नजरअंदाज न करें कान का दर्द

कान के मध्य में होने वाली सूजन या मध्य कान के संक्रमण को मध्यकर्ण संक्रमण कहते हैं। यह सर्दी और नाक में संक्रमण का बढ़ा हुआ रूप है। बच्चों का बड़ों की अपेक्षा सिर का आयतन व आकार छोटा होता है, जिसके कारण नाक और कान नजदीक होते हैं। इससे बच्चों को सर्दी जल्दी होती है, जिससे कानों में संक्रमण फैल जाता है। हालांकि कान के संक्रमण से बचने के लिए बच्चों को किसी भी प्रकार का टीका नहीं लगाया जाता है।


संक्रमण के प्रकार...


एक्यूट ओटाइटिस मीडिया:- तीन सप्ताह से कम समय में ठीक हो जाए।


क्रॉनिक ओटाइटिस मीडिया:- जो छह सप्ताह से ज्यादा चले और बार-बार कान से तरल या मवाद का स्राव हो।


कान की हड्डी में संक्रमण:- ये लंबे समय तक होता है, जिससे कान की हड्डी में संक्रमण फैल जाता है। इससे कान में सुराख बन जाता है और मवाद बहने लगता है। जो ऑपरेशन के बाद ही ठीक होता है।


पैरेंट्स कैसे रखें खयाल:- बच्चे को सर्दी है तो पैरेंट्स ध्यान दें। अगर सर्दी ज्यादा दिन तक है तो बच्चे को तुरंत चिकित्सक या शिशु रोग विशेषज्ञ को दिखाएं। बिना लापरवाही के पूरे समय बच्चे को निगरानी में रखें। इसके अलावा यदि बच्चे को सुनने में समस्या है तो चिकित्सक से परामर्श लेकर कान की जांच कराएं।


लक्षण...


-सर्दी के बाद कान में दर्द होना


-छोटे बच्चों का दर्द से रात में बार-बार रोना


-लंबे समय तक संक्रमण से परदे में छेद होना, फिर कान का बहना शुरू होना


-बुखार भी हो सकता है।


उपाय...


-बच्चे को सर्दी से बचाएं


-एलर्जी और खान-पान पर विशेष ध्यान दें


-बच्चों को वातावरण के अनुसार रखें


-प्रदूषण, खासतौर पर वायु प्रदूषण से बचाएं


-एलर्जी की दवा दें


-आवश्कतानुसार चिकित्सक से परामर्श लें।



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जोखिम में हर 10वीं गर्भवती महिला की जान, जानें पूरे मामला

अलीगढ़ :  जन्म के बाद नवजात बच्चे को बाहों में पाकर मां की खुशी का ठिकाना नहीं होता। उसकी आंखों की चमक कोई भी महसूस कर सकता है। यह खुशी पाने का अधिकर हर मां को है। लेकिन, कई गर्भवतियों के जीवन में यह पल कभी नहीं आता। बल्कि, उनके जीवन में प्रसव का क्षण बेहद भयावह होता है। जनपद में ही स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो हर 10वीं या 11 वीं गर्भवती महिला उच्च जोखिम में होती है। हालांकि, नियोजित गर्भावस्था व उसका ख्याल रखकर इस जोखिम को कम किया जा सकता है।

जिले में पिछले दिनों प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के अंतर्गत स्वास्थ्य विभाग ने गर्भवती महिलाओं की जांच के लिए शिविर आयोजित किए। इस दौरान 1115 गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच की गई। चिंता की बात ये है कि 104 जोखिम वाली गर्भवती महिलाएं पाई गईं। वहीं, 17 उच्च जोखिम वाली पाई गईं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. आनंद उपाध्याय ने बताया कि इन शिविरों का उद्देश्य ही ऐसे महिलाओं की पहचान करना था, ताकि समय से उच्च अस्पताल में संदर्भन कर जोखिम को कम किया जा सके। वर्तमान में अधिक से अधिक गर्भवती की जांच कर उच्च खतरे वाली गर्भावस्था की पहचान की जरूरत है। इससे भविष्य में उन्हें किसी अनहोनी से बचाया जा सकेगा।

महिला अस्पताल की सीएमएस डा. रेनू शर्मा ने बताया कि सभी महिलाओं को गर्भावस्था में प्रसव पूर्व देखभाल,प्रसव के दौरान कुशल देखभाल और प्रसव के बाद के कई सप्ताह तक देखभाल और सहायता तक पहुंच की आवश्यकता होती है। सभी प्रसवों में कुशल स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा सहायता मिलनी चाहिए, क्योंकि समय पर प्रबंधन और उपचार मिलना मां और बच्चे के लिए जरूरी है। लेकिन, जागरूकता के अभाव में तमाम गर्भवती, प्रसव पूर्व की जांच तक नहीं कराती हैं। ऐसे में पता ही नहीं चल पाता कि उन्हें क्या परेशानी है। उच्च जोखिम के कई कारण हो सकते हैं, जैसे गर्भावस्था के दौरान खून या अन्य पोषक तत्वों की कमी, हाइपरटेंशन, शुगर, एचआइवी, गर्भ में जुड़वा बच्चे होना, पिछला प्रसव सिजेरियन होना या गर्भपात होना, कम या ज्यादा उम्र में गर्भधारण होना आदि।



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डैगू वुखार और वायरल का कहर अव गावो मे मौत का सिलसिला जारी

फिरोजाबाद : फिरोजाबाद जिले में डेंगू बुखार और वायरल शहरी क्षेत्रों में जरूर कम हुआ है किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में बराबर बढ़ता जा रहा है समय पर मरीजों को उचित उपचार ना मिलने के कारण मरीजों की मोत भी हो रही है। फिरोजाबाद जिले में डेंगू बुखार वायरल का प्रकोप करीब 2 महीने से चल रहा है किंतु शासन प्रशासन के काफी प्रयास के बावजूद अभी तक बीमारी पर कंट्रोल नहीं हो पाया है शहरी क्षेत्र में मरीजो की संख्या जरूर कम हुई है मगर ग्रामीण क्षेत्रों में अभी बुखार वायरल के मरीज बराबर निकल रहे हैं किंतु ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्र पर इलाज की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण मरीज परेशान है शासन के कड़े निर्देश की बावजूद अनेक स्वास्थ्य केंद्र पर डॉक्टर उपलब्ध नहीं मरीजों को प्राइवेट डॉक्टरों पर इलाज के लिए जाना पड़ रहा है मेडिकल कॉलेज मे गुरुवार को कुल मरीजों की संख्या 130 थी जबकि नए मरीज 30 भर्ती किए गए मंगलवार की रात को एक मरीज कुंदन पुत्र सतीश कुमार की इंजेक्शन लगने के बाद पेट फूलने से मौत हो गई मरीज के परिजनों द्वारा काफी हंगामा काटा गया जिनको पुलिस के द्वारा मेडिकल कॉलेज परिसर से बाहर कर दिया गया जबकि परिजन डॉक्टरों पर उपचार में लापरवाही का आरोप लगा रहे मेडिकल कॉलेज में ऐसे अनेक मामले सामने आए किंतु की कोई सुनवाई नहीं हुई शिकोहाबाद के सरकारी अस्पताल में मरीजों की संख्या 162 है गुरुवार को नए 77 मरीज भर्ती किए गए संक्रामक बीमारी का प्रकोप शिकोहाबाद और सिरसागंज क्षेत्र में अधिक होने की वजह से शिकोहाबाद अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ रही है किंतु डॉक्टरों की कमी के कारण परेशानी का सामना करना पड़ रहा है जिले में पिछले सप्ताह मरीजों की मौत पर कुछ नियंत्रण हुआ था सोमवार, मंगलवार और बुधवार में क़रीब 15 मरीज़ों क़ी मौत के कारण चिंता बढ़ गई है ग्रामीण क्षेत्रों में सही तरीके से साफ सफाई नहीं होने की शिकायतें भी मिल रही है ।





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पौष्टिकता से भरपूर है अखरोट

अखरोट केवल साधारण खाद्य नहीं है बल्कि स्वास्थ्य एवं चिकित्सीय दृष्टि से इसे असाधारण भी कहा जा सकता है। अखरोट समूल ही बहुपयोगी है। यदि अखरोट की जड़ें या अंकुर चबाएं तो मृत्यु तक दांत टस से मस नहीं होते। अखरोट की रसीली पत्तियों का रस बहुत स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। आयुर्वेद में अखरोट की पत्तियों का कई तरह से उपयोग किया जाता है। इसकी रसीली पत्तियों को 2 से 3 घंटे तक पानी में उबाल कर जो द्रव निकाला जाता है उसका प्रयोग कहीं चाय के रूप में किया जाता है तो कहीं रूधिर-वाहिकाओं के फैलाव की दवा के रूप में या हाजमा सुधारने के लिये किया जाता है। आंखें आ जाएं तो इसके रसीले पत्तों के द्रव से धोने पर शत-प्रतिशत लाभ पहुंचता है। इससे कुल्ला किया जाए तो मसूड़ों के घाव भर जाते हैं तथा दांत अपनी जगह मजबूत हो जाते हैं। 


अखरोट की पत्तियों का यह रस गाढ़ा हो तो इसका उपयोग एक्जिमा की दवा के रूप में किया जाता है। गठिया तथा आमवात अगर प्रभावी होने लगे तो इस द्रव से नहाना बहुत लाभदायक होता है। धार्मिक अनुष्ठानों में या व्रताहार के रूप में अखरोट बहुत उपयोगी है। व्यंजनों में भी अखरोट की गिरी महत्वपूर्ण समझी जाती है। अखरोट की गिरी का मसालेदार सूप भी बनाया जाता है तथा इसकी कच्ची गिरी का जैम भी बनाया जाता है। बर्फीले प्रांत के रहने वालों के खाद्य या व्यंजनों में अखरोट की बहुत उपयोगिता है। रूस, मंगोलिया या काकेशर और अंटार्कटिक क्षेत्रों में वहां के सैनिक आज भी जब अपनी मुहिमों पर निकलते हैं तो अखरोट की गिरी से बनी मिठाई अपने साथ लेकर चलते हैं जो आटे के संग अंगूर का रस उबाल कर तथा उसमें गिरी डाल कर बनाई जाती है। अखरोट की गिरी का तेल निकालने के बाद जो भाग बचता है वह बेकार नहीं जाता। 


उसका एक हिस्सा पशुओं के चारे और चूजों के दानों में मिलाया जाता है जो स्वादिष्ट तो होता ही है, साथ में स्वास्थयवर्धक भी होता है। हलवे में यदि अखरोट की गिरी का रस मिलाया जाए तो यह स्वादिष्ट तो होगा ही, साथ ही बहुत पौष्टिक भी। अखरोट की पौष्टिक तथा स्वास्थ्यवर्धक गिरी बच्चे, बूढ़ों, डायबिटिज के रोगियों या जिन को दिल का दौरा पड़ चुका हो, अधेड़ उम्र वालों को या दूध पिलाने वाली माताओं आदि के लिये बहुत गुणकारी मानी गयी है। बहरहाल अगर दो, तीन अखरोट रोज खायें तो काफी लाभदायक होते हैं। बहुत भीषण गर्मी में अखरोट नहीं खाना चाहिये। जाड़ों में शहद के साथ यदि अखरोट खाया जाए तो स्वास्थ्यवर्धक रहता है। अखरोट की गिरी में कैलोरी बहुत अधिक होती है जो शरीर के लिये बहुत जरूरी होती है। इसमें वे सब विटामिन होते हैं जिनकी जरूरत शरीर को होती है।




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केजरीवाल सरकार के डेंगू विरोधी महा अभियान ‘10 हफ्ते, 10 बजे, 10 मिनट’ में इस सप्ताह दिल्ली का हर दुकानदार लेगा हिस्सा

नई दिल्ली : दिल्ली सरकार की तरफ से चलाए जा रहे डेंगू विरोधी महा अभियान ‘10 हफ्ते, 10 बजे, 10 मिनट, हर रविवार डेंगू पर वार’ में इस सप्ताह दिल्ली के सभी दुकानदार हिस्सा लेंगे। दिल्ली के सभी दुकानदार रविवार को सुबह 10 बजे अपनी दुकान या ऑफिस के आसपास इकट्ठे साफ पानी की जांच करेंगे और उसको बदल कर या उसमें पेट्रोल या तेल डाल कर डेंगू के खिलाफ हमला बोलेंगे। साथ ही, सभी दुकानदार अपने परिचितों को कॉल कर अभियान का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित करेंगे। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सभी दुकानदारों से दिल्ली सरकार की तरफ से चलाए जा रहे इस अभियान का पालन करने की अपील करते हुए कहा कि दिल्ली को डेंगू से बचाने के लिए दिल्ली के हर दुकानदार को अपनी दुकान या ऑफिस के आसपास में देखना है कि पानी इकट्ठा तो नहीं है और अगर है तो उसे उड़ेल दें, बदल दें या उसमें थोड़ा तेल डाल दें।


उल्लेखनीय है कि केजरीवाल सरकार की तरफ से डेंगू के खिलाफ ‘10 हफ्ते, 10 बजे, 10 मिनट, हर रविवार डेंगू पर वार’ महा अभियान चलाया जा रहा है। दिल्ली सरकार ने इस सप्ताह के अभियान में दिल्ली के हर दुकानदार को शामिल करने का लक्ष्य रखा है। दिल्ली सरकार ने इस बार थीम की टैग लाइन ‘दिल्ली का हर दुकानदार, करेगा डेंगू पर वार’ दी है। दिल्ली सरकार ने दिल्ली में रह रहे हर दुकानदार से बढ़-चढ़ कर इस अभियान का हिस्सा बनने की अपील की है।


गत वर्षों की तरह, इस बार भी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली सरकार ने दिल्ली में डेंगू को खत्म करने के लिए ‘10 हफ्ते, 10 बजे, 10 मिनट, हर रविवार डेंगू पर वार’ महा अभियान शुरू की है। दिल्ली सरकार के सभी मंत्री, विधायक और अधिकारी भी हर रविवार को अभियान में हिस्सा लेकर अपने-अपने घरों में जमा साफ पानी की सफाई करते हैं। साथ ही, दिल्ली सरकार, विभिन्न माध्यमों के जरिए दिल्ली में रह रहे सभी नगारिकों से अभियान के साथ जुड़कर हर सप्ताह अपने घर के कूलर, गमलों आदि का साफ पानी बदलने और आसपास जमा पानी की सफाई करने के लिए जागरूक कर रही है। साथ ही अपील की जा रही है कि हम सभी को मिलकर हर हाल में मच्छरों को पनपने से रोकना है। 10 हफ्तों तक हम सब को ऐसा करना है और डेंगू को हराना है।


हर साल डेंगू के सबसे ज्यादा मामले 1 सितंबर से 15 नवंबर के बीच आते हैं। डेंगू का मच्छर केवल साफ पानी में पनपता है। साफ पानी के अंदर डेंगू के अंडे पैदा होते हैं और वो अंडे 8 से 10 दिन के अंदर मच्छर में बदल जाते हैं। अगर हम 8 दिन से पहले उस पानी को बदल दें और उस अंडे को नष्ट कर दें, तो मच्छर पैदा ही नहीं होंगे। यह मच्छर 200 मीटर से ज्यादा नहीं उड़ सकते। अगर आपके घर में डेंगू होता है, तो आप यह मानकर चलें कि मच्छर आसपास ही पैदा हुआ है। लिहाजा, डेंगू को खत्म करने के लिए दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली में रहने वाले हर व्यक्ति को 10 हफ्तों तक केवल 10-10 मिनट देने की अपील की जा रही है। अगर हर दिल्ली वासी अपने घर और आसपास इकट्ठे साफ पानी की अच्छे से जांच कर लें और यह सुनिश्चित कर लें कि आपके पड़ोसियों ने भी अपने घर में जांच कर ली है, तो डेंगू से सुरक्षित रह सकते हैं।



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गहरी नींद से पाएं प्राकृतिक सौन्दर्य


चेहरे पर प्राकृतिक आभा और आकर्षण के लिए महँगे सौन्दर्य उत्पादों के बजाय एक अच्छी और सुकून भरी नींद बेहद अहम होती है। भरपूर नींद लेने से दिमाग को शान्ति मिलती है, पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है, जिससे आप आंतरिक तौर पर स्वस्थ रहते हैं। इससे बाहरी खूबसूरती निखरने लगती है और आप सुन्दर, सौम्य और आकर्षक दिखने लगती हैं।


क्या आप जानती हैं कि गहरी नींद आपकी खूबसूरती को चार चाँद लगा सकती है। रोजाना 8-9 घण्टे गहरी नींद लेने से शरीर तरोताजा हो जाता है। जब आप गहरी नींद में होती हैं तो आपके शरीर में खून का संचार बढ़ता है, इससे आपके चेहरे की आभा बढ़ जाती है। गहरी नींद से आपके शरीर में कोलेजन का पुनर्निर्माण होता है तथा आपके चेहरे की मांसपेशियों को आराम मिलता है। जब हम नींद में होते हैं तो हमारे तनाव के हार्मोंस (कॉर्टिसॉल) कम हो जाते हैं तथा हमारी नींद के हार्मोंस (मीलाटोनिन) बढ़ जाते हैं। हमारी त्वचा और पूरा शरीर स्वयं का पुनर्निर्माण करता है या हम यह कह सकते हैं कि दिन में हमारी त्वचा को प्रदूषण या सूर्य की किरणों से हुए नुकसान की भरपाई रात की नींद करती है।


रात को पूरी नींद न आने पर आंखों में सूजन आ जाती है क्योंकि तनाव की वजह से कोर्टलिस का स्तर बढ़ जाता है। जिससे आपके शरीर में विद्यमान अम्ल का स्तर बदल जाता है और शरीर में पानी की मात्रा में अधिकता आ जाती है। यही वजह है कि चेहरे या आंखों के नीचे सूजन आ जाती है। जब आप सो रही होती हैं तो त्वचा की नई कोशिकाएं तेजी से विकसित होती हैं, जिससे सुबह उठते ही आपको ताजगी का अहसास होता है तथा आप सुंदर दिखाई देती हैं।


मेरा यह मानना है कि अगर जवान और आकर्षक दिखना चाहती है तो रात को 9 से 11 बजे तक हर हालत में सो जाइए। अपनी त्वचा को झुर्रियों से परे रखने के लिए पीठ के बल सोना सबसे उपयोगी होता है क्योंकि इससे त्वचा पर पड़ने वाले दबाव से क्रीजिंग हो जाती है, जिससे झुर्रियां रोकी जा सकती है। रात की गहरी नींद आपके बालों को काला, लम्बा तथा आकर्षक बनाए रखने में मदद करती है। गहरी नींद शरीर में प्रोटीन के उपयुक्त संश्लेषण के लिए अत्यंत आवश्यक होती है जो कि हार्मोंस को प्रभावित करती है जिससे आपके बालों की वृद्धि तथा चमक प्रभावित होती है।


अक्सर लोगों को यह कहते देख गया है कि आप थके-थके लग रहे हो। यह तब होता है जब हम पर्याप्त नींद नहीं ले पाते जिसकी वजह से चेहरे पर काले धब्बे उभर आते हैं तथा त्वचा अपनी प्राकृतिक आभा खो देती है। रात को पर्याप्त नींद से शरीर में विषैले पदार्थ खत्म हो जाते हैं एवं पुरानी कोशिकाएं हट जाती हैं। उनके स्थान पर नई कोशिकाएं पैदा हो जाती हैं और हम युवा दिखने लगते हैं। पर्याप्त नींद के अभाव में शरीर में रक्त का संचार कम हो जाता है, जिससे त्वचा मुरझाई तथा बेजान लगने लगती है।


बेहतर नींद के लिए प्रतिदिन रात्रि में सोने तथा सुबह उठने का समय नियमित रखें। रात्रि को सोने से पहले चाय, शराब, काफी या तामसिक पदार्थों से परहेड करें क्योंकि इससे मस्तिष्क की शिराएँ उत्तेजित हो जाती हैं जो अच्छी नींद में व्यवधान डालती हैं। हमेशा मध्य रात्रि यानि 11 बजे से पहले नींद ले लें।


पर्याप्त नींद न लेने की वजह से आप थके-थके महसूस कर सकते हैं जिससे आपका मनोबल गिर जाता है तथा आप तनावपूर्ण जीवन जीना शुरु कर देते हैं। एक ताजा अनुसंधान के अनुसार अनिंद्रा की वजह से लोग 10 गुना ज्यादा तनाव में रहते हैं। सोने से पहले अपने चेहरे, गर्दन, पांव को हल्के क्लीजर से धो डालिए। जिससे आपकी त्वचा पर दिनभर में मेकअप, गन्दगी, धूल-मिट्टी को हटाने में मदद मिले। अपनी नाइट क्रीम तथा आई जैल सोने से बीस मिनट पहले जरूर लगा लीजिए ताकि यह त्वचा में समा जाए तथा तकिया खराब ना हो। रात्रि में सोने से आधा घण्टा पहले गुनगुने पानी से नहाने से आपकी मांसपेशिओं और तंत्रिकाओं को आराम मिलता है, जिससे आपको अच्छी नींद आती है।


अगर आप पर्याप्त नींद नहीं लेते हैं तो निंद्रा के अभाव में शरीर में ‘घरेलिन’ तत्व बढ़ जाते हैं। इनकी वजह से भूख बढ़ जाती है और शरीर में फैट बढ़ने से वजन बढ़ना शुरू हो जाता है। यदि आप नियमित रूप में जिम जाती हैं या व्यायाम व योग कर रही हैं तथा इसके बावजूद आपका वजन बढ़ता है तो आप अपनी नींद पर ध्यान दें। रात्रि में सोते समय जल मिश्रित भोजन ग्रहण करें। रात को पानी पीने की जगह पानीयुक्त सब्जियाँ, फलों का सेवन करें। अगर आप रात में पर्याप्त नींद नहीं ले पाएं तो दिन में आधा घण्टा सोने से आपका मूड तरोताजा हो जायेगा और आपकी स्मरण शक्ति और एकाग्रता भी बढ़ेगी।


-शहनाज़ हुसैन-

(लेखिका अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्ति सौन्दर्य विशेषज्ञ हैं।)









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शिक्षा संस्थानों में फिटनेस गतिविधियां हों

