करने वाले समर्पित स्वयंसेवक ला सकते हैं। साफ़ है जो अन्नदाता पूरे देश को अन्न दे सकता है वह आंदोलन के दौरान स्वयं भूखा कैसे रह सकता है ,बल्कि वास्तव में किसान आंदोलन के सदक़े में जगह जगह हज़ारों भूखे आम लोगों को भी भोजन नसीब हो रहा है।


दूसरी बड़ी ग़लती सत्ता के पक्षकारों द्वारा आंदोलन को कुचलने के असफल प्रयासों द्वारा की जा रही है। कभी सरकार ज़मीन में कीलें ठोक कर किसानों को दिल्ली में न घुसने देने की कोशिश करती है तो कभी सड़कों में खाईयां खोद उनका रास्ता रोकने का प्रयास किया गया,कभी भाजपा विधायक द्वारा अपने चंद समर्थकों के साथ धरने पर बैठे किसानों पर हमला किया गया  तो कभी आंदोलनरत किसानों को पानी की आपूर्ति रोक दी गयी। कभी 2 अप्रैल 2021 को अलवर में राकेश टिकैत के क़ाफ़िले पर हमला कराया गया तो गत 28 अगस्त को करनाल में लाठी चार्ज कर कई किसान घायल कर दिये गये। जब किसान मोर्चा ने उत्तर प्रदेश में अपने जनसमर्थन के लिये आंदोलन के विस्तार की बात की तो भाजपा द्वारा एक कार्टून जारी किया गया जिसकी शब्दावली व चित्र किसानों को डराने व धमकी देने वाले थे। परन्तु इन जैसे सत्ता के सभी प्रयासों का प्रभाव उल्टा ही हुआ है। हमेशा इन 'सरकारी ' कोशिशों व दुष्प्रचार का फ़ायदा किसानों को ही मिला है। बहुमत की सत्ता भले ही इस आंदोलन को सिर्फ़ इसलिये तवज्जो न दे रही हो क्योंकि उसकी नज़रों में किसानों से ज़्यादा अहमियत चंद उद्योगपतियों की है परन्तु दरअसल यह सरकार व उसके सलाहकारों की भूल है। राकेश टिकैत ने सिर्फ़ एक बार इन्हीं अत्याचारों से दुखी होकर आंसू बहाये थे उसके बाद इस आंदोलन में गोया सैलाब आ गया था। क्योंकि यह 'अन्नदाता ' द्वारा अपनी ज़मीन व अपनी आत्म सम्मान की रक्षा की ग़रज़ से आम जनता विशेषकर किसानों के बीच बहाये गये एक किसान नेता के दिल से निकले आंसू थे जिन्होंने कोहराम मचा दिया। न कि संसद में आत्मरक्षा की गुहार लगाने या कैमरे के सामने छलकाये गये ढोंगपूर्ण घड़ियाली आंसू।


सरकार भले ही किसानों की हित चिंतक होने या उनकी आय दो गुनी करने का कितना ही दावा क्यों न करे परन्तु नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो एनसीआरबी के आंकड़ों अनुसार 2019 में भारत में 4324 किसानों द्वारा क़र्ज़ या भूखमरी के चलते आत्म हत्या की गयी । इनमें सबसे अधिक 1247 आत्महत्यायें महाराष्ट्र के किसानों या खेतिहर मज़दूरों द्वारा की गयीं। जबकि सबसे कम यानी 63 किसानों की आत्महत्यायें पंजाब में हुईं। पंजाब सरकार द्वारा गत दिनों भूमिविहीन मज़दूरों का 526 करोड़ क़र्ज़ भी माफ़ किया गया क्योंकि क़र्ज़ के बोझ से दबा प्रायः यही वर्ग आत्म हत्या करता है। परन्तु केंद्रीय स्तर पर तो उद्योगपतियों के हज़ारों व लाखों करोड़ रूपये तो ग़ैर निष्पादित संपत्ति अर्थात एनपीए के खाते में डाल दिये जाते हैं और उन्हें देश छोड़ने के लिये कथित रूप से 'सुरक्षित मार्ग' भी मुहैय्या कराया जाता है। जबकि  मामूली से पैसों के लिये एक ग़रीब किसान व मज़दूर के घरों की कुर्की हो जाती है,उसे जेल भेज दिया जाता है या उसके चित्र व नाम प्रकाशित कर उसे अपमानित किया जाता है।


सरकार को चाहिये कि वह अपनी छवि चमकाने,चुनावी जीत के गुणा भाग बिठाने,विज्ञापन आधारित लोकप्रियता अर्जित करने तथा केवल चंद उद्योगपतियों के हितों की चिंता करने के बजाये अन्नदाताओं की समस्याओं का यथाशीघ्र समाधान करे।इसके अलावा सरकार को किसानों पर लांछन लगाने जैसी रणनीति से व किसानों को कमज़ोर समझने की सलाह देने वाले सलाहकारों से भी बाज़ आना चाहिये। परन्तु चिंता का विषय है कि गत लगभग एक वर्ष से 'अन्नदाता ' की ताक़त का आंकलन करने में यह सरकार विफल रही है। 


-तनवीर जाफ़री-




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भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने पानी में बैठकर विरोध जताया , खुद की गलतियों से फंसे टिकैत और प्रदर्शनकारी

गाजियाबाद :  कृषि कानून विरोधियों ने यूपी गेट पर खुद ही जलनिकासी की व्यवस्था बिगाड़ दी है। इसकी वजह से शनिवार को यहां घुटनों तक जलभराव हो गया। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने पानी में बैठकर विरोध जताया। नाले की सफाई नहीं होने का आरोप लगाकर दूसरों पर दोष मढ़ा, जबकि हकीकत में इसके दोषी प्रदर्शनकारी खुद हैं।

तीनों कृषि कानूनों के विरोध में यूपी गेट पर 28 नवंबर से धरना चल रहा है। प्रदर्शनकारियों ने यहां टेंट लगाकर राष्ट्रीय राजमार्ग-नौ, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे, संपर्क मार्ग और फ्लाईओवर के नीचे कब्जा किया है। टेंटों के नीचे ईंट-सीमेंट से चिनाई करा दी है। जगह-जगह टायलेट लगाकर उसे हाईवे की जलनिकासी की लाइन से जोड़ दिया है। इसकी वजह से सकी वजह से हाईवे की जलनिकासी की व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है।

बारिश का पानी नहीं निकल पा रहा है। पानी हाईवे पर ही भर रहा है। शुक्रवार रात और शनिवार को दिन में हुई बारिश में यहां घुटनों तक पानी भर गया। टेंटों में रखे बिस्तर, राशन आदि भीग गए। यह सबकुछ प्रदर्शनकारियों की स्वयं की गलती से हुआ। प्रदर्शनकारी अगर हाईवे की जलनिकासी की व्यवस्था नहीं बिगाड़ते तो पानी बह जाता। जलभराव की स्थिति नहीं बनती। 

शनिवार को धरना स्थल पर घुटनों तक पानी भर गया तो राकेश टिकैत कुछ प्रदर्शनकारियों के साथ बैरिकेड के पास पहुंचे। यहां पानी में बैठकर विरोध जताया। कहा कि दिल्ली की तरफ जाने वाली नाले की सफाई की मांग की गई लेकिन सुनवाई नहीं हुई। इस कारण जलभराव हुआ। उनकी वह फोटो इंटरनेट मीडिया पर जमकर वायरल हुई। चंदन नामक व्यक्ति ने उनकी फोटो वायरल करते हुए लिखा कि '' टिकैत साहब जलमग्न हो गए ''। इस तरह अन्य लोगों ने भी तंज कसते हुए टिप्पणियां की हैं।

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किसान आंदोलन में आए तीन युवक अवैध हथियारों के साथ पकड़े

बहादुरगढ : किसान आंदोलन में आए सिरसा के तीन युवकों को पुलिस ने अवैध हथियारों के साथ गिरफ्तार किया है। तीनों से अलग-अलग देशी पिस्तौल बरामद हुए हैं। तीनों के खिलाफ पहले भी विभिन्न थानों में आपराधिक मामले दर्ज हैं। बहादुरगढ़ अदालत ने तीनों को न्यायिक हिरासत में झज्जर जेल भेज दिया है।


सीआईए टू बहादुरगढ़ के प्रभारी निरीक्षक मनोज कुमार ने बताया कि किसान आंदोलन क्षेत्र में किसी आपराधिक वारदात को अंजाम देने की फिराक में घूम रहे दो युवकों को वीरवार को अवैध हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया था। पकड़े गए दोनों आरोपितों से प्राथमिक पूछताछ में उनके तीसरे साथी के संबंध में खुलासा हुआ, जिस पर पुलिस ने उनके तीसरे साथी को भी काबू कर लिया। इस तीसरे युवक के कब्जे से भी एक देसी पिस्तौल बरामद हुआ। उसकी पहचान शुभम उर्फ छब्बा निवासी वैदवाला सिरसा के तौर पर हुई। उन्होंने कहा कि हो सकता है ये तीनों युवक आंदलोनकारियों के पड़ाव में कोई वारदात करने की मंशा से आए हों।


इंस्पेक्टर मनोज ने बताया कि पकड़े गए आरोपियों से पूछताछ में अन्य आपराधिक वारदातों के संबंध में भी खुलासा हुआ। पकड़े गए एक आरोपित गुरुदत्त के खिलाफ आपराधिक वारदात का एक मामला दर्ज होने के संबंध में खुलासा हुआ। आरोपित के खिलाफ महिला थाना सिरसा में वर्ष 2019 में दुष्कर्म का एक मामला दर्ज हुआ था। गिरफ्त में आए तीसरे आरोपित शुभम के खिलाफ भी अलग-अलग तीन आपराधिक मामले दर्ज हैं। आरोपित के खिलाफ वर्ष 2014 में एक मामला थाना सदर सिरसा में अवैध हथियार रखने के संबंध में दर्ज हुआ था। वहीं आरोपित ने राजस्थान के एरिया में एक गाड़ी छीनने की वारदात को अंजाम दिया था। इसके संबंध में आरोपी के खिलाफ वर्ष 2014 में थाना पल्लू राजस्थान में गाड़ी छीनने का एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था। आरोपित शुभम के खिलाफ विचाराधीन एक आपराधिक मामले में निश्चित समय पर अदालत में पेश न होकर भगोड़ा होने के संबंध में भी थाना सदर सिरसा में वर्ष 2018 में उद्घोषित आरोपी घोषित होने के संबंध में एक मामला दर्ज हुआ था। रिमांड के दौरान पूछताछ के पश्चात दोनों आरोपितों सहित गिरफ्त में आए तीसरे आरोपित को भी अदालत ने न्यायिक हिरासत में भेज दिया।



