
नई दिल्ली: जाने आलम (जानू चौधरी) भारतीय राजनीति में एक दौर था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को 'नसीब वाला' बताकर विरोधियों पर तंज कसते थे। साल 2015 के दिल्ली चुनाव में उन्होंने गरजते हुए कहा था, "अगर मोदी की किस्मत से पेट्रोल-डीजल के दाम कम होते हैं, तो बदनसीबों को क्यों लाना?" लेकिन आज, जब 2026 के वैश्विक समीकरण बदल रहे हैं और कच्चा तेल $100 के पार गोते लगा रहा है, तो सवाल यह है: क्या अब 'किस्मत' बदल गई है या फिर जनता को 'ग्रैब' (संबोधित) करने की उनकी कला इस आग को भी ठंडा कर देगी?
1. किस्मत का 'क्रूड' कनेक्शन: तब और अब
2014 में सत्ता संभालते ही मोदी सरकार को वैश्विक बाजार से एक बड़ा 'गिफ्ट' मिला था। कच्चे तेल की कीमतें औंधे मुंह गिरी थीं। उस वक्त सरकार ने गिरती कीमतों का पूरा फायदा जनता को देने के बजाय एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर अपना खजाना भरा। तर्क दिया गया कि यह पैसा बुनियादी ढांचे और विकास में लग रहा है।
तब का नैरेटिव: "मोदी भाग्यशाली हैं, इसलिए देश का भला हो रहा है।"
अब की हकीकत: 2026 में मध्य-पूर्व (इजरायल-ईरान संघर्ष) के तनाव और सप्लाई चेन की बाधाओं ने कच्चे तेल को फिर से महंगा कर दिया है। अब जब कीमतें बढ़ रही हैं, तो 'किस्मत' वाला तर्क सरकार के लिए गले की हड्डी बनता दिख रहा है।
2. जनता को 'ग्रैब' करने की मास्टरक्लास
विपक्ष का आरोप है कि मोदी जी आपदा को भी 'इवेंट' बनाने में माहिर हैं। जब तेल महंगा होता है, तो सरकार के पास तर्क तैयार होते हैं:
रूस-यूक्रेन या मध्य-पूर्व का युद्ध: ग्लोबल परिस्थितियों को ढाल बनाना।
डायवर्सिफिकेशन का कार्ड: हम अब 27 नहीं, बल्कि 41 देशों से तेल खरीद रहे हैं।
राष्ट्रवाद और भविष्य: "हम आज महंगा तेल सह रहे हैं ताकि भविष्य में सौर ऊर्जा और हाइड्रोजन में आत्मनिर्भर बन सकें।"
"क्या यह सिर्फ संयोग है कि चुनाव आते ही तेल की कीमतें स्थिर हो जाती हैं और चुनाव खत्म होते ही 'वैश्विक दबाव' हावी हो जाता है?" — यह सवाल आज हर नुक्कड़ पर गूंज रहा है।
3. अब किसकी किस्मत?
अगर कच्चा तेल सस्ता होना मोदी की किस्मत थी, तो अब महंगा होना किसकी किस्मत मानी जाए?
- जनता की बदकिस्मती? क्योंकि अंततः बोझ आम आदमी की जेब पर ही पड़ता है।
- विपक्ष के लिए मौका? जो लंबे समय बाद महंगाई को एक धारदार हथियार की तरह इस्तेमाल कर पा रहा है।
- तेल कंपनियों का 'कुशन': सरकार अब तेल कंपनियों को घाटा सहने या 'कुशन' इस्तेमाल करने का निर्देश दे रही है ताकि आम जनता का गुस्सा सीधे प्रधानमंत्री तक न पहुंचे।
निष्कर्ष: ब्रांड मोदी बनाम महंगाई की आग
मोदी की राजनीति का सबसे बड़ा मंत्र है—'नैरेटिव मैनेजमेंट'। वे जानते हैं कि जब आर्थिक आंकड़े खिलाफ हों, तो भावनाओं का सहारा कैसे लिया जाता है। लेकिन 2026 का भारत बदल रहा है। ₹100 से ऊपर का पेट्रोल अब सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि मध्यम वर्ग का दर्द है।
अब देखना यह है कि क्या प्रधानमंत्री अपनी पुरानी 'किस्मत' को फिर से जगा पाएंगे, या इस बार 'महंगा तेल' उनके अभेद्य राजनीतिक दुर्ग में सेंध लगा देगा। By jane Aalam (Janu choudhary)