शिक्षा संस्थान में विद्यार्थी जीवन से ही अच्छे स्वास्थ्य की नींव रखी जाती है, परंतु क्या हमारे संस्थानों में विद्यार्थियों के लिए फिटनेस की  सुविधाएं उपलब्ध हैं। पिछले साल मार्च से हम कोरोना महामारी के कारण शिक्षा संस्थानों से दूर हैं। पढ़ाई  ऑनलाइन तो कभी ऑफलाइन हो ही जाती है, मगर फिटनेस के लिए घर पर भी कार्य नहीं हो रहा है। कोरोना के भयानक परिणामों को देखते हुए अब हर नागरिक की फिटनेस का आधार विद्यार्थी जीवन से ही मजबूत बनाना और अधिक जरूरी हो गया है। हवा में जब अधिक धूल-धुआं हो गया है और पृथ्वी पर जैसे-जैसे जीवन जीने की आवश्यक चीजें घटती जा रही हैं, वैसे-वैसे मानव को अब स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा सजग होना पडे़गा। अच्छे स्वास्थ्य की नींव बचपन से लेकर विद्यार्थी जीवन तक पक्की की जाती है। मगर हिमाचल प्रदेश के अधिकांश स्कूलों में प्रत्येक विद्यार्थी की स्वास्थ्य के लिए न तो सुविधा है और न ही पर्याप्त शिक्षक हैं। विद्यार्थी कितना फिट है, उसके लिए विद्यालय में कोई परीक्षा ही नहीं है। ऐसे में शिक्षा के कर्णधारों  के साथ-साथ अभिभावकों व विद्यालय प्रशासन को इस विषय पर अनिवार्य रूप से सोचना होगा कि हमारी आगामी पीढि़यों की फिटनेस व नैतिकता कैसे उन्नत हो सके। स्वास्थ्य के सिद्धांतों से नैतिकता का गहरा संबंध है। संयम, निरंतरता, निस्वार्थ सोच व ईमानदारी से कार्य निष्पादन हम खेल के मैदान में ही सही ढंग से सीख पाते हैं। किसी भी देश को इतनी क्षति युद्ध या महामारी से नहीं होती है जितनी तबाही नशे के कारण हो सकती है।


आज जब देश के अन्य राज्यों सहित हिमाचल प्रदेश में भी नशा युवा वर्ग पर ही नहीं किशोरों तक चरस, अफीम, स्मैक, नशीली दवाओं तथा दूरसंचार के माध्यमों के दुरुपयोग से शिकंजा कस रहा है, इसलिए विद्यालय व अभिभावकों को इस विषय पर सचेत हो जाना चाहिए। यदि विद्यार्थी  किशोरावस्था में नशे से बच जाता है तो वह फिर युवावस्था आते-आते समझदार हो गया होता है। इसलिए विद्यालय स्तर पर प्राथमिक से वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों को विभिन्न विधाओं में व्यस्त रखने के साथ-साथ शारीरिक फिटनेस  की तरफ मोड़ना बेहद जरूरी हो जाता है। विद्यार्थी के विकास के लिए खेलों के माध्यम से फिटनेस कार्यक्रम बहुत जरूरी हो जाते हैं, मगर कुछ विद्यार्थियों द्वारा बनी दो टीमें तो खेलने लग जाती हैं और सारा विद्यालय दर्शक बन जाता है। फिटनेस तो विद्यालय के हर विद्यार्थी को अनिवार्य रूप से चाहिए होती है। विद्यालय स्तर पर हर विद्यार्थी के लिए अभी तक कोई भी कार्यक्रम नहीं है। पिछले कुछ दशकों से हिमाचल प्रदेश के नागरिकों की फिटनेस में बहुत कमी आई है । इसके पीछे का प्रमुख कारण भी विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों के लिए किसी भी प्रकार के फिटनेस कार्यक्रम का न होना है। पढ़ाई की होड़ में हम विद्यार्थियों की फिटनेस को ही भूल गए हैं।


 हिमाचल प्रदेश की अधिकांश आबादी गांव में रहती है। वहां पर सवेरे-शाम  वर्षों पहले से ही विद्यार्थी अपने अभिभावकों के साथ कृषि व अन्य घरेलू कार्यों में सहायता करता था। विद्यालय आने-जाने के लिए कई किलोमीटर दिन में पैदल चलना पड़ता था। इसलिए उस समय के विद्यार्थी को किसी भी प्रकार के फिटनेस कार्यक्रम की कोई जरूरत नहीं थी। मगर अब घरेलू कार्यों से विद्यार्थी दूर हो गया है और विद्यार्थी घर के आंगन में बस पर सवार होकर विद्यालय के प्रांगण में उतरता है। पढ़ाई के नाम पर ज्यादा समय खर्च करने के कारण फिटनेस के लिए कोई समय नहीं बचता है। इस कॉलम के माध्यम से पहले भी कई  बार फिटनेस के बारे में सचेत किया जाता रहा है। जब अधिकतर स्कूलों के पास फिटनेस के लिए न तो आधारभूत ढांचा है और न ही कोई कार्यक्रम है तो फिर आज का विद्यार्थी फिटनेस व मनोरंजन के नाम पर दूरसंचार माध्यमों का कमरे में बैठ कर खूब दुरुपयोग कर रहा है। ऐसे में शिक्षा के द्वारा विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास की बात मजाक लगती है। आज के विद्यार्थी को अगर कल का अच्छा नागरिक बनाना है  तो हमें विद्यालय व घर पर उसके लिए सही फिटनेस कार्यक्रम देना होगा। तभी हम सही अर्थों में अपनी अगली पीढ़ी को शिक्षित करेंगे। बचपन से युवावस्था जैसे पढ़ाई का सही समय है, उसी प्रकार शारीरिक विकास का समय भी यही है। इस समय ही हमारे शरीर की रक्त वाहिकाओं के बढ़ने, मांसपेशियों व हड्डियों के मजबूत होने का समय है। इस सब के लिए भी फिटनेस कार्यक्रम अनिवार्य रूप से चाहिए क्योंकि एक उम्र बीत जाने के बाद भी हम इनका विकास नहीं कर सकते हैं।


 बिना फिटनेस कार्यक्रम के आज का विद्यार्थी अच्छा पढ़-लिख कर डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजर व अन्य बड़ा डिग्रीधारक तो बनकर नौकरी तो ले सकता है, मगर क्या वह साठ वर्ष की उम्र तक अपने कार्य का निष्पादन सही तरीके से कर सकता है। आज चालीस वर्ष पार करते ही बुढ़ापा आ रहा है। ऐसे में विद्यार्थियों को विद्यालय स्तर पर फिटनेस कार्यक्रम की बहुत जरूरत है। अमरीका व यूरोप के विकसित देशों के विद्यालयों में हर विद्यार्थी की सामान्य फिटनेस के लिए वैज्ञानिक आधार पर तैयार किए गए कार्यक्रम के साथ-साथ उचित आहार का भी प्रबंध  होता है। विद्यार्थी की फिटनेस कैसी है, इसके लिए साल में कई बार परीक्षा होती है। हमारे यहां कुछ स्तरीय विद्यालयों में फिटनेस कार्यक्रम तो हैं, मगर शारीरिक क्षमताओं को नापने के लिए कोई परीक्षण नहीं है। इस सबके लिए  विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों की सामान्य फिटनेस का मूल्यांकन कर उसमें सुधार के लिए सुझाव देकर सुधार करवाने के लिए ‘फिटनेस मूल्यांकन व सुझाव’ कार्यक्रम की शुरुआत जल्द ही करनी चाहिए। इस कार्यक्रम के अतंर्गत विद्यालय के हर विद्यार्थी का साल में तीन बार विभिन्न शारीरिक क्षमताओं का परीक्षण कर उनका मूल्यांकन किया जाए। पांच दशक पहले भी राष्ट्रीय स्तर से फिटनेस जागरूकता के लिए इस तरह के कार्यक्रम चले थे, मगर शिक्षा राज्य सूची का विषय होने के कारण बाद में धीरे-धीरे खत्म हो गए थे। अब फिर फाइलों में सीबीएसई फिटनेस टैस्टिंग की बात तो कर रही है, मगर धरातल पर तो अभी तक कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। शारीरिक स्वास्थ्य के सिद्धांतों को मद्देनजर रखकर फिटनेस विशेषज्ञों से कार्यक्रम बनवा कर उसे लागू करवाया जाए।


-भूपिंद्र सिंह-



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इन आसान घरेलू उपायों से मिलेगा मियादी बुखार में आराम

टायफायड जिसे मियादी बुखार भी कहा जाता है, आमतौर पर दूषित पानी या भोजन से फैलता है। मियादी बुखार में व्यक्ति को 104 डिग्री तक भी बुखार हो सकता है। गंभीर स्थित हिोने पर अस्पताल में भर्ती भी करवाना पड़ता है। यूं तो टायफाइड होने पर व्यक्ति को डॉक्टरी मदद की जरूरत होती है, लेकिन फिर भी आप कुछ आसान घरेलू उपायों के जरिए स्थिति में काफी हद तक राहत पा सकते हैं। तो चलिए जानते हैं ऐसे ही कुछ आसान उपायों के बारे में...


लिक्विड पर करें फोकस

चूंकि टायफाइड में व्यक्ति को तेज बुखार होता है और शरीर का तापमान बढ़ने से व्यक्ति डिहाइडेट हो सकता है। ऐसे में व्यक्ति को अपने लिक्विड की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए। आप पानी के अलावा नारियल पानी, फलों के रस व सूप आदि का सेवन करें। इससे आपको कई तरह के पौष्टिक तत्व भी मिलेंगे। अक्सर टायफाइड होने पर व्यक्ति को दस्त हो जाते हैं। ऐसे में भी पानी की मात्रा बढ़ाने की आवश्यकता होती है। आप चाहें तो मार्केट में मिलने वाले ओआरएस पैकेट का घोल बनाकर भी पी सकते हैं।


लहसुन

आपको शायद पता ना हो लेकिन लहसुन टायफायड बुखार में बेहद लाभदायी होता है। सबसे पहले तो लहसुन की तासीर गर्म होती है, जिससे शरीर में पसीना आता है और बुखार कम होता है। इसके अलावा इसमें एंटी−ऑक्सीडेंट्स होते हैं। साथ ही यह आपके प्रतिरक्षा तंत्र को भी बेहतर बनाने का काम करता है। आप इसे कच्चा खा सकते हैं। इससे आपको अधिक लाभ होगा।


तुलसी 

तुलसी में कई तरह के औषधीय गुण पाए जाते हैं और इसलिए लोग कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं होने पर इसका इस्तेमाल करते हैं। टायफाइड में भी यह बेहद कारगर है। इसके लिए आप पानी में तुलसी की कुछ पत्तियां डालकर उबालें और रोगी को यह पानी छानकर पीने के लिए दें।

 

कोल्ड कंप्रेस

टायफाइड में व्यक्ति को तेज बुखार होता है। ऐसे में शरीर का तापमान कम करने के लिए कोल्ड कंप्रेस की मदद लें। इसके लिए आप एक साफ कपड़े को ठंडे पानी में भिगोएं। फिर इसे निचोड़ें और मरीज के माथे पर रखें। इससे उसका तापमान कम हो जाएगा और व्यक्ति को काफी अच्छा महसूस होगा। लेकिन हर थोड़ी देर में कोल्ड कंप्रेस करने से बचें क्योकि कई बार पानी टायफाइड के मरीजों के लिए परेशानी भी खड़ी कर सकता है।



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आम समस्या है फटी एड़ियां

पांव शरीर का आधार माने जाते हैं। पांव पर ही पूरे शरीर का भार होता है तथा पांव ही हमारे शरीर को गतिशील करते हैं। इसीलिए पांव का ख्याल अत्यंत महतवपूर्ण माना जाता है। सर्दियों में फटी एड़ियों की समस्या आम होती है तथा महिलाएं सबसे ज्यादा पीड़ित रहती हैं। मौसम में बदलाव के दौरान भीषण ठण्डी/गर्मी में शरीर में नमी की कमी, विटामिन की कमी, डायबटीज़, थायराईड, शरीर में मोटापे तथा 60 वर्ष से ज्यादा आयु वर्ग के लोगों को फटी एड़ियों की समस्या का सामना करना पड़ता है। इसलिए यदि आपको फटी एड़ियों की समस्या से लगातार जूझना पड़ रहा है तो यह अनुवांशिक या स्वास्थय कारणों से भी हो सकता है फटी एड़ियों की समस्या सामान्यतः पाँव के प्रति लापरवाही से बढ़ जाती है। हवाई चप्पल या खुले जूतों का प्रयोग करने से भी फटी एड़ियां उभर आती हैं। पाँव की एड़ियों में गहरी दरार पड़ जाने से कई बार असहनीय पीड़ा का सामना भी करना पड़ सकता है। आपके पाँव की त्वचा में अक्सर रूखापन आ जाता है तथा जब रूखापन बढ़ जाता है तो फटी एड़ियों का स्वरूप ले लेता है।


सर्दियों में ठण्डे बर्फीले मौसम की वजह से शरीर में नमी की कमी आ जाती है जिससे पाँव में खून का बहाव प्रभावित होता है । एड़ियों की त्वचा बाकी भागों की बजाय ज्यादा सख्त होती है तथा सर्दियों में नमी की वजह से इसका लचीलाप कम हो जाता है जिससे फटी एड़ियों का स्वरूप बन जाता है। शरीर में नमी की कमी के कारण जीवित कोशिकाएं कठोर हो जाती हैं तथा उसमें एड़ियों के भाग पर मृत कोशिकाएं बढ़ जाती हैं जोकि बाद में फटी एड़ियों का स्वरूप ले लेती हैं। लेकिन आप कुछ प्रकृतिक उपायों से इन फटी एड़ियों से छुटकारा पा सकती हैं। –

अपनी त्वचा में यौवनता तथा ताजगी लाने के लिए अपने पाँव को सप्ताह में एक बार घर में ‘‘फुट ट्रीटमैंट‘‘ जरूर दें। पाँव को गर्म पानी में डुबोने से एड़ियों की त्वचा मुलायम होती है जिससे मृत्क कोशिकाओं को हटाने में मदद मिलती है। प्रतिदिन पाँव तथा एड़ियों की उचित देखभाल सुनिश्चित करने के लिए नहाने से पहले अपने पाँव में शुद्ध बादाम तेल की रोजाना मालिश कीजिए! नहाने के बाद जब पाँव गीले हों तो पाँव पर क्रीम का इस्तेमाल कीजिए जिससे पाँव पर नमी बरकरार रखने में मदद मिलेगी। फुट क्रीम से पाँव की सर्कुलर मोशन में हल्के-हल्के मालिश कीजिए तथा इससे आपके पाँव मुलायम बने रहेंगे जिससे फटी एड़ियों की समस्या नहीं आएगी।


पाँव की समस्याओं के लिए शहद प्रकृतिक उपचार उपचार माना जाता है। शहद में एंटी बैकटीरियल तथा एंटी माइक्रोबियल गुण विद्यमान होते हैं जो कि फटी एड़ियों को साफ करके इनका प्रकृतिक उपचार कर सकते हैं । पांच लीटर गुनमुने पानी में एक कप शहद मिलाकर इसमें 20 मिनट तक पाँव सोख कर रखने से पाँव में कोमलता आती है। आप शहद को ‘‘फुट सक्रब‘‘ या फुट मास्क के तौर पर भी प्रयोग कर सकते हैं।

आपकी रसोई में भी फटी एड़ियों का प्रकृतिक ईलाज उपलब्ध है। नींबू को काटकर इसका आधा भाग लेकर इसे चीनी में मिलाएं तथा इसे अपने एड़ियों पर आहिस्ता-आहिस्ता रगड़ें और बाद में एड़ियों को साफ ताजे पानी से धो लीजिए। इस प्रक्रिया को हफ्ते मे दो बार अपनाने से बेहतर सकारात्मक परिणाम मिलेंगे।


रात को साने से पहले गर्म पानी में नमक डालकर अपने पैरों को आधा घण्टा तक भीगो कर रखें जिससे आपकी एड़ियों की त्वचा मुलायम हो जाएगी तथा इसके बाद बाथिंग स्पंज से रगड़कर एड़ियों से मृत कोशिकाओं को आहिस्ता-आहिस्ता हटा दीजिए। कभी भी धातू के स्पंज का इस्तेमाल मत कीजिए क्योंकि इससे एड़ियों के घाव गहरे हो सकते हैं। पाँव को धोने के बाद त्वचा पर क्रीम की मालिश कीजिए तांकि त्वचा क्रीम को पूरी तरह सोख ले। नींबू तथा हल्दी के गुणों वाली क्रीम सबसे बेहतर होगी। रात को सोने से पहले फटी एड़ियों को साॅफ्ट काॅटन के कपड़े की पट्टी बांधकर सोने से फट एड़ियों के घाव भरने में मदद मिलेगी। रात में सोने से पहले पाँव पर ‘‘फुटक्रीम‘‘ लगाकर पाँव को काॅटन के कपड़े की पट्टी बांधकर सोने से घाव को प्रकृतिक तरीके से ठीक होने में मदद मिलती है तथा बिस्तर भी खराब नहीं होता।


फटी एड़ियों के लिए नारियल तेल रामबाण की तरह काम करता है। नारियल तेल में विद्यमान एंटी इन्फलेमेटरी तथा एंटी माईक्रोबाईल गुण विद्यमान होते हैं। जिससे त्वचा की नमी बरकरार रखने में मदद मिलती है तथा नारियल तेल को सूखी त्वचा के उपचार के लिए सबसे बेहतर माना जाता है। नारियल तेल त्वचा में नमी बरकरार रखने के इलावा त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने में भी मददगार साबित होता है। नारियल तेल को प्रतिदिन उपयोग में लाने से फटी एड़ियों की समस्या से बचा जा सकता है तथा यह पाँव की बाहरी त्वचा के टिशू को मजबूत करता है, रात को सोने से पहले नारियल तेल से त्वचा की मालिश करने से सुबह आपके पाँव कोमल तथा मुलायम बनकर उभरेंगे। यदि आप फटी एड़ियों की समस्या से जूझ रहे हैं तो दिन में दो बार नारियल तेल से अपने पाँव की मालिश कीजिए।


फटी एड़ियों के उपार में जैतून का तेल काफी प्रभावी माना जाता है। हफ्ते में दो बार जैतून के तेल की ट्रीटमैंट, फटी एड़ियों की समस्या का प्रभावी निदान प्रदान करती है। जैतून के गर्म तेल को काॅटन बाॅल से आहिस्ता-आहिस्ता पाँव में गोलाकार तरीके से लगाने से त्वचा तेल को सोख लेगी। उसके बाद पाँव को काॅटन के कपड़े से बांध लीजिए तथा थोड़ी देर बाद गुनगुने पानी से धो डालिए। रात को सोने से पहले प्रतिदिन जैतून के तेल से पाँव की मालिश करने से आपको बेहतरीन परिणाम मिल सकते हैं।


तिल का तेल फटी एड़ियों के पोषण तथा नमी प्रदान करने में प्रभावी माना जाता है। तिल के तेल में एंटी फंगल गुण होने के अलावा विटामिन, मिनरल तथा न्यूटरीऐंटस विद्यमान होते हैं। अपने पाँव में आहिस्ता-आहिस्ता तिल के तेल की मालिश कीजिए तथा तेल को आहिस्ता-आहिस्ता प्रकृतिक तौर पर पाँव को सोख लेने दीजिए तथा बाद में आप पाँव को सामान्य पानी में धो सकते हैं। तिल का तेल पाँव की त्वचा में कोमलता तथा नमी बरकरार रखता है तथा फटी एड़ियों का प्रकृतिक उपचार माना जाता है।


मौसम के हिसाब से पाँव में जूतों का चयन कीजिए। सर्दियों में हवाई चप्पल, सैंडल आदि के उपयोग से परहेज कीजिए तथा बंद जूतों को प्रयोग में लायें। सर्दियों में काॅटन के मौज़े को प्राथमिकता दें क्योंकि ऊनी या सिंथेटिक्स के मौज़े से पाँव की त्वचा रूखी हो सकती है। सर्दियों में साबून, शैम्पू के प्रयोग को जरूरत से ज्यादा उपयोग में ना लायें तथा विटामिन ई, कैल्शियम, जिंक, ओमेगा-3 आदि से भरपूर डाईट लें।

(लेखिका अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सौंदर्य विशेषज्ञ हैं तथा हर्बल क्वीन के रूप में लोकप्रिय हैं)





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संतरे का छिलका बर्न करता है फैट

विटामिन सी और कई दूसरे पोषक तत्वों से भरपूर संतरा तो वजन कम करने में मददगार है ही, उसका छिलका भी अपने कई गुणों के कारण फैट को बर्न करता है. संतरे के छिलके में विटामिन बी6, कैल्शियम, फॉलेट के अलावा पॉलिफेनॉल्स भी पाया जाता है जो डायबिटीज के साथ अल्जाइमर और मोटापा जैसी दिक्कतों को भी दूर करने में मदद करता है. संतरे के फल की तुलना में उसके छिलके में 4 गुना अधिक फाइबर होता है.


इसलिए इसके सेवन के बाद देर तक भूख नहीं लगती. छिलके में मौजूद विटामिन सी फैट को बर्न करने में मदद करता है. संतरे में कैलरीज की मात्रा बेहद कम होती है. साथ ही संतरे में पानी की मात्रा अधिक होती है. एक संतरे में आमतौर पर करीब 87 प्रतिशत पानी होता है जिससे यह सर्दी के मौसम में आपको हाइड्रेटेड रखने में मदद करता है. संतरे में मौजूद फाइबर के कारण इसे खाने के बाद पेट भरा हुआ महसूस होता है. पाचन तंत्र भी सही बना रहता है और कब्ज की दिक्कत भी नहीं होती. एक स्टडी के मुताबिक, संतरे में पाया जाने वाला वाटर-साल्यूबल यानि पानी में घुलनशील विटामिन मोटापे से लड़ने और वेट को मैनेज करने में मदद करता है. यह शरीर के फैट बर्निंग प्रोसेस को भी तेज करता है.






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थायराइड भी हो सकता है थकान का कारण

क्या आपके साथ भी एसे होता है कि आप सारा दिन काम करते करते इतना थक जाती है कि आप अपना मनपंसद टी.वी शो भी अच्छी तरह से नहीं देख पाती और घर में हमेशा थका-थका महसूस करती है। घर पर सीढियां चढ़ने के वक्त,कोई भी काम करने के वक्त या बैड से उठने के वक्त भी एसा महसूस होना कि जितनी नींद हमने ली है वो अभी भी पर्याप्त नहीं है। स्वस्थ ऊर्जा का निर्माण स्वास्थ्यवर्द्धक पाचन प्रणाली से शुरू होता है। विटामिन बी की कमी से भी थकान महसूस होती है। हल्की थकान तथा गंभीर थकान में से आप खुद को किसका शिकार महसूस करती हैं और वास्तव में आपके साथ गलत क्या हो रहा है? 