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जो किसानों को सता रहे हैं उनकी नींद उड़ी हुई है,हम तो रात तसल्ली से सोए: योगेंद्र यादव

करनाल/नई दिल्ली : करनाल के जिला सचिवालय के बाहर आंदोलनकारी किसान डटे हैं। किसानों नेताओं के तेवर नरम नहीं पड़े हैं। उन्होंने रात यहीं खुले में बिताने के बाद सुबह ही टेंट लगाने शुरू कर दिए। दिन में धूप से बचाव के लिए टैंट की व्‍यवस्‍था की जा रही है। सुबह के नाश्‍ते और लंगर की व्यवस्था भी की गई है। वहीं किसान नेता राकेश टिकैत मीडिया के सामने आए। बुधवार को मीडिया के सामने आए योगेंद्र यादव ने कहा कि हम बीती रात पूरी तसल्ली से सोए। नींद उनकी जरूर उड़ी है,जो किसानों को सता रहे हैं। तीन बार सरकार ने किसानों पर जुल्म करके आंदोलन की ऊर्जा बांटने का भरसक प्रयास किया लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। बल्कि इससे आंदोलन को और अधिक मजबूती मिली। उम्मीद है कि शासन प्रशासन को अब किसानों के हौसले और तेवर देखकर कुछ समझ आ गई होगी लेकिन यदि अब भी ऐसा नहीं होता तो किसान कतई पीछे नहीं हटेंगे। योगेंद्र यादव ने कहा, हमें उस अधिकारी पर कार्रवाई चाहिए, जिसका वीडियो वायरल हुआ। लगातार यह मांग की जा रही है। पांच मिनट में बात सुलझ सकती है। हम न्यूनतम मांग कर रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा। अगर एक अधिकारी को सस्पेंड करने और जांच बिठाने तक से पीछा हटा जा रहा है तो किसान इस तरह आवाज उठाने के सिवा और क्या कर सकते हैं। सरकार अगर अब भी मांग मान ले तो हम 15 मिनट में यहां से डेरा उठा लेंगे। सच यह है कि प्रशासन पूरी तरह बैकफुट पर है। अन्य राज्यों से भी जत्थे यहां लाए जा सकते हैं। आंदोलन जितना लंबा खिंचेगा, सरकार की उतनी फजीहत होगी। राकेश टिकैत ने दो टूक कहा कि दिल्ली बार्डर से अलग यहां कितने भी समय के लिए अलग मोर्चा लगाने से कोई गुरेज नहीं है। यह साफ हो चुका है कि प्रशासन न तो वायरल वीडियो में लाठीचार्ज कराने के आदेश देने वाले अधिकारी पर किसी प्रकार की कार्रवाई के मूड में है और न ही किसानों से ठोस वार्ता करना चाहता है। इसलिए हम भी लंबे संघर्ष के लिए तैयार हैं। फिर चाहे दो दिन, दो महीने और दो साल ही यहां क्यों न बैठना पड़े।





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वापस नहीं लिए जाएंगे नए कृषि कानून : भाजपा सांसद

बलिया (उत्तर प्रदेश) : नए कृषि कानूनों की वापसी की मांग को लेकर किसानों के व्यापक आंदोलन के बीच भाजपा सांसद और पार्टी किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह मस्त ने कहा है कि सरकार इन कानूनों को वापस नहीं लेगी।


बलिया से सांसद मस्त ने मंगलवार को यहां संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा है कि सरकार नये कृषि कानूनों को वापस नहीं लेगी और इन कानूनों को वापस लेने के लिए नहीं बनाया गया है।


उन्होंने सवाल किया है कि संसद में बना कानून अगर सड़क पर आंदोलन करके वापस हो जाएगा तो संसद की क्या प्रतिष्ठा रह जाएगी।


हालांकि भाजपा सांसद ने यह भी कहा कि सरकार किसानों और कृषि के हित में किसी भी तरह के सुझाव का स्वागत करेगी, वह स्वयं किसान हैं तथा किसानों और कृषि के हित में पहल करने के लिए तैयार हैं।


मस्त का यह बयान ऐसे समय आया है जब नए कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले साल दिसंबर से प्रदर्शन कर रहे किसानों ने पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में महापंचायत का आयोजन करके नए कानूनों को वापस लेने की मांग और बुलंद की थी।


उन्होंने कांग्रेस, सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल को नसीहत देते हुए कहा कि इन पार्टियों को सामने आकर अपने बैनर तले किसान आंदोलन करना चाहिए।


भाजपा नेता ने कहा कि कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसानों का आंदोलन भविष्य के किसान आंदोलनों पर सवाल खड़ा करने के साथ ही भरोसे का संकट पैदा करेगा।







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चढूनी ने करनाल लाठीचार्ज में जान गंवाने वाले किसान परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा और सरकारी नौकरी और घायल किसानों को दो-दो लाख रुपये देने की मांग की

करनाल : किसानों पर 28 अगस्त को हुए पुलिस के कथित लाठीचार्ज के विरोध में करनाल में मंगलवार को महापंचायत करने तथा ‘‘लघु सचिवालय का घेराव करने’’ की किसानों की योजना के मद्देनजर जिले में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। अधिकारियों ने बताया कि करनाल में हरियाणा पुलिस के साथ ही बड़ी संख्या में केन्द्रीय बलों के कर्मी भी तैनात किए गए हैं, जबकि नई अनाज मंडी में भी बल की भारी तैनाती की गई है। किसानों की योजना अनाज मंडी में एकत्रित होकर, वहां से लघु सचिवालय का घेराव करने के लिए आगे बढ़ने की है।


हरियाणा भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के प्रमुख गुरनाम सिंह चढूनी ने किसानों से शांतिपूर्वक तरीके से अनाज मंडी में एकत्रित होने की अपील की है। उन्होंने कहा, ‘‘हम नई अनाज मंडी में महापंचायत करेंगे।’’ चढूनी ने एक वीडियो संदेश में कहा, ‘‘मैं सभी से शांतिपूर्वक तरीके से मंडी पहुंचने की अपील करता हूं। मुझे संदेश मिला है कि पुलिस हमें मंडी में एकत्रित होने देगी। आगे की कार्रवाई महापंचायत में ही तय की जाएगी।’’ खबरों के अनुसार, किसानों ने नई अनाज मंडी पहुंचना शुरू कर दिया है, जबकि बीकेयू के नेता राकेश टिकैत भी करनाल पहुंच रहे हैं।


पुलिस के कई वरिष्ठ अधिकारियों को नई अनाज मंडी में तैनात किया गया है। लघु सचिवालय के आसपास अवरोधक लगाए गए हैं और भारी बल की तैनाती की गई है। लघु सचिवालय का घेराव करने के कार्यक्रम से एक दिन पहले प्रशासन ने जिले में सोमवार को लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगा दिया था और मोबाइल इंटरनेट सेवा को निलंबित कर दिया गया था।


हरियाणा सरकार ने पास के चार जिलों में भी मोबाइल इंटरनेट सेवाएं सोमवार दोपहर 12:30 बजे से लेकर मंगलवार मध्य रात्रि तक बंद रखने का आदेश दिया है। कुरुक्षेत्र, कैथल, जींद और पानीपत जिलों में मंगलवार को दिन में 12 बजे से रात 11:59 बजे तक मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद रहेगी। केन्द्रीय अर्धसैनिक बलों की 10 टुकड़ियों सहित सुरक्षा बलों की 40 टुकड़ियां भी तैनात की गई हैं, जहां स्थानीय अधिकारियों ने दण्ड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लागू कर पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्रित होने पर प्रतिबंध लगा दिया है।


हरियाणा पुलिस द्वारा जारी एक परामर्श अनुसार, मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-44 (अंबाला-दिल्ली) पर मंगलवार को करनाल जिले में यातायात प्रभावित हो सकता है। इसमें कहा गया, ‘‘इसलिए, एनएच-44 का उपयोग करने वाले लोगों को सलाह दी जाती है कि वे करनाल शहर की यात्रा करने से बचें या सात सितंबर को अपने गंतव्य तक जाने के लिए वैकल्पिक रास्तों का उपयोग करें।’’


हरियाणा पुलिस के एक प्रवक्ता ने बाद में बताया था कि कि जरूरत पड़ने पर दिल्ली-अंबाला राष्ट्रीय राजमार्ग पर मार्ग में परिवर्तन मंगलवार सुबह नौ बजे से लागू किया जाएगा, लेकिन तब तक यातायात सामान्य रूप से चलेगा।


करनाल के पुलिस अधीक्षक गंगा राम पुनिया ने बताया कि पड़ोसी जिलों से अतिरिक्त बल के साथ, पुलिस अधीक्षक रैंक के पांच अधिकारी और 25 डीएसपी रैंक के अधिकारी यहां सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी करेंगे। उन्होंने कहा कि सुरक्षा उपायों के तहत कैमरों से लैस ड्रोन भी तैनात किए जाएंगे।


करनाल के उपायुक्त निशांत कुमार यादव ने कहा कि किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी।


सोमवार को चंडीगढ़ में संवाददाताओं से बातचीत के दौरान हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने किसानों से यह सुनिश्चित करने की अपील कीथी कि विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण हो तथा आम आदमी को उससे परेशानी न हो।


कृषि कानूनों का विरोध कर रहे विभिन्न किसान संगठनों की नेतृत्व कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने मांगे पूरी नहीं होने पर सात सितंबर को करनाल में लघु सचिवालय की घेराबंदी करने की चेतावनी दी है।


गौरतलब है कि हरियाणा पुलिस ने 28 अगस्त को भाजपा की एक बैठक में जा रहे नेताओं का विरोध करते हुए एक राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात बाधित करने वाले किसानों के एक समूह पर कथित तौर पर लाठीचार्ज किया था। इसमें 10 से अधिक प्रदर्शनकारी घायल हो गए थे। एसकेएम ने आईएएस अधिकारी आयुष सिन्हा के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करने की मांग की है। सिन्हा कथित तौर पर एक टैप में पुलिस कर्मियों को प्रदर्शन कर रहे किसानों के ‘‘सिर तोड़ने’’ के लिए कहते सुनाई दे रहे हैं। संगठन ने सिन्हा को बर्खास्त करने की भी मांग की है।


