आंदोलन के दौरान किसानों की मौत संख्या के सवाल पर कृषि मंत्री ने कहा: सरकार के पास कोई रिकॉर्ड नहीं

नई दिल्ली : केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने मंगलवार को लोकसभा को बताया कि सरकार के इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है कि केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन के दौरान कितने किसानों की मौत हुई।


उन्होंने जनता दल (यू) के राजीव रंजन सिंह, कांग्रेस के अब्दुल खालिक, गौरव गोगोई और अदूर प्रकाश, बसपा कुंवर दानिश अली तथा कुछ अन्य सदस्यों के प्रश्न के लिखित उत्तर में यह भी कहा कि आंदोलन के दौरान जान गंवाने किसानों के परिवारों को मुआवजा देने से जुड़ा कोई प्रस्ताव नहीं है।


इन सदस्यों ने सवाल किया था कि क्या सरकार इस बात से अवगत है कि आंदोलन के दौरान कितने किसानों की मौत हुई और कितने किसान बीमार पड़े? क्या सरकार के पास कोई प्रस्ताव है कि जिन किसानों की मौत हुई है उनके परिवारों को मुआवजा दिया जाए?


तोमर ने अपने उत्तर में कहा, ‘‘भारत सरकार के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है। बहरहाल, सरकार ने किसान संगठनों के साथ बातचीत के दौरान उनसे यह अपील की कि सर्दी और कोविड के हालात को देखते हुए बच्चों तथा बुजुर्गों खासकर महिलाओं को घर जाने दिया जाए।’’


उन्होंने मुआवजे से जुड़े सवाल पर कहा, ‘‘उपरोक्त को ध्यान में रखते हुए, जी नहीं।’’


कृषि मंत्री ने हैदराबाद से लोकसभा सदस्य असदुद्दीन ओवैसी के एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि किसान संगठनों के साथ उनके मुद्दों को लेकर 11 दौर की बातचीत की गई और सरकार आगे भी उनसे बातचीत करने के लिए तैयार है।







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किसानों के आने की सूचना पर जीडीए गेट पर पुलिस बल तैनात हुआ

गाजियाबाद : किसानों की मंगलवार को जीडीए कार्यालय को घेरकर प्रदर्शन करने की सूचना फैलते ही अधिकारी हरकत में आ गए। तुरंत सिहानी थाने को फोन कर पुलिसबल बुला लिया। फिर जीडीए के मुख्य गेट के बाहर अस्थाई बैरियर लगाकर पुलिस बल तैनात हो गया। लेकिन पूरा दिन बितने के बाद भी जब किसान कार्यालय नहीं पहुंचे तो अधिकारियों ने राहत की सांस ली।


जीडीए कार्यालय पर लगातार किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। सोमवार को भी वेव व सन सिटी टाउनशिप से प्रभावित किसानों ने प्राधिकऱण के मुख्य गेट पर विरोध प्रदर्शन कर धरना दिया था। मंगलवार को क्रासिंग रिपब्लिक से प्रभावित किसानों के विरोध प्रदर्शन करने के लिए आने की सूचना प्राधिकरण में फैल गई। इस सूचना के बाद अधिकारी तुरंत हरकत में आए और प्राधिकरण के मुख्य गेट पर अस्थाई बैरियर लगा दिए। साथ ही सिहानी थाने फोन कर पुलिस बल बुला लिया। प्राधिकऱण के मुख्य गेट पर बैरिकेटिंग के साथ पुलिस बल भी तैनात हो गया, लेकिन काफी इंतजार क रने के बाद भी कोई किसान दल वहां नहीं आया। हालांकि इस दौरान प्राधिकरण कार्यालय के अंदर भी किसानों के विरोध प्रदर्शन करने के लिए आने की चर्चा होती रही। लेकिन किसी भी किसान के नहीं आने से अधिकारियों ने राहत की सांस ली।





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किसानों ने सिंघु और टीकरी बॉर्डर के बाद पूर्ण रूप से खाली किया गाजीपुर बॉर्डर

नई दिल्ली : कृषि कानून और अन्य मांगों पर सरकार के साथ सहमति बनने के बाद किसान दिल्ली सीमाओं से वापस अपने घर की ओर रवाना हो गए हैं। गाजीपुर बॉर्डर पर बीकेयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के नेतृत्व में सभी किसानों ने आज बॉर्डर को पूर्ण रूप से खाली कर दिया है।


गाजीपुर बॉर्डर खाली करने से पहले किसानों ने सुबह हवन किया और सभी को धन्यवाद देते हुए बॉर्डर खाली कर दिया। इस अवसर पर राकेश टिकैत व अन्य किसान अब जीत का जश्न मनाते हुए बॉर्डर से मोदीनगर, मेरठ, दौराला टोल प्लाजा, मंसूरपुर होते हुए सौरम और अपने गांव सिसौली पहुंचेंगे।


भारतीय किसान यूनियन राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने बॉर्डर खाली करने के दौरान मीडिया से बात करते हुए कहा कि, मैं सभी का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। दिल्ली की सीमाओं पर जिन लोगों ने लंगर चलाया, उनको भी धन्यवाद देना चाहता हूं।


उन्होंने आगे कहा कि, अभी आंदोलन खत्म नहीं हुआ है सिर्फ स्थगित हुआ है।


गाजीपुर बॉर्डर पर सुबह से ही काफी जश्न का माहौल था। बच्चे, बुजुर्ग व महिलाएं खुशी में थिरकते हुए भी नजर आए। नौजवान युवाओं ने ट्रैक्टरों पर गाने बजाकर अपनी खुशी का इजहार किया।


किसानों के स्वागत के लिए सिसौली गांव को दुल्हन की तरह सजाया गया है। किसान भवन को भी रौशनी से जग मग किया गया है, क्योंकि राकेश टिकैत व अन्य किसान 380 दिनों से अधिक समय बाद अपने घर की दहलीज पर कदम रखेंगे।


इससे पहले सिंघु व टीकरी बॉर्डर से किसानों ने बॉर्डर खाली कर दिया था। अब नेशनल हाइवे ऑथोरिटी ऑफ इंडिया के कर्मचारी एक्सप्रेस वे पर सफाई , बिजली के तारों की मरम्मत में लगे हुए हैं ताकि आम नागरिकों के लिए जल्द तमाम मार्गों को खोला जा सके।



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मेरठ में धरने पर बैठे युवा किसान की सर्दी से मौत, किसानों ने जमकर किया हंगामा

मेरठ : कृषि कानून खत्म होने के बाद भी किसानो का आंदोलन और धरना खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। मेरठ में धरने पर बैठे किसानों का आरोप है कि एक युवक की ठंड लगने से मौत हो गई। मृतक युवक भी उनके साथ धरने पर बैठा था। युवक की मौत से किसानों में भारी रोष है।


उधर, मेरठ के परतापुर क्षेत्र में धरने पर बैठे एक युवक की ठंड लगने से मौत होने की सूचना से हड़कंप मच गया। बताया गया कि भूमि अधिग्रहण की नई नीति के तहत मुआवजे की मांग को लेकर शताब्दी नगर सैक्टर-4 बी में भाकियू का धरना जारी है। वहीं, कुछ किसान पानी की टंकी पर बैठकर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं।


किसानों ने बताया कि धरने पर बैठे राहुल चौधरी (27) की बीती रात ठंड लगने से मौत हो गई। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) नेता विजयपाल घोपला का कहना है कि इस मामले में शासन-प्रशासन ढुलमुल रवैया अपना रहा है। पहले भी कई किसान धरने पर अपनी जान गवां चुके हैं।


मौके पर मौजूद किसान मृतक की मां को सरकारी नौकरी और एक करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग कर रहे हैं। भाकियू नेता विजयपाल घोपला ने कहा कि अगर मांग पूरी नहीं की गई तो शव उठने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने कहा इस बार किसान चुप बैठने वाले नहीं हैं।


सपा नेता पवन गुर्जर तमाम कार्यकतार्ओं के साथ मौके पर पहुंचे हैं। सपा नेता ने किसानो के धरना स्थल पर बैठ कर किसानो के साथ धरना प्रदर्शन में हिस्सा लिया और कहा कि सपा सदैव ही किसानों के साथ है।





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किसानों के वापस जाने से सूना हुआ एसकेएम मु्ख्यालय, पहले रहती थी खूब चहल-पहल

नई दिल्ली : केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले किसानों के अपने-अपने घरों की ओर लौटने के बाद शनिवार को सिंघू बॉर्डर पर स्थित संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के मुख्यालय में सन्नाटा पसर गया। कृषि कानूनों के निरस्त कर दिया गया है, जिनके खिलाफ किसानों ने लगभग एक साल तक विरोध प्रदर्शन किया।


हरियाणा के कुंडली में प्रदर्शनकारी किसानों द्वारा बंद किये राजमार्ग पर टाइल के गोदाम में स्थित एसकेएम मुख्यालय आंदोलन के दौरान किसानों का केंद्र हुआ करता था। यहां अनिगन बैठकें और संवाददाता सम्मेलन हुए।


मुख्यालय के लोहे के जिस द्वार पर एसकेएम के स्वयंसेवक आगंतुकों पर नजर रखते थे, आज सुबह वहां सन्नाटा पसरा दिखा। किसान अपने तंबू और अन्य ढांचे उखाड़ने और सामान पैक करने में व्यस्त दिखे।


मुख्यालय के अंदर लगभग साठ साल की आयु के व्यक्ति बलिराम भोजन कर रहे थे। वह गोदाम में चौकीदार के तौर पर काम करते हैं।


बिहार के बेगुसराय के रहने वाले बलिराम ने कहा, ''इस जगह बहुत चहल-पहल रहती थी और किसान नेता यहां रोजाना बैठकें और चर्चा करते थे। अब देखिये, मैं यहां अकेला हूं।''


पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान संघों के नेताओं ने एसकेएम मुख्यालय में अपनी कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं, जिसमें पिछले बृहस्पतिवार को हुई एक बैठक भी शामिल है, जिसमें उन्होंने अपना आंदोलन स्थगित करने और राजमार्ग खाली करने की घोषणा की थी।


एसकेएम 40 किसान संघों का नेतृत्व करने वाला संगठन है, जो केंद्र के तीन कृषि कानूनों कानूनों को निरस्त करने और फसलों पर एमएसपी की कानूनी गारंटी देने की मांग कर रहा था।





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यूपी गेट पर किसानों ने मनाया विजय दिवस

गाजियाबाद : यूपी गेट बॉर्डर पर शनिवार को किसानों ने विजय दिवस मनाया। किसानों ने मंच से सुखमणी साहब का पाठ कर पूजा अर्चना की। यूपी गेट से रविवार सुबह को जत्थों के निकलने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। जबकि भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत तीन दिन के दौरे के बाद सबसे बाद में यूपी गेट बॉर्डर छोड़ेंगे।


यूपी गेट पर सुबह से ही किसानों के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। मंच पर सुबह करीब 10 बजे से सुखमणी साहब का पाठ शुरू हुआ। पाठ कर गुरुवाणी की गई। सुखमणी पाठ के दौरान ही भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत को सरूपा पहनाया गया। भाकियू राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि रविवार से तीन दिन में यूपी गेट बॉर्डर को खाली कर दिया जाएगा। सामान खोलने और बांधने में थोड़ा समय लगेगा। हालांकि रविवार से वह तीन दिन अमृतसर, चंडीगढ़ व हरियाणा के दौरे पर रहेंगे। चंडीगढ़ में चल रहे तीन धरने को समाप्त कराएंगे। हरियाणा में आयोजित होने वाली पंचायतों में भाग लेंगे। 14 दिसंबर की शाम को यूपी गेट वापस आएंगे। फिर 15 दिसंबर को यूपी गेट से वापस घर की ओर रूख करेंगे। वह सबसे बाद में ही यूपी गेट बॉर्डर से जाएंगे। साथ ही विभिन्न मुद्दों को लेकर राज्य सरकारों से वार्ता की जाएगी। 15 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक होगी। जरूरत पड़ने पर सरकार से भी बात की जाएगी। सरकार समझौते के आधार पर किसानों की सभी बातों को मानेगी। मंच से भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैट ने किसान आंदोलन को सफल बनाने वाले किसान और अन्य लोगों को बधाई दी। इसके मंच से किसान नेता योगेंद्र यादव ने भी किसानों को बधाई और शुभकामनाएं दी।


यूपी गेट पर किसान के परिवारों के सदस्यों का पहुंचने का सिलसिला शनिवार को भी जारी रहा। बहनों ने किसानों का टीका कर उनके एक साल चले आंदोलन की जीत होने पर बधाई दी। किसानों का कई स्थानों पर टीका कर उनके ऊपर पुष्प वर्षा भी की। दिल्ली निवासी रीना चौहान ने बताया कि विजय दिवस किसानों की जीत का प्रतीक है। इस उपलक्ष्य को भव्य व यादगार बनाने के लिए अपने किसान भायों का टीका करने पहुंची हैं। उन्होंने दिनभर हजारों किसानों का टीका कर उनका मुंह भी मीठा किया।


यूपी गेट पर किसान के परिवारों के सदस्यों का पहुंचने का सिलसिला शनिवार को भी जारी रहा। बहनों ने किसानों का टीका कर उनके एक साल चले आंदोलन की जीत होने पर बधाई दी। किसानों का कई स्थानों पर टीका कर उनके ऊपर पुष्प वर्षा भी की। दिल्ली निवासी रीना चौहान ने बताया कि विजय दिवस किसानों की जीत का प्रतीक है। इस उपलक्ष्य को भव्य व यादगार बनाने के लिए अपने किसान भायों का टीका करने पहुंची हैं। उन्होंने दिनभर हजारों किसानों का टीका कर उनका मुंह भी मीठा किया।


यूपी गेट पर अधिकांश किसानों के माथे पर तिलक ही लगा नजर आया। कुछ लोगों के पहुंचने पर किसान तिलक को विजय का प्रतीक बताते दिखे। किसान मूछों में ताव देकर विजयी तिलक कहकर इतराते दिखे। साथ ही किसान घर वापस जाने और खुशी मनाने के पीछे सरकार द्वारा भेजे गए लिखित प्रपत्र का भी बखान किया। किसानों ने कहा कि अब सरकार ने सब कुछ लिखित में दिया है तो सरकार को कुछ वक्त देना चाहिए।


यूपी गेट पर शनिवार को काफी भीड़ बढ़ गई। किसान अपनी सहूलियत व सुविधाओं के हिसाब से पहुंचते रहे। इससे यूपी गेट पर चारों को लोगों के अलावा वाहन ही वाहन नजर आए। यूपी गेट के अलावा मैक्स के सामने स्थित सड़क पर भी वाहन खड़े दिखे। यूपी गेट पर यूपी, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड व महाराष्ट्र के नंबरों की लिखे वाहन खड़े दिखे। इनमें सबसे ज्यादा वाहन यूपी के अलावा उत्तराखंड के ही रहे।


यूपी गेट पर कुछ युवा किसान लंगर का खाना खाकर मौज मस्ती भी करते दिखे। इनमें से कुछ युवा किसान दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे की लेन पर क्रिकेट खेलते भी दिखे। कभी-कभी उनकी बॉल एक्सप्रेसवे दिल्ली की ओर से आने वाली लेन पर भी पहुंचती रही। साथ ही कुछ बच्चे एक्सप्रेसवे पर गिल्ली डंडा खेल का भी आनंद लेते दिखे।


किसान आंदोलन के दौरान भी यूपी गेट से एंबुलेंस सहित जरूरी सेवाओं से जुड़े लोगों को निकाला जा रहा है, लेकिन शनिवार को यूपी गेट पर वाहनों का दबाव बढ़ने, सामान को लादने, किसानों की भीड़ बढ़ने से आवागमन में परेशानी आई रही। साथ ही एंबुलेंसों को निकलने में सबसे ज्यादा परेशानी आई। भीड़भाड़ के चलते उनका तेजी निकलना दिनभर प्रभावित हुए रहा। ऐसे में किसानों ने एंबुलेंस को निकालने में मदद की। जबकि, पैदल चलने वाले लोगों को वाहनों के आवागमन करने से मंच तक पहुंचने में परेशानी आई। एक दूसरे को मिठाई खिलाने का सिलसिला भी गेट से लेकर मंच संचालन तक चलता रहा। इससे भी जगह-जगह किसानों की भीड़ लगी रही।


वहीं तड़के से ही किसानों ने अपने-अपने टेंट, झोपड़ी व कैंपों को खोलना शुरू कर दिया। दूरदराज के किसान तंबू खोलने और अपना सामान बांधने में जुटे रहे।खोड़ा किसान चेक पोस्ट के आसपास से लेकर मंच और मैक्स के पास वाले प्रवेशद्वार के आसपास से भी कई झोपड़ी व टेंट हट गए। किसानों ने उनको अपनी सुविधानुसार ट्रक, मेटाडोर व टैक्टर में भरा। फिर उनको अपने घरों की ओर रवाना कर दिया। जबकि कुछ किसानों को स्थाई कैंप, टेंट व झोपड़ियों को खोलने में खासी परेशानी आ रही है। शुरूआत में टेंट व झोपड़ियों को वेल्डिंग मशीन से बेल्ड कर दिया था। टेंट व झोपड़ी की छत आसानी से खोल दी गई। लेकिन लोहे के ढांचे को हटाने में मशीनों का प्रयोग करना पड़ा। युवा किसान टेंट व झोपड़ियों की छत पर चढ़े नजर आए। उन्होंने ग्लैडर मशीन व ड्रिल मशीन से लोहे के ढांचे को खोला। जबकि बुजुर्ग किसान नीचे ही रहकर युवाओं को काम में मदद करते रहे।





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फूलों की बारिश से हुआ दिल्ली से पंजाब जा रहे किसानों का स्वागत

जींद :  दिल्ली में एक साल से अधिक समय तक विभिन्न मांगों को लेकर धरना दे रहे किसान अब घर वापिस जा रहे है। हाइवे के रास्ते दिल्ली से पंजाब जा रहे किसानों का जोरदार स्वागत बांगर के लोगों द्वारा किया गया।


खटकड़ टोल पर आस-पास के गांवों से भारी तादाद में किसान, युवा, मजदूर, महिलाएं पहुंची। यहां किसानों को फूलों की बारिश की गई।


हाइवे पर उचाना की अतिरिक्त मंडी के पास आढ़ती एसोसिएशन द्वारा लगाए गए भंडारे में पहुंचे पर किसानों का स्वागत किया। यहां पर हरियाणा, पंजाब भाईचारा जिंदाबाद के नारे लगाते हुए पंजाब, हरियाणा के किसान आपस में गले मिले। हाइवे पर खड़े होकर पंजाब जाने वाले किसानों को भंडारे में लेकर लोग जा रहे थे। उचाना की अतिरिक्त मंडी में लगे भंडारे में किसानों के लिए स्पेशल देशी घी की जलेबी के अलावा खीर, हलवा, पूरी-सब्जी, पकौडे का प्रबंध किया हुआ था। लस्सी, कढ़ी, रायत भी बनाया हुआ था। यहां पर सुबह पांच बजे से ही किसान आने लगे थे। जैसे-जैसे समय बीतता गया किसानों की संख्या यहां पर बढ़ती गई। करीब दस हजार से अधिक किसानों के खाने की व्यवस्था की हुई थी। आस-पास के गांवों से पहुंचे किसान गांव से दूध लेकर यहां पहुंचे ताकि चाए, खीर में दूध की कमी न पड़े। दिल्ली से आ रहे किसानों ने अपने-अपने ट्रैक्टरों को फूलों, गुब्बारों से सजाया हुआ था।


अतिरिक्त मंडी में लगाए गए डीजे पर किसानी गाने पूरे दिन बजे। यहां पर युवा, बुजुर्ग, महिलाएं डीजे पर झूमी। बुजुर्ग महिला राजकौर, बलिंद्रकौर ने कहा कि अपनी जमीन, युवा पीढ़ी को लेकर लड़े गए इस आंदोलन में जीत किसानी की हुई। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, यूपी के साथ-साथ सभी के भाईचारे की जीत इस आंदोलन में हुई। सरकार को झूकना पड़ा जो कानून सरकार ने बनाए थे उन्हें वापिस लेना पड़ा। पंजाब से आ रहे किसानों ने हरियाणा के किसानों को पगड़ी बांध कर स्वागत भी किया।