-थकावट महसूस होने के कई कारण हो सकते है। जब भी शरीर में थकावट महसूस हो तो थोड़ा इधर-उधर टहल कर आप अपनी थकावट को दूर कर सकती है। जब आप थकी होती हैं तो आपका मैटाबोलिक रेट कम हो जाता है और आप कम कैलोरीज बर्न करती हैं। इसी कारण आपको थकावट महसूस होती है। कसरत करने से भी आप सारा दिन बेहतर महसूस करेंगी और काम करने के बाद भी थकावट कम महसूस होगी। 


-हमारे शरीर में थकान महसूस होने के कई कारण हो सकते है। कई बार विटामिन्स की कमी होने पर भी हम कोई भी काम करने के बाद थकावट महसूस करते है। आयरन की कमी होने पर भी थकान महसूस होती है। यदि आपको अपनी त्वचा पीली दिखाई दे, अपनी धड़कन तेज महसूस हो और चिड़चिड़ापन महसूस हो तो आयरन से भरपूर डाइट आपको इस समस्या से निजात पाने में सहायक हो सकती है। 


-अपने वातावरण को ताजा बनाए रखें और बोर होने से बचें जब भी आप बोर हो रही हो तो संगीत का लुत्फ उठा सकती है और बोरियत आपके मूड को प्रभावित करती है। 


-आपकी थकावट का कारण थायराइड भी हो सकता है। सुबह के समय थकान थायराइड की कमजोर कार्यप्रणाली का चिन्ह हो सकती है। इसलिए थायराइड की जांच अवश्य करवाएं। 


-भरपूर नींद न लेने की वजह से भी आप सारा दिन थकान महसूस कर सकती है। शरीर के लिए भरपूर नींद लेना भी बहुत जरूरी होता है। इसलिए रात के समय कम से कम 8 घंटे नींद लेना जरूरी है और दिन के समय बीच में कम से कम 20-30 मिनट की नींद जरूर लें। 


-दिन में भारी भोजन करने की बजाय अपने भोजन में साबुत अनाज, ओट्स, अंकुरित खाद्य तथा बहुत सारी सब्जियां तथा फल शामिल करें। 



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स्वास्थ्य के लिए वरदान है प्याज

भारतीय रसोई में प्याज का बड़ा ही महत्व है। बिना प्याज के हमारे यहां रसोई को अधूरा माना जाता है। ऐसी कम ही डिशेज होगी जो प्याज के बनती हैं। प्याज खाने में स्वाद तो बढ़ाता है ही, वही हमारे स्वास्थ्य के लिए भी एक वरदान है। प्याज एक अत्यंत गुणकारी पौधा है जिसमें औषधीय गुण भी पाएं जाते हैं। लाल प्यामज में ढेर सारे पोषक तत्वन होते हैं, जो बड़ी से बड़ी बीमारियों को खत्म करने की शक्तिा रखते हैं। इसके अलावा इसमें ग्लूकोस भी प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। हरा प्याज चेहरे की झुर्रियों को दूर करता है। इसे खाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। इसके इलावा मसूड़ो में सूजन और दांत में दर्द होने पर प्याज के रस और नमक का मिश्रण लगाने से दर्द में राहत मिलती है।

 

सर्दी-जुखाम

इसमें एंटी-फंगल और एंटीऑक्सीाडेंट गुण पाए जाते हैं। इसे नियमित रूप से खाने से सर्दी-जुखाम और बुखार से राहत मिलेगी। प्याज के रस में मिश्री मिलाकर चाटने से कफ की समस्या से जल्द ही निजात मिलती है।


ब्लतड प्रेशर और दिल के लिए

लाल प्यागज शरीर के खराब कोलेस्ट्रॉणल को निकाल कर हृदय को रोगों से बचाता है। इसे नियमित खाने से हाई ब्लतड प्रेशर मेंटेन रहता है।


कैंसर का इलाज

प्याज कैंसर सेल को बढ़ने से रोकता है। यह प्रोस्टेलट और पेट के कैंसर होने के खतरे को भी कम करता है। खाली पेट रोज सुबह प्याज खाने से पाचन से जुड़ी समस्याएं नहीं होती हैं।


गठिया का दर्द और सूजन में आराम

कई बीमारियों की वजह से होने वाले शारीरिक दर्द और सूजन से भी यह राहत दिलाता है। अगर आपको अस्थ मा, एलर्जी या गठिया रोग है तो अभी से ही लाल रंग की प्याभज खाना शुरु कर दें। गठिया में सरसों का तेल व प्याज का रस मिलाकर मालिश करें।


एंटी फंगल

प्याज में एंटी फंगल गुण पाए जाते हैं। यदि प्याज के बीजों को सिरका में पीसा कर दाद-खाज और खुजली में लगाए तो जल्दी ही आराम मिलता है।


बालों के लिए फायदेमंद

बालों में प्याज का रस लगाने से बाल झड़ना बंद हो जाते हैं और साथ ही बालें की चमक भी बढ़ती है। अगर रूसी की समस्याय है तो आप इसके रस को भी सिर पर लगा सकते हैं।


यूरिन प्रॉब्लम्स

अगर किसी को यूरिन प्रॉब्लम हो और रुक-रुक कर पेशाब आता है तो पेट पर प्याज के रस की हल्की मालिश करनी चाहिए। इसके इलावा दो चम्मच प्याज का रस और गेहूं का आटा लेकर हलुवा बना लीजिए। इसको गर्म करके पेट पर इसका लेप लगाने से पेशाब आना शुरू हो जाता है। पानी में उबालकर पीने से भी पेशाब संबंधित समस्या खत्म हो जाती है।


पथरी की समस्या में लाभ

अगर आपको पथरी की शिकायत है तो प्याज आपके लिए बहुत उपयोगी है। प्याज के रस को चीनी में मिलाकर शरबत बनाकर पीने से पथरी की समस्या से निजात मिलता है। प्याज का रस सुबह खाली पेट पीने से पथरी अपने-आप कटकर बाहर निकल जाती है।

 

इम्यूनिटी पावर बढ़ाए

यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को इतना अधिक बढ़ा देता है कि बीमारियों जल्दी होती ही नहीं। यह कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम बनाए रखता है। हरे प्याज में क्रोमियम होता है। इसीलिए यह डायबिटीज के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। यह ब्लडप्रेशर पर नियंत्रण करता है। 


लंबी उम्र के लिए

प्याज खाने से कई शारीरिक बीमारियां नहीं होती हैं। इसके आलावा प्याज कई बीमारियों को दूर भगाता है। इसलिए यह कहा जाता है कि प्याज खाने से उम्र बढती है, क्योंकि इसके सेवन से कोई बीमारी नहीं होती और शरीर स्वस्थ्य रहता है।





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दिल्ली में डेंगू और चिकनगुनिया के खिलाफ मुहिम शुरू करेंगे सीएम केजरीवाल

नई दिल्ली : राजधानी दिल्ली में बारिश के बाद डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारी से जनता को बचाने के लिए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 10 हफ्ते 10 बजे 10 मिनट पर हर रविवार डेंगू पर वार मुहिम की शुरुआत की है. दिल्ली में कई ऐसी कच्ची कॉलोनियां हैं, जहां पर गंदगी का अंबार लगा हुआ है और पानी की निकासी का कोई रास्ता नहीं है. इसकी वजह से इन कॉलोनियों में रहने वाले लोगों को लगता है कि मुख्यमंत्री की महामारी से बचाने की मुहिम कारगर साबित नहीं हो सकती है. इस मुहिम को कारगर साबित करने के लिए सबसे पहले समस्या के समाधान की जरूरत है. गंदे पानी की निकासी का रास्ता निकाला जाए. इलाके में जमा गंदगी को हटाया जाए. तभी कुछ काम हो सकता है.


लोगों ने बताया कि तिमारपुर विधानसभा की वजीराबाद की कच्ची कॉलोनियों में महीनों से गंदगी का अंबार लगा हुआ है. यह हालात आम दिनों में भी देखने को मिलते हैं. यहां खाली पड़े प्लॉटों में पानी भरा हुआ है. लोग अपने घरों से निकलने वाली गंदगी को खाली प्लॉटों में डालते हैं. यहां पर बड़ी संख्या में बहुमंजिला इमारत बनी है. उनमें रहने वाले लोग गंदगी की वजह से घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. 


लोगों का यह भी कहना है कि यहां पर जनप्रतिनिधि भी लोगों की सुध लेने के लिए नहीं आते है. मुख्यमंत्री भले ही लोगों को बचाने के लिए मुहिम की शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन हालात देखकर नहीं लगता कि इन कॉलोनियों में यह मुहिम कारगर साबित होगी. यहां के लोगों का आरोप है कि चुनाव के समय नेता गलियों में घूमते हैं, लेकिन उसके बाद कोई भी नेता जनता की समस्या का समाधान नहीं करता. तिमारपुर की इन कच्ची कॉलोनी के हालात बद से बदतर हैं. दिल्ली में ज्यादातर कच्ची कॉलोनी में रहने वाले लोग इन्ही समस्याओं से जूझ रहे हैं. 


लोगों का कहना है कि तिमारपुर विधानसभा से आम आदमी पार्टी के विधायक दिलीप पांडेय हैं, जो जीतने के बाद दिखाई नहीं दिए. वहीं इलाके की कांग्रेस की निगम पार्षद अमरलता सांगवान है, जो जिले की कांग्रेस महिला मोर्चा की जिला अध्यक्ष भी है. लेकिन कोई भी प्रतिनिधि इस महामारी के दौर में लोगों की सुध नहीं ले रहा है. कोई भी कर्मचारी या जनप्रतिनिधि इलाके में डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी घातक बीमारियों से बचाने के लिए दवाई का स्प्रे करने भी नहीं आ रहा है. 




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कब्ज, एसिडिटी और मल त्याग में दर्द की समस्या से तुरंत राहत दिलाता है मलासन

आजकल खान-पान की गड़बड़ी, तनाव और लाइफस्टाइल के कारण लोगों में पेट संबंधी समस्याएं काफी बढ़ गई हैं। एक शोध के मुताबिक शहरों में रहने वाले हर 10 में से 6 व्यक्ति को कब्ज की समस्या है। एसिडिटी, अपच, हार्ट बर्न, कब्ज जैसी समस्याओं से आप भी कभी न कभी परेशान होते हैं। कई लोगों को मल त्याग में बहुत दर्द का सामना करना पड़ता है और घंटों टॉयलेट में बैठे रहने के बाद भी पेट साफ नहीं होता है। इन सभी समस्याओं को मलासन चुटकियों में ठीक करता है। मलासन के अभ्यास से पेट संबंधी सभी बीमारियां दूर होती हैं और मल त्याग के समय आसानी होती है। 


कैसे करें मलासन: मलासन करने के लिए सबसे पहले अपने घुटनों को मोड़कर मल त्‍याग की अवस्‍था में बैठ जाएं। बैठने के बाद अपने दोनों हाथों की बगल को दोनों घुटनों पर टीका दें। अब दोनों हाथो की हथेलियों को मिलाकर नमस्कार मुद्रा बनाएं। अब धीरे-धीरे सांस लें और छोड़ें, आपको कुछ देर इसी अवस्था में बैठना है। अब धीरे-धीरे हांथो को खोलते हुए वापस उठ कर खड़े हो जाए।


हिप्स के जोड़ों को बनाता है लचीला: मलासन हिप के जोड़ों में लचीलापन बनाये रखने में मदद करता है। यह लचीलापन हम सभी को जन्‍म के समय मिलता है, लेकिन उम्र के साथ इसमें कमी आने लगती है। हिप ज्वाइंट्स को इमोशन्स का केंद्र कहा जाता है। इसलिए अगर आपके हिप ज्वाइंट्स मजबूत होंगे, तो आपका अपने इमोशन्स पर कंट्रोल बढ़ेगा।


कब्ज के लिए है रामबाण: मलासन से कब्‍ज सहित पेट की सभी समस्‍याओं से निजात पा सकते हैं। पुरानी कब्ज की परेशानी, पेट दर्द और एसिडिटी जैसी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए हम दवाओं का सहारा लेते हैं, जिससे कुछ समय के लिए तो आराम मिल जाता है, लेकिन कुछ समय बाद यह समस्‍याएं हमें घेर लेती है। लेकिन नियमित मलासन को करने से आप कब्‍ज की समस्‍या से छुटकारा पा सकते हैं। मलासन का अर्थ होता है मल त्याग करते समय जिस आसन में हम बैठते है उसे ही मलासन कहते हैं।


मलासन के अन्य लाभ: मलासन को करने से पेट एवं कमर को काफी लाभ होता है। इसे नियमित करने से गैस और कब्ज की परेशानी से छुटकारा मिलता है।कमर, घुटने, मेरुदंड की मांसपेशिया लचीली बनती है। मलासन से घुटनों, जोड़ों, पीठ और पेट का दर्द कम होता है। पेट की चर्बी दूर होती है।




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रैपिड किट से प्रतिदिन औसतन 10 डेंगू मरीज की पुष्टि

नोएडा : रैपिड किट से प्रतिदिन नोएडा-ग्रेनो में औसतन 10 डेंगू मरीजों की पुष्टि हो रही है, लेकिन बिना क्रॉस जांच इन मरीजों में बीमारी की पुष्टि नहीं की जा रही है। बुधवार को जिला अस्पताल में 90 नमूनों की क्रॉस जांच होनी है। इसके बाद आधिकारिक तौर पर मरीजों की संख्या स्पष्ट होगी।


निजी और सरकारी अस्पतालों में एक सप्ताह से प्रतिदिन औसतन 10-12 मरीजों में डेंगू की पुष्टि की जा रही है। रैपिड किट से जांच में पुष्टि के बाद इन मरीजों का इलाज भी शुरू कर दिया गया है। इन मरीजों के नमूने स्वास्थ्य विभाग को भेजे गए हैं। ताकि क्रॉस जांच के बाद स्थिति स्पष्ट हो सके। जिला अस्पताल में तीन दिन से लगातार एक-दो डेंगू मरीज मिल रहे हैं। इन मरीजों की जांच रैपिड किट से की गई है। जिला मलेरिया विभाग ने अब तक 13 डेंगू मरीजों की पुष्टि की है। इन मरीजों की पुष्टि भी क्रॉस जांच के बाद की गई है। अब तक एलाइजा किट से 101 लोगों की जांच की जा चुकी है। इसमें जिला अस्पताल में 42 और शिशु अस्पताल में 59 मरीजों की जांच हुई है। जिला अस्पताल में रैपिड किट से 974 की जांच हुई है।


जिला मलेरिया अधिकारी राजेश शर्मा ने बताया कि नमूनों की क्रॉस जांच के बाद डेंगू मरीजों की सही संख्या स्पष्ट होती है। सभी निजी और सरकारी अस्पतालों से रैपिड किट से जांच के बाद मरीजों के नमूने भी मांगे गए हैं। ताकि क्रॉस जांच कर मरीज में डेंगू बीमारी की स्थिति जानी जा सके।




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कोविड के बाद हृदय संबंधी जटिलताओं के बारे में परामर्श मांगने वालों की संख्या में वृद्धि: अपोलो अस्पताल

नई दिल्ली : दिल्ली के एक प्रमुख निजी अस्पताल ने सोमवार को कहा कि उसके यहां कोविड-19 के बाद हृदय संबंधी जटिलताओं के बारे में परामर्श मांगने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है। अस्पताल के डॉक्टरों ने दावा किया है कि आने वाले महीनों में हृदय रोगों का बोझ बढ़ सकता है।


इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स ने एक बयान में कहा कि लॉकडाउन के चलते गतिहीन जीवन शैली ने कई लोगों में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, धूम्रपान और तनाव में वृद्धि की है, जिससे हृदय रोगों (सीवीडी) का खतरा बढ़ गया है।


देश 2020 की शुरुआत से कोविड-19 महामारी से जूझ रहा है। अप्रैल से जून तक दूसरी लहर के दौरान बहुत बुरे हालात पैदा हो गए थे। दिल्ली भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुई, जहां बिस्तर और ऑक्सीजन संकट ने लोगों की पीड़ा को और बढ़ा दिया।


अस्पताल ने एक बयान में दावा किया, '' कोविड के बाद होने वाली मायोकार्डिटिस जैसी हृदय संबंधी जटिलताओं के बारे में परामर्श मांगने वालों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, लिहाजा हृदय संबंधी जटिलताओं वाले रोगियों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि दिन-ब-दिन स्पष्ट होती जा रही है।''


बयान में कहा गया है, '' संक्रमण से उबरने के बाद भी वायरस के कारण शरीर में होने वाली सूजन और क्षति के चलते लोगों को इस तरह की जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है। शरीर का कोई भी हिस्सा कमजोर होने पर इस तरह के नुकसान सामने आते है।


दक्षिणी दिल्ली के इस प्रमुख निजी अस्पताल के डॉक्टरों ने यह भी दावा किया कि आने वाले महीनों में हृदय रोग का बोझ कई गुना बढ़ सकता है।


उन्होंने कहा कि महामारी के दौरान लॉकडाउन और गतिहीन जीवन शैली से सीवीडी के कई मामले सामने आ रहे हैं।


अस्पताल ने कहा कि एक अन्य महत्वपूर्ण कारक यह है कि महामारी ने लोगों में स्वास्थ्य जांच के लिए बाहर जाने में झिझक पैदा कर दी है। कोरोनो वायरस संक्रमण की चपेट में आने के डर से अनेक लोग नियमित स्वास्थ्य जांच भी नहीं करा पाए। ऐसे में जो लोग पहले से ही हृदय संबंधी समस्याओं से पीड़ित थे, वे अब डॉक्टरों के पास जा रहे हैं।


अपोलो अस्पताल के कार्डियोथोरेसिक और वैस्कुलर सर्जरी के वरिष्ठ सलाहकार डॉ मुकेश गोयल ने कहा, महामारी से पहले के समय की तुलना में, हमने निवारक स्वास्थ्य जांच के लिए ओपीडी में आने वाले रोगियों की संख्या में तेज गिरावट देखी है।


उन्होंने कहा, ''इनमें वे मरीज शामिल हैं जो महामारी से पहले हृदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित थे। वे अब नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच नहीं करा रहे।''


डॉक्टरों ने कहा कि निवारक स्वास्थ्य जांच में गिरावट और कोविड के बाद की हृदय संबंधी जटिलताओं से ऐसे मामलों में वृद्धि होने की आशंका है।






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पान के पत्ते को खाने से हो सकता है मुंह के कैंसर से निजात

हिंदू धर्म में किसी भी प्रकार की पूजा-अर्चना हो या फिर बरातियों का स्वागत करना हो तो सबमे पाम के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। पान एक ऐसी चीज है जो आज के युग से चलन में न होकर राजा-महाराजा के समय से चली आ रही है।


इतना ही नही बनारस और महोबा के पान तो विश्व प्रसिद्ध है। इतना ही नही फिलेमी गलियारों में पान के गानों के कारण हर गली-महोल्ला में इसके गाने सुनाई देते है। साथ ही यह एक औषधि भी है।


हम यह बात मान सकते है कि पान के पत्तों में सुपारी, तंबाकू, चूना आदि लगा कर खाने से स्वास्थ संबंधी बीमारी हो सकती है। लेकिन आगर आप केवल पान के पत्तें का इस्तेमाल करते है तो यह काफी लाभकारी हो सकता है। इसे खानें से गंभीर से गंभीर बीमारियों से निजात मिल सकता है। जानिेए पान खाने से होने वाले फायदों के बारें में।


पाचन को सुधारें:- पान के पत्ताा का वैसे माउथ फेशनर की तरह इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इसे चबाने से हमारें लिए कापी फायदेमंद हो सकता है। जब हम इसे चबा कर खाते है तब हमारी लार ग्रंथि पर असर पड़ता है। इससे इससे सलाइव लार बनने में मदद मिलती है। जो हमारी पाचन तंत्र के लिए बहुत ही जरुरी है। अगर आपने भारी भोजन भी कर दिया है उसके बाद आप पान खा लें। इससे आपको भोजन आसानी से पच जाएगा।


मुंह के कैंसर से बचाए:- पान सिर्प छोटी बीमारियों के लिए ही लाभकारी नही हा बल्कि गंभीर बीमारियों के लिए फायदेमंद है। पान के पत्ते को चबाने से मुंह के कैसंर से बचा जा सकता है। क्योंकि इसमें अधिक मात्रा में एस्कॉर्बिक एसिड होता है जो एक उत्कृाष्टप एंटीऑक्सिडेंट है। जो बॉड़ी में फ्री रैडिकल को कम करता है।


माउथ-फ्रेशर:- पान के पत्तोंक में कई ऐसे यौगिक होते हैं जो सांसों में बदबू को खत्म करता है। इसके अलावा पान में लौंग, सौंफ, इलायची जैसे विभिन्न मसाले मिलने से ये एक बेहतरीन माउथ-फ्रेशर भी बन जाता है।


सेक्सर पावर:- पान को सेक्सक का सिंबल भी माना जाता है। सेक्सर संबंध से पहले खाने से इस क्रिया का अधिक सुख लिया जा सकता है। इसलिए नए जोड़े को पान खिलाने की परंपरा भी काफी पुरानी है। इसलिए इसे दिया जाता है।


मसूड़ों में सूजन या गांठ आ जाने पर:- अगर आपके मसूड़े में गांठ या फिर सूजन हो जाए तो पान का इस्तेमाल काफी लाभदायक होता है। पान में पाए जाने तत्व इन उभारों को कम करने का काम करते हैं।


साधारण बीमारियों और चोट लगने पर:- अगर आपको सर्दी हो रखी है तो ऐसे में पान के पत्ते आपके लिए फायदेमंद रहेंगे। इसे शहद के साथ मिलाकर खाने से फायदा होता है। साथ ही पान में मौजूद एनालजेसिक गुण सिर दर्द में भी आराम देता है।


गैस्ट्रिक अल्सर से बचाव:- पान के पत्तेृ के रस को पीने से गैस्ट्रिक अल्सर को रोकने में काफी मदद करता है। क्योंकि इसे गैस्ट्रो प्रोटेक्टिव गतिविधि के लिए भी जाना जाता है।


पढ़े औषधीय गुणों के बारें में...