चढ़ूनी ने कहा कि सोमवार को जिला प्रशासन के अधिकारियों के साथ यहां एक बैठक हुई थी लेकिन अपनी मांगों पर संतोषजनक प्रतिक्रिया न मिलने पर उन्होंने मंगलवार को महापंचायत करने और फिर लघु सचिवालय का घेराव करने का निर्णय किया।


चढूनी ने करनाल में लाठीचार्ज में कथित रूप से घायल होने के बाद जान गंवाने वाले एक किसान के परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की मांग की थी। वहीं, प्रशासन का कहना है कि किसान की मौत पुलिस की कार्रवाई से नहीं बल्कि दिल का दौरा पड़ने से हुई। चढूनी ने अन्य घायल किसानों को दो-दो लाख रुपये देने की भी मांग की है।





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आंदोलन का चुनावी अंदाज

किसानों के नाम पर आंदोलन की शुरुआत शाहीनबाग अंदाज में हुई थी। उसकी तरह ही असत्य पर आधारित अभियान चलाया जा रहा है। सीएए ने नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया था। जबकि आंदोलन इस बात कर किया गया कि सरकार वर्ग विशेष की नागरिकता छीन लेगी लेकिन कुछ ही समय में ऐसा कहने वाले बेनकाब हुए। इसी प्रकार किसानों के नाम पर चल रहा आन्दोलन भी बड़े झूठ पर आधारित है। सीएए विरोध की तर्ज पर कहा जा रहा है कि कृषि कानूनों से किसानों की जमीन छीन ली जाएगी। वास्तविकता यह कि पुरानी व्यवस्था में किसान अपनी जमीन बेचने को विवश हो रहे थे क्योंकि कृषि में लाभ कम हो रहा था। इसका फायदा पूंजीपति उठा रहे थे। नए कृषि कानूनों से किसानों को विकल्प उपलब्ध कराए गए हैं। इनको भी स्वीकार करने की बाध्यता नहीं है। किसानों को अधिकार प्रदान किये गए।


देश में अस्सी प्रतिशत से अधिक किसान छोटी जोत वाले हैं। आंदोलन के नेताओं को इनकी कोई चिंता नहीं है। आंदोलन का स्वरूप अभिजात्य वर्गीय है। ऐसा आंदोलन नौ महीने क्या नौ वर्ष तक चल सकता है। आंदोलन के नेता कृषि कानूनों का काला बता रहे हैं। लेकिन उनके पास इस बात का जवाब नहीं है कि इसमें काला क्या है, वह कह रहे है कि किसानों की जमीन छीन ली जाएगी लेकिन उनके पास इसका जवाब नहीं कि किस प्रकार किसानों की जमीन छीन ली जाएगी। कॉन्ट्रैक्ट कृषि तो पहले से चल रही है। किसानों को इसका लाभ मिल रहा है। ऐसा करने वाले किसी भी किसान की जमीन नहीं छीनी गई।


आंदोलन के नेता कह रहे है कि कृषि मंडी समाप्त हो जाएगी। जबकि वर्तमान सरकार ने कृषि मंडियों को आधुनिक बनाया है। कृषि मंडियों से खरीद के रिकार्ड कायम हुए हैं। आंदोलन के नेता कह रहे है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य समाप्त हो जाएगा। लेकिन वर्तमान सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में अब तक कि सर्वाधिक वृद्धि की है।


जाहिर है कि यह आंदोलन भी सीएए की तरह विशुद्ध राजनीतिक है। इससे किसानों का कोई लेना देना नहीं है। इसमें किसान हित का कोई विचार समाहित नहीं है। सीएए विरोधी आंदोलन जल्दी समाप्त हो गया। लेकिन इस आंदोलन में किसान शब्द जुड़ा है। इसका लाभ मिल रहा है। इसी नाम के कारण सरकार ने बारह बार इनसे वार्ता की। संचार माध्यम में भी किसान आंदोलन नाम चलता है। जबकि वास्तविक किसान इससे पूरी तरह अलग है। उन्हें कृषि कानूनों में कोई खराबी दिखाई नहीं दे रही है। आंदोलन के नेता और उनका समर्थन करने वाले राजनीतिक दल अपनी जवाबदेही से बच रहे हैं। किसी ने यह नहीं बताया कि वह पुरानी व्यवस्था को बचाने हेतु इतना बेकरार क्यों है। इसका क्या निहितार्थ निकाला जाए, क्या उनके पास पुरानी व्यवस्था की अच्छाइयां बताने के लिए कुछ नहीं है।


किसी ने यह नहीं कहा कि पुरानी व्यवस्था में किसान खुशहाल थे इसलिए वे सुधारों का विरोध कर रहे हैं। जबकि सुधार तथ्यों पर आधारित है। इसका विरोध कल्पनाओं पर आधारित है। मात्र कल्पना के आधार पर आंदोलन चलाया जा रहा है। सरकार के विरोध में विपक्ष ने अपने हितों का भी ध्यान नहीं रखा। सत्ता पक्ष ने उनको बिचौलियों के बचाव हेतु परेशान बताया। क्योंकि विधेयकों के माध्यम से बिचौलियों को ही दूर किया गया। मंडियां समाप्त नहीं होंगी, न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रहेगा, किसानों को अपनी मर्जी से उपज बेचने का अधिकार मिला। ऐसे में विरोध का कोई औचित्य या आधार ही नहीं था। विरोध में सर्वाधिक मुखर दलों को सत्ता में रहने का अवसर मिलता रहा है।


कांग्रेस आज भी कई प्रदेशों की सत्ता में है। नरेंद्र मोदी सरकार के ठीक पहले कांग्रेस की केंद्र में सरकार थी। ऐसी सभी पार्टियों को तो किसान हित पर बोलने का अधिकार ही नहीं है। दस वर्षों में एक बार किसानों की कर्ज माफी मात्र से कोई किसान हितैषी नहीं हो जाता। आज हंगामा करने वाली पार्टियां स्वयं जवाबदेह हैं। उनको बताना चाहिए कि पुरानी व्यवस्था के माध्यम से उन्होंने किसानों को कितना लाभान्वित किया था। उन्हें बताना चाहिए कि क्या उस व्यवस्था में बिचौलिओं की भूमिका नहीं थी। क्या सभी किसानों की उपज मंडी में खरीद ली जाती थी।


स्वामीनाथन समिति का गठन यूपीए सरकार ने किया था। उसकी सिफारिशों पर मोदी सरकार अमल कर रही है। कुछ दिन पहले कांग्रेस सवाल करती थी कि स्वामीनाथन रिपोर्ट कब लागू होगी। सरकार अमल कर रही है तो हंगामा किया जा रहा है। यह दोहरा आचरण कांग्रेस के लिए हानिकारक है। जाहिर है कि विपक्ष पिछली व्यवस्था के लाभ बताने की स्थिति में नहीं है।


भाषण और बयान चल रही है,किसानों के हित की दुहाई दी जा रही है,लेकिन कोई यह नहीं बता रहा है कि अब तक चल रही व्यवस्था में किसानों को क्या लाभ मिल रहा था, कोई यह नहीं बता रहा है कि कितने प्रतिशत कृषि उत्पाद की खरीद मंडियों में होती थी। कोई यह नहीं बता रहा है कि पिछली व्यवस्था में बिचौलियों की क्या भूमिका थी। कोई यह नहीं बता रहा है कि कृषि उपज का वास्तविक मुनाफा किसान की जगह कौन उठा रहा था। विपक्ष इन सबका जवाब देता तो स्थिति स्पष्ट होती। कहा जा रहा है कि किसान बर्बाद हो जाएंगे, बड़ी कम्पनियां उनके खेतों पर कब्जा कर लेंगी, अंग्रेजों की तरह उनसे नील का उत्पादन कराएंगी, खेत बर्बाद हो जाएंगे आदि।


पुरानी व्यवस्था में अनेक कमियां थी। इसमें किसानों पर ही बन्धन थे, वही परेशान होते थे। इस व्यवस्था में वे लोग लाभ उठा रहे थे, जो किसान नहीं थे। वह किसानों की तरह मेहनत नहीं करते थे, उन्हें फसल पर मौसम की मार से कोई लेना देना नहीं था। ऐसे में इस आंदोलन से किसका लाभ हो सकता है। आंदोलन किसके बचाव हेतु चल रहा है। इसमें किसानों का हित नजरअंदाज किया जा रहा है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो पुरानी व्यवस्था में लाभ उठाने वालों के गिरोह का उल्लेख किया है। कहा कि देश में अब तक उपज और बिक्री के बीच में ताकतवर गिरोह पैदा हो गए थे। यह किसानों की मजबूरी का फायदा उठा रहे थे। जबकि इस कानून के आने से किसान अपनी मर्जी और फसल दोनों के मालिक होंगे। उन्होंने देश के किसानों को आश्वस्त किया कि देश में न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म होगा ना ही कृषि मंडियां समाप्त होंगी।


कांग्रेस किसानों को भ्रमित कर रही है। कांग्रेस ने शुरू से ही देश के किसानों को कानून के नाम पर अनेक बंधनों से जकड़ रखा है। आज तक किसानों के हित में कोई फैसला नहीं लिया। आज जब कृषि सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं तो किसानों को गुमराह किया जा रहा है। देश में एमएसपी अनवरत जारी है। फसल मंडियां अपनी जगह यथावत है। लेकिन कांग्रेस पार्टी किसानों को यह कह कर गुमराह कर रही है कि एमएसपी खत्म हो जाएगी। मंडियों को खत्म कर दिया जाएगा। सरकार ने किसानों को अधिकार के लिए ऐतिहासिक कानून बनाये हैं। यह कृषि सुधार इक्कीसवीं सदी के भारत की जरूरत है।


-डॉ. दिलीप अग्निहोत्री-

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)









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हरियाणा के करनाल में आज किसानों की महापंचायत, इंटरनेट सेवाएं बंद

नई दिल्ली : कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के प्रदर्शन के बीच विभिन्न जगहों पर महापंचायतों का आयोजन किया जा रहा है, ऐसे में किसानों ने आज हरियाणा के करनाल में महापंचायत का एलान किया है। वहीं किसानों के कार्यक्रम के मद्देनजर इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं।


