‘हिंदू-मुस्लिम’ करना घातक होगा

हिंदू-मुस्लिम रिश्तों को लेकर सदा से ही भारत में आपसी भाईचारे और साझा विरासत का वातावरण रहा है। हां, लगभग 5-10 प्रतिशत तो हमेशा ही फसाद पर उतारू रहते हैं दोनों ओर, मगर आम तौर से गंगा-जमुनी तहज़ीब का ही अनुसरण करते चले आ रहे हैं, भारत के सभी निवासी, चाहे वे किसी भी धर्म के अनुयायी हों। कर्नाटक में जिस प्रकार से मंदिरों के निकट मुस्लिम दुकानदारों से सामान लेने के विरुद्ध वहां बैनर या पोस्टर लगाए गए हैं, उससे आपसी समभाव व सद्भाव पर कुप्रभाव पड़ सकता है। इस प्रकार की विघटनकारी बातों से बचने की आवश्यकता है। दक्षिण भारत के शिमोगा से एक विचलित करने वाली खबर आई है कि वहां के मंदिरों के कंप्लेक्स के बाहर कोई भी मुस्लिम अपनी किसी भी प्रकार की दुकान नहीं चलाएगा। इसका कारण बताया गया कि ये लोग बीफ का सेवन करते हैं। यह ठीक है कि बीफ के खाने से परहेज़ करना चाहिए मुस्लिमों को, क्योंकि गाय को हिंदू धर्म में माता के स्थान पर मान-सम्मान दिया गया है। जिस प्रकार से उडुपि, दक्षिण कन्नड़, टुमकुर, हासन, चिकमंग्लूर, दुर्गापुरामेशवरी आदि के मंदिरों के कैंपस में मुस्लिम पूजा सामग्री से लेकर अन्य नाना प्रकार का सामान बेचते थे, उससे न केवल इन मुस्लिम दुकानदारों के घर चलते थे बल्कि इस से अंतरधर्म सद्भावना व समभावना का सुखद प्रचार भी होता था। इन स्थानों पर बड़े-बड़े पोस्टर व बैनर लगा दिए गए हैं कि मुस्लिम दुकानदार से सौदा नहीं लिया जाए। इस प्रकार के बैनर न केवल अनैतिक व गैर कानूनी हैं बल्कि मानवता विरोधी भी हैं।

 

न जाने कब भारत में यह दूषित हिंदू-मुस्लिम मानसिकता की समाप्ति होगी। यदि भारत को विश्व गुरु और 5 ट्रिलियन अर्थ व्यवस्था बनना है तो हिंदू-मुस्लिम के मकडज़ाल से बाहर निकलना होगा और केवल और केवल भारत कार्ड खेलना होगा, न कि हिंदू-मुस्लिम ‘खेला होबे’! हां, एक सोचने वाली बात यह है कि आखिर यह कांड शिमोगा से ही क्यों शुरू हुआ! इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि इसी स्थान से हिजाब का अज़ाब शुरू हुआ था और 96 में से 6 छात्राओं ने बावजूद स्कूल से यह उसूल जारी होने पर कि हिजाब अन्यथा कोई और कोई धार्मिक पहनावा पहनने की अनुमति नहीं, फिर भी कक्षा की इन 6 छात्राओं ने इस बात की जि़द पकड़ ली कि वे हिजाब पहनकर ही कक्षा में आएंगी। वास्तव में उनको चंद कट्टरवादियों ने धमका दिया कि हिजाब नहीं तो किताब नहीं! एक समाज में जब एक तबक़ा जि़द पकड़ उद्दंड हो जाता है तो दूसरा तबका भी उसी रास्ते पर चल पड़ता है। 

 

इसी हिंदू-मुस्लिम पचड़े को लेकर लेखक की एक बार सरसंघचालक मोहन भागवत जी से बात हो रही थी तो उनका मत था कि अधिकतर मुस्लिम संस्कारी, राष्ट्रवादी व शांतिमय हैं, मगर कुछ स्वयंभू मुस्लिम नेता उन पर ढक्कन कस देते हैं जिसके कारण शाहीन बाग़ और हिजाब जैसी समस्याएं सामने आती रहती हैं और एक सुदृढ़ समाज को बांटने के प्रयास होते हैं। भागवत के विचार में मुस्लिम और हिंदू अलग हैं ही नहीं, भले ही उनका धर्म भिन्न हो, मगर डीएनए तो एक ही है। इसमें उन्होंने यह भी जोड़ा कि मुस्लिमों के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि भारत को प्रगति के इस मुकाम तक लाने में मुसलमानों का बड़ा योगदान है। साथ ही साथ उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम उनकी संतान की माफिक हैं और उनके साथ वे बराबरी का सुलूक करना चाहते हैं। इस तरह दुकानदारी व दुकानदारों के मामले में हिंदू-मुस्लिम करना भारत के लिए घातक होगा। इससे बचा जाना चाहिए।

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लंका दहन के समय एक घर छोड़ दिया था हनुमानजी ने

मेघनाथ ने श्रीहनुमानजी को रावण के सामने लाकर खड़ा कर दिया। हनुमानजी ने देखा कि राक्षसों का राजा रावण बहुत ही ऊंचे सोने के सिंहासन पर बैठा हुआ है। उसके दस मुंह और बीस भुजाएं हैं। उसका रंग एकदम काला है। उसके आसपास बहुत से बलवान योद्धा और मंत्री आदि बैठे हुए हैं। लेकिन रावण के इस प्रताप और वैभव का हनुमानजी पर कोई असर नहीं पड़ा। वह वैसे ही निडर खड़े रहे जैसे सांपों के बीच में गरुड़ खड़े रहते हैं।

 

हनुमानजी को इस प्रकार अपने सामने अत्यन्त निर्भय और निडर खड़े देखकर रावण ने पूछा- बन्दर तू कौन है? किसके बल के सहारे वाटिका के पेड़ों को तुमने नष्ट किया है? राक्षसों को क्यों मारा है? क्या तुझे अपने प्राणों का डर नहीं है? मैं तुम्हें निडर और उद्दण्ड देख रहा हूं। हनुमानजी ने कहा- जो इस संपूर्ण विश्व के, इस संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं, मैं उन्हीं भगवान श्रीरामचंद्रजी का दूत हूं। तुम चोरी से उनकी पत्नी का हरण कर लाये हो। उन्हें वापस कर दो। इसी में तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का कल्याण है। यदि तुम यह जानना चाहते हो कि मैंने अशोवाटिका के फल क्यों खाये, पेड़ आदि क्यों तोड़े, राक्षसों को क्यों मारा तो मेरी बात सुनो। मुझे बहुत जोर की भूख लगी थी इसलिए वाटिका के फल खा लिये। बंदर स्वभाव के कारण कुछ पेड़ टूट गये। अपनी देह सबको प्यारी होती है इसलिए जिन लोगों ने मुझे मारा, मैंने भी उन्हें मारा। इसमें मेरा क्या दोष है? लेकिन इसके बाद भी तुम्हारे पुत्र ने मुझे बांध रखा है।

 

रावण को बहुत ही क्रोध चढ़ आया। उसने राक्षसों को हनुमानजी को मार डालने का आदेश दिया। राक्षस उन्हें मारने दौड़ पड़े। लेकिन तब तक विभीषण ने वहां पहुंच कर रावण को समझाया कि यह तो दूत है। इसका काम अपने स्वामी को संदेश पहुंचाना है। इसका वध करना उचित नहीं होगा। इसे कोई अन्य दंड देना ही ठीक होगा। विभीषण की यह सलाह रावण को पसंद आ गयी। उसने कहा ठीक है बंदरों को अपनी पूंछ से बड़ा प्यार होता है। इसकी पूंछ में कपड़े लपेटकर, तेल डालकर उसमें आग लगा दो। जब यह बिना पूंछ का होकर अपने स्वामी के पास जायेगा तब फिर उसे भी साथ लेकर लौटेगा। यह कहकर वह बड़े जोर से हंसा।

 

रावण का आदेश पाकर राक्षस हनुमानजी की पूंछ में तेल भिगो भिगोकर कपड़े लपेटने लगे। अब तो हनुमानजी ने बड़ा ही मजेदार खेल किया। वह धीरे धीरे अपनी पूंछ को बढ़ाने लगे। ऐसी नौबत आ गयी कि पूरी लंका में तेल, कपड़े और घी बचे ही नहीं। अब राक्षसों ने तुरंत उनकी पूंछ में आग लगा दी। पूंछ में आग लगते ही हनुमानजी तुरंत उछलकर एक ऊंची अटारी पर जा पहुंचे और वहां से चारों ओर कूद कूदकर वह लंका को जलाने लगे। देखते ही देखते पूरी नगरी आग की विकराल लपटों में घिर गयी। सभी राक्षस और राक्षसियां जोर जोर से चिल्लाने लगे। वे सब रावण को कोसने लगे। रावण को भी आग बुझाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। हनुमानजी की सहायता करने के लिए पवन देवता भी जोर जोर से बहने लगे। थोड़ी ही देर में पूरी लंका जलकर नष्ट हो गयी। हनुमानजी ने केवल विभीषण का घर छोड़ दिया और उसे जलाया नहीं।

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विवाद पर बोले आरिफ मोहम्मद, कहा- ये मुस्लिम महिलाओं को घर में कैद करने की साजिश

नई दिल्ली: कर्नाटक हिजाब विवाद को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। कॉलेज परिसर में हिजाब न पहनने देने को मुस्लिम महिलाएं अपने मौलिक अधिकारों का हनन बता रही हैं। अब इस मामले पर केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने हिजाब को मुस्लिम महिलाओं को प्रताड़ित करने का तरीका बताया है।

बच्चियों को जमीन में दफना देते थे मुस्लिम
उन्होंने कहा कि अरब देशों में एक समय था, जब लोग बच्चियों के जन्म लेते ही उन्हें जमीन में दफन कर देते थे। फिर इस्लाम ने इसे बंद कर दिया, लेकिन वहां यह मानसिकता आज 21वीं सदी में भी कायम है। पहले उन लोगों ने तीन तलाक का आविष्कार किया, फिर हिजाब और फिर मुस्लिम महिलाओं का प्रताड़ित करते रहने के लिए अन्य तरीके ईजाद कर लिए।

वे नहीं चाहते कि मुस्लिम महिलाएं आगे बढ़ें
आरिफ मोहम्मद ने कहा कि मुझे लगता है कि हिजाब को लेकर जो भी हो रहा है, ये विवाद नहीं है। मुझे यह एक साजिश मालूम होती है, जिसका मकसद मुस्लिम महिलाओं को उनके घरों के भीतर हीकैद करना है। आज मुस्लिम महिलाएं, लड़कों की तुलना में आगे हैं और यह विवाद उन्हें पीछे धकेलने के लिए है। 

देश के कई हिस्सों में शुरू हुए विवाद, लगातार हो रही बयानबाजी
कर्नाटक के उडुपी जिले के एक कॉलेज में मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहनकर आने से रोकने के बाद विवाद शुरू हुआ था। इसके बाद यह विवाद राज्य के अन्य एरिया में भी फैल गया। हिंदू संगठनों से जुड़े छात्रों ने बदले में भगवा शॉल पहनकर हिजाब वाली छात्राओं को रोकना शुरू कर दिया। इसे लेकर हिंसक तनाव बनने के बाद राज्य सरकार ने सभी तरह के धार्मिक पहचान वाले कपड़े पहनने स्कूल-कॉलेजों में पहनने पर रोक लगा दी। कुछ लोगों ने कर्नाटक सरकार के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

इसके बाद देश के कई अन्य राज्यों में भी हिजाब के कारण छात्राओं को कॉलेजों में एंट्री नहीं दिए जाने के विवाद सामने आए हैं। इसे लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार भड़काऊ बयान भी सामने आ रहे हैं। राजनेता भी अपने-अपने तरीके से बयान दे रहे हैं।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्कूल-कॉलेजों में फिलहाल धार्मिक पहचान वाले कपड़े, चाहे वह भगवा शॉल हो या हिजाब, नहीं पहनने का अंतरिम आदेश जारी किया है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इसके बाद से ही देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।


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दिल्ली में तीर्थयात्रा योजना बहाल करने की तैयारी, द्वारकाधीश के लिए रवाना होगी ट्रन

नई दिल्ली। दिल्ली सरकार की बुजुर्गो के लिए तीर्थयात्रा योजना सोमवार से बहाल होगी और श्रद्धालुओं को लेकर एक ट्रेन गुजरात के द्वारकाधीश जाएगी। कोविड-19 के बढ़ते मामलों के मद्देनजर जनवरी के पहले सप्ताह में यह तीर्थयात्रा योजना रोक दी गयी थी।

दिल्ली सरकार की तीर्थयात्रा विकास समिति के अध्यक्ष कमल बंसल ने बताया कि दिल्ली से 1,000 बुजुर्ग श्रद्धालुओं को लेकर द्वारकाधीश जाने वाली ट्रेन को सोमवार शाम सात बजे सफदरजंग रेलवे स्टेशन से हरी झंडी दिखायी जाएगी। रामेश्वरम के लिए एक अन्य ट्रेन 18 फरवरी को रवाना होगी।

कोविड के मामले बढ़ने के बीच जनवरी में मुख्यमंत्री तीर्थयात्रा योजना रोक दी गयी थी। बंसल ने कहा, ‘‘हम अन्य तीर्थ स्थलों के लिए ट्रेन की घोषणा भी कर सकते हैं, क्योंकि रेलवे हमें ट्रेन की उपलब्धता के बारे में सूचित कर सकता है।’’ उन्होंने कहा कि अधिकांश वरिष्ठ नागरिकों की मांग रामेश्वरम और द्वारकाधीश के लिए थी। रामेश्वरम के लिए करीब 15,000 और द्वारकाधीश के लिए 7,000 आवेदन लंबित हैं।

बंसल ने कहा, ‘‘हम अपने बुजुर्गों की मांग पर जितना संभव हो सकता है उतनी यात्राओं की व्यवस्था करने के लिए तैयार हैं, लेकिन यह ट्रेन की उपलब्धता पर निर्भर करता है।’’ उन्होंने कहा कि दिल्ली से बुजुर्गों के लिए निशुल्क तीर्थयात्रा की योजना के तहत जनवरी में अलग-अलग तीर्थस्थलों के लिए 11 ट्रेन यात्राओं की योजना बनायी गयी, लेकिन कोरोना वायरस की तीसरी लहर के कारण यह संभव नहीं हुआ।

इस योजना के तहत 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों को 15 मार्गों पर तीर्थयात्रा के लिए ले जाया जाता है और इसका पूरा खर्च दिल्ली सरकार उठाती है। सरकार प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक और उसके साथ जाने वाले एक व्यक्ति की यात्रा और उसके ठहरने समेत अन्य खर्च उठाती है। इस योजना के तहत दिल्ली सरकार ने 81.45 करोड़ रुपये दिए हैं जिसमें से 2021-22 में 66.92 करोड़ रुपये खर्च किए गए। अधिकारियों ने बताया कि अभी तक करीब 38,000 वरिष्ठ नागरिकों को इस योजना का फायदा मिला है।

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जातीय नेतृत्व के कुचक्र में दलित

नई दिल्ली: राजनेताओं और दलों ने डाॅ. भीमराव अंबेडकर और कथित दलित उत्थान की राजनीति को अपने राजनीतिक हितों का साधन और साध्य बना लेने से ज्यादा कुछ नहीं समझा। अतएव जो दलित एक समय मायावती की बसपा के सेवक थे, वे भाजपा और अब समाजवादी पार्टी के दर पर नतमस्तक हो रहे हैं।

 

इनमें ज्यादातर अति पिछड़े और दलित हैं। कमोबेश इसे ही स्वार्थपरक अवसरवादी राजनीति कहते हैं। साफ है, इनके लिए अंबेडकरवादी दर्शन का आदर्श स्व हित से आगे नहीं बढ़ पाया। मायावती ने भी अंबेडकर के जातिविहीन सामाजिक दर्शन को पूंजी और सामंती वैभव के भोग का पर्याय मान लिया। भविष्य में निर्मित होने वाली इन स्थितियों को शायद अंबेडकर ने 1956 में ही भांप लिया था। गोया, उन्होंने आगरा में भावुक होते हुए कहा था कि 'उन्हें सबसे ज्यादा उम्मीद दलितों में पढ़े-लिखे बौद्धिक वर्ग से थी कि वे समाज को दिशा देंगे लेकिन इस तबके ने हताश ही किया है।'

 

दरअसल अंबेडकर का अंतिम लक्ष्य जाति विहीन समाज की स्थापना थी। जाति टूटती तो स्वाभाविक रूप से समरसता व्याप्त होने लग जाती। लेकिन देश की राजनीति का यह दुर्भाग्यपूर्ण पहलू रहा कि नेता सवर्ण रहे हों या अवर्ण जाति, वर्ग भेद को ही आजादी के समय से सत्तारूढ़ होने का मुख्य हथियार बनाते रहे हैं।

 

आज मायावती को सबसे ज्यादा किसी तात्विक मोह ने कमजोर किया है तो वह है, धन और सत्ता लोलुपता। जबकि अंबेडकर इन आकर्षणों से सर्वथा निर्लिप्त थे। भारत ऐसा भुक्तभोगी देश रहा है कि जब वह सोने की चिड़िया कहा जाता था, तब उसे मुगलों ने लूटा और फिर अंग्रेजों ने। अंग्रेजों ने तो भारत के सामंतों और जमींदारों को इतनी निर्ममता से लूटा कि इंग्लैंड के औद्योगिक विकास की नींव ही भारत की धन-संपदा के बूते रखी गई। यहां के किसान और शिल्पकारों से खेती और वस्तु निर्माण की तकनीकें हथियाईं।

 

भारत के भौगोलिक विस्तार की सीमाएं सिमट जाने का कारण भी पूंजी का निजीकरण और सामंतों की भोग-विलासी जीवन शैली रही है। दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत में भी प्रशासनिक व्यवस्था में यही दुर्गुण समाविष्ट होकर देश को दीमक की तरह चाट रहा है। दलित नेता व अधिकारी भी अधिकार संपन्न होने के बाद उन्हीं कमजोरियों की गिरफ्त में आते गए। इसीलिए अगड़े-पिछड़ों का खेल और दल-बदल की महिमा मतदाताओं के ध्रुवीकरण की कुटिल मंशा से आगे नहीं बढ़ पाई। यही वजह रही कि उत्तर-प्रदेश जैसे जटिल, धार्मिक व सामाजिक संरचना वाले राज्य में चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती आज चुनावी सरगर्मियों के बीच मौन व उदासीन हैं। यह उनकी राजनीतिक निष्क्रियता की घोषणा तो है ही, कालांतर में नेपथ्य में चले जाने का संकेत भी है। वरना, एक समय ऐसा भी था, जब इस दलित नेत्री से बसपा को अखिल भारतीय बना देने की उम्मीद की जा रही थी और दलितों में यह उम्मीद मायावती ने ही जगाई थी कि संगठन वह शक्ति है, जो प्रजा को राजा बना सकती है।

 

बहुजन समाज पार्टी का वजूद खड़ा करने से पहले कांशीराम ने लंबे समय तक डीएस-4 के माध्यम से दलित हितों के लिए संघर्ष किया था। इसी डीएस-4 का सांगठनिक ढांचा स्थापित करते समय बसपा की बुनियाद पड़ी और समूचे हिंदी क्षेत्र में बसपा के विस्तार की प्रक्रिया आरंभ हुई। कांशीराम के वैचारिक दर्शन में दलित और वंचितों को करिश्माई अंदाज में लुभाने का चुंबकीय तेज था। फलस्वरूप बसपा एक मजबूत दलित संगठन के रूप में स्थापित हुई और उत्तर-प्रदेश में चार बार सरकार बनाई। अन्य प्रदेशों में बसपा के विधायक दल-बदल के खेल में भागीदार बनकर सरकार बनाने में सहायक बने। किसी दल का स्पष्ट बहुमत नहीं होने पर समर्थन का टेका लगाने का काम भी किया। केंद्र में मायावती यही भूमिका अभिनीत करके राज्यसभा सांसद बनती रहीं। इन साधनों के साध्य के लिए मायावती ने सामाजिक अभियांत्रिकी (सोशल इंजीनियरिंग) जैसे बेमेल प्रयोगों का भी सहारा लिया। इन प्रयोगों का दायित्व किसी दलित को सौंपने की बजाय, सनातनी ब्राह्मण सतीष मिश्रा के सुपुर्द किए। मसलन सत्ता प्राप्ति के लिए जातीय समीकरण बिठाने में मायावती पीछे नहीं रहीं।

 

अंबेडकर ने जाति विहीन समाज की पुरजोर पैरवी की थी। लेकिन कर्मचारी राजनीति के माध्यम से जातिगत संगठन बसपा की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले कांशीराम ने अंबेडकर के दर्शन को दरकिनार कर कहा कि 'अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो।' यह नारा न केवल बसपा के लिए प्रेरणास्रोत बना बल्कि मंडलवादी मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, शरद यादव और नीतीश कुमार ने भी इसे अपना-अपना, परचम फहराने के लिए सिद्ध मंत्र मान लिया। गोया, इन नेताओं ने अंबेडकर द्वारा स्थापित जाति तोड़ो आंदोलन को जाति सुरक्षा आंदोलन में बदल दिया। इसीलिए मंडल आयोग की पिछड़ी जातियों को आरक्षण की सिफारिशें मान लेने के बाद अब जातिगत जनगणना की बात पुरजोरी से उठाई जा रही है, जिससे संख्या बल के आधार पर जातिगत आरक्षण व्यवस्था सरकारी नौकरियों के साथ-साथ विधायिका में भी की जा सके।

