सीजफायर के बीच अमेरिका को झटका! होर्मुज के ऊपर से 1800 करोड़ का ड्रोन लापता

अमेरिका-ईरान के बीच हुए सीजफायर के ठीक दो दिन बाद अमेरिका का निगरानी ड्रोन, MQ-4C ट्राइटन, होर्मुज स्ट्रेट से लापता हो गया है। यह अमेरिकी नौसेना का सबसे महंगा और अत्याधुनिक निगरानी ड्रोन है। जो तीन घंटे की निगरानी पूरी करने के बाद अपनी बेस पर लौटते वक्त रडार से ओझल हो गया।

अमेरिकी नौसेना का एक निगरानी ड्रोन, एमक्यू-4सी ट्राइटन की कीमत 200 मिलियन डॉलर (लगभग 1,800 करोड़ रुपये) है। यह ड्रोन अपनी उच्च-ऊंचाई और लंबी दूरी की क्षमताओं के लिए जाना जाता है। फिलहाल अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ड्रोन तकनीकी खराबी के कारण दुर्घटनाग्रस्त हुआ है या इसे मार गिराया गया है।

अपने बेस पर लौटते वक्त हुआ लापता

ऑनलाइन फ्लाइट ट्रैकिंग वेबसाइट, ड्रोन ने फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट की लगभग तीन घंटे की निगरानी पूरी की। इसके बाद ऐसा लग रहा था कि वह इटली के सिगोनेला नौसैनिक हवाई अड्डे पर अपने बेस पर लौट रहा था। ड्रोन ने ईरान की ओर थोड़ा सा मोड़ लिया और कोड 7700 (सामान्य आपातकाल के लिए) भेजकर नीचे उतरना शुरू कर दिया। यह ड्रोन लगभग 50,000 फीट की अपनी उड़ान ऊंचाई से तेजी से 10,000 फीट से नीचे उतर गया। इसके बाद ड्रोन ट्रैकिंग से गायब हो गया।

उड़ान के दौरान भेजा था इमरजेंसी अलर्ट

इस दौरान इसे ट्रैक किया गया और वह तेजी से ऊंचाई खोता हुआ दिखाई दिया, जिसके बाद वह गायब हो गया। दी वॉर जोन की रिपोर्ट के मुताबिक, उड़ान के दौरान इसने इमरजेंसी अलर्ट भी भेजा था।

सीजफायर के दो दिन बाद की घटना

बताते चलें कि ड्रोन के लापता होने की घटना अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम पर सहमति बनने के दो दिन बाद हुई है, जिसमें ईरान ने होर्मुज को जहाजरानी यातायात के लिए फिर से खोलने पर सहमति जताई थी।

MQ-4C ट्राइटन के बारे में...

अमेरिका के एमक्यू-4सी ट्राइटन को खाड़ी क्षेत्र के ऊपर अमेरिकी केंद्रीय कमान के क्षेत्र में तैनात किया गया है। यह परंपरागत विमानों के विपरीत, ट्राइटन महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर लंबे समय तक रणनीतिक निगरानी प्रदान करता है। इसे निरंतर और व्यापक समुद्री निगरानी के लिए डिजाइन किया गया है, और यह अक्सर पी-8ए पोसाइडन गश्ती विमानों के लिए उच्च-ऊंचाई पर निगरानी रखने वाले विमान के रूप में कार्य करता है।

ट्राइटन एकमात्र स्वायत्त उच्च-ऊंचाई, लंबी अवधि तक उड़ान भरने वाला ड्रोन है, जो 50,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर 24 घंटे से अधिक समय तक 7,400 समुद्री मील की रेंज के साथ उड़ान भरने में सक्षम है।