किसानों ने कहा कि एक साल तक धरनों पर ही हर पर्व मनाए गए। अब घर वापिसी के बाद आज का दिन उनके लिए होली, दिवाली जैसा है। 700 से अधिक किसानों को इस आंदोलन में खोने का दर्द है। ये जीत आंदोलन में जो मौत का ग्रास बने किसान है उनको समर्पित है। आंदोलन में किसानों ने देखा कि कौन उनके साथ है कौन उनके खिलाफ।




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सिंघू धरना स्थल पर किसानों की भावनाएं हिलोरे मार रहीं, कई जगह यातायात प्रभावित

नई दिल्ली/चंडीगढ़ : दिल्ली-हरियाणा सीमा पर एक साल से अधिक समय तक चले आंदोलन के पश्चात किसानों के घर लौटने के क्रम में शनिवार को फूलों से लदी ट्रैक्टर ट्रॉलियों के काफिले 'विजय गीत' बजाते हुए सिंघू धरना स्थल से बाहर निकल गए, लेकिन इस दौरान किसानों की भावनाएं हिलोरें मार रही थीं। सिंघू बॉर्डर छोड़ने से पहले, कुछ किसानों ने 'हवन' किया, तो कुछ ने कीर्तन गाये, जबकि कुछ किसान 'विजय दिवस' के रूप में इस दिन को चिह्नित करने के लिए 'भांगड़ा' करते नजर आये।


उधर, पंजाब और हरियाणा में सिंघू बॉर्डर से लौटे किसानों की घर-वापसी पर मिठाइयों और फूल-मालाओं से जोरदार स्वागत करने का सिलसिला शुरू हो गया है। दिल्ली-करनाल-अम्बाला और दिल्ली-हिसार राष्ट्रीय राजमार्गों पर ही नहीं, बल्कि राजकीय राजमार्गों पर अनेक स्थानों पर किसानों के परिजन अपने गांववालों के साथ किसानों का स्वागत करते नजर आये। इस अवसर पर लड्डू-बर्फी भी बांटे जा रहे हैं।


ट्रैक्टर ट्रॉलियों और अन्य वाहनों के हुजूम की वजह से दिल्ली-सोनीपत-करनाल राष्ट्रीय राजमार्गों पर वाहनों की रफ्तार धीमी पड़ गई। दूर-दूर तक वाहनों का काफिला नजर आ रहा है।


मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान, तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में और इन कानूनों को वापस लिये जाने की मांग को लेकर पिछले साल 26 नवंबर को बड़ी संख्या में यहां एकत्र हुए थे।


संसद में 29 नवम्बर को इन कानूनों को निरस्त करने तथा बाद में एमएसपी पर कानूनी गारंटी के लिए एक पैनल गठित करने सहित विभिन्न मांगों के सरकार द्वारा मान लिये जाने के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने बृहस्पतिवार को विरोध प्रदर्शन स्थगित करने की घोषणा की थी।


अब जब सिंघू बॉर्डर से किसान अपने घरों को लौटने लगे हैं तो उनकी भावनाएं उफान पर हैं और मन में खुशियां हिलोरें मार रही हैं। ये किसान पिछले एक साल साथ रहने के बाद एक-दूसरे से विदाई लेते वक्त आपस में गले मिलते और बधाई देते नजर आए।


सिंघू बॉर्डर से रवाना होने को तैयार अम्बाला के गुरविंदर सिंह ने कहा, ‘‘यह हमलोगों के लिए भावनात्मक क्षण है। हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारा बिछोह इतना कठिन होगा, क्योंकि हमारा यहां लोगों से और इस स्थान से गहरा लगाव हो गया था। यह आंदोलन हमारे यादों में हमेशा मौजूद रहेगा।’’


यद्यपि कुछ किसान सिंघू बॉर्डर पर केएफसी के निकट पेट्रॉल पम्प पर इकट्ठा होकर कीर्तन और अरदास कर रहे थे तो कुछ टेंट को उखाड़ने और उन्हें ट्रैक्टर ट्रॉलियों पर लादने में मदद कर रहे थे। उसके सौ-दो सौ मीटर की दूरी पर ही पंजाब के युवकों का एक समूह जीत की खुशी में पंजाबी गानों पर भांगड़ा नृत्य कर रहे थे।


सिंघू बॉर्डर पर पुलिस की उपस्थिति बहुत ही कम थी और जितने भी पुलिसकर्मी वहां मौजूद थे, उनके चेहरे पर सुकून के भाव स्पष्ट देखे जा सकते थे। एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘‘हम अपनी ड्यूटी बेहतर तरीके से कर रहे थे। प्रदर्शन के समाप्त हो जाने से निश्चित तौर पर यात्रियों और स्थानीय लोगों को बड़ी राहत मिलेगी।’’


इस बीच वाहनों के काफिले की वजह से विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों पर यातायात की गति धीमी हो गयी है।


सोनीपत के एक यातायात पुलिस अधिकारी ने कहा कि सोनीपत-करनाल राष्ट्रीय राजमार्ग पर वाहन धीरे-धीरे चल रहे हैं। कुछ वाहन राजमार्ग पर गलत साइड से घूस आये हैं, जिसकी वजह से भी वाहनों की आवाजाही में समस्या खड़ी हुई है। दिल्ली-रोहतक राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी कुछ स्थानों पर जाम की स्थिति बनी हुई है।



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किसानों ने टेंट खोलने और सामान पैक करने की तैयारी शुरू

गाजियाबाद : यूपी गेट पर सालभर से जमी करीब 200 से 250 टेंट व झोपड़ियों को सिमटने की कवायद शुक्रवार से शुरू कर दी गई। किसान टेंटों के अंदर सामान बांधने में जुट गए हैं। दूरदराज के किसानों ने गैर जरूरी सामान को भिजवा भी दिया। दिनभर यूपी गेट पर किसान एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर व डांस कर जश्न मनाते भी दिखे।


फैसले के मुताबिक, किसान 11 दिसंबर को घर लौटने की तैयारी में हैं। शुक्रवार सुबह को पंजाब, हरियाणा सहित दूरदराज के किसानों ने अपने टेंटों को खोलना शुरू कर दिया। कुछ किसान ट्रैक्टर व मेटाडोर आदि में सामान लादकर ड्राइवर को सामान सहित निकालते रहे। सुबह से युवा किसान अपने टेंट व झोपड़ी आदि को खोलने में जुट गए। इस कार्य में बुजुर्गों ने भी मदद की। किसानों के टेंट के अंदर से अपना जरूरी सामान डिब्बे, गत्ते व कट्टों आदि में भरा। ताकि, आसानी से सामान को घर पहुंचाया जा सके और घर लौटते समय किसी तरह की परेशानी नहीं आए। एक दो बुजुर्ग किसान अपने कंधे पर ही सामान लादकर पैदल ही निकलते दिखे।


वहीं आसपास के किसान सामान समेटने को लेकर पूरी तरह से निश्चिंत दिखे। अधिकांश किसान अपनी ट्राली आदि को ही तंबू व टैंट बनाकर रख रहे थे। अब उनको महज ट्राली में ट्रैक्टर जोड़कर गांव की ओर निकलना है। इसको लेकर किसान अपने परिजनों से ट्रैक्टर की व्यवस्था करने को लेकर फोन पर बात करते रहे। किसानों के मुताबिक जश्न से अगले दिन शनिवार को किसानों के निकलने का सिलसिला शुरू हो जाएगा।


यूपी गेट पर सुबह के समय किसानों के सामान्य ही चहल पहल रही। इसके बाद दोपहर से किसानों के यूपी गेट पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। किसानों के परिवार सहित महिलाएं भी शनिवार को मंच से होने वाले विदाई कार्यक्रम में शामिल होने की लिए पहुंची। पीलीभीत से पहुंचे सुखविंदर ने बताया कि किसानों को जीत की बधाई देने और जशन में शामिल होने के लिए पहुंचे हैं। वह परिवार सहित यूपी-26 नाम से बने कैंप में रुकेंगे।


यूपी गेट पर दिनभर मुंह मीठा कराने का सिलसिला भी जारी रहा। किसानों ने एक दूसरे को जलेबी, बर्फी, रसगुल्ले, लड्डू आदि खिलाकर जीत की बधाई दी। यूपी गेट पर प्रवेश द्वार के पास ही लंगर व भोजनालय के अलावा मेज लगाकर मिठाई बांटी गई। किसान मिठाई खाने के साथ-साथ डांस करने से भी खुद को रोक नहीं पाए। किसानों के अलावा उनके परिवार से पहुंचे लोग भी ट्रैक्टर आदि पर लगे डीजे व साउंड सिस्टम पर नाचते रहे। जबकि युवा किसान ट्रैक्टर पर लगे झंडे व साउंड सिस्टम का आनंद लेते हुए राउंड मारते रहे। साउंड सिस्टम की पर बजती धुन से यूपी गेट का माहौल कुछ और नहीं नजर आया।


यूपी गेट पर शनिवार को होने वाले जश्न की तैयारियां लंगर व भोजनालय में भी देखने को मिली। लंगर व भोजनालयों में सुबह से मिष्ठान आदि को बनाया जाना शुरू हो गया। लंगरों में देशी घी के मिठाई व कच्ची इमरती बनाए जाने की तैयारिया जोरों पर दिखीं। इसके लिए लंगर में लगे किसान भी कड़ी मेहनत करते दिखे। कोई रसगुल्ले की गोली तो कोई बख्खर बनाने में जुटे रहे।


किसानों का एक साल से आंदोलन जारी रहा। संघर्षरत किसानों और सरकार के बीच सहमति बन गई। किसान आंदोलन समाप्त कर अपने घरों को लौट जाएंगे। किसानों ने समाधान निकलने पर ईश्वर का धन्यवाद करते दिखे। किसानों के मुताबिक शुक्रवार सुबह को किसान नेता राकेश टिकैत समेत पदाधिकारी यूपी गेट से जाकर दिल्ली बंग्ला साहिब में मत्था टेकने के लिए गए। सभी ने मत्था टेककर दुआएं मांगी।


यूपी गेट पर सुबह को किसानों ने हवन कर पूजा अर्चना की। किसानों के हवन में आहुति देकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी। आहुति देने वालों में युवाओं के अलावा बुजुर्ग किसान भी शामिल रहे।






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प्रदर्शनस्थल घर की तरह थे, जीवन भर याद रहेंगे : किसानों ने कहा

 नई दिल्ली : दिल्ली के तीन सीमा स्थलों पर तीन कृषि कानूनों के खिलाफ एक साल से अधिक समय तक आंदोलन करने वाले कई किसानों ने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कहा कि प्रदर्शनस्थल घर की तरह थे और उन्हें ये दिन जीवनभर याद रहेंगे।


संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने घोषणा की है कि हजारों प्रदर्शनकारी 11 दिसंबर से विरोध स्थलों को खाली करना शुरू कर देंगे।


इस घोषणा के बाद पटियाला के रहने वाले लगभग 65 वर्षीय अमरीक सिंह ने कहा कि उन्होंने सिंघू बॉर्डर पर अपने तम्बू में घर जैसा महसूस किया और इसे छोड़ने की बात सोचकर लग रहा कि कुछ छूट रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे यह सब पीछे छोड़ने और संघर्ष की उन सभी यादों, खुशी के पल और दोस्तों को छोड़ने का मन नहीं करता है।’’


पिछले साल 26 नवंबर से किसानों ने दिल्ली के सीमावर्ती स्थल -सिंघू, गाजीपुर और टीकरी में राजमार्गों की घेराबंदी कर दी थी और अपने रहने का इंतजाम कर लिया था।


लुधियाना के एक किसान सौदागर सिंह ने सालभर के विरोध प्रदर्शनों के दौरान अपने संघर्षों को याद करते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शनस्थल पर उन्हें कई नए दोस्त मिले। उन्होंने कहा, ‘‘हमने सोचा था कि सरकार हमारी नहीं सुनेगी और हमें यहीं रहना होगा। लेकिन आखिरकार हम जीत गए और कृषि कानून निरस्त हो गए। अब घर जाने का समय है और हमें अब अजीब लग रहा है।’’


कई किसान प्रदर्शनकारियों ने घर जाने की तैयारी करते हुए कहा कि वे रोजाना इस्तेमाल की कई चीजें यहीं छोड़ देंगे और अपने निजी सामान और वाहनों को ले जाएंगे। सौदागर सिंह ने कहा, ‘‘घर वापस ले जाने के लिए बहुत कुछ नहीं है। इसमें से अधिकतर सामान स्थानीय लोगों को दिया जाएगा, जिनमें से कई यहां आते रहे।’’


केंद्र द्वारा तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने और किसानों की अधिकतर मांगों को स्वीकार करने के साथ, कई प्रदर्शनकारियों ने महसूस किया कि यह आंदोलन को समाप्त करने और घर वापस जाने का समय है।


ज्यादातर किसानों का कहना कि सिंघू बॉर्डर पर विरोध का उनका अनुभव जीवनभर याद रहेगा और वे इस जगह को याद करेंगे। सिंघू बॉर्डर पर एक प्रदर्शनकारी हरकीरत ने कहा, ‘‘हमने विरोध के दौरान मारे गए अपने किसान भाइयों के लिए एक स्मारक बनाये जाने की मांग की है। एक बार यहां स्मारक बन जाएगा तो हम बार-बार इस जगह पर आएंगे।’’


किसान संगठनों का दावा है कि कृषि कानूनों के खिलाफ सालभर के आंदोलन के दौरान विभिन्न स्थानों पर 700 से अधिक किसानों की मौत हुई। ऐसे कई प्रदर्शनकारी भी हैं जो अपने नेताओं की इच्छा पर आने वाले कई दिनों तक धरना स्थल पर रुकने के लिए तैयार हैं।


अयोध्या से आए कमलापति बागी ने कहा, ‘‘हमने यहां सभी व्यवस्था की। बीच-बीच में हम अपने घर जाते थे और विरोध में शामिल होने के लिए फिर से वापस आ जाते थे। जरूरी हुआ तो हम महीनों और वर्षों तक रह सकते हैं।’’


फतेहगढ़ साहिब के एक युवा प्रदर्शनकारी बलप्रीत सिंह ने कहा कि विरोध समाप्त हो सकता है लेकिन किसानों के लंबित मुद्दों पर संघर्ष जारी रहेगा।




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किसान आंदोलन खत्म होने की घोषणा के बाद यात्रियों को राहत मिलने की उम्मीद

नई दिल्ली : दिल्ली की सीमाओं पर धरना स्थल खाली करने की किसानों की घोषणा के बाद एक साल से अधिक समय से बंद पड़ीं सड़कें फिर से खुलने का रास्ता साफ हो गया है। इससे यात्रियों की बड़ी राहत मिलेगी और उनकी यातायात संबंधी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।


केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले साल नवंबर में आंदोलनकारी किसान दिल्ली की सीमाओं टीकरी, सिंघू और गाजीपुर में धरने पर बैठ गए थे, जिससे दिल्ली से गाजियाबाद, नोएडा और हरियाणा जाने या वहां से दिल्ली आने वाले यात्रियों को सड़कें बंद होने या उनका मार्ग बदले जाने के चलते मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इन कृषि कानूनों को अब रद्द किया जा चुका है।


चालीस किसान संघों का नेतृत्व कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन निलंबित करने का बृहस्पतिवार को निर्णय लिया और घोषणा की कि किसान 11 दिसंबर से अपने घरों की ओर लौटने लगेंगे।


नियमित रूप से हरियाणा के रेवाड़ी और दिल्ली के बीच यात्रा करने वाली सुमन राठौड़ ने कहा, ''तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने की सरकार की घोषणा के बाद, मैंने सोचा था कि किसान अपना आंदोलन समाप्त कर देंगे, लेकिन उन्होंने इसे जारी रखा। आज की उनकी घोषणा से मेरे जैसे कई यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी, जो गंभीर परेशानियों का सामना कर रहे हैं।''


नोएडा एक्सटेंशन में रहने वाली नीति रस्तोगी काम के लिए दिल्ली आती हैं। उन्होंने कहा, ''विरोध प्रदर्शन शुरू होने से पहले मैं अपने कार्यालय पहुंचने के लिए दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे से सफर करती थी। प्रदर्शनकारियों द्वारा सीमा पर डेरा जमाने के बाद, मैंने कार्यालय जाने के लिये मेट्रो ट्रेन में यात्रा शुरू कर दी। हालांकि इससे मुझे अधिक समय लगता है और कोरोना वायरस की चपेट में आने का भी डर रहता है।''


नोएडा और दिल्ली के बीच नियमित रूप से यात्रा करने वाले विप्लव त्रिपाठी ने बताया कि वह प्रतिदिन अपनी कार से कार्यालय जाते हैं। सड़क बंद होने के कारण उनके आने-जाने का समय 45 मिनट और बढ़ गया।


उन्होंने कहा, ''नोएडा-मेरठ एक्सप्रेसवे का उपयोग करके मैं एक घंटे में अपने कार्यालय पहुंच सकता हूं, लेकिन नोएडा से गुजरने और सुबह के समय ट्रैफिक के चलते मैं देर से कार्यालय पहुंचता और वहां से लौटता हूं।''






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किसानों की मांग पर केंद्र से मिला लिखित दस्तावेज, एसकेएम बैठक शुरू

नई दिल्ली : कृषि कानूनों के खिलाफ शुरू हुए किसान आंदोलन पर गुरुवार को कृषि मंत्रालय की ओर से किसानों को आधिकारिक पत्र मिल गया है। इसके बाद, एसकेएम की अपनी बैठक शुरू हो गई है।


दरअसल केंद्र की ओर से दोबारा भेजे गए मसौदा प्रस्ताव पर किसानों ने अपनी सहमति जाहिर कर दी थी, उसी प्रस्ताव पर सरकार ने किसानों को लिखित में दे दिया है। अब उम्मीद है कि किसान आंदोलन पर अंतिम फैसला लेंगे।


इस बीच, सिंघु बॉर्डर पर किसानों ने टेंट हटाना शुरू कर दिये हैं और आपस मे किसान मिठाई भी बाट रहें है। इसे देखते हुए अब यह लगभग तय हो गया है कि किसान आज अपना इस आंदोलन पर अंतिम फैसला ले सकते हैं।





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टिकैत की आंसुओं से किसान आंदोलन को मिला था जीवन, पुलिस ने कर ली थी धरना खत्म करने की तैयारी

गाजियाबाद : तीन कृषि कानूनों के विरोध में गाजियाबाद के यूपी गेट पर एक साल से चल रहे किसान आंदोलन की सफलता के तीन अहम मंत्र रहे। कृषि कानून बनने के बाद किसानों का गुबार गुस्से में बदला तो उन्होंने गाजीपुर बॉर्डर पर आकर दिल्ली को घेर लिया। 26 जनवरी के बाद बिखरते किसान आंदोलन को संजीवनी भी गाजीपुर बॉर्डर से ही मिली।


लाल किले पर धार्मिक ध्वज फहराने के बाद 28 जनवरी को पुलिस ने धरना खत्म कराने की तैयारी कर ली थी, लेकिन गाजीपुर बॉर्डर पर बैठे राकेश टिकैत ने पंचायत की और पुलिस की ओर से गिरफ्तारी का प्रयास किए जाने पर उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। इन आंसुओं ने किसानों के गुस्से को और भड़का दिया और तंबू छोड़कर जा चुके किसान रातोंरात फिर से गाजीपुर बॉर्डर पर आ डटे। उसी का परिणाम है कि आंदोलन न केवल फिर से जिंदा हो गया, बल्कि सरकार बैकफुट पर आ गई। किसान आंदोलन की सफलता में गाजियाबाद-दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर की भूमिका अहम रही।


सिंघु बॉर्डर पर 26 नवंबर 2020 को किसानों ने आंदोलन शुरू किया था। भाकियू के अध्यक्ष नरेश टिकैत, राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत और युवा अध्यक्ष गौरव टिकैत के नेतृत्व में एक दिन बाद 27 नवंबर को किसानों का काफिला मोदीनगर पहुंचा था। 28 नवंबर की सुबह किसानों ने यूपी गेट (गाजीपुर बॉर्डर) पर डेरा डाल दिया था। 550 से अधिक ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ दिल्ली की तरफ कूच कर रहे पश्चिमी उप्र के किसानों ने दिल्ली जाने का एलान किया तो अधिकारियों के चिंताएं बढ़ गई थीं।