 

सतीश मिश्रा के बसपा में आगमन के बाद सामाजिक अभियांत्रिकी का बेमेल तड़के का सिलसिला तो शुरू हुआ ही, जिन लोगों को मायावती मनुवादी कहकर ललकारा करती थीं, उन्हीं मनुवादियों के कर्मकांड बसपा के मंचों पर सत्ता प्राप्ति के लिए अनिवार्य अनुष्ठान बन गए। चुनावी साभाओं में हवन कुंड बनाए जाने लगे और वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ भगवान परशुराम के सोने-चांदी के फरसे प्रतीक के रूप में मायावती को भेंट किए जाने लगे। 'तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार' का जो नारा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को बतौर गाली दिया जाता था, 'वह हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं' के सनातनी संस्कार में बदल गया।

 

मायावती ब्राह्मणों की लाचारी दूर करने के बहाने कहने लगीं, 'ब्राह्मण हशिए पर चले गए हैं, इसलिए उनकी खोई गरिमा लौटाने का काम हम करेंगे।' इस गौरव के पुनर्वास के लिए मायावती ने 2017 में उत्तर-प्रदेश के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा से आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण के प्रस्ताव का टोटका रचकर भारत सरकार को कानून बनाने के लिए भेजा। स्वार्थपूर्ति के लिए किए जाने वाले इन आडंबरों से पता चलता है कि हमारे निर्वाचित जनप्रतिनिधि जिस संविधान के प्रति निष्ठा व अक्षरश: पालन की शपथ लेते हैं, उसे पढ़ने-समझने की आवश्यकता ही अनुभव नहीं करते।

 

यहीं नहीं वे जिस दल के सदस्य होते हैं और उस दल के जिस नेता के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर, उनके गुणगान करने में थकते नहीं हैं, अमूमन उसी व्यक्ति की विचार-प्रक्रिया को पलीता लगाते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में अंबेडकर की चिंता ठीक थी कि 'मेरी चिंता इस बात के अहसास से गहरी हो जाती है कि जातिवाद और पंथवाद के रूप में मौजूद भारत की बुराइयों व कुरीतियों के कारण विभिन्न राजनीतिक दल अस्तित्व में आ सकते हैं।' आज देश में करीब 1400 राजनीतिक दल हैं, जिनका प्रमुख आधार धर्म, जाति और क्षेत्रवाद है।

 

देशभर में दलितों की आबादी 16 प्रतिशत है। पंजाब में 30, पश्चिम बंगाल में 23, उत्तर-प्रदेश में 21 और महाराष्ट्र में 10.5 फीसदी दलित आबादी है। चूंकि अंबेडकर महाराष्ट्र से थे, इसलिए ऐसा माना जाता है कि सबसे ज्यादा दलित चेतना महाराष्ट्र में है। दलित आंदोलनों की भूमि भी महाराष्ट्र रहा है। डाॅ. अंबेडकर ने यहीं रिपब्लिकन ऑफ इंडिया (आरपीआई) राजनीतिक दल का गठन किया था। लेकिन इस पार्टी के अब तक करीब 50 विभाजन हो चुके हैं। इसके कर्ताधर्ता अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर हैं। इसी दल से निकले रामदास अठावले ने अपनी पार्टी आरपीआई-ए गठित की हुई है। उनकी मंशा भाजपा-शिवसेना तो कभी कांग्रेस-एनसीपी को समर्थन देकर सत्ता में बने रहने की रही है। यही पदलोलुपता महाराष्ट्र में दलित वर्ग को सबसे ज्यादा असंगठित किए हुए है।

 

इस नाते मायावती के इस करिश्मे को मानना पड़ेगा कि वे उत्तर-प्रदेश में अपना 22 प्रतिशत वोट 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में स्थिर रखने में सफल रही हैं। हालांकि 2014 में बसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी उन्हें लगभग इतना ही वोट मिला था। इसी वोट की माया रही कि अगड़े और पिछड़े थैलियां लेकर उनसे बसपा का टिकट लेने की कतार में लगे रहे। किंतु अब यह मिथक टूटने को आतुर दिखाई दे रहा है। इस एक जातीय कुचक्र के टूटने भर से अन्य राजनीतिक दलों का जातिगत कुचक्र भी टूटेगा, ऐसा फिलहाल नहीं लग रहा है। गोया, जातीय गठबंधन के कुचक्र बने रहेंगे।

 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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योगी ने बाबा गोरखनाथ को चढ़ाई खिचड़ी

गोरखपुर। सूर्य के मकर राशि के प्रवेश के प्रतीक मकर संक्रांति के पावन पर्व पर शनिवार तड़के से नाथ सम्प्रदाय के प्रसिद्ध शिवावतारी गोरक्षनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने का सिलसिला शुरू हो गया।

मुख्यमंत्री एवं गोरक्षपीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ सबसे पहले बाबा गोरखनाथ को सबसे पहले खिचड़ी चढ़ायी जिसके बाद श्रद्धालु कतारबद्ध होकर अपने आराध्य को खिचड़ी चढ़ाते रहे। इस दौरान योगी मेला परिसर में श्रद्धालुओं की सुविधा जांचने के लिये खुद भ्रमण रहे।

सदियों से गोरक्षनाथ मंदिर में मकर संक्रान्ति के दिन कच्चा चावल.दाल और तिल की खिचड़ी चढाने की परम्परा रही है। मान्यता के अनुसार योगी गोरखनाथ हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के ज्वाला मंदिर से भ्रमण के बाद गोरखपुर आये थे और यहीं से उन्होंने अपने योग स्थल पर मकर संक्रान्ति के दिन खिचडी चढाने की शुरूआत की थी।

गोरखनाथ मंदिर में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा बिहार तथा पडोसी देश नेपाल से भी भारी संख्या में श्रद्धालु खिचड़ी चढाने आते हैं। आज अपरान्ह एक बजे तक पांच लाख से अधिक भक्तों के द्वारा शिवावतारी गोरक्षनाथ को खिचडी चढाने का अनुमान है।

श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित भीम सरोवर में पहले स्नान करते हैं और उसके बाद योगी गोरखनाथ का दर्शन करने के बाद खिचडी चढाते हैं। भीम सरोवर में देश के सभी पवित्र नदियों का जल डाला गया है। आज से गोरखनाथ मंदिर परिसर में एक माह तक चलने वाला भव्य मेला भी शुरू हो गया है जिसे खिचडी मेला कहा जाता है। मेले में बिहार.दिल्ली और कोलकाता आदि प्रान्तों से दुकानदार आये हैं।

शहर के चौराहा तथा गलियों में चूड़ा लाई पट्टी तिलकुट तथा गजक की दुकानें सजी है। आगरा का तिल लड्डू, बिहार का तिलकुट,बंगाल का रामदाना, कानपुर की गजक एवं लखनऊ की रेवड़ी इस बार लोगों को खूब भा रही है। परम्परागत वस्तुओं के साथ ही साथ इस समय सजावटी सामानों की भी भरमार है।

सुरक्षा के मद्देनजर मेले में जाने वाले श्रद्धालुओं को मेटल डिटेक्टर से होकर गुजरना पड़ रहा है। भारी संख्या में पुलिस और पीएसी के जवानों को तैनात किया गया है1 सुरक्षा के लिए भरी संख्या में स्वयं सेवक मंदिर के तरफ से लगाये गये हैं। इसके अलावा एनसीसी, स्काउट गाइड और स्वयंसेवी संगठनों ने मेंला में आये श्रध्दालुओं को विशेष सहयोग देने का काम कर रहे हैं।

खिचडी चढाने का सिलसला देर रात तक चलने का अनुमान है जिसमें लगभग दस लाख से अधिक श्रध्दालूओं द्वारा खिचडी चढाने की सम्भावना है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी संख्या में आने के मद्देनजर यातायात पुलिस ने गोरखनाथ क्षेत्र में यातायात व्यवस्था में फेरबदल भी किया है

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हिंदू स्वामियों ने अपनी भाषा से हिंदू धर्म का अपमान किया: कर्ण सिंह नीत फाउंडेशन

नई दिल्ली : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह की अध्यक्षता वाले ‘टेंपल ऑफ अंडरस्टैंडिंग इंडिया फाउंडेशन’ के न्यासियों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले कुछ हिंदू स्वामियों के कथित भाषणों को "चौंकाने वाला" करार दिया और कहा कि उन्होंने "ऐसे बयान" देकर खुद ही हिंदू धर्म का "अपमान" किया है।


उन्होंने हाल ही में उत्तराखंड के हरिद्वार और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित धर्म संसद में कुछ हिंदू धर्मगुरुओं के "बयानों" पर आपत्ति जतायी और कहा कि उन लोगों ने "ऐसे बयान" देकर स्वयं ही हिंदू धर्म का "अपमान" किया है।


उन्होंने एक बयान में कहा कि ऐसे आयोजन अंतर-धार्मिक आंदोलन को "पुन: सक्रिय" करने के महत्व को उजागर करते हैं जो सामंजस्यपूर्ण और रचनात्मक संवाद के जरिए विभिन्न धर्मों के लोगों को एक साथ लाने का प्रयास करता है।


उन्होंने कहा, "कर्ण सिंह की अध्यक्षता में टेंपल ऑफ अंडरस्टैंडिंग इंडिया फाउंडेशन के न्यासियों ने हरिद्वार और अन्य जगहों पर कुछ हिंदू स्वामियों के हालिया बयानों पर गहरा सदमा और भय व्यक्त किया। अल्पसंख्यकों के नरसंहार का खुला आह्वान चकित करने वाला है।"


फाउंडेशन के न्यासियों ने रेखांकित किया कि ऐसे लोगों को "निश्चित रूप से" देश के कानून के तहत दंडित किया जाएगा क्योंकि उनके बयान न सिर्फ मौजूदा कानून के खिलाफ हैं बल्कि संविधान के भी खिलाफ हैं।


उन्होंने कहा, "इस तरह के बयान देकर उन्होंने उपनिषदों में वर्णित जन कल्याण और भाईचारे के महान वेदांत सिद्धांतों को विकृत कर दिया है... इससे स्वयं ही हिंदू धर्म का अपमान होता है।"






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जिन्हें ईसा से नफ़रत है,'मसीहाई' वह क्या जानें

मानव इतिहास में ईसा मसीह का नाम प्रत्येक धर्म व जाति के लोगों द्वारा अत्यंत सम्मान से लिया जाता है। ईसाईयों का एक वर्ग ईसा को ईश्वर मानता है और प्रभु यीशु मसीह कहकर संबोधित करता है तो दूसरा वर्ग उन्हें ख़ुदा का बेटा इसलिये कहता है क्योंकि उनका जन्म अविवाहित व पवित्र मां मरियम के पेट से ईश्वरीय चमत्कार से हुआ था। उधर मुसलमानों में भी ईसा को इसलिये पूरा सम्मान दिया जाता है क्योंकि मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार धरती पर अवतरित होने वाले एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बरों में ईसा भी एक थे। उन्होंने मुहम्मद साहब से पहले अवतार लिया था। धार्मिक मान्यताओं व विश्वासों से इतर ईसा मसीह धरती पर मानवता के लिये आदर्श मानव रूप में अवतरित हुये। करुणा,क्षमा,प्रेम,सेवा,सत्कार,शिक्षा,ग़रीबों,निर्बल,दुर्बल,असहाय,बीमार व कुष्ठ लोगों की सेवा को ही वे सबसे बड़ा धर्म व कर्तव्य मानते थे। किसी परोपकारी अथवा उद्धार करने वाले को 'मसीहा' कहकर पुकारना ईसा के सेवा भाव का ही परिणाम है। आज भारत सहित पूरे विश्व में अनेकानेक शिक्षण संस्थान,अस्पताल,कुष्ठ रोगी अस्पताल,लावारिसों के लिये खुले 'होम्स' आदि तमाम लोकहितकारी संस्थायें व संस्थान इन्हीं 'ईसा '  के मानने वालों द्वारा संचालित किये जा रहे हैं जिसका लाभ ईसाई तो कम ग़ैर ईसाई ज़्यादा उठा रहे हैं। भारत में अकेली मदर टेरेसा ने ही लाखों ग़ैर ईसाई अपेक्षित,तिरस्कृत व प्रताड़ित लोगों को नया जीवन प्रदान किया। सेवा भाव में उनकी दूसरी मिसाल मौजूद नहीं। उनकी इन्हीं सेवाओं के लिये उन्हें भारत रत्न प्रदान किया गया था। 


परन्तु  हर समय आँखों पर संप्रदायवाद का चश्मा लगाये रखने वालों को मानवता के प्रति इनकी सेवा,इनका त्याग व बलिदान नज़र नहीं आता। इन्हें सिर्फ़ यह दिखाई देता है कि चूँकि यह ईसाई संस्थायें हैं लिहाज़ा यह सारी सेवायें लोगों का धर्म परिवर्तन कराने के लिये ही की जाती हैं। सांप्रदायिकता की नज़रों से हर चीज़ को देखने वाले इन लोगों को यह भी बताना चाहिये कि मिशनरीज़ द्वारा चलाये जा रहे इन्हीं स्कूल व कॉलेज से शिक्षित होकर निकले करोड़ों छात्रों में से अब तक कितने छात्रों ने धर्म परिवर्तन किया और मिशनरीज़ संचालित अस्पतालों से स्वास्थ्य लाभ पाने वाले कितने मरीज़ों ने धर्म परिवर्तन किया ? इन्हें ईसा से भी दुश्मनी है,माँ मरियम से भी और अब तो गत 25 दिसंबर को हमारे देश में आगरा में तोहफ़े बांटने के प्रतीक सेंटा क्लॉज़ का भी पुतला यह कहकर फूँक दिया गया कि 'धर्म परिवर्तन हेतु लालच देने के लिये सेंटा क्लॉज़ तोहफ़े बांटता है'। क्या पूरे विश्व में और इस परंपरा की शुरुआत से ही सेंटा क्लॉज़ धर्म परिवर्तन हेतु तोहफ़े बांटता है ? विश्व हिन्दू परिषद् के लोगों ने वाराणसी में भी सेंटा क्लॉज़ का पुतला फूंकने की योजना बनाई थी जिन्हें पुलिस ने नज़रबंद कर दिया क्योंकि पुलिस को कार्यक्रम की ख़बर पुतला दहन से पहले ही लग गई थी।


गत 25 दिसंबर को तो हरियाणा का अंबाला जिला भी इन संप्रदायिकतावादियों की चपेट में आ गया। अंबाला ज़िले की गिनती आम तौर  पर देश के शांतिप्रिय ज़िलों में की जाती है। साम्प्रदायिक दंगों अथवा धर्म जाति आधारित नफ़रत अथवा संघर्ष का भी इस ज़िले अथवा शहर का कोई इतिहास नहीं है। परन्तु पिछले दिनों क्रिसमस के दिन अंबाला के इस शांतिपूर्ण वातावरण को न केवल अशांत करने का कुत्सित प्रयास किया गया बल्कि अंबाला को कलंकित भी कर दिया गया। अंबाला छावनी स्थित होली रिडीमर कैथोलिक चर्च के  बाहर लगी यीशु मसीह की मूर्ति को कुछ असामाजिक तत्वों ने खंडित कर दिया। 1843 में निर्मित यह चर्च अंबाला छावनी के सबसे प्राचीन भवनों में प्रमुख है। बताया जाता है कि 1948 में इटेलियन कैपुचिन की निगरानी में होली रिडीमर कैथोलिक चर्च का निर्माण किया गया था। अंबाला के इतिहास की इस तरह की यह पहली घटना है जिसकी वजह से यहां रहने वाले ईसाई समुदाय के लोगों में अपने व अपने धर्मस्थलों की सुरक्षा के प्रति चिंता को बढ़ा दिया है।


देश के अनेक राज्यों में चर्च में तोड़ फोड़ करने,आगज़नी करने,ईसा मसीह व मरियम की मूर्तियों को खंडित करने के समाचार अक्सर आते रहते हैं। जिन शिक्षिकाओं द्वारा मिशनरीज़ स्कूल्स में शिक्षा दी जाती है,जिन्हें नन्स  के नाम से जाना जाता है उनके साथ बलात्कार करने तक की दुःखद व शर्मनाक ख़बर सुनी जा चुकी है। क्या कोई धर्म यही सिखाता है कि जो हमारे बच्चों को शिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाये उसका इस आरोप में बलात्कार किया जाये कि वह धर्म परिवर्तन कराती है ? 1999 में ओड़िसा के मनोहरपुर क्षेत्र में इन्हीं क्रूर सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा ऑस्ट्रेलियन मिशनरी ग्रहम स्टेंस व उनके दस वर्षीय पुत्र फ़्लिप व छः वर्षीय पुत्र टिमोथी, तीनों को सोते समय उन्हीं के वाहन में ज़िंदा जला दिया गया था। उस समय भी पूरी दुनिया में देश की बहुत बदनामी हुई थी। आज उसी मनोहरपुर के लोग प्रतिदिन ग्रहम स्टेंस व उनके बच्चों की याद में शोक मनाते आ रहे हैं।


भारत,पाकिस्तान,बांग्लादेश,अफ़ग़ानिस्तान जैसे कई देश हैं जहां सक्रिय सांप्रदायिकतावादी शक्तियां जो स्वयं किसी का कल्याण नहीं कर सकतीं,जिन्हें दया करुणा प्रेम,अहिंसा,सहयोग,परोपकार पर नहीं बल्कि नफ़रत,हिंसा,क्रूरता पर यक़ीन है वही लोग किसी भी धर्म के किसी भी आराध्य अथवा महापुरुष के दुश्मन बने बैठे हैं। नफ़रत,वैमनस्य संभवतः इनके संस्कारों में शामिल है। अन्यथा मंदिर-मस्जिद-चर्च व गुरुद्वारों ने बनाने के सिवा किसी का बिगाड़ा ही क्या है ? यह धर्मस्थल व महापुरुष हमेशा से संपूर्ण मानवता के लिये प्रेरणादायी रहे हैं। किसी भी धर्म का सच्चा अनुयायी अपने दिल में किसी भी धर्म के किसी भी धर्मस्थल अथवा महापुरुष के प्रति बैर नहीं रख सकता। भारतवासियों का विशेषकर यह स्वभाव है तभी तो यह देश पूरी दुनिया में अनेकता में एकता का प्रतीक समझा  जाता है। परन्तु जिन्हें जिन्हें ईसा से नफ़रत है,मसीहाई वह क्या जानें। 


-निर्मल रानी-





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जल्द शादी के बंधन में बंधना चाहती हैं तो अपनाएं ये उपाय

शिवजी की पूजा और व्रत करें

 

जिन लड़कियों की शादी की उम्र हो गई है और उन्हे मनचाहा वर नहीं मिल रहा है। उनके लिए शिवजी का व्रत रखना काफी लाभदायक होता है। इन्हें 16 सोमवार के व्रत रखने चाहिए। नए साल में आप पहले सोमवार से इसकी शुरुआत कर सकते हैं। हर सोमवार मंदिर जाएं और शिवलिंग पर जल चढ़ाएं। व्रत कथा पढ़कर भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद लें।


छुआरे सिरहाने रख कर सोएं

शुक्रवार की रात्रि में आठ छुआरे जल में उबाल कर जल के साथ ही अपने सोने वाले स्थान पर सिरहाने रख कर सोएं। तथा शनिवार को प्रात: स्नान करने के बाद किसी भी बहते जल में मनचाहे साथी का स्मरण करते हुए इन्हें प्रवाहित कर दें।


हल्दी पानी से करें स्नान

हल्दी पानी से करें स्नान जो लड़कियां विवाह योग्य हैं लेकिन अच्छे प्रस्ताव मिलने में देरी हो रही है वो अपने नहाने के पानी में जरा सी हल्दी मिला ले। रोज हल्दी मिले पानी से स्नान करने से शादी की संभावना बढ़ जाती है।

 

मंदिर में चढ़ाएं लाल गुलाब

मंगलवार के दिन देवी मंदिर में लाल गुलाब के फूल चढ़ाएं, पूजन करें एवं मंगलवार का व्रत रखें। यह नौ मंगलवार तक करें। गुलाब के फूलों के बीच अपने साथी का नाम लिखकर कागज छुपा दें।

 

लाल कपड़े पहने

लाल कपड़े पहने यदि लड़की के परिवार वाले किसी के यहां उसके रिश्ते की बात करने जा रहे हैं तो उस दिन कन्या को लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए। घर के सदस्यों को अपने हाथ से मीठा खिलाकर लड़के वालों के घर भेजना चाहिए। संभव हो तो कन्या को इस दिन अपने बाल खुले छोड़ देने चाहिए।

 

हल्दीयुक्त रोटियां गाय को खिलाएं

गुरुवार के दिन प्रात:काल हल्दीयुक्त रोटियां बनाकर प्रत्येक रोटी पर गुड़ रखें व उसे गाय को खिलाएं। 7 गुरुवार नियमित रूप से यह विधि करने से शीघ्र विवाह होता है। गाय के कान में धीरे से फुसफुसाकर साथी का नाम लें।

 

दुर्गा सप्तशती का पाठ करें

दुर्गा सप्तशती का पाठ करें शादी के लिए अच्छा घर परिवार ना मिल पा रहा हो तो ऐसे में प्रभु की शरण में जाना बेहतर उपाय है। लड़की को रोज सुबह जल्दी उठकर नहाना चाहिए और साफ़ वस्त्र धारण करने चाहिए। घर या फिर पास के मंदिर में जाकर धुप-बत्ती जलाना चाहिए। इसके बाद शांत मन से दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।

 

केले के पेड़ की पूजा करें

केले के पेड़ की पूजा करें हिंदू धर्म में केले के पेड़ को काफी पूजनीय माना गया है। मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए कन्या को गुरुवार के दिन भगवान बृहस्पति का स्मरण करना चाहिए और केले के पेड़ के पास शुद्ध देसी घी का दीपक जलाना चाहिए। इसके साथ ही केले के वृक्ष के सामने गुरु के 108 नामों का जप करना चाहिए। यदि संभव हो तो लड़की को गुरुवार के दिन व्रत भी रखना चाहिए।



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ईसाइयों के 'उत्पीड़न' की रिपोर्ट पर राहुल गांधी ने कहा, दुनिया देख रही है

नई दिल्ली : भारत में ईसाइयों के ''उत्पीड़न'' संबंधी अतंरराष्ट्रीय मीडिया में खबरों का हवाला देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने मंगलवार को कहा कि देश के भीतर के घटनाक्रम को दुनिया देख रही है।


भारत के ईसाइयों के कथित उत्पीड़न के संबंध में न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर को साझा करते हुए राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, ‘‘हमारे देश में कई लोग रेत में मुंह छुपाकर बैठे हैं। हालांकि, दुनिया देख रही है।''


कांग्रेस नेता ने ''स्पीक-अप (आवाज उठाओ)'' और ''नो फीयर (डरो मत)'' हैशटैग के साथ कहा, ‘‘अन्याय के समय, चुप्पी भी मिलीभगत होती है।''





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गांव में आंबेडकर की प्रतिमा स्थापित करने को लेकर दलित और पाल समुदाय के बीच तनाव

मुजफ्फरनगर (उप्र) : उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में खतौली के एक गांव में विवादित भूमि पर डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा स्थापित करने को लेकर दलित और पाल समुदाय के बीच तनाव पैदा हो गया है।


पुलिस ने यह जानकारी दी।


दोनों समुदायों के बीच झड़प के बाद जिले के प्राधिकारियों ने विवादित स्थल पर प्रतिमा स्थापित करने को मंजूरी नहीं दी।


क्षेत्राधिकारी आर के सिंह के अनुसार, एहतियात के तौर पर जसोला गांव में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। प्रतिमा स्थापित करने के लिए अधिकारियों से अनुमति नहीं ली गई थी।






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संत क्यों करें हिंदुत्व की बदनामी?