-मुंह के छालों के लिए पान बहुत फायेदेमंद होता है। छाले पड़ने पर पान के रस को देशी घी से लगाने पर प्रयोग करने से फायदा होता है।

-पान के पत्ते का ब्लठड शुगर कंट्रोल करने में काफी सहायक होते हैं। और इसे एंटी डायबिटिक गुण के रुप में भी जाना जाता है।

-सांस की नली में दिक्कत होने पर पान का तेल का इस्तेमाल करना फायदेमंद है। इसके लिए पान के तेल को गर्म करके सोते वक्त सीने पर लगाने से श्वास नली की बीमारियों से निजात मि जाता हैं।

-अगर आपके सिर में दर्द हो रहा हो तो इसके लिए पान के पत्ते लाभकारी हो सकते है। इसके लिए माथे पर पान के पत्तोंक का पेस्ट लगाएं।

-अगर आपको मसूड़ों से खून आ रहा हो तो इसके लिए पान के पत्तों को पानी में उबालकर उन्हेंय मैश कर लें। इन्हेंय मसूड़ों पर लगाने से खून बहना बंद हो जाता है।






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घातक साबित होती डेंगू के प्रकोप की अनदेखी

उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र इत्यादि कई राज्य इस समय वायरल बुखार और डेंगू के कहर से जूझ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में तो रहस्यमयी मानी जा रही बीमारी के अधिकांश मामलों में बहुत से मरीजों में डेंगू की पुष्टि भी हुई है। डेंगू और वायरल बुखार से विभिन्न राज्यों में सैंकड़ों मरीजों की मौत हो चुकी है। देश में प्रायः मानसून के समय जुलाई से अक्तूबर के दौरान डेंगू के सर्वाधिक मामले सामने आते हैं। दरअसल मानसून के साथ डेंगू और चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छरों के पनपने का मौसम भी शुरू होता है, इसीलिए इस बीमारी को लेकर लोगों में व्यापक जागरूकता की जरूरत महसूस की जाती रही है लेकिन इस मामले में सरकारी तंत्र का हर साल बेहद लचर रवैया सामने आता रहा है, जिस कारण देखते ही देखते डेंगू का प्रकोप कई राज्यों को अपनी चपेट में ले लेता है। डेंगू प्रतिवर्ष खासकर बारिश के मौसम में लोगों को निशाना बनाता है और पिछले साल भी इसके कारण सैंकड़ों लोगों की मौत हुई थी। देश के अनेक राज्यों में अब हर साल इसी प्रकार डेंगू का कहर देखा जाने लगा है, हजारों लोग डेंगू से पीडि़त होकर अस्पतालों में भर्ती होते हैं, जिनमें से कई दर्जन लोग मौत के मुंह में भी समा जाते हैं। दरअसल डेंगू आज के समय में ऐसी बीमारी बन गया है, जिसके कारण प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो जाती है। यह घातक बीमारियों में से एक है, जिसका यदि समय से इलाज न मिले तो यह जानलेवा हो सकता है।


डेंगू के कई राज्यों में बढ़ते मामलों को देखते हुए मौजूदा समय में डेंगू से बचाव को लेकर अत्यधिक सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि कोविड काल में डेंगू सहित अन्य बीमारियों के जोखिम को नजरअंदाज करना काफी खतरनाक हो सकता है। डेंगू का प्रकोप अब पहले के मुकाबले और भी भयावह इसलिए होता जा रहा है क्योंकि अब डेंगू के कई ऐसे मरीज भी देखे जाने लगे हैं, जिनमें डेंगू के अलावा मलेरिया या अन्य बीमारियों के भी लक्षण होते हैं और इन बीमारियों के एक साथ धावा बोलने से कुछ मामलों में स्थिति खतरनाक हो जाती है। डेंगू बुखार हमारे घरों के आसपास खड़े पानी में ही पनपने वाले ऐडीस मच्छर के काटने से होने वाला एक वायरल संक्रमण ही है। ऐडीस मच्छर काले रंग का स्पॉटेड मच्छर होता है, जो प्रायः दिन में ही काटता है। डेंगू का वायरस शरीर में प्रविष्ट होने के बाद सीधे शरीर के प्रतिरोधी तंत्र पर हमला करता है। इस मच्छर का सफाया करके ही इस बीमारी से पूरी तरह से बचा जा सकता है। वैसे बीमारी कोई भी हो, उसके उपचार से बेहतर उससे बचाव ही होता है और डेंगू के मामले में तो बचाव ही सबसे बड़ा हथियार माना गया है।


डेंगू प्रायः दो से पांच दिनों के भीतर गंभीर रूप धारण कर लेता है। ऐसी स्थिति में प्रभावित व्यक्ति को बुखार आना बंद हो सकता है और रोगी समझने लगता है कि वह ठीक हो गया है लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है बल्कि यह स्थिति और भी खतरनाक होती है। अतः बेहद जरूरी है कि आपको पता हो कि डेंगू बुखार होने पर शरीर में क्या-क्या प्रमुख लक्षण उभरते हैं। डेंगू के अधिकांश लक्षण मलेरिया से मिलते-जुलते होते हैं लेकिन कुछ लक्षण अलग भी होते हैं। तेज बुखार, गले में खराश, ठंड लगना, बहुत तेज सिरदर्द, थकावट, कमर व आंखों की पुतलियों में दर्द, मसूडों, नाक, गुदा व मूत्र नलिका से खून आना, मितली व उल्टी आना, मांसपेशियों व जोड़ों में असहनीय दर्द, हीमोग्लोबिन के स्तर में वृद्धि, शरीर पर लाल चकते (खासकर छाती पर लाल-लाल दाने उभर आना), रक्त प्लेटलेट (बिम्बाणुओं) की संख्या में भारी गिरावट इत्यादि डेंगू के प्रमुख लक्षण हैं।


डेंगू से बचाव के लिए लोगों का इसके बारे में जागरूक होना बेहद जरूरी है क्योंकि उचित सावधानियां और सतर्कता बरतकर ही इस जानलेवा बीमारी से बचा जा सकता है। घर की साफ-सफाई का ध्यान रखा जाना बहुत जरूरी है। घर या आसपास के क्षेत्र में डेंगू का प्रकोप न हो, इसके लिए जरूरी है कि मच्छरों के उन्मूलन का विशेष प्रयास हो। डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का पनपना रोकें। कुछ अन्य जरूरी बातों पर ध्यान देना भी आवश्यक है। जैसे, अपने घर में या आसपास पानी जमा न होने दें। जमा पानी के ऐसे स्रोत ही डेंगू मच्छरों की उत्पत्ति के प्रमुख कारक होते हैं। यदि कहीं पानी इकट्ठा हो तो उसमें केरोसीन ऑयल या पैट्रोल डाल दें ताकि वहां मच्छरों का सफाया हो जाए। पानी के बर्तनों, टंकियों इत्यादि को अच्छी प्रकार से ढ़ककर रखें। कूलर में पानी बदलते रहें। यदि कूलर में कुछ दिनों के लिए पानी का इस्तेमाल न कर रहे हों तो इसका पानी निकालकर कपड़े से अच्छी तरह पोंछकर कूलर को सुखा दें। खाली बर्तन, खाली डिब्बे, टायर, गमले, मटके, बोतल इत्यादि में पानी एकत्रित न होने दें। बेहतर यही होगा कि ऐसे कबाड़ और इस्तेमाल न होने वाले टायर इत्यादि को नष्ट कर दें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि कहीं भी पानी जमा होकर सड़ न रहा हो। घर के दरवाजों, खिड़कियों तथा रोशनदानों पर जाली लगवाएं ताकि घर में मच्छरों का प्रवेश बाधित किया जा सके। पूरी बाजू के कपड़े पहनें। हाथ-पैरों को अच्छी तरह ढ़ककर रखें। मच्छरों से बचने के लिए मॉस्कीटो रिपेलेंट्स का प्रयोग कर सकते हैं लेकिन सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करना मच्छरों से बचाव का सस्ता, सरल, प्रभावी और हानिरहित उपाय है। डेंगू के लक्षण उभरने पर तुरंत योग्य चिकित्सक की सलाह लें।


किसी व्यक्ति को डेंगू हो जाने पर उसे पौष्टिक और संतुलित आहार देते रहना बेहद जरूरी है। तुलसी का उपयोग भी काफी लाभकरी है। आठ-दस तुलसी के पत्तों का रस शहद के साथ मिलाकर लें या तुलसी के 10-15 पत्तों को एक गिलास पानी में उबाल लें और जब पानी आधा रह जाए, तब पी लें। नारियल पानी पीएं, जिसमें काफी मात्रा में इलैक्ट्रोलाइट्स होते हैं, साथ ही यह मिनरल्स का भी अच्छा स्रोत है, जो शरीर में ब्लड सेल्स की कमी को पूरा करने में मदद करते हैं। विटामिन सी शरीर के इम्यून सिस्टम को सही रखने में मददगार होता है। इसलिए आंवला, संतरा, मौसमी जैसे विटामिन सी से भरपूर फलों का सेवन करें। बुखार होने पर पैरासिटामोल का इस्तेमाल करें और ध्यान रखें कि बुखार किसी भी हालत में ज्यादा न बढ़ने पाए लेकिन ऐसे मरीजों को एस्प्रिन, ब्रूफिन इत्यादि दर्दनाशक दवाएं बिल्कुल न दें क्योंकि इनका विपरीत प्रभाव हो सकता है। हां, उल्टियां होने पर रोगी को नसों द्वारा ग्लूकोज चढ़ाना अनिवार्य है। स्थिति थोड़ी भी बिगड़ती देख तुरंत अपने चिकित्सक से सम्पर्क करें। फिलहाल डेंगू से बचाव के उपाय ही सबसे अहम हैं क्योंकि अभी तक इसकी कोई वैक्सीन नहीं बनी है।


-योगेश कुमार गोयल-





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चिल्ली गांव में मौत का सिलसिला जारी, अब तक 11 मौत हुई

पलवल :  जिले के उपमंडल हथीन के गांव चिल्ली में बच्चों की मौत के बाद अब यह बीमारी बुजुर्गों को भी अपनी चपेट में ले रही है। शनिवार को बुखार के चलते एक 65 वर्षीय बुजुर्ग की मौत हो गई। स्वास्थ्य विभाग के पास रोजाना दर्जनों बच्चे बुखार से पीड़ित आ रहे हैं।


हथीन विधानसभा के चिल्ली गांव में बुखार से हो रही मौतों का सिलसिला लगातार जारी है। पिछले कुछ दिनों में अब तक 11 मौत बुखार से मौत हो चुकी हैं। स्वास्थय विभाग टीम गांव में लगातार काम कर रहीं है। उधर पेयजल की लाइनों को उखाड़े जाने से गांव के लोगों को पैसों से पानी मंगा कर पीना पड़ रहा है। रहस्यमयी बुखार गांव चिल्ली के निवासियों और स्वास्थ्य विभाग के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। शनिवार को बुखार के चलते 65 वर्षीय बुजुर्ग की मौत हो गई, जिसके बाद बच्चों के बाद बड़ों में भी इस बुखार के लक्षण देखे जा रहे हैं। लेकिन स्वास्थ्य विभाग अभी तक यह पता नहीं कर पाया है कि यह वायरस कौन सा है इसके अलावा गांव में बनाए गए। अस्थाई क्लीनिक पर रोजाना दर्जनों के करीब बच्चे बुखार से पीड़ित आ रहे हैं। गांव में 2 बच्चों में डेंगू की भी पुष्टि हो चुकी है ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के सामने यह बुखार एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा हुआ है स्वास्थ्य विभाग लगातार सैंपलिंग कर रहा है और ग्रामीणों और बच्चों को दवाइयां दी जा रही हैं।


ग्रामीण सलीम का कहना है कि जहां एक तरफ ग्रामीण बुखार की चपेट में है तो वहीं दूसरी तरफ और परेशानियां भी मुंह खोलें ग्रामीणों के सामने खड़ी हुई है। गंदे पानी की सप्लाई को रोकने के लिए गांव में पेयजल सप्लाई के लिए बनाई गई लाइन को उखाड़ दिया गया है और अब इस लाइन के उखाड़ दिए जाने से नई मुसीबत ग्रामीणों के सामने खड़ी हो गई है। ग्रामीणों को अब 800 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक का पानी का टैंकर मंगाकर अपने घर खर्चे और पीने के लिए पानी खरीदना पड़ रहा है। आनन-फानन में प्रशासन ने पानी की सप्लाई वाली पाइपों को तो काट कर उखाड़ दिया। लेकिन पानी की सप्लाई करना भूल गया और अब ग्रामीण अपनी जेब से पैसा देकर घर खर्च और पीने के लिए पानी मंगा रहे हैं।



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आजादी के अमृत महोत्सव पर फिट इंडिया फ्रीडम दौड़ में लोगों ने दिया फिट रहने का संदेश

गाजियाबाद : 75वीं आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर शनिवार को रिज़र्व पुलिस लाइन में फिट इंडिया फ्रीडम दौड़ का आयोजन किया गया। जिलाधिकारी राकेश कुमार सिंह व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक पवन कुमार ने दौड़ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।


वहीं एनडीआरएफ स्वर्ण जयन्तीपुरम में प्रदेश के स्वास्थ राज्यमंत्री अतुल गर्ग ने दौड़ में शामिल लोगों का स्वागत किया। इन्होंने लोगों को फिट रहने के टिप्स भी इस दौरान दिए। उन्होंने कहा कि फिट रहेंगे तो जीवन सकारात्मक रहेगा। फिट दौड़ के आयोजन का मक़सद भी यही है।


पुलिस लाइन में आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने पुलिस कर्मियों एवं जनता के लोगों को फिट इंडिया फ्रीडम रन 2.0 में हिस्सा लेने, अपने परिवार एवं मित्रों को भी शामिल होने के लिये प्रोत्साहित करने के अलावा प्रतिदिन 30 मिनट शारीरिक गतिविधियां करने की शपथ दिलाई। इसके अलावा आजादी का अमृत महोत्सव के तहत फिट इंडिया फ्रीडम दौड़ का आयोजन नेहरू युवा केंद्र गाजियाबाद की ओर से जनपद में किया गया। कार्यक्रम में आसपास के क्षेत्रों के विभिन्न हिस्सों व गांवों के सैकड़ों युवाओं ने भाग लिया और भारत माता की जय के नारे लगाए। 



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जिम का मिलेगा डबल फायदा, अगर एक्सरसाइज के बाद खाएंगे यह चीजें

आज के समय में लोग बॉडी बनाने और खुद को फिट रखने के लिए जिम का सहारा लेते हैं। लेकिन ऐसे भी बहुत से लोग होते हैं, जो वर्कआउट तो करते हैं, लेकिन उन्हें कुछ खास फायदा नजर नहीं आता। हो सकता है कि आपके वर्कआउट में कोई कमी न हो, लेकिन आप अपने आहार पर ध्यान न दे रहे हों। जो लोग वर्कआउट करते हैं या जिम जाते हैं, उन्हें अपनी डाइट पर अधिक फोकस करना चाहिए। जरा सी लापरवाही से आपको विपरीत परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। तो चलिए जानते हैं जिम के बाद क्या खाएं−


प्रोटीन रिच फूड

अगर आप एक्सरसाइज के बाद अपने मसल्स की रिकवरी करना चाहते हैं तो सबसे पहले तो आपको एक्सरसाइज के आधे घंटे के भीतर कुछ न कुछ खाना चाहिए। दरअसल, वर्कआउट के दौरान हमारा शरीर न्यूटिएंट्स का इस्तेमाल करता है और इसलिए पोस्ट वर्कआउट मील शरीर को हील करने में मदद करता है। बेहतर होगा कि आप वर्कआउट के बाद आधे घंटे के भीतर एक प्रोटीन रिच फूड जरूर लेना चाहिए। अगर आप खुद को टोनअप करना चाहते हैं तो कार्ब्स से बचें। आप प्रोटीन रिच डाइट में पीनट बटर सैंडविच, सोया मिल्क, पनीर या बेसन चीला खा सकते हैं।


खाएं सैंडविच

अगर आप कुछ लाइट और पौष्टिक खाना चाहते हैं तो वर्कआउट के बाद सैंडविच खाया जा सकता है। आप ब्राउन ब्रेड में कई तरह की वेजिटेबल्स का इस्तेमाल करके खाएं। 


ब्राउन राइस

आप वर्कआउट के बाद ब्राउन राइस भी खा सकते हैं। यह एंटी−ऑक्सीडेंट से समृद्ध होते हैं और इनमें फाइबर भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है। जो आपके मेटाबॉलिज्म को बढ़ाते हैं और वजन घटाने में भी मदद करते हैं।


पानी भी है जरूरी

चूंकि एक्सरसाइज के दौरान आप काफी पसीना बहाते हैं, जिसके कारण शरीर से इलेक्टालाइट की कमी हो जाती है। ऐसे में यह बेहद जरूरी हो जाता है कि आप खुद को हाइडेट रखें। वैसे तो शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के लिए पानी पिया जा सकता है। लेकिन अगर आप चाहें तो पानी के स्थान पर नारियल पानी पीएं। यह पोटेशियम का एक अच्छा स्त्रोत है, जो शरीर में फलूयड को बैलेंस करने में मदद करता है। साथ ही नारियल पानी के सेवन से आपको वर्कआउट के बाद होने वाले क्रैम्प की संभावना भी काफी कम हो जाती है। इसके अलावा आप पोस्ट वर्कआउट डाइट के रूप में लो फैट मिल्क और फ्रूट्स की मदद से कुछ स्मूदी बनाकर उसका सेवन भी कर सकते हैं।



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दिल्ली में तेजी से बढ़े वायरल बुखार के मामले ,अधिकतर बच्चे पीड़ित

नई दिल्ली :  दिल्ली में बच्चों में वायरल बुखार के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अस्पतालों की ओपीडी में भी मरीजों की संख्या बढ़ी है। इनमें अधिकतर बच्चे वायरल बुखार से पीड़ित हैं। कुछ बच्चों में तेज बुखार, उल्टी दस्त की समस्या भी है। जबकि प्रतिदिन दो-तीन बच्चों में डेंगू की शिकायत मिल रही है। द्वारका स्थित आकाश हेल्थकेयर अस्पताल के पीडियाट्रिक्स विभाग की वरिष्ठ डाक्टर मीना जे के मुताबिक ओपीडी में ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ी है, जिन्हें तेज बुखार आ रहा है। बच्चों में यह बुखार चार से छह दिन तक चल रहा है। साथ ही उनमें खांसी-जुकाम की भी शिकायत मिल रही है। कुछ बच्चों में सांस लेने में परेशानी भी देखी जा रही है।

ऐसे में बच्चों के स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। उन्हें बिना मास्क लगाए बाहर नहीं निकलने देना चाहिए। साथ ही घर में अगर किसी सदस्य को बुखार या सर्दी-जुकाम है तो बच्चों को उससे दूर रखना चाहिए। डा. मीना ने बताया कि वायरल से पीड़ित कई बच्चों की हालत गंभीर होने पर उन्हें एनआइसीयू में भर्ती किया जा रहा है। पिछले दो सप्ताह से बच्चों में डेंगू के भी तीन-चार मामले प्रतिदिन आ रहे हैं।


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पीरियड्स टाइम में क्या खाएं और क्या नहीं, महिलाओं का जानना जरूरी

महिलाओं को महीने के 6-7 दिन पीरियड्स की समस्या से गुजरना पड़ता हैं। पीरियड्स के दौरान अधिकतर महिलाओं को दर्द, चिड़-चिड़ापन और कमजोरी महसूस होती हैं। वहीं अक्सर पीरियड्स आने से पहले महिलाओं की पीठ, पेड़ू या कमर में दर्द होता है, जोकि नैचुरल है। मगर खान-पान में थोड़ी-सी सावधानी बरतकर आप पीरियड्स के दौरान होने वाली परेशानियों से छुटकारा पा सकती हैं। चलिए आज हम आपको बताते हैं कि पीरियड्स के दौरान आपको किन-किन बातों का ख्याल रखना चाहिए।

 

पानी

पीरियड्स के दौरान ठंडे की बजाए गर्म पानी पीएं। दिनभर में कम से कम 1-2 कप चाय या दूध भी पीएं। इस दौरान आप ज्यादा से ज्यादा गर्म चीजों का सेवन करें।


आटे का हलवा

आटे के हलवे में गुड़ डालकर खाएं। इससे पेट अच्छी तरह से साफ हो जाएगा और आपका दर्द भी कम होगा।


गर्म पानी से स्नान

साथ ही नहाने के लिए गर्म पानी का इस्तेमाल करें। वहीं अगर आपको ज्यादा दर्द होता है तो शॉवर लेते समय 1 मग गर्म पानी पेड़ू पर जरूर डालें।


ना करें दवाओं का सेवन

अक्सर महिलाएं दर्द से छुटकारा पाने के लिए दवा का सेवन करती हैं जोकि गलत है। इसकी बजाए आप नैचुरल तरीके इस्तेमाल कर सकती हैं।


तला-भुना से परहेज

पीरियड्स में तला-भुना खाने से इंस्ट्रोजन हॉर्मोन का लेवल बिगड़ जाता है। इससे पेट और कमर दर्द होने की समस्या हो सकती है। साथ ही ठंडी तहसील वाली चीजें, ज्यादा मीठा, रैड मीट, आचार या खट्टी चीजें खाने से भी परहेज करें।


एेलोवेरा जूस

अगर पीरियड्स में ज्यादा दर्द रहता है तो एेलोवेरा जूस में 1 चम्मच शहद अौर पानी मिलाकर पीएं। इससे दर्द, कमोजरी और अधिक ब्लीडिंग से राहत मिलेगी।


तुलसी का काढ़ा

तुलसी भी पीरियड्स में काफी लाभकारी है। पानी में 7-8 तुलसी के पच्चे उबालकर, उसमें 1 चम्मच शहद मिलाए और रोजाना पीए। इससे पीरियड्स की सभी प्रॉबल्म दूर होगी।


गर्म पानी से सेंक

पेट दर्द होने पर गर्म पानी की बोतल या थैली पेट के निचले हिस्से या दर्द वाली जगह पर रखें। इससे गंदगी व रूका रक्त बाहर निकल जाता है और दर्द से तुरंत राहत मिलती है।




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गुड़ को दें चीनी की जगह, मिलेंगे लाजवाब फायदे

चाय के प्रेमी अक्सर तेज मीठे वाली चाय पीना ही पसंद करते हैं। बहुत कम ऐसे लोग होंगे जो कम मीठे वाली चाय पीते हैं। अगर आप भी मीठी चाय पीने के शौकीन हैं तो चीनी की जगह आज ही चाय में गुड़ डालना शुरु कर दें। इससे न केवल चाय का स्वाद बढ़ेगा बल्कि चीनी के सेवन से शरीर को पहुंचने वाले नुकसान से भी आप बच जाएंगे। तो चलिए जानते हैं भला गुड़ किस तरह गुड़, चीनी खाने से बेहतर है...