दिल्ली सीमा में पुलिस ने किसानों को रोकने के लिए कूड़े से भरे डंपर तक खड़े कर दिए थे। बाद में किसानों ने यूपी गेट में ही डेरा जमा लिया। एक दिसंबर को उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर से किसान भी दिल्ली आ गए। तीन दिसंबर को राष्ट्रीय अध्यक्ष चौ. नरेश टिकैत ने पहली महापंचायत कर हुंकार भरी तभी उत्तराखंड के किसानों ने दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर लंगर लगाकर मंच बना लिया। इस मंच का चेहरा बने थे राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के नेता सरदार वीएम सिंह। 17 दिसंबर को किसानों ने दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर पहली बार खाप पंचायत की। इसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 28 से ज्यादा खापों के चौधरियों ने शिरकत कर सरकार को एक्सप्रेसवे बंद करने की चेतावनी दी।


26 जनवरी पर किसानों ने 500 से अधिक ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली में मार्च किया। जिसका नेतृत्व राकेश टिकैत कर रहे थे। मगर लालकिले की प्राचीर पर एक घटना ने लोगों को किसानों के खिलाफ कर दिया। किसानों का मनोबल टूट गया और आंदोलन में तंबू व लंबर खाली होने लगे थे। आंदोलन के इतिहास में सरदार वीएम सिंह भी कई आरोप लगाकर घर लौट गए। इधर, पुलिस प्रशासन ने रास्ता खाली कराने के लिए डेढ़ हजार सुरक्षा बलों के साथ यूपी गेट पर मार्च कर माहौल गरमा दिया। 27 जनवरी का दिन किसानों के लिए काली रात जैसा गुजरा।


28 जनवरी का दिन किसान आंदोलन और अगुवाई कर रहे राकेश टिकैत के लिए काफी महत्वपूर्ण था। शाम करीब 7:30 बजे पुलिस फोर्स कार्रवाई के लिए तैयार थी, लेकिन राकेश टिकैत के आंसू छलक गए। यह पल किसान आंदोलन के जीवनदान का टर्निंग प्वाइंट बन गया था। इस खबर से देश का माहौल बदल गया और यूपी गेट पर फिर जनसैलाब उमड़ने लगा। 26 नवंबर को किसान आंदोलन को एक साल पूरे हो गए। आंदोलन में 11-11 किसानों ने ढाई माह तक भूख हड़ताल की। नेता और अभिनेताओं का भी किसानों को समर्थन मिला। पंजाब, उत्तराखंड व पश्चिम बंगाल के नेता भी यूपी गेट पहुंचे थे। आंदोलन का यही समय था कि किसानों ने नया साल, बैशाखी, होली, गुरु पर्व, रक्षाबंधन, भाई-दूज और दीवाली भी आंदोलन स्थल पर मनाई।





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सरकार के नये प्रस्ताव पर आम सहमति, प्रदर्शन समाप्त करने पर फैसले के लिए बैठक कल : एसकेएम

नई दिल्ली : संयुक्त किसान मोर्चा ने बुधवार को कहा कि उनकी लंबित मांगों पर केन्द्र के प्रस्ताव के ताजा मसौदे पर आम सहमति बन गई है और आंदोलन के लिए भविष्य की रणनीति तय करने को लेकर बृहस्पतिवार को बैठक होनी है।


हालांकि संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के नेता सरकार से 'लेटरहेड' पर औपचारिक संवाद की मांग कर रहे हैं।


किसान नेता और एसकेएम कोर समिति के सदस्य गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा कि लंबित मांगों के संबंध में केन्द्र सरकार की ओर से पहले प्राप्त हुआ प्रस्ताव का मसौदा स्वीकार करने योग्य नहीं था, जिसके बाद केन्द्र ने बुधवार को नये सिरे से प्रस्ताव का मसौदा भेजा है।


एसकेएम कोर समिति की बैठक के बाद संवाददाता सम्मेलन में चढूनी ने कहा, ‘‘अपनी मांगों को लेकर हम सरकार से सहमत हैं। कल की बैठक के बाद हम आंदोलन को स्थगित करने पर फैसला लेंगे। आंदोलन वापस लेने के संबंध में अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। एसकेएम की कल (बृहस्पतिवार) दोपहर 12 बजे और एक बैठक होगी।’’


किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे एसकेएम ने एक बयान में कहा कि किसानों की मांग के संबंध में केन्द्र सरकार के मसौदे पर आमसहमति बन गई है।


एसकेएम ने एक बयान में कहा, ‘‘सरकार के ताजा प्रस्ताव पर आम सहमति बन गई है। अब सरकार के लेटरहेड पर औपचारिक संवाद का इंतजार है। एसकेएम की कल दोपहर 12 बजे फिर से सिंघू बॉर्डर पर बैठक होगी, उसके बाद मोर्चा उठाने के संबंध में औपचारिक फैसला लिया जाएगा।’’







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किसानों की शहादत पर सपा जलायेगी दीप

आगरा : लखीमपुर खीरी में मारे मारे गये किसानों की शहादत को लेकर आज समाजवादी पार्टी पूरे प्रदेश में किसान स्मृति दिवस के रूप में  मनाने जा रही है। जिसके चलते आज शाम छह बजे फतेहाबाद रोड़ स्थित सपा कार्यालय पर जिलाअध्यक्ष मधुसूदन शर्मा और महानगर अध्यक्ष बाजिद निसार के नेतृत्व में सैकड़ो कार्यकर्ता और पदाधिकारी किसान स्मृति दिवस मनाने जा रहे है। भाजपा के केन्द्रीय मंत्री के बेटे द्वारा किसानों की जिस तरह हत्या की गई थी। इसी कड़ी में किसानों का मान बढ़ाने के लिए आज शाम दीप जलाकर किसानों की शहादत पर दीप जलाकर भाजपा सरकार को क्रूरता की याद दिलाने को कार्य किया जायेगा।




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नोएडा प्राधिकरण के सामने धरना दे रहे 600 किसानों पर केस

नोएडा : पुलिस ने नोएडा प्राधिकरण कार्यालय के सामने प्रदर्शन कर रहे 600 किसानों के खिलाफ केस दर्ज किया है। इस एफआईआर में 41 किसानों को नामजद किया गया है।

सेक्टर-20 पुलिस को नोएडा प्राधिकरण के सहायक प्रबंधक रामचंदर की तरफ से शिकायत दी गई थी। उनका कहना है कि 30 नवंबर को सैकड़ों किसानों ने विभिन्न मांगों को लेकर नोएडा प्राधिकरण के कार्यालय का घेराव कर धरना प्रदर्शन किया। साथ ही, रास्ता भी बंद कर दिया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने करीब 600 किसानों के खिलाफ केस दर्ज किया है। इनमें किसान नेता सुखबीर खलीफा, उदल सिंह, महेश, सुधीर चौहान, अंकित, ओमवीर, बिजेंदर, अतुल, सुरेंद्र, राजेंद्र, विपुल,सतपाल ,अरविंद, गौरव यादव, राहुल, सागर ,प्रेमचंद्र, सोनू, तेजपाल, पूनम, बबली शर्मा, सविता, अलका, विनोद यादव, सुनील चौहान, अतुल, अमित भाटी सहित 41 किसानों को नामजद किया गया है। इससे पहले भी सेक्टर-20 और सेक्टर- 39 थाने में किसान परिषद के अध्यक्ष सुखबीर खलीफा सहित अन्य के खिलाफ केस दर्ज हैं।


नोएडा के 81 गांव के किसान अधिग्रहित जमीन की बढ़ी हुई दर से मुआवजा देने सहित विभिन्न मांगों को लेकर एक सितंबर से प्राधिकरण कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। हाल ही में किसानों ने विरोध में कार्यालय के सभी गेट पर मवेशी बांध दिए थे।






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बसताड़ा टोल प्‍लाजा पर आंदोलनकारियों ने बुलाई डांसर, ​वीडियो वायरल होने पर साधी चुप्‍पी

करनाल :  लाठीचार्ज प्रकरण के बाद एक बार फिर से करनाल का बसताड़ा टोल प्‍लाजा चर्चा में हैं। इस बार तो यहां का वीडियो जमकर वायरल हो रहा है। इस पर लोग चर्चा भी कर रहे है। आंदोलनकारी जश्‍न मना रहे हैं, ठुमके लगा रहे हैं। इस जश्‍न में डांसर भी मौजूद है। वीडियो वायरल होने के बाद से किसान नेता भी कुछ बोलने से कतरा रहे हैं। कृषि कानूनों के मुद्दे को लेकर बसताड़ा टोल प्लाजा पर बैठे आंदोलनकारियों के बीच खुशी मनाने के नाम पर डांसरों को नचाने का वीडियो रविवार को इंटरनेट मीडिया पर वायरल होता रहा। इसे लेकर दिनभर चर्चाओं का दौर भी जारी रहा। हालांकि आंदोलनकारी इस पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं हैं।

बता दें कि जिले के बसताड़ा टोल पर आंदोलनकारियों ने पराली पर कानून वापस लेने की खुशी में शनिवार को कार्यक्रम आयोजित किया था। इसमें उन्होंने मिठाई बांटी व रागिनी कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम में पंजाबी, हिंदी व हरियाणवी गानों की धूम मची तो आयोजकों ने कलाकारों से डांस भी करवाया। मौके पर मौजूद आंदोलनकारियों ने जोश के साथ जश्न मनाया और ठुमकों पर ठहाके भी लगाए। बताया जा रहा है कि इस दौरान पेशकश पर नोट भी बरसाए गए। 

रविवार को इस आयोजन के वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हुए तो इस बात की शहर में खूब चर्चा हुई कि खुशी मनाने का कार्यक्रम रागिनी और अन्य लोक प्रस्तुतियों तक तो ठीक था, पर हाईवे पर युवतियों से ठुमके लगवाना कहीं न कहीं उचित संदेश नहीं देता है। दूसरी ओर इस मसले पर पूछे जाने को लेकर फिलहाल आंदोलनकारियों की ओर से खुलकर कुछ नहीं कहा जा रहा है। उनसे इस संबंध में संपर्क का प्रयास किया गया लेकिन किसी ने फोन रिसीव नहीं किया .


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अभी जारी रहेगा आंदोलन : टिकैत

साहिबाबाद : संसद सत्र के पहले दिन सोमवार को लोकसभा और राज्यसभा में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का विधेयक पास होने के बावजूद यूपी गेट पर चल रहा धरना-प्रदर्शन जारी रहा। प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि आंदोलन अभी जारी रहेगा। चार दिसंबर को होने वाली संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में अगली रणनीति तय की जाएगी।


सोमवार सुबह से ही यूपी गेट प्रदर्शन स्थल पर चहल-पहल रही। प्रदर्शनकारी टेंटों और धूप में बैठक कृषि कानूनों की वापसी को लेकर चर्चा करते रहे। दोनों सदनों में कानूनों को वापस लेने का विधेयक पास होने पर प्रदर्शनकारियों ने खुशी जताई। राकेश टिकैत ने उनके साथ बैठक की। कृषि कानूनों के वापस होने का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि तीन कृषि कानून एक बीमारी थी। उसका उपचार हो गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून और अन्य मांगों को भी पूरा किया जाए। राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार चाहती है कि बिना बातचीत किए आंदोलन खत्म हो जाए। देश में कोई आंदोलन या धरना न हो। बातचीत का रास्ता बंद हो जाए। सरकार इस गलतफहमी में न रहे। सरकार से बात किए बिना हम नहीं जाएंगे। सरकार को चाहिए कि बातचीत करके मामला निपटा ले। उन्होंने कहा कि हम सरकार से बात करने को तैयार हैं। सरकार जहां बुलाएगी हम वहां बात करने जाएंगे। कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था रही : यूपी गेट पर कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था रही। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी डटे रहे। खुफिया विभाग सतर्क रहा। यहां की पल-पल की जानकारी अधिकारियों से साझा की गई। पुलिस अधिकारियों ने राकेश टिकैत से बातचीत भी की। बता दें कि यहां 28 नवंबर 2020 से तीनों कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन चल रहा है।




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आज संसद में अन्नदाता के नाम का सूरज उगाना है: राहुल

नई दिल्ली : कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने संबंधी विधेयक को संसद में पेश किए जाने से पहले, सोमवार को कहा कि आज संसद में अन्नदाता के नाम का सूरज उगाना है।


राहुल ने ट्वीट किया, ‘‘आज संसद में अन्नदाता के नाम का सूरज उगाना है।’’


गौरतलब है कि संसद का शीतकालीन सत्र आज से शुरू होने जा रहा है और आज ही कृषि कानून निरसन विधेयक-2021 को लोकसभा में विचार किये जाने और पारित करने के लिए सूचीबद्ध किया गया है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से तीनों कृषि कानूनों को निरस्त किए जाने की घोषणा के बाद इसके लिए एक विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी प्रदान की थी।




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किसानों के मुद्दों पर कांग्रेस सांसदों ने सोनिया के नेतृत्व में संसद परिसर में प्रदर्शन किया

नई दिल्ली : कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी के सांसदों ने सोमवार को किसानों के मुद्दों को लेकर संसद भवन परिसर में प्रदर्शन किया।


संसद भवन परिसर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने प्रदर्शन से पहले, कांग्रेस सांसदों की सोनिया गांधी की अगुवाई में बैठक हुई जिसमें तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने संबंधी विधेयक और कुछ अन्य मुद्दों को लेकर रणनीति पर चर्चा की गई।


कांग्रेस सांसदों ने संसद भवन परिसर में प्रदर्शन के दौरान सरकार विरोधी नारे भी लगाए। इस मौके पर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे। कांग्रेस सांसदों ने तीनों कानूनों को तत्काल निरस्त करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी देने की मांग की।


उधर, राहुल गांधी ने तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने संबंधी विधेयक को संसद में पेश किए जाने से पहले कहा कि आज संसद में अन्नदाता के नाम का सूरज उगाना है। राहुल ने ट्वीट किया, ‘‘आज संसद में अन्नदाता के नाम का सूरज उगाना है।’’


कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाद्रा ने ट्वीट कर कहा, ‘‘आज सड़कों पर हमारे अन्नदाताओं द्वारा किए संघर्ष की जीत की गूंज संसद में होगी। आज एक बार फिर किसान आंदोलन में शहीद हुए 700 किसानों की, लखीमपुर के किसानों की शहादत को याद करने का दिन है। आज जब संसद में तीनों कृषि कानून वापस लिए जाएंगे तब पूरा देश एक साथ 'जय किसान' बोलेगा और अन्नदाताओं को नमन करेगा।’’


गौरतलब है कि संसद का शीतकालीन सत्र आज से शुरू होने जा रहा है और आज ही कृषि कानून निरसन विधेयक-2021 को लोकसभा में विचार किये जाने और पारित करने के लिए सूचीबद्ध किया गया है।





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किसान आन्दोलन सत्यमेव जयते की पुष्टि करता है

दिल्ली की फिजा में सर्द मौसम ने दस्तक दे दी है उधर दिल्ली दरबार की राजनीति के गलियारों में गुलाबी गर्माहट की चर्चा चारो ओर राजनीतिज्ञ पंडितों के जुबानो पर हो रही है।आज भारतीय राजनीति के इलिहास स्वर्णिम दिन है।आज के दिन यानि 26 नवम्बर भारतीय संविधान दिवस है।किसान आन्दोलन की आरम्भ का दिन ' व भारतीय राजनीति मे भष्टाचार उल्मूलन हेतू आम आदमी पार्टी का स्थापना दिवस है। मेरे लिए लिए भी यह स्वर्णिम दिवस है 1 आज मे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के विधान सभा के एक दिवसीय विशेष सत्र का साक्षी भाव से कवेरज करने मौका मिला है। चलिए आप भी मेरे साथ इस पल का साक्षी बने। आप को मै बता दे कि भारतीय राजनीति के इतिहास में संसद के मानसुन सत्र का आगाज सोमवार से होनी वाली है। इसके पुर्व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में दिल्ली विधान सभा का एक दिवसीय विशेष सत्र का विधान सभा के अध्यक्ष राम निवास गोयल की अध्यक्षता मे आहुत की गई। इस विशेषसत्र के दौरान माननीय अध्यक्ष ने 26 नवम्बर के ऐतिहासिक दिवस की महत्व पर अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय संविधान निर्माताओं ' को याद किया।अध्यक्ष महोदय ने दिवगंत पुर्व विधायकों को श्रद्धाजंली अर्पित कर ते हुए एक मिनट सदन मे मौन रखा गया। तदोपरान्त विधान सभा के सभी सदस्यो को संविधान के प प्रस्तावना को स्मरण दिलाते हुए सपथ दिलाई |जैसे ही सदन की कार्यवाही प्रारंभ हुई।अध्यक्ष द्वारा उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को सदन के पटल पर दस्तावेज रखने की आगह किया गया।इस पर विपक्ष ने नेताओ द्वारा प्रदूर्षण व शराब की नई नीति पर चर्चा कराने की मांग कर ने लगे। अध्यक्ष के बार बार मना करने व समझाने पर भी जब विपक्षी विधायकों द्वारा अपनी माँग पर अड़े रहे तथा सदन मे शोर गुल करते हुए सदन की कार्यवाही में व्यवधान करते है।इस पर अध्यक्ष जी ने कहा आप हरियाणा से गंदा पानी छोडना बंद कर दे,दिल्ली का प्रदूषण कम हो जायेगा। लेकिन विपक्ष के विधायक अपनी जिद पर अडे रहे शोर करते रहे। जितेन्द्र महाजन अशोक बाचपेयी मोहन सिंह बिष्ट को सदन से बाहर जाने का आदेश दिया। काफी शोर गुल के बीच मार्शल को बुलाकर मोहन सिंह बिष्ट बाहर निक्राल दिया गया।जिस पर सभी विपक्षी विधायकों ने सदन से वॉक आउट कर गये।विधान सभा परिसर महात्मा गाँधी जी की प्रतिमा के आगे घारणा पर बैठ गए।इधर सदन ने गोपाल राय जी लाये गये प्रस्ताव पर चर्चा व समर्थन सदन उपस्थित विधायकों द्वारा किया जा रहा था। 


दिल्ली विधानसभा एक दिवसीय सत्र मे सदन को संबोधित करते हुए उप मुख्य मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि किसान आन्दोलन एक वर्ष देश के लोक तंत्र के इतिहास मे एक नया अध्याय बन आया है।जिसे आने वाली पीढ़ी को पढ़ना चाहिए। बहस के अन्तिम चरण मे मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल ने संबोधित करते हुए कहा कि तीन काले कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन की जीत पर सभी देशवासियों को बधाई दी। इस आन्दोलन मै मेरे देश के किसान ने अपने सत्याग्रह से यह दिखा दिया कि अन्याय के खिलाफ सच्चाई और मज़बूत इरादों की जीत ज़रूर होती है। इसके पहले 1907 मे पंजाब के किसान द्वारा आन्दोलन किया गया जो कि 9 महीने तक चला था।दुनिया के इतिहास में यह सबसे लंबा आंदोलन रहा, जो देश के किसानों को अपनी ही चुनी हुई सरकार के खिलाफ करना पड़ा और 12 महीने तक चला। कभी किसी ने सोचा नहीं था कि आजाद भारत में किसानों को राष्ट्र विरोधी,खालिस्तानी,चीन-पाकिस्तान के एजेंट समेत तमाम गंदी-गंदी गालियां दी जाएंगी। मुख्य मंत्री ने सवाल किया कि अगर देश के सारे किसान राष्ट्र विरोधी हैं, तो जो कल किसानो को गालियां दे रहे थे, वो स्वयं मे क्या हैं? पिछले कुछ वर्षों से लोगों का जनतंत्र पर से भरोसा उठता जा रहा था। किसान आन्दोलन मे 700 से अधिक्र किसानो की शहीद होना पड़ा है।यह जनतंत्र की जीत है, इससे लोगों का जनतंत्र में भरोसा बढ़ा है। मुख्य मंत्री ने किसानों की एमएसपी समेत अन्य लंबित मांगों का हम पूरा समर्थन करते हैं और किसानों पर लगाए गए सभी झूठे मुकदमें को वापस लेने की मांग करते हैं।