देश के कुछ शहरों से ऐसे बयानों और घटनाओं की खबरें देखकर चिंता हुई, जिन्हें सख्ती से नहीं रोका गया तो वे भारत में सामाजिक कोहराम मचा सकती हैं। सच पूछा जाए तो वे भारत और हिंदुत्व, दोनों की बदनामी का कारण बन सकती हैं।


पहले हम यह देखें कि वे क्या हैं? हरिद्वार में निरंजनी अखाड़े की महामंडलेश्वर अन्नपूर्णा और हिंदू महासभा के नेता धर्मदास ने इतने आपत्तिजनक बयान दिए हैं कि अब पुलिस उनके खिलाफ बाकायदा जांच कर रही है। उनमें से एक ने कहा है कि हिंदू लोग किताबों को कोने में रखें और मुसलमानों के खिलाफ हथियार उठाएं। दूसरे ने कहा कि भारत में बसे पाकिस्तानियों की वजह से हिंदू पूजा-पाठ में बाधा होती है और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह जैसे लोगों का वध कर दिया जाना चाहिए। यह कितने शर्म की बात है। एक और 'हिंदू संत' ने कहा है कि इस समय भारत में श्रीलंका के तमिल आतंकवादी प्रभाकरन और भिंडरावाले जैसे लोगों की ज्रऊरत है।


इसी तरह के लोगों ने अंबाला के एक प्रसिद्ध और पुराने गिरजाघर में घुसकर ईसा मसीह की मूर्ति को तोड़ दिया। गुड़गांव में भी गिरजे में घुसकर तथाकथित हिंदूवादियों ने क्रिसमस के उत्सव को भंग कर दिया। ऐसा ही पिछले साल असम में कुछ लोगों ने किया था। रायपुर में आयोजित धर्म-संसद में अधर्म की कितनी घृणित बात हुई है। इस संसद में 20 संप्रदायों के मुखिया और कांग्रेस व भाजपाई नेताओं ने भी भाग लिया था। उनमें से ज्यादातर लोगों के भाषण तो संतुलित, मर्यादित और धर्मसंगत थे लेकिन अपने आपको हिंदू संत बतानेवाले दो वक्ताओं ने ऐसे भाषण दिए, जिन्हें सुनकर सारी संताई चूर-चूर हो जाती है। एक 'संत' ने गांधीजी की हत्या को ठीक बताया और नाथूराम गोड़से की तारीफ की। उन्होंने मुसलमानों पर इल्जाम लगाया कि वे भारत की राजनीति को काबू करने में लगे हुए हैं। किसी अन्य 'संत' ने हिंदुओं के शस्त्रीकरण की भी वकालत की। उन्होंने सारे धर्म-निरपेक्ष लोगों को 'हिंदू विरोधी' बताया।


पता नहीं, ये संत लोग कितने पढ़े-लिखे हैं? क्या उन्हें पता नहीं है कि हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री और सभी सांसद उस संविधान की रक्षा की शपथ लेते हैं, जो धर्म-निरपेक्ष है? ये लोग अपने आपको संत कहते हैं तो क्या इनका बर्ताव संतों की तरह है? ये तो अपने आपको उग्रवादी नेताओं से भी ज्यादा नीचे गिरा रहे हैं। ये समझते हैं कि ऐसी उग्रवादी और हिंसक बातें कहकर वे हिंदुत्व की सेवा कर रहे हैं लेकिन भारत के मुट्ठीभर हिंदू भी उनसे सहमत नहीं हैं। उनके ऐसे निरंकुश बयानों से हमारे देश के मुसलमानों और ईसाइयों में भय और कट्टरता का संचार होता है। अपने तथ्यों और तर्कों के आधार पर किसी भी मजहब या संप्रदाय की समालोचना करने में कोई बुराई नहीं है, जैसे कि महापंडित महर्षि दयानंद किया करते थे लेकिन घृणा और हिंसा फैलाने से बड़ा अधर्म क्या है?


-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

(लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार हैं)





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प्रधानमंत्री शनिवार को गुरु पर्व पर लखपत साहिब गुरुद्वारा में आयोजित समारोह को संबोधित करेंगे

नई दिल्ली :  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को सिखों के पहले गुरु नानक देव के 552वें प्रकाश पर्व के अवसर पर गुजरात के कच्छ स्थित लखपत साहिब गुरुद्वारे में आयोजित गुरु पर्व समारोहों को संबोधित करेंगे।


प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने शुक्रवार को एक बयान जारी कर यह जानकारी दी।


पीएमओ ने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी 25 दिसंबर को दोपहर करीब बारह बज कर तीस मिनट पर गुजरात के कच्छ में स्थित गुरुद्वारा लखपत साहिब में गुरु नानक देव जी के गुरु पर्व समारोह को वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से संबोधित करेंगे।’’


पीएमओ ने कहा कि हर साल 23 दिसंबर से 25 दिसंबर तक गुजरात के सिख लखपत साहिब गुरुद्वारे में गुरु नानक देव जी का गुरु पर्व मनाते हैं।


गुरु नानक देव लखपत गुरुद्वारा साहिब में रुके थे। गुरुद्वारा लखपत साहिब में उनकी कुछ वस्तुयें रखी हुई हैं, जिनमें खड़ाऊं, पालकी और पांडुलिपियां शामिल हैं। कुछ पांडुलिपियां गुरुमुखी लिपि में हैं।


वर्ष 2001 में आए भूकंप से इस गुरूद्वारे को भी नुकसान पहुंचा था। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने बाद में इसका जीर्णोद्धार कराया था।


पीएमओ ने कहा, ‘‘इस पहल से सिख पंथ के प्रति प्रधानमंत्री की गहरी आस्था का पता चलता है। उनकी आस्था हाल के अन्य अवसरों पर भी नजर आई, जैसे गुरु नानक देव जी का 550वां प्रकाश पर्व, गुरु गोबिन्द सिंह जी का 350वां प्रकाश पर्व और गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाश पर्व।’’


ज्ञात हो कि पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा के चुनाव होने हैं।



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इस एक स्थान पर होती है तीन धर्मों की यात्रा

संसार भर में भारत ही ऐसा देश है जहां विभिन्न धर्मों से जुड़े लोग एकजुट होकर रहते हैं। बहुत से ऐसे स्थान हैं जहां विभिन्न धर्मों के पवित्र स्थल एक ही स्थान पर स्थापित हैं। उन्हीं में से एक तीर्थ है राजगृह। राजगृह हिन्दू, बौद्ध और जैन तीनों धर्मों के अनुयायीयों का तीर्थ है। पुरातन काल में राजगृह मगध की राजधानी हुआ करती थी तत्पश्चात मौर्य साम्राज्य आया। महाभारत में राजगृह को तीर्थ माना गया है। राजगृह के समीप अरण्य में जरासंध की बैठक नाम की एक बारादरी अवस्थित है।


हिन्दू तीर्थ:- यहां प्रवाहित होने वाली सरस्वती नदी को स्थानीय लोग प्राची सरस्वती कहते हैं। सरस्वतीकुण्ड से आधा मील की दूरी पर सरस्वती को वैतरणी कहा जाता है। इस नदी के तट पर पिण्डदान और गोदान का बहुत महत्व है इसलिए यहां प्रत्येक धर्म-समुदाय के लोग पिण्डदान करते हैं। यहां मार्कण्डेयकुण्ड, व्यासकुण्ड, गंगा-यमुनाकुण्ड, अनन्तकुण्ड, सप्तर्षिधारा और काशीधारा हैं। जिनके समीप बहुत से देवी-देवताओं के मंदिर अवस्थित हैं।


बौद्ध तीर्थ:- पुरातन काल में इस स्थान पर बौद्धों के 18 विहार हुआ करते थे। राजगृह मुख्य बौद्ध तीर्थ है क्योंकि महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन काल का बहुत बड़ा हिस्सा यहां व्यतित किया था। वर्षा के चार महीने यहीं व्यतीत किया करते थे।


जैन तीर्थ:- जैन तीर्थ पंच पहाड़ों पर स्थित है। इक्कीसवें तीर्थंकर मुनि सुव्रतनाथ का जन्म इसी पहाड़ी पर हुआ था। यही उनकी तपो भूमी थी। मुनिराज धनदत्त और महावीर के बहुत सारे गणधर इसी स्थान से मोक्ष को प्राप्त हुए थे। जैनयात्री यहां विशेष रूप से दर्शनों के लिए आते हैं।





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पत्नी के श्राप से झुका रहता है शनिदेव का सिर

भगवान शनिदेव का नाम सुनते ही लोगों के मन में दहशत सी समा जाती है परन्तु शनिदेव हमेशा अहित नहीं करते। किसी के ऊपर मेहरबान हो गए तो उसके वारे-न्यारे। शनिदेव सृष्टिकर्ता के इशारों पर चलने के लिए मजबूर हैं। वे स्वयं किसी का अहित नहीं करते। शनि के अधिदेवता प्रजापिता ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका वर्ण कृष्ण, वाहन गिद्ध तथा रथ लोहे का बना हुआ है।


ये एक-एक राशि में तीस-तीस महीने तक रहते हैं। शनि भगवान सूर्य तथा छाया संवर्णा के पुत्र हैं। शनि की दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। ब्रह्म पुराण के अनुसार बचपन से ही शनि देवता भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वह श्रीकृष्ण के अनुराग में निमग्न रहा करते थे।


वयस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। इनकी पत्नी सती-साध्वी और परम तेजस्विनी थी। एक रात वह ऋतु-स्नान करके पुत्र प्राप्ति की इच्छा से इनके पास पहुंची पर ये श्रीकृष्ण के ध्यान में निमग्न थे। इन्हें बाह्य संसार की सुधि ही नहीं थी। पत्नी प्रतीक्षा करके थक गई। उनका ऋतुकाल निष्फल हो गया। इसलिए उसने क्रुद्ध होकर शनिदेव को शाप दे दिया कि आज से जिसे तुम देख लोगे, वह नष्ट हो जाएगा।


ध्यान टूटने पर शनिदेव ने अपनी पत्नी को मनाया। पत्नी को भी अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ किंतु शाप के प्रतिकार की शक्ति उसमें न थी। तभी से शनि देवता अपना सिर नीचा करके रहने लगे क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि इनके द्वारा किसी का अनिष्ट हो।






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दिल्ली उच्च न्यायालय ने दक्षिण दिल्ली में गैरकानूनी तरीके से बना मंदिर हटाने को कहा

नई दिल्ली : दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को दिल्ली सरकार को दक्षिण दिल्ली में सरकारी जमीन पर गैरकानूनी तरीके से बना मंदिर हटाने का निर्देश देते हुए कहा कि वहां कोई धार्मिक गतिविधियां नहीं चल रही हैं।


उच्च न्यायालय ने कहा कि उच्चतम न्यायालय पहले ही एक बार निर्देश दे चुका है कि मंदिर या गुरुद्वारे के नाम पर अवैध निर्माण की अनुमति नहीं दी जा सकती है, ऐसे में कोई सवाल नहीं उठता है कि अतिक्रमण को जल्दी ना हटाया जाए, ताकि उसका दुरुपयोग नहीं हो।


न्यायमूर्ति रेखा पल्ली एकल पीठ ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि दक्षिण दिल्ली के डिफेंस कालोनी इलाके में किसी की संपत्ति के सामने गैरकानूनी तरीके से किए गए अतिक्रमण को 10 दिन के भीतर हटाया जाए और दिल्ली पुलिस से इस संबंध में सहायता करने को कहा है।


अदालत ने टिप्पणी की, ‘‘वर्षों से पूरे शहर को मजाक बनाकर रखा गया है... जब उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय को अतिक्रमण का पता चलता है, फिर धार्मिक समिति का मामला कहां से आया? उसमें (उपराज्यपाल के नोट में) कहां कहा गया है कि अदालत अवैध निर्माण को गिराने का आदेश नहीं दे सकता है?’’


इसपर दिल्ली सरकार के वकील ने कहा कि अदालत ध्वस्तीकरण का आदेश दे सकता है, लेकिन अगर एजेंसियों को फैसला लेना है तो पहले उन्हें धार्मिक समिति से अनुमति लेनी होगी।


अदालत ने संबंधित थाने के एसएचओ से सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि गैरकानूनी निर्माण (मंदिर) के भीतर रखी भगवान की प्रतिमाओं को पास के मंदिर में रखवाया जाए ताकि उनकी पवित्रता बनी रहे और हिन्दुओं की भावनाओं का भी सम्मान करना चाहिए।’’


अदालत ने संपत्ति के सामने गैरकानूनी तरीके स निर्मित मंदिर के रूप में हुए अतिक्रमण को हटाने का अनुरोध करने वाली याचिका को स्वीकार किया।


सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार और पुलिस की ओर से वकील अनुपम श्रीवास्तव ने कहा कि निर्माण को गिराने पर सहमति प्राप्त करने के लिए उपराज्यपाल की अध्यक्षता वाली धार्मिक समिति को यह प्रस्ताव फिर से भेजा जाएगा।


अदालत ने उपराज्यपाल के नोट का भी अवलोकन किया और कहा कि इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि कोई ध्वस्तीकरण नहीं होना चाहिए अगर यह सक्षम अदालत के आदेशों के विपरीत है।


याचिका में कहा गया था कि कोविड-19 महामारी के दौरान कुछ लोगों ने अतिक्रमण करके भीष्म पितामह मार्ग पर उसकी संपत्ति के ठीक सामने सार्वजनिक भूमि , जो फुटपाथ है, पर अवैध तरीके से मंदिर का निर्माण कर दिया। 




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पितरों के तर्पण का शुभ दिन


मार्गशीर्ष अमावस्या इस बार शनिवार को है। इस अमावस्या का अद्भुत फल है। उच्च का बृहस्पति वृश्चिक राशि में बैठे सूर्य,  शनि,  शुक्र और चंद्रमा को पांचवीं दृष्टि और केतु को नवम दृष्टि से देख कर गुरु कृपा बरसा रहा है। ग्रहों की इस बलवान स्थिति में अमावस्या का होना इस बात का संकेत है कि हम अपने पितरों को हर हा में इस दिन स्मरण करें और जो कुछ भी हमारे पास उपलब्ध है,  पूरे परिवार के साथ उन्हें अर्पित करें। यूं तो हर अमावस्या का अपना महत्व है, लेकिन शनैश्चरी अमावस्या के दिन अपने पितरों को अर्पित किया गया भोग और तर्पण हमारे बहुत से संकटों को समाप्त कर जीवन पथ पर विकास का मार्ग उपलब्ध कराता है।


जिन लोगों की जन्मराशि मेष और सिंह है,  उन पर शनि की ढैया और जिनकी तुला,  वृश्चिक और धनु राशि है,  उन्हें शनि की साढ़ेसाती से जूझना पड़ रहा होगा। इन लोगों को इस दिन पिप्पलाद मुनि की कथा, जिसका वर्णन भविष्यपुराण में मिलता है और पद्मपुराण में वर्णित राजा दशरथ द्वारा रचित शनि स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। अगर आपका मेष, वृष, कन्या, तुला, मकर और कुंभ लग्न है और शनि की साढ़ेसाती और ढैया वाली राशियों में आपकी राशि भी शामिल है तो हर हा में इस दिन आपको पूजा करनी चाहिए। 


संभव हो तो तीन से पांच रत्ती का नीलम दान करें या शुक्ल पक्ष के किसी शनिवार को जन्मलग्न अनुकूल होने पर ही नीलम धारण करें। पूजा करने से जहां इन राशियों को करियर की समस्याओं और चले आ रहे रोगों आदि से मुक्ति मिलेगी,  वहीं कर्ज आदि उतरने के साथ-साथ विवाह की संभावना भी बनने गेगी। जिन लोगों की जन्मकुंडली में पितृ दोष से संतान आदि ना होने की आशंका है, उन्हें इस दिन अवश्य शनि की पूजा करने के बाद सरसों के तेल, काले तिल, काली उड़द की दाल आदि का दान अवश्य करना चाहिए। सर्दी में कंबल या ऊनी वस्त्र का दान भी बहुत शुभ माना जाता है। शनि देव उस आदमी से बहुत नाराज होते हैं, जो अपने नौकरों का अपमान करते हैं और किसी तरह का कष्ट आदि देते हैं।


शनि से पीड़ित राशियों को इस दिन इस बात का प्रण लेना चाहिए कि वे किसी भी तरह से किसी को सताएंगे नहीं। शनि एक न्यायप्रिय ग्रह हैं,  जो किसी तरह के अन्याय करने पर कठोर सजा देते हैं। जिन लोगों की जन्मकुंडली में शनि अपनी नीच राशि मेष में हैं,  उन्हें तो सदैव शनैश्चरी अमावस्या पर पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ अपने पितरों को भोग और तर्पण द्वारा प्रसन्न करना चाहिए। यूं तो हमेशा ही परिवार के बुजुर्ग सदस्यों की सेवा करनी चाहिए, लेकिन इस दिन तो हर हा में ऐसा कोई कर्म नहीं करना चाहिए, जिससे उन्हें मानसिक और शारीरिक कष्ट हो, बल्कि बुजुर्गों की प्रसन्नता के लिए उनकी इच्छाएं पूरी करनी चाहिए।   


-पं. भानुप्रतापनारायण मिश्र-




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कल है गुरु प्रदोष व्रत, जानिए पूजा मुहूर्त संग विधि और महत्व

सनातन धर्म के अनुसार हिंदू पंचाग में हर माह दो प्रदोष व्रत होते हैं। प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि के दिन रखा जाता है। इस समय मार्गशीर्ष मास का शुक्ल पक्ष चल रहा है। इस पक्ष की त्रयोदशी तिथि आने वाली है। प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने का विधान है। प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा प्रदोष मुहूर्त में ही करने का विधान है, लेकिन समय की कमी के कारण लोग इस दिन प्रात:काल में भी पूजा कर लेते हैं। 

ज्योतिषाचार्यके अनुसार, मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 15 दिसंबर दिन बुधवार को देर रात 02 बजकर 01 मिनट पर हो रहा है। इसका समापन 17 दिसंबर दिन शुक्रवार को प्रात: 04 बजकर 40 मिनट पर हो रहा है। प्रदोष व्रत के लिए पूजा का मुहूर्त 16 दिसंबर दिन गुरुवार को प्राप्त हो रहा है। ऐसे में प्रदोष व्रत 16 दिसंबर को रखा जाएगा। इस दिन गुरुवार है, तो यह गुरु प्रदोष व्रत होगा। 

यदि आप प्रदोष व्रत रखते हैं, तो आपको प्रदोष काल में शाम 05 बजकर 27 मिनट से रात 08 बजकर 11 मिनट के मध्य भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। यह प्रदोष व्रत के लिए पूजा मुहूर्त है, जो 02 घंटे 44 मिनट तक है। 

गुरु प्रदोष व्रत रखने से दांपत्य जीवन में खुशहाली आती है। गुरु प्रदोष व्रत मुख्यत: महिलाएं रखती हैं। शनि प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को उत्तम संतान की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत के दिन आप अपने किसी विशेष कार्य की सिद्धि के लिए मंत्र जाप भी कर सकते हैं।



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काशी विश्वनाथ धाम में स्थापित की गई शंकराचार्य, अहिल्याबाई, भारत माता की प्रतिमा