गुड़ में पाए जाने वाले जरुरी तत्व

चीनी कैमिकल प्रोसेस के जरिए तैयार की जाती है। जिस वजह से इसका ज्यादा सेवन सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में जरुरी है चीनी की जगह गुड़ का इस्तेमाल करें। गुड़ खाने से शरीर को कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन और कॉपर मिलता है। जिससे शरीर को बहुत से फायदे मिलते हैं। 


सर्दियों में फायदेमंद गुड़

सर्दियों में आपका शरीर को गर्म चीजों की जरुरत होती है। ऐसे में गुड़ खाने से आपका शरीर गर्म रहता है।


मजबूत हड्डियां

गुड़ में मौजूद कैल्शियम आपकी हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है। छोटे बच्चों को बचपन से ही गुड़ खाने की आदत डालें, इससे उनकी हड्डियों का विकास तेजी से होगा।


प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए फायदेमंद

गुड़ में आयरन, कैल्शियम और फास्फोरस जैसे गुण होते हैं जो शरीर में खून की कमी दूर करने में मददगार रहते हैं। गुड़ खाने से शरीर में रेड ब्‍लड सेल्‍स बनते हैं जो शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं। निरंतर गुड़ के सेवन से गर्भावस्‍था के दौरान बीमारियों और एलर्जी से लड़ने में मदद मिलती है।


नार्मल ब्लड प्रेशर

चीनी के सेवन से जहां आपका ब्लड प्रेशर लेवल बिगड़ता है वहीं गुड़ खाने से शरीर का ब्लड प्रेशर नार्मल होता है।


प्रदूषण से बचाव

अगर आप दिन ऑफिस बैठने की जगह दिन भर सड़कों पर गुजरता है तो आपने अंदर गए प्रदूषण की सफाई करने के लिए रोज 1 टुकड़ा गुड़ खाएं। गुड़ के एंटी-ऑक्सीडेंट तत्व शरीर में मौजूद सभी तरह के किटाणु और प्रदूषित तत्वों को खत्म करने का काम करते हैं।


पेट के लिए फायदेमंद

गुड़ आपके शरीर के लिए एंटी-ऑक्सीडेंट का काम करता है। इसके रोजाना सेवन से जहरीले पदार्थ आपके शरीर से युरीन के जरिए बाहर निकल जाते हैं। जिससे आप लाइट एंड हेल्दी फील करते हैं। गुड़ खाने से आपको कभी कब्ज की प्रॉबल्म नहीं होती। जिससे आप एक नहीं कई बिमारियों से बचे रहते हैं।


इन सबके साथ-साथ गुड़ खाने से आपका ब्रेन स्ट्रांग होता है, आपकी आंखों की रोशनी लंबे समय तक बरकरार रहती है साथ ही सर्दियों के दौरान होने वाले सर्दी जुकाम से भी आप बचे रहते हैं। 






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नशे का कारोबार करने वाले, नौजवान युवाओं की जिंदगी में घोल रहे हैं जहर

बिजनौर : नगीना में भांग पत्तियों की स्थान पर सुल्फा बेचा जा रहा है सुल्फा माफिया नैनू उफ़र् विवेक अगर्वाल निवासी नजीबाबाद वर्षों से इस कारोबार में सन लिप्त हैं। यह एक लाइसेंस लेते हैं और पूरे जनपद भर में सुल्फा गांजा आदि नशीले पदार्थ खुलेआम बेचते हैं। पुलिस भी इन पर कार्यवाही नहीं करती इनका कहना है कि मैं प्रतिदिन आबकारी विभाग और पुलिस विभाग को मोटी रकम देता हूं। नशे का कारोबार करने वाले सुल्फा माफिया नैनू नाम से प्रसिद्ध है, यह इतने शातिर किस्म के हैं की आबकारी विभाग से भांग पत्ती घोटकर पिलाने का लाइसेंस छोटा-मोटा ले लेते हैं और उसकी आड़ में नशे का कारोबार कर रहे हैं। यह नौजवान बच्चों की जिंदगी को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। कोई भी व्यक्ति नगीना रेलवे लाइन के पास से चुपके से जाकर इनकी दुकान से नशे की गोलियां सुल्फा गांजा अफीम आदि ले सकता है, लेकिन यह इतने शातिर हैं कि ज्यादातर उन्हीं लोगों को नशे का सामान देते हैं जो इनके यहां लगातार आते जाते रहते हैं। नजीबाबाद हो नगीना हो धामपुर या किरतपुर छोटे कस्बों में भी इनके आदमी इस नशे के कारोबार में लगे हुए हैं, जिससे सरकार को लाखों रुपए का प्रतिमा चूना लगाया जाता है नगीना इंस्पेक्टर आबकारी नजीबाद इंस्पेक्टर आबकारी विभाग में बैठे बाबू सुभाष कुमार जी का इन्हें भरपूर संरक्षण प्राप्त है। इससे पहले भी यह अखबार की सुर्खियों में खूब रहे और आए दिन रहते हैं। पुलिस विभाग हो या आबकारी ऐसे नशे के कारोबारी को बरसों से आज तक नहीं पकड़ पाई है, जो खुलेआम सरकार को चूना लगाने में और नोजवानों जिंदगी को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।




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सिरदर्द को हल्के में न लें, इन गंभीर बीमारियों का हो सकता है संकेत

इंग्लैंड के गेट्सहेड में 21 साल की जेसिका केन को अचानक सिरदर्द हुआ है, वह पेनकिलर खाकर सोई और उसकी मौत हो गई। दरअसल, जेसिका को मेनिंगोकॉकल मेनिनजाइटिस और सेप्टिकैमिया नाम की बीमारी हो गई थी जिसने उसकी जान ले ली। दरअसल, ये एक ऐसा इंफेक्शन है जिसमें बैक्टीरिया खून में प्रवेश करता है और बड़ी तेजी से फैलने लगता है। यह बैक्टीरिया खून में टॉक्सिन्स रिलीज करने लगता है जो जानलेवा साबित हो सकता है।


स्वास्थ्य समस्याओं को हल्के में न लें

हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने सिरदर्द, बहती नाक, छींक आना, हल्का बुखार जैसी दिक्कतों को हल्के में लेते हैं और उसके इलाज के बारे में भी नहीं सोचते। लेकिन ये लक्षण किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या की ओर भी इशारा करते हैं जिस पर अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो यह आपके लिए बेहद हानिकारक और जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसे में हम आपको बता रहे हैं आखिर क्यों आपको सिरदर्द को भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। सिरदर्द भी कुछ गंभीर बीमारियों के संकेत हो सकता है। 


ब्लड क्लॉट

कई बार ब्रेन में अगर किसी तरह का ब्लड क्लॉट बन जाए तो उस वजह से भी हेडएक यानी सिरदर्द होने लगता है। अगर आपको कभी-कभार बहुत गंभीर सिरदर्द होने लगता है और दर्द बर्दाश्त के बाहर हो जाए तो आपको अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। अगर समय रहते इलाज न हो तो ये ब्लड क्लॉट स्ट्रोक में परिवर्तित हो सकते हैं जो जानलेवा भी साबित हो सकता है।


ऑप्टिक न्यूराइटिस

अगर आंखों के पीछे वाले सिर के हिस्से में दर्द हो रहा तो यह ऑप्टिक न्यूराइटिस का लक्षण हो सकता है। इसमें ब्रेन से आंखों तक जानकारी पहुंचाने वाली नसों को नुकसान पहुंचता है जिस वजह से देखने में दिक्कत होती है और कई बार विजिन लॉस भी हो सकता है।


माइग्रेन या ट्यूमर

लंबे समय तक सिरदर्द की समस्या है तो विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। यह माइग्रेन, ट्यूमर या नर्वस सिस्टम से जुड़ी दूसरी बीमारी भी हो सकती है। कभी-कभी ज्यादा दिनों तक सिरदर्द से संवेदी अंगों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है, जिससे इनकी कार्यक्षमता भी प्रभावित हो जाती है। सिरदर्द को लेकर भ्रम की स्थिति में कतई न रहें। 




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गर्भवती महिलाओं को भी मोबाइल का यूज कम करना चाहिए, ये है वजह

इसमें कोई शक नहीं कि मोबाइल फोन जो अब स्मार्टफोन बन चुका है हमारी जिंदगी का ऐसा अहम हिस्सा बन चुका है जिसे हम अपनी जिंदगी से अब अलग नहीं कर सकते। मोबाइल के बिना अपनी लाइफ की कल्पना करना भी शायद मुश्किल ही लगे। टॉडलर्स यानी छोटे बच्चों से लेकर टीनएजर्स और बुजुर्गों तक... हर किसी के हाथ में स्मार्टफोन रहता है और बड़ी संख्या में लोगों की इसकी लत भी लग चुकी है। इस लिस्ट में गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। लेकिन मोबाइल के एक्सेस यूज का न सिर्फ आप पर बल्कि गर्भ के अंदर पल रहे बच्चे पर भी बुरा असर पड़ता है। कैसे, यहां जानें...


बच्चे में बिहेवियर से जुड़ी दिक्कतें

मोबाइल फोन की स्क्रीन और उससे निकल रही ब्राइट ब्लू लाइट को लंबे समय तक देखते रहने से न सिर्फ आपकी आंखों को नुकसान होता है। बल्कि हाल ही में हुई एक स्टडी की मानें तो अगर प्रेग्नेंट महिला लंबे समय तक मोबाइल फोन यूज करे तो होने वाले बच्चे में बिहेवियर से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने डेनमार्क में इसको लेकर एक स्टडी की जिसमें प्रसव पूर्व और प्रसव के बाद मोबाइल फोन यूज करने का बच्चे के व्यवहार और इससे जुड़ी समस्याओं के बीच क्या लिंक ये जानने की कोशिश की गई।


हाइपरऐक्टिविटी और बिहेवियरल इशू का शिकार

इस स्टडी में ऐसी महिलाओं को शामिल किया गया जिनके बच्चे 7 साल के थे। स्टडी के दौरान महिलाओं को एक क्वेश्चेनेयर दिया गया था जिसमें उनके बच्चे की हेल्थ और बिहेवियर के साथ-साथ वे खुद फोन का कितना इस्तेमाल करती हैं, इससे जुड़े सवालों के जवाब देने थे। स्टडी के आखिर में यह बात सामने आयी कि जिन महिलाओं के बच्चे प्रसव से पूर्व और प्रसव के बाद स्मार्टफोन के प्रति एक्सपोज थे यानी जिन मांओं ने प्रेग्नेंसी के दौरान और डिलिवरी के बाद भी मोबाइल यूज ज्यादा किया उनके बच्चे हाइपरऐक्टिविटी और बिहेवियरल इशूज का शिकार थे।


प्रेग्नेंट महिलाएं इन बातों का रखें ध्यान

- मोबाइल फोन पर बहुत ज्यादा बात करने की बजाए टेक्स्ट भेजें या लैंडलाइन का उपयोग करें

- प्रेग्नेंसी के दौरान बहुत ज्यादा सोशल मीडिया को स्क्रॉल न करें

- जहां तक संभव हो हैंड्स फ्री किट यूज करें ताकरि सिर और शरीर के नजदीक रेडिएशन को कम किया जा सके। 





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हायपर कोलेस्ट्राल से प्रभावित हृदय

विज्ञान के नित-नये अविष्कारों ने इंसान को चकाचैंध कर दिया है। चिकित्सा जगत में तो अजूबे अविष्कार हुए हैं। अलग-अलग यंत्र, मशीनें, अनेक औषधियां और न जाने कितनी सुविधाएं पर फिर भी रोगों का ताड़व कम नहीं हुआ है बल्कि अनेक व्याधियों ने इंसान को अपने पंजे में जकड़ रखा है। हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, डायबिटिज आज के संघर्षशील युग की देन हैं। इसके अलावा आज हमें हायपरकोलेस्ट्राल के भी अधिकांश रोगी मिलते हैं। इसका कारण है हमारे आहार-विहार में विषमता, क्योंकि हमें ऐशोआराम की जिन्दगी पसन्द है। हम श्रम से कतराते हैं, ऐसी जिन्दगी का ही परिणाम है-हायपरकोलेस्ट्राल।


हृदय रोग को बढ़ानेवाला यह कोलेस्ट्राल है जिसे नियंत्रण में रखना शरीर के लिए अत्यावश्यक है। इसकी अधिक मात्रा हृदय व मस्तिष्क धमनियों को जितना नुकसान पहुंचाती है, वैसे ही इसकी प्राकृत मात्रा शरीर को स्वस्थ रखने में सक्षम रहती है। कोलेस्ट्राल का अंतर्भाव लिपिड में होता है। ये लिपिड 5 प्रकार के होते हैं और मनुष्य शरीर के महत्वपूर्ण घटक हैं। सभी प्राणियों के कोषों में कोलेस्ट्राल होता है व अधिकांशतः यह नाड़ी संस्थान में रहता है। इसका स्राव पित्तरस में होता है व यकृतीय संवहन में यह सहभागी होता है। चिकित्सीय दृष्टि से इसका अत्यन्त महत्व है। शरीर में निर्मित सभी प्रकार के स्टेराइड हार्मोन का भी आवश्यक अंग है। 


लिपिड के एकत्रीकरण, संवहन, ट्रांसपोर्ट व उत्सर्जन में विकृति होने पर अनेक व्याधियां उत्पन्न होती हैं जैसे मोटापा, यकृतप्लीहा का बढ़ना, एथेरोस्क्लेकोसिस, अग्न्याशय में सूजन, पित्तामशरी इत्यादि। इन सब में एथोरोस्क्लेरोसिस सबसे महत्वपूर्ण है जो कि लिपिड के एकत्रीकरण से होता है। धमनियों में कोलेस्ट्राल जमा होने से कड़कपन आ जाता है फलस्वरूप धमनियों का मार्ग संकरा हो जाता है जिससे धमनियों का मार्ग संकरा हो जाता है जिससे धमनियों में स्थित रक्त हृदय, मस्तिष्क व शरीर के अन्य भागों में कम पहुंचता है। यह रूकावट हृदय की धमनियों में होने से छाती में दर्द (एन्जाइना) या कभी-कभी हार्ट अटैक भी होता है। यह रूकावट नाड़ीवह संस्थान यानी मस्तिष्क में होने पर स्मरणशक्ति का नाश, मस्तिष्क के उच्चतम कार्यों में विकृति, लकवा व वृद्धावस्था में व्यवहार, स्वभावादि में अंतर आता है। 


इसके अलावा अन्य अंगों की धमनियों में यह कोलेस्ट्राल जमा होकर गैंगरीन उत्पन्न करता है। इस कोलेस्ट्राल से लेरिक सिंड्रोम नामक व्याधि भी होती है जिसमें मुख्यतः पेट व पैरों की धमनी में रूकावट होता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह के रोगी में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ने से रक्तवाहिनी में जमा होने की आशंका ज्यादा रहती है, अतः उच्च रक्तचाप व मधुमेह रोगी को कोलेस्ट्राल निवारक आहार लेना आवश्यक है जिसमें सलाद, हरी सब्जी, अंकुरित आहार, फल, छाछ की प्रचुर मात्रा हो।


कोलेस्ट्राल की मात्रा सामान्य करने में सबसे महत्वपूर्ण है-आहार, विहार पर नियंत्रण होना। आहार में चर्बीयुक्त पदार्थ जैसे तेल, घी, मांसाहार, शराब, आलू, चावल इत्यादि का सेवन कम करें। विहार में मानसिक तनाव से बचें। हायपर कोलेस्ट्राल के रूग्णों को अक्सर मोटापा अधिक रहता है अतएव उन्हें वजन पर नियंत्रण रखना अनिवार्य है। कोलेस्ट्राल कम करने के लिए आयुर्वेद संहिताओं में मेदोहर औषधियां वर्णित है। इनमें मुख्यतया त्रिकटु, कुटकी, लहसुन, पुनर्नवा, विडंग इत्यादि चिकित्सक के परामर्शानुसार लेना चाहिए। इसके अलावा आरोग्यवर्घिनी व त्रिफला गुग्गुल 2 चम्मच सुबस-शाम लेना चाहिए। साथ में मोटापा होने पर चिकित्सक के परामर्शानुसार ही औषधि लेनी चाहिए।


हायपरकोलेस्ट्राल के कारण अधिकतर हृदयगत धमनियां (कोरोनरी आर्टरीस) प्रभावित होती हैं जिससे हृदयगत विकार जैसे छाती में दर्द (एन्जाइना) जैसी (व्याधियां) होती हैं। आधुनिक चिकित्सानुसार इसमें एंजियोप्लास्टी करके धमनियों में से कोलेस्ट्राल को साफ करते हैं परन्तु फिर भी इन रूग्णों को सावधानियां रखनी पड़ती हैं जिससे फिर न एंजियोप्लास्टी करवानी पड़े। आयुर्वेद शास्त्र में कोलेस्ट्राल को कम करने व धमनियों का संकरापन दूर करने के लिए अनेक औषधियां हैं जिससे एंजियोप्लास्टी करने की संभावना कम होती है। अतएव योग्य चिकित्सक के मार्गदर्शन में मेदोहर व हृदय औषधि लेकर एंजियोप्लास्टी से बचा जा सकता है। 




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उप्र में वायरल बुखार का प्रसार रोकने, स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए उचित कदम उठाए सरकार : प्रियंका

नई दिल्ली : कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाद्रा ने उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले और कुछ अन्य जिलों में वायरल एवं डेंगू बुखार से कई लोगों की मौत होने पर चिंता व्यक्त करते हुए शुक्रवार को कहा कि लोगों को हरसंभव स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराई जाए और बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए उचित कदम उठाये जाएं। उन्होंने यह सवाल भी किया कि क्या उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान पैदा हुई स्थिति से कोई सबक नहीं लिया?


कांग्रेस की उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका ने ट्वीट किया, ‘‘उत्तर प्रदेश में वायरल बुखार से 100 से अधिक लोगों की मौत की खबर पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। क्या उप्र सरकार ने कोविड की दूसरी लहर के दौरान अपने त्रासदीपूर्ण प्रबंधन के भयावह परिणामों से कोई सबक नहीं लिया है?’’ उन्होंने कहा, ‘‘सभी संभव संसाधनों का उपयोग प्रभावित लोगों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने के लिए करने का निर्देश दिया जाए और आगे इस बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए उचित कदम उठाए जाएं।’’


गौरतलब है कि फिरोजाबाद में वायरल एवं डेंगू बुखार से मरने वालों की संख्या बढ़कर 47 हो गयी जबकि जिलाधिकारी ने मामले में लापरवाही बरतने पर तीन चिकित्सकों को निलंबित कर दिया हैं। सदर विधानसभा सीट के विधायक मनीष असीजा का दावा है कि मरने वालों की संख्या 61 पहुंच गयी हैं।





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निम्न रक्तचाप के कारण सायरा बानो अस्पताल में भर्ती, डॉक्टर ने कहा-अब ठीक हैं

मुंबई :  गुजरे जमाने की मशहूर अदाकारा सायरा बानो को निम्न रक्तचाप की शिकायत के बाद इस सप्ताह के शुरु में यहां एक अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में भर्ती कराया गया था और अब वह ठीक हैं। अस्पताल के एक अधिकारी ने बुधवार को यह जानकारी दी। अधिकारी ने बताया कि 77 वर्षीय अभिनेत्री को तीन दिन पहले खार हिंदुजा अस्पताल में भर्ती कराया गया। जुलाई में सायरा बानो के पति और प्रख्यात अभिनेता दिलीप कुमार का निधन हो गया था। अधिकारी ने बताया, ''निम्न रक्तचाप के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। उन्हें तीन दिन पहले अस्पताल लाया गया था। वह अब ठीक हैं और काफी बेहतर हैं। चिंता की कोई बात नहीं है।'' अस्पताल के अधिकारी ने कहा कि उन्होंने मंगलवार को अदाकारा से बात की थी। अधिकारी ने कहा कि यह कोविड-19 समर्पित अस्पताल नहीं है। महामारी के मद्देनजर अदाकारा की कोविड-19 की जांच की गयी लेकिन संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई। सायरा बानो ने 'जंगली' फिल्म से शुरुआत की थी और उन्होंने कई फिल्मों में यादगार भूमिका अदा की। अदाकारा को एक या दो दिन में अस्पताल से छुट्टी दिए जाने की संभावना है। सायरा बानो के पति दिलीप कुमार का लंबे समय से अस्वस्थता के कारण 98 साल की उम्र में सात जुलाई को निधन हो गया था।



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महिलाओं को पीसीओडी से मिलेगा छुटकारा

पॉलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम या पीसीओडी एक ऐसी बीमारी है जिसके तहत ओवरी में मल्टीपल सिस्ट हो जाते हैं। ये सीस्ट खास किस्म के तरल पदार्थ की थैलियां होती हैं। सिस्ट होने की असली वजह मासिक धर्म में अनियमतता को बताया जाता है। मासिक धर्म में अनियमतता के कारण ओवरी का साइज बढ़ जाता है नतीजतन एंड्रोजेन और एस्ट्रोजेनिक नामक हारमोन भारी मात्रा में प्रोड्यूस होते हैं। पॉलिसिस्टिक ओवरी नार्मल ओवरी की तुलना में आकार में काफी बड़े होते हैं। इसे स्टीन लिवंथन सिंड्रोम भी कहा जाता है। पीसीओडी के कारण गर्भास्था, मासिक धर्म, डायबिटीज जैसी बीमारी में परेशानियों का इजाफा करता है।


पीसीओडी के लक्षण : पीसीओडी के लक्षण बेहद खतरनाक ढंग से देखे जा सकते हैं। दरअसल इससे महिलाओं के शरीर में बाल बढ़ जाते हैं, स्तन का साइज छोटा हो जाता है, आवाज में फर्क महसूस होने लगता है, वजन बढ़ जाता है, सिर के बाल पतले होने लगते हैं। इतना ही नहीं जो महिलाएं पीसीओडी से पीड़ित होती हैं, उनमें एंग्जाइटी, डिप्रेशन, वजन बढ़ना जैसी समस्या भी देखने को मिलती है। इन दिनों पीसीओडी वयस्क महिलाओं की कम उम्र की युवतियों में देखने को मिल रही है। इसकी असली वजह काम का तनाव, अस्वस्थ खानपान, एंग्जाइटी, डिप्रेशन, व्यायाम न करना है। साथ ही जो युवतियां कम सोती हैं, उन्हें भी पीसीओडी होने का खतरा रहता है। जो महिलाएं अपनी जीवनशैली के कारण पीसीओडी का शिकार हो रही हैं, वे चाहें तो कुछ आसनों की मदद से स्वस्थ जीवन जी सकती हैं। उनमें पीसीओडी का खतरा भी कम हो जाता है। 


कपालभाती : कपालभाती शब्द दो शब्दों को जोड़कर बनाया गया है। एक कपाल यानी माथा और भाती यानी चमकना। माना जाता है कि नियमित व्यायाम करने से चेहरे पर ग्लो आता है और शरीर स्वस्थ रहता है। कपालभाती वास्तव में एक शत क्रिया है। यह एक तरह शरीर की क्लीनिंग प्रक्रिया है जिसकी मदद से शरीर से जहरीले पदार्थों को निकाला जाता है। इसके तहत आपको योगिक आसन में बैठना होता है और फिर पूरी प्रक्रिया सांसों के लेने और छोड़ने पर निर्भर करती है। 


योनि मुद्रा : यह एक ऐसा योगासन है जिसे करते हुए महिला किसी भी रूप में बाहरी दुनिया से जुड़ाव महसूस नहीं करती। इसलिए इसे योनि मुद्रा कहा जाता है। यह हमें अपनी अंदरूनी दुनिया से जोड़ता है इसलिए इसे योनि मुद्रा कहा जाता है। यह गर्भाशय में शिशु के होने का आभास कराता है।


पवनमुक्त आसन : पवनमुक्त आसन हमारे पेट के लिए सबसे ज्यादा लाभकारी आसन है। साथ ही यह हमारी पाचन क्रिया को भी बेहतर करता है। पवनमुक्त आसन से एब्डोमिनल और पीठ की मसल्स को मजबूती मिलता है साथ ही रक्त संचार का प्रवाह भी बेहतर होता है। 


हलासन : हल एक तरह का जमीन जोतने के लिए इस्तेमाल होने वाला उपकरण है जिसे किसान द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। हलासन को सर्वांगासन के बाद ही किया जाता है जो वास्तव में कंधों से जुड़ा हुआ आसन है। यह आसन भी पीसीओडी में राहत देने में मदद करता है। 


धनुर्सान : यह आसन टेंशन और डिप्रेशन को दूर भगान के लिए किया जाता है। अतः यदि किसी महिला में पीसीओडी के जरा भी लक्ष्ण दिखें या उन्हें जबरदस्त तनाव होता है तो उन्हें यह आसन अवश्य करना चाहिए। इससे पीसीओडी के आशंका में काफी कमी आती है।



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बदलता मौसम बिगाड़ न दे आपकी सेहत, याद रखें ये खास बातें

मौसम बदलने के साथ बीमारियों का खतरा भी बढ़ता जाता है। गुनगुनी सर्दी की शुरुआत हो गई है, ऐसे में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को बचाव की जरूरत होती है, लेकिन डॉक्टर्स के मुताबिक, सर्दियों के मौसम में ज्यादा से ज्यादा ऑर्थराइटिस, अस्थमा, हार्ट की प्रॉब्लम और टॉन्सिल्स के मरीजों को ज्यादा बचाव की जरूरत होती है। इस मौसम में ड्राई स्किन, सर्दी जुकाम, शरीर में दर्द और हाइपोथर्मिया जैसे बदलाव भी होने लगते हैं। ऐसे में इससे बचाव जरूरी है, आइए जानते हैं कैसे...


