केरल चुनाव 2026: अबकी बार गठबंधन नहीं

केरल में विधानसभा चुनाव अब कुछ ही महीने दूर हैं और सियासी सरगर्मी तेज हो चुकी है। सवाल यही है कि क्या पिनराई विजयन के नेतृत्व वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटकर इतिहास रचेगा, या फिर कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) नेतृत्व की स्पष्टता और जमीनी सक्रियता के दम पर वापसी करेगा। नगर निकाय चुनावों में वोट शेयर बढ़ाने वाली भाजपा की मौजूदगी भी कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकती है।

एलडीएफ अपनी सरकार के कामकाज—कल्याणकारी योजनाएं, आधारभूत ढांचे का विकास और संकट प्रबंधन—को चुनावी मुद्दा बना रहा है। विजयन गठबंधन का सबसे बड़ा चेहरा हैं। फ्रंट के संयोजक टी.पी. रामकृष्णन का कहना है कि मुकाबला कड़ा है और जनता विकास कार्यों पर फैसला करेगी। वहीं एम. स्वराज का मानना है कि चुनौती प्रदर्शन का बचाव नहीं, बल्कि मतदाताओं को निरंतरता का महत्व समझाना है। हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि विजयन के बाद राज्यव्यापी अपील वाले दूसरे पंक्ति के नेता की कमी एलडीएफ के लिए चुनौती बन सकती है।

यूडीएफ में वर्षों की गुटबाजी के बाद एकजुटता का दावा किया जा रहा है। विपक्ष के नेता वीडी सतीशन के नेतृत्व में कांग्रेस अधिक संगठित नजर आ रही है। सतीशन का कहना है कि राज्य राजनीतिक पुनर्संरचना के लिए तैयार है और जनता जवाबदेही व पारदर्शिता चाहती है। यूडीएफ का जोर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने के साथ खुद को भरोसेमंद विकल्प के रूप में पेश करने पर है।

भाजपा नीत एनडीए दीर्घकालिक रणनीति के तहत शहरी क्षेत्रों में आधार मजबूत करने और वोट प्रतिशत बढ़ाने पर फोकस कर रही है। ईसाई समुदाय तक पहुंच बनाने की कोशिशें भी तेज हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि भले ही सीटें सीमित हों, लेकिन वोट शेयर में बढ़ोतरी कई सीटों के समीकरण बदल सकती है। ऐसे में संकेत साफ हैं कि इस बार चुनाव लहर के बजाय सीट-दर-सीट कड़े मुकाबले और छोटे-छोटे वोट शिफ्ट पर तय होगा।