वाराणसी (उप्र) : भारत की प्रतीकात्मक पृष्ठभूमि में पत्थर से बनी भारत माता प्रतिमा, महारानी अहिल्याबाई होल्कर और संत आदि शंकराचार्य की प्रतिमाओं को काशी विश्वनाथ धाम के विशाल परिसर में स्थापित किया गया है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ घंटे बाद ही महत्वाकांक्षी काशी विश्वनाथ गलियारा परियोजना के पहले चरण का सोमवार को उद्घाटन करेंगे। इससे प्राचीन शहर में पर्यटकों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है।


प्रधानमंत्री कार्यालय ने सुबह करीब 10 बजकर 45 मिनट पर ट्वीट किया, ‘‘प्रधानमंत्री कुछ देर पहले वाराणसी पहुंच गए हैं।’’ उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी की।


इस भव्य गलियारे की नींव आठ मार्च 2019 को रखी गई थी, जो एक गलियारे के माध्यम से मुख्य मंदिर को ललिता घाट से जोड़ता है। इसकी चार दिशाओं में विरासत वास्तुकला शैली में भव्य प्रवेश द्वार और सजावटी मेहराब बनाए गए हैं। इस गलियारे को अब काशी विश्वनाथ धाम कहा जाता है।


वाराणसी के जिला अधिकारी कौशल राज शर्मा ने रविवार को कहा, ‘‘ प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी, घाट की ओर से काशी विश्वनाथ धाम में दाखिल होंगे और गलियारे का उद्घाटन करेंगे। वह नए गलियारे के परिसरों का दौरा करेंगे और वहां की इमारतों को देखेंगे। यह आयोजन देश के सभी हिस्सों से बड़ी संख्या में आए संतों की उपस्थिति में होगा...।’’


मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 के आसपास करवाया था और 19वीं शताब्दी में महाराजा रणजीत सिंह ने इसका सोने का ‘शिखर’ बनवाया।


इस अवसर पर होल्कर की रानी को श्रद्धांजलि देने के लिए गलियारों के प्रांगण में महारानी अहिल्याबाई के बड़े-बड़े पोस्टर लगाए गए हैं। नई गलियारा परियोजना का हिस्सा, बनारस गलियारे के भीतर अहिल्याबाई का एक विशाल भित्ति चित्र है, जबकि घाट से निकलने वाले गलियारे के मार्ग के दाईं ओर, रानी की बैठी हुई मुद्रा में एक प्रतिमा स्थापित की गई है।


अहिल्याबाई की प्रतिमा के पास ही संत आदि शंकराचार्य की प्रतिमा लगाई गई है। विशाल गलियारे में अब भारत माता की एक पत्थर की मूर्ति भी है, जिस पर नक्काशी की गई है और एक तिरंगा भी लगा है।


भारत के मानचित्र को धातु की सतह पर चित्रित किया गया है, जिस पर देश की कला और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाया गया है।


प्रधानमंत्री मोदी के 2014 से निर्वाचन क्षेत्र रहे इस शहर को ‘दिव्य काशी भव्य काशी’ कार्यक्रम से पहले भव्य रूप से सजाया गया है, खासकर गोदौलिया चौक और उसके आसपास पवित्र स्थल की ओर जाने वाली सड़कों को ...।


प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, कोविड-19 वैश्विक महामारी के प्रकोप के बावजूद इस परियोजना का काम तय समय पर पूरा हुआ है।





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कौशल्या माता मंदिर, जहाँ श्रीराम विराजे है अपनी माँ की गोद में....

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 30 किलोमीटर दूरी पर चंदखुरी में भगवान श्रीराम की जननी कौशल्या माता का प्रसिद्ध मंदिर है। छत्तीसगढ़ की पावन भूमि में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जननी माता कौशल्या का मंदिर पूरे भारत में एक मात्र और दुर्लभ मंदिर तो है ही यह छत्तीसगढ़ राज्य की गौरवपूर्ण अस्मिता भी है। प्राकृतिक सुषमा के अनेक अनुपम दृश्य इस स्थल पर दिखाई देते हैं।


पौराणिक कथाएं 


रामायण काल में छत्तीसगढ़ का अधिकांश भाग दण्डकारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आता था। यह क्षेत्र उन दिनों दक्षिणापथ भी कहलाता था। यह रामवनगमन पथ के अंतर्गत है इस कारण श्रीरामचंद्र जी के यहां वनवास काल में आने की जनश्रुति मिलती है। उनकी माता की जन्मस्थली होने के कारण उनका इस क्षेत्र में आगमन ननिहाल होने की पुष्टि करता है।


वाल्मिकी रामायण के अनुसार अयोध्यापति युवराज दशरथ के अभिषेक के अवसर पर कोसल नरेश भानुमंत को अयोध्या आमंत्रित किया गया था। इसी अवसर पर युवराज द्वारा राजकुमारी भानुमति जो अपने पिता के साथ अयोध्या गयी थी, उनकी सुंदरता से मुग्ध होकर युवराज दशरथ ने भानुमंत की पुत्री से विवाह का प्रस्ताव रखा, तभी कालांतर में युवराज दशरथ एवं कोसल की राजकन्या भानुमति का वैवाहिक संबंध हुआ। कोसल की राजकन्या भानुमति को विवाह उपरांत कोसल राजदूहिता होने के कारण कौशल्या कहा जाने लगा। रानी कौशल्या को कोख से प्रभु राम का जन्म हुआ।


कौशल्या माता मंदिर


चंद्रखुरी स्थित माता कौशल्या मंदिर का जीर्णोद्धार 1973 में किया गया था। पुरातात्विक दृष्टि से इस मंदिर के अवशेष सोमवंशी कालीन आठवीं-नौंवी शती ईस्वीं के माने जाते हैं।यहां स्थित जलसेन तालाब के आगे कुछ दूरी पर प्राचीन शिव मंदिर चंद्रखुरी जो इसके समकालीन स्थित है, पाषण से निर्मित इस शिव मंदिर के भग्नावशेष की कलाकृति है।


इस तालाब में सेतु बनाया गया है। सेतु से जाकर इस मंदिर के प्रांगण में संरक्षित कलाकृतियों से माता कौशल्या का यह मंदिर जलसेन तालाब के मध्य में स्थित है, जहां तक पहुंचा जा सकता है। जलसेन तालाब लगभग 16 एकड़ क्षेत्र में विस्तृत है, इस सुंदर तालाब के चारों और लबालब जलराशि में तैरते हुए कमल पत्र एवं कमल पुष्प की सुंदरता इस जलाशय की सुंदरता को बढ़ाती है।


इस मंदिर की नैसर्गिक सुंदरता एवं रमणीयता और बढ़ जाती है।चंद्रखुरी सैंकड़ों साल तक चंद्रपुरी मानी जाती थी क्यूंकि चंद्रपुरी क अर्थ देवताओं की नगरी होता है। हालाँकि अब चंद्रपुरी से चंद्रखुरी हो गया। दरअसल तालाब के संबंध में कहावत है । यह इस क्षेत्र का सबसे बड़ा तालाब था। चूँकि इसके चारों ओर 126 तालाब होने की जनश्रुति मिलती है। किंतु अभी इस क्षेत्र में 20-26 तालाब ही बचे हैं ।





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कृष्ण जन्मभूमि मुद्दे को पुनर्जीवित करने की कोशिश

कुछ ही महीनों में उत्तरप्रदेश में चुनाव होने वाले हैं. जमीनी स्तर की स्थिति पर नजर रखने वाले अधिकांश राजनैतिक विश्लेषकों का मत है कि राज्य में मोदी और योगी की लोकप्रियता में जबरदस्त गिरावट आई है. इसका कारण हैं वे परेशानियां जो आम लोगों को भुगतनी पड़ी हैं. कोरोना के कारण पलायन, किसानों का आंदोलन, बेरोजगारी में जबरदस्त इजाफा और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली जनता में असंतोष के अनेक वजहों में कुछ हैं. इन सबके चलते आम लोग साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के उस दलदल से बाहर निकल रहे हैं जिसमें वे पिछले कुछ दशकों से फंसे हुए थे. उत्तरप्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के हालिया बयान को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.


अपनी सरकार में कानून और व्यवस्था की ‘बेहतरीन’ स्थिति का वर्णन करने वाले अपने एक ट्वीट में उन्होंने समाज को बांटने की अपनी प्रवृत्ति का भरपूर परिचय दिया. उन्होंने कहा कि उत्तरप्रदेश की सरकार ने लुंगी वालों और जालीदार टोपी पहनने वालों द्वारा किए जाने वाले अपराधों, जिनमें जमीनों पर कब्जा और फिरौती के लिए अपहरण शामिल हैं, से उत्तरप्रदेश की जनता को मुक्ति दिलाई है. एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा कि अयोध्या और काशी में भव्य मंदिरों का निर्माण कार्य जारी है और अब मथुरा की बारी है. कई साम्प्रदायिक संगठनों ने यह धमकी भी दी कि वे 6 दिसंबर को मथुरा में ईदगाह पर हिन्दू कर्मकांड करेंगे.


मंदिर-मस्जिद मुद्दे को भाजपा ने सबसे पहले 1984 में उठाया था. सन् 1986 में विश्व हिन्दू परिषद ने यह संकल्प लिया कि भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या, भगवान कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में इन दोनों देवों के और वाराणसी  भगवान शिव के भव्य मंदिर बनाए जाएंगे. बाबरी मस्जिद को ढ़हाते समय संघ परिवार के कार्यकर्ताओं का नारा था कि यह तो केवल शुरूआत है और आगे काशी और मथुरा की बारी है. यह इस तथ्य के बावजूद कि सन 1991 के धर्मस्थल अधिनियम के अनुसार सभी आराधना स्थलों पर 15 अगस्त 1947 की स्थिति बनाए रखी जाना है.


मंदिर-मस्जिद का मुद्दा संघ और भाजपा के लिए वोट कबाड़ने का जरिया बन गया है. राम मंदिर आंदोलन, जिसकी परिणति बाबरी मस्जिद के ध्वंस और राममंदिर के निर्माण में हुई, ने संघ परिवार को चुनावों में जबरदस्त फायदा पहुंचाया. बाबरी मस्जिद मामले में संघ परिवार के सभी दावे खोखले थे. उच्चतम न्यायालय तक को यह कहना पड़ा कि सन 1949 में मस्जिद में रामलला की मूर्तियों की स्थापना एक अपराध था और सन 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस भी एक अपराध था. न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि बाबरी मस्जिद का निर्माण राम मंदिर के मलबे पर किया गया है और भगवान राम का जन्म ठीक उसी स्थान पर हुआ था - ये दोनों दावे अप्रमाणित हैं. पर इस सबके बावजूद इस मुद्दे ने भाजपा को वोटों से मालामाल कर दिया. यह दावा कि मुस्लिम शासकों ने देश में अनेक मंदिर गिराए थे, इतनी बार दुहराया गया कि लोग उसे ध्रुव सत्य मानने लगे. इसमें कोई संदेह नहीं कि मुस्लिम राजाओं ने मंदिर गिराए. परंतु हिन्दू राजा भी मंदिर गिराने में पीछे नहीं थे. सोमनाथ मंदिर के ध्वंस को महमूद गजनी से जोड़ा जाता है. परन्तु उसने धार्मिक कारणों से सोमनाथ पर हमला नहीं किया था. उसका उद्देश्य मंदिर की अथाह संपत्ति लूटना था.


कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ हमें बताती है कि 11वीं सदी के कश्मीर के शासक हर्षदेव के दरबार में एक अधिकारी का काम केवल सोने और चांदी की मूर्तियों को मंदिरों से उखाड़कर राजकोष में पहुंचाना था. जाने-माने अध्येता रिचर्ड ईटन के अनुसार हिन्दू राजा अपने प्रतिद्वंद्वियों के कुलदेवता की मूर्ति खंडित करते थे और औरंगजेब ने गोलकुंडा में स्थित एक मस्जिद को इसलिए गिरा दिया था क्योंकि वहां के शासक तानाशाह ने कई सालों से बादशाह को वार्षिक नजराना नहीं दिया था.


ये सारी जानकारियां ऐतिहासिक दस्तावेजों में उपलब्ध हैं. अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की अपनी नीति के तहत इतिहास के चुनिंदा पक्षों का इस्तेमाल किया. इससे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफरत पैदा हुई. आज स्थिति यह बन गई है कि शाखाओं, स्कूलों और मीडिया संस्थानों के अपने जाल के जरिए साम्प्रदायिक संगठनों ने मुस्लिम राजाओं पर मंदिरों के विध्वंसक होने का ठप्पा लगा दिया है. हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि तर्क और तथ्यों की बात करने वालों को अजीब निगाहों से देखा जाता है.


आंद्रे त्रुश्के की पुस्तक ‘औरंगजेब’ कहती है, “औरंगजेब के शासनकाल की शुरूआत में मुगल साम्राज्य में जो दसियों हजार हिन्दू और जैन मंदिर थे उनमें से सभी नहीं परन्तु अधिकांश औरंगजेब के शासनकाल के अंत में भी खड़े थे. त्रुश्के आगे लिखते हैं, “राजनैतिक घटनाक्रम के कारण औरंगजेब को कुछ हिन्दू मंदिरों पर हमला करना पड़ा. औरंगजेब ने 1669 में काशी विश्वनाथ मंदिर और 1670 में मथुरा के केशवदेव मंदिर को ढ़हाने का हुक्म दिया. परंतु इसके पीछे मंदिर से जुड़े लोगों के राजनैतिक कार्यकलाप थे और इसका उद्देश्य मुगल साम्राज्य के आगे उन्हें झुकाना था.” रिचर्ड ईटन के अनुसार औरंगजेब के शासनकाल में जिन मंदिरों को गिराने के लिए शाही फरमान जारी किए गए उनकी संख्या 1 से 12 के बीच थी.


त्रुश्के लिखते हैं, “सन् 1670 में औरंगजेब ने मथुरा में वीरसिंह बुंदेला द्वारा 1618 में निर्मित कृष्णादेव मंदिर को नेस्तोनाबूद करने का हुक्म दिया. इसके पीछे राजनीतिक कारण थे...हो सकता है कि मथुरा के ब्राम्हणों ने आगरा के किले से भागने में शिवाजी की मदद की हो.”


इतिहास के वैज्ञानिक अध्ययन से हमें यह पता चलता है कि राजाओं का लक्ष्य सत्ता और संपत्ति था. अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक इतिहास लेखन द्वारा राजाओं को उनके धर्म से जोड़ा. इस कुटिल चाल के जरिए मुस्लिम शासकों की हरकतों के लिए आज के मुसलमानों को दोषी ठहराया गया. ब्रिटिश काल से जारी अनवरत प्रचार का ही यह नतीजा है कि आम लोगों की निगाह में मुस्लिम राजा मंदिरों के ध्वंस और इस्लाम में धर्मपरिवर्तन के प्रतीक बन गए हैं. मुस्लिम राजाओं का दानवीकरण और उनके प्रति नफरत ही साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंसा का आधार है और  नफरत और ध्रुवीकरण ही संघ परिवार का प्रमुख हथियार हैं.


मथुरा में कृष्णा जन्मभूमि और शाही ईदगाह का एक-दूसरे के अगल-बगल में होना हमारी वास्तविक संस्कृति को दर्शाता है. भारत में हिन्दू और मुसलमान सदियों से मिलजुलकर रहते आए हैं और एक-दूसरे के त्यौहारों पर खुशियाँ मनाना उनके जीवन का भाग रहा है. मुंबई के दादर में एक ट्रेफिक आईलैंड है जिस पर एक मंदिर, एक मस्जिद और एक चर्च तीनों बने हुए हैं. मुम्बई में सन् 1992-93 की भयावह साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान भी इनमें से एक भी आराधना स्थल को तनिक भी नुकसान नहीं पहुंचाया गया. सभी धर्मों के लोग इस पर बहुत श्रद्धा रखते हैं. क्या हम ऐसे भारत की कल्पना कर सकते हैं जिसमें ऐसे स्थानों के प्रति सम्मान का भाव हो.


-राम पुनियानी-


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इस व्रत को करने पर हनुमानजी करेंगे सभी कष्ट दूर, जानें महत्व ..

हनुमानजी को पराक्रम, बल, सेवा और भक्ति के आदर्श देवता माने जाते हैं। इसी वजह से पुराणों में हनुमानजी को सकलगुणनिधान भी कहा गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि- ‘चारो जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा।’ इस चौपाई का अर्थ है कि हनुमानजी इकलौते ऐसे देवता हैं, जो हर युग में किसी न किसी रूप गुणों के साथ जगत के लिए संकटमोचक बनकर मौजूद रहेंगे। शास्त्रों में कहा गया है कि हनुमानजी की सेवा करने और उनका व्रत रखने से उनकी विशेष कृपा अपने भक्तों पर बनी रहती है। जानिए मंगलवार की व्रत कथा और पूजन विधि।


हनुमानजी का व्रत करने का लाभ

ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, हनुमानजी का व्रत करने से कुंडली में मौजूद सभी ग्रह शांत हो जाते हैं और उनकी अशीम कृपा प्राप्त होती है। अपने भक्तों पर आने वाले हर संकट को हनुमानजी दूर करते हैं। संतान प्राप्ति के लिए हनुमानजी का व्रत फलदायी माना जाता है। इस व्रत को करने से भूत-प्रेत और काली शक्तियों का प्रभाव नहीं पड़ता है। मंगलवार का व्रत करने से सम्मान, साहस और पुरुषार्थ बढ़ता है।


मंगलवार पूजन विधि

हनुमानजी का व्रत लगातार 21 मंगलवार करना चाहिए। मंगलवा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान वगैरह से निवृत्त होकर सबसे पहले हनुमानजी का ध्यान करें और व्रत का संकल्प करें। इसके बाद ईशान कोण की दिशा (उत्तर-पूर्व कोने) में किसी एकांत स्थान पर हनुमानजी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। फिर गंगाजल के छीटें देकर उनका लाल कपड़ा धारण कराएं। फिर पुष्प, रोली और अक्षत के छीटें दें। इसके बाद चमेली के तेल का दीपक जलाएं और तेल की कुछ छीटें मूर्ति या तस्वीर पर डाल दें।


इसके बाद हनुमानजी फूल अर्पित करें और अक्षत व फूल हाथ में रखकर उनकी कथा सुनें और हनुमान चालिसा और सुंदरकांड का पाठ भी करें। इसके बाद आप भोग लगाएं और अपनी मनोकामना बाबा से कहें और प्रसाद सभी में वितरण कर दें। अगर संभव हो सके तो दान जरूर करें। शाम के समय भी हनुमान मंदिर जाकर चमेली के तेल का दीपक जलाएं और सुंदरकांड का पाठ करें और उनकी आरती करें। 21 मंगलवार के व्रत होने के बाद 22वें मंगलवार को विधि-विधान के साथ बजरंगबली का पूजा कर उन्हें चोला चढ़ाएं। उसके बाद 21 ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें भोजन कराएं और क्षमतानुसार दान–दक्षिणा दें।


मंगलवार व्रत कथा

एक समय की बात है एक ब्राह्मण दंपत्ति प्रेमभाव से साथ-साथ रहते थे लेकिन उनकी कोई संतान ना होने के कारण दुखी रहते थे। ब्राह्मण हर मंगलवार के वन जाकर हनुमानजी की पूजा करने जाता था और संतान की कामना करता था। ब्राह्मण की पत्नी भी हनुमानजी की बहुत बड़ी भक्त थी और मंगलवार का व्रत रखती थी। वह हमेशा मंगलवार के दिन हनुमानजी का भोग लगाकर ही भोजन करती थी। एक बार व्रत के दिन ब्राह्मणी भोजन नहीं बना पाई, जिससे हनुमानजी का भोग नहीं लग सका। तब उसने प्रण किया कि वह अगले मंगलवार को हनुमानजी को भोग लगाकर ही भोजन करेगी। वह छह दिन तक भूखी-प्यासी रखी और मंगलवार के दिन व्रत के दौरान बेहोश हो गई।


ब्राह्मणी की निष्ठा और लगन को देखकर हनुमानजी बहुत प्रसन्न हुए और आशीर्वाद के रूप में एक संतान दी और कहा कि यह तुम्हारी बहुत सेवा करेगा। संतान पाकर ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और उसने बालक का नाम मंगल रखा। कुछ समय बाद जब ब्राह्मण घर आया, तो घर में बच्चे की आवाज सुनाई दी और अपनी पत्नी से पूछा कि आखिर यह बच्चा कौन है? ब्राह्मणी की पत्नी ने कहा कि हनुमानजी ने व्रत से प्रसन्न होकर अपने आशीर्वाद के रूप में यह संतान हम दोनो की दी है। ब्राह्मण को अपनी पत्नी की इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। एक दिन जब ब्राह्मणी घर पर नहीं थी तो ब्राह्मण ने मौका देखकर बच्चे को कुएं में गिरा दिया।


अजब-गजब हनुमान, पंचायत में करते हैं फैसला, उतारते हैं प्रेम का भूत

जब ब्राह्मणी घर लौटी तो उसने मंगल के बारे में पूछा। तभी पीछे से मंगल मुस्कुरा कर आ गया और ब्राह्मण बच्चे को देखकर आश्चर्य चकित रह गया। रात को हनुमानजी ने ब्राह्मण को सपने में दर्शन दिए और बताया कि यह संतान तुम्हारी है। ब्राह्मण सत्य जानकर बहुत खुश हुआ। इसके बाद ब्राह्मण दंपत्ति प्रत्येक मंगलवार को व्रत रखने लगे। शास्त्रों के अनुसार, जो भी मनुष्य मंगलवार व्रत और कथा पढ़ता या सुनता है, उसे हनुमानजी की विशेष कृपा प्राप्ति होती है। उसके सभी कष्ट दूर होते हैं और हनुमानजी की दया के पात्र बनते हैं।




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समुद्र का पानी क्यों हुआ खारा, जुड़ा है मां पार्वती से नाता

हिंदू धर्म में शिव पुराण को बहुत ही खास माना जाता हैं। वहीं शास्त्रों में इस बात का वर्णन मिलता है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाराजा पृथु के पुत्रों ने जब समुद्रों का निर्माण किया था तो सातों समुद्र मीठे और दूध जैसे द्रव्यों के थे। लेकिन वर्तमान में दुनियाभर में जितने भी समंदर हैं वो सभी खारे पानी के हैं। आखिर समुद्र का पानी खारा क्यों होता है इसके पीछे एक पौराणिक कथा छुपी हुई है आइए जानते है इस कथा के बारे में....