विधानसभा अध्यक्ष राम निवास गोयल की अध्यक्षता में संपन्न सत्र में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, कृषि मंत्री गोपाल राय, कैलाश गहलोत समेत दिल्ली सरकार के सभी मंत्री और विधायक मौजूद रहे। इस दौरान दिल्ली के शहरी विकास मंत्री गोपाल राय ने किसान आंदोलन की जीत को लेकर सदन में रखे गए संकल्प पत्र का प्रस्ताव रखा गया। सबसे पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आज से एक साल पहले किसान आंदोलन शुरू हुआ था। केंद्र सरकार द्वारा बिना किसानों से पूछे, बिना जनता से पूछे अपने अहंकार में तीन काले कानून पास किया था। लोकसभा इनका बहुमत है और राज्यसभा में भी इनकी काफी सीटें हैं। उसका इन्हें अहंकार है कि हम तो कुछ भी पास करा लेंगे। उस अहंकार के चलते इन्होंने ये काले कानून पास किए। इनको लगता था कि किसाना आएंगे, थोड़े दिन आंदोलन करेंगे, चीखेंगे, चिल्लाएंगे और फिर घर चले जाएंगे। पिछले साल 26 नवंबर को दिल्ली के बॉर्डर पर यह आंदोलन शुरू हुआ। आज पूरा एक साल हो गया और उनका आंदोलन सफल रहा। सबसे पहले मैं इस देश के किसानों को तहे दिल से बहुत-बहुत बधाई देना चाहता हूं। इस आंदोलन में सब लोग शामिल हुए। कोई प्रत्यक्ष रूप से कोई अपने-अपने घर से दुआएं भेज रहे थे। जो भी इस देश का भला चाहते हैं, सबने इस आंदोलन का समर्थन किया। महिलाओं, व्यापारियों, छात्रों, पत्रकारों, बुजुर्गों, युवाओं और बच्चों के साथ सभी धर्म-जाति के लोगों ने इसका समर्थन किया और सबने इसकी सफलता के लिए दुआएं दी। मैं सभी देश वासियों को इसकी सफलता पर बधाई देना चाहता हूं। मुख्यमंत्री के बाद विधान सभा अध्यक्ष द्वारा सदन मे प्रस्ताव को सदन मे पारित करने हेतू सदन के पटल रखने की प्रक्रिया पुरी की गई जिसे सदन ने ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। दिल्ली विधान सभा की आज पुराना सचिवालय मे एक दिवसीय विधान सभा के विशेष सत्र मे सता पक्ष - विपक्ष के सभी विधायक के साथ मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, कृषि मंत्री गोपाल राय ' कैलास गहलोत 'राजेन्द्र पाल गौतम समेत सभी मंत्री दिल्ली सरकार मौजूद थे ! दिल्ली विधान सभा का यह पत्रकारिता जीवन के इतिहास मे एक स्वर्णिम यादो के सुनहरे पन्नों में सिमट कर रह गई। फिल हाल मै आप से यह कहते हुए - ना ही काहूँ से दोस्ती ना ही काहूँ से बैर। खबरी लाल तो माँगे सबकी खैर ॥ विदा लेते है। फिर आपके समक्ष तीरक्षी नजर से तीखी खबर के संग उपस्थित होगे 


-विनोद तकिया वाला-



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रस्सी तो जल गयी मगर ऐंठन नहीं गयी

स्वतंत्र भारत के इतिहास में चले सबसे बड़े व संयुक्त किसान आंदोलन ने आख़िरकार केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को घुटने टेकने के लिये मजबूर कर ही दिया। देश का एक बड़ा 'भोंपू वर्ग ' जो बहुमत की मोदी सरकार तथा इसपर पड़ रही पूंजीपतियों की गहरी छाया,साथ साथ प्रधानमंत्री के सख़्त स्वभाव पर विश्वास किये बैठा था वह ज़रूर इस मुग़ालते में था कि तीनों कृषि क़ानून वापस नहीं होने वाले। परन्तु इसी देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसे देश के किसानों की ताक़त पर पूरा भरोसा था,वह जानता था कि किसान, सरकार से अपनी मांगे पूरी करवाये बिना दिल्ली की सरहदों से 'घर वापसी ' करने वाले नहीं हैं। और आख़िरकार जीत देश की अन्नदाताओं की ही हुई। एक वर्ष तक चले इस आंदोलन में तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी के बावजूद किसान अब फ़सल के न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी,तथा आंदोलन के दौरान उपजी अनेक परिस्थितिजन्य मांगों को लेकर अभी भी 'दिल्ली द्वार ' पर डटे हुये हैं। तीनों कृषि क़ानूनों पर सरकार के पीछे खिसकने के बाद अब किसानों का मानना है कि यदि इसी झटके में उनकी तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी के अतिरिक्त न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी व अन्य मांगें पूरी हो गयीं तो निकट भविष्य में उन्हें कोई नया आंदोलन छेड़ने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी।


तरह तरह के आरोप-प्रत्यारोप व लांछन झेलने व आंदोलन के दौरान किसानों के कष्ट उठाने की पराकाष्ठा के दौर से गुज़रने वाले आंदोलन का हालांकि अभी अंत नहीं हुआ है। परन्तु तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी तक का सफ़र भी अच्छा नहीं रहा। यहाँ तक कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु पर्व के दिन देश को संबोधित करते हुये जिन शब्दावली व वाक्यों का प्रयोग किया वे भी यही संकेत दे रहे थे कि 'क़ानून तो अच्छा था परन्तु कुछ किसानों को समझाया नहीं जा सका'। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री के संबोधन के इन अंशों को ही देखिये - 'किसानों की स्थिति को सुधारने के इसी महाअभियान में देश में तीन कृषि क़ानून लाए गए थे। मक़सद ये था कि देश के किसानों को, ख़ासकर छोटे किसानों को, और ताक़त मिले, उन्हें अपनी उपज की सही क़ीमत और उपज बेचने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा विकल्प मिले। बरसों से ये मांग देश के किसान, देश के कृषि विशेषज्ञ, देश के कृषि अर्थशास्‍त्री, देश के किसान संगठन लगातार कर रहे थे। पहले भी कई सरकारों ने इस पर मंथन भी किया था। इस बार भी संसद में चर्चा हुई, मंथन हुआ और ये क़ानून लाए गए। देश के कोने-कोने में कोटि-कोटि किसानों ने, अनेक किसान संगठनों ने, इसका स्वागत किया, समर्थन किया। मैं आज उन सभी का बहुत-बहुत आभारी हूं, धन्‍यवाद करना चाहता हूं।'


प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि -'हमारी सरकार, किसानों के कल्याण के लिए, ख़ासकर छोटे किसानों के कल्याण के लिए, देश के कृषि जगत के हित में, देश के हित में, गांव ग़रीब के उज्जवल भविष्य के लिए, पूरी सत्यनिष्ठा से, किसानों के प्रति पूर्ण समर्पण भाव से, नेक नीयत से ये क़ानून लेकर आई थी। लेकिन इतनी पवित्र बात, पूर्ण रूप से शुद्ध, किसानों के हित की बात, हम अपने प्रयासों के बावजूद कुछ किसानों को समझा नहीं पाए हैं। भले ही किसानों का एक वर्ग ही विरोध कर रहा था, लेकिन फिर भी ये हमारे लिए महत्‍वपूर्ण था। कृषि अर्थशास्त्रियों ने, वैज्ञानिकों ने, प्रगतिशील किसानों ने भी उन्हें कृषि क़ानूनों के महत्व को समझाने का भरपूर प्रयास भी किया। हम पूरी विनम्रता से, खुले मन से उन्‍हें समझाते रहे। अनेक माध्‍यमों से व्‍यक्तिगत और सामूहिक बातचीत भी लगातार होती रही। हमने किसानों की बातों को, उनके तर्क को समझने में भी कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं छोड़ी। मैं आज देशवासियों से क्षमा मांगते हुए सच्‍चे मन से और पवित्र हृदय से कहना चाहता हूं कि शायद हमारी तपस्‍या में ही कोई कमी रही होगी जिसके कारण दिए के प्रकाश जैसा सत्‍य ख़ुद किसान भाइयों को हम समझा नहीं पाए। आज गुरु नानक देव जी का पवित्र प्रकाश पर्व है। ये समय किसी को भी दोष देने का नहीं है। आज मैं आपको, पूरे देश को, ये बताने आया हूं कि हमने तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने का, 'रिपील ' करने का निर्णय लिया है। इस महीने के अंत में शुरू होने जा रहे संसद सत्र में, हम इन तीनों कृषि क़ानूनों को 'रिपील ' करने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा कर देंगे'।


प्रधानमंत्री के इस संबोधन के बाद अब बारी थी उस चाटुकार मीडिया तथा काले कृषि क़ानून समर्थकों की। इस वर्ग को प्रधानमंत्री की क़ानून वापसी की घोषणा में भी 'प्रधानमंत्री का मास्टर स्ट्रोक ' दिखाई देने लगा। इस फ़ैसले को उत्तर प्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों से जोड़कर देखा जाने लगा। परन्तु प्रधानमंत्री के संबोधन में कृषि क़ानूनों की वकालत करने के साथ ही इन्हें वापस लेने की घोषणा भी करना,यह स्थिति सरकार व किसानों के मध्य ऐसे अविश्वासपूर्ण हालात को जन्म दे गयी जो पहले कभी नहीं देखे गये। जब प्रधानमंत्री जी फ़रमाते हैं कि -'इतनी पवित्र बात, पूर्ण रूप से शुद्ध, किसानों के हित की बात, हम अपने प्रयासों के बावजूद कुछ किसानों को समझा नहीं पाए हैं ' उस समय उन्हें यह भी याद रखना चाहिये कि वे इतनी पवित्र,पूर्ण रूप से शुद्ध तथा किसानों के हित की बात केवल किसानों को ही नहीं बल्कि मेघालय के राज्यपाल सतपाल मलिक को भी नहीं समझा सके? वे अपनी बात अपनी ही पार्टी के सांसद वरुण गांधी व वीरेंद्र सिंह जैसे कई नेताओं को भी नहीं समझा सके ?


प्रधानमंत्री भले ही इसे 'थोड़े से किसानों' और 'किसानों के छोटे से वर्ग' का आंदोलन जैसे शब्दों का प्रयोग कर इस आंदोलन की व्यापकता को संकुचित करने का प्रयास क्यों न करें परन्तु वास्तव में यह किसान आंदोलन की व्यापकता,दृढ़ता व उनके संकल्पों की ही जीत थी जिसने सरकार को घुटने टेकने के लिये मजबूर कर दिया। अन्यथा यह आंदोलन अभी और भी व्यापक व तीव्र हो सकता था। क्योंकि यह राजनैतिक दलों द्वारा बुलाई गयी 'भाड़े की भीड़' पर आधारित आंदोलन नहीं बल्कि देश के समर्पित 'अन्नदाताओं ' का आंदोलन था और यह शक्ति उन्हीं आनंदताओं की जीत है। जो लोग सरकार के फ़ैसले में 'मास्टर-स्ट्रोक' जैसा कुछ देख रहे हैं उनकी स्थिति दरअसल -'रस्सी तो जल गयी मगर ऐंठन नहीं गयी' जैसी ही है। 


-तनवीर जाफ़री-


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लोकसभा में सोमवार को पेश होगा कृषि कानूनों को निरस्त करने संबंधी विधेयक

नई दिल्ली : सरकार तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों को निरस्त करने संबंधी विधेयक सोमवार को लोकसभा में पेश करेगी जिसमें कहा गया है कि किसानों का एक छोटा समूह इन कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन समय की जरूरत है कि समावेशी विकास के लिए सबको साथ लेकर चला जाए।


संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन यानी सोमवार की लोकसभा की कार्यवाही सूची में इस विधेयक को शामिल किया गया है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से तीनों कानूनों को निरस्त करने की घोषणा के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस विधेयक को मंजूरी दी थी।


केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर निचले सदन में इस विधेयक को पेश करेंगे।


सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने अपने सांसदों को व्हिप जारी कर कहा कि वे सोमवार को सदन में मौजूद रहें।


लोकसभा की 29 नवंबर की कार्यवाही सूची के अनुसार, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कृषक उपज व् यापार और वाणिज् य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2020, कृषक (सशक् तिकरण व संरक्षण) कीमत आश् वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 को निरस्त करने और आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन करने से संबंधित विधेयक पेश करेंगे।


उधर, किसान नेताओं ने शनिवार को कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने संसद तक 29 नवंबर को आहूत अपने ट्रैक्टर मार्च को स्थगित कर दिया है और अगले महीने एक बैठक में आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।


मार्च को स्थगित करने का निर्णय संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने से दो दिन पहले किया गया है।


पिछले एक साल से कानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठनों का नेतृत्व करने वाले संयुक्त किसान मोर्चा ने यह भी कहा कि वह किसानों को उनकी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी देने वाले कानून की मांग पर संसद में आश्वासन चाहता है।



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संयुक्त किसान मोर्चा की आज महत्वपूर्ण बैठकें, अंतिम रोड मैप होगा तैयार

नई दिल्ली : तीनों कृषि कानूनों की वापसी के एलान के बाद किसान अब भी दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं। किसान जाने के बजाए अब आगे की रूप रेखा तैयार करने लगे हैं। लिहाजा संयुक्त किसान मोर्चा की आज 12 बजे एक महत्वपूर्ण बैठक है जिसमें आगे का रोड मैप तैयार होगा।


जानकारी के अनुसार, सिंघु बॉर्डर स्थित कजारिया टाइल्स स्थित जगह पर दो बैठकें होंगी, जिसमें पहली 11 बजे 9 सदस्यीय समिति भाग लेगी। इसमें डॉ. दर्शनपाल सिंह, बलबीर सिंह राजेवाल, गुरनाम सिंह चढूनी, योगेंद्र यादव, जगजीत सिंह ढल्लेवाल, हन्नान मोला, जोगिंद्र सिंह उगराहां, शिवकुमार कक्का व युद्धवीर सिंह शामिल हैं।


इस बैठक के होने के तुरंत बाद ही संयुक्त मोर्चा की बैठक होगी जिसमें सभी संगठनों के प्रमुखों को आने के लिए कहा गया है।


इस बैठक में किसान एमएसपी पर कानून बनाने पर अपनी रणनीति बना सकते हैं। क्योंकि किसान साफ कर चुके हैं कि जब तक एमएसपी पर कानूनी गारंटी नहीं दी जाती, तब तक दिल्ली की घेराबंदी जारी रहेगी।


वहीं किसान एमएसपी कानून के बाद आंदोलन में जान गंवाने वालों को मुआवजा और आंदोलन के दौरान दर्ज हुए किसानों पर मुकदमे रद्द करने की मांग कर रहें हैं।


दरअसल किसान 29 नवंबर को संसद कूच करने की योजना बना चुके हैं। हालांकि आज की बैठक में इसपर भी तय होगा कि क्या किसान ट्रैक्टर से संसद कूच करेंगे या नहीं ? वहीं कृषि कानूनों के अलावा अपनी अन्य मांगों पर अब दबाब बनाये जाने का प्रयास किया जाने लगा है।




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दिल्ली विधानसभा के विशेष सत्र में आप सरकार ने तीन कृषि कानून के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया

नई दिल्ली : दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शुक्रवार को किसानों को केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ उनकी आंदोलन की सफलता के लिये बधाई देते हुये कहा कि उनकी जीत, लोकतंत्र की जीत है और आम आदमी पार्टी की सरकार उनकी मांगों का समर्थन करती है ।


दिल्ली विधानसभा ने शुक्रवार को एक प्रस्ताव पास कर तीन कृषि कानूनों को वापस लेने, आंदोलन के दौरान दिवंगत हुए 700 किसानों के परिवारों को मुआवजा देने तथा फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी दिये जाने की मांग की ।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में घोषणा की थी कि जिन तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन कर रहे हैं, उन्हें वापस लिया जायेगा ।


सदन में प्रस्ताव पर एक चर्चा का जवाब देते हुये केजरीवाल ने विधानसभा में कहा, ‘‘किसानों की जीत लोकतंत्र की जीत है । हम किसानों की लंबित मांग का समर्थन करते हैं, और हम किसानों के साथ हैं ।’’


विधानसभा में यह प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित हो गया । यह प्रस्ताव दिल्ली सरकार के मंत्री गोपाल राय ने सदन में रखा था ।


मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने लोकसभा में बहुमत होने के कारण ‘‘अहंकार’’ में तीनों कृषि कानून पारित किया था ।


केजरीवाल ने कहा, ‘‘लोकसभा में बहुमत होने के कारण कृषि कानून अहंकार में पारित कराया गया। मैं किसानों की सफलता पर उन्हें बधाई देता हूं । देश के लोगों, महिलाओं, युवाओं एवं व्यापारियों के हित में जो कुछ भी होगा, उसका समर्थन करता हूं। मैं विशेष रूप से पंजाब के किसानों को बधाई देता हूं ।’’


विधानसभा में पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि केंद्र सरकार की ओर से पारित तीन कृषि कानून सामान्य तौर पर किसानों एवं जनता के हित के खिलाफ था और मुट्ठी भर व्यापारिक घरानों के पक्ष में बनाया गया था ।


केजरीवाल ने कहा कि किसानों को सफलता प्राप्त करने के लिये कोविड, खराब मौसम और डेंगू जैसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ा ।


उन्होंने कहा, ‘‘यह सबसे लंबा अहिंसक आंदोलन है । सत्तारूढ़ दल (भाजपा) ने उन्हें उकसाने के लिये सब कुछ किया । उन्हें गाली सुननी पड़ी, उन्हें आतंकवादी कहा गया, चीन और पाकिस्तान का एजेंट कहा गया लेकिन वे इसस उबर गये । इस आंदोलन ने लोगों का लोकतंत्र में विश्वास बढा है जो हाल ही में हिल गया था ।’’


केजरीवाल ने कहा कि आम आदमी पार्टी की सरकार ने भारी दबाव के बावजूद स्टेडियमों को जेल में तब्दील नहीं होने दिया।


प्रस्ताव में लखीमपुर खीरी मामले में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा को पद से हटाने और उन्हें गिरफ्तार किये जाने की मांग की गयी है।


आप के राष्ट्रीय संयोजक ने कहा, ‘‘केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा को तत्काल बर्खास्त कर दिया जाना चाहिये । मुझे समझ में नहीं आता कि उन्हें नहीं हटाने को लेकर केंद्र सरकार की क्या मजबूरी है । किसानों के खिलाफ मामलों को वापस लिया जाना चाहिये ।’’


उन्होंने कहा कि यह कितना अजीब है कि जब तीन कृषि कानून पारित किए गए, तो भाजपा ने इसे ‘‘मास्टरस्ट्रोक’’ करार दिया।


उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन जब तीन कानूनों को वापस ले लिया गया, तो उन्होंने इसे फिर से मास्टरस्ट्रोक कहा। मुझे उन पर दया आती है, हो सकता है कि उनकी जगह किसी को न रखा जाए।’’


चर्चा में हिस्सा लेते हुये उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि भाजपा और (प्रधानमंत्री नरेंद्र) मोदी ने इस आंदोलन को बाहरी ताकतों द्वारा प्रयोजित आंदोलन करार दिया ।’’


उन्होंने सदन में आरोप लगाया, ‘‘प्रधानमंत्री और अन्य (भाजपा) नेताओं ने आंदोलन में मरने वाले किसानों के बारे में एक शब्द नहीं बोले । किसानों के आंदोलन को अपमानित करने के लिये सरकार ने 100 करोड़ रुपये खर्च कर दिये ।’’


विधानसभा में पारित प्रस्ताव में कहा गया है, ‘‘यह सदन किसानों को आतंकी और राष्ट्र विरोधी कह कर उनका अपमान करने वाली राजनीतिक पार्टियों की निंदा करती है, जो अपने अधिकारों के लिये अहिंसक तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे थे ।


इसमें कहा गया है, ‘‘यह देश 700 किसानों के सर्वोच्च बलिदान को कभी नहीं भूल सकता है और यह सदन इन किसानों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता और सम्मानजनक श्रद्धांजलि व्यक्त करता है।’’


इसमें कहा गया है, ‘‘यह सम्मानित सदन उन सभी किसानों के परिजनों को सम्मानजनक मुआवजा दिये जाने की मांग करता है, जिन्होंने अपने अधिकारों के लिए लड़ते हुए अपनी जान गंवाई।’’


मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के हजारों किसान, केंद्र के तीन कृषि कानूनों को रद्द करने और फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की मांग को लेकर पिछले एक साल से दिल्ली की सीमा-सिंघू, गाजीपुर और टिकरी - पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।


इसमें कहा गया है, ‘‘यह सदन इन कृषि कानूनों को निरस्त करने की घोषणा का स्वागत करता है और केंद्र सरकार से इन्हें जल्द से जल्द निरस्त करने का आह्वान करता है। यह सदन न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की उनकी जायज मांग में किसानों के साथ खड़ा है ।’’