संयुक्त किसान मोर्चा ने एक बयान में कहा , सुबह 10 बजे करनाल की अनाज मंडी में किसानों की पंचायत पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार होगी। आज दिनभर की गतिविधियों का जायजा लेने के बाद मोर्चे ने अफसोस प्रकट किया की हरियाणा सरकार ने शहीद सुशील काजल और अन्य घायल किसानों को मुआवजा देने की बजाय उन्हें अपराधी ठहराने की कोशिश की है।


बयान के अनुसार, किसानों के सर फोड़ने का हुक्म देने वाले अफसर के खिलाफ कार्यवाही करने की बजाय सरकार ने उन्हें इनाम दिया है। इसलिए इसके विरोध में होने वाली पंचायत आयोजित की जाएगी। संयुक्त किसान मोर्चा ने सभी किसानों को आह्वान किया है कि वह सरकारी दमन का विरोध करने के लिए अधिक से अधिक संख्या में कल 10 बजे अनाज मंडी करनाल पहुंचे।


दूसरी ओर किसानों की महापंचायत के मद्देनजर हरियाणा सरकार ने करनाल समेत पड़ोसी जिलों में इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी हैं, करनाल में इंटरनेट सेवाएं 6 सितंबर की दोपहर 12.30 बजे से 7 सितंबर की रात 11.59 बजे तक बंद रहेंगी।


हालांकि मोर्चे ने सभी किसानों से हर हालत में शांति बनाए रखने की अपील की है।


मोर्चे ने कहा, किसान आंदोलन से बौखलाई हरियाणा सरकार के पास अब एक ही हथकंडा बचा है कि वह किसी तरह किसान आंदोलन में हिंसा करवा कर उसे बदनाम करें। इसलिए किसानों को विशेष रूप से सजग रहना होगा कि वह सरकार और उसके एजेंटों को ऐसी कोई हरकत करने का कोई मौका ना दें, किसी तरह की हिंसा की गुंजाइश न होने दें।




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किसानों ने लुहारली प्लाजा एक घंटे टोल मुक्त रखा

दादरी : भारतीय किसान यूनियन (महाशक्ति) के कार्यकर्ताओं ने सोमवार को प्रदर्शन कर नेशनल हाइवे-91 स्थित लुहारली टोल को करीब एक घंटे तक शुल्क मुक्त रखा। वे हाइवे-91 की मरम्मत कराने की मांग कर रहे थे। हाइवे के अधिकारी के आश्वासन पर किसान शांत हुए और प्रदर्शन खत्म किया।


भारतीय किसान यूनियन (महाशक्ति) के राष्ट्रीय अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह और बुलंदशहर के जिला अध्यक्ष मौ. अली भाटी के नेतृत्व में सोमवार को करीब 12 बजे किसान इकट्ठे होकर लुहारली टोल प्लाजा पर पहुंचे और सभी लेन के बैरियर हटाकर प्लाजा को टोल मुक्त कर दिया।


किसान नेताओं का कहना है कि काफी लंबे समय से यह हाइवे टूटा पड़ा है। किसान, मजदूर और गरीब सड़क टूटी होने के कारण हादसे के शिकार हो रहे हैं। इसकी मरम्मत के लिए कई बार सूचित किया जा चुका है लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे नाराज होकर यूनियन के कार्यकर्ता टोल प्लाजा पर पहुंचे और प्रदर्शन किया। मामले की जानकारी मिलने पर पुलिस, प्रशासन, हाइवे के अधिकारी मौके पर पहुंच गए। हाइवे के अधिकारी की ओर से रोड की जल्द मरम्मत कराने के आश्वसन के बाद किसान शांत होकर वापस लौट गए। जीटी रोड प्राधिकरण के मैनेजर मेंटेनेंस टीके सिंह ने बताया कि टूटी हुई सड़क की मरम्मत का काम चालू करा दिया गया है। यह काम जल्द ही पूरा हो जाएगा।


लुहारली टोल प्लाजा के प्रबंधक बजरंग सैनी ने बताया कि करीब एक घंटे टोल मुक्त रहने से करीब एक लाख रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है।






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मुजफ्फरनगर में किसानों की महापंचायत पहुंचे विधिक सेल किसान यूनियन अंबावत के एडवोकेट फरमान त्यागी


 मुजफ्फरनगर  : आज दिनांक 5 सितंबर 2021 को भारतीय किसान यूनियन के सभी संगठन एवं उत्तराखंड उत्तर प्रदेश तथा देश के सभी राज्यों से मुजफ्फरनगर महापंचायत में पहुंचे लाखों किसान वहीं पर उत्तराखंड से प्रदेश अध्यक्ष भारतीय किसान यूनियन विधिक सेल एडवोकेट फरमान त्यागी दल बल के साथ मुजफ्फरनगर महापंचायत में पहुंचे और वहीं पर राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी ऋषि पाल अंबावता पहुंचे तथा अन्य सैकड़ों किसान नेता उधर लाखों की संख्या की भीड़ एक इतिहास बना गई वहां पर कई मुख्य निर्णय लिए गए जिसमें सभी ने एकजुट होकर आने वाले समय में देश में सरकार को बदलने का निर्णय लिया इस मौके पर एडवोकेट फरमान त्यागी ने कहा किसान की लड़ाई में वह हमेशा तन मन धन से देश के किसानों के साथ खड़े हैं ,और स्तर पर लड़ाई लड़ेंगे इस मौके पर उनके साथ पूर्व राज्य मंत्री तमिल त्यागी, डॉक्टर तारीख त्यागी, आबाद त्यागी नियामू, सावेज सलमान इरशाद सरताज त्यागी छपार शहराज त्यागी सहित सैकड़ों किसान उपस्थित रहे.
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भाजपा ने मुजफ्फरनगर में हुई किसान महापंचायत को ‘चुनाव रैली’ करार दिया

नई दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने मुजफ्फरनगर में हुई ‘किसान महापंचायत’ को रविवार को ‘‘चुनाव रैली’’ करार दिया और इसके आयोजकों पर उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीति करने का आरोप लगाया।


केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा रविवार को आयोजित ‘किसान महापंचायत’ में उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्यों से हजारों किसानों ने भाग लिया।


भाजपा के किसान मोर्चा प्रमुख एवं सांसद राजकुमार चाहर ने एक बयान में दावा किया कि ‘महापंचायत’ के पीछे का एजेंडा राजनीति से जुड़ा है, न कि किसानों की चिंताओं से।


उन्होंने कहा कि यह किसान महापंचायत नहीं, बल्कि राजनीतिक एवं चुनावी बैठक थी तथा विपक्ष और संबंधित किसान संगठन राजनीति करने के लिए किसानों का इस्तेमाल कर रहे हैं।


चाहर ने दावा किया कि किसी अन्य सरकार ने किसानों के लिए इतना काम नहीं किया है, जितना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछले सात साल में किया है।


केंद्र के नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान पिछले नौ महीने से दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हुए हैं।




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गाजीपुर बार्डर से सीधे महापंचायत में पहुंचे राकेश टिकैत ,महापंचायत के दौरान एक महिला रिपोर्टर से बदसलूकी

मुजफ्फरनगर  : मुजफ्फरनगर में संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर किसान रविवार (आज) राजकीय इंटर कालेज के मैदान में भाजपा की सरकार के खिलाफ हुंकार भरेंगे। केन्द्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली बार्डर पर किसान लगभग आठ माह से आंदोलनरत हैं। इसी क्रम में मुजफ्फरनगर में आज होने जा रही किसान महापंचायत की कई दिन से युद्धस्तर पर तैयारियां चल रही थीं। यहां होने वाली महापंचायत के लिए आयोजकों और पुलिस-प्रशासन ने पूरी तैयारी की है। आयोजको ने किसानों के लिये 500 लंगर और 1000 चिकित्सा यूनिट की व्यवस्था की है। प्रशासन भी महापंचायत को लेकर चौकन्ना है। कई जिलों से पुलिस बुलाई गई है। किसान संगठनों ने भी व्यवस्था और सुरक्षा के लिये 5000 वालंटियर तैयार किये है। करीब दो लाख वर्ग फुट के पंडाल के साथ वाटर प्रूफ मंच भी बनाया गया है। महापंचायत में शामिल होने उत्तर प्रदेश समेत, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब तथा राजस्थान आदि राज्यों से किसान पहुंचे हैं। इनके ठहरने और भोजन की विभिन्न स्थानों पर व्यवस्था की गई है।

गाजीपुर बार्डर से सीधे महापंचायत में राकेश टिकैत पहुंच गए हैं। इनके साथ नरेश टिकैत, चढ़ूनी और भाकियू के जिलाध्‍यक्ष व किसान नेता योगेंद्र यादव मंच पर मौजूद हैं। मंच पर पहुंचते ही इन्‍होंने हाथ उठाकर लोगों का अभिवादन किया। राकेश टिकैत यहां से वापस गाजीपुर बार्डर ही जाएंगे। वे नौ महीने से घर नहीं गए है। संयुक्त किसान मोर्चा के पदाधिकारियों मोहन सिंह, योगेंद्र यादव, जगजीत सिंह, दर्शनपाल, शिवकुमार बलबीर सिंह आदि को राकेश टिकैत ने पटका पहनाया। जिसके बाद सिख समाज के लोगों ने राकेश टिकैत को तलवार भेंट की।

हजारों किसान सड़कों पर घूम रहे हैं। इतना ही नहीं पंचायत में आने वाले वाहनों के कारण पूरा शहर जाम हो गया है। जिस वाहन को जहां जगह मिल रही है वह वहीं खड़ा हो रहा है। उधर, मंच से केंद्र और प्रदेश सरकार पर जमकर निशाना साधा जा रहा है। मंच पर भाकियू के नरेश टिकैत, युद्धवीर सिंह समेत किसान संगठनों के पदाधिकारी मौजूद है। मंच से वक्ता किसानों के हितों की लड़ाई लड़ने का आह़वान किया जा रहा है। उधर, शामली रोड, भोपा रोड, रूडकी रोड, जानसठ रोड समेत अन्य स्थानों पर वाहनों की लाइन लगी हुई है। सुरक्षा की दृष्टि से फोर्स अलर्ट पर है।