शिव पुराण के मुताबिक एक बार देवी माता पार्वती शिव को पाने के लिए घोर तपस्या कर रही थी। उनकी तपस्या का तेज इतना था कि देवलोक में बैठे देवताओं का सिहांसन डोलने लगा। इससे देवता भयभीत हो गए। जब सभी देवता इस समस्या को हल करने में जुटे थे उसी वक्त समुद्र देव माता पार्वती के स्वरूप को देखकर मोहित हो गए। 


समुद्र ने भगवान शिव को कहा था बुरा भला


जब माता पार्वती की तपस्या पूरी हो गई तब समुद्र देव ने उनसे विवाह करने की इच्छा जताई। इस संबंध में उन्होंने मां पार्वती के पास विवाह का प्रस्ताव भी रखा। यह सुनकर माता पार्वती ने समुद्र देव से कहा कि वे कैलाशपति भगवान शिव से प्रेम करती हैं और उन्हें अपना पति परमेश्वर मान चुकी हैं। जब समुद्र देव ने यह सुना तो उन्हें गुस्सा आ गया। वे भगवान शिव के लिए भलाबुरा कहने लगे। उन्होंने क्रोध में आकर कहा, "उस भस्माधारी आदिवासी में ऐसा क्या है, जो मुझमें नहीं है, मैं सभी मनुष्यों की प्यास बुझाता हूं, मेरा चरित्र दूध की तरह सफेद है। हे पार्वती! मेरा विवाह प्रस्ताव स्वीकार करें।"


क्रोध में आकर मां पार्वती ने दिया श्राप


माता पार्वती ने जब अपने सामने भोलेनाथ का तिरस्कार होते हुए देखा तो उन्हें सहन नहीं हुआ। उन्हें समुद्र देव के ऊपर क्रोध आ गया। उन्होंने समुद्र देव को शाप देते हुए कहा, जिस मीठे पानी पर तुमको घमंड है, वह खारा हो जाएगा। खारे पानी की वजह से तुम्हारा जल मनुष्य ग्रहण नहीं कर पाएंगे। मां पार्वती के उस श्राप के कारण समुद्र का जल खारा हो गया। एक पौराणिक कथा यह भी है कि जब समुद्र हुआ था, तब मंथन के प्रभाव से भी समुद्र जल खारा हो गया था। 





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'हिन्द की चादर' गुरू तेग बहादुर

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर द्वारा गुरु श्री तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस नानकशाही कैलेंडर के अनुसार 8 दिसम्बर को श्रद्धापूर्वक मनाया जा रहा है।


हालांकि सरकारी अवकाश सूची में शहीद दिवस का अवकाश पुराने कैलेंडर के अनुसार 24 नवम्बर को दिया गया था लेकिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अनुसार वास्तव में गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस 8 दिसम्बर को है, इसीलिए इस वर्ष यह अब 8 दिसम्बर को मनाया जा रहा है।


सिखों के नौवें गुरू तेग बहादुर सदैव सिख धर्म मानने वाले और सच्चाई की राह पर चलने वाले लोगों के बीच रहा करते थे, जिन्होंने न केवल धर्म की रक्षा की बल्कि देश में धार्मिक आजादी का मार्ग भी प्रशस्त किया। सिखों के 8वें गुरू हरिकृष्ण राय की अकाल मृत्यु हो जाने के बाद तेग बहादुर को नौवां गुरू बनाया गया था, जिनके जीवन का प्रथम दर्शन ही यही था कि धर्म का मार्ग सत्य और विजय का मार्ग है। 1 अप्रैल 1621 को माता नानकी की कोख से जन्मे तेग बहादुर ने धर्म और आदर्शों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। 14 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में वीरता का परिचय दिया था और उनकी इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने ही उनका नाम 'तेग बहादुर' अर्थात् तलवार का धनी रखा था।


गुरू तेग बहादुर ने हिन्दुओं तथा कश्मीरी पंडितों की मदद कर उनके धर्म की रक्षा करते हुए अपने प्राण गंवाए थे। क्रूर मुगल शासक औरंगजेब ने उन्हें हिन्दुओं की मदद करने और इस्लाम नहीं अपनाने के कारण मौत की सजा सुनाई थी- उनका सिर कलम करा दिया था। उस आततायी और धर्मांध मुगल शासक की धर्म विरोधी तथा वैचारिक स्वतंत्रता का दमन करने वाली नीतियों के विरूद्ध गुरू तेग बहादुर का बलिदान एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक घटना थी।


विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वालों में गुरू तेग बहादुर का स्थान अद्वितीय है। एक धर्म रक्षक के रूप में उनके महान बलिदान को समूचा विश्व कदापि नहीं भूल सकता। उस समय औरंगजेब ने आदेश पारित किया था कि राजकीय कार्यों में किसी भी उच्च पद पर किसी हिन्दू की नियुक्ति नहीं की जाए और हिन्दुओं पर 'जजिया' (कर) लगा दिया जाए। उसके बाद हिन्दुओं पर हर तरफ अत्याचार का बोलबाला हो गया। अनेक मंदिरों को तोड़ कर वहां मस्जिदें बनवा दी गई और मंदिरों के पुजारियों, साधु-संतों की हत्याएं की गई।


हिन्दुओं पर लगातार बढ़ते अत्याचारों और भारी-भरकम नए-नए कर लाद दिए जाने से भयभीत बहुत सारे हिन्दुओं ने उस दौर में धर्म परिवर्तन कराकर मजबूरन इस्लाम धर्म अपना लिया। औरंगजेब के अत्याचारों के उस दौर में कश्मीर के कुछ पंडित गुरू तेग बहादुर के पास पहुंचे और उन्हें अपने ऊपर हो रहे जुल्मों की दास्तान सुनाई। गुरू जी ने उनकी पीड़ा सुनने के बाद मुस्कराते हुए कहा कि तुम लोग बादशाह से जाकर कहो कि हमारा पीर तेग बहादुर है, अगर वह मुसलमान हो जाए तो हम सभी इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर के सूबेदार शेर अफगन के मार्फत यह संदेश औरंगजेब तक पहुंचाया तो औरंगजेब बिफर उठा। उसने गुरू तेग बहादुर को दिल्ली बुलाकर उनके परम प्रिय शिष्यों मतिदास, दयालदास और सतीदास के साथ बंदी बना लिया और तीनों शिष्यों से कहा कि अगर तुम लोग इस्लाम धर्म कबूल नहीं करोगे तो कत्ल कर दिए जाओगे।


भाई मतिदास ने जवाब दिया कि शरीर तो नश्वर है और आत्मा का कभी कत्ल नहीं हो सकता। यह सुनकर औरंगजेब ने मतिदास को जिंदा ही आरे से चीर देने का हुक्म दिया। औरंगजेब के फरमान पर जल्लादों ने भाई मतिदास को दो तख्तों के बीच एक शिकंजे में बांधकर उनके सिर पर आरा रखकर आरे से चीर दिया और उनकी बोटी-बोटी काट दी लेकिन जब भाई मतिदास को आरे से चीरा जाने लगा, तब भी वे भयभीत हुए बिना 'श्री जपुजी साहिब' का पाठ करते रहे। अगली बारी थी भाई दयालदास की लेकिन उन्होंने भी जब दो टूक लहजे में इस्लाम धर्म कबूल करने से इनकार कर दिया तो औरंगजेब ने उन्हें गर्म तेल के कड़ाह में डालकर उबालने का हुक्म दिया। सैनिकों ने उसके हुक्म पर उनके हाथ-पैर बांधकर उबलते हुए तेल के कड़ाह में डालकर उन्हें बड़ी दर्दनाक मौत दी लेकिन भाई दयालदास भी अपने अंतिम श्वांस तक 'श्री जपुजी साहिब' का पाठ करते रहे। अगली बारी थी भाई सतीदास की लेकिन उन्होंने भी दृढ़ता से औरंगजेब का इस्लाम धर्म अपनाने का फरमान ठुकरा दिया तो उस आततायी क्रूर मुगल शासक ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए उन्हें कपास से लपेटकर जिंदा जला देने का हुक्म दिया। भाई सतीदास का शरीर धू-धूकर जलने लगा लेकिन वे भी निरंतर 'श्री जपुजी साहिब' का पाठ करते रहे।


औरंगजेब के आदेश पर 22 नवम्बर 1675 को काजी ने गुरू तेग बहादुर से कहा कि हिन्दुओं के पीर! तुम्हारे सामने तीन ही रास्ते हैं- पहला, इस्लाम कबूल कर लो। दूसरा, करामात दिखाओ और तीसरा, मरने के लिए तैयार हो जाओ। इन तीनों में से तुम्हें कोई एक रास्ता चुनना है। अन्याय और अत्याचार के समक्ष झुके बिना धर्म और आदर्शों की रक्षा करते हुए गुरू तेग बहादुर ने तीसरे रास्ते का चयन किया। जालिम औरंगजेब को यह सब भला कहां बर्दाश्त होने वाला था। उसने गुरू तेग बहादुर का सिर कलम करने का हुक्म सुना दिया। 24 नवम्बर के दिन चांदनी चौक के खुले मैदान में एक विशाल वृक्ष के नीचे गुरू तेग बहादुर समाधि में लीन थे, वहीं औरंगजेब का जल्लाद जलालुद्दीन नंगी तलवार लेकर खड़ा था। अंततः काजी के इशारे पर जल्लाद ने गुरू तेग बहादुर का सिर धड़ से अलग कर दिया गया, जिसके बाद चारों ओर कोहराम मच गया। इस प्रकार अपने धर्म में अडिग रहने और दूसरों को धर्मान्तरण से बचाने के लिए गुरू तेग बहादुर और उनके तीनों परम प्रिय शिष्यों ने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहूति दे दी।


धन्य हैं भारत की पावन भूमि पर जन्म लेने वाले और दूसरों की सेवा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले उदार चित्त, बहादुर व निर्भीक ऐसे महापुरूष। हिन्दुस्तान तथा हिन्दू धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हुए गुरू तेग बहादुर को उसके बाद से ही 'हिन्द की चादर गुरू तेग बहादुर' के नाम से जाना जाता है। उन्होंने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपनी कुर्बानी दी, इसीलिए उन्हें 'हिन्द की चादर' कहा जाता है।


-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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इस्लाम धर्म छोड़कर वसीम रिजवी ने अपनाया हिंदू धर्म

गाजियाबाद : अपने बयानों को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहने वाले वसीम रिजवी ने इस्लाम छोड़ गाजियाबाद में आज हिंदू धर्म अपना लिया। यति नरसिंहानंद गिरि महाराज ने उन्हें पूरे धार्मिक रीति रिवाज से सनातन धर्म में शामिल कराया है। वहीं धर्म परिवर्तन होने के बाद वसीम रिजवी अब त्यागी हो गए हैं।


गाजियाबाद स्थित डासना देवी मंदिर में अपना धर्म परिवर्तन करने के बाद वह अब त्यागी बिरादरी में शामिल हुए और जानकारी के अनुसार उनका नया नाम जितेंद्र नारायण सिंह त्यागी रखा गया है।


इस दौरान उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि, हिंदू होना एक जीवन शैली है। कानूनी तरीके से कोई भी अपना धर्म आसानी से बदल सकता है लेकिन किसी मंदिर में जाकर किसी खास संस्कार या प्रक्रिया के तहत पूरी तरह से हिंदू बनना संभव नहीं है। इसके लिए एक पूरी प्रक्रिया को अपनाना होता है।


दरअसल हाल ही में हरबीर नारायण सिंह त्यागी (वसीम रिजवी) काफी सुर्खियों में रहे थे जब उन्होंने कुरान से 26 आयतें हटाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।


इसके बाद उन्होंने काफी धमकियां भी मिली और मुस्लिम समाज के लोगों ने इसपर आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि अदालत में सुनवाई के दौरान उनकी याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया था।


उनके मुताबिक, हर दिन उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलती रहती थी और इस्लाम से निकाल ही दिया गया था और हिंदू धर्म में जितनी अच्छाइयां हैं वह किसी और धर्म में नहीं पाई जाती।


धर्म परिवर्तन करने के बाद उन्होंने मीडिया से आगे बात करते हुए कहा कि, आज से वह सिर्फ हिंदुत्व के लिए काम करेंगे। वहीं मुसलमानों का वोट किसी भी सियासी पार्टी को नहीं जाता है। मुसलमान केवल हिंदुत्व के खिलाफ और हिंदुओं को हराने के लिए वोट करते हैं।


इससे पहले उन्होंने एक ऐलान भी किया था, जिसमें अपने मरने के बाद उन्होंने हिंदू रीति रिवाज के तहत अंतिम संस्कार कराने की इच्छा जाहिर की। साथ ही उनकी चिता को यति नरसिम्हानंद ही अग्नि देने की भी बात कही थी।


दरअसल उनको इस बात का डर था कि कई लोग उनके मरने के बाद उनके शरीर को दफनाने नहीं देंग,े जिसके बाद उन्होंने इस बात का ऐलान किया था।




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देवताओं के तेज से प्रकट हुई थीं महादुर्गा, जानिए कहां से मिले उन्हें अस्त्र-शस्त्र

महादुर्गा पार्वती का दूसरा नाम है। हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। पुराण में महादुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। महादुर्गा असल में शिव की पत्नी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने लिया था। इस तरह महादुर्गा युद्ध की देवी हैं। देवी दुर्गा के स्वयं कई रूप हैं।

 

मुख्य रूप उनका गौरी है, अर्थात शान्तमय, सुन्दर और गोरा रूप। उनका सबसे भयानक रूप काली है, अर्थात काला रूप। विभिन्न रूपों में महादुर्गा भारत और नेपाल के कई मन्दिरों और तीर्थस्थानों में पूजी जाती हैं। कुछ दुर्गा मन्दिरों में पशुबलि भी चढ़ती है। भगवती दुर्गा की सवारी शेर है। 

 

एक बार महिषासुर नामक असुरों के राजा ने अपने बल और पराक्रम से देवताओं से स्वर्ग छिन लिया। जब सारे देवता भगवान शंकर व विष्णु के पास सहायता के लिए गए। पूरी बात जानकर शंकर व विष्णु को क्रोध आया तब उनके तथा अन्य देवताओं से मुख से तेज प्रकट हुआ, जो नारी स्वरूप में परिवर्तित हो गया। 

 

शिव के तेज से देवी का मुख, यमराज के तेज से केश, विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से वक्षस्थल, सूर्य के तेज से पैरों की अंगुलियां, कुबेर के तेज से नाक, प्रजापति के तेज से दांत, अग्नि के तेज से तीनों नेत्र, संध्या के तेज से भृकुटि और वायु के तेज से कानों की उत्पत्ति हुई।

 

इसके बाद देवी को शस्त्रों से सुशोभित भी देवों ने किया। देवताओं से शक्तियां प्राप्त कर महादुर्गा ने युद्ध में महिषासुर का वध कर देवताओं को पुनः स्वर्ग सौंप दिया। महिषासुर का वध करने के कारण उन्हें ही महादुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है।

 

देवताओं ने दिए माता दुर्गा को शस्त्र

देवी भागवत के अनुसार, शक्ति को प्रसन्न करने के लिए देवताओं ने अपने प्रिय अस्त्र-शस्त्र सहित कई शक्तियां उन्हें प्रदान की। इन सभी शक्तियों को प्राप्त कर देवी मां ने महाशक्ति का रूप ले लिया-


1. भगवान शंकर ने मां शक्ति को त्रिशूल भेंट किया।

2. भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र प्रदान दिया।

3. वरुण देव ने शंख भेंट किया।

4. अग्निदेव ने अपनी शक्ति प्रदान की।

5. पवनदेव ने धनुष और बाण भेंट किए।

6. इंद्रदेव ने वज्र और घंटा अर्पित किया।

7. यमराज ने कालदंड भेंट किया।

8. प्रजापति दक्ष ने स्फटिक माला दी।

9. भगवान ब्रह्मा ने कमंडल भेंट दिया।

10. सूर्य देव ने माता को तेज प्रदान किया।

11. समुद्र ने मां को उज्जवल हार, दो दिव्य वस्त्र, दिव्य चूड़ामणि, दो कुंडल, कड़े, अर्धचंद्र, सुंदर हंसली और अंगुलियों में पहनने के लिए रत्नों की अंगूठियां भेंट कीं।

12. सरोवरों ने उन्हें कभी न मुरझाने वाली कमल की माला अर्पित की।

13. पर्वतराज हिमालय ने मां दुर्गा को सवारी करने के लिए शक्तिशाली सिंह भेंट किया।

14. कुबेर देव ने मधु (शहद) से भरा पात्र मां को दिया।




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वृन्दावन के बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं को जबरन चंदन-टीका लगाने पर रोक

मथुरा :  उत्तर प्रदेश में मथुरा के वृन्दावन शहर में स्थित बांके बिहारी मंदिर की प्रशासनिक अधिकारी ने मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के माथे पर जबरन टीका या चंदन लगाए जाने पर रोक लगा दी है।


ऐसा करने वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। मंदिर के राजभोग के सेवायत शैलेंद्र नाथ गोस्वामी ने प्रशासनिक अधिकारी सिविल न्यायाधीश (जूनियर डिवीजन) अर्चना सिंह से शिकायत की थी कि कई गोस्वामी जिनकी उस दिन सेवा भी नहीं होती वे मंदिर में बैठ जाते हैं और वहां दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के माथे पर चंदन या टीका लगाकर उनसे दान-दक्षिणा मांगते हैं।


उन्होंने कहा कि ऐसा करने से मंदिर की व्यवस्था भंग होती है तथा प्रतिष्ठा को भी आघात पहुंचता है। ऐसे में देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु स्वयं को असहज स्थिति में पाते हैं और मंदिर के प्रति उनके मन में गलत छवि उभरती है। उन्होंने यह भी बताया कि पूर्व मंदिर प्रशासक द्वारा ऐसे मामलों पर रोक लगाने के लिए 16 मार्च 2017 में भी एक आदेश पारित किया था।


गोस्वामी ने बताया कि मंदिर प्रशासक न्यायाधीश ने शिकायत पर संज्ञान लेते हुए उक्त आदेश का सख्ती से अनुपालन करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही मंदिर परिसर में चबूतरे आदि पर अवैध कब्जा करने वाले और वहां बैठने वाले लोगों को भी हटाए जाने को कहा गया है।






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मंदिरों की मणिमाला का मोती है जगत का अम्बिका मंदिर

सरस्वती, नृत्य भाव में गणपति, महिषासुर मर्दिनी, नवदुर्गा, वीणाधारिणी, यम, कुबेर, वायु, इन्द्र, वरूण, प्रणय भाव में युगल, अंगड़ाई लेते हुए व दर्पण निहारती नायिका, शिशु क्रीडा, वादन, नृत्य आकृतियां एवं पूजन सामग्री सजाये रमणी आदि कलात्मक प्रतिमाओं का अचंभित कर देने वाली मूर्तियों का खजाना और आदित्य स्थापत्य कला को अपने में समेटे जगत का अम्बिका मंदिर राजस्थान के मंदिरों की मणिमाला का मोती कहा जा सकता है। मूर्तियों का लालित्य, मुद्रा, भाव, प्रभावोत्पादकता, आभूषण, अलंकरण, केशविन्यास, वस्त्रों का अंकन और नागर शैली में स्थापत्य का आकर्षण इस शिखरबंद मंदिर को खजुराहो और कोणार्क मंदिरों की श्रृंखला में ला खड़ा करता है। मंदिर के अधिष्ठान, जंघाभाग, स्तम्भों, छतों, झरोखों एवं देहरी का शिल्प-सौन्दर्य देखते ही बनता है।

 

जगत का अम्बिका मंदिर राजस्थान में उदयपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर गिर्वा की पहाडि़यों के बीच बसे कुराबड़ गांव के समीप अवस्थित है। मंदिर परिसर करीब 150 फीट लम्बे ऊंचे परकोटे से घिरा है। पूर्व की ओर प्रवेश करने पर दुमंजिले प्रवेश मण्डप पर बाहरी दीवारों पर प्रणय मुद्रा में नर-नारी प्रतिमाएं, द्वार स्तम्भों पर अष्ठमातृका प्रतिमाएं, रोचक कीचक आकृतियां तथा मण्डप की छत पर समुद्र मंथन के दृश्यांकन दर्शनीय हैं। छत का निर्माण परम्परागत शिल्प के अनुरूप कोनों की ओर से चपटे एवं मध्य में पद्म केसर के अंकन के साथ निर्मित है। मण्डप में दोनों ओर हवा और प्रकाश के लिए पत्थर से बनी अलंकृत जालियां ओसियां देवालय के सदृश्य हैं।

 

