क्यों मिलती है मंदिर जाने से अद्भुत शांति? जानिए क्या है इसके पीछे वैज्ञानिक, वास्तुकला एवं आध्यात्मिक रहस्य ?

उपभोक्ता जनघोष:जब कभी जीवन में कुछ समझ नहीं आता और संघर्षों से मन हारता जाता है तो कदम खुद ब खुद मंदिर की ओर चल पड़ते हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि परेशानियों के झंझट में लड़खड़ाता मन मंदिर में जाकर क्यों स्थिर हो जाता है।  

आइए जानते है कुछ मुख्य बिंदु  

सबसे पहले दर्शन और पूजन का वैज्ञानिक स्वरूप बताया। उन्होंने कहा कि हमारे देश में प्राचीन मंदिर धरती के धनात्मक यानी पॉजिटिव ऊर्जा केंद्रों पर बनाये गए हैं। ये मंदिर आकाशीय ऊर्जा के ग्रिड हैं। भक्त मंदिर में नंगे पैर होता है। इससे उसके शरीर में अर्थ प्रवाहित होने लगता है। जब हाथ जोड़ता है तो शरीर का ऊर्जा चक्र चलने लगता है। देव प्रतिमा के आगे सिर झुकाता है तो प्रतिमा से परावर्तित होने वाली पृथ्वी व आकाशीय तरंगे मस्तक पर पड़ती हैं और मस्तक पर स्थित आज्ञा चक्र पर प्रभाव डालती है। जिससे सकरात्मक विचार आते हैं। भक्त अपने अंदर एक विशेष ऊर्जा और हल्केपन तथा शांति का अनुभव करने लगता है।।

मंदिर के शिखर का भी विशेष महत्व होता है। मंदिर के शिखर की भीतरी सतह से ऊर्जा ध्वनी एवं तरंगें टकरा कर  मनुष्य को प्रभावित करती हैं। ये परावर्तित तरंगें मानव तन की प्राकृतिक आवृति बनाये रखने में भी सहायक सिद्ध होती है।  ध्वनि, प्रकाश, वायु आदि सभी मे तरंगें होती हैं। कोई भी तरंग सीधी रेखा में नही चलती सभी की अपनी आवृति होती है। विस्फोट होता है। ये जितनी अधिक शक्तिशाली होगी उसका उतना ही अधिक क्रिया क्षमता पर असर पड़ेगा। मन्दिरों में शंख, घण्टे और मन्त्रों की ध्वनि में एक विशेष आवृति बनती है। वह दैवीय ऊर्जा होती है जो हमें मानसिक शारीरिक और आत्मिक रूप से दृढ़ बनाती है।

वही देखा जाये तो हमारे देश में मंदिरों के गुंबद पिरामिड के आकार जैसे होते हैं। जो कास्मिक ऊर्जा के संपर्क में रहते हैं। प्रतिमा का सीधा संबंध उस ऊर्जा से सदा बना रहता है। जब भक्त प्रतिमा के समक्ष जाता है तो उसका ब्रेन कास्मिक वेव के संपर्क में आ जाता है और ब्रेन यानी मस्तिक के न्यूरॉन्स विशेष प्रकार से सक्रिय होने लगते हैं। उस समय भक्त प्रतिमा के सामने जो भी प्रार्थना करता है उसका फल उसे अवश्य मिलता है। प्रार्थना जितनी गहन होगी उतनी ही जल्दी फलित भी होती है।

वही अगर मंदिर के द्वार की बात करे तो   मंदिर और गर्भ गृह का द्वार बड़ा नहीं होना चाहिए । बस एक ही भक्त एक बार मे प्रवेश कर सके, इस शिल्प से द्वार इसीलिए  बनाये जाते थे जिससे  कास्मिक ऊर्जा का संतुलन बना रहे। उसी प्रकार मंदिर की चौखट का महत्व है। मंदिर का चौखट सामान्य चौखट से ऊंची और चौड़ी होती है। यह पत्थर, लकड़ी आदि की होती है उस पर सोने, चांदी, पीतल आदि से कवर किया जाता है इसलिए कि मंदिर की दिव्य ऊर्जा बाहर विकीर्ण न हो सके। मंदिर की ऊर्जा मंदिर के अंदर ही रहे। इसके पीछे आध्यात्मिक रहस्य भी है। चौखट पर भगवान नर सिंह का वास माना जाता है इसलिए उसे स्पर्श कर सिर पर लगाना या सिर से स्पर्श करना चाहिए। मंदिर में प्रवेश करते समय पैर चौखट से स्पर्श न हो। मंदिर की चौखट लाल या पीले रंग से रंगी जाती है। उसके दोनों तरफ तीन रंग की धारियां होती है। लाल पीला और सफेद यह सत्व रज और तम का प्रतीक हैं।