महापंचायत के दौरान मंच से केंद्र सरकार और राज्‍य सरकार के खिलाफ नारेबाजी की गई। वहीं एक न्‍यूज चैनल के महिला रिपोर्टर से भी बदसलूकी की गई। जिसके बाद मंच से संचालकों ने ऐसा न करने की हिदायत दी। साथ ही पुलिसकर्मियों को अंदर बुलाकर व्‍यवस्‍था बनाने की मांग की। मंच से 'फसल हमारी दाम तुम्हारा नहीं चलेगा..मंच से लगातार नारेबाजी जारी रहा। तीनों कृषि कानून वापस लेने और सरकार के खिलाफ नारेबाजी जारी है। 

नरेन्द्र मोदी सरकार के तीन कृषि कानून के विरोध में रविवार को किसानों के मसीहा माने जाने वाले चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की कर्मभूमि मुजफ्फरनगर में आज होने वाली किसान महापंचायत में महिला किसान भी एकत्र हैं। महिला किसानों का कहना है कि हम तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग को लेकर यहां एकत्रित हुए हैं। हम यहां से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से तीन कानूनों को वापस लेने का अनुरोध करते हैं। अगर वह कृषि कानून वापस ले लेते हैं तो हमारा यहां पर एकत्र होना सफल हो जाएगा।


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नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ किसानों का आंदोलन जारी, भारी संख्या में महिलाएं शामिल, पुलिस बल मौजूद

नोएडा : आबादी निस्तारण और दूसरी मांगों को लेकर नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ गौतमबुद्ध नगर के सैकड़ों किसानों का प्रदर्शन आज भी जारी है। भारी संख्या में महिलाएं और बड़े-बुजुर्ग अथॉरिटी का घेराव करने नोएडा के सेक्टर-6 पहुंचे हैं। हालांकि सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए पुलिस ने उन्हें पहले ही रोक दिया। इसके चलते कड़ी धूप में सैकड़ों महिलाएं और आंदोलनकारी किसान हरौला बारात घर के सामने मुख्य मार्ग पर ही बैठ गए हैं। हाथों में तिरंगा लिए यह सभी नोएडा प्राधिकरण मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए अपनी मांगे पूरी करवाने की जिद पर अड़े हैं। हालांकि पुलिस प्रदर्शनकारियों को बसों में भरकर मौके से हटाने में जुटी है।


महिलाओं समेत 200 किसानों को हिरासत में लिया

महाआंदोलन में शामिल होने पहुंचे किसान नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने आज भी महिलाओं और प्रदर्शनकारी किसानों के साथ ज्यादती की। किसानों का कहना है कि करीब 100 प्रदर्शनकारियों को तीन बसों में भरकर पुलिस साथ ले गई है। इसमें भारी संख्या में महिलाएं भी शामिल हैं। पुलिस प्रदर्शन रुकवाने के लिए गैरकानूनी और अमानवीय तरीका अपना रही है। देर शाम तक पता चलेगा कि कितने किसानों को रिहा किया गया। हालांकि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस कुछ नेताओं को हवालात भेजेगी। किसानों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई से उन्हें डराया नहीं जा सकता। 


25 किसान और नेताओं पर कार्रवाई

सुरक्षा-व्यवस्था को देखते हुए भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की गई है। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और हालात को सामान्य बनाने की कोशिश में जुटे हैं। बताते चलें कि आबादी निस्तारण समेत चार महत्वपूर्ण मांगों को लेकर भारतीय किसान परिषद के 81 गांवों के हजारों किसान पिछले 3 दिन से लगातार नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। गुरुवार को आंदोलन में हिस्सा लेने पहुंचे नोएडा कांग्रेस के नेता अनिल यादव समेत 25 किसानों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। जबकि 100 को हिरासत में लिया गया था। उन्हें बाद में पुलिस लाइन से छोड़ दिया गया। 


धारा 144 का पालन करें

इनमें 35 महिलाएं भी शामिल थीं। किसानों का आऱोप है कि बीते मंगलवार को पुलिस ने गांव-गांव जाकर लोगों से प्रदर्शन में शामिल नहीं होने का दबाव बनाया था। इसके अलावा 200 से ज्यादा किसानों और नेताओं के घरों पर नोटिस चस्पा किया गया था। नोएडा के एडीसीपी कानून-व्यवस्था कुमार ने कहा था कि जनपद में धारा 144 लागू है। इसका पालन करना सभी नागरिकों के लिए कानूनन अनिवार्य है। साथ ही कोरोना वायरस की गाइडलाइंस का भी पालन कराया जाएगा। इसके लिए जो जरूरी होगा, वह सारे कदम उठाए जाएंगे।


महाआंदोलन अनिश्चितकाल तक चलेगा

भारतीय किसान परिषद के नेताओं का कहना है कि जब तक प्राधिकरण आबादी निस्तारण और नाम दर्ज करने से जुड़ी चार महत्वपूर्ण मांगे स्वीकार नहीं कर लेगा, उनका महाआंदोलन अनिश्चितकाल तक चलता रहेगा। रोजाना हजारों की संख्या में किसान सपरिवार प्राधिकरण कार्यालय के सामने प्रदर्शन करने आएंगे। बड़ी बात यह है कि धीरे-धीरे इस आंदोलन को राजनीतिक दलों का सहयोग मिलने लगा है। एक दिन पहले ही कांग्रेस के नेता अनिल यादव आंदोलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। 


अनिल यादव समेत 60 जेल भेजे गए

हालांकि पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। अब तक उन्हें रिहा नहीं किया गया है। आज सुबह उनकी पत्नी और यूपी कांग्रेस की सोशल मीडिया उपाध्यक्ष पंखुड़ी पाठक ने बताया, अनिल यादव समेत नोएडा के 60 किसान अभी भी जेल में हैं। बचपन से सुनते आए थे कि भारत में अपने अधिकार की लड़ाई लोकतांत्रिक तरीक़े से लड़ने का अधिकार हर भारतीय को है। लेकिन योगी-मोदी सरकार ने साबित कर दिया है कि इनका मक़सद लोकतंत्र का अंत करना है।



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किसानों ने किया शिवनाडर यूनिवर्सिटी गेट पर हंगामा, पुलिस बल तैनात

ग्रेटर नोएडा : ग्रेटर नोएडा की शिवनाडर यूनिवर्सिटी के बाहर प्रभावित किसानों को बढ़ा हुआ मुआवजा देने, गांव के विकास कराने, रोजगार देने समेत मांगों को लेकर चिटहेरा गांव के किसानों ने गेट पर प्रदर्शन किया। किसानों ने जमकर हंगामा किया। इस बीच यूपीएसआईडीसी, शिवनाडर के अधिकारियों के साथ उपजिलाधिकारी की मध्यस्था में किसानों की वार्ता विफल रही।


जय जवान जय किसान मोर्चा के संयोजक सुनील फौजी और किसान संघर्ष समिति के प्रवक्ता मनवीर भाटी के नेतृत्व में चिटहेरा गांव के किसान नारेबाजी करते हुए शुक्रवार को शिवनाडर यूनिवर्सिटी के गेट पर पहुंचे। नारेबाजी करते हुए गेट पर ही धरने पर बैठ गए।


किसानों के प्रदर्शन की सूचना मिलने पर उपजिलाधिकारी आलोक कुमार गुप्ता पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए। यूपीएसआईडीसी और शिवनाडर यूनिवर्सिटी के अधिकारियों के साथ किसानों की एक घंटे तक वार्ता चली। वार्ता के दौरान एक सप्ताह में मांगों को पूरा कराने का आश्वासन दिया गया। लेकिन किसान नहीं माने।


किसानों का कहना है कि इन मांगों को लेकर पहले भी कई बार आश्वासन मिलते रहे हैं। किसान लंबे समय से बढ़ा हुआ मुआवजा देने, किसान परिवार के युवा सदस्यों को नौकरी देने, गांव का विकास कराने की मांग करते रहे हैं, लेकिन उनकी मांगों को पूरा नहीं किया गया है। किसान यूनिवर्सिटी गेट पर धरने पर जमे हुए हैं। किसानों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों को पूरा नहीं किया जाएगा आंदोलन जारी रहेगा। 




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किसान संगठनों के 25 सितंबर को ‘भारत बंद’ का वाम दलों ने किया समर्थन

नई दिल्ली : केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से किए गए, 25 सितंबर को ‘‘भारत बंद’’ के आह्वान का वामपंथी दलों ने समर्थन करने की घोषणा की है।


मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), फॉरवर्ड ब्लॉक और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) की ओर से बृहस्पतिवार को जारी एक संयुक्त बयान में लोगों से भारत बंद का समर्थन करने की अपील की गई है।


बयान में रेखांकित किया गया है कि तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी देने की मांग को लेकर किसानों का संघर्ष 10 माह से जारी है।


वामपंथी दलों ने कहा, ‘‘नरेंद्र मोदी सरकार अड़ी हुई है और वार्ता के जरिए किसानों से संवाद करने से मना कर रही है। वामपंथी दल सरकार के इस रुख की निंदा करते हैं और तीनों कृषि कानूनों को तत्काल वापस लेने और एमएसपी के लिए कानूनी गारंटी की मांग करते हैं। साथ ही राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन को समाप्त किया जाए और श्रम संहिताओं को खत्म किया जाए।’’


बयान में कहा गया है, ‘‘वामपंथी दल अपनी सभी इकाइयों से भारत बंद की सफलता के लिए सक्रियता से काम करने का आह्वान करते हैं। वामपंथी दल लोगों से भी भारत बंद का समर्थन करने की अपील करते हैं।’’




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नोएडा में किसानों का धरना, 100 से अधिक गिरफ्तार

नोएडा : विभिन्न मांगों को लेकर 81 गांवों के किसान आज भी नोएडा प्राधिकरण पर धरना देने पहुंचे, और वहां पहले से ही तैनात पुलिस बल ने किसानों को हरौला गांव के पास घेर लिया तथा करीब सवा सौ किसानों एवं किसान नेताओं को गिरफ्तार कर उन्हें पुलिस लाइन भेजा गया है। किसानों की आबादी निस्तारण, मुआवजा तथा 10 प्रतिशत के हिसाब से भूखंड आवंटन समेत विभिन्न मांगों को लेकर नोएडा प्राधिकरण पर धरना देने पहुंचे किसान नेता सुखबीर पहलवान समेत 33 लोगों को पुलिस ने बुधवार को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। अपर पुलिस उपायुक्त (जोन प्रथम) रणविजय सिंह ने बताया कि जनपद में कोविड-19 के चलते धारा 144 लगी है। उन्होंने बताया कि भारतीय किसान परिषद के बैनर तले बृहस्पतिवार को भी सवा सौ किसान तथा कांग्रेस नेता अनिल यादव नोएडा प्राधिकरण पर धरना देने के लिए आए। पुलिस ने उन्हें समझाने- बुझाने का प्रयास किया, लेकिन वे नहीं माने। उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस नेता अनिल यादव ने कहा कि वह किसान हैं, तथा उनकी लड़ाई पुलिस से नहीं बल्कि नोएडा प्राधिकरण से है।