प्रवेश मण्डप और मुख्य मंदिर के मध्य खुला आंगन है। प्रवेश मण्डप से मुख्य मंदिर करीब 50 फुट की दूरी पर पर्याप्त सुरक्षित अवस्था में है। मंदिर के सभा मण्डप का बाहरी भाग दिग्पाल, सुर-सुंदरी, विभिन्न भावों में रमणियों, वीणाधारिणी, सरस्वती, विविध देवी प्रतिमाओं की सैंकड़ों मूर्तियों से सज्जित है। दायीं ओर जाली के पास सफेद पाषाण में निर्मित नृत्य भाव में गणपति की दुर्लभ प्रतिमा है। मंदिर के पार्श्व भाग में बनी एक ताक में महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उत्तर एवं दक्षिण ताक में भी विविध रूपों में देवी अवतार की प्रतिमाएं नजर आती हैं। मंदिर के बाहर की दीवारों की मूर्तियों के ऊपर एवं नीचे कीचक मुख, गज श्रृंखला एवं कंगूरों की कारीगरी देखते ही बनती है। प्रतिमाएं स्थानीय पारेवा नीले-हरे रंग के पाषाण में तराशी गई हैं।

 

गर्भ गृह की परिक्रमा हेतु सभा मण्डप के दोनों ओर छोटे-छोटे प्रवेश द्वार बनाए गए हैं। गर्भ गृह की विग्रह पटि्टका मूर्तिकला का अद्भुत खजाना है। यहां द्वारपाल के साथ गंगा, यमुना, सुर-सुंदरी, विद्याधर एवं नृत्यांगनाओं के साथ-साथ देवप्रतिमाओं के अंकन में शिल्पियों का श्रम देखते ही बनता है। गर्भ गृह की देहरी भी अत्यन्त कलात्मक है। गर्भ गृह में प्रधान पीठिका पर अम्बिका माता की प्रतिमा स्थापित है।

 

मध्यकालीन गौरवपूर्ण मंदिरों की श्रृंखला में सुनियोजित ढंग से बनाया गया जगत का अम्बिका मंदिर मेवाड़ के प्राचीन उत्कृष्ठ शिल्प का नमूना है। जीवन की जीवंतता एवं आनंदमयी क्षणों की अभिव्यक्ति मूर्तियों में स्पष्ट दर्शनीय है। यहां से प्राप्त प्रतिमाओं के आधार पर इतिहासकारों का मानना है कि यह स्थान पांचवी व छठी शताब्दी में शिव-शक्ति संप्रदाय का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। इसका निर्माण खजुराहो में बने लक्ष्मण मंदिर से पहले करीब 960 ईस्वी के आसपास माना जाता है। मंदिर के स्तम्भों पर उत्कीर्ण लेखों से पता चलता है कि ग्यारहवीं शताब्दी में मेवाड़ के शासक अल्लट ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। यहां देवी को अम्बिका कहा गया है। धार्मिक महत्व की दृष्टि से यह प्राचीन शक्तिपीठ है।

 

मंदिर को पुरातत्व विभाग के अधीन संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। यद्यपि इस मंदिर को देखने के लिए उदयपुर से पर्यटक बड़ी संख्या में पहुंचते हैं, तथापि पुरातत्व, मूर्ति एवं शिल्पकला में रूचि रखने वालों के लिए मंदिर का विशेष महत्व है।

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कैसे होता है आत्मा का परमात्मा से मिलन

यह सृष्टि परमात्मा पर ही टिकी हुई है। आज जो इस संसार का संतुलन बना हुआ है। वह ईश्वर के द्वारा ही संभव है। उसी ने इस सम्पूर्ण जगत की रचना की है। उसके अतिरिक्त और सब मिथ्या है, भ्रम है, स्वप्न है। हम सब इस संसार सागर में किसी न किसी कार्य को लेकर इतने व्यस्त रहते है की भगवान को भूल ही जाते है। और यह नहीं जानते की इस जगत से मुक्ति का माध्यम तो सिर्फ भगवान का ध्यान और चिंतन है। सांसारिक क्रिया कलाप, धन दौलत, जन ये सभी नाशवान है। आज नहीं तो कल हमारा साथ छोड़ देंगे।


इस जगत में रहने वाले प्रत्येक मानव को जीवन यापन करने के लिए क्रियाकलाप तो जरूरी है पर यह नहीं की वह भगवान को भूल जाए। भगवान की मानव को इस संसार से छुटकारा दिलाता है, ईश्वर उपासना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। नदियां जब तक समुद्र में नहीं मिल जातीं अस्थिर और बेचैन रहती है। मनुष्य की असीमता भी अपने आपको मनुष्य मान लेने की भावना से ढकी हुई है। उपासना विकास की प्रक्रिया है। संकुचित को सीमा रहित करना, स्वार्थ को छोड़कर परमार्थ की ओर अग्रसर होना, मैं और मेरा छुड़ाकर हम और हमारे की आदत डालना ही मनुष्य के आत्म-तत्व की ओर विकास की परम्परा है। 


यह तभी सम्भव है। जब सर्वशक्तिमान परमात्मा को स्वीकार कर लें, उसकी शरणागति की प्राप्ति हो जाय। मनुष्य रहते हुए मानवता की सीमा को भेदकर उसे देवस्वरूप में विकसित कर देना ईश्वर की शक्ति का कार्य है। उपासना का अर्थ परमात्मा से उस शक्ति को प्राप्त करना ही है। 


जान-बूझकर या अकारण परमात्मा कभी किसी को दण्ड नहीं देता। प्रकृति की स्वच्छन्द प्रगति प्रवृत्ति में ही सबका हित नियन्त्रित है। जो इस प्राकृतिक नियम से टकराता है वह बार-बार दुःख भोगता है। और तब तक चैन नहीं पाता जब तक वापस लौटकर फिर उस सही मार्ग पर नहीं चलने लगता। भगवान् भक्त की भावनाओं का फल तो देते हैं किन्तु उनका विधान सभी संसार के लिये एक जैसा ही है। भावनाशील व्यक्ति भी जब तक अपने पाप की सीमायें नहीं पार कर लेता तब तक अटूट विश्वास, दृढ़ निश्चय रखते हुए भी उन्हें प्राप्त नहीं कर पाता।





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सिखों के खिलाफ नफरत फैलाने के मामलो में दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी की शिकायत पर कंगन रनौत खिलाफ केस दर्ज

- कंगना को गिरफ्तार करके पदम श्री एवार्ड वापस लिया जाए : मनजिन्दर सिंह सिरसा


नई दिल्ली : दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की शिकायत पर विवादग्रस्त कंगन रनौत के खिलाफ सांप्रदायिक नफरत फैलाने का केस मुम्बई के खार पुलिस थाने में दर्ज हो गया है। उसके खिलाफ एफ.आई.आर. नंबर 724 /21 धारा 295 ए के अंतर्गत केस दर्ज किया गया है।

इस बारे यहां एक प्रैस कान्फ्रेंस में जानकारी देते हुए कमेटी के प्रधान सरदार मनजिन्दर सिंह सिरसा ने बताया कि दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी और मुम्बई की संगतों के सहयोग से केस दर्ज हुआ है और हम मांग करते हैं कि उसको तुरंत गिरफ्तार किया जाए और उससे पदम श्री एवार्ड भी वापस लिया जाए। सवालों के जवाब देते हुए श्री सिरसा ने कहा कि हम वीडियो के द्वारा हम उसके माँ बाप को भी कहा था कि आप अपनी बच्ची को समझाएं। या तो यह नशे करती है या फिर यह मानसिक तौर पर बीमार है और इसका इलाज करवाना चाहिए।

श्री सिरसा ने बताया कि दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी ने मुम्बई के स्थानीय सिख संस्थाओं के साथ मिल कर खार पुलिस थाने में शिकायत दी थी जिस के आधार पर केस दर्ज किया गया है। श्री सिरसा ने कहा कि शायद कंगन रनौत को फिल्में नाम मिलने कारण वह मायूस है और वह प्रचार हासिल करने के लिए ऐसीं विवादग्रस्त पोस्टें डालती रहती है। उन्होंने कहा कि हम आशा करते हैं कि अब कंगना रनौत को जल्दी ही गिरफ्तार किया जाएगा। उन्होंने यह भी आशा प्रकट की कि राष्ट्रपति को की अपील पर कार्यवाही करते हुए कंगन रणौत से पदम श्री वापिस लिया जाएगा।

उन्होंने मुम्बई की सिंह सभाएं और स्थानिक संगत का धन्यवाद किया जिन के सहयोग से यह केस दर्ज हुआ है। एक सवाल के जवाब में सरदार सिरसा ने कहा कि जो खार पुलिस ने केस दर्ज किया है, उस में स्पष्ट लिखा है कि इसने इंस्टाग्राम पर पोस्ट डाली है और अब हम इंस्टाग्राम तक भी पहुँच करेंगे कि इसका अकाउंट बैन किया जाए।




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तो इस तरह भगवान बुद्ध ने अपने शिष्‍यों को ज्ञान का महत्‍व समझाया

एक दिन गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं को तंबाधातिका के बारे में बताया। तंबाधातिका 55 सालों तक एक राज्य का जल्लाद रहा। सेवानिवृत्ति के बाद एक दिन तंबाधातिका ने खिचड़ी बनाई और नहा-धोकर खिचड़ी थाली में डाली। वह खिचड़ी खाने ही वाला था कि दरवाजे पर भिक्षु सारिपुत्त पहुंचे। सारिपुत्त ध्यान से उठे ही थे और उन्हें जोरों की भूख लगी थी। तंबाधातिका ने सोचा कि जीवन भर उसने हत्याएं की हैं, आज पुण्य का मौका हाथ लगा है। उसने भिक्षु को अंदर बुलाया और उनके सामने खिचड़ी रख दी।


भोजन करने के बाद भिक्षु ने उसे धम्म का उपदेश दिया। लेकिन तंबाधातिका ने नहीं सुना, क्योंकि उस दौरान वह अपना जल्लाद का जीवन याद कर रहा था। भिक्षु सारिपुत्त ने उससे पूछा कि क्या वह चोरों को मारना चाहता था या इसलिए मारा क्योंकि राजा ने आदेश दिया था। तंबाधातिका ने कहा कि उसने बस आज्ञा का पालन किया अन्यथा उसकी उन्हें मारने की कोई इच्छा नहीं थी। तब भिक्षु ने पूछा, ‘अगर ऐसा है, तो आप दोषी होंगे या नहीं?’ तंबाधातिका ने सोचा कि चूंकि वह बुरे कामों के लिए जिम्मेदार नहीं था, तो वह दोषी नहीं था। इसके बाद वह शांत हो गया और भिक्षु ने उपदेश पूरा किया। जब वह भिक्षु को विदा करके लौटा तो उसकी मौत हो गई।


बुद्ध ने भिक्षुओं को बताया कि इस तरह से तंबाधातिका को मोक्ष प्राप्त हुआ। भिक्षु दुविधा में पड़ गए। उन्होंने बुद्ध से पूछा कि जीवन भर हत्याएं करने वाले को भला मोक्ष कैसे मिल सकता है? बुद्ध मुस्कुराए और बोले, ‘तंबाधातिका ने अंत समय में ज्ञान प्राप्त कर लिया था। भिक्षु सारिपुत्त ने उनके पूरे जीवन में पहली बार ज्ञान के शब्द कहे, जिसे उन्होंने समझ लिया था कि ज्ञान ही तो मोक्ष है।’ बुद्ध बोले, ‘बिना ज्ञान का हजार शब्दों का उपदेश बेकार है और जिस एक शब्द से मन शांत हो जाए, वह सबसे बड़ा ज्ञान है।’


संकलन : करुणा मौर्य




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ऐसे करें चंद्र दर्शन और पूजा, मिलता है ये फल

हिंदू कैलेंडर के हिसाब से चंद्र दर्शन हर माह में एक बार होता ही हैं। चन्द्र दर्शन तब किया जाता है जब अमावस्या के बाद पहली बार चंद्रमा दिखाई देता है। चंद्र दर्शन हिंदु धर्म में काफी महत्व रखता है क्योंकि चद्रंमा को देवता समान माना जाता है। भक्त इस दिन भगवान चंद्र की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं और चंद्र देवता की विशेष पूजा करते हैं। इस विशेष दिन पर चंद्रमा को देखने के लिए इसे बहुत भाग्यशाली और समृद्ध माना जाता है। भगवान चंन्द्रमा की पूजा घर में सफलता और सौभाग्य लाती है।


अनुष्ठान: इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और अपने पति और बच्चों की लंबी उम्र की कामना करती हैं। अपनी श्रद्धा और भक्ति के अनुसार लोग भी इस दिन व्रत रख पूजा करते हैं। व्रत के दौराना भक्त पूरे दिन किसी भी प्रकार का भोजन ग्रहण नहीं करते हैं। चांद दिखने के बाद ही व्रत खत्म होता हैं। साथ ही इस दिन ब्राह्मणों को चीनी,चावल और कपड़े दान करना और भी अधिक अच्छा माना जाता हैं।


महत्व: चंद्रमा को नौ ग्रहों में से बहुत ही विशेष माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि चंद्रमा का पृथ्वी पर मनुष्यों जीवन पर एक बहुत ही विशेष प्रभाव होता है। चंद्र दर्शन करने से और इस दिन व्रत करने से सभी प्रकार की नकारात्मकता से छुटकारा मिलता है। जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है। इस विशेष दिन पर भगवान चंद्रमा की पूजा करने से भक्तों के जीवन में पवित्रता और ज्ञान का अद्भुद् संचार होता है। जीवन में नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है। व्रत के दौरान शक्तिशाली चंद्र मंत्रों का जाप किया जाता है ताकि अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सके।



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आरती के बाद इसलिए बोला जाता है कर्पूरगौरं करुणावतारं... मंत्र

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि।।


मंदिर या घर या किसी धार्मिक आयोजन में जब भी पूजन कर्म होते हैं तो वहां आरती के बाद यह मंत्र विशेष रूप से बोला जाता है। इस मंत्र से शिवजी की स्तुति की जाती है। इसका अर्थ है-


कर्पूरगौरं- कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले।

करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं।

संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार हैं।

भुजगेंद्रहारम्- इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं।

सदा वसन्तं हृदयाविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है।


मंत्र का पूरा अर्थ


जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है।


यह मंत्र इसलिए

किसी भी देवी-देवता की आरती के बाद कर्पूरगौरम् करुणावतारं....मंत्र ही क्यों बोला जाता है, इसके पीछे बहुत गहरे अर्थ छिपे हुए हैं। भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय विष्णु द्वारा गाई हुई मानी गई है। अमूमन ये माना जाता है कि शिव शमशान वासी हैं, उनका स्वरूप बहुत भयंकर और अघोरी वाला है। लेकिन, ये स्तुति बताती है कि उनका स्वरूप बहुत दिव्य है।


शिव को सृष्टि का अधिपति माना गया है, वे मृत्युलोक के देवता हैं, उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है, पशुपति का अर्थ है संसार के जितने भी जीव हैं (मनुष्य सहित) उन सब का अधिपति। ये स्तुति इसी कारण से गाई जाती है कि जो इस समस्त संसार का अधिपति है, वो हमारे मन में वास करे। शिव श्मशान वासी हैं, जो मृत्यु के भय को दूर करते हैं। हमारे मन में शिव वास करें, मृत्यु का भय दूर हो।



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सूर्यदेव को प्रसन्न करना हो, तो रविवार को करें इस मंत्र से पूजा


रविवार सूर्य देव की पूजा का विशेष दिन है। अगर आपकी कुंडली में सूर्य का दोष है तो इस मंत्र के साथ पूजा जरुर करनी चाहिए। सूर्य देव बहुत ही जल्द प्रसन्न हो जाते है। जिससे सूर्य की कृपा व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। साथ ही, नौकरी और भाग्य संबंधी परेशानियां भी सूर्य पूजा से दूर हो सकती हैं।


हिंदू धर्म के शास्त्रों में सूर्य पूजा के लिए कई मंत्र बताए गए हैं, इन मंत्रों का जप सुबह-सुबह करना चाहिए। रविवार से शुरू करके हर रोज सूर्य मंत्रों का जप करें और सूर्य को जल अर्पित करें। ये उपाय सभी सुख प्रदान करने वाला माना गया है और सूर्य नमस्कार करने से बल, बुद्धि, विद्या, वैभव, तेज, ओज, पराक्रम व दिव्यता आती है। आपकी सभी परेशानियों से जल्द ही निजात मिल जाता है। जानिए रविवार के दिन किस तरह पूजा करनी चाहिए जिससे कि सूर्य भगवान जल्द ही आप पर प्रसन्न हो जाए।


ऐसे करें सूर्य देव को प्रसन्न:- रविवार को सुबह जल्दी उठकर स्नान करें इसके बाद किसी मंदिर या घर में ही सूर्य को जल अर्पित करे इसके बाद पूजन में सूर्य देव के निमित्त लाल पुष्प, लाल चंदन, गुड़हल का फूल, चावल अर्पित करें। गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई का भोग लगाएं और पवित्र मन से नीचें दिए हुए सूर्य मंत्र का जाप कर सकते हैं। यह मंत्र राष्ट्रवर्द्धन सूक्त से लिए गए है। साथ ही अपने माथें में लाल चंदन से तिलक लगाए।


ऊं खखोल्काय शान्ताय करणत्रयहेतवे।

निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे।।

त्वमेव ब्रह्म परममापो ज्योती रसोमृत्तम्।

भूर्भुवः स्वस्त्वमोङ्कारः सर्वो रुद्रः सनातनः।।


आप चाहें तो इस दूसरें मंत्र का जाप कर सकती है....


प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यम् रूपं हि मण्डलमृचोथ तनुर्यजूंषि।

सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम्।।


या फिर इस मंत्र का जाप करे-


उदसौ सूर्यो अगादुदिदं मामकं वचः।

यथाहं शत्रुहोऽसान्यसपत्नः सपत्नहा।।

सपत्नक्षयणो वृषाभिराष्ट्रो विष सहिः।

यथाहभेषां वीराणां विराजानि जनस्य च।।


इन मंत्रो का जाप करनें से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाएगी और घर में सुख-शांति आएगी। साथ ही घर में शांति रहेगी जिससे घर में कभी धन की कमी नही होगी।




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शिरडी साईबाबा मंदिर में हर दिन 10,000 और श्रद्धालुओं को दर्शन करने की मंजूरी

शिरडी : कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों में कमी आने के साथ ही अहमदनगर जिला प्रशासन ने प्रसिद्ध शिरडी मंदिर में जाकर पास लेने वाले 10,000 श्रद्धालुओं को प्रतिदिन साईबाबा के दर्शन करने की मंजूरी देने का फैसला किया है।


जिला प्रशासन ने छह अक्टूबर को एक आदेश जारी कर ऑनलाइन माध्यम से पास लेने वाले 15,000 श्रद्धालुओं को हर दिन दर्शन करने की अनुमति दी लेकिन मामलों में कमी आने के मद्देनजर प्राधिकारियों को वहीं जाकर पास लेने वाले और अधिक श्रद्धालुओं को दर्शन करने की अनुमति देने का प्रस्ताव मिला।


ऑनलाइन माध्यम से 15,000 श्रद्धालुओं को पास जारी किए जा रहे हैं, इसका मतलब है कि अब कुल 25,000 श्रद्धालु हर दिन साईबाबा के दर्शन कर सकते हैं।


अहमदनगर जिलाधीश राजेंद्र भोंसले द्वारा जारी एक आधिकारिक आदेश के अनुसार, ''बैठक में लिए गए फैसले के अनुसार साईबाबा मंदिर ट्रस्ट ने कोविड-19 नियमों का पालन करते हुए प्रतिदिन वहीं जाकर पास लेने वाले 10,000 श्रद्धालुओं को दर्शन की मंजूरी दी है।''


महामारी से पहले हर दिन लाखों श्रद्धालु शिरडी आते थे।





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विश्‍वास का तरीका बदलना होगा तभी भगवान को जान पाएंगे

मेरे आसपास के सभी लोग भगवान को मानते हैं, इसलिए मैं भी भगवान को मानता हूं। सब भगवान में अटूट विश्वास रखते हैं, इसलिए मैं भी रखता हूं। सब मंदिर जाते हैं, इसलिए मैं भी जाता हूं। जो सब कह रहे होते हैं या फिर जो सब कर रहे होते हैं, उसमें आपकी खोज तो कुछ भी नहीं, इसमें तो कोई गहरी बात नहीं। जिसने भगवान को अनुभव किया, उसने भगवान में श्रद्धा और विश्वास रखा! यदि उसने भी भेड़चाल की तरह दूसरों के कहने में आकर बिना भगवान को अनुभव किए उनके प्रति श्रद्धा अनुभव की या विश्वास किया तो यह ज्ञान सहित विज्ञान नहीं। फिर यह केवल मान्यता है, और मान्यता दौड़ाती बहुत है, पहुंचाती कहीं भी नहीं।


मानना और जानना, दोनों में बड़ा अंतर है। सब मानते हैं, इसलिए हम भी मानेंगे की प्रवृत्ति सही नहीं है। मानने से ऊपर उठकर हमें जानने में आना होगा। यदि हमने ईश्वर को दूसरों की देखा-देखी ही माना तो उनमें हमारा विश्वास आने-जाने वाला ही होगा। वह विश्वास हमेशा एक जैसा रहने वाला नहीं होगा। उस विश्वास में स्थायित्व की भावना का अभाव होगा। जब जीवन में सब ठीक चल रहा होता है तो मन में जो भी बनावटी विश्वास होते हैं, वे ठीक हैं और वे चल भी जाते हैं। लेकिन जब जीवन में परिस्थितियां उलटी-पुलटी हों, विपरीत हों, जो सोच कर चल रहे हों, वह हो ही न रहा हो तो उस समय यह जो ऊपर वाला विश्वास है, वह डगमगा जाएगा। इस ऊपर-ऊपर वाले विश्वास में कोई गहराई नहीं होती। इसकी सीधी वजह यह है कि यह विश्वास अनुभव के आधार पर नहीं होता, बल्कि सुनी-सुनाई बातों के कारण हो रहा होता है।


वैसे भी जो देखा न जा सके, उसमें विश्वास करना कठिन ही होता है। लेकिन उस परमात्मा को अनुभव करने की शक्ति भी हमारे ही अंदर निहित है। हम सब में परमात्मा का निवास है। तो सबसे पहले अपने विश्वास को नए तरीके से स्थापित करना होगा। उसको अपने अनुभव के आधार पर नया जन्म देना होगा और यह तब होगा जब यह भाव पक्का होगा कि कोई शक्ति तो है जो सारे विश्व को बड़ी बारीकी से और व्यवस्थित तरीके से चला रही है। कोई तो ताकत है जो हमारे शरीर को निरंतर गति दे रही है। कोई तो है, जिससे मेरे सहित पूरा ब्रह्मांड चल रहा है।


इस सार को अपने अंतरतम के भीतर उतर कर ही जाना जा सकता है। इसके लिए ध्यान है। ध्यान का अभ्यास अपने भीतर स्थित उसी ब्रह्म को जानने की प्रक्रिया है, जिससे हम चल रहे हैं, यह जगत चल रहा है। अपने अंदर उतरने के लिए हमें ध्यान करना होगा क्योंकि निरंतर ध्यान और प्रार्थना आपको उस शक्ति को अपने भीतर अनुभव करा देती है। तब किसी के कहने से विश्वास करने की जरूरत नहीं रह जाती है, बल्कि तब तो अपने अंदर खुद-ब-खुद विश्वास उत्पन्न हो जाता है!


