रूस ने 4 महीने के लिए पेट्रोल निर्यात रोका

रूस ने 1 अप्रैल से 31 जुलाई तक पेट्रोल निर्यात पर रोक का फैसला किया है। उप-प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने ऊर्जा मंत्रालय से इस प्रस्ताव को तैयार करने को कहा। रूस के मुताबिक यह कदम घरेलू सप्लाई बनाए रखने और कीमतें नियंत्रित रखने के लिए है।

नोवाक ने कहा कि मिडिल ईस्ट में चल रहे इजराइल-ईरान जंग की वजह से ग्लोबल तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्शन बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। इससे कीमतों में उतार-चढ़ाव हो रहा है। रूस रोजाना 1.2 से 1.7 लाख बैरल पेट्रोल निर्यात करता है।

इस फैसले से चीन, तुर्किये, ब्राजील, अफ्रीका और सिंगापुर प्रभावित हो सकते हैं। ये देश रूसी तेल उत्पादों के बड़े खरीदार हैं। भारत पर असर कम होगा क्योंकि वह पेट्रोल नहीं, कच्चा तेल खरीदता है।

पहले भी पेट्रोल एक्सपोर्ट पर रोक लगाई गई थी

मॉस्को में शुक्रवार को पेट्रोल एक्सपोर्ट के बैन को लेकर बैठक हुई थी। इसमें खासतौर पर यह जोर दिया गया कि राष्ट्रपति पुतिन ईंधन कीमतें नियंत्रित रखना चाहते हैं।

मंत्री नोवाक ने बैठक में कहा कि पेट्रोल-डीजल का पर्याप्त स्टॉक है और रिफाइनरियां पूरी क्षमता से काम कर रही हैं। तेल कंपनियों ने कहा कि पेट्रोल-डीजल का पर्याप्त स्टॉक है और रिफाइनरियां पूरी या उससे अधिक क्षमता पर काम कर रही हैं, जिससे जरूरत पूरी हो रही है।

रूस पहले भी कीमत नियंत्रण और घरेलू सप्लाई के लिए पेट्रोल-डीजल निर्यात पर रोक लगा चुका है। पिछले साल भी ऐसा हुआ था, जब यूक्रेन हमलों से रिफाइनरियां प्रभावित हुई थीं।

इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, रूस ने पिछले साल करीब 50 लाख मीट्रिक टन पेट्रोल एक्सपोर्ट किया था, यानी हर दिन लगभग 1.17 लाख बैरल के बराबर है।

एक दिन पहले ही नोवाक ने कहा था कि जरूरत पड़ी तो रूस फिर से तेल निर्यात पर रोक लगा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि रूस का यूराल्स तेल और दूसरे तेल उत्पाद इन दिनों ब्रेंट क्रूड के बराबर या उससे भी महंगे दाम पर बिक रहे हैं।

रूस के फैसले का भारत पर कितना असर

एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत सीधेतौर पर पेट्रोल जैसे तैयार ईंधन पर ज्यादा निर्भर नहीं है, बल्कि कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) पर निर्भर है। क्रूड ऑयल को ही रिफाइन कर पेट्रोल और डीजल बनाए जाते हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 80% कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से लगभग 20% रूस से आता है।

भारत बहुत कम मात्रा में पेट्रोल या अन्य तैयार ईंधन आयात करता है। इसके बजाय देश अपने बड़े रिफाइनरी नेटवर्क के जरिए कच्चे तेल को खुद प्रोसेस करता है। यही वजह है कि रूस के पेट्रोल निर्यात पर लगी रोक का भारत पर सीधा असर पड़ने की संभावना बहुत कम है।

भारत रोजाना करीब 56 लाख बैरल कच्चा तेल रिफाइन करता है। यह न सिर्फ अपनी घरेलू जरूरत पूरी करता है, बल्कि तैयार ईंधन का निर्यात भी करता है।

हालांकि एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि रूस के फैसले से अगर वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। पहले से ही जंग के कारण तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं।

क्रूड से 15 डॉलर तक महंगा मिल रहा रूसी तेल

इधर, इजराइल-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। इससे निपटने के लिए भारतीय रिफाइनर्स ने रूस से भारी मात्रा में तेल खरीदने का फैसला किया है। अप्रैल महीने की डिलीवरी के लिए भारत ने रूस से लगभग 60 मिलियन यानी 6 करोड़ बैरल कच्चे तेल का सौदा किया है।

जो रूसी तेल कभी भारत को भारी डिस्काउंट पर मिलता था, अब उसके लिए प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये सौदे ब्रेंट क्रूड की कीमतों पर 5 से 15 डॉलर प्रति बैरल के प्रीमियम (अतिरिक्त कीमत) पर बुक किए गए हैं। सप्लाई की कमी और मांग ज्यादा होने की वजह से कीमतों में यह उछाल देखा जा रहा है।

दरअसल, भारत की इस खरीदारी के पीछे अमेरिका की दी गई छूट का बड़ा हाथ है। अमेरिका ने भारत को उन रूसी तेल कार्गो को लेने की अनुमति दी है, जो 5 मार्च से पहले जहाजों पर लोड हो चुके थे। बाद में इस छूट का दायरा बढ़ाकर 12 मार्च कर दिया गया।


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United States ने Iran पर 850 टॉमहॉक मिसाइलें दागीं: मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव

ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका ने बड़े पैमाने पर टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया। इसे अमेरिकी हथियारों के जखीरे का अहम हथियार माना जाता है।

वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक चार हफ्तों में 850 से ज्यादा मिसाइलें दागी गईं। अनुमान है कि अमेरिकी नौसेना के पास लगभग 4,000 टॉमहॉक मिसाइलें थीं।

अगर यह सही है तो टॉमहॉक मिसाइलों का करीब एक चौथाई हिस्सा खत्म हो चुका है। रक्षा मंत्रालय के भीतर इसको लेकर चिंता बढ़ गई है। एक टॉमहॉक बनाने में करीब 2 साल लग सकते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार कमी पूरी करने में कई साल लगेंगे।

अमेरिका के पास करीब 4000 टॉमहॉक मिसाइलें

टॉमहॉक अमेरिका की खास क्रूज मिसाइल है। यह 1,000 मील (1609 किमी) तक उड़कर 1,000 पाउंड (453 किलो) विस्फोटक सटीक निशाने पर गिरा सकती है। इसके एडवांस वर्जन की रेंज 2500 किमी है।

टॉमहॉक का बड़े पैमाने पर पहला इस्तेमाल 1991 के खाड़ी युद्ध में हुआ। अमेरिका ने इराक पर दूर से सैकड़ों मिसाइलें दागीं। इसे रिमोट वार कहा गया, क्योंकि पहली बार इतनी सटीक और लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें इस्तेमाल हुईं।

टॉमहॉक को समुद्र में मौजूद युद्धपोतों और पनडुब्बियों से भी दागा जा सकता है, जिससे दुश्मन के इलाके में घुसे बिना हमला संभव हो जाता है। अमेरिका बीते एक महीने से ईरान पर हमले कर रहा है। यह पूरी तरह ‘स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक’ है। यानी हमला इतनी दूर से किया गया कि अमेरिकी सैनिकों को जमीन पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ रही है।

एक्सपर्ट्स के अनुमान के मुताबिक अमेरिका के पास फिलहाल 4000 के करीब टॉमहॉक मिसाइलें हैं। यूरोप, मिडिल ईस्ट और एशिया में बढ़ते खतरों के बीच अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को टॉमहॉक मिसाइलों की बहुत जरूरत है।

अगर युद्ध लंबा चला, तो अमेरिका के पास अपने उपयोग के लिए भी टॉमहॉक खत्म हो सकते हैं, सहयोगियों को देना मुश्किल होगा।

एक साल में 600 टॉमहॉक मिसाइल बनाता है अमेरिका

अमेरिका टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का उत्पादन बहुत सीमित मात्रा में करता है। मौजूदा क्षमता के मुताबिक एक साल में करीब 600 टॉमहॉक मिसाइलें बनाई जा सकती हैं।

एक टॉमहॉक की लागत करीब 36 लाख डॉलर (34 करोड़ रुपए) है, जिससे तेज इस्तेमाल ने सप्लाई पर दबाव बढ़ाया है।

समस्या यह है कि एक टॉमहॉक बनने में लगभग 2 साल लगते हैं, इसलिए ऑर्डर के बाद तुरंत उपलब्ध नहीं होती।

यही वजह है कि जब युद्ध में इनका तेजी से इस्तेमाल होता है, जैसे अभी ईरान संघर्ष में हुआ, तो स्टॉक जल्दी घट जाता है और उसे भरने में कई साल लग सकते हैं।

जापान के साथ मिसाइल बनाने की डील अटकी

2024 में टॉमहॉक की कमी का समाधान दिखा, जब अमेरिका जापान में जॉइंट प्रोडक्शन के करीब पहुंचा, जिससे उत्पादन दोगुना हो सकता था।

प्लान यह था कि जापान, अमेरिका के लिए टॉमहॉक मिसाइल के कुछ हिस्से का उत्पादन करे। इसका फायदा दोनों देशों को मिलता। जापान अपनी रक्षा नीति में बदलाव कर रहा है और लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। यही वजह है कि उसने मिसाइल बनाने में मदद करने की हामी भरी।

हालांकि अमेरिका ने इस साझेदारी के लिए कई सख्त शर्तें रखी थीं। जैसे कि

मिसाइलों की तकनीक और डिजाइन पर पूरा कंट्रोल अमेरिका का रहेगा

जापान इन मिसाइलों को बिना अमेरिका की मंजूरी के किसी तीसरे देश को नहीं बेच सकेगा

इनका इस्तेमाल भी तय नियमों और शर्तों के तहत ही होगा

संवेदनशील तकनीक के ट्रांसफर को सीमित रखा जाएगा

हालांकि अमेरिका के अंदर ही इस डील का विरोध शुरू हो गया। दोनों ही पार्टी में कई नेताओं और विशेषज्ञों को डर था कि एडवांस्ड मिसाइल टेक्नोलॉजी विदेश में शेयर करना जोखिम भरा हो सकता है। टोमहॉक बनाने वाली कंपनी RTX के एक सीनियर अधिकारी ने भी इस विरोध में साथ दिया।

यह भी चिंता थी कि इससे अमेरिका की रक्षा इंडस्ट्री को नुकसान होगा और देश की इकोनॉमी पर भी असर पडे़गा। इस वजह से यह योजना पूरी तरह लागू नहीं हो पाई और मामला अटका गया।

अमेरिका से 6 गुना तेज हथियार बना रहा चीन

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक यह मामला अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा की बड़ी समस्या दिखाता है। वह अकेले चीन की बढ़ती औद्योगिक क्षमता का मुकाबला नहीं कर पा रहा, जो अब सैन्य शक्ति में बदल रही है।