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नक्सल क्षेत्र में भेजे जाएं किसानों से बदसलूकी करने वाले IAS अधिकारी : राकेश टिकैत

नई दिल्ली : रविवार को नूंह की नई अनाज मंडी में हुई संयुक्त किसान मोर्चा की महापंचायत में पांच सितंबर को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में होने वाली पंचायत में ज्यादा से ज्यादा किसानों को जुटने का आह्वान किया गया। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने कहा कि मुजफ्फरनगर में होने वाली पंचायत में मिशन यूपी का एलान होगा। 

राकेश टिकैत ने मांग की कि वायरल वीडियो में करनाल में किसानों से सख्ती से पेश आने को कहने वाले आइएएस अधिकारी को बर्खास्त किया जाए या निलंबित कर पांच साल के लिए जम्मू-कश्मीर या नक्सलवाद क्षेत्र में भेज देना चाहिए। राकेश टिकैत ने कहा प्रधानमंत्री ने 2022 में किसानों की आमदनी दोगुनी होने का वादा किया था तो किसान आगामी 1 जनवरी 2022 को अपनी फसल सरकार को दोगुने दामों में बेचेंगे। जय किसान आंदोलन के संस्थापक योगेंद्र यादव ने कहा कि सरकार जब तक नए तीन कृषि कानूनों को वापस नहीं ले लेगी तब तक हमारा आंदोलन जारी रहेगा। इस मौके पर आजाद खान ने महापंचायत की अध्यक्षता की।

इस बीच हरियायाणा के करनाल में शनिवार को किसानों और पुलिस के बीच हुई झड़प पर हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री जयप्रकाश दलाल ने दुख जताया है। रविवार को गुरुग्राम के नेहरू स्टेडियम में आयोजित खेलो हरियाणा के समापन समारोह के दौरान बातचीत में कहा कि किसानों पर लाठी चार्ज किया जाना गलत है। वहीं, उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस पर हमला भी गलत है। किसी भी तरह का टकराव नहीं होना चाहिए। शांति से बातचीत होने से ही हल निकलेगा। मंत्री ने कहा कि जिनकी गलती है, उन पर कार्रवाई की जाएगी। प्रदेश मुख्यमंत्री ने लाठी चार्ज के मुद्दे पर स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस या किसानों में जिन जिन लोगों की गलती मिलेगी उन पर कार्रवाई की जाएगी।


 



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कृषि कानून भाजपा के अरबपति मित्रों के फायदे के लिए हैं : प्रियंका

नई दिल्ली : कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाद्रा ने शनिवार को आरोप लगाया कि तीनों ‘‘काले कृषि कानून भाजपा के अरबपति मित्रों के फायदे’’ के लिए लाए गए हैं।


उन्होंने हिमाचल प्रदेश में अडानी समूह द्वारा सेब के दाम घटाने से किसानों को परेशानी होने के दावे वाली एक खबर का हवाला देते हुए ट्वीट किया, ‘‘किसान काले कृषि कानूनों का विरोध क्यों कर रहे हैं? क्योंकि अगर किसानों की मेहनत से उगाई गई फसल के दाम व अन्य चीजें तय करने का अधिकार भाजपा के अरबपति मित्रों को दे दिया गया तो यही हाल होगा।’’


कांग्रेस महासचिव ने आरोप लगाया, ‘‘काले कृषि कानून भाजपा के अरबपति मित्रों के फायदे के लिए हैं।’’ प्रियंका ने एक अन्य ट्वीट में उत्तर प्रदेश में अपराध की घटनाओं को लेकर राज्य की भाजपा सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, ‘‘मुख्यमंत्री जी, आपके होर्डिंग्स, विज्ञापनों में तो सब "ठीक ठाक" बताया जाता है। लेकिन, आपके राज में अपराधियों को इतनी शक्ति क्यों मिली हुई है? क्यों महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं?’’




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संयुक्त किसान मोर्चा ने 25 सितंबर को ‘भारत बंद’ का आह्वान किया

नई दिल्ली : केंद्र के तीन नये कृषि कानूनों के खिलाफ जारी प्रदर्शनों की अगुवाई कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने 25 सितंबर को ‘भारत बंद’ का आह्वान किये जाने की शुक्रवार को घोषणा की। एसकेएम ने कहा कि इस कदम का उद्देश्य पिछले साल नवंबर से शुरू हुए किसान आंदोलन को और अधिक मजबूती और विस्तार देना है।


दिल्ली के सिंघू बॉर्डर पर संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए एसकेएम के आशीष मित्तल ने कहा, “हम 25 सितंबर को ‘भारत बंद’ का आह्वान कर रहे हैं।’’ उन्होंने कहा, “यह पिछले साल इसी तारीख को आयोजित इसी तरह के ‘बंद’ के बाद हो रहा है और हम उम्मीद कर रहे हैं कि यह पिछले साल के बंद की तुलना में ज्यादा सफल रहेगा, जो कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के बीच हुआ था।”


शुक्रवार को संपन्न हुए किसानों के अखिल भारतीय सम्मेलन के समन्वयक ने कहा कि दो दिवसीय कार्यक्रम सफल रहा और 22 राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसमें न सिर्फ कृषि संघों के बल्कि महिलाओं, मजदूरों, आदिवासियों के साथ-साथ युवाओं और विद्यार्थियों के कल्याण के लिए काम करने वाले संगठनों के सदस्य भी शामिल हुए।


सम्मेलन के दौरान, पिछले नौ महीनों से चल रहे किसानों के संघर्ष पर चर्चा और विचार-विमर्श हुआ, और कृषि कानूनों के खिलाफ उनके आंदोलन को अखिल भारतीय आंदोलन बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया। मित्तल ने कहा, “सम्मेलन के दौरान, इस बात पर चर्चा की गई कि सरकार कैसे कॉरपोरेट समर्थक है और किसान समुदाय पर हमला कर रही है।”


तीन विवादास्पद कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के विरोध प्रदर्शन को बृहस्पतिवार को नौ महीने पूरे हो गए। सरकार के साथ 10 दौर से अधिक की बातचीत भी दोनों पक्षों के बीच गतिरोध को तोड़ने में विफल रही है। सरकार इन कानूनों को प्रमुख कृषि सुधारों के रूप में पेश कर रही है।




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गन्ने के एफआरपी में वृद्धि पेट्रोल, डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के मुकाबले अपर्याप्त : टिकैत

नई दिल्ली : भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत ने मिलों द्वारा गन्ना किसानों को दिए जाने वाले न्यूनतम मूल्य में वृद्धि को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के मद्देनजर ''अपर्याप्त'' बताया। मिलों को, गन्ना किसानों को प्रति क्विंटल पांच रुपये अधिक देना होगा।केंद्र सरकार ने बुधवार को 2021-22 के नये विपणन सत्र के लिए गन्ने का उचित और लाभकारी (एफआरपी) मूल्य पांच रुपये बढ़ाकर 290 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। हालांकि, इसके साथ ही सरकार ने चीनी के बिक्री मूल्य में तत्काल बढ़ोतरी से इनकार किया है। मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (सीसीईए) की बुधवार को हुई बैठक में 2021-22 के विपणन वर्ष (अक्टूबर-सितंबर) के लिए गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य बढ़ाने का फैसला किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे किसानों के हित में लिया गया ''महत्वपूर्ण'' फैसला बताया और कहा कि इससे चीनी मिल से जुड़े श्रमिकों को भी लाभ होगा।बुधवार की शाम को यहां पत्रकारों से बातचीत में टिकैत ने कहा, ''गन्ने के एफआरपी में यह वृद्धि किसानों को स्वीकार्य नहीं है क्योंकि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि के मुकाबले यह अपर्याप्त है।''उन्होंने मांग की कि गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य पेट्रोल, डीजल और उन अन्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के अनुरूप होना चाहिए जो किसान फसल उगाने में इस्तेमाल करते हैं।खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि केंद्र के फैसले से पांच करोड़ गन्ना किसान और उन पर निर्भर लोगों को फायदा होगा। साथ ही चीनी मिलों और संबंधित गतिविधियों में शामिल करीब पांच लाख कामगारों को भी लाभ होगा।








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किसानों के प्रदर्शन स्थल पर फोगिंग कराई

नई दिल्ली :  पूर्वी निगम के नेता विपक्ष मनोज कुमार त्यागी ने भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष राकेश टिकैत से मुलाकात की और उनका दुख साझा किया। इस अवसर पर नेता विपक्ष ने कहा किसानों का सुध लेने वाला कोई नहीं है जो किसान धरती से अन्न उगाकर लोगों का पेट भरता है उन किसानों का दुख दर्द सुनने वाला कोई नहीं है। नेता विपक्ष ने कहा की अभी बरसात का मौसम होने की वजह से किसानों के प्रदर्शन स्थल अर्थात गाजीपुर बॉर्डर पर मच्छर का प्रकोप भी बहुत ज्यादा हो गया है। इसे लेकर नेता विपक्ष ने अपने देख-रेख ने प्रदर्शन स्थल पर फागिंग करवाई ताकि प्रदर्शनकारी किसानों को जलजनित बीमारी से बचाया जा सके। इस अवसर पर विनोद नगर की पार्षद गीता रावत, त्रिलोकपुरी के पार्षद विजय कुमार एवं कल्याण पुरी के पार्षद धीरेंद्र कुमार भी मौजूद थे।








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ओवैसी मुस्लिम समाज को डराने का काम कर रहे हैं: आशु मलिक