इस बीच दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता रामबीर सिंह विधूड़ी ने कहा कि इस प्रस्ताव की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि केंद्र सरकार ने पहले ही इन कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर चुकी है ।


भाजपा विधायक विजेंदर गुप्ता ने कहा कि पुलिस अथवा अर्द्धसैनिक बलों ने किसान आंदोलन पर एक भी गोली नहीं चलायी । उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी आधारहीन आरोप लगा रही है।




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संघर्ष से ही निकलता है समाधान का रास्ता : टिकैत

गाजियाबाद : भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि संघर्ष से ही समाधान का रास्ता निकलता है। किसानों ने अपना बलिदान देकर ठंड, गर्मी और बरसात की परवाह किए बगैर खुले आसमान के नीचे धरना जारी रखा। सरकार अब धीरे-धीरे मांगों पर विचार करने लगी है। तीन कृषि कानून जनता के लिए नुकसानदेह थे, जो वापस हुए हैं। अब फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी समेत किसानों की मांगों की बारी है।


बुधवार को वह सदरपुर में मधुबन बापूधाम आवासीय योजना में भूमि अधिग्रहण के बढ़े मुआवजे की मांग के लिए स्थानीय किसानों के अनिश्चितकालीन धरने में पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने एक जनवरी को फसल के दाम दोगुना करने की बात कही थी। इसे किसान साल के शुरू में देखेगा। स्थानीय किसानों के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि 'हमारा जिला-हमारा कलेक्ट्रेट' नारे के साथ जैसे दिल्ली को चारो ओर से घेरा गया है। ठीक वैसे ही डेरा डालो और मांग पूरी न होने तक धरना जारी रखो। अभी सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस करने में सहमति बनाई है। अभी किसानों की फसलों के एमएसपी, बिजली बिल, किसानों पर दर्ज मुकदमें वापस लेने की मांग बाकी है। वह अपनी सभी मांगों को पूरा कराए बगैर वापस नहीं लौटेंगे। 


राजबीर सिंह, गौरी शंकर, बोस चौधरी, महेंद्र मुखिया, सुरदीप शर्मा, सुनील सहरावत, आशु चौधरी आदि मौजूद थे। बुनकर मार्ट का काम रुकवाया : बढ़े मुआवजे की मांग को लेकर धरनारत सदरपुर और स्थानीय किसानों ने बुनकर मार्ट में चल रहे निर्माण कार्य को जबरन रुकवा दिया। उन्होंने बुनकर मार्ट पर भाकियू का बैनर लगाते हुए यहां कार्य कर रहे श्रमिकों को काम न करने की चेतावनी भी दी। छह को कलेक्ट्रेट या जीडीए पर धरना : धरना स्थल पर मौजूद किसानों ने पांच दिसंबर तक मांगे पूरी न होने पर छह दिसंबर को जीडीए कार्यालय परिसर या कलेक्ट्रेट में अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन करने की चेतावनी दी। धरने में सक्रिय भूमिका निभा रहे गौरी शंकर ने बताया कि पंचायत कर तय किया जाएगा कि धरना कलेक्ट्रेट या जीडीए में कहां दिया जाए।




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मांगों पर कायम किसान महापंचायत, जारी रहेगा विरोध प्रदर्शन

लखनऊ :  लखनऊ की किसान महा पंचायत ने सोमवार को किसानों द्वारा प्रधानमंत्री को सौंपे गए छह सूत्रीय चार्टर को दृढ़ता से दोहराया और स्पष्ट किया कि अभी उनका आंदोलन खत्म नहीं हुआ है।


किसान यूनियनों के एक छत्र संगठन संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि उनका विरोध तब तक जारी रहेगा, जब तक कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी और केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी को बर्खास्त करने सहित उनकी मांगों को पूरा नहीं किया जाता है।


कई राज्यों के हजारों किसानों को संबोधित करते हुए बीकेयू के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा, हमारी सभी मांगें पूरी होने तक हमारा आंदोलन खत्म नहीं होने वाला। हम पूरे देश में इसी तरह की पंचायतें आयोजित करेंगे और जो लोग सोचते हैं कि यह मुद्दा खत्म हो गया है, दुख की बात है कि वे गलत हैं।


उन्होंने कहा कि एमएसपी गारंटी उनकी सबसे बड़ी मांग है।


टिकैत ने कहा, हम न्यूनतम समर्थन मूल्य को सभी फसलों और सभी किसानों के लिए कानूनी अधिकार के रूप में सी2 प्लस 50 प्रतिशत (उत्पादन लागत से 50 प्रतिशत अधिक) के फामूर्ले पर आधारित बनाना चाहते हैं। हमारे पत्र में हमने प्रधानमंत्री को याद दिलाया है कि उनकी अध्यक्षता में एक समिति ने 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री से इसकी सिफारिश की थी और उनकी सरकार ने बाद में संसद में भी इसकी घोषणा की थी।


महा पंचायत में बड़ी संख्या में किसान लखीमपुर खीरी से आए थे और 3 अक्टूबर की घटना का मुद्दा, जिसमें केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा की एक एसयूवी द्वारा कथित तौर पर चार किसानों को कुचल दिया गया था, महा पंचायत में प्रमुखता से उठा।


किसानों ने मंत्री की बर्खास्तगी और गिरफ्तारी की मांग की, जो इस मामले में आरोपी हैं। उनका बेटा आशीष मिश्रा पहले से ही जेल में है।


टिकैत ने कहा कि उन्हें पता चला है कि सरकार डेयरी विकास पर नई नीति ला रही है और किसान चाहते हैं कि इस मुद्दे पर उनसे सलाह ली जाए।


उन्होंने कहा कि किसानों की अगली बैठक 26 नवंबर को दिल्ली की सीमा पर होगी।


इस बीच, किसानों ने आंदोलन के दौरान अपनी जान गंवाने वाले किसानों की याद में एक स्मारक के लिए सिंघु सीमा पर जमीन की मांग भी की।


टिकैत ने मृतक किसानों के परिवारों के लिए मुआवजे की भी मांग की।


अन्य मांगों में बिजली नियमन संशोधन विधेयक को वापस लेना, दिल्ली सीमा आंदोलन और पराली जलाने से संबंधित सभी मामलों को वापस लेना शामिल है।


संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने रविवार को प्रधानमंत्री को एक खुले पत्र में छह शर्तें रखीं और सरकार द्वारा किसानों के साथ इन पर चर्चा करने में विफल रहने पर आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दी।







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नकारात्मक आंदोलन से हुआ किसानों का अहित

अंततः प्रधानमन्त्री मोदी ने कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान कर दिया। सहसा इस खबर पर यकीन करना कठिन था। क्योंकि नरेंद्र मोदी की इमेज कठोर निर्णयों के लेने एवं उन पर अडिग रहने की है यदि यह निर्णय उनकी समझ में देश हित में हैं।


किसी भी दबाव में मोदी अपने फैसले बदलने के लिए नहीं जाने जाते। कृषि कानूनों की वापसी अत्यधिक निराश जनक है। यह राजनीति की अर्थशास्त्र पर जीत है। मोदी ने कृषि कानूनों की वापसी के समय अपने सम्बोधन में जैसा कहा कि यह कानून सच्ची नीयत से लाए गए और दिए की लौ की तरह सत्य थे परन्तु कुछ लोगों को हम समझा नहीं सके,अतः उनकी भावनाओं को देखते मैं इन तीनों कृषि कानूनों को वापस लेता हूँ।


यह सत्य है कि स्वतंत्रता के बाद पहली बार किसी सरकार ने कृषि क्षेत्र में मूलभूत सुधार लाने एवं किसानों को शोषण एवं बन्धनों से निजात दिलाने के लिए सही कदम उठाते हुए इन तीनों कृषि कानूनों के रूप में महत्वपूर्ण कदम उठाया था जो विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस एवं वामपंथियों के मोदी विरोध के एजेंडे एवं उनकी कुत्सित राजनीति की भेंट चढ़ गया। निकट भविष्य में अब शायद ही कोई कृषि क्षेत्र एवं किसानों की माली हालत सुधारने के लिए कोई क्रान्तिकारी कदम उठाने के विषय में सोचेगा। अपने देश में कृषि क्षेत्र की उत्पादकता एवं आय का स्तर बहुत नीचा है और देश के चौरासी प्रतिशत किसान लघु एवं सीमान्त कृषक हैं जिनके पास दो हेक्टेअर या कम ही भूमि है। इन कृषि कानूनों का लक्ष्य इन छोटी जोत के किसानों का उद्धार ही था जिनके पास न तो निवेश के लिए पूंजी है और न ही इतना विपणन आधिक्य कि वे गरीबी के दुष्चक्र से बाहर आ सकें। सरकारी विपणन मंडियों में बिचौलियों के द्वारा एक लम्बे समय से इनका शोषण सर्वविदित है। इन कृषि कानूनों के माध्यम से किसानों को अपनी फसल कहीं भी बेचने का अधिकार दिया गया और उनके विकल्पों को बढ़ाने के लिए कृषि उपज की खरीद के लिए निजी क्षेत्र को भी भागीदारी देने की व्यवस्था की गई। इन कृषि कानूनों की वापसी का मतलब है कि देश के किसानों को पुनः उन्हीं राज्य मंडियों में बिचौलियों के वर्चस्व के तहत अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होना होगा। अब किसानों के लिए लाभदायक कीमत की कल्पना पुनः एक सपना हो जाएगी।


निजी निवेश को कृषि क्षेत्र में प्रोत्साहित करने के लिए इन कृषि कानूनों में एक संविदा खेती को बढ़ावा देने के लिए था जिसमें किसान फसल के पूर्व निजी उद्योगपतियों से संविदा कर सकते थे और अपनी फसल सीधे बेचकर अच्छी कीमत प्राप्त कर सकते थे। कानून में प्रावधान किए गए थे कि छोटे किसानों का किसी प्रकार से शोषण उद्योगपतियों द्वारा न किया जा सके। यह प्रावधान किए गए कि किसान जब चाहे संविदा से हट सकता है और इसके लिए उस पर कोई दण्ड या जुर्माना नहीं लगाया जा सकता। यह स्पष्ट तौर पर प्रावधान था कि संविदा केवल फसल के लिए होगा। किसानों की भूमि की खरीद बिक्री या पट्टे को संविदा खेती के दायरे से पूर्णतया प्रथक रखा गया था। यदि कृषि कानून लागू होते तो इस निजी निवेश का फायदा किसानों को मिलता परन्तु कानूनों की वापसी ने छोटे किसानों को इस अवसर से वंचित कर दिया।


देश में पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश जैसे दस से अधिक राज्यों में संविदा खेती लागू है परन्तु इनके नियम कानूनों में एकरूपता नहीं है और किसानों के हित भी संरक्षित नहीं हैं। मोदी जी द्वारा लाए गए कानून का उद्देश्य था कि एक ही नियम कानून के तहत देश के सभी किसानों को इसका लाभ मिले परन्तु कृषि कानूनों के विरोधी वामपंथियों एवं कांग्रेस के किसान संगठनों ने झूठा दुष्प्रचार किया कि मोदी किसानों की जमीन अडानी अम्बानी के हाथ देने के लिए यह कानून लाए हैं। इनमें से कोई यह बता सकता है कि जिन राज्यों में दशकों से संविदा खेती है, वहाँ कितनी किसानों की जमीन निजी उद्योगपतियों ने हड़प ली।


इन कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा के समय नरेंद्र मोदी ने जो तर्क दिया कि हमारी तपस्या में ही शायद कोई कमी रही कि हम कुछ लोगों को अपनी बात समझा नहीं सके। एक लोकतंत्र में आप किसी भी नीति या कानून के लिए शत प्रतिशत समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकते। यदि कोई कानून अधिकतर लोगों के हित में है और वह चौरासी प्रतिशत किसानों को फसल बेचने के विकल्प देने के साथ साथ उन्हें निजी निवेश के माध्यम से आय बढ़ाने का अवसर भी प्रदान करता है तो कुछ विपक्षी दलों की किसान संगठनों द्वारा प्रायोजित धरना प्रदर्शन एवं विरोध के समक्ष समर्पण की नीति एक तरह से उन लोगों के लिए मायूस करने वाला कदम है जो प्रधानमन्त्री के द्वारा लाए इन कानूनों से कृषि क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन आने एवं लघु सीमान्त कृषकों के अच्छे दिन आने की उम्मीद कर रहे थे।


यह भी सही है कि कृषि कानूनों के विषय में विपक्ष का दुष्प्रचार इतना अधिक था और इस विषय को एक चुनावी मुदा बनाकर जिस तरह सभी राजनीतिक दल भाजपा एवं मोदी जी को किसान विरोधी साबित करने में लगे थे उससे सरकार के लिए भी चुनौती खड़ी हो गई थी कि वह किस तरह इस दुष्प्रचार से बचे कि उसके लिए किसानों के हितों से अधिक अपनी जिद एवं हठधर्मिता है। अधिकांश किसान इन कानूनों की बारीकियों एवं प्रावधानों को समझते नहीं ,अतः आन्दोलन करने वाले नेताओं एवं विपक्ष के लिए किसानों को झूठे दुष्प्रचार से भी समझाना आसान रहा कि यदि नए कानूनों को लागू किया गया तो किसानों की जमीन चली जाएगी एवं सरकारी मण्डियाँ समाप्त हो जाएगी। किसान निजी उद्योगपतियों की कृपा पर निर्भर हो जाएगा जिनका कृषि उपज की खरीददारी में अहम भूमिका होगी।


निकट भविष्य में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड सहित पांच राज्यों के चुनाव ने सरकार को ऐसा आत्मघाती एवं अदूरदर्शी कदम उठाने के लिए मजबूर किया। ऐसा मैं इस कारण से कह रहा हूँ कि इन कानूनों की वापसी से प्रधानमन्त्री की देश एवं कमजोर व्यक्ति के साथ खड़ा रहने की छवि कमजोर हुई है। इसके साथ ही इन कानूनों की वापसी से एक गलत संदेश यह भी गया कि देश में किसी भी झूठे दुष्प्रचार के सहारे भीड़तंत्र जुटाकर इस सरकार को किसी भी देशहित एवं बहुजन हिताय निर्णय को वापस लेने के लिए मजबूर किया जा सकता है। यदि निकट भविष्य में अनुच्छेद 370 समर्थक एवं सीएए विरोधी पुनः सक्रिय हों तो कोई ताज्जुब नहीं। यही बात सीएए पर भी लागू होती है।


मेरा मानना है कि मोदी जी की छवि देश के जनमानस में यह है कि वह जो भी निर्णय लेंगे वह देशहित में ही होगा। इस स्थिति में मोदी जी द्वारा राकेश टिकैत, हन्नान मुल्ला, योगेन्द्र यादव जैसे तथाकथित किसान नेताओं के दबाव में ऐसा निर्णय लेना समझ से परे है। सरकार वस्तुतः असमंजस की स्थिति में रही। सामान्य किसानों के हितों से बेपरवाह इस तथाकथित किसान आन्दोलन का प्रारम्भ से ही मक़सद किसानों की आड़ में मोदी को घेरना एवं देश में अराजकता फैलाना था जिसका सबसे बड़ा सबूत गणतंत्र दिवस पर सामने आया जब अराजक तत्वों की मदद से इन नेताओं ने दिल्ली में लाल किले तक ट्रैक्टर रैली एवं लाल किले का झण्डा उतारने से लेकर पुलिस पर हमला भी किया। गणतंत्र दिवस पर जो नंगा नाच किया गया वह देश का किसान करने की सोच भी नहीं सकता परंतु अफसोस है कि कानून वापसी के साथ ही घटना के लिए जिम्मेदार लोग मुखर होकर दर्ज मुकदमों की वापसी की मांग उठा रहे हैं।


हकीकत यह है कि यह आन्दोलनकारी अब भी सरकार पर ही सभी घटनाओं की जिम्मेदारी डाल रहे हैं और अब भी आन्दोलन समाप्त कर घर वापसी को तैयार नहीं हैं। अब भी वह चुनाव तक किसी न किसी बहाने आन्दोलन जीवित रखना चाहते हैं और सरकार पर उन्हें आन्दोलनजीवी, खालिस्तानी एवं न जाने क्या क्या कहे जाने का आरोप लगा रहे हैं। एम एस पी के लिए अनिवार्य कानून बनाने को अब वो अपनी मुख्य मांग बताने लगे हैं। अब जब सरकार ने पहल की है और आन्दोलन को समाप्त करने के लिए कृषि क्षेत्र के लिए उठाए गए अपने महत्वपूर्ण कदम पीछे खींच लिए है तो उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि अब आन्दोलन शीघ्रातिशीघ्र खत्म हो। किसान नेताओं को भी प्रधानमन्त्री मोदी के इस कदम की सार्थकता के लिए आन्दोलन को समाप्त करने के विषय में सोचना चाहिए।


-राकेश कुमार मिश्र-

(लेखक अर्थशास्त्री हैं।)





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आंदोलन बनाम किसान-सत्ता का घमासान!

अब किसान आंदोलन समाप्त होना निश्चित है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने कानून वापस लेने की घोषणा कर दी आने वाले सत्र में जिस पर मोहर भी लग जाएगी। देश में खुशी का माहौल है। खुशी का माहौल होना भी स्वाभाविक है। क्योंकि राजनीति में पक्ष और विपक्ष दोनों का होना जरूरी होता है। और ऐसा होता भी है क्योंकि बिना विपक्ष के सत्ता पक्ष निश्चित ही बेलगाम हो जाएगा। पक्ष के कार्यों पर विपक्ष उंगलियां उठाता है तथा अपनी कसौटी पर सरकार के द्वारा लिए गए फैसलों की आलोचना करते हुए उन्हें जन विरोधी साबित करने का पैतरा अपनाता है। राजनीति के क्षेत्र में पक्ष और विपक्ष दोनों का अपना-अपना कार्य है।


किसान कानून बिल वापसी की घोषणा होते ही विपक्षी पार्टियों की वैचारिक जीत हुई जिसे सभी विपक्षी पार्टियाँ अपने-अपने अनुसार गढ़ने का प्रयास कर रही हैं। साथ ही किसानों के प्रति सहानुभूति दिखाकर किसानों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करती हुई दिखाई दे रही हैं। विपक्षी पार्टियों को अवसर भी बैठे बैठाए मिल गया जिसे नकारा नहीं जा सकता। क्योंकि सरकार अगर बिल न लाती तो किसान आंदोलनरत न होते जब किसान आंदोलनरत न होते तो विपक्ष को यह मुद्दा न मिलता। परन्तु यह राजनीति का रूप है यह तो चलता रहेगा। परन्तु विरोध का मुख्य कारण और भी घातक है क्योंकि भाजपा के कुछ नेताओं के द्वारा गैर जिम्मेदाराना रवैया जिस प्रकार से अपनाया गया वह बहुत ही चिंताजनक है। कुछ नेताओं के द्वारा जिस प्रकार से मुँह खोला गया वह जगजाहिर है। किसानों को कभी खालिस्तानी तो कभी आंदोलन जीवी कहा गया। लाल किले पर हुए अमर्यादित उपद्रव को भी देश ने देखा जिसका दृश्य अत्यंत दुखद है। भले ही इसके पीछे कोई भी व्यक्ति अथवा रूप हो परन्तु लालकिला हमारी राष्ट्रीय धरोहर है। इसका हृदय की आंतरिम आत्मा से सदैव सम्मान करना चाहिए। न कि देश के गौरव एवं मान-सम्मान के प्रतीक का इस तरह राजनीतिक दुष्प्रयोग। इस प्रकार का राजनीतिक दुरुपयोग किया जाना अत्यन्त घिनौना कार्य है। ऐसा कदापि नहीं करना चाहिए। सियासत, सत्ता, राजनीति होती रहेगी। आंदोलन भी सत्ता का ही एक हिस्सा है। जब सरकार बनेगी, फैसले लेगी तो सहयोग तथा विरोध दोनों होते रहेंगे। हमें राष्ट्र के गौरव को प्रथमिकता देनी चाहिए। राजनीति के भी मानक तय होने चाहिए। 