चीन वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का 28% और अमेरिका 17% हिस्सेदारी रखता है। अनुमान है कि चीन 5-6 गुना तेजी से एडवांस हथियार हासिल कर रहा है।

चीन का एक शिपयार्ड अमेरिका के सभी शिपयार्ड्स से ज्यादा जहाज बना सकता है।

अमेरिका को चीन से पिछड़ने का खतरा

अब अमेरिका को यह खतरा है कि वह इतिहास में ब्रिटेन, जर्मनी और जापान की तरह किसी उभरती औद्योगिक ताकत से सैन्य रूप से पिछड़ जाए। इतिहास बताता है कि ऐसी प्रतिस्पर्धाओं अक्सर विनाशकारी युद्धों में खत्म होती हैं।

समाधान यह है कि अमेरिका अकेले नहीं, बल्कि जापान, दक्षिण कोरिया, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर चीन का मुकाबला करे।

काफी समय तक कई सहयोगी देश अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका पर छोड़ते रहे। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसे ‘फ्री राइडिंग’ कहा था। ये देश अपनी अर्थव्यवस्था का बहुत छोटा हिस्सा रक्षा पर खर्च करते थे और अमेरिका पर निर्भर रहते थे।

ट्रम्प अक्सर फ्री राइडर्स के खिलाफ सख्ती का श्रेय लेते हैं। पिछले 60 सालों में अमेरिका ने अपनी जीडीपी का 3 से 9.4 प्रतिशत तक रक्षा पर खर्च किया है, जबकि कई सहयोगी देशों का खर्च 1 प्रतिशत से भी कम रहा है।

अब एशिया में चीन की बढ़ती आक्रामकता और यूरोप में रूस की जंगबाजी को देखते हुए यह व्यवस्था अब टिकाऊ नहीं रही। अब अमेरिका को दुनिया में अपनी भूमिका और गठबंधनों को नए सिरे से सोचना होगा, क्योंकि अब वह अकेला सबसे ताकतवर देश नहीं रहा।


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अमेरिका में एयरपोर्ट हादसे में 2 पायलटों की मौत

अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित ला गार्डिया एयरपोर्ट पर बड़ा विमान हादसा हो गया, जहां रनवे पर एयर कनाडा एक्सप्रेस का विमान ट्रक से टकरा गया। इस हादसे में विमान में सवार 100 से अधिक यात्रियों के घायल होने की भी खबर है।

अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस विमान हादसे में पायलट और सह-पायलट की मौत हो गई। घटना की शुरुआती जांच में सामने टक्कर से कुछ पल पहले ही पायलट और वाहन चालक दोनों को रुकने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद हादसा नहीं टल सका। 

सभी प्लेन को किया गया ग्राउंडेड

फ्लाइट-ट्रैकिंग वेबसाइट FlightRadar24 ने एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि हवाई अड्डे पर लोगों को निकालने के लिए राहत बचाव का कार्य जारी है। घटना के तुरंत बाद अमेरिकी फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) ने सुरक्षा कारणों से हवाई अड्डे पर सभी उड़ानों के लिए 'ग्राउंड स्टॉप' जारी कर दिया है। यानी सभी उड़ानों पर रोक लगा दी गई है।

बार-बार रुकने का दिया था निर्देश

 अधिकारियों ने इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। जांच के दौरान सामने आई ऑनलाइन ऑडियो रिकॉर्डिंग और शुरुआती फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा से पता चलता है कि टक्कर होने से कुछ क्षण पहले एयर ट्रैफिक कंट्रोल ने बार-बार विमान के पायलट और ट्रंक ड्राइवर को रुकने का निर्देश दिया था।

लेकिन इसके बावजूद ट्रंक ड्राइवर और विमान पायल कंट्रोल नहीं कर पाए और यह हादसा हो गया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में विमान का अगला हिस्सा हवा में उठा हुआ नजर आ रहा है, जिससे टक्कर की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

पांच दमकलकर्मी गंभीर रूप से घायल

न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, न्यूयॉर्क फायर डिपार्टमेंट ने कहा है कि इस घटना कम से कम पांच दमकलकर्मी (फायर फाइटर्स) गंभीर रूप से घायल हुए हैं। वहीं, विमान में सवार 100 से अधिक यात्रियों के घायल होने की भी खबर है। एयरक्राफ्ट रेस्क्यू एंड फायरफाइटिंग (ARFF) की टीमें घटनास्थल पर तैनात हैं।



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युद्ध के बीच तेल-गैस से ईरान की रिकॉर्ड कमाई

अमेरिका-इजराइल के साथ जंग को ईरान ने एक मौके में बदल दिया है। अमेरिका ने खार्ग आइलैंड के पास सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, लेकिन ग्लोबल ऑयल संकट के डर से तेल टर्मिनल को सीधे निशाना नहीं बनाया। इसी का फायदा उठाते हुए ईरान ने खार्ग टर्मिनल चालू रखा और ‘घोस्ट फ्लीट’ के जरिए चीन को सप्लाई जारी रखी है।

International Energy Agency और S&P Global के मुताबिक, ईरान रोजाना 1.7 से 2 मिलियन (17 से 20 लाख) बैरल तेल एक्सपोर्ट कर रहा है। देश के करीब 90% तेल का एक्सपोर्ट अभी भी खार्ग टर्मिनल से हो रहा है।

साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमले से एक्सपोर्ट प्रभावित हुआ, लेकिन गैस सप्लाई पूरी तरह बंद नहीं हुई। रिपोर्ट है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले विदेशी जहाजों से ईरान करीब 16.5 करोड़ रुपए प्रति जहाज ‘वॉर टैक्स’ भी वसूल रहा है।

