प्रभास ने अपनी फिल्म ‘दि राजा साब’ के प्रमोशन के दौरान इसके क्लाइमेक्स को बेहद विस्फोटक बताते हुए इसे मशीन गन की तरह लिखा हुआ कहा था। संभव है कि उन्हें पहले ही यह अंदाजा हो गया हो कि हॉरर–कॉमेडी–फैंटेसी के तौर पर प्रचारित यह फिल्म न तो डर पैदा कर पाती है और न ही हंसाने में सफल होती है। भावनात्मक पक्ष पूरी तरह नदारद है और कमजोर कहानी के चलते दर्शक फिल्म से जुड़ नहीं पाते।
कमजोर पटकथा के कारण प्रभास जैसे बड़े स्टार की मौजूदगी भी फिल्म को डूबने से नहीं बचा पाती। लेखक और निर्देशक मारुति ने धोखा, प्रतिशोध, रोमांस, भ्रम और दिमाग से खेलने जैसे तत्वों को मिलाकर एक ऐसा आइडिया गढ़ने की कोशिश की, जो कागजों पर रोमांचक लगता है, लेकिन पर्दे पर उसका असर नहीं दिखता। नतीजतन, यह फिल्म दर्शकों के धैर्य की कड़ी परीक्षा लेती है।
कहानी की बात करें तो इसकी शुरुआत एक वार्ड बॉय (सत्या) से होती है, जो अस्थियों से भरी हांडी लेकर एक सुनसान और रहस्यमयी हवेली में पहुंचता है। इसके बाद कहानी राजू (प्रभास) के जीवन में प्रवेश करती है, जो अल्जाइमर से पीड़ित अपनी दादी गंगा मां (जरीना वहाब) के साथ रहता है। गंगा को सिर्फ अपने पति कनकराजू (संजय दत्त) की याद है और उन्हें पूरा विश्वास है कि वह अभी जीवित हैं। दादी की जिद पर राजू अपने दादा की तलाश में निकलता है।
इस दौरान उसकी मुलाकात नन बेस्सी (निधि अग्रवाल) और भैरवी (मालविका मोहनन) से होती है। भैरवी के जरिए उसे पता चलता है कि उसके दादा नरसापुर के जंगलों में छिपे हैं। राजू अपने दोस्त और पुलिस कांस्टेबल अंकल (वीटीवी गणेश) के साथ रहस्यमयी हवेली पहुंचता है, जहां पहले से वार्ड बॉय कैद है। दादा कहां हैं, उन्होंने परिवार को क्यों छोड़ा और क्या राजू उन्हें दादी से मिला पाएगा—कहानी इन्हीं सवालों के जवाब तलाशती है।
मूल रूप से तेलुगु में बनी यह फिल्म हिंदी सहित अन्य भाषाओं में डब होकर रिलीज हुई है। दादी–पोते के रिश्ते से शुरू हुई कहानी बाद में दादा और पोते के बीच टकराव में बदल जाती है। हिप्नोटिज्म, प्रतिशोध और दुष्ट शक्तियों जैसे तत्वों को मिलाने के बावजूद कहानी अपने मूल मकसद तक पहुंचने में काफी वक्त लेती है। इंटरवल से पहले का हिस्सा बेवजह के रोमांस और खिंचे हुए दृश्यों से भरा है, जिससे दर्शक ऊबने लगते हैं।
मध्यांतर के बाद की कहानी लगभग पूरी तरह हवेली के भीतर सिमट जाती है, जहां न डर का एहसास होता है और न रोमांच का। खलनायक को दुष्ट तो बताया गया है, लेकिन उसकी क्रूरता पर्दे पर प्रभावी ढंग से सामने नहीं आती। भैरवी और उसके नाना का मकसद भी अधूरा लगता है। गाने कहानी में जबरन ठूंसे हुए प्रतीत होते हैं।
प्रभास भले ही फिल्म में स्टाइलिश नजर आते हैं, लेकिन उनके किरदार का लेखन बेहद कमजोर है। हिंदी डबिंग में कई जगह लिप-सिंक की समस्या खटकती है। मालविका मोहनन को एक्शन सीन जरूर मिले हैं, लेकिन उनका किरदार भी प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहता है। निधि अग्रवाल और रिद्धि कुमार केवल शोपीस बनकर रह जाती हैं। संजय दत्त ने खलनायक के रूप में ठीक-ठाक काम किया है, जबकि जरीना वहाब दादी के किरदार में न्याय करती हैं। बमन ईरानी की संक्षिप्त भूमिका असर नहीं छोड़ पाती।
तकनीकी पक्ष की बात करें तो फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर जरूरत से ज्यादा लाउड है। बप्पी लाहिड़ी के मशहूर गीत ‘नाचे-नाचे’ का रीमिक्स सतही लगता है। क्लाइमेक्स के कुछ दृश्य जरूर बेहतर बन पड़े हैं, लेकिन कहानी की बजाय ग्राफिक्स पर जरूरत से ज्यादा फोकस फिल्म को बेस्वाद बना देता है।
कुल मिलाकर, मारुति हॉरर, कॉमेडी, फैंटेसी और इमोशन के बीच संतुलन बनाने में असफल नजर आते हैं। क्लाइमेक्स को छोड़ दिया जाए तो फिल्म में ऐसा बहुत कम है जो देर तक याद रह सके। अंत में पार्ट-2 का संकेत दिया गया है, लेकिन बेहतर होता कि मेकर्स पहले इसी फिल्म को मजबूती से पूरा करते।