परन्तु किसान बिल वापसी पर जहाँ विपक्ष ढ़ोल-नगाड़े बजा रहा है। सरकार की नीति को फेल होने की बात विपक्ष कह रहा है। विपक्ष की खुशी यह ज्यादा दिन टिकने वाली नहीं है। विपक्ष को यह समझ लेना चाहिए कि सरकार ने किस उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह कार्य किया है। सरकार के द्वारा उठाए गए कदम को समझने की जरूरत है। किसी भी क्षेत्र में बुद्धिजीवियों के द्वारा अधिक उत्सुकता हानिकारक साबित हो सकती है। मैं अपने अनुभव तथा समझ के अनुसार स्पष्ट कर दूँ कि सरकार के द्वारा उठाया गया यह कदम एक तीर से कई निशाने को साधता हुआ दिखाई दे रहा है। जिसके परिणाम भविष्य में धरातल पर एक के बाद एक दिखाई देंगे।


राजनीति में जहाँ तक मेरी समझ है तो मेरी समझ के अनुसार सरकार ने बिल वासपी का फैसला लेकर उत्तर प्रदेश के चुनाव में विपक्षी पार्टियों के हाथ से मुद्दा छीन लिया। यह अलग बात है कि बिल भाजपा सरकार के द्वारा ही लाया गया और भाजपा सरकार ने ही बिल को वापस लिया जिससे नीति पर प्रश्न चिन्ह विपक्ष लगा सकता है। विपक्ष के द्वारा नीति पर प्रश्न चिन्ह उठाकर उसे चुनावी मुद्दा बनाना स्वाभाविक है। विपक्ष बिलकुल यह कह सकता है कि सरकार ने चुनाव में हार के डर से अपने कदमों को पीछे खीच लिया। परन्तु यह भी सत्य है कि सरकार के द्वारा उठाए गए कदम से भाजपा का वोट बैंक अब बिखरने से बच सकता है। खास करके स्वयं भाजपा पार्टी के अंदर भी इस बिल को लेकर दबी जुबन में एक स्वर उठ रहा था निश्चित ही अब उस पर भी पूर्ण विराम लग गया। अब उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा मजबूती के साथ जाएगी। ऐसा निश्चित है।


इस बिल के वापसी को लेकर भाजपा का निकट भविष्य में सबसे बड़ा दाँव यह होने जा रहा है। जिसका मुख्य टारगेट पंजाब चुनाव में दिखाई देगा। पंजाब के चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने एक बड़ा फैसला लिया है। भापजा कांग्रेस के हाथ से पंजाब को मुक्ति दिलाकर कमल खिलाना चाह रही है। जिसमें सिख समुदाय मुख्य भूमिका में है। बिना बिल वापसी के सिखों को अपने साथ जोड़ा नहीं जा सकता साथ ही नए गठबंधन के रूप में अगर पंजाब में भाजपा को प्रवेश करना है। तो सिख समुदाय को साथ लेकर चलना पंजाब की सियासत में बहुत ही आवश्यक है बिना सिख समुदाय के पंजाब में कमल खिला पाना भापजा के लिए पूरी तरह से नामुमकिन है। इसलिए देश के प्रधानमंत्री ने सही टाईमिंग की प्रतीक्षा की। टाईमिंग के अनुसार आने वाले समय का इंतेजार किया। सिख समुदाय के सबसे बड़े दिन प्रकाश पर्व के दिन यह घोषणा की जिससे के संदेश पूरी तरह से सही टाईमिंग के साथ सही जगह तक पहुँच जाए। निश्चित प्रधानमंत्री के द्वारा प्रयोग की गई हुई टाईमिंग पूरी तरह से साफ एवं स्पष्ट है जिसे समझने की आवश्यकता है। इसलिए विपक्ष को हो हल्ला करने के साथ-साथ बुद्धि का भी प्रयोग करना चाहिए अन्यथा उत्तर प्रदेश तथा पंजाब के चुनाव में विपक्ष की रणनीति फेल होना तय है। क्योंकि अधिक उत्साह एवं जोश अधिक दिन टिकने वाले नहीं होते। 


नाराज पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपनी अलग लाईन खींच ली है। जिसमें कैप्टन तथा भाजपा की अपनी जरूरत एवं सियासी हित सामने हैं। कैप्टन अकेले दम पर कांग्रेस को पंजाब की सत्ता से पूरी तरह से बेदखल नहीं कर सकते क्योंकि कैप्टल कांग्रेस से निकलकर आए हैं। तो कैप्टन जो भी सियासी सेंधमारी करेंगे वह सेंधमारी कांग्रेस पार्टी में कर पाएंगे। अगर भाजपा की बात की जाए तो भाजपा भी अकाली के साथ जाकर पंजाब में अपनी किस्मत आजमा चुकी है। इसलिए भाजपा को भी पंजाब में अमरेन्दर सिंह के रूप में एक बड़ा चेहरा मिलता हुआ दिखाई दे रहा है। जोकि पंजाब के चुनाव में सबसे बड़ा टर्निंग प्वाईन्ट हो सकता है। जिसके कई रूप हैं एक बिन्दु तो यह कि कैप्टन सरदार बिरादरी से आते हैं। दूसरा यह कि कैप्टन भाजपा का मुख्य मुद्दा राष्ट्रवाद की गणित पर फिट बैठते हैं। तीसरा सबसे बड़ा मुद्दा यह कि कैप्टन एक बड़ा चेहरा हैं जिनकी छवि पंजाब में एक धाकड़ मुख्यमंत्री के रूप में है। चौथा सबसे बड़ा टर्निगं प्वाइंट यह है कि कैप्टन मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस से आते हैं। जोकि पंजाब की मौजूदा सरकार में है। इसलिए कैप्टन भाजपा के लिए प्रत्येक बिंदु पर पूरी तरह से फिट बैठते हुए दिखाई दे रहे हैं। अमरेन्दर पंजाब के सियासी वातावरण में भाजपा के लिए पूरी तरह से फिट बैठेंगे।    


अवगत करा दें कि जिस दिन कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि वह कांग्रेस छोड़ रहे हैं लेकिन भाजपा में शामिल नहीं होंगे, उसी दिन यह संकेत मिल गया था कि अब कृषि कानूनों पर मोदी सरकार का पुनर्विचार करना स्वाभाविक है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के पंजाब का मुख्यमंत्री रहते हुए खुद भाजपा ने उन पर आरोप लगाया था कि दिल्ली की सीमाओं पर पंजाब के किसानों को भेजने के पीछे कैप्टन ही हैं। इसलिए भाजपा के कृषि कानूनों की वापसी के पीछे कैप्टन को अगर खुल कर श्रेय दिया जाए तो हैरानी नहीं होगी। इसी मुद्दे पर बीजेपी से अलग हुए अकाली दल के लिए भी अब भाजपा के साथ वापस आने में ज्यादा परेशानी नहीं होगी, खासतौर से चुनाव के बाद जरूरत पड़ने पर भाजपा अकाली दल के साथ भी आसानी से पुनः जा सकती है। क्योंकि सियासत में कोई न दुश्मन होता है और न ही कोई दोस्त। सियासत में सारा खेल समीकरण पर ही निर्भर करता है। इसलिए भाजपा कैप्टन अमरेन्दर सिंह के साथ पुनः अकाली दल के साथ आसानी के साथ जा सकती है जिससे पंजाब की राजनीति में भारी बदलाव दिखाई दे रहा है।


अतः प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा किसान बिल वापसी के क्षेत्र में उठाया गया यह कदम उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पंजाब की धरती पर नई बिसात बिछाता हुआ दिखाई दे रहा है। जिसे समझने की आवश्यकता है। क्योंकि राजनीति में जब बड़े लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं तो निश्चित ही छोटे लक्ष्यों को दरकिनार करना पड़ता है। इसलिए प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पंजाब का लक्ष्य निर्धारित कर दिया है। किसान बिल वापसी से कैप्टन अमरेंदर सिंह को भाजपा के साथ जनता के बीच जाने में किसी तरह की हिचक नहीं होगी। साथ ही अकाली दल भी गठबंधन का पुनः हिस्सा बन सकता है। 

-सज्जाद हैदर-

(वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्र चिंतक)






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आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों के परिजनों को नौकरी देने की मांग

ग्रेटर नोएडा : केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन नए कृषि बिलों का विरोध सबसे पहले आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने किया था। किसानों की आवाज को आप ने प्रमुखता से उठाया और लगातार किसानों का साथ दिया। किसानों के आंदोलन और पार्टी के विरोध के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसान विरोधी तीनों ने कृषि बिलों को वापस लेना पड़ा है। यह बात आप के जिलाध्यक्ष भूपेंद्र जादौन ने कही।

 सेक्टर-93 गेझा गांव में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए जिलाध्यक्ष ने कहा कि तीनों नए कृषि बिलों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वापस लेने की घोषणा करना सत्य की जीत हुई है। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन के दौरान 700 से ज्यादा किसानों ने अपने प्राण गवाएं हैं। उन सभी को शहीद का दर्जा और उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी मिलनी चाहिए।


 नोएडा प्रभारी प्रत्याशी पंकज अवाना ने कहा कि उत्तर प्रदेश में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने पर दिल्ली मॉडल को पूर्णता लागू किया जाएगा। इस मौके पर राजेंद्र भूढ़ा, नितिन प्रजापति, विपुल जौहरी, पवन भूढ़ा, हैप्पी अवाना, सोनू अवाना, नितिन प्रधान, संदीप अवाना, रोहित अवाना, बिट्टू अवाना, नीरज गुर्जर, अनिल पाल, रवि, सोनू ,लोहिया आदि मौजूद थे।




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किसानों के सत्याग्रह ने अहंकार को झुकाया, दोबारा ‘दुस्साहस’ नहीं करें प्रधानमंत्री: राहुल

नई दिल्ली : कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों को निरस्त किए जाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद शुक्रवार को कहा कि देश के अन्नदाताओं ने अपने सत्याग्रह से सरकार के अहंकार को झुका दिया है और अब प्रधानमंत्री मोदी को आगे ऐसा ‘दुस्साहस’ नहीं करना चाहिए।


किसानों-मजदूरों के नाम लिखे खुले पत्र में राहुल गांधी ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री को अगले साल तक किसानों की आय दोगुनी करने का खाका सामने रखना चाहिए।


कांग्रेस नेता ने पत्र में कहा, ‘‘आपके तप, संघर्ष और बलिदान के दम पर मिली ऐतिहासिक जीत की बहुत-बहुत बधाई। करीब 12 महीने से ठिठुरती ठंड, भीषण गर्मी, बरसात, तमाम परेशानियों व जुल्मों के बावजूद तीनों खेती विरोधी काले कानूनों को खत्म कराने का जो सत्याग्रह आपने जीता है, उसकी दूसरी मिसाल आजाद भारत के इतिहास में नहीं मिलती। मैं आपके इस संघर्ष में 700 से अधिक किसान-मज़दूर भाई-बहनों द्वारा दी गई कुर्बानी के लिए नतमस्तक हूं।’’


उन्होंने जोर देकर कहा, ‘‘एक तानाशाह शासक के अहंकार से लड़ते हुए जिस गांधीवादी तरीके से आपने उन्हें फैसला वापस लेने को मजबूर किया, यह असत्य पर सत्य की विजय का एक बेजोड़ उदाहरण है।’’


राहुल गांधी के मुताबिक, ‘‘आज के इस ऐतिहासिक दिन हम उन शहीद किसान-मज़दूर भाई-बहनों को याद करते हैं, जिन्होंने अपनी जान का बलिदान देकर इस सत्याग्रह को मजबूत किया। काश, ये नौबत ही न आती, अगर केंद्र सरकार ने शुरू ही में किसानों की मांगों पर ध्यान दिया होता।’’


उन्होंने किसानों का आह्वान किया, ‘‘साथियों, संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। कृषि उपज का लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य मिले, विवादास्पद बिजली संशोधन कानून खत्म हो, खेती की जोत में इस्तेमाल होने वाली हर चीज़ पर लगाए गए टैक्स का बोझ घटे, डीज़ल के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि कम हो तथा खेत-मज़दूर पर कमरतोड़ कर्ज के बोझ का हल निकालना खेतिहर किसान के संघर्ष के गंभीर विषय हैं।’’


कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘मैं आप सबको भरोसा दिलाता हूं कि मौजूदा आंदोलन की ही भांति भविष्य में भी आपके सभी जायज संघर्षों में मैं और कांग्रेस पार्टी का एक-एक कार्यकर्ता आपके कंधे से कंधा मिलाकर आपकी आवाज को बुलंद करेंगे।’’


राहुल गांधी ने कहा, ‘‘मैं प्रधानमंत्री से मांग करता हूं कि किसान अपना फ़ायदा और नुकसान सबसे बेहतर समझता है। चंद पूंजीपतियों के हाथ में खेलकर किसान को अपने ही खेत-खलिहान में गुलाम बनाने की साजिश कर व उसे (फैसले) सही साबित करने का दोबारा दुस्साहस न करें।’’


उन्होंने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री को अपने वादे के मुताबिक साल 2022 तक किसान की दोगुनी आय सुनिश्चित करनी चाहिए। इसके लिए उन्हें जल्दी से जल्दी भविष्य की योजनाओं का रोडमैप भी जारी करना चाहिए।’’


इससे पहले उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘देश के अन्नदाता ने अपने सत्याग्रह से अहंकार का सिर झुका दिया। अन्याय के खिलाफ़ यह जीत मुबारक हो! जय हिंद, जय हिंद का किसान!’’


राहुल गांधी ने कृषि कानूनों के खिलाफ कुछ महीने पहले पंजाब में निकाली गई अपनी एक यात्रा से संबंधित, जनवरी महीने के अपने उस बयान का एक वीडियो भी साझा किया जिसमें उन्होंने दावा किया था कि केंद्र सरकार एक दिन ये कानून वापस लेने को मजबूर होगी।


कांग्रेस नेता ने एक अन्य ट्वीट में कहा, ‘‘जीत उनकी भी है, जो लौट के घर ना आए…हार उनकी ही है, जो अन्नदाताओं की जान बचा ना पाए…।’’ उन्होंने किसान आंदोलन के दौरान अलग अलग मौकों पर घायल हुए किसानों से जुड़ा एक वीडियो भी साझा किया।


उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले करीब एक वर्ष से अधिक समय से विवादों में घिरे तीन कृषि कानूनों को निरस्त किए जाने के फैसले की शुक्रवार को घोषणा की। उन्होंने कहा कि इन कानूनों को निरस्त करने की संवैधानिक प्रक्रिया संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पूरी कर ली जाएगी।


ज्ञात हो कि पिछले लगभग एक साल से कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून, कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार कानून और आवश्यक वस्तु संशोधन कानून, 2020 के खिलाफ विभिन्न राज्यों व राजधानी दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर किसान संगठन आंदोलन कर रहे हैं।



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कृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले का कई फिल्मी हस्तियों ने किया स्वागत

मुंबई : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीत केन्द्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले का सोनू सूद, उर्मिला मातोंडकर, तापसी पन्नू और ऋचा चड्ढा सहित कई हस्तियों ने शुक्रवार को स्वागत किया।


हजारों किसान कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून, कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत अश्वासन और कृषि सेवा करार कानून और आवश्यक वस्तु संशोधन कानून, 2020 के खिलाफ पिछले करीब एक साल से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं। साथ ही, वे फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी की मांग भी कर रहे हैं। सरकार और किसानों के बीच इन मुद्दों पर कई दौर की बातचीत बेनतीजा रही थी।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को गुरु नानक जयंती के अवसर पर राष्ट्र के नाम संबोधन में तीन कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की घोषणा की और कहा कि इसके लिए संसद के आगामी सत्र में विधेयक लाया जाएगा। प्रधानमंत्री ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से जुड़े मुद्दों पर एक समिति बनाने की भी घोषणा की।


मोदी ने कहा, '' आज, मैं आप सभी को बताना चाहता हूं कि हम तीनों कृषि कानून वापस ले रहे हैं।''


इस घोषणा के बाद कई फिल्मी हस्तियों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया।


अभिनेता सोनू सूद ने इसे एक बेहतरीन खबर बताया और ना केवल प्रधानमंत्री का बल्कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए किसानों का भी शुक्रिया अदा किया।


उन्होंने ट्वीट किया, '' यह एक बेहतरीन खबर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, कृषि कानून वापस लेने के लिए आपका धन्यवाद। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान केवल अपनी मांगे उठाने के लिए किसानों का भी शुक्रिया। उम्मीद है कि आप सभी आज गुरु नानक देव जी की जयंती पर मनाए जाने वाले प्रकाश पर्व पर खुशी से अपने परिवारों के पास लौट जाएंगे।''


किसानों की तस्वीर साझा करते हुए अभिनेत्री एवं राजनेता उर्मिला मातोंडकर ने ट्वीट किया, '' जीत की ख़ातिर जुनून चाहिए, जिसमे उबाल हो ऐसा खून चाहिए, ये आसमान भी आएगा जमीन पर, बस इरादों मे जीत की गूंज चाहिए। किसान आंदोलन जिंदाबाद, किसान बहन-भाईयों को मुबारक, शहीद किसानों को नमन। जयकिसान ।''


रिचा चड्डा ने भी किसान समर्थक टी-शर्ट पहने एक तस्वीर साझा की और लिखा, '' सरबत दा भला (सबका भला हो)।''


तापसी पन्नू ने एक न्यूज क्लिप साझा की, जिसमें प्रधानमंत्री तीन कानून वापस लिए जाने की घोषणा करते नजर आ रहे हैं। साथ ही उन्होंने लिखा, '' इसके साथ ही गुरु पर्व की भी सभी को बधाई।''


अभिनेत्री गुल पनाग ने कहा कि यह भविष्य की सरकारों के लिए एक सबक है कि कोई भी सुधार लाते समय सभी हितधारकों की राय लें। उन्होंने ट्वीट किया, '' काश, हमने गतिरोध को इतना लंबा नहीं चलने दिया होता, इससे कई लोगों की जान गई...किसान आंदोलन तथा प्रदर्शनकारियों को नीचा दिखाया गया, उनका अपमान किया गया। यह भविष्य की सरकारों के लिए एक सबक है कि सुधार लाते समय सभी हितधारकों की राय भी लें। साथ ही, कानून बनाने वालों के लिए भी सबक है कि बिना बहस एवं चर्चा के कुछ ही मिनट में कानून पारित ना करें... विधायी प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।''


उन्होंने किसानों को कथित ताौर पर गुंडा, देशद्रोही, आतंकवादी कहे जाने पर भी नाराजगी व्यक्त की और कहा कि इसे ना भुलाया जा सकता है और ना माफ किया जाएगा।


दिया मिर्जा ने ट्वीट किया, '' जय किसान। #गुरु पर्व ।''


आंदोलन के दौरान, पन्नू, चड्ढा, प्रियंका चोपड़ा जोनास, सोनम कपूर आहूजा, प्रीति जिंटा, स्वरा भास्कर, दिलजीत दोसांझ, रितेश देशमुख, निर्देशक हंसल मेहता, हरभजन मान, जसबीर जस्सी जैसी कई हस्तियों ने सोशल मीडिया पर किसानों के साथ एकजुटता व्यक्त की थी।


मान, कंवर ग्रेवाल, हर्फ चीमा, बब्बू मान, जस बाजवा, हिम्मत संदू, आर नायत, अनमोल गगन सहित कई पंजाबी गायकों तथा अभिनेता ने किसानों के आंदोलन के प्रति एकजुटता दिखाते हुए गीत भी लिखे।





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तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन का घटनाक्रम

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुक्रवार को तीन विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा से सरकार और किसानों के बीच साल भर से चल रहा टकराव खत्म होने की उम्मीद बनी है। कृषि कानूनों के विरुद्ध इस आंदोलन में 700 से अधिक किसानों की मौत हो चुकी है।


इन तीन कानूनों ने यह चिंता पैदा की कि इससे चुनिंदा फैसलों पर सरकार द्वारा दी गई न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी खत्म हो जाएगी और किसान बड़े उद्योगपतियों की दया पर छोड़ दिए जाएंगे।


इन कानूनों की घोषणा किए जाने के बाद से ही हजारों किसान इन्हें निरस्त करने की मांग को लेकर दिल्ली की सीमाओं पर जुटने लगे, जिसके कारण शिरोमणि अकाली दल को केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार से अलग होना पड़ा। इन प्रदर्शनों पर युवा पर्यावरणविद ग्रेटा थनबर्ग, गायिका-कार्यकर्ता रिहाना और वकील-लेखिका मीना हैरिस ने भी प्रतिक्रिया दी जो अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी हैं।