खाड़ी देशों का प्रोडक्शन 70% तक गिरा

ईरान की होर्मुज स्ट्रेट पर पकड़ और लगातार हमलों के कारण सऊदी अरब, कतर, इराक, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों की सप्लाई प्रभावित हुई है। सुरक्षित समुद्री रास्तों की कमी, बढ़ते हमले और लॉजिस्टिक्स दिक्कतों के चलते इन देशों का कुल उत्पादन 70% तक गिर गया है।

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध का सबसे सीधा असर कच्चे तेल पर पड़ा है। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड 3.26% की उछाल के साथ 112.19 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जो जुलाई 2022 के बाद का सबसे उच्चतम स्तर है।

अगर तेल की कीमतें 100 डॉलर के ऊपर बनी रहती हैं, तो इसका असर भारत में महंगाई पर पड़ेगा, जो बाजार के लिए अच्छा नहीं है।

होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से इन पांच देशों की सप्लाई पर असर…

सऊदी अरब – दुनिया का सबसे बड़ा तेल एक्सपोर्टर सऊदी अरब प्रोडक्शन बनाए रखने में संघर्ष कर रहा है। तेल का प्रोडक्शन 1 करोड़ बैरल/दिन से घटकर 80 लाख बैरल/दिन रह गया है। ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए यनबू तक तेल पहुंचाया जा रहा है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से स्टोरेज टैंक भर गए हैं, जिससे अरामको को कई कुएं अस्थायी रूप से बंद करने पड़े।

कतर – कतर दुनिया की 20% LNG जरूरतें पूरी करता है। अब कतर की रास लफान गैस फैसिलिटी पर हमलों के बाद ‘फोर्स मेज्योर’ लागू किया गया है, यानी सप्लाई की गारंटी नहीं है। देश की LNG एक्सपोर्ट क्षमता 17% घट गई है और टैंकर बंदरगाहों पर खड़े हैं, जिससे वैश्विक कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।

इराक – इराक में BP, Eni और TotalEnergies जैसी विदेशी कंपनियों ने स्टाफ वापस बुला लिया है। होर्मुज के रास्ते बंद होने से प्रोडक्शन 43 लाख से गिरकर 13 लाख बैरल/दिन रह गया है। करीब 70% गिरावट आई है। वैकल्पिक पाइपलाइन नहीं होने से स्टोरेज भर गए, जिससे ‘वेस्ट कुरना’ और ‘मजनून’ जैसे बड़े फील्डों में काम रोकना पड़ा।

कुवैत – कुवैत पूरी तरह होर्मुज पर निर्भर है। नाकेबंदी और ‘वॉर टैक्स’ के कारण निर्यात लगभग ठप हो गया है। प्रति जहाज 16.5 करोड़ वसूली और इंश्योरेंस संकट से निर्यात लगभग जीरो पर पहुंच गया। कुओं में दबाव बढ़ने से 50% उत्पादन बंद करना पड़ा।

UAE – अबू धाबी-फुजैराह पाइपलाइन फुल कैपेसिटी से चल रही है, लेकिन कुल डिमांड काफी ज्यादा है। बाकी तेल होर्मुज में फंसा है। ईरानी हमलों के कारण जहाजों का बीमा प्रीमियम 400% तक बढ़ गया है, जिससे व्यापार महंगा हो गया है और फुजैराह पोर्ट पर गतिविधि कम हुई है।

अमेरिका की ईरानी तेल खरीद पर 30 दिन की छूट

ग्लोबल ऑयल और एनर्जी मार्केट में बढ़ती महंगाई से अमेरिका भी परेशान है। महंगाई काबू करने के लिए उसने 20 मार्च को ईरानी तेल की खरीद पर प्रतिबंधों में 30 दिन की छूट दी है। यह छूट सिर्फ समुद्र में मौजूद ईरानी तेल के टैंकरों की खरीद के लिए है।

अमेरिकी ट्रेजरी मिनिस्टर स्कॉट बेसेंट ने इसकी घोषणा की थी। ट्रेजरी विभाग की वेबसाइट के मुताबिक यह छूट 20 मार्च से 19 अप्रैल के लिए है।

स्कॉट बेसेंट ने कहा कि दुनिया के लिए इस मौजूदा सप्लाई को अस्थायी रूप से खोलकर ग्लोबल मार्केट में लगभग 14 करोड़ बैरल तेल तेजी से आएगा। इससे दुनियाभर में ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ेगी और सप्लाई पर बने अस्थायी दबाव को कम करने में मदद मिलेगी।


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अमेरिका ने ईरान के तेल की खरीद पर 30 दिन की छूट दी

ट्रम्प प्रशासन ने ईरानी तेल की खरीद पर प्रतिबंधों में 30 दिन की छूट दी है। ये छूट केवल समुद्र में मौजूद ईरानी तेल के टैंकरों की खरीद के लिए है। अमेरिकी ट्रेजरी मिनिस्टर स्कॉट बेसेंट ने इसकी घोषणा की। ट्रेजरी विभाग की वेबसाइट के मुताबिक यह छूट 20 मार्च से 19 अप्रैल के लिए है।

ग्लोबल मार्केट में तेल की सप्लाई बढ़ाने और कीमतों को काबू में रखने के लिए ऐसा किया गया है। अमेरिका-इजराइल की ईरान के साथ चल रही जंग की वजह से क्रूड की कीमतें 110 डॉलर के पार निकल गई है। 28 फरवरी को जंग शुरू होने से पहले ये 70 डॉलर के करीब थी।