जब विश्वास अंदर से अनुभव के आधार पर जन्म लेता है तो भारी से भारी दुख हो या कितनी भी उलटी-पुलटी परिस्थितियां हों, वह सबमें अडिग बना रहता है। इसलिए पहला कार्य और सारी कोशिश अपने भीतर उतरने की होनी चाहिए। फिर जैसा अंदर की आवाज कहे, वैसा करो। फिर जो भी घटेगा वह उचित होगा और वही हमारी जीवन यात्रा में सहायक होगा।


-सुरक्षित गोस्वामी-




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अन्नपूर्णा देवी की प्रतिमा काशी विश्वनाथ धाम में स्थापित, मुख्यमंत्री पूजा में हुए शामिल

वाराणसी : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को यहां काशी विश्वनाथ धाम में कनाडा से 108 साल बाद वापस लाई गयी मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में बतौर यजमान भाग लिया।


मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा की शोभा यात्रा सोमवार को सुबह दुर्गाकुंड स्थित कूष्मांडा मंदिर से निकली। प्रतिमा को रजत पालकी में काशी विश्वनाथ धाम में लाया गया। मुख्यमंत्री ने पालकी को अपने कंधे पर उठाया। जब पालकी मंदिर परिसर में पहुंची तो परिसर मंत्रोच्चार, घंटा-घड़ियाल और शंख ध्वनि से गूंज उठा। मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिमा को प्राण प्रतिष्ठित कर काशी विश्वनाथ धाम के ईशान कोण में स्थापित किया गया। प्रतिमा के साथ ही मंदिर परिसर में पुनर्निर्माण कार्य के दौरान हटाकर रखे गए पांच अन्य विग्रहों को भी प्राण प्रतिष्ठित कर स्थापित किया गया।


इससे पहले मुख्यमंत्री रविवार की रात को अपने दो दिवसीय दौरे पर यहां पहुंचे। उन्होंने देर रात में लहुराबीर-मैदागिन मार्ग पर शाही नाले की सफाई एवं मरम्मत के कार्य का निरीक्षण किया और युद्धस्तर पर अभियान चलाकर तत्काल कार्य पूरा करने का निर्देश दिया।


योगी ने देर रात में ही काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन करने के बाद श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण कार्य की प्रगति का भी जायजा लिया।




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आपको कंगाल बना सकती हैं आपकी ही ये गलतियां

वास्तु जहां घर में खुशहाली, धन और वैभव बढ़ाता है वहीं इससे जुड़ी कुछ गलतियां कंगाली, दुख व दरिद्रता का कारण भी बन सकती हैं। जी हां, आपके द्वारा की गई कुछ गलतियां ही घर में वास्तु दोष का कारण बनते हैं, जिससे आपको कई तरह की समस्याओं को सामना करना पड़ता है और आज हम आपको उन्हीं के बारे में बताएंगे।


ना रखें खंडित मूर्ति: घर में भगवान की कोई ऐसी प्रतिमा ना रखें, जो खंडित हो या जिसका कोई अंग भंग हो चुका है। इसे नदी में विसर्जित कर दें। नहीं तो इससे धन संबंधित परेशानियां बढ़ जाएंगी।


तवा और कढ़ाई: इस्तेमाल करने के बाद तवा और कढ़ाई को सीधा ना रखें इससे राहुदोष बढ़ता है, जिससे न सिर्फ पैसों की किलल्त आती है बल्कि घर में भी कलह-कलेश का माहौल बना रहता है। हमेशा यूज के बाद इसे उलटा करके रखें।


शाम को झाड़ू लगाना गलत: सूरज डूबने के बाद झाड़ू ना लगाएं। इससे मां लक्ष्मी नाराज हो जाती है और घर की बरकत गायब हो जाती है। इसके अलावा झाड़ू को हमेशा ऐसी जगह रखें, जहां से वो किसी को नजर ना आए।


खराब नल भी है कारण: घर में कोई पानी नल या पाइप खराब से तो उसे ठीक करवाएं क्योंकि इससे धन संपति की हानि होती है। वहीं नहाने के बाद बाथरूम साफ जरूर करें। इससे राहू सही रहता है।


गलत दिशा में रखी अलमारी: घर के उत्तर-पूर्व कोने में अलमारी या तिजोरी रखने से भी धन हानि होने लगती है। अलमारी को हमेशा दक्षिण दिशा की दीवार से लगाकर रखें। इससे उसका मुंह उत्तर की ओर खुलेगा, जिससे धन में बढ़ौतरी होगी।


जूठे बर्तन ना रखें: बेडरूम में जूठे बर्तन ना रखें। इससे कंगाली के साथ परिवार की सेहत खराब होती है। बेड के नीचे जूते भी ना रखें। वहीं रात के समय भी शैंक में झूठे बर्तन नहीं रखने चाहिए क्योंकि इससे मां लक्ष्मी नाराज हो जाती है।


टूटा शीशा रखना गलत: अगर आपके घर में कोई शीशा टूटा हुआ है, उसमें दरार आ गई है या फिर खिड़की का कांच टूट गया है, तो इसे तुरंत बदल दीजिए। इससे न सिर्फ धन हानि होती है बल्कि इससे घर में नेगेटिव एनर्जी भी आती है।


कांटेदार पौधे लगाना: घर में ऐसे पौधे बि‍ल्कुल न लगाएं जो कांटेदार हो या फिर जिनमें से दूध निकलता हो। इस तरह के पौधे धन संबंधी परेशानियों के साथ-साथ अन्य समस्याओं का भी कारण बनते हैं।






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जय श्रीराम कहने वाले सभी लोग मुनि नहीं हो सकते: राशिद अल्वी

सम्भल : कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने सम्भल में कहा कि कुछ लोग जय श्रीराम का नारा लगाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। जय श्रीराम कहने वाले सभी लोग मुनि नहीं हो सकते।


उनके इस बयान पर भाजपा नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। भाजपा व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक विनीत अग्रवाल शारदा ने राशिद अल्वी को अपना डीएनए टेस्ट करवाने की सलाह दी है।


सम्भल में चल रहे कल्कि महोत्सव में कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने प्रदेश की योगी सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग कहते हैं कि देश में राम राज्य आ गया है, लेकिन जहां तक मैं समझता हूं राम राज्य में नफरत की कोई जगह नहीं है। भाजपा नेताओं को कटघरे में खड़ा करते हुए राशिद अल्वी ने कहा कि कुछ लोग जय श्रीराम का नारा लगाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। रामायण का प्रसंग सुनाते हुए राशिद ने कहा कि तीर लगने के बाद जब लक्ष्मण की तबीयत खराब हो रही थी तो संजीवनी बूटी लाने के लिए हनुमान को भेजा गया। रावण ने हनुमान का रास्ता रोकने के लिए एक राक्षस को भेज दिया। राक्षस ने एक मुनि का वेश बदलकर श्रीराम का गुणगान करने लगा। आजकल तो बहुत लोग लगाते हैं। जय श्रीराम सुनकर हनुमान ऊपर से नीचे उतर आते हैं। तब राक्षस बोला कि पहले मानसरोवर में स्नान करके आओ। बिना स्नान जय श्रीराम नहीं बोला जाता। यह बात अलग है कि आजकल बिना नहाए बहुत से लोग जय श्रीराम बोलते हैं। जय श्रीराम का नारा लगाने वाले सभी लोग मुनि नहीं हो सकते।


राशिद अल्वी ने कहा कि राम राज्य में नफरत नहीं थी। इस समय देश में जय श्रीराम के नाम पर गुमराह कर रहे हैं। सीता माता ने कहा कि रामराज्य में शेर और बकरी एक स्थान पर पानी पीते हैं। भाजपा के लोग जय श्रीराम का नाम लेकर गुमराह कर रहे हैं।


कांग्रेस नेता के इस बयान पर भाजपा नेताओं ने कडी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक व फायर ब्रांड नेता विनीत अग्रवाल शारदा ने राशिद अल्वी को अपना डीएनए टेस्ट करवाने को कहा है। उन्होंने कहा कि डीएनए जांच से पता चल जाएगा कि राशिद के पूर्वज हिन्दू रहे हैं। जय श्रीराम हमारी आस्था का विषय है। इस पर टिप्पणी का किसी को कोई अधिकार नहीं है। आज अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर बन रहा है। श्रीराम का विरोध करने वालों को जनता करारा जवाब देगी।




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किसी नए कार्य के शुरू होने से पहले छींक आए तो होता हैं शुभ संकेत

छींक का आना एक आम बात है। यह आपको कभी भी किसी वक्त आ सकती है। लोगों की छींक आने पर बनी सोच के अनुसार यह अशुभ संकेत या उन्हें नजर लगने की ओर इशारा करती है। वहीं डाक्टरों के मुताबिक जब नाक के अंदर कुछ कचरा फंस जाता है तो छींक आने से आपके नाक से कचरा अपने आप साफ हो जाता है। मगर वहीं  वास्तु के अनुसार छींक आना हर बार अशुभ नहीं बल्कि कई बार शुभ भी माना जाता है। 


छींक का पीछे से सुनाई देना : अक्सर लोग घर से बाहर निकलते वक्त यदि किसी व्यक्ति की छींक सुन लें तो उनके मन में भ्रम पैदा हो जाता है। मगर वास्तु के अनुसार यदि आपको छींक पीछे से सुनाई दे तो यह अशुभ नहीं बल्कि शुभ संकेत हैं। इसका मतलब आप जिस काम के लिए भी जा रहे हैं तो वह काम बिना किसी विघ्न के पूरा हो जाएगा।


खरीरदारी : उसी तरह बाजार में खरीरदारी करते वक्त अगर किसी की छींक सुनाई दे तो आपके द्वारा खरीदी गईं वस्तुएं आपके लिए शुभ साबित होंगी। ऐसे ही अगर आप नए कपड़े ट्राई करते वक्त किसी की छींक सुनें तो समझ लें आपकी अलमारी नए कपड़ों से भरने वाली है।


बीमार व्यक्ति : अगर आप घर में बीमार पड़े किसी व्यक्ति के लिए दवा खरीदने निकलने पर किसी व्यक्ति की छींक सुने तो समझ जाएं कि वह व्यक्ति जल्द ठीक होने वाला है।


नया कारोबार : नया कारोबार या फिर डील शुरु करने जाते वक्त अगर आपको छींक आए तो इसे भी खुद के लिए शुभ मानें। सुबह के वक्त गल्ले पर बैठते वक्त छींक आना भी शुभ माना जाता है। ऐसा होने से आपका दिन शुभ निकलने वाला है।


तो ये थी छींक से जुड़ी कुछ शुभ बातें। अब आपको बताते हैं भला छींक आना कब अशुभ माना जाता है...


धार्मिक कार्यों की शुरुआत करते वक्त छींक आना अशुभ माना जाता है। रात को सोने से पहले और सुबह उठते ही छींक आना या फिर सुनना अशुभ माना जाता है। परीक्षा देते जाते वक्त छींक आना भी अशुभ बात की तरफ संकेत देता है। किसी यात्रा की शुरुआत से पहले भी छींक सुनना गलत माना जाता है। अगर नए घऱ में प्रवेश करते वक्त छींक का एहसास हो तो वहीं रुक जाएं। भोजन से पूर्व भी छींक आना अशुभ माना जाता है, इसका असर आपके स्वास्थ पर पड़ता है। 





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वह चीज़े जिनका टूटनाअशुभ नहीं, शुभ माना जाता है

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई अपने काम जल्दबाजी में करता है। मगर अक्सर जल्दबाजी में किया गया आपका काम और भी बढ़ा देता है। जैसे कि रसोई में जल्दबाजी करते वक्त हाथ से कुछ गिर जाना या फिर खाना पकाते वक्त जल जाना, ऐसी कई बाते हैं जिन्हें लेकर न चाहते हुए भी लोगों के मन में वहम जाग जाता है। मगर वास्तु के अनुसार हाथ से किसी चीज का गिरना या फिर हाथ से गिरकर टूट जाना हर बार अशुभ नहीं माना जाता।


वास्तु के अनुसार चीजों का हाथ से गिरकर टूट जाना हमारे ऊपर या हमारी जिंदगी में अशुभ की बजाएं शुभ प्रभाव भी डालता हैं। अब इन चीजों में कितनी सच्चाई हैं, ये तो कोई नहीं जानता। फिर भी आज हम आपको कुछ चीज़ों के गिरने या टूटने पर होने वाले हमपर प्रभाव के बारे में बताएंगे जो इस प्रकार हैं...


दूध का उबलना - अक्सर लोग दूध के उबल कर गिर जाने पर चिंता करने लगते है और परेशान हो जाते हैं लेकिन इसके लिए एक धारणा है कि दूध अगर उबलकर सीधा जमीन पर गिरे तो उसे शुभ माना जाता है और अगर गैस की फ्लैम को छुएं तो वो अशुभ माना जाता है।


शीशे का टूटना - कांच टूटने पर लोग इसे अपशगुन समझने लगते है। वहीं वास्तु शास्त्र के अनुसार कांच का टूट कर गिरना शुभ माना जाता है। वास्तु शास्त्र के मुताबिक कांच आप पर आने वाली बला को खुद पर लेकर टूट जाता है लेकिन याद रखें कि टूटे हुए कांच को जितना जल्दी हो सके बाहर फेंक दे क्योंकि ऐसा करने से कांच के साथ-साथ आप पर आने वाली बला भी कांच के साथ ही घर से बाहर चली जाएगी।


नमक का गिरना - नमक खाना बनाने के साथ-साथ नज़र उतारने के भी काम आता है लेकिन किसी कारणवश यह हाथों से गिर जाएं तो इसे अपशगुन माना जाता है मगर इंग्लैंड में लोकविश्वास है कि गिरे नमक में से एक चुटकी लेकर बाएं कंधे की ओर से पीछे फेंक देने पर अपशगुन नहीं होता।


चप्पल का टूटना - अगर आपकी चप्पल बहुत पुरानी या आम भाषा में कहें कि घिस कर टूट गई है तो इसे शुभ माना जाता है। लोगों की इस बारे में सोच है कि चप्पल के घिसकर टूटने से उनके दुख भी टूट कर नष्ट हो जाते हैं।


हाथ से चीज़ों का गिरना - अगर हाथों और पर्स से रूपए-पैसे गिर जाते है तो इसे अशुभ और धन की देवी लक्ष्मी का रुठ जाना मानते हैं। ये आर्थिक नुकसान का संकेत देता है। इससे बचने के लिए गिरे हुए रूपए-पैसों को तुरंत उठाकर सिर से लगाकर धन की देवी लक्ष्मी से क्षमा याचना करके उसे जेब में रखना चाहिए। इससे आर्थिक नुकसान से बचाव होगा।








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पीएम मोदी ने इस अंदाज में दी छठ पूजा की शुभकामनाएं, जेपी नड्डा, अमित शाह और राजनाथ सिंह ने भी दी महापर्व की बधाई

नई दिल्ली :  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को सूयोर्पासना के महापर्व छठ की शुभकामनाएं देते हुए हर किसी के उत्तम स्वास्थ्य और सुख सौभाग्य की कामना की है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा , केंद्रीय मंत्री अमित शाह , राजनाथ सिंह समेत मोदी सरकार के मंत्रियों और भाजपा नेताओं ने भी छठ महापर्व की शुभकामनाएं दी है।


छठ महापर्व को लेकर अपने मन की बात के अपने पुराने अंश के प्रसारित वीडियो को शेयर करते हुए पीएम मोदी ने ट्वीट किया, सूयोर्पासना के महापर्व छठ की आप सभी को ढेरों शुभकामनाएं। छठी मईया हर किसी को उत्तम स्वास्थ्य और सुख-सौभाग्य प्रदान करें।


पीएम मोदी ने शेयर किए अपने वीडियो में सूर्य वंदना या छठ-पूजा को पर्यावरण संरक्षण, रोग निवारण व अनुशासन का पर्व बताते हुए कहा कि यह ऐसा पर्व है, जिसमें खान-पान से लेकर वेशभूषा तक, हर बात में पारंपरिक नियमों का पालन किया जाता है । छठ-पूजा का अनुपम-पर्व प्रकृति से और प्रकृति की उपासना से पूरी तरह जुड़ा हुआ है ।


वीडियो में छठ महापर्व की महिमा के बारे में बताते हुए पीएम मोदी ने कहा है, आस्था के इस महापर्व में उगते सूर्य की उपासना और डूबते सूर्य की पूजा का सन्देश अद्वितीय संस्कार से परिपूर्ण है। दुनिया तो उगने वालों को पूजने में लगी रहती है लेकिन छठ-पूजा हमें, उनकी आराधना करने का भी संस्कार देती है जिनका डूबना भी प्राय: निश्चित है ।


पीएम मोदी ने शेयर किए गए वीडियो में कहा है, हमारे जीवन में स्वच्छता के महत्व की अभिव्यक्ति भी इस त्योहार में समाई हुई है । छठ से पहले पूरे घर की सफाई, साथ ही नदी, तालाब, पोखर के किनारे, पूजा-स्थल यानि घाटों की भी सफाई, पूरे जोश से सब लोग जुड़ करके करते हैं । सामान्य रूप से लोग कुछ माँगकर लेने को हीन-भाव समझते हैं लेकिन छठ-पूजा में सुबह के अघ्र्य के बाद प्रसाद मांगकर खाने की एक विशेष परम्परा रही है । भारत के इस महान परम्परा के प्रति हर किसी को गर्व होना बहुत स्वाभाविक है ।


भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी देशवासियों को छठ महापर्व की शुभकामनाएं देते हुए ट्वीट किया , सूर्य उपासना एवं लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा की सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं।अपने प्रकाश से अंधकार को मिटाने वाले सूर्यदेव और छठी मैया से सभी के सुख, शांति, वैभव एवं उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूँ।


केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी जय छठी मैया कहते हुए ट्वीट किया, समस्त देशवासियों को सूर्य आराधना के महापर्व छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं। सूर्यदेव सभी के जीवन में सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और नई ऊर्जा का संचार करें। जय छठी मैया !


केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी महापर्व की शुभकामनाएं देते हुए ट्वीट किया, महापर्व छठ की सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं। छठी मइया आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आयें, यही कामना है। जय छठी मइया!