इन कानूनों को लाए जाने के बाद के घटनाएं इस प्रकार हैं :


पांच जून 2020 : सरकार ने तीन कृषि विधेयकों की घोषणा की।


14 सितंबर 2020 : तीन कृषि कानूनों के विधेयक संसद में लाए गए।


17 सितंबर 2020 : लोकसभा में विधेयक पारित।


20 सितंबर 2020 : राज्यसभा में ध्वनि मत से विधेयक पारित ।


24 सितंबर 2020 : पंजाब में किसानों ने तीन दिन के रेल रोको आंदोलन की घोषणा की।


25 सितंबर 2020 : अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के आह्वान पर देशभर के किसान प्रदर्शन में जुटे।


26 सितंबर 2020 : शिरोमणि अकाली दल (शिअद) ने कृषि विधेयकों पर भाजपा नीत राजग छोड़ा।


27 सितंबर 2020 : कृषि विधेयकों को राष्ट्रपति ने मंजूरी दी और भारत के गजट में अधिसूचित करने के साथ ये कृषि कानून बने।


25 नवंबर 2020 : पंजाब और हरियाणा में किसान संघों ने ‘दिल्ली चलो’ आंदोलन का आह्वान किया, दिल्ली पुलिस ने कोविड-19 के कारण अनुमति नहीं दी।


26 नवंबर 2020 : दिल्ली की ओर मार्च करने वाले किसानों को हरियाणा के अंबाला जिले में पुलिस ने खदेड़ने की कोशिश की, किसानों ने पानी की बौछारों, आंसू गैस का सामना किया।


28 नवंबर 2020 : गृह मंत्री अमित शाह ने किसान नेताओं से पेशकश की कि अगर वे दिल्ली की सीमाओं को खाली करते हैं और बुराड़ी में निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर जाते हैं तो जल्द ही उनसे बातचीत की जाएगी। हालांकि, किसानों ने इस पेशकश को ठुकरा दिया।


तीन दिसंबर 2020 : सरकार ने किसानों के प्रतिनिधियों के साथ पहले चरण की वार्ता की, लेकिन बैठक बेनतीजा रही।


पांच दिसंबर 2020 : किसानों और केंद्र के बीच दूसरे चरण की वार्ता भी बेनतीजा रही।


आठ दिसंबर 2020 : किसानों ने भारत बंद का आह्वान किया। अन्य राज्यों के किसानों ने भी उन्हें समर्थन दिया।


नौ दिसंबर 2020 : किसान नेताओं ने तीन विवादास्पद कानूनों में संशोधन के केंद्र सरकार के प्रस्ताव को खारिज कर दिया।


11 दिसंबर 2020 : भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने कृषि कानूनों के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख किया।


13 दिसंबर 2020 : केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया कि किसानों के प्रदर्शन में ‘टुकड़े टुकड़े’ गिरोह का हाथ है।


30 दिसंबर 2020 : सरकार और किसान नेताओं के बीच छठे दौर की वार्ता कुछ आगे बढ़ती दिखी।


चार जनवरी 2021 : सरकार और किसान नेताओं के बीच सातवें दौर की वार्ता भी बेनतीजा रही, केंद्र कृषि कानूनों को निरस्त करने पर राजी नहीं हुआ।


सात जनवरी 2021 : उच्चतम न्यायालय नए कानूनों को चुनौती देने वाली और प्रदर्शनों के खिलाफ याचिकाओं पर 11 जनवरी को सुनवाई के लिए राजी हो गया।


11 जनवरी 2021 : उच्चतम न्यायालय ने किसानों के प्रदर्शन से निपटने के तरीके को लेकर केंद्र की खिंचाई की।


12 जनवरी 2021 : उच्चतम न्यायालय ने कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगायी, कानूनों पर सिफारिशें देने के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की।


26 जनवरी 2021 : गणतंत्र दिवस पर किसान संघों द्वारा बुलाई ट्रैक्टर परेड के दौरान हजारों प्रदर्शनकारियों की पुलिस के साथ झड़प हुई। लाल किले पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गयी।


29 जनवरी 2021 : सरकार ने डेढ़ वर्षों के लिए कृषि कानूनों को स्थगित करने और कानून पर चर्चा के लिए संयुक्त समिति गठित करने का प्रस्ताव दिया। किसानों ने प्रस्ताव ठुकरा दिया।


पांच फरवरी 2021 : दिल्ली पुलिस की साइबर अपराध शाखा ने किसान प्रदर्शनों पर एक ‘टूलकिट’ बनाने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की, जिसे युवा पर्यावरणविद ग्रेटा थनबर्ग ने साझा किया था।


छह फरवरी 2021 : प्रदर्शनरत किसानों ने दोपहर 12 बजे से तीन बजे तक तीन घंटों के लिए देशव्यापी ‘चक्का जाम’ किया।


छह मार्च 2021 : किसानों को दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन करते हुए 100 दिन पूरे हुए।


आठ मार्च 2021 : सिंघु बॉर्डर प्रदर्शन स्थल के समीप गोलियां चली। कोई घायल नहीं हुआ।


15 अप्रैल 2021 : हरियाणा के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उनसे किसानों के साथ वार्ता बहाल करने का अनुरोध किया।


27 मई 2021 : किसानों ने आंदोलन के छह महीने पूरे होने पर ‘काला दिन’ मनाया और सरकार के पुतले जलाए।


पांच जून 2021 : प्रदर्शनरत किसानों ने कृषि कानूनों की घोषणा के एक साल होने पर संपूर्ण क्रांतिकारी दिवस मनाया।


26 जून 2021 : किसानों ने कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन के सात महीने होने पर दिल्ली की ओर मार्च किया।


22 जुलाई 2021 : करीब 200 प्रदर्शनरत किसानों ने ‘‘मानसून सत्र’’ की तरह संसद भवन के समीप किसान संसद शुरू की।


सात अगस्त 2021 : 14 विपक्षी दलों के नेताओं ने संसद भवन में मुलाकात की और दिल्ली के जंतर मंतर में किसान संसद में जाने का फैसला लिया।


पांच सितंबर 2021 : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कुछ महीने बाकी रहने पर भाजपा नीत राजग को चुनौती देते हुए किसान नेताओं ने मुजफ्फरनगर में ताकत का बड़ा प्रदर्शन किया।


22 अक्टूबर 2021 : उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वह उसके विचाराधीन मामलों पर भी प्रदर्शन करने के लोगों के अधिकार के खिलाफ नहीं है लेकिन उसने स्पष्ट किया कि ऐसे प्रदर्शनकारी अनिश्चितकाल तक सड़कों को बंद नहीं कर सकते।


29 अक्टूबर 2021 : दिल्ली पुलिस ने गाजीपुर सीमा से अवरोधक हटाने शुरू किए, जहां केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ किसान प्रदर्शन कर रहे हैं।


19 नवंबर 2021 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की।








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कृषि कानूनों की वापसी लोगों के संघर्ष की जीत, प्रधानमंत्री को माफी मांगनी चाहिए : वामपंथी दल

नई दिल्ली : वामपंथी दलों ने शुक्रवार को कहा कि तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने का सरकार का निर्णय लोगों के संघर्ष की जीत है और कहा कि इस सरकार की कथित जनविरोधी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन की यह शुरुआत भर है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार की सुबह देश को संबोधित करते हुए घोषणा की कि वह तीनों कृषि कानूनों को वापस ले रहे हैं।


माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने प्रदर्शन के दौरान किसानों की मौत पर मोदी से माफी मांगने के लिए कहा।


येचुरी ने एक ट्वीट में कहा, ‘‘अपनी जिद के कारण मोदी ने ‘अन्नदाताओं’ की मौत को लेकर कोई अफसोस नहीं जताया। मोदी अब भी इन कृषि कानूनों को उचित ठहरा रहे हैं। इस ऐतिहासिक, प्रेरणादायक और बहादुरी वाले संघर्ष से वह कुछ नहीं सीखना चाहते।’’


उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘सरकार और इसकी एजेंसियों द्वारा ‘फर्जी’ मामलों के माध्यम से निशाना बनाए गए लोगों के लिए न्याय का संघर्ष जारी रहेगा। अपने ‘क्रोनी’ व्यवसायी सहयोगियों के फायदे के लिए कृषि कानूनों का ‘तानाशाही’ कदम उठाने के कारण हुई परेशानियां के लिए प्रधानमंत्री को माफी मांगनी चाहिए।’’


भाकपा के सांसद बिनय विस्वम ने एक वीडियो संदेश में कहा कि किसानों ने सरकार के खिलाफ लड़ाई जीती है और आरोप लगाया कि सरकार ‘‘कृषि क्षेत्र को कॉरपोरेट के हवाले कर रही थी।’’


उन्होंने कहा, ‘‘यह भारत के लोगों के लिए जीत का क्षण है। भारतीय कृषि क्षेत्र को कॉरपोरेट लूट से बचाने के लिए किसान लड़े और जीते। उन्होंने उस सरकार को हरा दिया जो भारतीय कृषि क्षेत्र को कॉरपोरेट क्षेत्र को सौंपने जा रही थी... लोगों की जान जाने और कठिनाईयों का सामना करने के बावजूद उन्होंने भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए जंग की । अंतत: मोदी सरकार इसे वापस लेने के लिए बाध्य हुई क्योंकि उसके पास कोई और विकल्प नहीं था।’’


भाकपा- माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘किसानों ने ‘सत्ता के नशे में चूर घमंडी’ मोदी सरकार को अब तक का सबसे बड़ा झटका दिया है। जीत का जश्न मनाइए, आंदोलन को और आगे ले जाइए।’’


तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मोदी सरकार की घोषणा का स्वागत करते हुए आंदोलनरत किसान संगठनों के संघ संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने कहा कि वह इंतजार करेगा कि घोषणा को संसदीय प्रक्रिया द्वारा प्रभावी किया जाए। साथ ही कहा कि उनकी अन्य मांगें अब भी लंबित हैं।



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केन्द्र सरकार को यह फैसला बहुत पहले ले लेना चाहिए था: मायावती

लखनऊ :  बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने तीन कृषि कानून वापस लिये जाने के केन्द्र के फैसले पर शुक्रवार को किसानों को बधाई दी और कहा कि सरकार को यह फैसला बहुत पहले ले लेना चाहिए था।


बसपा प्रमुख ने किसान आंदोलन के दौरान मारे गये किसानों के परिवारों को आर्थिक सहायता और उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की भी मांग की ।


मायावती ने संवाददाताओं से कहा, '' किसानों का बलिदान रंग लाया, सरकार ने अंत में तीन विवादास्पद कानूनों को वापस ले लिया, हालांकि इसकी घोषणा बहुत देर से की गई। तीन कृषि कानून वापस लेने का फैसला केंद्र सरकार को बहुत पहले ले लेना चाहिए था। देश के समस्त किसानों को हार्दिक बधाई ।''


उन्होंने कहा, ''यदि यह फैसला केंद्र सरकार पहले ले लेती तो देश अनेक प्रकार के झगड़ों व झंझटों से बच जाता, लेकिन अभी भी किसानों की उनकी उपज के मूल्य से संबंधित कानून बनाने की मांग अधूरी है, बहुजन समाज पार्टी की मांग है कि केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में इस संबंध में कानून बनाकर किसानों की इस मांग को पूरा करे।''


उन्होंने कहा, '' बसपा की यह शुरू से ही मांग रही है कि खेती, किसानी के और किसानों के मामले में कोई भी नया कानून बनाने से पहले किसानों से परामर्श जरूर लिया जाना चाहिए, ताकि किसी भी गैर जरूरी विवाद से देश को व राज्यों को बचाया जा सके।''


मायावती ने कहा, ''एक बार फिर देश के किसानों को उनके संघर्ष के जरिए मिली इस जीत के लिये मैं उन्हें तहेदिल से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें देती हूं । मैं केंद्र सरकार से यह भी कहना चाहूंगी कि किसानों के इस आंदोलन के दौरान जो किसान शहीद हुए, उनके परिवारों को केंद्र सरकार उचित आर्थिक मदद दे और उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दे।''


गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले करीब एक वर्ष से अधिक समय से विवादों में घिरे तीन कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की शुक्रवार को घोषणा की।



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मोदी जी, आपकी नीयत और बदलते रुख पर विश्वास करना मुश्किल है: प्रियंका गांधी

नई दिल्ली : कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाद्रा ने तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों को निरस्त करने से जुड़ी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद शुक्रवार को कहा कि चुनाव में आसन्न हार को देखते हुए प्रधानमंत्री को सच्चाई समझ आने लगी है, लेकिन उनकी नीयत एवं बदलते रुख पर विश्वास करना मुश्किल है।


उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘600 से अधिक किसानों की शहादत 350 से अधिक दिन का संघर्ष, नरेंद्र मोदी जी आपके मंत्री के बेटे ने किसानों को कुचल कर मार डाला, आपको कोई परवाह नहीं थी। आपकी पार्टी के नेताओं ने किसानों का अपमान करते हुए उन्हें आतंकवादी, देशद्रोही, गुंडे, उपद्रवी कहा, आपने खुद आंदोलनजीवी बोला।’’


कांग्रेस की उत्तर प्रदेश प्रभारी ने कहा, ‘‘किसानों पर लाठियां बरसायीं, उन्हें गिरफ़्तार किया। अब चुनाव में हार दिखने लगी तो आपको अचानक इस देश की सच्चाई समझ में आने लगी - कि यह देश किसानों ने बनाया है, यह देश किसानों का है, किसान ही इस देश का सच्चा रखवाला है और कोई सरकार किसानों के हित को कुचलकर इस देश को नहीं चला सकती।’’


उन्होंने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा, ‘‘आपकी नीयत और आपके बदलते हुए रुख़ पर विश्वास करना मुश्किल है। किसान की सदैव जय होगी। जय जवान, जय किसान, जय भारत।’’


उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले करीब एक वर्ष से अधिक समय से विवादों में घिरे तीन कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की घोषणा की और कहा कि इसके लिए संसद के आगामी सत्र में विधेयक लाया जाएगा। तीनों कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन कर रहे थे। 





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किसानों की जीत, देश की जीत है : रालोद प्रमुख जयंत चौधरी

नई दिल्ली  : राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के प्रमुख जयंत चौधरी ने तीन केंद्रीय कृषि कानूनों को निरस्त करने के सरकार के निर्णय के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद शुक्रवार को कहा कि किसानों की जीत देश की जीत है।


इससे पूर्व आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने के निर्णय की घोषणा की। किसान पिछले वर्ष से दिल्ली की सीमाओं पर इन कानूनों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।


चौधरी ने हिंदी में ट्वीट किया, ‘‘किसान की जीत, हम सब की है, देश की जीत है!’’


रालोद के ट्विटर हैंडल पर कहा गया, ‘‘यह जीत किसानों के संघर्ष, तप और बलिदान की जीत है। देश के किसानों को बधाई। ’’ पार्टी ने भी किसानों को बधाई दी है।


सैकड़ों किसान दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर इन तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करवाने की मांग पर नंवबर 2020 से धरना दिये हुए बैठे थे। केंद्र और किसान प्रतिनिधियों के बीच 11 दौर की आपैचारिक बातचीत हुई जो बेनतीजा रही। केंद्र ने जहां इन कानूनों को किसान हितैषी बताया था वहीं प्रदर्शनकारी किसानों का कहना था कि ये कानून उन्हें कॉरपोरेट घरानों के आश्रित बना देंगे।




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कृषि कानून निरस्त करने का फैसला : प्रदर्शन स्थलों पर मिठाइयां बांटी गईं

नई दिल्ली : तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त किए जाने के लिए केंद्र सरकार के फैसले की घोषणा के बाद दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों के पास किसानों के प्रदर्शन स्थलों पर कई लोगों ने शुक्रवार को सुबह मिठाइयां बांटी।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन कानूनों को निरस्त करने की घोषणा गुरु नानक जयंती के अवसर पर की है। मोदी ने शुक्रवार को घोषणा की कि सरकार ने तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने का फैसला किया है और उन्होंने प्रदर्शनकारी किसानों से घर लौटने की भी अपील की। किसान इन कानूनों के खिलाफ पिछले करीब एक साल से प्रदर्शन कर रहे हैं।


प्रधानमंत्री ने कहा कि इन कानूनों को निरस्त करने की संवैधानिक प्रक्रिया संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पूरी कर ली जाएगी। उन्होंने कहा, ‘‘मैं आज देशवासियों से क्षमा मांगते हुए सच्चे मन से और पवित्र हृदय से कहना चाहता हूं कि शायद हमारी तपस्या में ही कोई कमी रही होगी, जिसके कारण दिये के प्रकाश जैसा सत्य कुछ किसान भाइयों को हम समझा नहीं पाए हैं।’’


प्रधानमंत्री की इस घोषणा के बाद दिल्ली-उत्तर प्रदेश के गाजीपुर बॉर्डर और दिल्ली-हरियाणा सिंघु बॉर्डर पर लोगों को प्रदर्शनस्थलों पर जलेबी और अन्य मिठाइयां वितरित करते देखा गया।


कई टीवी चैनल और समाचार पोर्टल पर भी वीडियो दिखाए गए, जिनमें लोग टोकरियों में मिठाइयां लेकर प्रदर्शन स्थलों पर लोगों को इन्हें बांटते दिख रहे हैं।


सिखों के प्रथम गुरु नानक देव की जयंती को सिख समुदाय पूरी श्रद्धा और जोश से मनाता है। इस अवसर पर गुरुद्वारों, सार्वजनिक इमारतों और घरों को रोशन किया जाता है।


मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि आज गुरु नानक देव की जयंती है और यह किसी पर दोष लगाने का अवसर नहीं है।


किसान उपज व् यापार एवं वाणिज् य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक, 2020, किसानों (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) का मूल् य आश् वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं विधेयक, 2020 और आवश् यक वस् तु (संशोधन) विधेयक, 2020 के खिलाफ कई किसान नवंबर 2020 से प्रदर्शन कर रहे थे। 








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नोएडा में सांसद के आवास का घेराव करने के आरोप में करीब 600 किसानों के खिलाफ मामला दर्ज

नोएडा (उप्र) : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता और गौतम बुद्ध नगर से सांसद डॉ. महेश शर्मा के आवास का घेराव करने तथा मुख्य मार्ग पर यातायात बाधित करने के आरोप में नोएडा के सेक्टर 20 थाने में करीब 600 किसानों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।


अपर पुलिस उपायुक्त (प्रथम जोन) रणविजय सिंह ने बताया कि 81 गांव के किसान अपनी विभिन्न मांगों को लेकर 64 दिन से नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि किसानों ने मंगलवार को सांसद शर्मा के सेक्टर 15-ए स्थित आवास का घेराव करने की घोषणा की।


सिंह ने बताया कि सांसद के आवास से थोड़ी ही दूरी पर पुलिस ने किसानों को रोक दिया, जिसके बाद किसान सड़क पर ही बैठ गए तथा उन्होंने यातायात बाधित कर दिया।


उन्होंने कहा कि यातायात बाधित होने की वजह से लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि इस मामले में भारतीय किसान परिषद के अध्यक्ष सुखबीर खलीफा समेत करीब 600 लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।


इस बीच, खलीफा ने कहा कि बढ़ी हुए दर से मुआवजा देने तथा विकसित भूखंड देने सहित विभिन्न मांगों को लेकर 81 गांव के किसान 63 दिन से नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन प्राधिकरण ना तो उनकी मांगों को पूरा कर रहा है और ना ही उनसे कोई सकारात्मक वार्ता कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब तक किसानों की मांगें पूरी नहीं होती, उनका धरना प्रदर्शन जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि यहां के अन्य जनप्रतिनिधियों का भी जल्द घेराव किया जाएगा।



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कृषि कानूनों को 26 नवंबर तक रद्द करें, नहीं तो दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन तेज़ किया जाएगा: टिकैत

गाजियाबाद : भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) नेता राकेश टिकैत ने सोमवार को कहा कि केंद्र के पास विवादित कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए 26 नवंबर तक का वक्त है और इसके बाद दिल्ली की सीमाओं पर किए जा रहे विरोध प्रदर्शन को तेज़ किया जाएगा।