स्कॉट बेसेंट ने कहा कि दुनिया के लिए इस मौजूदा सप्लाई को अस्थायी रूप से खोलकर ग्लोबल मार्केट में लगभग 14 करोड़ बैरल तेल तेजी से आएगा। इससे दुनियाभर में ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ेगी और सप्लाई पर जो अस्थायी दबाव बना है, उसे कम करने में मदद मिलेगी।

रूसी तेल की खरीद पर दूसरी बार प्रतिबंध हटाया

ट्रम्प प्रशासन ने गुरुवार को एक नया 'जनरल लाइसेंस' जारी किया, जिसके तहत उन रूसी टैंकरों से तेल बेचने की इजाजत दी गई है जो 12 मार्च तक लोड हो चुके थे। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के मुताबिक, यह छूट 11 अप्रैल 2026 तक लागू रहेगी।

नया लाइसेंस 12 मार्च को जारी किए गए पिछले 30 दिनों के 'सेंक्शंस वेवर' की जगह लेगा। पुराने लाइसेंस में कुछ तकनीकी स्पष्टता की कमी थी। नए लाइसेंस के जरिए उत्तर कोरिया, क्यूबा और क्रीमिया को इस छूट से बाहर कर दिया है।

युद्ध के कारण 120 डॉलर तक पहुंच गई थी तेल की कीमतें

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। ब्रेंट क्रूड आज 112 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। बीते दिनों ये 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था।

तेल की कीमतों के बढ़ने की सबसे बड़ी वजह 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' का बंद होना है। ये करीब 167 किमी लंबा जलमार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। ईरान जंग के कारण यह रूट अब सुरक्षित नहीं रहा है। खतरे को देखते हुए कोई भी तेल टैंकर वहां से नहीं गुजर रहा।

दुनिया के कुल पेट्रोलियम का 20% हिस्सा यहीं से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे देश भी अपने निर्यात के लिए इसी पर निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत का 50% कच्चा तेल और 54% एलएनजी इसी रास्ते से मंगाता है। ईरान खुद इसी रूट से एक्सपोर्ट करता है।

ईरान पर प्रतिबंधों की शुरुआत 1979 में हुई थी

ईरान पर तेल प्रतिबंध मुख्य रूप से उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से लगाए गए थे। ईरान पर प्रतिबंधों की शुरुआत 1979 में हुई थी, जब तेहरान में अमेरिकी दूतावास के कर्मचारियों को बंधक बना लिया गया था।

2015: ओबामा प्रशासन के दौरान ईरान के साथ परमाणु समझौता (JCPOA) हुआ था। इसके बदले में ईरान पर से तेल निर्यात करने के कलिए कई पाबंदियां हटा ली गई थीं।

2018: तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने परमाणु समझौते से बाहर निकलते हुए कड़े प्रतिबंध लगा दिए। ईरान की तेल की कमाई को 'जीरो' करने के लिए ऐसा किया गया।

अब नीचे सवाल-जवाब में इस फैसले की वजह और असर…

सवाल 1: अमेरिका ने अचानक ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील क्यों दी?

जवाब: ईरान के साथ युद्ध शुरू हुए तीन हफ्ते हो चुके हैं। इस दौरान मिडिल-ईस्ट में तनाव और स्ट्रैट ऑफ होर्मुज के बंद होने से ग्लोबल सप्लाई चेन ठप हो गई है।

कच्चे तेल की कीमतें 3.5 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। इस 'एनर्जी क्राइसिस' से निपटने के लिए ट्रम्प प्रशासन ने यह कदम उठाया है।

सवाल 2: क्या यह अमेरिका का ईरान के प्रति नरम रुख है?

जवाब: बिल्कुल नहीं। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट का कहना है कि यह एक सोची-समझी रणनीति है। उन्होंने X पर लिखा, "हम तेहरान के खिलाफ ही ईरानी बैरल का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि कीमतें कम रखी जा सकें।" अमेरिका का तर्क है कि यह तेल वैसे भी चोरी-छिपे चीन को बेचा जाता, इससे बेहतर है कि इसे वियतनाम या थाईलैंड जैसे अमेरिकी सहयोगी देश खरीद लें।

सवाल 3: इस तेल की बिक्री से होने वाली कमाई का ईरान क्या करेगा?

जवाब: अमेरिका ने साफ किया है कि ईरान के लिए इस कमाई को हासिल करना बहुत मुश्किल होगा। बेसेंट के मुताबिक, अमेरिका अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम पर अपनी पकड़ बनाए रखेगा ताकि ईरान इस पैसे का इस्तेमाल न कर सके। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतें 33% तक बढ़ चुकी हैं, ऐसे में ईरान को कुछ न कुछ आर्थिक फायदा तो जरूर होगा।

सवाल 4: क्या 14 करोड़ बैरल तेल दुनिया की जरूरत के लिए काफी है?

जवाब: यूएस एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के अनुसार, 14 करोड़ बैरल तेल पूरी दुनिया की सिर्फ डेढ़ दिन की खपत के बराबर है। यूरेशिया ग्रुप के एनालिस्ट ग्रेगरी ब्रू का कहना है कि यह स्टॉक बहुत जल्द खत्म हो जाएगा। इसके बाद अमेरिका के पास या तो ईरान पर से पूरी तरह बैन हटाने का विकल्प बचेगा या फिर कोई और कड़ा रास्ता चुनना होगा।

सवाल 5: 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' क्या है और इसमें तेल का क्या रोल है?