सर्दी-जुकाम:- सर्दियों का मौसम आते ही सर्दी जुकाम की समस्या बढ़ जाती है। जिन लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, उनके लिए यह सबसे बड़ी समस्या हो जाती है।


ऐसे करें बचाव:- इससे बचने के लिए साफ-सफाई का खास ध्यान रखें। यह एक वायरल इंफेक्शन होता है। इसके लिए बार-बार हाथ को साबुन से धोएं ताकि इंफेक्शन से बचे रहें। साथ ही भाप, नमक के पानी के गरारे फायदेमंद होंगे।


अस्थमा की दिक्कत:- सर्दियों में एलर्जी के तत्व कोहरे की वजह से आसपास ही रहते हैं, हवा में उड़ते नहीं हैं। ऐसे में इनसे अस्थमा के मरीजों और बुजुर्गों की तकलीफ बढ़ जाती है।


ऐसे करें बचाव:- इस मौसम में बुजुर्गों व अस्थमा के मरीज धूल-मिट्टी से बचें। तकलीफ बढ़ने पर डॉक्टर को दिखाएं।


हाइपोथर्मिया:- अगर शरीर का ताप 34-35 डिग्री से नीचे चला जाए तो हाइपोथर्मिया की दिक्कत बढ़ जाती है। इसमें हाथ-पैर ठंडे हो जाते हैं और बीपी भी कम हो जाता है। अगर शरीर का तापमान कम हो जाए तो मौत भी हो सकती है।


ऐसे करें बचाव:- सुबह की तेज ठंड हवाओं से बचें। गर्म चीजों को खाएं।


टॉन्सिल:- सर्दियों में बच्चों में टॉन्सिल की समस्या ज्यादा बढ़ जाती है। इसमें गले में काफी दर्द होता है। खाना खाने में दिक्कत होती है, तेज बुखार भी आ सकता है।


ऐसे करें बचाव:- इससे बचे रहने के लिए इस मौसम में ठंडी चीजें खाने से बचें। गर्म खाने और गुनगुने पानी का प्रयोग करें।


स्किन ड्राइनेस:- सर्दियां शुरू होते ही शरीर में जो पहला बदलाव होता है, वह है स्किन ड्राइनेस। ठंडक बढ़ने और वातावरण में नमी कम होने से इसकी समस्या बढ़ने लगती है। ड्राई स्किन को मॉइश्चर ना किया जाए तो त्वचा में खुजली और लाल चकते होने लगते हैं। त्वचा रूखी होकर फटने लगती है। कई बार फटी त्वचा से खून भी निकलने लगता है।


ऐसे करें बचाव:- नहाने के बाद मॉइश्चराइजर या नारियल तेल लगाएं। साथ ही होठों पर वैसलीन लगाएं।


यह भी जरूरी... 


पिएं ज्यादा पानी:- सर्दियों में लोग पानी कम और चाय, कॉफी ज्यादा पीते हैं, जिससे उन्हें डिहाइड्रेशन होने लगता है। इससे बचने के लिए सूप या जूस पिएं। सब्जियां जैसे पालक, गाजर, बथुआ, मैथी में प्राकृतिक रूप से पानी होता है, इन्हें भी अपने खाने में शामिल करें।


ओवरइटिंग से बचें:- सर्दियों में अक्सर लोग हैवी डाइट लेने लगते हैं। ओवरइटिंग से पाचनतंत्र गड़बड़ा जाता है। ऐसें में इससे बचें। 



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पौष्टिकता से भरपूर है अखरोट

अखरोट केवल साधारण खाद्य नहीं है बल्कि स्वास्थ्य एवं चिकित्सीय दृष्टि से इसे असाधारण भी कहा जा सकता है। अखरोट समूल ही बहुपयोगी है। यदि अखरोट की जड़ें या अंकुर चबाएं तो मृत्यु तक दांत टस से मस नहीं होते। अखरोट की रसीली पत्तियों का रस बहुत स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। आयुर्वेद में अखरोट की पत्तियों का कई तरह से उपयोग किया जाता है। इसकी रसीली पत्तियों को 2 से 3 घंटे तक पानी में उबाल कर जो द्रव निकाला जाता है उसका प्रयोग कहीं चाय के रूप में किया जाता है तो कहीं रूधिर-वाहिकाओं के फैलाव की दवा के रूप में या हाजमा सुधारने के लिये किया जाता है। आंखें आ जाएं तो इसके रसीले पत्तों के द्रव से धोने पर शत-प्रतिशत लाभ पहुंचता है। इससे कुल्ला किया जाए तो मसूड़ों के घाव भर जाते हैं तथा दांत अपनी जगह मजबूत हो जाते हैं। 


अखरोट की पत्तियों का यह रस गाढ़ा हो तो इसका उपयोग एक्जिमा की दवा के रूप में किया जाता है। गठिया तथा आमवात अगर प्रभावी होने लगे तो इस द्रव से नहाना बहुत लाभदायक होता है। धार्मिक अनुष्ठानों में या व्रताहार के रूप में अखरोट बहुत उपयोगी है। व्यंजनों में भी अखरोट की गिरी महत्वपूर्ण समझी जाती है। अखरोट की गिरी का मसालेदार सूप भी बनाया जाता है तथा इसकी कच्ची गिरी का जैम भी बनाया जाता है। बर्फीले प्रांत के रहने वालों के खाद्य या व्यंजनों में अखरोट की बहुत उपयोगिता है। रूस, मंगोलिया या काकेशर और अंटार्कटिक क्षेत्रों में वहां के सैनिक आज भी जब अपनी मुहिमों पर निकलते हैं तो अखरोट की गिरी से बनी मिठाई अपने साथ लेकर चलते हैं जो आटे के संग अंगूर का रस उबाल कर तथा उसमें गिरी डाल कर बनाई जाती है। अखरोट की गिरी का तेल निकालने के बाद जो भाग बचता है वह बेकार नहीं जाता। 


उसका एक हिस्सा पशुओं के चारे और चूजों के दानों में मिलाया जाता है जो स्वादिष्ट तो होता ही है, साथ में स्वास्थयवर्धक भी होता है। हलवे में यदि अखरोट की गिरी का रस मिलाया जाए तो यह स्वादिष्ट तो होगा ही, साथ ही बहुत पौष्टिक भी। अखरोट की पौष्टिक तथा स्वास्थ्यवर्धक गिरी बच्चे, बूढ़ों, डायबिटिज के रोगियों या जिन को दिल का दौरा पड़ चुका हो, अधेड़ उम्र वालों को या दूध पिलाने वाली माताओं आदि के लिये बहुत गुणकारी मानी गयी है। बहरहाल अगर दो, तीन अखरोट रोज खायें तो काफी लाभदायक होते हैं। बहुत भीषण गर्मी में अखरोट नहीं खाना चाहिये। जाड़ों में शहद के साथ यदि अखरोट खाया जाए तो स्वास्थ्यवर्धक रहता है। अखरोट की गिरी में कैलोरी बहुत अधिक होती है जो शरीर के लिये बहुत जरूरी होती है। इसमें वे सब विटामिन होते हैं जिनकी जरूरत शरीर को होती है।





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बैठने वाली जॉब करने वाले जरूर करें ये योगासन, नहीं होंगी रीढ़ की हड्डी की समस्याएं

जैसे-जैसे तकनीक विकसित होती जा रही है, बहुत सारे काम अब एक ही जगह बैठकर किए जाने लगे हैं। इसी तरह पढ़ने वाले स्टूडेंट्स, दुकानदार और डेस्क डेस्क जॉब वाले लोगों को दिनभर एक ही जगह बैठे-बैठे काम करना पड़ता है। काम के दबाव के कारण न तो अपनी फिटनेस के बारे में सोचने का वक्त होता है और न ही जिम जाकर एक्सरसाइज करने का समय होता है। ऐसे में देखा गया है कि थोड़े समय बाद इन लोगों में पीठ दर्द, कमर दर्द, कंधा दर्द या कोहनी और उंगलियों का दर्द शुरू हो जाता है। इसका कारण यह है कि आप मानसिक रूप से तो एक्टिव होते हैं मगर शारीरिक रूप से बिल्कुल निष्क्रिय होते हैं। फिट रहने के लिए आपके शरीर को थोड़ी मेहनत या एक्सरसाइज करनी बहुत जरूरी है। अगर आपको अपने काम से ज्यादा समय नहीं मिलता है, तो आप घर पर या ऑफिस में ही 10 मिनट समय निकालकर कुछ आसान योगासन कर सकते हैं, जिससे आप शरीर में होने वाली इन समस्याओं से बचे रहें। इसके अलावा ये योगासन आपको शारीरिक रूप से फिट भी रखेंगे।


हस्तोत्तासन करें : हस्तोत्तासन को आप कहीं भी और कभी भी कर सकते हैं। इसे करने के लिए सबसे पहले सीधे खड़े हो जाएं और हाथों को ऊपर आकाश की तरफ उठा लें। अह दोनों हाथों के पंजों को मिलाते हुए एड़ियों को ऊंचा करें और हाथों को और ऊपर की तरफ खींचें। इसके बाद एड़ियों को जमीन पर रख दें। अब हाथों को ऊपर उठाए हुए ही दाईं तरफ क्षमतानुसार घूम कर स्ट्रेच करें। फिर इसी तरह बाईं तरफ क्षमतानुसार स्ट्रेच करें। हर 3 घंटे के अंतराल पर ऐसा 2-3 बार कर लें, तो आपको कभी भी कमर और पीठ की समस्या नहीं होगी।


सुप्त पवनमुक्तासन : चटाई बिछाकर सीधे लेट जाएं। अपने घुटनों से टांगें मोड़ लें और उन्हें अपनी छाती के करीब लाएं। अपनी टांगों के आसपास अपनी बाहें लपेटें। चाहें तो अब आंखें भी बंद कर सकती हैं। गहरी सांस लें। इसी मुद्रा में 1 मिनट के लिए रहें। अब सांस छोड़ें और अपना सिर इतना उठाएं कि आपकी नाक घुटनों को छू सके। इस मुद्रा में 5 सेकंड तक रहें। सांस लेते हुए अब अपना सिर पीछे ले जा सकती हैं। इसे 5 बार दोहराएं। इस आसन से पेट, छोटी और बड़ी इंटेस्टाइन, लिवर, पेन्क्रियाज़, गॉलब्लैडर और पेल्विक की मांसपेशियों की खुद-ब- खुद मालिश हो जाती है।


पदसंचालनासन : यह आसन मोटापे के इलाज में बहुत कारगर है। इसके अभ्यास से पीठ, हिप्स, टांगें, होठ, पेट और पेल्विस मजबूत होते हैं। चटाई बिछा लें और उस पर सीधी लेट जाएं। हथेलियां नीचे की तरफ हों। सामान्य रूप से सांस लें और अपनी दोनों टांगों को ऐसे हवा में चलाएं, मानो लेटे हुए साइकिल चला रही हों। इसके 10-12 राउंड्स करें। अब शवासन में आएं, यानी लेट जाएं और दो मिनट तक धीरे-धीरे सांस लें। अब उलटी दिशा में टांगों को चलाएं। इसके 10-12 राउंड्स करें।


स्ट्रेचिंग करें : उल्‍टी टांग को सीधी टांग के ऊपर रखें और आगे की तरफ झुक जाएं फिर महसूस करें कि कहां-कहां स्‍ट्रेच आ रहा है। फिर वापस उसी अवस्‍था में आ जाएं। फिर दूसरी तरफ से भी इस आसन को करें। अब अपनी उंगलियों को आपस में फंसाकर ऊपर ले जाइए और खींचकर रखिए। सांस भरते रहिए और वापस आ जाइए। फिर अपना उल्‍टा हाथ ऊपर ले जाइए और दूसरी साइड में झुक जाइए। ऐसा ही दूसरी साइड से भी करें। उल्टा पैर आगे ले जाइए फिर हाथ से पैरों की उंगालियों को पकड़ने की कोशिश करें। अगर नहीं पकड़ पा रहे तो पैर को पकड़ लें। फिर वापस आ जाइए। दूसरी तरफ से भी ऐसे ही करें।


घंटों तक न बैठे रहें : ऑफिस में बैठने का काम हो तो भी एक जगह चेयर पर घंटों तक न बैठे रहें, बल्कि बीच-बीच में टहलते रहें। हर एक-डेढ़ घंटे बाद अपनी कुर्सी से उठें और 20 कदम चलकर शरीर को थोड़ा स्ट्रेच करें और फिर बैठ जाएं। अपना सामान स्वयं ही उठाकर रखें या फिर लंच टाइम में अपने केबिन में ही टहल लें। कैसे भी 15-20 मिनट तो अवश्य निकालें अपने लिए जिसमें आप चल सकें, ताकि शरीर की कसरत हो जाए।




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डिप्रेशन से बचना है तो छोड़ें कॉल और ई-मेल

अगर आप अपने दोस्तों को याद कर के उन्हें कॉल कर अपना मन हलका कर लेते हैं तो ऐसा करना आप पर भारी पड़ सकता है। पुराने जमाने के अपेक्षाकृत आरामदायक और शांत जीवन जीने वालों के लिए यह खबर हवा के एक ताजे झोंके के समान है। शोध करने वालों ने आखिरकार माना है कि डिप्रेशन से बचने के लिए फोन कॉल करने और ईमेल भेजने से कहीं बेहतर है कि दोस्तों या परिवार के साथ आमने-सामने की मुलाकात की जाए।


ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक टीम ने पाया कि जो लोग अपने परिवार और दोस्तों से नियमित रूप से मिलते रहते हैं उनमें उन लोगों के मुकाबले अवसाद के लक्षण कम पाए गए जो लोगों से फोन या ई-मेल के जरिए बात करते हैं। अध्ययन में यह भी पता चला कि लोगों से आमने-सामने मिलने से होने वाले फायदे काफी बाद तक अपना असर दिखाते हैं।


मनोविज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर एलन टिओ ने कहा, यह लोगों को अवसाद से बचाने के लिए अपने खास रिश्तेदारों और दोस्तों से संवाद के तौर तरीके के बारे में मिली जानकारी का पहला रूप है। टीम ने शोध में पाया कि सामाजिक रूप से मिलने जुलने के सभी तरीके एक समान असर नहीं छोड़ते। टिओ ने कहा, परिवार या दोस्तों के साथ फोन काल या डिजिटल संवाद का अवसाद से बचाने में उतना असर नहीं है जितना प्रत्यक्ष मिलने-जुलने में है।


युनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के लांगीट्यूडनल हेल्थ एंड रिटायरमेंट स्टडी में टिओ और उनके सहयोगियों ने 50 और इससे अधिक उम्र के 11000 व्यस्कों का अध्ययन और परीक्षण किया। अध्ययन करने वालों ने फोन और ई-मेल से लोगों से संपर्क रखने वालों पर ध्यान केंद्रित किया। दो साल तक देखा कि ये कितने अंतराल पर इन जरियों से संवाद करते हैं। उन्होंने पाया कि लोगों से आमने-सामने न मिलने वाले इन लोगों के दो साल बाद अवसादग्रस्त होने की संभावना दोगुनी हो गई है। अध्ययन में पाया गया कि हफ्ते में कम से कम तीन बार परिवार और दोस्तों से प्रत्यक्ष मिलने वालों में दो साल बाद अवसाद का शिकार होने की संभावना न्यूनतम स्तर पर होती है। जो लोग प्रत्यक्ष तो मिलते हैं लेकिन कम मिलते हैं उनमें इसकी संभावना बढ़ जाती है।







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लाइलाज बीमारी नहीं है डिप्रेशन

डिप्रेशन या अवसाद एक मानसिक रोग है जिसमें मरीज उदासी, अस्थिरता, अकेलापन, निराशा व पछतावा महसूस करता है। रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसकी जरूरत किसी को नहीं है और वह सबके ऊपर बोझ है। डिप्रेशन से पीड़ित लोगों का मूड भी अकसर काफी खराब रहता है। छोटे से छोटा काम पूरा करना भी उन्हें महाभारत-सा मुश्किल लगता है। छोटी-सी बात पर भी परेशान हो जाना इसका सामान्य लक्षण है।


विभिन्न शोधों से पता चलता है कि अवसाद के पीछे जैविक, आनुवांशिक व मनोसामाजिक कारणों की एक मजबूत और जटिल पारस्परिक क्रिया होती है। कोई अपने किसी नजदीकी व्यक्ित की मौत पर अवसाद का शिकार हो जाता है, तो कोई गंभीर बीमारी होने पर। इसके अलावा बॉयोकेमिकल असंतुलन के कारण भी डिप्रेशन हो सकता है। मस्तिष्क में मौजूद रसायन, तंत्रिकाओं द्वारा संदेश भेजने में अहम भूमिका निभाते हैं।


जब इन रसायनों में असंतुलन पैदा होता है तो संदेश ठीक से प्रेषित नहीं हो पाता, इसलिए दिमाग कुछ अलग तरीके से काम करने करता है। ये सब अवसाद के ही लक्षण हैं। उदाहरण के लिए नोरेपाइनफ्राइन नामक रसायन हमारे दिमाग में चैकन्ने पन व उत्तेजना को नियंत्रित करता है। यदि यह असंतुलित हो जाए, तो थकान और उदासी हो जाती है जो बीमारी का लक्षण है। अवसाद का शिकार व्यक्ित अपने बारे में हमेशा नकारात्मक बातें सोचता रहता है। वह अपने नकारात्मक चश्मे से ही दुनिया को देखना चाहता है। कुछ समय के लिए ऐसी सोच सामान्य है, किंतु यदि यही सोच लगातार बनी रहे तो, एक्सपर्ट की मदद की आवश्यकता होती है।


मरीज की दैनिक गतिविधियों और स्वास्थ्य पर भी डिप्रेशन का असर पड़ता है। डिप्रेशन के कारण मूड ठीक रखने वाले सेरोटोनिन हारमोन का स्तर खून में कम हो जाता है और इसके कारण धमनियों में खून जमने की आशंका बढ़ जाती है। इससे हृदय और मस्तिष्क को भी भारी खतरा उत्पन्न हो सकता है। अवसाद और मधुमेह से पीड़ित लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियां, अंधापन और मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियां होने की आशंका बनी रहती है।


महिलाओं में डिप्रेशन:- पुरुषों की तुलना में महिलाओं में डिप्रेशन होने की संभावना दोगुनी होती है और वे किसी भी उम्र में इसकी शिकार हो सकती हैं। डिप्रेशन से पीड़ित महिला अकसर उदास रहती है। उसका मूड भी काफी खराब रहता है। इसमें मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर, बायपोलर मूड डिसऑर्डर प्रमुख हैं। मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर में ध्यान एकाग्र करने में परेशानी होती है, आत्मसम्मान में कमी, थकान या ऊर्जा में कमी महसूस होती है। वहीं, बायपोलर मूड डिसऑर्डर में व्यक्ित को जल्दी गुस्सा आता है और वह चिड़चिड़ा महसूस करता है। पर, वह इस बात से इंकार करता है कि उसे कोई समस्या है।


महिलाओं की जिंदगी की कुछ घटनाओं के कारण उन्हें डिप्रेशन होने की आशंका ज्यादा होती है। इन कारणों में यौवनावस्था में प्रवेश करना, प्रेगनेंसी, मेनोपॉज, किसी तरह का शोषण, संबंधों से जुड़े तनाव आदि प्रमुख हैं। डिप्रेशन के कारण इन महिलाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है। एक ताजा शोध के अनुसार यदि भाई-बहन या पेरेंट्स में से किसी को डिप्रेशन की समस्या है, तो महिला को यह परेशानी होने की आशंका बढ़ जाती है। इसके अलावा महिलाओं में डिप्रेशन के 80 प्रतिशत से ज्यादा मामले किसी तरह के शोषण का परिणाम रहे हैं। अकसर, बचपन में हुए शारीरिक और मानसिक शोषण के बारे में हम किसी को बताने से हिचकते हैं और इसी का नतीजा बड़े होकर डिप्रेशन के रूप में सामने आता है।


कैसे करें उपचार की शुरुआत:- अवसाद के उपचार हेतु कई तरीके उपलब्ध हैं। सबसे पहले किसी मनोचिकित्सक से मिलें। इसके बाद अवसाद के स्तर के मुताबिक ही डॉक्टर से ट्रीटमेंट लें। अवसादग्रस्त व्यक्ित की परेशानी को दूर करने के लिए कई तरह की थेरेपी इस्तेमाल होती हैं, जो बातचीत पर आधारित होती हैं। उदाहरण के लिए बिहेवियर थेरेपी, ग्रुप थेरपी, साइकोडायनेमिक थेरेपी और फैमिली थेरेपी इत्यादि। इलाज के लिए कई दवाएं भी हैं, जो दी जा सकती हैं लेकिन अनिवार्य नहीं होतीं। इनके अलावा उच्च आत्मविश्वास, स्थितियों से निपटने का कौशल, लक्ष्य बनाकर काम करने, किसी खेल या हॉबी जैसे टेनिस, फोटोग्राफी आदि को समय देने, सकारात्मक सोच रखने वाले लोगों के साथ समय बिताने आदि से भी अवसाद की स्थिति से बाहर निकलने में मदद मिलती है।





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प्रेग्नेंसी के दौरान कामेच्छा कम होने के कारण

कुछ महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान कामेच्छा कम हो जाती है जब कि कुछ में यह ज्यादा होती है। इसका मतलब है कि सब महिलाएं एक जैसी नहीं होती हैं। लेकिन जहां तक यौन इच्छा कम होने का सवाल है, इसके क्या कारण हो सकते हैं? प्रेग्नेंसी के दौरान कामेच्छा कम होने के क्या कारण हैं? शरीर में होने वाले परिवर्तनों के कारण कामेच्छा कम हो सकती है। ध्यान रखें कि गर्भावस्था के दौरान कामेच्छा की कमी मानसिक कारणों से भी हो सकती है। आपका पार्टनर आपका किस प्रकार साथ देता है और प्रेग्नेंसी दौरान होने वाले उतार-चढ़ावों से आप कैसे तालमेल बिठा पाती हैं, इन सब बातों पर भी कामेच्छा निर्भर करती है। इस दौरान होने वाले बदलावों से बहुत सी महिलाएं तनाव में आ जाती हैं जिससे उनकी कामेच्छा कम हो जाती है।


प्रेग्नेंसी के दौरान कामेच्छा कम होने के कारण...


उबाक

उबाक आना इन दिनों में महिलाओं में कमजोरी रहती है और उबाक भी आती हैं। इससे भी उनकी यौन इच्छा कम हो जाती है।


थकान 

प्रेग्नेंसी के शुरुआती दिनों में महिलाएं थकान अनुभव करती हैं, यह भी एक कारण हो सकता है।


हार्मोन का असंतुलन 

हार्मोन या तो कामेच्छा बहुत बढ़ा सकते हैं या फिर इसे बहुत कम कर सकते हैं। कामेच्छा को प्रभावित करने में इनका भी योगदान रहता है।


डर 

कई बार, डर से भी सेक्स की इच्छा मर जाती है। कई महिलाओं को डर रहता है कि इस समय सेक्स करने से बच्चे को कुछ ना हो जाए, इसलिए वे सेक्स की इच्छा को पनपने ही नहीं देती हैं।


शुष्कता 

कुछ महिलाएं इस समय ड्रायनेस से पीड़ित हो जाती हैं जिससे गर्भावस्था के दौरान कामेच्छा कम हो जाती है।


उत्साह 

कुछ महिलाएं पूरे समय बच्चे के बारे में ही सोचती रहती हैं। ऐसे में यौन संबंध बनाने का विचार उनके मन में नहीं आता है






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बाॅडी को फिट बनाने के लिए अपनाएं ये टिप्स...