केंद्र के तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान दिल्ली के सिंघू, टीकरी और गाज़ीपुर बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे हैं जिसे 26 नवंबर को एक साल पूरा हो जाएगा। इन प्रदर्शनों की अगुवाई संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) कर रहा है जिसमें किसानों के कई संघ शामिल हैं। बीकेयू भी एसकेएम में शामिल है और उसके समर्थक दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर गाज़ीपुर में धरना दे रहे हैं।


बीकेयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता टिकैत ने ट्वीट किया, “ केंद्र सरकार के पास 26 नवंबर तक का समय है। उसके बाद 27 नवंबर से किसान गांवों से ट्रैक्टरों से दिल्ली के चारों तरफ आंदोलन स्थलों पर बॉर्डर पर पहुंचेंगे और पक्की किलेबंदी के साथ आंदोलन और आंदोलन स्थल को मजबूत करेंगे।”


किसानों की मांग है कि केंद्र सरकार तीन कृषि कानूनों-- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम 2020, कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020 तथा आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020 को रद्द करे और फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी देने के लिए कानून बनाए।


केंद्र और किसानों के बीच 11 दौर की बातचीत हो चुकी है लेकिन कोई हल नहीं निकला है। केंद्र सरकार का कहना है कि ये कानून किसानों के हित में हैं जबकि प्रदर्शनकारियों का दावा है कि ये कानून उन्हें उद्योगपतियों के रहमोकरम पर छोड़ देंगे। 




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प्राधिकरण पर धरना देने वाले 800 किसानों के खिलाफ केस

नोएडा : नोएडा प्राधिकरण के कार्यालय पर धरना प्रदर्शन के दौरान कार्यालय के गेट पर ताला लगाने और कर्मचारियों को कार्यालय में बंधक बनाने के मामले में 800 किसानों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। पुलिस ने 38 किसानों को नामजद किया है।


एडीसीपी रणविजय सिंह ने बताया कि नोएडा प्राधिकरण में तैनात हेड कांस्टेबल जितेंद्र प्रसाद की शिकायत पर कार्रवाई की गई है। शिकायत में बताया गया कि किसान परिषद के अध्यक्ष सुखबीर खलीफा, सुधीर चौहान, उदल, सोनू, अंकित, ओमवीर, बिजेंदर सहित 38 आरोपियों समेत करीब 800 अन्य किसानों ने शुक्रवार को नोएडा प्राधिकरण के गेट पर ताला लगा दिया। कार्यालय में तैनात लोगों को बंधक बनाया और सरकारी कार्य में बाधा डाली। पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।


इससे पूर्व भी किसान परिषद के नेताओं के खिलाफ थाना सेक्टर 20 में कई मामले दर्ज हो चुके हैं। आबादी के निस्तारण, बढ़ हुए दर से मुआवजा देने और आवासीय भूखंड आवंटित करने की मांग को लेकर 81 गांव के किसान करीब दो माह से नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। किसान नेता सुखबीर खलीफा ने आरोप लगाया कि नोएडा प्राधिकरण के अधिकारी तानाशाही रवैया अपनाए हुए हैं।




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गालंद/मसूरी डंपिंग ग्राऊंड दिनभर चली अधिकारियों/किसानो की बहस का हल बासित प्रधान ने निकला, फैसला 8 को महापंचायत में लिया जायेगा

पिछले दिनों चले आ रहे मसूरी वह गालंद  गांव के खेतों में नगर निगम द्वारा डंपिंग ग्राउंड को लेकर चल रही बहस के कारण कल दिन भर किसानों व अधिकारियों की बहस चलती रही मामले का हल ना निकलता देख किसान डंपिंग ग्राउंड के सामने सड़क पर ही धरने पर बैठ गए गांव की महिलाएं व बुजुर्गों वे युवाओं ने डंपिंग ग्राउंड के सामने सड़क पर ही बैठ कर कूड़ाघर को लेकर अपना विरोध जताया। 


मौके पर सीओ गाजियाबाद एसडीएम गाजियाबाद नगर निगम अधिकारी नगर आयुक्त गाजियाबाद तहसीलदार सब मौजूद थे दिनभर चली बहस का जब हम ना निकला शाम के समय बासित प्रधान मैं जब अधिकारियों से बातचीत की तब अधिकारियों ने यह कहा कि यहां पर कोई डंपिंग ग्राउंड नहीं बनेगा बस निगम अपनी जमीन को बाउंड्री करके अपना कब्जा लेना चाहता है वह एसडीम गाजियाबाद नें लिखित आश्वासन देने को कहा इस पर गांव वालों ने अपनी मंशा बताते हुए कहा की 8 तारीख को 20 गांव की महापंचायत है उस दिन इस पर निर्णय लिया जाएगा कि नगर निगम को जमीन पर बाउंड्री कराई जाएगी या नहीं अधिकारियों ने बहुत ज्यादा जद्दोजहद के बाद वह बातचीत में बासित प्रधान के आने के उपरांत इस मामले का हल 8 तारीख को होने वाली महापंचायत पर टाल

 दिया।



 गांव वालों ने नारे लगाते हुए डंपिंग ग्राउंड नहीं बनेगा डंपिंग ग्राउंड नहीं बनेगा गाजियाबाद का  कूड़ा यहां नहीं डालेगा इस तरह के नारों से माहौल  गूंज उठा ।


सीओं गाज़ियाबाद  के यह कहने के बाद की यहां कोई भी डंपिंग ग्राउंड नहीं बनेगा यह एक वेस्ट मैनेजमेंट प्लान है जो कचरे को जमा करके बिजली बनती है जिससे गांव का विकास होगा ।


पर गांव वाले इस बात को लेकर अड़े रहे कि यहां कोई भी वेस्ट मैनेजमेंट प्लान नहीं बनेगा हमें कोई भी ऐसा प्लान नहीं चाहिए जिससे कचरा जमा होता हो यहां नहर का पानी शुद्ध है व 50 से ज्यादा स्कूल कॉलेज है हजारों की तादात में बच्चे पढ़ते है जिससे उनके स्वस्थ्य पर बड़ा असर पड़ेगा शाम के समय तक सभी अधिकारी व गांव के निवासियों और बासित प्रधान की मौजूदगी में इस बात पर निर्णय लिया गया कि फैसला 8 तारीख को महापंचायत में दिया जाएगा।


मौजूद निवासी इस तरह से थे

बासित अली ,प्रधान ढ़बारसी गांव जिला हापुड़ व गालंद निवासी

ब्रहमसिंह राणा, राष्ट्रीय महासचिव किसान मजदूर संगठन।

दीपक तोमर युवा जिला उपाध्यक्ष किसान मजदूर संगठन

आशु तोमर युवा जिला अध्यक्ष

मनोज तोमर 

राजीव तोमर

मनोज तोमर एडवोकेट

मुकेश तोमर

दिनेश तोमर

परवीन तोमर

कुस्मवती

दीपक तोमर

श्रवण फौजी

विनोद तोमर

दीपक प्रधान

लंप्पी

कपिल तोमर

दुष्यंत तोमर

पंकज तोमर

राजीव चौहान

विकाश तोमर

संजय प्रधान गालंद

रिपोर्ट आस चौधरी 

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एसीएससी ने किसान प्रदर्शन स्थल पर 'लिंचिंग' के दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को कहा

नई दिल्ली : राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने दिल्ली-हरियाणा सीमा के पास कुंडली में किसानों के प्रदर्शन स्थल पर एक शख्स की भीड़ द्वारा हत्या (लिंचिंग) के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ हरियाणा पुलिस से सख्त कार्रवाई करने को कहा है।


आयोग के प्रमुख विजय सांपला ने हरियाणा पुलिस से शुक्रवार को 24 घंटे के भीतर प्रारंभिक रिपोर्ट भी देने को कहा।


दिल्ली-हरियाणा सीमा के पास कुंडली में किसानों के प्रदर्शन स्थल पर एक व्यक्ति की भीड़ ने हत्या की, उसके हाथ काट दिए और शव को वहां लगे धातु अवरोधक से बांध दिया। इस निर्मम घटना के लिए निहंगों के समूह को जिम्मेदार ठहराया गया है।


सांपला ने कहा कि मृतक की पहचान लखबीर सिंह के तौर पर हुई है जिसका ताल्लुक अनुसूचित जाति के समुदाय से था।


सांपला ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा कि एनसीएससी ने हरियाणा पुलिस से 24 घंटे के भीतर प्रारंभिक रिपोर्ट मांगी है।


सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हुई एक वीडियो क्लिप में, कुछ निहंग जमीन पर खून से लथपथ पड़े व्यक्ति के पास खड़े दिख रहे हैं। क्लिप में निहगों को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि व्यक्ति को सिखों की पवित्र पुस्तक का अपमान करने की सजा दी गई है।


केंद्र के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाप दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि निहंगों के एक समूह ने इस निर्मम हत्या की जिम्मेदारी ली है।





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किसान आंदोलन : सिंघु बार्डर पर एक युवक की बेरहमी से हत्या, हाथ काटकर शव बैरिकेड से लटकाया

नई दिल्ली :  तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में लगातार 10 महीने से जारी किसानों के धरना प्रदर्शन के बीच दिल्ली-हरियाणा के सिंघु बार्डर पर एक हैरान करने वाली घटना सामने आई है। यहां पर एक युवक की पहले तो बेरहमी से हत्या की गई फिर उसके हाथ काटकर लटका दिया गया। इस बाबत शुक्रवार सुबह से ही इस घटना के बाबत कई तस्वीरें वायरल हैं, जिसमें इसमें साफ देखा जा सकता है कि सिंघु बार्डर पर एक युवक के दोनों हाथों को बांधकर लटकाया गया है और इस युवक की मौत की जानकारी सामने आ रही है। 

बृहस्पतिवार रात को दिल्ली-हरियाणा के सिंघु बार्डर पर कुछ लोगों ने एक अनजान व्यक्ति का दाहिना हाथ काट कर मार दिया। इसके बाद शव को किसानों के धरना स्थल के पास ले जाकर 'सूली' पर लटका दिया। युवक को मारने और हाथ काटकर सूली पर लटकाने का आरोप निहंगों पर लगा है। इनका कहना है कि इस युवक ने हमारे गुरु ग्रंथ साहिब का अंग भंग किया। हालांकि, जान गंवाने इस व्यक्ति की अभी शिनाख्त नहीं हुई है। 

निहंगों का यह भी कहना है कि इस शख्स को  30,000 रुपये देकर किसी ने ऐसा करने के लिए भेजा था। आरोप है कि बृहस्पतिवार रात में ही निहंगों ने इस कृत्य की वीडियो भी बनाई। फिर इसे शुक्रवार सुबह वायरल किया। बताया जा रहा है कि आरोपित निहंगों ने ऐसा जानबूझकर किया है।

कहा जा रहा है कि युवक की हत्या बृहस्पतिवार रात को ही की गई, उसके बाद शुक्रवार सुबह 5:30 बजे संयुक्त किसान मोर्चा की मुख्य स्टेज के पास करीब 100 किलोमीटर घसीट कर निहंगों के ठिकाने यानी फोर्ड एजेंसी के पास शव को लाया गया। इसके बाद सुबह 6:00 बजे शव को लटकाया गया है, ताकि लोग देख सकें। वहीं, प्रबंधक थाना रवि कुमार मौके पर पहुंच गए हैं। बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले की जांच शुरू कर दी गई है।

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आंदोलन की तैयारी में जुटे किसान

 नोएडा : जिले के तीनों प्राधिकरण को खिलाफ 18 अक्तूबर को होने वाले आंदोलन को लेकर किसान तैयारी में जुटे हैं। इस आंदोलन में अधिक से अधिक संख्या में लोगों की भीड़ जुटाने के लिए गांव-गांव जाकर जन जागरण अभियान चलाया जा रहा है। भाकियू के किसानों ने गुरुवार को ग्रेनो के कई गांवों में जाकर नुक्कड़ सभाएं कीं।


भाकियू के प्रदेश महासचिव पवन खटाना ने सफीपुर गांव में नुक्कड़ सभा कर किसानों को संबोधित किया। प्रदेश महासचिव पवन खटाना ने कहा जिले का किसान काफी समस्या से जूझ रहा है। प्रदेश महासचिव ने कहा कि 18 अक्तूबर को किसान अपने हक की लड़ाई के लिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में इकट्ठा हो। किसान 18 अक्टूबर को जीरो पॉइंट पर इकट्ठा होकर नोएडा के लिए कूच करेंगे। किसानों का आंदोलन तीनों प्राधिकरण के खिलाफ होगा। इस मौके पर सुनील प्रधान, राजे प्रधान, प्रमोद सफीपुर, अजीत चेची, अजीपाल नंबरदार, सुंदर खटाना, चंद्रपाल आदि किसान मौजूद रहे।






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संयुक्त किसान मोर्चा ने दशहरे पर मोदी, अजय मिश्रा का पुतला जलाने की चेतावनी दी

नई दिल्ली : लखीमपुर खीरी में तीन अक्टूबर को काफिले की गाड़ी से कुचले गए किसानों की आत्मा की शांति के लिए अंतिम अरदास के एक दिन बाद, बुधवार को संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र का पुतला जलाने की चेतावनी दी।


एसकेएम ने कहा कि मोदी और कई अन्य भाजपा नेता, जिनमें गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा शामिल हैं, जिनके बेटे आशीष मिश्रा इस मामले में मुख्य आरोपी हैं, के पुतले 15 अक्टूबर को दशहरा के अवसर पर फूंके जाएंगे।


अजय मिश्रा टेनी को तुरंत बर्खास्त और गिरफ्तार करने की अपनी मांग दोहराते हुए, एसकेएम ने एक बयान में कहा, काले झंडों के साथ विरोध कर रहे किसानों को अजय मिश्रा की धमकी के कई वीडियो मौजूद हैं, यह स्पष्ट है कि वह दुश्मनी, घृणा और वैमनस्य को बढ़ावा दे रहे थे। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री के रूप में उनकी निरंतरता न्याय से समझौता करती है, और यह अकल्पनीय है कि नरेंद्र मोदी सरकार उनका बचाव करना जारी रखे हुए है।


3 अक्टूबर को लखीमपुर खीरी हिंसा में किसानों और एक पत्रकार समेत नौ लोगों की मौत हो गई थी।


एसकेएम ने मंगलवार को शहीद किसान दिवस करार देते हुए मारे गए किसानों की आत्मा की शांति के लिए अंतिम अरदास की थी। बयान में कहा गया है कि पूरे भारत में हजारों किसानों ने मोमबत्ती की रोशनी में श्रद्धांजलि सभा की।




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संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत: न्यायालय ने जंतर-मंतर पर सत्याग्रह की इजाजत मांग रहे किसान संगठन से कहा

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे और यहां जंतर-मंतर पर ‘सत्याग्रह’ करने की अनुमति देने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने का अनुरोध कर रहे एक किसान संगठन से शुक्रवार को कहा, "आपने पूरे शहर को पंगु बना दिया है और अब आप शहर के भीतर आना चाहते हैं और यहां फिर से विरोध शुरू करना चाहते हैं।"


न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति सी टी रविकुमार की पीठ ने कृषकों के संगठन ‘किसान महापंचायत’ और उसके अध्यक्ष से कहा कि एक बार जब उन्होंने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ अदालत का रुख कर लिया था तो उन्हें न्यायिक व्यवस्था में भरोसा रखना चाहिए और मामले में फैसला होने देने चाहिए था।


शीर्ष अदालत ने कहा कि नागरिकों को भी बिना किसी डर के स्वतंत्र रूप से घूमने का समान अधिकार है और विरोध में उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।


अदालत ने कहा, “एक संतुलित दृष्टिकोण होना चाहिए।”


पीठ ने याचिकाकर्ताओं को एक हलफनामा दायर करने के लिए कहा कि वे उस विरोध का हिस्सा नहीं हैं, जो हो रहा है और जिसके तहत शहर की सीमाओं पर राष्ट्रीय राजमार्गों को अवरुद्ध किया गया है। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख चार अक्टूबर को निर्धारित कर दी।


कई किसान संगठन तीन कानूनों - किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020, आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 और मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम, 2020 पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता, 2020 के पारित होने का विरोध कर रहे हैं।


शुरुआत में, विरोध पिछले साल नवंबर में पंजाब से शुरू हुआ और बाद में मुख्य रूप से दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में फैल गया।




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भारत बंद के कारण 25 ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित : रेलवे

नई दिल्ली : केन्द्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ विभिन्न किसान यूनियन द्वारा आहूत ‘भारत बंद’ के कारण सोमवार को करीब 25 ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित हुई।


उत्तर रेलवे के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘‘दिल्ली, अंबाला और फिरोजपुर संभागों में 20 से अधिक स्थानों पर जाम हैं। इसके कारण करीब 25 ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित हुई है।’’


अधिकारियों ने बताया कि दिल्ली-अमृतसर शान-ए-पंजाब, नई दिल्ली-मोगा एक्सप्रेस, नई दिल्ली से कटरा जाने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस और अमृतसर शताब्दी आदि प्रभावित ट्रेनों में शामिल हैं।


किसान संगठनों ने तीन कृषि कानूनों के पारित होने के एक साल पूरा होने पर सोमवार को भारत बंद का आह्वान किया है। बंद सुबह छह बजे से शाम चार बजे तक प्रभावी रहेगा।




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संयुक्त किसान मोर्चा के 'भारत बंद' को सपा का पूर्ण समर्थन : अखिलेश यादव

लखनऊ : समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने केंद्र के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ संयुक्त किसान मोर्चा के आंदोलन और उनके 'भारत बंद' के आह्वान का समर्थन करते हुए सोमवार को कहा कि किसानों को सम्मान नहीं देने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया है।


सपा प्रमुख ने ट्वीट कर किसान आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा की। यादव ने ट्वीट किया, ''संयुक्त किसान मोर्चा के 'भारत बंद' को सपा का पूर्ण समर्थन है। देश के अन्नदाता का मान न करने वाली दंभी भाजपा सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार खो चुकी है। किसान आंदोलन भाजपा के अंदर टूट का कारण बनने लगा है।''


उन्होंने पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के निर्माण को लेकर भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, ''पूर्वांचल की गरीबी व पिछड़ेपन को दूर करने के लिए जिस समाजवादी पूर्वांचल एक्सप्रेस वे (लखनऊ-बलिया) का शिलान्यास किया गया था उसके पूरा होने की खुशी है, पर ये दुख भी है कि भाजपा ने इसके मूल स्वरूप व गुणवत्ता से समझौता किया है।'' यादव ने कहा, ''भाजपा विकास के रास्ते बनाना नहीं जानती है।





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किसान यूनियनों का भारत बंद, हमने कोई रास्ता सील नहीं किया हैः टिकैत

नई दिल्ली : केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानून का विरोध कर रहे किसान संगठनों का भारत बंद अभियान सुबह 6:00 बजे शुरू हुआ, जिसके चलते कई जगह से यातायात में रुकावट की सूचना मिल रही है। किसान संगठनों के भारत बंद के मद्देनजर उत्तर प्रदेश से दिल्ली में गाजीपुर बॉर्डर की ओर से प्रवेश करने वाला यातायात रोका गया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लाल किला क्षेत्र के आसपास चौकसी बढ़ा दी गई है और उधर जाने वाले कुछ रास्तों को बंद कर दिया गया है। इस बीच किसान नेता राकेश टिकैत ने एक बयान में कहा कि एंबुलेंस, डॉक्टर और आपातकालीन कारण से यात्रा करने वालों को गुजरने दिया जाएगा। हमने कोई रास्ता सील नहीं किया है। हम केवल एक संदेश देना चाहते हैं। हम दुकानदारों से अपील करते हैं कि वे अभी अपनी दुकानें बंद रखें और 4:00 बजे के बाद खोलें। वहीं, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने किसानों के आंदोलन के समर्थन में ट्विटर पर लिखा किसानों का अहिंसक सत्याग्रह आज भी अखंड है, लेकिन शोषण- कार सरकार को यह नहीं पसंद है....। गौरतलब है कि करीब 40 संगठनों के संयुक्त किसान मोर्चे ने सोमवार सुबह 6:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक देशभर में जगह-जगह धरने और प्रदर्शन का ऐलान किया है। कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने किसानों के भारत बंद का समर्थन किया है। वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसान से आंदोलन का रास्ता छोड़कर बातचीत से मुद्दे का समाधान निकालने की अपील की है। किसानों के आज के विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर जगह- जगह यातायात बाधित होने की आशंका है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली सहित कई अन्य राज्यों की पुलिस ने स्थिति से निपटने के लिए विशेष प्रबंध किए हैं। 









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