जवाब: यह ट्रम्प प्रशासन का ईरान के खिलाफ सैन्य और आर्थिक अभियान है। एक तरफ अमेरिका ईरान के सैन्य ठिकानों को तबाह कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह नहीं चाहता कि इसकी वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा जाए। तेल की सप्लाई सुनिश्चित करना इस ऑपरेशन का एक अहम हिस्सा है ताकि अमेरिकी वोटर्स और सहयोगी देशों पर महंगाई का बोझ न पड़े।

सवाल 6: स्ट्रैट ऑफ होर्मुज को लेकर ट्रंप का क्या स्टैंड है?

जवाब: दुनिया का करीब 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है, जिसे ईरान ने लगभग बंद कर रखा है। ट्रम्प ने इसे लेकर कहा कि एक समय के बाद यह अपने आप खुल जाएगा। वह फिलहाल सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और तेल की कमी को अस्थायी दर्द मान रहे हैं।

सवाल 7: आगे क्या होगा? एक्सपर्ट्स की क्या राय है?

जवाब: विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के पास अब बहुत कम विकल्प बचे हैं। पूर्व अधिकारी लैंडन डेरेंट्ज़ के मुताबिक, स्थिति बहुत गंभीर है। अब या तो अमेरिका को किसी भी तरह स्ट्रैट ऑफ होर्मुज खुलवाना होगा या फिर और भी गंभीर आर्थिक परिणामों के लिए तैयार रहना होगा।

नॉलेज बॉक्स: 'सेंक्शंस वेवर' क्या होता है?

जब एक देश दूसरे पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाता है, तो कुछ खास स्थितियों में व्यापार जारी रखने के लिए जो कानूनी छूट दी जाती है, उसे 'वेवर' कहते हैं। अमेरिका अक्सर अपनी जरूरत और ग्लोबल मार्केट के संतुलन के लिए ऐसे अस्थायी वेवर जारी करता रहता है।

भारत पर असर: भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा तेल आयात करता है। अगर ग्लोबल मार्केट में 14 करोड़ बैरल एक्स्ट्रा तेल आता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रह सकती हैं।


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कतर के LNG प्लांट पर हमले से भारत-चीन समेत कई देशों की बढ़ी चिंता, 5 साल तक गैस सप्लाई प्रभावित

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान न सिर्फ इजरायल और अमेरिका पर हमले कर रहा है, बल्कि खाड़ी देशों को भी निशाना बना रहा है। ईरान ने बुधवार रात कतर के तेल और गैस प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया।

ईरान द्वारा किए गए इस हमले ने कतर की (रास लफान रिफाइनरी) लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) निर्यात क्षमता का लगभग 17% हिस्सा ठप कर दिया है। इस हमले से हुए नुकसान से उबरने में और रिपेयर के काम में करीब 5 साल का समय लग सकता है। यह संकट भारत के लिए सबसे गंभीर चुनौती है। भारत अपनी कुल जरूरत की लगभग 47% प्राकृतिक गैस अकेले कतर से आयात करता है।

 कतर एनर्जी के सीईओ साद अल-काबी ने बताया कि18 मार्च और 19 मार्च, 2026 की सुबह हुए हमलों से प्रमुख उत्पादन सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा है। इसकी मरम्मत में पांच साल तक का समय लग सकता है, जिसके कारण उसे कुछ LNG अनुबंधों पर दीर्घकालिक 'फोर्स मेज्योर' (अप्रत्याशित घटना के कारण अनुबंध से छूट) घोषित करना पड़ा है।

ऊर्जा मामलों के राज्य मंत्री और कतर एनर्जी के अध्यक्ष और CEO साद शेरिदा अल-काबी ने कहा, "मिसाइल हमलों ने कतर की LNG निर्यात क्षमता को 17 प्रतिशत कम कर दिया है और वार्षिक राजस्व में अनुमानित 20 अरब डॉलर का नुकसान पहुंचाया है। हमारी उत्पादन सुविधाओं को हुए भारी नुकसान की मरम्मत में पांच साल तक का समय लगेगा और हमें दीर्घकालिक 'फोर्स मेज्योर' घोषित करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।"

भारत के लिए चिंता का विषय

इस व्यवधान ने भारत के लिए चिंताएं बढ़ा दी हैं, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कतर पर बहुत अधिक निर्भर है। पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC) और वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़े दिखाते हैं कि भारत के कुल LNG आयात में कतर की हिस्सेदारी लगभग आधी है।

भारत में कब कितनी आपूर्ती हुई?

2024 में, भारत ने लगभग 27.8 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) LNG का आयात किया, जिसमें से कतर ने 11.30 MMT की आपूर्ति की, जिसका मूल्य 6.40 अरब डॉलर था, यह कुल LNG आयात का लगभग 47 प्रतिशत था। पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC) और वाणिज्य मंत्रालय के 2025-26 के आधिकारिक आंकड़ों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि कतर भारत का प्राथमिक गैस आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।

घरेलू कीमतों पर दिखेगा असर

बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच, इस चल रहे व्यवधान से भारत के ऊर्जा आयात के लिए जोखिम बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि उसके सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता से आपूर्ति कम होने से घरेलू बाजार में उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है।