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घर में लगी घड़ी बदल सकती है आपका भाग्य, जानिए कैसे

हमारे जीवन में बदलाव छोटी-छोटी चीजों से ही आते है। कई बार एक छोटा सा बदलाव हमारे जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। हमारे सामने आने वाली परेशानियां और चुनौतियों की मूल जड़ तक हमें पहुंचना चाहिए और इनके उपाय हमें वास्तु शास्त्र से ही मिलते है। आपके घर की दीवार पर लगी एक घड़ी भी वास्तु दोष उत्पन्न कर सकती है। जी हां यह बिल्कुल सही है। घड़ी ना केवल समय बताती है बल्की आपका समय भी बदल सकती है। घर में लगी घड़ी आपका भाग्य बदल सकती है। अगर आपके घर में सही दिशा में घड़ी नही लगी हुई है तो यह आपके लिए दुःखों का कारण भी बन सकती है। आज हम आपको बताने जा रहें है कि किस प्रकार से घड़ी आपके जीवन में बदलाव ला सकती है और किस दिशा में घड़ी को लगाना चाहिए।


दुर्भाग्य का सूचक है बंद घड़ी

एक कहावत प्रचलित है कि बंद घड़ी भी दिन में दो बार ठीक समय बताती है। लेकिन आपको यह शायद ही पता होगा की बंद घड़ी आपके भाग्य में कई तरह की विपदाएं उत्पन्न कर सकती है। वास्तु के अनुसार घर में रखी बंद घड़ी आपके जीवन में समस्याओं को पैदा कर सकती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में टूटी-फूटी घड़ी तथा बंद घड़ी दुर्भाग्य का सूचक होती है। इसलिए आज ही सबसे पहला काम आप यह करें की घर में मौजूद बंद और टूटी-फूटी घड़ी को हटा दें।

 

इस दिशा में लगी घड़ी रोकेगी आपकी प्रगति

हम घर में घड़ी लगाते समय दिशा का ध्यान नहीं देते है। जो वास्तु के अनुसार बिल्कुल ही गलत है। गलत दिशा में घड़ी लगाने से आपको आर्थिक हानि उठानी पड़ेगी साथ ही आपकी प्रगति भी नहीं होगी। वास्तु की मानें तो अगर घर में दक्षिण दिशा में घड़ी लगी हुई है तो घर का मुखिया सदैव बीमार रहेंगा। साथ ही साथ दक्षिण दिशा में घड़ी लगी रहने से प्रगति के अवसर नहीं मिलेंगे। इस दिशा में घड़ी लगाने से आपकी प्रगति रूक जाएगी आप आर्थिक रूप से तथा हर प्रकार से प्रगतिशील नही हो पाएंगे। अगर आपके घर की दक्षिण दिशा में घड़ी लगी हुई है तो उसे आप तत्काल आज ही उसे निकाल दें।


इस दिशा में घड़ी लगाने से होती है उन्नति

अब आप जब भी घर में घड़ी लगाए तो दिशाओ का ध्यान रखें। आप इस बात का विशेष ध्यान रखे की जिस दीवार पर आप घड़ी लगा रहें है वो दक्षिण और पश्चिम दिशा में नहीं होनी चाहिए। नहीं तो आपको इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। वास्तु के अनुसार घड़ी पूर्व या उत्तर दिशा की दीवार पर लगाई जानी चाहिए। अगर पूर्व या उत्तर दिशा में घड़ी लगाई जाती है तो वास्तु के अनुसार आपको शुभ-लाभ और उन्नति प्रदान होगी। इस दिशा में घड़ी लगाने से आपके भाग्य में कई प्रकार के बदलाव आएंगे।







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छठ पूजा के लिए घाटों की साफ-सफाई में जुटे श्रद्धालु

ग्रेटर नोएडा : छठ पर्व को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। श्रद्धालु छठ घाटों की साफ-सफाई में जुट गए हैं। सोमवार को नहाए खाए के साथ इस पर्व की शुरुआत होगी।


पूर्वांचल के लोगों के सबसे बड़े पर्व छठ की तैयारी शुरू हो गई है। सबसे पहले श्रद्धालुओं ने छठ घाटों की सफाई शुरू कर दी है। नवादा गांव में बने छठ घाट की साफ सफाई शुरू हो गई है। छठ आयोजन समिति से जुड़े डॉ. वीके सिंह ने बताया कि श्रद्धालुओं ने छठ घाटों की सफाई शुरू कर दी है। घाट के आसपास कूड़ा करकट हटाया जा रहा है। पानी में जो गंदगी है, उसको भी निकाला जा रहा है ताकि पूजा अर्चना करने में किसी तरह की दिक्कत ना आए।


सेक्टर जू 3 में भी छठ घाट की तैयारी शुरू हो गई है। आयोजन समिति से जुड़े मनोज झा ने बताया कि यहां पर हर वर्ष छठ पूजा की जाती है। इस बार भी यहां पर छठ पूजा की जाएगी। इसके लिए साफ-सफाई शुरू हो गई है। इसके अलावा शहर में आईईसी कॉलेज के सामने बने पार्क में भी छठ पूजा होती है। यहां पर भी श्रद्धालुओं ने काम शुरू कर दिया है। घाटों को पूजा के लायक बनाया जा रहा है ताकि श्रद्धालु बिना किसी परेशानी के पूजा अर्चना कर सकें।


सोमवार को नहाय खाए के साथ छठ पर्व की शुरुआत होगी। मंगलवार को खरना होगा। बुधवार को श्रद्धालु डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगे। जबकि गुरुवार को उगते हुए सूर्य को अर्घ देकर छठ पर्व का समापन होगा।






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भैया दूज: भाई-बहन के पावन संबंधों की मजबूती का पर्व

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है 'भैया दूज'। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं।


कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात् कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को 'यम द्वितीया' व 'भ्रातृ द्वितीया' के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-दिन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है।


भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थी और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थी कि वे अपने इष्ट मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया। उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं, इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है, इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।


यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से 'भैया दूज' का पर्व मनाया जाने लगा।


भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक अन्य कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो ही संतानें थी-एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया।


अगले दिन भाई को वापस लौटना था, अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को विदा किया और उसके घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी।


कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। उसने अभी तक पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फैंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी। रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।


जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई। परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर ही दिया और उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई।


सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए और भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।


भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढ़ेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही 'भैया दूज' पर्व मनाया जाता है।


-योगेश कुमार गोयल-

(लेखक स्वंतत्र टिप्पणीकार हैं)

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घर में होने वाले वास्तु दोषों से आपको बचाता है सिंदूर

क्या आप जानते हैं कि शादी-शुदा महिलाओं की शोभा बढ़ाने वाला सिंदूर घर के वास्तु दोष भी दूर करता है। जी हां, घर के मुख्य द्वार पर सिंदूर लगाने से घर में मौजूद सारी नेगेटिव एनर्जी गायब हो जाती है। 


सरसों का तेल और सिंदूर- वास्तु के अनुसार, घर के मुख्य द्वार पर सिंदूर में सरसों का तेल मिक्स करके स्वास्तिक निशान बनाने से घर के सभी वास्तु दोष दूर होते हैं। अगर घर का दरवाजा दो हिस्सों में बंटा है तो दाईं तरफ दरवाजे पर स्वास्तिक का निशान बनाएं। ऐसा करना आप और आपके परिवार के लिए बहुत शुभ साबित होगा।


आर्थिक परेशानियां- घर के वास्तु दोष दूर होने के साथ-साथ घर के मुख्य द्वार पर सिंदूर लगाने से घर की आर्थिक स्थिति भी बेहतर होती है। आसान शब्दों में दरवाजे पर सिंदूर का तिलक पैसों की कमी दूर करता है। साथ ही घर में चोरी-डकैती होने का खतरा भी टल जाता है।


कलह-कलेश- यदि घर में रहने वाले सभी सदस्यों में हमेशा कलह-कलेश का माहौल बना रहता है तो दरवाजे की बगल में सिंदूर के पांच टीके लगाएं। ऐसा करने से घर की खोई हुई सुख-शांति लौट कर वापिस आ जाएगी।


नई वस्तुएं- अगर आप कोई नई गाड़ी या फिर घर खरीदें तो नारियल के ऊपर सिंदूर का तिलक लगाने के बाद ही उसका शुभ आरंभ करें। ऐसा करने से नई खरीदी हुई नई चीज आपके लिए बहुत फल दायक साबित होगी।


कुंडली दोष- वास्तु के साथ-साथ ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी यदि आपकी कुंडली में मंगल ग्रह की स्थिति खराब चल रही है तो चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर हनुमान जी को चढ़ाएं। ऐसा करने से आप जीवन में आने वाली मुश्किलों से बच पाएंगे। 






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हज 2022 के लिये आवेदन जमा करने का आग़ाज़

नई दिल्ली : हज यात्रा 2022 के लिये हज आवेदन प्राप्त करने का औपचारिक कार्य का षुभारंभ आज दिल्ली स्टेट हज कमेटी कार्यालय हज मंजिल आसफ अली रोड, नई दिल्ली में हुआ। इस अवसर पर दिल्ली स्टेट हज कमेटी के अध्यक्ष जनाब मुख्तार अहमद, मेम्बरान जनाब अब्दुल रहमान, विधायक, जनाब हाजी युनुस, विधायक, जनाब हाजी अब्दुल वाजिद खान, निगम पार्शद, जनाब डाक्टर षादाब हुसैन रिजवी अषरफी, दिल्ली स्टेट उर्स कमेटी के अध्यक्ष एफ.आई. इस्माईली, गु्रप आफॅ हज एंड सोषल वर्क आॅरगेनाईजेषन के सदर हाजी इदरीस, हाजी रियाज राजू, हाजी असद मियां,  हाजी रियाज़ुद्दीन, हज्जन महरून निसा, हाजी षकील, हाजी जहीरूद्दीन, मौ0 जाहिद, असद आलम, हाजी फरीद जमील एवं हज से जुड़ी स्वयं सेवी संस्थाओं के अलावा दिल्ली स्टेट हज कमेटी डिप्टी अधिषासी अधिकारी मोहसिन अली एवं सभी पदाधिकारी, कर्मचारी व हज यात्रा पर जाने के इच्छुक लोग उपस्थित थे।


इस अवसर पर सदस्यों ने हज यात्रा पर जाने वाले इच्छुक लोगों को षुभकामनाये प्रकट करते हुये आषा व्यक्त की इस वर्श हज यात्रा सुरक्षित एवं कुषलता पुर्वक संपन्न होगी। दिल्ली स्टेट हज कमेटी के चेयरमैन श्री मुख्तार अहमद ने इस अवसर पर मौजूद सभी लोगों का इस्तक़बाल किया और कहा कि अल्लाह का बहुत बड़ा करम और फज़ल है कि दो साल के लंबे इंतज़ार के बाद हज-2022 में हिन्दुस्तानी हाजियों के षामिल होने की पूरी उम्मीद है और दिल्ली स्टेट हज कमेटी का चैयरमेन होने के नाते मुझे हज-2022 के लिए हज फार्म भरने का ऐलान करते हुऐ बहुत खुषी हो रही है।


उन्होनंे कहा कि दिल्ली स्टेट हज कमेटी ना सिर्फ दिल्ली बल्कि दिल्ली से फलाईट लेने वाले षुमाली हिन्दुस्तान की रियासतों से आने वाले तमाम आज़मीने हज की ख़िदमत के लिए हाजि़्ार है, साथ ही यह भी बताया कि दिल्ली राज्य हज कमेटी के आफिस मे आने वाले सभी  हज की दरख्वास्त देने वालों की हर मुमकिन मदद की जाएगी, उनके आॅन लाइन फार्म भरने, आॅन लाइन बैंक में पैसे जमा कराने या हज से मुत्ताल्लिक़ दीगर जरूरियात हों या ब्लड ग्रुप चैकिंग हो यह सभी सहुलियात एक ही छत के नीचे मुहैया कराई जाऐंगी जिससे आज़्ामिन हज को किसी भी काम के लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़ेगा। इसके अलावा जैसी जरूरत महसूस होगी हम आज़्ामिने हज की सहुलियात के मज़्ाीद इतज़्ाामात करेगें। जनबा मुख्तार अहमद ने आगे बताया की हज आवेदन जमा करने का कार्य 01 नवम्बर 2021 से आरंभ हो कर 31 जनवरी 2022 तक चलेगा। उन्होंने कहा कि हज कमेटी आॅफ इंडिया द्वारा जारी दिषा निर्देष के अनुसार इच्छुक हज यात्री आॅन लाईन आवेदन कर सकते है। जिन लोगों को आॅन लाईन आवेदन करने में कोई समस्या उतपन्न होती है तो वह दिल्ली स्टेट हज कमेटी से कार्य दिवस में सुबह 10 बजे से षाम 4 बजे तक 011.23230507 पर संपर्क कर सकते हैं

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इस दीपावली सजाएं ये 7 प्रकार की पारंपरिक आकर्षक रंगोली, देवी लक्ष्मी होंगी प्रसन्न

दीपावली के पर्व पर हर घर-आंगन में रंगोली सजाई जाती है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार किसी भी प्रकार के मंगल कार्य में रंगाली का बहुत महत्व है। दीपों के पर्व दिवाली की तो रंगोली के बिना इस त्योहार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। समय के साथ-साथ रंगोली बनाने के तरीकों में बदलाव आया है, लेकिन इसे लेकर उत्साह बिल्कुल कम नहीं हुआ। यही कारण है कि पारंपरिक रंगोली का नयापन भी मन को मोहता है।


जानिए रंगोली के 7 प्रकार और तरीके-


1 रंगों की ओली- रंगों की सहायता से, कई लयबद्ध बिंदुओं को मिलाते हुए रंगोली की कई सुंदर-सुंदर आकृतियां बनाई जाती हैं, जो बेहद आसान और आकर्षक होती है। यह तरीका आसान होने के कारण युवतियों के साथ ही छोटी बालिकाएं भी आसानी से रंगोली को आकार दे सकती हैं। इसके बाद इसमें अपने अनुसार रंग भरकर इसे और भी आकर्षक बनाया जाता है। तब तैयार होती है, खूबसूरत रंगोली। अगर आपको रंगोली बनाना कठिन लगता है, तो आपके लिए सबसे बेहतर तरीका यही है। इसके लिए बाजार में किताब उपलब्ध है।


2 मांडना- वर्तमान में रंगोली का प्रचलन सबसे अधिक है, लेकिन पुरानी परंपरानुसार आज भी आंतरिक इलाकों में मांडने बनाए जाते हैं। यह घर के आंगन या फर्श पर प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर आकर्षक ढंग से बनाए जाते हैं। आप अगर ही दिन रंगोली नहीं बनाना चाहते तो मांडना पारंपरिक और खूबसूरत तरीका है।मांडने की एक खासियत यह भी है, कि यह लंबे समय तक बने रहते हैं। इसे बनाने के लिए गीले रंगों का प्रयोग किया जाता है, जो सूखने के बाद लंबे समय तक उतने ही आकर्षक नजर आते हैं।


3 फूलों की रंगोली- रंगोली बनाने का एक बेहद खूबसूरत तरीका यह भी है। दुनिया में फूलों से ज्यादा सुंदर चीज और कुछ भी नहीं। इन्हीं रंगबिरंगे फूलों और पंखुड़ियों का प्रयोग कर जब रंगोली बनाई जाती है, तो यह न केवल आंखों को खूबसूरत दिखाई देती है, बल्कि इसकी महक से आपका मन भी इस खूबसूरती को महसूस करने लगता है। दक्षिण भारत में खास तौर से इस तरह की रंगोली बनाई जाती है, और अब हर जगह यह प्रचलन है।

4 तैलीय रंगों की रंगोली- जी हां, तैलीय रंगों और सामान्य पक्के रंगों द्वारा भी रंगोली बनाई जाती है, जो लंबे समय तक बरकरार रहती है। इसे बार-बार बनाने की आवश्यकता नहीं होती। और आप इसके लिए जितने चाहें उतने रंगों का इस्तेमाल कर सकते हैं। आप इसे सीधे ब्रश की सहायता से मनचाही आकृतियों में घर के आंगन, फर्श या फिर आप जहां चाहें बना सकते हैं।


5 कृत्रिम सांचों से बनी रंगोली- यह रंगोली बाजार में उपलब्ध अलग-अलग आकृतियों और सांचों से बनाई जाती है, जिसके लिए आपको हाथ से मेहनत करने की जरूररत नहीं होती। बस सांचे में रंगोली भरकर अपने अनुसार आकृतियां उकेरी जा सकती हैं। इसमें पहले जमीन पर छन्नी से रंगों को समान रूप से फैलाया जाता है, उसके बाद सांचे या फिर छापों की सहायता से सफेद रंगोली का उपयोग कर आकृतियां बनाई जाती है। यह रंगोली अापके लिए बनाना आसान भी होगा और समय की बचत भी होगी।


6 प्राकृतिक रंगोली- अगर आप बाजार में मिलने वाली रंगोली का उपयोग नहीं करना चाहते, तो घर में प्राकृतिक रंगोली तैयार कर आकृतियां बना सकते हैं। इसके लिए आप घर पर ही सूजी व चावल के आटे को अलग-अलग रंगों में रंग सकते हैं। इसके अलावा हल्दी, मसूर की दाल व बेसन का उपयोग कर सकते हैं।


7 दीपों की रंगोली- घर के बरामदे या बड़े आंगन में कई दीपों और फूलों की पंखुड़ियों को सजाकर बनाई गई यह रंगोली जगमगाती हुई बेहद आकर्षक लगती है। खास तौर से दीपावली की रात यह रंगोली बनाई जाती है, जो पूरे वातावरण को रौशन करने के साथ ही महका देती है। आप इसके लिए खुशबूदार दीपों का प्रयोग भी कर सकते हैं। इन सात तरीकों से आप अपने आंगन की रंगोली को सजा सकते हैं।





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छठ मैया की पूजा में इन नियमों का करें पालन

छठ पूजा का महापर्व आज नहाय-खाय से शुरू हो गया है। छठ पूजा बिहार, यूपी, झारखंड, दिल्ली, मुंबई समेत कई शहरों में चार दिनों तक धूमधाम से मनाया जाएगा। इस व्रत में करीब 36 घंटों तक व्रत रखने वाले को निर्जला रहना होता है। यह व्रत सभी व्रतों में सबसे कठिन माना जाता है। इस व्रत के नियम अन्य व्रतों से भिन्न और कठिन होते हैं, जिनका पालन करना आवश्यक माना गया है। इन नियमों का पालन न करने से व्रत निष्फल माना जाता है। सूर्य देव और छठी मैया का अशीर्वाद व्रत रखने वाले व्यक्ति और उसके परिवार को नहीं मिलता है। छठी मैया और सूर्य देव की आराधना को समर्पित छठ पूजा में नियमों का पालन करते हैं, तो व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। नियम तोड़ने पर व्रत निष्फल हो जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा सगर ने सूर्य षष्ठी व्रत नियमपूर्वक नहीं किया था, जिसके कारण उनके 60 हजार पुत्र मार दिए गए थे।


आइए जानते हैं कि छठ पूजा के व्रत नियम क्या-क्या हैं:


छठ पूजा के नियम-


1. व्रत रखने वाले व्यक्ति को जमीन पर चटाई बिछाकर सोना चाहिए। पलंग या तखत का प्रयोग वर्जित है।


2. चार दिन चलने वाले इस व्रत में प्रत्येक दिन स्वच्छ वस्त्र पहनने का विधान है, लेकिन शर्त ये है कि वे वस्त्र सिले हुए न हों। ऐसी स्थिति में व्रत रहने वाली महिला को साड़ी और पुरुष को धोती पहनना चाहिए।


3. यदि आपके परिवार में किसी ने छठ पूजा का व्रत रखा है तो परिवार के सदस्यों को तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए। व्रत से चार दिन तक शुद्ध शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करना चाहिए।


4. व्रत रखने वाले व्यक्ति को पूरे चार दिनों तक मांस, मदिरा, धूम्रपान, झूठे वचन, काम, क्रोध आदि से दूर रहना चाहिए।


5. छठ पूजा का व्रत साफ सफाई से भी जुड़ा है, इसलिए घर और पूजा स्थल आदि की साफ सफाई जरूर करें।


6. छठ पूजा में बांस के सूप का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। सूर्य उपासना के समय पूजा सामग्री को सूप में रखकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है।


7. सूर्यास्त से पूर्व और सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य देने के लिए गन्ने का प्रयोग जरूरी माना गया है।


8. भगवान सूर्य और छठी मैया को ठेकुआ और चावल के आटे के लड्डू का भोग जरूर लगाएं। यह इस पूजा का विशेष प्रसाद होता है।





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शारदीय नवरात्र: महादेव को पति रूप में पाने के लिए महागौरी ने किया था कठोर तप

वाराणसी : शारदीय नवरात्र के आठवें दिन महाअष्टमी पर बुधवार को श्रद्धालुओं ने महागौरी अन्नपूर्णा के दरबार में मत्था टेका। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र स्थित दरबार में दर्शन पूजन के बाद महिलाओं ने परिवार में सुख, शान्ति, वंशवृद्धि के लिए माता रानी से गुहार लगाई।


दरबार में आधी रात के बाद से ही श्रद्धालु दर्शन के लिए कतारबद्ध होने लगे। मंदिर में दर्शन पूजन के दौरान श्रद्धालु महागौरी माता के प्रति श्रद्धा का भाव दिखाते रहे। कड़ी सुरक्षा के बीच बैरिकेडिग में कतारबद्ध श्रद्धालु अपनी बारी का इन्तजार मां का गगनभेदी जयकारा लगाकर करते रहे। इसके पहले रात तीन बजे से मंहत शंकर पुरी की देखरेख में माता के विग्रह को पंचामृत स्नान कराया गया। नवीन वस्त्र और आभूषण धारण कराने के बाद भोग लगाकर मां की मंगला आरती वैदिक मंत्रोच्चार के बीच की गई। अलसुबह मंदिर का पट खुलते ही पहले से ही कतार में प्रतीक्षारत श्रद्धालु मंदिर के प्रथम तल स्थित गर्भगृह के पास पहुंचे और दर्शन पूजन किया। इसके पहले श्रद्धालु गर्भगृह परिसर की परिक्रमा भी करते रहे। यह सिलसिला देर शाम तक चलता रहेगा। लाखों श्रद्धालु महाअष्टमी पर व्रत भी रखे हुए है।


महागौरी अन्नपूर्णा के दर्शन मात्र से ही पूर्व के पाप नष्ट हो जाते हैं। देवी की साधना करने वालों को समस्त प्रकार के अलौकिक सिद्धियां और शक्तियां प्राप्त होती हैं। मान्यता है कि माता रानी ने 8 साल की उम्र से ही भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप शुरू किया था। कठोर तप करने के कारण देवी कृष्ण वर्ण की हो गई थी। लेकिन उनकी तपस्या से देख महादेव ने गंगाजल से देवी की कांति को वापस लौटा दिया, इस प्रकार देवी को महागौरी का नाम मिला।


देवी भागवत पुराण के अनुसार भगवान शिव के साथ उनकी पत्नी के रूप में महागौरी सदैव विराजमान रहती है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी पाप धुल जाते हैं। उसके पूर्व संचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। महागौरी की चार भुजाएं हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे के बाएं हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं।





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