अच्छी सेहत होना किसी खजाने से कम नहीं, अगर आप अच्छी सेहत की बेताज बादशाह हैं तो आधी से ज्यादा दिक्कतें तो यूं ही खत्म हो जाती है। लेकिन अच्छी सेहत पाना कोई आसान काम नहीं है इसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। लेकिन कुछ लोग सेहत बनाने के लिए शॉर्टकट अपनाते हैं और जो उनके ऊपर बुरा असर भी डालता है। हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ ऐसी ही बातें जो आपको सेहतमंद बनाने के साथ-साथ आपको स्ट्रॉन्ग मसल्स बनाने में भी मदद करेगी...


कैलोरी की मात्रा:- मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए सबसे पहले अपनी कैलोरी की मात्रा को बढ़ाएं क्योंकि जब आप कसरत करेंगे तो उसके लिए आपको कैलोरी की जरुरत पड़ेगी। ध्यान रहे कि आपको जितनी कैलोरी की जरुरत है उससे ज्यादा कैलोरी ना खाएं और किसी अच्छे स्वास्थ्य सलाहकार से बात करें।


कंपाउंड एक्सर्साइज:- इस एक्सर्साइज में एक से अधिक मांसपेशियों का इस्तेमाल होता है। कंपाउंड एक्सर्साइज सबसे बढ़िया एक्सर्साइज है मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए। इसमें मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए वजन और तारों का उपयोग होता है।


मॉर्निंग एक्सर्साइज:- सुबह एक्सर्साइज करने के बहुत फायदे होते हैं। जब आप सुबह खली पेट कसरत करते हैं तो यह आपकी मांसपेशियों ज्यादा मजबूत बनाती हैं।


डाइजेस्ट्वि एन्जाइम:- जब आपको अपनी मांसपेशियों को मजबूत बनाना हो तो, आपको वैसा ही भोजन भी खाना होगा जो आपके शरीर को ताकत दे। क्यों कि आप एक्सर्साइज कर रहे हैं इसलिए आपको ऐसा भोजन खाना चाहिए जिसमें ज्यादा पोषक तत्व मजूद हों।


ज्यादा पानी पियें:- खूब पानी पिएं। अपने शरीर में पानी की कमी ना होने दें। काम से काम दिन में 10-20 गिलास पानी पियें।


पालथी मार कर बैठना:- पालथी मार कर बैठना मांसपेशियों को मजबूत बनाने में बहुत सहायक है, लेकिन अगर आप गलत तरीके से बैठे तो आपके घुटनों में समस्याएं हो सकती हैं।


डेडलिफ्ट्स करें:- डेडलिफ्ट्स मांसपेशियों को मजबूती देने में मदद करती हैं, इसमें रोज वजन उठाया जाता है। मांसपेशियों को मजबूत बनाने में वजन उठाना बहुत जरुरी है।


प्रोटीन:- मांसपेशियों के निर्माण और मरम्मत के लिए प्रोटीन बहुत जरूरी होता है। जिम जाने वाले लोगों को मांसपेशियों की काफी कसरत करनी पड़ती हैं, इसे ध्यान में रखते हुए प्रोटीन अधिक लेना चाहिए। अंडे, चिकन, मछली, स्प्राउट्स और दालें आदि का सेवन करें। सप्लीमेंट आदि से अच्छा है कि प्राकृतिक स्रोतों का सेवन करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पियें। इसके साथ ही नारियल का पानी भी फायदेमंद।


व्यायाम के बाद खाना:- कार्बोहाईड्रेट और प्रोटीन मांसपेशियों की मजबूती के लिए अच्छे होते हैं। कार्बोहाईड्रेट अमीनो एसिड बनता है जिसे इंसुलिन बनता है और इसे मांसपेशियों को ताकत मिलती है।


नींद:- आपके शरीर को कम से कम आठ घंटे की नींद की जरुरत है, जिसे आप दूसरे दिन के उसी जोश के साथ व्यायाम कर सके।


फैट:- आहार में जरूर लें फैट हमारे लिए बहुत जरुरी है इसमें आप नट्स और फिश खा सकते हैं जो आपको शक्ति देगीं।


कार्डियो:- कार्डियो को भी अपने व्यायाम में शामिल करें इससे आपकी मांसपेशियां मजबूत होंगी।



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खाली पेट खजूर खाने के से खून की कमी, कमजोरी और कोलेस्ट्रॉल जैसे रोगों से मिलेगा छुटकारा

सुबह खाली पेट खजूर खाने से आंतों के कीड़े को खत्म करने में मदद मिल सकती है। इतना ही नहीं, इसके सेवन से दिल मजबूत होता है, लीवर की सफाई होती है और रक्त का पोषण होता है। अगर कुछ मीठा खाने का मन है तो कैंडी की बजाय दो तीन खजूर खा लें। खजूर मीठे की तलब मिटाने का हेल्दी तरीका है। ये सफेद शुगर के अच्छे विकल्प होते हैं क्योंकि इनमें सोडियम, कोलेस्ट्रॉल और फैट नहीं होता। लेकिन याद रखें, इसमें कैलोरी अधिक होती है।


शोध के अनुसार, तनाव और कोलेस्ट्रॉल लेवल कम करने में खजूर उपयोगी है। खजूर फाइबर और आयरन का बेहतर स्रोत है। यदि आप अपने कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करना चाहते हैं, तो आपको रोजाना दो खजूर खाने चाहिए। खजूर फाइबर का अच्छा स्रोत है, इसलिए इसे खाने से पाचन क्रिया को फायदा पहुंचता है। ये एलडीएल कॉलेस्ट्रॉल (बैड कॉलेस्ट्रॉल) जमा होने से भी रोकते हैं, जिसकी वजह से दिल की बीमारियों जैसे हाइपरटेंशन, दिल का दौरा आदि का जोखिम कम होता है।


क्योंकि खजूर फाइबर से भरपूर होते हैं, इसलिए इसके सेवन से कब्ज जैसी पेट की समस्या से निपटने में मदद मिल सकती है। फाइबर सेवन की कमी से कब्ज हो सकता है। यह मल त्याग को बढ़ावा देती हैं और इससे संपूर्ण पाचन स्वास्थ्य में सुधार होता है। शरीर में आयरन की कमी होने पर एनीमिया की स्थिति बन जाती है। आयरन लाल रक्त कोशिकाओं की शरीर के दूसरे अंगों में ऑक्सीजन पहुंचाने में मदद करते हैं, जिससे कि वो अंग ठीक से काम कर पाते हैं। खजूर में आयरन उच्च मात्रा में होता है, इसलिए नियमित रूप से खजूर का सेवन करने से आप एनीमिया से बच जाएंगे।





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दिमागी बुखार पर प्रभावी नियंत्रण तथा इनका त्वरित इलाज एवं सहयोग सर्वाेच्च प्राथमिकता : जिलाधिकारी

जिलाधिकारी व मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता में विशेष संचारी रोग नियंत्रण एवं दस्तक अभियान सम्बन्धी समीक्षा बैठक हुई सम्पन्न।


 उत्तर प्रदेश जनपद हापुड़ ब्यूरो। जिलाधिकारी अनुज सिंह व मुख्य विकास अधिकारी उदय सिंह की अध्यक्षता में कलेक्ट्रेट भवन के सभागार में विशेष संचारी रोग नियंत्रण/दस्तक अभियान को सफल बनाने हेतु सम्बन्धित अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे थे। बैठक में जिलाधिकारी ने कहा कि शासन की मंशा के अनुरूप संचारी रोग तथा दिमागी बुखार पर प्रभावी नियंत्रण तथा इनका त्वरित इलाज एवं सहयोग सर्वाेच्च प्राथमिकताओं में एक है। इसलिए संचारी रोग कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये आशा तथा आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों द्वारा घर-घर भ्रमण कर दिमागी बुखार, खॉसी, जुखाम तथा विभिन्न संचारी रोगों से बचाव हेतु अभियान चलाकर सर्वें किया जा रहा है, तथा इसके उपचार के विषय में स्वास्थ्य शिक्षा तथा आवश्यक जानकारी देते हुए जन जागरूकता फैलाने का कार्य भी कराया जा रहा है। जन जागरूकता कार्यक्रम के दौरान यह ध्यान रखा जाए कि कोई भी ग्राम, मोहल्ला व घर छूटने न पावे।

 बैठक के दौरान मुख्य विकास अधिकारी ने संचारी रोग नियंत्रण/दस्तक अभियान यूनिसेफ द्वारा प्रस्तुत फीडबैक की रिपोर्ट में शिक्षा विभाग, कृषि, स्वास्थ्य विभाग के द्वारा प्रगति धीमी गति पाये जाने पर गहरी नाराजगी जताते हुए सम्बन्धित विभागों के अधिकारियों को ढंग से कार्य करके इस कार्यक्रम को सफल बनाने का निर्देश दिया है। और इसके साथ ही अन्य विभागों को निर्देशित किया कि अपने दायित्वों का निर्वहन सुचारू ढंग से करायें। 

उन्होने कहा कि संचारी रोग अभियान में भाग लेने वाले सभी विभाग अपनी रिपोर्ट समय पर उपलब्ध कराएं। उन्होने सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के अधीक्षको, जिला पंचायत राज अधिकारी एवं जिला कार्यक्रम अधिकारी इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये विशेष ध्यान दें। 

मुख्य विकास अधिकारी ने जिला पंचायत राज अधिकारी, नगर पालिका, नगर पंचायतों के अधिशासी अधिकरियो को निर्देशित करते हुए कहा कि संचारी रोग को दृष्टिगत रखते हुए साफ-सफाई, सेनीटाइजेशन, फॉगिंग, जल भराव, उथले हैंडपंपों का चिन्हीकरण कराकर शुद्ध पेयजल की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाय तथा विशेष अभियान चलाकर जन जागरूकता फैलायी जाये। इसके अलावा खुली नालियों को ढकनें की व्यवस्था एवं नालियों की साफ-सफाई जल भराव वाले स्थानों पर चूना का छिड़काव कराने के निर्देश दिये।

बैठक के दौरान मुख्य चिकित्साधिकारी डा0 रेखा शर्मा ने चिकित्सा अधीक्षकों को कार्यक्रम के सफल संचालन हेतु उचित कार्यवाही कराने के निर्देश दिये।

इस अवसर पर अपर मुख्य चिकित्साधिकारी, जिला पंचायत राज अधिकारी, जिला मलेरिया अधिकारी, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी, नगर पालिका/नगर पंचायत के अधिशासी अधिकारीगण सहित अन्य सम्बन्धित विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे। व जिला सूचना अधिकारी हापुड़। मौजूद रहे

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इस तरह किशमिश खाने से जल्दी होंगे मोटे

वजन कम करने के बारे में आपको ढेर सारी सलाह मिल सकती हैं, लेकिन शायद ही आपको वजन बढ़ाने के नुस्खे मिले होंगे। अगर आप सच में काफी पतले हैं और अपना वजन बढ़ाना चाहते हैं तो एक ऐसा ड्राइ फ्रूट है जो आपकी मदद कर सकता है। दरअसल, यहां हम किशमिश के बारे में बात कर रहे हैं जो स्किनी जीन के खिलाफ इस लड़ाई में आपका साथ दे सकती है। यहां हम जानेंगे कि वजन बढ़ाने के लिए किशमिश का उपयोग कैसे किया जाए और क्या हैं इसके स्वस्थ्य लाभ..


वजन बढ़ाने में कैसे मदद कर सकती है किशमिश?


वजन बढ़ाने के लिए आपको शरीर में अधिक कैलोरी को कंज्यूम करना पड़ता है और किशमिश में हाई कैलोरी होती है। 100 ग्राम किशमिश में मौजूद 299 कैलोरी आपके डेली कैलोरी सेवन का लगभग 15 फीसदी है। जर्नल फॉर फूड एंड न्यूट्रिशन रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, किशमिश का सेवन बेहतर वेट गेन पैरामीटर्स और पोषक तत्वों के सेवन से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए, आप वजन बढ़ाने के लिए किशमिश का उपयोग कर सकते हैं और ऐसा करते समय कई स्वास्थ्यवर्धक पोषक तत्व प्राप्त कर सकते हैं! इसलिए, पूरे यकीन के साथ ये कहा जा सकता है कि किशमिश हेल्दी तरीके से वजन बढ़ाने में प्रभावी रूप से आपकी मदद कर सकती है।


किशमिश में मौजूद हैं शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व


किशमिश मूल रूप से सूखे अंगूर हैं। इसलिए, वे अंगूर के अधिकांश पोषक तत्वों को बरकरार रखते हैं। आम तौर पर, साधारण चीनी के रूप में कार्बोहाइड्रेट, किशमिश का प्राइमरी कंपोनेंट होता है। इसके अतिरिक्त, इसमें आयरन, कैल्शियम और बोरॉन जैसे ट्रेस एंटीऑक्सिडेंट और खनिजों के साथ कुछ मात्रा में आहार फाइबर भी होते हैं।


आपको पतले से मोटा करने का गुण रखती है किशमिश


स्वस्थ कैलोरी से समृद्ध ये सूखे मेवे न्यूट्रिशन का एक पावरहाउस होते हैं। किशमिश भले ही दुबले-पतले और मुरझाए हुए रूप में दिखती हो लेकिन इसका असर एक दम उल्टा है। आप वजन बढ़ाने के लिए कई तरीकों से किशमिश का प्रयोग कर सकते हैं। आप चाहें तो अपने ओट्स या दही में कुछ किशमिश डालकर खा सकते हैं। चूंकि ये ड्राइ फ्रूट ळैं तो आप उन्हें डायरेक्ट भी खा सकते हैं। इसके अतिरिक्त आप उन्हें ब्रेकफास्ट में भी ले सकते हैं। 


वजन बढ़ाने के लिए किशमिश का सेवन कैसे करें?


प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले प्रोटीन और हेल्दी फैट से भरपूर खाद्य पदार्थों में किशमिश खाने से आपके वजन बढ़ाने की प्रभावशीलता में सुधार हो सकता है। वजन बढ़ाने के लिए किशमिश का सेवन कैसे करें, इसके बारे में यहां सुझाव दिए गए हैं।


-यदि आप किशमिश के सभी पोषक तत्वों का लाभ लेना चाहते हैं, तो उन्हें एक कप फुल-फैट दूध में रात भर भिगोएं और अगले दिन सेवन करें।

-किशमिश को आप शुगर-फ्री नट बटर में मिलाकर खा सकते हैं।

-घर पर ग्रेनोला बनाएं और अच्छी मात्रा में किशमिश मिलाएं। फिर इस मिश्रण का लुत्फ उठाएं और वजन बढ़ाएं।

-किशमिश की स्मूदी या प्रोटीन शेक में ब्लेंड करके भी कंज्यूम कर सकते हैं। 


वेट गेन के लिए जरूरी है 300-500 कैलोरी को कंज्यूम करना


वजन बढ़ाने के लिए किशमिश का सेविंग साइज हर व्यक्ति में अलग-अलग होता है और यह उसकी एज, जेंडर, फिजिकल एक्टीविटी, मेटाबॉलिज्म एक्टिविटी आदि जैसे कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है। इसके लिए सबसे पहले आपको अपने कैलोरी इंटेक के बारे में जानकारी होनी चाहिए। धीरे-धीरे वजन बढ़ाने के लिए आपको 300-500 कैलोरी अधिक को कंज्यूम की आवश्यकता है। दूसरी ओर, यदि आप अपने वजन बढ़ाने के प्रयासों को तेजी से ट्रैक करना चाहते हैं, तो आपके पास मेंटेनेंस के लिए लगभग 700-1000 कैलोरी अधिक होनी चाहिए।



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महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री जयंत पाटिल की एंजियोग्राफी हुई

मुंबई : महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री जयंत पाटिल की यहां एक निजी अस्पताल में बृहस्पतिवार को एंजियोग्राफी की गई। इससे एक दिन पहले मंत्रिमंडल की बैठक में बेचैनी होने की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।


चिकित्सीय प्रक्रिया के बाद, मंत्री ने सोशल मीडिया पर बताया कि चिंता करने की कोई बात नहीं है और चिकित्सकों ने उन्हें दो दिन के लिए आराम करने की सलाह दी है।


राज्य के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने बताया कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष, पाटिल को बुधवार को ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था जब उन्होंने मंत्री परिषद की बैठक के दौरान तबियत बिगड़ने की शिकायत की थी।


पाटिल ने बृहस्पतिवार को कहा, 'आज सुबह ब्रीच कैंडी अस्पताल में मेरी एंजियोग्राफी की गई। चिकित्सकों को एंजियोग्राफी के दौरान कोई समस्या नहीं दिखी।'


मंत्री ने कहा, 'मुझे दो दिन आराम करने की सलाह दी गई है।' साथ ही बताया कि वह अस्पताल से छुट्टी मिलने के तुरंत बाद काम पर लौटेंगे और उनका हाल-चाल लेने वालों को शुक्रिया कहा।


एंजियोग्राफी शरीर के अंगों या नसों का अध्ययन करने के लिए एक्स-रे जैसी तकनीक का इस्तेमाल करना है।





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चॉकलेट खाएं और तनाव दूर भगाएं

आधुनिक अस्वास्थ्यकर जीवनशैली के दुष्प्रभावों को अगर आप दूर करना चाहते हैं, तो काजू, बेरीज और चॉकलेट खाएं। विशेषज्ञों के मुताबिक, कुछ खास खाद्य पदार्थ तनाव को दूर करने और खुश रहने में मदद करते हैं। ऑनलाइन स्वास्थ्य पोर्टल हैल्प मी डॉक के संस्थापक सुव्रो घोष ने तनाव दूर करने वाले खाद्य पदार्थो की सूची जारी की है। 


ऐवोकैडो:- ऐवोकैडो विटामिन ई, विटामिन बी और पोटाशियम सहित कई पोषक तत्वों से भरपूर है। भूख और रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करके यह तनाव को दूर करने में बेहद प्रभावशाली है।


काजू:- काजू जिंक से भरपूर है जो कि मानसिक अवसाद और बेचैनी को दूर करने में बेहद कारगर है।


बेरी (जामुन, स्ट्रॉबेरी जैसे फल):- बेरी विटामिन सी के अच्छे स्नेत हैं, जो कि एक बेहतरीन तनाव नाशक है।


चॉकलेट:- सबकी पसंदीदा चॉकलेट फील गुड फैक्टर यानी मूड को अच्छा करने में प्रभावशाली है।


ग्रीन टी:- ग्रीन टी मानसिक प्रदर्शन को सुधारने और मस्तिष्क की कोशिकाओं को सक्रिय करने में मदद करती है।


केला:- पोटाशियम से भरपूर केला, इस जरूरी खनिज का प्राकृतिक स्रोत है, जो कि दिल की धड़कन को सामान्य करने में मदद करता है, मस्तिष्क तक ऑक्सीजन पहुंचाता है और शरीर में पानी के संतुलन को बनाए रखता है। जब हम तनावग्रस्त होते हैं, हमारे चयापचय का स्तर बढ़ जाता है, जिसके कारण पोटाशियम का स्तर गिर जाता है। उच्च पोटाशियम युक्त केले के सेवन से इसे फिर से संतुलित किया जा सकता है।


अखरोट:- अखरोट का सेवन तनाव से लड़ने, शांत और प्रसन्न रहने में मदद करता है।




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डेंगू के कहर से खुद को यूं बचाएं

एक छोटा सा मच्छर, डेंगू और मलेरिया का रूप धारण कर हमारे लिए जानलेवा बन सकता है। डेंगू एक ऐसी बीमारी हैं जो एडिस इजिप्टी मच्छरों के काटने से होती हैं। दिल्ली और एनसीआर में लगातार डेंगू के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है और अब पंजाब में इसके कई मामले सामने आ रहे हैं। कई लोगों को इसके चलते अपनी जान से हाथ धोने पड़े हैं। ऐसे में आपको डेंगू के कारणों और उससे बचाव के बारे में पता होना जरूरी हैं।


-यह रोग तेज बुखार से शुरू होता है, जिससे तेज सिर दर्द और मांसपेशियों व जोडों में भयानक दर्द शुरू हो जाता है। इसे हड्डी तोड़ बुखार भी कहते हैं। 


-पूरे शरीर पर लाल चकते बन जाते हैं। 


-इसके अलावा पेट खराब होना, दर्द होना, कमजोरी, दस्त लगना, ब्लेडर की समस्या, निरंतर चक्कर आना, भूख ना लगना भी लक्षण हो सकते हैं।


-कई बार ऐसे लक्षण दिखाई भी नहीं देते, जिसके चलते इसे इंफ्लूएंजा का प्रकोप मान लिया जाता है या कोई अन्य विषाणु संक्रमण, यदि कोई व्यक्ति प्रभावित क्षेत्र से आया हो और इसे नवीन क्षेत्र मे ले गया हो तो बीमारी की पहचान ही नहीं हो पाती है। 


-रोगी यह रोग केवल मच्छर या रक्त के द्वारा दूसरे को दे सकता है वह भी केवल तब जब वह रोग ग्रस्त हो।


-बच्चों मे डेंगू के लक्षण साधारण सर्दी, बुखार तथा उल्टी आना हो सकते है।


-रक्त स्त्राव की प्रवृति यानि टोर्नक्विट परीक्षण सकारात्मक आना, खुद ब खुद छिल जाना, नाक, कान से, टीका लगाने के स्थान से खून रिसना, खूनी द्स्त लगना और खून की उल्टी आना।


जानिए, डेंगू से कैसे किया जा सकता है बचाव...


फिलहाल तो डेंगू से बचाव के लिए कोई टीका नहीं आया है इसलिए इससे बचाव के लिए आपका जागरूक होना जरूरी हैं।  


-डेंगू की रोकथाम के लिए जरूरी है कि डेंगू के मच्छ रों के काटने से बचें और इन मच्छसरों के फैलने पर नियंत्रण रखा जाए। डेंगू के मच्छ रों को कंट्रोल करने के लिए उसके पनपने की जगहों को ही नष्ट कर देना चाहिए। 


-एडीज एजिप्टी मच्छर ज्यादातर दिन में काटते हैं। ऐसे में पानी के कंटेनर खाली कर दें और जिन जगहों पर पानी के जमा होने की उम्मीद हैं, वहां कीटनाशकों का उपयोग करें।   


-टायर, बोतलें, कूलर, गुलदस्ते इनको अक्सर खाली करना चाहिए क्योंकि इन जगहों पर डेंगू के मच्छर अधिक होते हैं। साथ ही घर के अंदर और आस-पास भी पानी जमा ना होने दें। किसी भी बर्तन में लंबे समय तक पानी ना रखें। 


-रोजाना मच्छरदानी लगाकर सोएं और पूरे कपड़े पहनकर रहें। मच्छ र ना काटें, इसके लिए क्रीम लगाकर रखें। 


-घर में और घर के आस-पास साफ-सफाई रखें क्योंकि गंदगी में डेंगू के मच्छरों के पनपने की आशंका बढ़ जाती है। कचरे के डिब्बे को हमेशा ढककर रखें। 


-सोते समय चारों तरफ नेट लगाकर सोएं।  यदि घर में या आस-पास मच्छर ज्यादा हैं तो दिन में भी मच्छरदानी लगाएं।   


कुछ प्राकृतिक उपाय...