कतर के आधिकारिक बयान के अनुसार, इन हमलों से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) बनाने वाली दो ट्रेनें - ट्रेन 4 और ट्रेन 6 - क्षतिग्रस्त हो गईं। इन दोनों की कुल उत्पादन क्षमता सालाना 12.8 मिलियन टन (MTPA) है, जो कतर के कुल निर्यात का लगभग 17 प्रतिशत है।

चीन और इटली पर भी पड़ेगा असर

मंत्री साद शेरिदा अल-काबी ने कहा, "LNG सुविधाओं को हुए नुकसान की मरम्मत में तीन से पांच साल का समय लगेगा। इसका असर चीन, दक्षिण कोरिया, इटली और बेल्जियम पर पड़ेगा। इसका मतलब है कि हमें कुछ दीर्घकालिक LNG अनुबंधों के लिए पांच साल तक 'फोर्स मेज्योर' (अपरिहार्य परिस्थितियों) की घोषणा करने के लिए विवश होना पड़ेगा।"


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तेल आपूर्ति की 'आखिरी आस' पर महासंकट! होर्मुज के बाद यानबू को निशाना बना रहा ईरान

सऊदी अरब के लाल सागर तट पर स्थित यानबू बंदरगाह में सऊदी अरामको और एक्सॉनमोबिल की संयुक्त उद्यम 'SAMREF' रिफाइनरी पर गुरुवार को हवाई हमला हुआ। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हमले का असर कम रहा और इससे रिफाइनरी को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा है।

यह हमला ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) द्वारा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर के कई ऊर्जा ठिकानों को खाली कराने की चेतावनी जारी करने के कुछ ही समय बाद हुआ है। SAMREF भी इनमें शामिल थी। यह हमला अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरानी ऊर्जा सुविधाओं पर हमलों की जवाबी कार्रवाई मानी जा रही है।

तेल आपूर्ति की आखिरी आस पर हमला 

यानबू बंदरगाह फिलहाल खाड़ी देशों से कच्चे तेल का एकमात्र प्रमुख निर्यात मार्ग है, क्योंकि पिछले महीने युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है।

यह संकरा रास्ता दुनियाभर के पांचवें हिस्से की तेल आपूर्ति के लिए इस्तेमाल होता है। इससे पहले फुजैराह (यूएई) बंदरगाह भी हमलों के कारण प्रभावित है, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा गया है।

इराक और ईरान समेत कई खाड़ी देश मिलकर वैश्विक तेल का 31 प्रतिशत और गैस का 8-17 प्रतिशत उत्पादन करते हैं। कतर के रास लफ्फान एलएनजी संयंत्र पर ईरानी मिसाइल हमले से बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ।

और बढेगा ऊर्जा संकट

बता दें, SAMREF रिफाइनरी पर हमले से तेल बाजार में अस्थिरता और बढ़ेगी। सऊदी अरब और क्षेत्रीय देश ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं, लेकिन ईरान के जवाबी हमलों से स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। अगर हमले जारी रहे तो वैश्विक तेल कीमतों में और भी उछाल आ सकता है। वहीं आपोरती बुरी तरह से प्रभावित होगी।


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पश्चिम एशिया में तनाव के बीच मुंद्रा पोर्ट पहुंचा भारतीय झंडे वाला ‘जग लाडकी’ जहाज, UAE से आया कच्चा तेल

पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच भारतीय झंडे वाला तेल टैंकर जग लाडकी गुजरात के अडानी पोर्ट्स मुंद्रा पर पहुंच गया है। यह देश के ऊर्जा आयात में बेहद अहम वृद्धि है।

जहाज लगभग 80,886 मीट्रिक टन कच्चे तेल के साथ बंदरगाह पर पहुंचा। यह कार्गो यूएई से मंगाया गया था और इसे फुजैराह बंदरगाह पर लादा गया था। कुल 274.19 मीटर लंबाई और 50.04 मीटर चौड़ाई वाले इस टैंकर का डेडवेट टन भार लगभग 164,716 टन और सकल टन भार लगभग 84,735 टन है।

मुंद्रा पोर्ट पर भारी मात्रा में आता है तेल

मुंद्रा में इस टैंकर का आना इस बात को दिखाता है कि भारी मात्रा में कच्चे तेल के आयात को संभालने में अडानी पोर्ट्स की सुविधा कितनी अहम भूमिका निभाती है। इस तरह की खेप प्रमुख रिफाइनरियों के लिए बेहद जरूरी हैं, जो अपने कामकाज को सुचारू रूप से चलाने और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए इन्हीं खेपों पर निर्भर रहती हैं।

ये समुद्री घटनाक्रम पश्चिम एशिया में बढ़ते क्षेत्रीय तनाव की पृष्ठभूमि में सामने आए हैं। इससे पहले भारत का झंडा लगे दो एलपीजी कैरियर 16 और 17 मार्च को भारत पहुंचे। इससे पहले इन जहाजों ने होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित रूप से पार कर लिया था। एमटी शिवालिक और नंदा देवी में लगभग 92,712 मीट्रिक टन एलपीजी लदी थी।

भारत का ऑपरेशन संकल्प

अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करते हुए भारत ऑपरेशन संकल्प के तहत इन जलक्षेत्रों में अपनी नौसैनिक उपस्थिति लगातार बनाए हुए है। यह पहल महत्वपूर्ण शिपिंग रूट्स की सुरक्षा सुनिश्चित करने और जग लाडकी जैसे जहाजों की सुरक्षित डॉकिंग सुनिश्चित करने के लिए समर्पित है।