उत्तर प्रदेश नोएडा: जानेआलम (जानू चौधरी): समाजवादी लोग बापू महात्मा गाँधी के बताए गए मार्ग पर चलने और मानने वाले लोग हैं। हमने ओवैसी द्वारा संसद में की गई तकरीरों को सुना और समझा है ओवैसी साहब बापू से नही बल्कि नाथूराम गोडसे से बहुत प्यार करते है, क्योंकि जो व्यक्ति बापू के बताए गए अहिंसा के रास्ते पर नही चल सकता वो बापू का नही, गोडसे को ही मानने वाला हो सकता है।

ओवैसी जनता के बीच अपने जहरीले भाषणों से यहाँ उत्तर प्रदेश की जनता के दिलों में नफरत भरने भाईचारा ख़त्म करने आए है, और मैं यह मानता हूँ जो व्यक्ति हिन्दू मुस्लिम के दिल में नफ़रत भरने व एक दूसरे का दुश्मन बनाने का काम करे वह गोडसे का ही समर्थक हो सकता है, बापू के बताए गए रास्ते पर चलने वाला कभी नही हो सकता। लेकिन अब यहाँ की जनता अच्छे से समझती है कि एक दूसरे से लड़कर किसी का भला नही होने वाला, देश नफरत से नही प्यार से चलता है।
 
 

नेताजी को धरती पुत्र की उपाधि देने वाले यही किसान हैंइसलिए पार्टी हमेशा किसानों से साथ खड़ी है
आज देश की जनता को नफरत की नही बल्कि रोजगार की जरुरत है समाजवादी पार्टी के लोग हर जरूरतमंद का दर्द अच्छे से समझते है ,इस लिए समाजवादी पार्टी की सरकार में हुए काम और जनता को सरकारी लाभ मिलना ही समाजवादी पार्टी की सरकार की उपलब्धि रही है इसीलिए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से प्रदेश का युवा, बुजुर्ग, किसान बड़ी तादाद  में जुड़ा हुआ है, किसान आंदोलन का समर्थन समाजवादी पार्टी ने चुपके से नही, बल्कि खुलकर किया है और माननीय मुलायम सिंह यादव जी को धरती पुत्र की उपाधि इन्ही किसानों ने दी थी इसलिए समाजवादी पार्टी किसानों के साथ कभी गलत नही होने देगी।  


कांग्रेस ने देश के मुसलमानों को हमेशा अँधेरे में रखा, कांग्रेस का सपना हम दो हमारे दो” को बीजेपी ने पूरा किया
कांग्रेस ने देश के मुसलमानों को हमेशा अँधेरे में रखा है, जैसे कांग्रेस सरकार ने न्यायधीश राजेंद्र सच्चर की देखरेख में एक समिति का गठन किया था किसने अपनी रिपोर्ट में बताया कि मुसलमानों की आर्थिक स्तिथि दलितों से भी बत्तर है। हम समझ रहे थे शायद इस रिपोर्ट के बाद कांग्रेस मुसलमानों और दलितों के हालात सुधारने के लिए कोई कदम उठाएगी लेकिन ऐसा नही हुआ, और मुसलमानों को उनकी बदहाली को याद दिलाकर सभी राजनितिक दल लाभ उठाने लगे।



लेकिन मेरा मानना यह है कि देश में मुसलमानों के साथ साथ दलितों की भी आर्थिक स्थिति ठीक क्यों नही होनी चाहिए। कांग्रेस बीजेपी और ओवैसी मिलकर ही मुसलमानों को बाटने की राजनीति करते है, हमें याद है कांग्रेस का वह कार्यकाल जिसमें ,हम दो हमारे दो, का नारा, और आज उत्तर प्रदेश की बीजेपी ने उस नारे को कानून बनाकर पूरा कर दिया है।

   
स्वर्गीय कांशीराम द्वारा की गई टिप्णी मुसलमान कभी नही भूल सकता

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम द्वारा बाबरी मस्जिद पर विवादित टिप्णी को मुसलमान कभी नही भूल सकता, जिन्होंने बाबरी मस्जिद की जगह शौचालय बनाने का प्रस्ताव दिया था। बहन कुमारी मायावती ने मुस्लिम नेताओं के जरिए मुसलमानों का हमेशा वोटबैंक के तोर पर स्तेमाल किया है जिसमें नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे बड़े कद वाले नेता भी शामिल हैं। मुझे नही लगता अब मुसलमान किसी के बहकावे में आकर चुनाव में बटने का काम नही करेगा, बल्कि एकजुट होकर समाजवादी पार्टी साथ खड़ा होगा।
 
 
पांच सौ गरीब लड़कियों की शादी कराने के बाद मसीहा बनकर उभरे आशु मलिक
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आजकल के युवा जो भविष्य में राजनेता बनना चाहते है वह आशु मालिक की कामयाबी व शोहरत का हवाला देते है कि पॉलिटिक्स हो तो आशु मलिक  जैसी हो जिसमे दुआ,ताक़त शोहरत मिलती है। जैसे हाशिमपुरा के दंगा पीड़ितों की समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मदद करवाई, और दादरी बीफ कांड में अखलाक  के परिवार की मदद के लिए भी कमान आशु मलिक  ने ही संभाली थी। और तकरीबन  पांच सौ लड़कियों की शादी करवाकर सबका दिल जीत लिया है।  
  
आपको बता दें आशु मलिक  का राजनितिक सफ़र ज्यादा लम्बा नही रहा मात्र चार या पांचवर्षों  में उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा  प्राप्त कर लिया था, और फिर समाजवादी पार्टी की सरकार का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पार्टी आलाकमान की नजदीकियों के चलते विधान परिषद सदस्य के तौर पर आशु मलिक  के राजनीतिक सफ़र को छ वर्षों के लिए सेफ  कर दिया गया था, हालांकि  एमएलसी कार्यकाल पूरा होने के बाद मालिक की जगह वरिष्ठ नेता अहमद  हसन साहब को एमएलसी बना दिया गया जिसमें बताया जाता है आशुमलिक  की सहमती भी शामिल थी।
2010 में जब अखिलेश यादव की चुनावी परीक्षा चल रही थी तब आशु मलिक अखिलेश यादव के साथ कदम से कदम मिलाकर  रात दिन समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने का प्लान कर रहे थे। रानीतिक सफ़र के यह दो साल आशु मलिक के लिए बहुत अहम माने जाते है ,2012 में फुल बहुमत की समाजवादी पार्टी की सरकार बनी और मलिक  का राजयोग शुरू हो गया था लेकिन मलिक के बढ़ते कद को देखकर कुछ पुराने दिग्गज नेता पार्टी में विरोध जताने लगे जिसके कारण मलिक  को सरकार की शरुआत में पद तो नही मिला, लेकिन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से नजदीकियाँ ही आशु मालिक की पॉवर थी जिससे जनता के काम करवाने और अधिकारीयों से तालमेल का दौर जारी रहा, तक़रीबन दो वर्ष बाद मलिक को राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त हुआ था।

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स्वतंत्रता दिवस को ‘किसान मजदूर आजादी संग्राम दिवस’ के तौर पर मनाएंगे किसान


नई दिल्ली : केंद्र के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने देश के 75वें स्वतंत्रता दिवस को ‘किसान मजदूर आजादी संग्राम दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया है।


संयुक्त किसान मोर्चा के राष्ट्रीय आह्वान के बाद देश भर के किसान प्रखंड और तहसील स्तर पर इस दिन ‘तिरंगा रैलियां’ निकालेंगे। हालांकि किसानों ने जोर देते हुए कहा कि वे दिल्ली में नहीं घुसेंगे।


ऑल इंडिया किसान संघर्ष कॉर्डिनेशन कमेटी (एआईकेएससीसी) की कविता कुरुगंती ने कहा, ‘‘संयुक्त किसान मोर्चा ने 15 अगस्त को सभी घटक संगठनों का आह्वान किया है कि इस दिन को किसान मजदूर आजादी संग्राम दिवस के रूप में मनाया जाए और इस दिन तिरंगा मार्च आयोजित किये जाएंगे।’’


उन्होंने कहा, ‘‘इस दिन किसान और मजदूर तिरंगा मार्च में ट्रैक्टर, मोटर साइकिल, साइकिल और बैलगाड़ी आदि लेकर निकलेंगे और ब्लॉक, तहसील, जिला मुख्यालयों की ओर कूच करेंगे। वे पास के धरना स्थलों पर भी जा सकते हैं। इस दौरान वाहनों पर तिरंगे लगे होंगे।’’


किसान नेता अभिमन्यु कोहर ने कहा कि देशभर में पूर्वाह्न 11 बजे से दोपहर एक बजे तक रैलियां निकाली जाएंगी।


दिल्ली में भी सिंघू, टिकरी और गाजीपुर सीमाओं पर तिरंगा मार्च निकाले जाएंगे और पूरे दिन कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।


किसान नेता जगमोहन सिंह ने कहा, ‘‘सिंघू पर किसान प्रदर्शन स्थल स्थित मुख्य मंच से लेकर करीब आठ किलोमीटर दूर केएमपी एक्सप्रेस तक मार्च निकालेंगे।’’


किसानों ने जोर देते हुए कहा कि 15 अगस्त को निकलने वाली तिरंगा रैली शांतिपूर्ण होंगी और दिल्ली से दूरी रखी जाएगी।


सिंह ने कहा, ‘‘26 जनवरी के घटनाक्रम ने हमारे आंदोलन को बदनाम किया था, इसलिए 15 अगस्त को तिरंगा मार्च शहर में नहीं आएंगे, लेकिन हमारा आंदोलन तब तक खत्म नहीं होगा जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं होती।’’




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किसान आंदोलन में फैले व्याभिचार का सच

राजधानी में किसानों का अपनी मांगों को मनवाने को लेकर चल रहा आंदोलन अब सांकेतिक भर रह गया है। उसमें जमीनी किसानों की भागीदारी लगातार घटती जा रही है। लेकिन, यहां किसानों की संख्या को बेहतर बनाए रखने के लिए जो कुछ भी हो रहा है, वह चौंकाने वाला और स्तब्धकारी है। राजधानी के टिकरी क्षेत्र में किसानों के धरने में किसानों के लिए शराब आचमन की पर्याप्त व्यवस्था हो रही है। देह व्यापार से जुड़ी महिलाएं भी किसानों के पास पहुंचाई जा रही हैं। ये सारे आरोप एक राष्ट्रीय स्तर के खबरिया चैनल ने अपने खुफिया कैमरे से दर्ज रिपोर्ट के बाद प्रस्तुत एक कार्यक्रम में लगाये हैं। ये वास्तव में सनसनीखेज आरोप हैं। अगर ये आरोप रत्तीभर भी सच हैं तो किसान आंदोलन के नेताओं को तत्काल देश से माफी मांगनी चाहिए।