-मच्छर घर में ना पनपे इसके लिए अपने घर की खिड़कियों पर तुलसी का पौधा भी रख सकते हैं। इससे मच्छर नहीं आएंगे।  


-कमरों के खिड़की-दरवाजें बंद करके कपूर जला लें और 15 से 20 मिनट कमरों को बंद रखें। इससे आप मच्छरों को आसानी से दूर कर सकते हैं। 


-शाम को घर में नीम का धुआं करने से भी मच्छर नहीं आते।


-आप शाम को घर में लैवन्डर अरोमा कैंडल भी जला सकते हैं।



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पीठदर्द से सावधान रहें

कई लोग पीठ दर्द का शिकार होते हैं और कभी-कभी यह तकलीफ इतनी भयंकर हो जाती है कि जिन्दगी मानो थम सी जाती है। कई नृत्यागनाओं, खिलाड़ियो और आजकल तो कार्यालय में बैठकर काम करने वाले लोगों को इस तकलीफ को झेलना पड़ता है। पीठ दर्द किसी को भी और कभी भी हो सकता है वह चाहे बच्चा हो, स्त्री या वृध्द।


अपनी गलतियों के कारण

कहा जाता है कि मनुष्य जब से सभ्य हुआ है, वह सीधा दो पैरों पर चलने लगा। तब उसे इस तकलीफ से गुजरना पड़ा। यह इसलिए होता है, क्योंकि हम अपने शरीर का सारा भार केवल दो पैरों पर डालते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि केवल मोटे लोगों को ही पीठदर्द हो। दुबले और स्फूर्ति भर लेगों को भी पीठदर्द हो सकता है। डाक्टर लीओन रूट, जी पीठ दर्द के एक मशहूर डाक्टर हैं, का कहना है कि लगभग सभी पीठदर्द की तकलीफें इसके बारे में जानकारी की कमी और अपनी गलतियों से होती है। 


डाक्टर रूट का विश्वास है कि यदि लोगों को इसके बारे में जानकारी हो और पीठदर्द के आम कारणों से वे परिचित हों तो काफी हद तक पीठ दर्द की शिकायत रोकी जा सकती है। पीठ दर्द का इलाज सिक्के के एक रूख की कहानी है और इसका दूसरा रूख है खुद अपने आप को सावधान रखना और इससे बचना। आमतौर पर दिन लोगों को इस प्रकार का भयानक पीठ दर्द एक बार होता है, ये सदैव ही इस डर से घिरे रहते हैं कि न जाने कब और किस समय उन्हें फिर उस भयानक पीठदर्द का दौरा आए क्योंकि ऐसे दौरे तो आपको बिल्कुल निस्सहाय बना देते हैं। यह आपको दैनंदिन कार्य करने से रोकती है। आपको दर्द के मारे पागल बनाती है और आप ठीक से न तो उठ सकते हैं, न बैठ सकते हैं। यह दर्द आपको मानसिक तौर से भी चिढ़चिढ़ा बना देता है।


उठने-बैठने का तरीका

बैठने का गलत तरीका सबसे बड़ा कारण है पीठदर्द का। डाक्टर रूट का कहना है कि पीठदर्द शायद एक छोटी सी चुक पड़ने से भी हो हो सकता है, जैसे जब आप कई घंटे एक ही तरफ गर्दन को मोड़े हुए पढ़ रहे हैं, या फिर एक ही तरीके में बैठकर कपड़े धोने से, या कभी ऊंची तार से कपड़े उतारते समय या कोई खेल खेलते समय हो सकता है। आपको चुक पड़ जाये। बस यदि इसी को आपने नजरअंदाज किया तो हो सकता है यह आगे जाकर एक भयानक पीठदर्द का कारण हो सकता है। यदि आपको बार-बार एक जगह टीस सी उठे और दर्द होती हो तो यकीनन एक्सरे करवा लेना चाहिए। डाक्टर रूट का कहना है कि यदि ऐसा हो तो चैंकन्ना हो जाना चाहिये। पीठदर्द से जुड़ी और कई बीमारियां भी हो जाती हैं। स्लिप डिस्क हो जाना बहुत खतरनाक और दुखदाई है। आपकी दो रीढ़ की हड्डियों के बीच में एक मांस की तरह एक गोल कार्टिलज होती है जो आपकी हड्डियों को आपस में रगड़ने से बचाती है। जब स्लिम होती है तो इसका मतलब है कि यह क्र्टिलेज पिचक जाती है और इस कारण बहुत नुकसान हो सकता है। यह पीठ दर्द की सबसे भयानक और दर्ददायक बीमारी है।





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बरसात में वज़न कंट्रोल करना चाहते हैं तो इस तरह बनाएं डाइट प्लान

लगभग पूरे देश में मॉनसून आ चुका है। इस मौसम में लोग ज्यादातर तले हुए पकौड़े, चटपटे स्‍नैक्‍स, कचौरियां और तरह-तरह के पकवान खाने में दिलचस्पी रखते हैं। जो लोग मोटापे के शिकार हैं, वो भी इस मौसम में इन चीज़ों से दूरी नहीं बना पाते हैं। नतीजा उनका मोटापा कम होने के बजाए बढ़ने लगता है। मोटापे से निजात पाने के लिए लोग तरह-तरह के फंडे आजमाते हैं। लेकिन आप जानते हैं कि बरसात के मौसम में मोटापा कम करने के लिए तरह-तरह के डाइट टिप्स नहीं अपनानी चाहिए, क्योंकि इस मौसम में इंफेक्शन और वायरल संक्रमण होने का खतरा ज्यादा होता है। मोटापा घटाने के लिए इस मौसम में ऐसी डाइट लेनी चाहिए जो शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाने वाली हो, साथ ही वज़न भी कंट्रोल करें। आइए जानते हैं कि इस मौसम में वज़न को कंट्रोल करने के लिए डाइट में कौन-कौन सी चीज़ें शामिल करना चाहिए।


ग्रीन टी का करें नाश्ते में सेवन:


वजन कंट्रोल करने के लिए ग्रीन टी सबसे बेस्ट है। आप दिन की शुरूआत चाय की जगह ग्रीन टी से करें। ग्रीन टी आपके मेटाबॉलिज्‍म को दुरूस्त रखेगी साथ ही वजन को कंट्रोल भी रखेगी।


नाश्ते में करें टोन मिल्क और अंकुरित अनाज का सेवन:


नाश्ते में आप फुल क्रीम दूध की जगह लो कैलोरी मिल्क यानी टोन मिल्क का सेवन करें। आप नाश्ते में अंकुरित अनाज का सेवन करें। अंकुरित अनाज आपका वजन कंट्रोल रखेगा, साथ ही पाचन भी दुरुस्त रखेगा।


सीज़नल सब्जियों को करें डाइट में शामिल:


बारिश के मौसम में सीजनल सब्जियों का सेवन करें। सब्जियों का सेवन आप स्‍टीम करके या सलाद के रूप में कर सकते हैं।


लाइट करें डिनर:


बरसात के मौसम में आप डिनर में वेज सूप, मूंग दाल, मिक्स वेज को शामिल कर सकते हैं। बारिश में इस बात का ध्यान रखें कि डिनर बहुत लेट नहीं हो। देर से खाना खाएंगे तो पेट उतना ही बढ़ेगा।


फलों को करें डाइट में शामिल:


जब भी फास्ट फूड की क्रेविंग हो तो केला खाएं। केले में मौजूद तत्व फास्ट फूड की क्रेविंग को खत्म करते हैं, इसके अलावा आप तरह तरह के सीजनल फलों का सेवन करें।


डिस्क्लेमर: स्टोरी के टिप्स और सुझाव सामान्य जानकारी के लिए हैं। इन्हें किसी डॉक्टर या मेडिकल प्रोफेशनल की सलाह के तौर पर नहीं लें। बीमारी या संक्रमण के लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूर लें। 



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गर्भ निरोधकों में पीपीआईयूसीडी महिलाओं का सबसे मन पसंद साधन

मथुरा : विश्व जनसंख्या दिवस पर आशा बहुओं द्वारा महिलाओं को गर्भ निरोधक साधन अपनाने की सलाह दी जा रही है। महिलाओं को वाॅस्केट आॅफ च्वाइस के जरिए सभी प्रकार के गर्भ निरोधक स्थाई व अस्थाई साधनों के बारे में बताया जा रहा है लेकिन सबसे ज्यादा सुलभ और सुविधाजनक साधन प्रसव उपरांत पीपीआईयूसीडी पसंद किया जा रहा है। पिछले वर्ष 2020-21 में ये साधन कुल संस्थागत प्रसव के सापेक्ष सिर्फ 17 फीसदी महिलाओं ने अपनाया था। इस वर्ष अप्रैल से जून माह तक कुल संस्थागत प्रसव के सापेक्ष 23 फीसदी यह साधन महिलाओं ने अपनाया है। इस वर्ष तीन माह में 1288 महिलाओं ने कापर-टी लगवायी है जबकि 875 महिलाओं ने तिमाही गर्भनिरोधक इंजेक्शन अंतरा लगवाया है। सीएमओ डाॅ. रचना गुप्ता ने बताया कि गर्भ निरोधकों में पीपीआईयूसीडी एक बढ़िया साधन है। यह बर्थ कंट्रोल के लिए काफी प्रभावी होता है। आमतौर पर इसका उपयोग अनचाहे गर्भ से बचने और दो बच्चों के बीच अंतर रखने के लिए किया जाता है। पीपीआईयूसीडी लगाने से 5 से 10 वर्षों तक गर्भवती न होने और टेंशन फ्री रहने में मदद मिलती है। ये पहला या दूसरा बच्चा होने के बाद प्रसव काल में लगाया जाता है। पीपीआईयूसीडी एक छोटा सा अंतगर्भाशयी उपकरण है, जो प्लास्टिक और तांबे से निर्मित होता है। इसे महिला के गर्भाशय में डाला जाता है। इसका टी आकार गर्भाशय में आसानी से फिट हो जाता है। पीपीआईयूसीडी स्त्रियों के गर्भाशय में बनने वाले अंडे को पुरुष के शुक्राणु से निषेचित होने नहीं देती है। टी के आकार का बना यह उपकरण कॉपर से चारों ओर लिपटा होता है। यह कॉपर गर्भाशय ग्रीवा और गर्भाशय के अन्य तरल पदार्थों के साथ मिलकर उसमें कॉपर की मात्रा को बढ़ा देता है। कॉपर की बढ़ी हुई मात्रा के कारण यह द्रव शुक्राणु नाशक के रूप में काम करती है।


लाभार्थी को मिलते हैं 300 रुपए

डीसीपीएम पारुल शर्मा बताती हैं कि इसमें लाभार्थी को दो बार फॉलो अप में 300 रुपये प्रदान किए जाते हैं। कापर-टी महिला को किसी भी समय लगाई जा सकती है जबकि पीपीआईयूसीडी महिला को प्रसव के उपरांत लगाई जाती है।



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68 वर्षीय कैंसर मरीज को दर्द से मिला निजात, कारगर साबित हुई नर्व फ्रीजिंग टेक्नोलॉजी

नई दिल्ली : दर्द का बना रहना कैंसर मरीजों के लिए एक बड़ी समस्या है, जिससे निजात दिलाने के लिए कई तरह की आधुनिक, परिष्कृत तकनीके ईजाद की गई हैं। इन्हीं में से एक तकनीक क्रायोएब्लेशन भी है। हाल ही में इसे भारत में उपलब्ध कराया गया और इस तकनीक के माध्यम से एक मरीज को तुरन्त दर्द से निजात दिलाने में कारगर साबित हुई है। दर्द से निजात दिलाने वाली इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य उन नसों को नियंत्रित तरीके से शून्य से 80 डिग्री तक नीचे के तापमान पर फ्रीज करते हुए निष्क्रिय कर देना है, जिनसे दर्द संबंधी संकेतों का प्रसारण होता है। दिल्ली निवासी 68 वर्षीय कैंसर मरीज रमाकांत (बदला हुआ नाम) जिन्हें दाहिनी ओर छाती, पेट और पीठ में पिछले दो सप्ताह से गंभीर दर्द की शिकायत थी। मरीज को दर्द के कारण सोने में भी काफी समस्या आती थी। हालांकि दिल्ली के अस्पताल में जब मरीज का सीने की सीटी स्कैन कराया गया तो पता चला कि दाहिने फेफड़े में मांस इतना बढ़ गया था कि रीढ़ तक पहुंचने वाली नसों के स्थान पर फैल चुका था। रमाकांत का गुर्दा बुरी तरह खराब होकर आखिरी चरण में पहुंच चुका था। इस स्थिति में ज्यादातर दर्दनिवारक दवाइयां निष्प्रभावी हो गई थीं, उन्हें दर्द से निजात दिलाने की चुनौती तब और बढ़ गई जब उन्हें दाखिल करने के बाद ब्रेन स्ट्रोक का दौरा पड़ गया। दिल्ली साकेत स्थित मैक्स अस्पताल के पेन मैनेजमेंट के प्रमुख डॉ आमोद मनोचा ने बताया, फेफड़े के मांस से दबी उनकी नसों का क्रायोएब्लेशन किया गया। अल्ट्रासाउंड और एक्सरे के जरिये उन दबी हुई नसों को पहचान कर लक्षित किया गया। क्रायोएब्लेशन उपचार के बाद उनके दर्द में बहुत कमी आ गई। डॉ आमोद मनोचा ने कहा,गंभीर दर्द से बहुत हद तक आराम मिला और दर्द के कारण जो मरीज सो या लेट नहीं सकता था, उसका दर्द कुछ ही घंटे में छूमंतर हो गया। दरअसल क्रायोएब्लेशन तकनीक एक ऐसी न्यूनतम शल्यक्रिया है जिसमें मरीज को दर्द से निजात दिलाने के लिए कोई कट या चीरा नहीं लगाना पड़ता है। यह सुरक्षित और एक दिन की उपचार प्रक्रिया है जिसमें तत्काल और लंबे समय तक दर्द से निजात दिलाने की क्षमता होती है। यह प्रक्रिया विशेष जांच क्रायोप्रोब का इस्तेमाल करते हुए अपनाई जाती है। इसके लिए अल्ट्रासाउंड और एक्सरे इमेजिंग के इस्तेमाल से सही लोकेशन का पता लगाया जाता है। अस्पताल के अनुसार, क्रायोप्रोब एक खोखली सुई होती है जिसके जरिये जांच से सही स्थिति का पता लगा लेने के बाद नाइट्रस ऑक्साइड या कार्बन डाइऑक्साइड जैसे बहुत ठंडी गैस प्रवेश कराई जाती है। क्रायोप्रोब की नोक पर तापमान इतना कम रखा जाता है कि वहां आइस बॉल बन जाती है और इसे अल्ट्रासाउंड की मदद से देखा जा सकता है। इससे आसपास की नसें जम जाती हैं और मरीज का दर्द कम होने लगता है। दर्द कम होने के साथ ही मरीज की सामान्य गतिविधियां भी सुचारु हो गई, उसे दर्दनिवारक दवाइयां लेने की जरूरत भी कम हो गई और उसके अंगों की सामान्य गतिविधियां भी बढ़ गईं। कैंसर के दर्द के अलावा जोड़ों का दर्द और खासकर ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी से बचने वाले युवा मरीजों को दर्द से छुटकारा दिलाने और अन्य दर्द से निजात दिलाने में भी क्रायोएब्लेशन प्रक्रिया बहुत उपयोगी साबित हो सकती है।




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किडनी की बीमारी से बचना है तो अपनाएं संतुलित दिनचर्या

आज की दौड़-भाग भरी जिंदगी में लगभग सभी के लिए संतुलित दिनचर्या अपनाना मुश्किल हो गया है। ऐसे असंतुलन से ऊपरी तौर पर तो सभी खुद को स्वस्थ्य महसूस करते हैं, लेकिन आंतरिक स्तर पर व्यक्ति धीरे-धीरे बीमारियों से घिरने लगता है। जिंदगी और खानपान के इस असंतुलन से ज्यादातर लोगों में किडनी की बीमारियों की शिकायत सामने आ रही है।


चिकित्सकों की मानें तो संतुलित दिनचर्या अपनाए तो गुर्दे (किडनी) की बीमारियों से बचा जा सकता है। बीमारी के प्रति जागरूकता लाने हर साल मार्च के हर दूसरे बृहस्पतिवार को विश्व गुर्दा दिवस मनाया जाता है। इस बार यह 12 मार्च को है। शुरुआती दौर में जांच और प्रबंधन से बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है और ऐसे में इलाज के परिणाम भी अच्छे आते हैं।


साइलेंट शुरूआत


गुर्दा खराब होने के शुरुआती चरण में कोई भी लक्षण सामने नहीं आता है। यह साइलेंट रहता है। यही वह चरण होता है जब बीमारी का इलाज पूरी तरह संभव होता है, ऐसे में शुरुआती दौर में जांच और इलाज बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर इसका वक्त पर इलाज नहीं किया गया तो आगे चलकर किडनी फेल हो सकती है। कई मामलों में इसके लक्षण भी देखे गए हैं। इनमें पेशाब में खून आना, पैरों व आखों में सूजन आना, शीघ्र थकान महसूस होना, ब्लड प्रेशर अनियंत्रित होना जैसे लक्षण शामिल हैं।


ब्लड प्रेशर और शुगर मरीज रखें खास ध्यान


डॉ. विनाद बलेचा बताते हैं कि शरीर में दो गुर्दे होते है, जो रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ पेट के पिछले भाग में होते है। मूल रूप से गुर्दे हमारे शरीर में उत्पन्न हुए जहर को बाहर निकालकर खून की सफाई का काम करते है। आज जबकि रक्तचाप यानी ब्लड प्रेशर और शूगर की बीमारी बढ़ रही है तो उससे गुर्दो के लिए भी परेशानी बढ़ गई है। इन दोनों रोगों का गुर्दो पर सबसे ज्यादा विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में जब गुर्दे ठीक से काम नहीं करेंगे तो इससे शरीर में रोगों की संख्या भी बढ़ती जाती है। यदि शरीर में लगातार ऐसी स्थिति बनी रहती है तो एक समय के बाद गुर्दे काम करना बंद कर देते है। 


गुर्दे हमारे शरीर में फिल्टर का काम करते है। इससे शरीर में पानी व नमक की मात्रा नियंत्रित रहती है। गुर्दे फिल्टर के अलावा खून की कमी को भी दूर करते है और हड्डियों को मजबूत रखते है। यदि गुर्दो में दिक्कत होती है तो फिर शरीर के दूसरे अंग भी ठीक तरह से काम नहीं करते। ऐसे में ब्लड प्रेशर और शुगर के मरीजों को अपनी खास केयर करनी चाहिए। डॉ. विनीत चतुर्वेदी बताते हैं कि ऐसे लोग जिन्हें डायबीटीज, हाई ब्लड प्रेशर, एथरोस्क्लेरोटिक हार्ट डिजीज, पेरिफरल वस्कुलर डिजीज है और किडनी फेलियर का उनका पारिवारिक इतिहास है तो उनमें गुर्दा खराब होने का खतरा काफी ज्यादा रहता है।


समय-समय पर हो स्वास्थ्य की जांच


गुर्दे की बीमारी का शीघ्र पता चलने पर इसमें पूर्ण इलाज संभव है और बीमारी को बढने से रोका जा सकता है। इसलिए जरूरी है कि ब्लड प्रेशर व शूगर की नियमित जाच कराई जाए। खून की मात्रा और प्रोटीन की जांच के अलावा खून में यूरिया, किडनी की पथरी, रुकावट, गदूद व कैंसर की बीमारी की भी नियमित जाच कराई जानी चाहिए। ऐसे में समय रहते बीमारी के इलाज से आसानी से बचा जा सकता है।


करें बचाव


किडनी की बीमारी में समय रहते गुर्दा ट्रासप्लाट से नई जिंदगी भी शुरू हो सकती है, लेकिन बेहतर यही है कि व्यक्ति स्वयं बचाव के तरीकों पर ध्यान दें। डॉ. जे. एस. नामधारी ने बताया कि सतुंलित जीवन शैली में नियमित व्यायाम, रोजाना तीन से चार लीटर पानी पीना शामिल है। इसके अलावा धूम्रपान, शराब के सेवन और फास्ट फूड से बचें, खाने में नमक की मात्रा कम रखें, दर्द की गोलियों का अनावश्यक सेवन न करे, ब्लड प्रेशर व शूगर की नियमित जाच कराएं, 35 वर्ष की उम्र के बाद खून व पेशाब की जाच अवश्य कराएं।




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वैज्ञानिकों ने मोतियाबिंद की सरल, सस्ती और बिना ऑपरेशन के इलाज की विकसित की तकनीक

नई दिल्ली :  भारतीय वैज्ञानिकों ने मोतियाबिंद के इलाज की सरल, सस्ती और बिना ऑपरेशन के इलाज वाली तकनीक विकसित की है। यह तकनीक भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत आने वाले एक स्वायत्त संस्थान नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी) के वैज्ञानिकों की एक टीम ने गैर-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (गैर-दाहक या उत्तजेक दवा)-एनएसएआईडी एस्पिरिन से नैनोरोड डेवलप की है। यह एक लोकप्रिय दवा है जिसका उपयोग दर्द, बुखार, या सूजन को कम करने के लिए किया जाता है और यह मोतियाबिंद के खिलाफ एक प्रभावी गैर-आक्रामक छोटे अणु-आधारित नैनोथेरेप्यूटिक्स के रूप में भी पाया गया।

इस तरह हैं असरदार

जर्नल ऑफ मैटेरियल्स केमिस्ट्री बी में प्रकाशित उनका शोध एक सस्ते और कम जटिल तरीके से मोतियाबिंद को रोकने में मदद कर सकता है। उन्होंने स्व-निर्माण की एंटी-एग्रीगेशन क्षमता का उपयोग मोतियाबिंद के खिलाफ एक प्रभावी गैर-प्रमुख छोटे अणु-आधारित नैनोटेराप्यूटिक्स के रूप में किया है। एस्पिरिन नैनोरोड क्रिस्टलीय प्रोटीन और इसके विखंडन से प्राप्त विभिन्न पेप्टाइड्स के एकत्रीकरण को रोकता है, जो मोतियाबिंद बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वे जैव-आणविक संबंधों के माध्यम से प्रोटीन/पेप्टाइड के एकत्रीकरण को रोकते हैं, जो बीटा-टर्न जैसे क्रिस्टलीय पेप्टाइड्स की संरचना में बदल देते हैं, जो कॉइल्स (लच्छे) और कुंडल में अमाइलॉइड बनने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ये क्रिस्टलीन, और क्रिस्टलीन व्युत्पन्न पेप्टाइड समुच्चय के एकत्रीकरण को रोककर मोतियाबिंद बनने में रोकने के लिए पाए गए थे। उम्र बढ़ने के साथ और विभिन्न परिस्थितियों में, लेंस प्रोटीन क्रिस्टलीन समुच्चय नेत्र लेंस में अपारदर्शी संरचनाओं का निर्माण करता है, जो दृष्टि को बाधित करता है और बाद में मोतियाबिंद का कारण भी बनता है।



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