इसके साथ ही शिपिंग महानिदेशालय (DG Shipping) जहाज मालिकों, भर्ती और प्लेसमेंट सेवा लाइसेंस (RPSL) एजेंसियों और इस क्षेत्र में मौजूद भारतीय राजनयिक मिशनों के साथ समन्वय स्थापित करते हुए स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहा है।


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United States में शराब की खपत घटी, कंपनियों की कमाई पर बड़ा झटका

अमेरिका में शराब की खपत घट रही है। इसका सबसे बड़ा असर रेस्तरां बिजनेस पर पड़ रहा है। 2025 के गैलप पोल के मुताबिक अमेरिका में शराब पीने वालों की हिस्सेदारी निचले स्तर पर है। सिर्फ 54% लोगों ने कहा कि वे शराब पीते हैं। जो पीते हैं, वे भी पहले से कम पी रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण सेहत पर असर और शराब की कीमतों में बढ़ोतरी माना जा रहा है।

2025 में 31% अमेरिकी ऑपरेटर्स ने शराब बिक्री में गंभीर गिरावट की बात कही। न्यू जर्सी के मोंटक्लेयर में रेस्टोरेंट चलाने वाले डेमन वाइज ने बताया कि पहले उनकी कमाई का फॉर्मूला 40% खाना और 60% शराब था। पहले 50-50 हुआ। फिर 70% कमाई खाने से और सिर्फ 30% शराब से आने लगी।

मिलेनियल्स ने कम की शराब, जेन-जी ने फेरा मुंह

टेक्नोमिक की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, शराब के सबसे बड़े शौकीन रहे मिलेनियल्स (31-45 वर्ष) अब इससे दूरी बना रहे हैं। वहीं जेन-जी युवा उस खालीपन को नहीं भर पा रहे हैं। वे रेस्टोरेंट में अक्सर सिर्फ एक ड्रिंक और फोटो तक सीमित हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक महंगाई या कैनाबिस जैसे विकल्पों के कारण नई पीढ़ी शराब पर पैसा खर्च नहीं करना चाहती।

सेहत, आदतें और जीएलपी-1 दवाएं भी एक बड़ी वजह

जनवरी 2025 में यूएस सर्जन जनरल विवेक मूर्ति की रिपोर्ट में हल्की या मध्यम शराब खपत को भी कैंसर रिस्क से जोड़ा गया। इसके अलावा सेहत को लेकर बढ़ती जागरूकता, पीढ़ियों की बदलती आदतें और करीब 6% अमेरिकियों का जीएलपी-1 दवाओं का इस्तेमाल भी वजह मानी जा रही है। इन दवाओं से शराब की इच्छा कम होने के संकेत मिले हैं।

महंगी शराब और बेरोजगारी ने तोड़ी युवाओं की कमर

लॉस एंजिल्स के व्यवसायी डस्टिन लैंकेस्टर के अनुसार बढ़ती लागत युवाओं को शराब से दूर कर रही है। पहले व्हिस्की और बीयर 8 डॉलर यानी करीब 730 रुपए में मिल जाती थी, जिसकी कीमत अब 20 डॉलर यानी 1,800 रुपए तक पहुंच गई है। टेक्नोमिक रिपोर्ट के मुताबिक 9.2% बेरोजगारी दर के कारण जेन-जी की जेब पर भी दबाव बढ़ा है।


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मिसाइल अलर्ट से मचा हड़कंप, दुबई-दोहा में धमाके; ओमान के पास टैंकर हादसा

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच का संघर्ष हाल के वर्षों में मिडिल ईस्ट के सबसे ज्यादा संकटों में से एक बन गया है, जिसमें इस क्षेत्र के कई देशों में मिसाइल हमले, ड्रोन हमले और हवाई हमलों की खबरें सामने आई हैं।

इस बीच दुबई और दोहा में मिसाइल अलर्ट के बाद धमाकों की आवाजें सुनी गईं। सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि देश के पूर्वी हिस्से में ड्रोन को रोककर नष्ट कर दिया गया। इससे पहले मंत्रालय ने बताया था कि देश के उसी क्षेत्र में सऊदी सेनाओं द्वारा छह ड्रोन भी इस्तेमाल किए गए थे, जिन्हें सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया गया।

बगदाद एयरपोर्ट के पास अमेरिकी राजनयिक केंद्र पर रॉकेटों से फिर हमला

बगदाद एयरपोर्ट के पास एक अमेरिकी राजनयिक केंद्र को निशाना बनाकर रॉकेट हमलों की एक और लहर की खबर मिली है। सुरक्षा सूत्रों ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि इस ताजा हमले के बाद इलाके में सायरन बजने की आवाजें सुनी गईं। इससे पहले, बगदाद में अमेरिकी दूतावास को भी रॉकेटों और कई ड्रोन से निशाना बनाए जाने की खबर थी।

UAE के तट के पास टैंकर से टक्कर

मंगलवार तड़के यूएई के पूर्वी तट पर लंगर डाले एक टैंकर पर एक मिसाइल से हमला हुआ। यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस ने इस घटना की जानकारी देते हुए बताया कि यह जहाज फुजैरा के पास ओमान की खाड़ी में मौजूद था। टैंकर को मामूली नुकसान पहुंचा, लेकिन किसी के घायल होने की कोई खबर नहीं है।

ईरान के साथ संघर्ष शुरू होने के बाद से इस क्षेत्र में लगभग 20 जहाजों पर हमले होने की खबर है। ईरान के हमलों ने होर्मुज स्ट्रेट से होने वाले यातायात को काफी हद तक बाधित कर दिया है।


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