अब देश को यह जानने का अधिकार तो है ही कि किसान आंदोलन के नाम व्याभिचार कौन करवा रहा है? इसके लिए धन की व्यवस्था करने वाले कौन हैं? किसान आंदोलन के नेता राकेश टिकैत से लेकर किसानों के हक में बोलने वाले जरा यह बताएं कि टिकरी में क्या-क्या गुल खिलाए जा रहे हैं। अगर वे इन सब आरोपों पर भी चुप रहे तो बात गंभीर मोड़ ले लेगी। तब यही माना जाएगा न कि किसान आंदोलन की आड़ में एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत धरना स्थलों पर तबीयत से नंगा नाच करवाया जा रहा है।


हालांकि सरकार देश की खेती और किसानों के लिए एक से बढ़कर एक योजनाएं ला रही है, पर ये न जाने क्यों स्थायी रूप से असंतुष्ट हैं। आखिर ये चाहते क्या हैं? देश इनके हिसाब से और इनकी मर्जी से तो नहीं चलेगा। यह देश तो अब अराजकता भी नहीं बर्दाश्त करेगा।


दरअसल टीकरी से पहले भी गंभीर किस्म के समाचार आते ही रहे हैं। वहां पर विगत मई के महीने में पश्चिम बंगाल की एक युवती से हुए गैंगरेप का मामला भी सामने आया था। पहले बलात्कारियों ने उस अभागी स्त्री का अश्लील वीडियो बना लिया था, जिसके आधार पर वे उसे लगातार ब्लैकमेल कर रहे थे। हालांकि किसान नेताओं ने इतने गंभीर मामले को दबा कर ही रखा था कि कहीं इस मामले से किसान आंदोलन बदनाम न हो जाए।


तो देश अब यह जान ले कि किसान आंदोलन में क्या-क्या गुल खिलाए जा रहे हैं। इसीलिए सच्चे और ईमानदार किसान इस आंदोलन से दूर हो रहे हैं। वे यह भी देख रहे हैं कि सरकार अपनी हैसियत के मुताबिक किसानों के हित में भरसक कदम उठा ही रही है। उदाहरण के रूप में हाल ही में देश के 9.75 करोड़ किसानों के खातों में 19,500 करोड़ रुपये की राशि भेजी गई। इस योजना के जरिए अबतक 1.38 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि किसान परिवारों को सीधे भेजी जा चुकी है। खरीफ हो या रबी का सीजन, किसानों से एमएसपी पर अब तक की सबसे बड़ी खरीद की है। इससे धान किसानों के खाते में लगभग 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपये और गेहूं किसानों के खाते में लगभग 85 हजार करोड़ रुपये डायरेक्ट पहुंचे हैं।


आप नोटिस करेंगे कि एक बड़े षडयंत्र के तहत टोक्यो ओलंपिक खेलों में पदक जीतने वाले नीरज चोपड़ा, रवि दहिया और बजरंग पूनिया से आह्वान करने वाले दुष्ट खुराफाती भी पैदा हो गए हैं। ये चाहते हैं कि ये सभी खिलाड़ी राजधानी में चल रहे किसानों के धरनास्थल पर भी जाएं। वहां जाकर वे किसानों के हक में कोई बयान दे दें। मतलब यह कि बहुत गंभीर साजिश की जा रही है देश में किसानों की आड़ में देशभर में अस्थिरता फैलाने की।


देखिए किसानों के धरने टिकरी, सिंघू बार्डर और गाजीपुर बार्डर पर चल रहे हैं। दूसरी तरफ इनसे राजधानी का किसान या इन बार्डरों के आसपास का किसान नदारद है। वह इस आंदोलन का हिस्सा नहीं है। वह अपने खेतों में पूरी मेहनत लगाकर काम कर रहा है। किसान नेता आखिर क्यों नहीं बताते इसकी वजह ? क्या उन्हें पता है कि दिल्ली मेट्रो के मुंडका स्टेशन से करीब 7-8 किलोमीटर दूर है जोंती गांव। ये हरित क्रांति का गांव है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, पूसा में गेहूं की फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए गेहूं के उन्नतशील बीज विकसित किए थे नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर नारमन बोरलॉग और कृषि वैज्ञानिक डॉ.एम.एस.स्वामीनाथन की टीम ने।


ये बातें हैं पिछली सदी के छठे दशक की। उसके बाद इन्हीं बीजों को जोंती गांव में लगाने का फैसला हुआ। पूसा के एक कृषि वैज्ञानिक अमीर सिंह की खोजबीन के बाद जोंती का चयन हुआ था। जोंती को इसलिए चुना गया था क्योंकि यहां पर नहर का पानी आता था। डॉ. स्वामीनाथन और डॉ. बोरलॉग ने जोंती के किसानों को उन्नतशील बीजों के संबंध में विस्तार से बताया। उन्हें बीज दिए। और फिर कृषि वैज्ञानिकों और किसानों की मेहनत रंग लाने लगी। एक हेक्टेयर में 40 क्विंटल गेहूं की फसल का उत्पादन हुआ जोंती में। पहले होता था 20-25 क्विंटल। यानी गेहूं की पैदावार दो गुना बढ़ गई। ये एक तरह से हरित क्रांति का श्रीगणेश था। हरित क्रान्ति से देश में कृषि उत्पादन में गुणात्मक सुधार हुआ। इस तरह जोंती गांव बन गया हरित क्रांति का गांव। इससे सटे हैं लाडपुर, कंझालवा और घेवरा, जहां मनोज कुमार की फिल्म "मेरा गांव, मेरा देश" की शूटिंग हुई थी। इधर के गांव और किसान भी अपनी मेहनत के लिए मशहूर हैं। इन गांवों में अब भी गेहूं के अलावा हर तरह की सब्जियां उगाई जाती हैं।


निश्चित रूप से दिल्ली के गांवों में घूमना अपने आप में एक बेहतरीन अनुभव होता है। इधर घूमते हुए आप उस दौर में चले जाते हैं, जब देश हरित क्रांति की तैयारी में जुटा था। जोंती ने देश को एक प्रकार से भरोसा दिलाया था कि अब हमें खाद्यान्न की कमी से दो-चार नहीं होना पड़ेगा। सारी दिल्ली के किसान बहुत प्रोगेसिव रहे हैं। माना जाता है कि वे नई तकनीक को अपनाने में पंजाब और हरियाणा से कहीं आगे रहे हैं। जोंती मुख्य रूप से जाटों का गांव है। पर इधर वाल्मिकी, ब्राह्मण, सैनी और दूसरी जातियों के परिवार भी रहते हैं। जोंती में आपको पंच-पंचायत, हुक्का, सिर ढंकी महिलाएं सबकुछ दिखती हैं। और दिल्ली के किसानों से कितनी दूर बस्ती कथित आंदोलनकारी किसानों की दुनिया। वे किसानों के लिए लड़ाई लड़ने के नाम पर देश विरोधी ताकतों का मोहरा बन चुके हैं। वे सच को देखना ही नहीं चाहते और अब तो बेहद शर्मनाक हरकतों में भी लिप्त हो गए हैं।


अब बात कर लें स्टिंग आपरेशन की। राष्ट्रीय चैनल ने अपने स्टिंग आपरेशन में स्पष्ट दिखाया है कि कोई भी बेरोजगार या आवारा किस्म के लोगों को जुटाकर मुफ्त भोजन आवास के अतिरिक्त प्रतिदिन डेढ़ सौ रुपये तक की शराब और डेढ़ सौ में प्रतिदिन सेक्स की व्यवस्था करवाई जा रही है। तो यह है धरने पर बैठे लोगों का आकर्षण। अब तो जाँच में ही पता चलेगा कि इस आन्दोलन को चलाने के लिये धनवर्षा कहाँ से हो रही है।



-आर.के. सिन्हा-

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)





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राकेश टिकैत ने कारपोरेट घरानों को फिर लिया आड़े हाथ, बोले रोटी को कारपोरेट घरानों की तिजोरी में कैद नहीं होने देंगे

नई दिल्ली :  भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने एक बार फिर देश के कारपोरेट घरानों को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने कहा कि वो रोटी को कारपोरेट घरानों की तिजोरी में कैद नहीं होने देंगे। कारपोरेट घराने इस तरह की व्यवस्था कर रहे हैं कि किसान अनाज पैदा करने के बाद भी उनके ऊपर पूरी तरह से निर्भर हो जाए। खेती करने वाला किसान रोटी पैदा करता है मगर उसको उसका मूल्य नहीं मिल पाता है, उसके साथ न्याय नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि किसान गांव की मिट्टी से हमेशा ही जुड़ा रहता है मगर युवाओं और नारी शक्ति को इससे कम ही नाता रहता है मगर अब एक अभियान चलाकर देशभर में किसानों, युवाओं और नारी शक्ति को गांव की मिट्टी से जोड़ने का काम किया जाएगा। अपने इंटरनेट मीडिया एकाउंट ट्विटर पर उन्होंने ये बातें लिखी।

इसी के साथ उन्होंने हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में लैंडस्लाइड होने के कारण घटना में अपनी जान गंवाने वाले लोगों के प्रति शोक भी व्यक्त किया। ट्वीट करते हुए उन्होंने लिखा कि अनेकों लोगों की मृत्यु हो जाने की दुःखद समाचार प्राप्त हुए! ईश्वर मृतकों को अपने चरणों में स्थान प्रदान करें! मेरी व भाकियू परिवार की संवेदनाएं शोकाकुल परिजनों के साथ है!

इससे पहले वो देहरादून में किसानों से मीटिंग करने के लिए पहुंचे थे। किसानों से मीटिंग करने के बाद उन्होंने कहा कि यहां पहाड़ के किसानों के अलग मुद्दे हैं। मैदानी भाग के अलग मुद्दे हैं। पहाड़ के किसानों के लिए सरकार को नीति बनानी चाहिए। सरकार यहां सड़कें बनाए और पर्यटन पर काम करे। सभी इस आंदोलन से जुड़े हैं। इसी के साथ उन्होंने ये भी दोहराया कि हम वापस नहीं जाएंगे जब तक हमारी मांगे नहीं मान ली जाती है।




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