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‘होर्मुज नहीं खुला तो फिर शुरू होगी गोलीबारी’: सीजफायर के बीच ट्रंप की ईरान को सख्त चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ईरान को एक नई धमकी दी है। ट्रंप का कहना है कि अगर ईरान हॉर्मुज स्ट्रेट को नहीं खोलता है और परमाणु हथियार न रखने का वादा नहीं करता है तो गोलीबारी शुरू हो जाएगी।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर उन्होंने लिखा, "अमेरिका के सभी जहाज, विमान और सैन्य कर्मी साथ ही अतिरिक्त गोला-बारूद, हथियार और ऐसी कोई भी चीज जो पहले से ही काफी कमजोर हो चुके दुश्मन को पूरी तरह से खत्म करने और नष्ट करने के लिए सही और जरूरी हो ईरान के अंदर और उसके आस-पास तब तक तैनात रहेंगे, जब तक कि हुई 'असली सहमति' का पूरी तरह से पालन नहीं हो जाता।"

'कोई भी परमाणु हथियार इस्तेमाल नहीं किया जाएगा'

ट्रंप ने आगे लिखा, "अगर किसी भी वजह से ऐसा नहीं होता है, जिसकी संभावना बहुत ही कम है तो "गोलीबारी शुरू हो जाएगी" जो पहले कभी किसी ने नहीं देखी होगी, उससे भी ज्यादा बड़ी, बेहतर और जबरदस्त। बहुत पहले ही इस बात पर सहमति बन गई थी और इसके विपरीत तमाम झूठी बयानबाजियों के बावजूद कि कोई भी परमाणु हथियार इस्तेमाल नहीं किया जाएगा और होर्मुज स्ट्रेट खुला और सुरक्षित रहेगा।"

'सेना कर रही बेसब्री से इंतजार'

अमेरिकी राष्ट्रपति ने धमकी देते हुए लिखा, "इस बीच, हमारी महान सेना अपनी पूरी तैयारी कर रही है और आराम कर रही है। असल में, वह अपनी अगली जीत का बेसब्री से इंतजार कर रही है। अमेरिका वापस आ गया है!"


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सीजफायर के बाद ट्रंप का टैरिफ अटैक! ईरान को हथियार देने वाले देशों पर 50% ज्यादा शुल्क लगाने का ऐलान

अमेरिका-ईरान सीजफायर के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सख्त रुख अपनाते हुए ईरान का साथ देने वाले देशों को चेतावनी दी है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि जो भी देश ईरान को सैन्य हथियार सप्लाई करेगा, उसके द्वारा अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले सभी सामानों पर तुरंत 50% अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा। उन्होंने साफ किया कि यह फैसला तत्काल प्रभाव से लागू होगा और इसमें किसी तरह की कोई छूट नहीं दी जाएगी।

इस कड़े ऐलान से ठीक पहले ट्रंप ने एक और बयान में अमेरिका और ईरान के बीच सहयोग की बात कही। उन्होंने दावा किया कि ईरान अब यूरेनियम संवर्धन की गतिविधियां बंद कर देगा और दोनों देश मिलकर परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर काम करेंगे। ट्रंप ने यह भी कहा कि जमीन के भीतर मौजूद परमाणु सामग्री को बाहर निकालने की प्रक्रिया भी सख्त निगरानी में की जाएगी।

ट्रंप के मुताबिक, यह पूरा ऑपरेशन अमेरिकी सैटेलाइट सिस्टम की निगरानी में चल रहा है और अब तक किसी भी सामग्री के साथ छेड़छाड़ नहीं हुई है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका, ईरान को टैरिफ और प्रतिबंधों में राहत देने के मुद्दे पर बातचीत कर रहा है और 15 में से कई अहम बिंदुओं पर सहमति बन चुकी है।


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अमेरिका-ईरान के बीच दो हफ्ते का युद्धविराम कराने का दावा

अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ्ते के युद्धविराम में पाकिस्तान की अहम भूमिका सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अपने बयान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर को ‘प्रिय भाई’ बताते हुए उनके प्रयासों की सराहना की। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस भूमिका को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया। पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच संवाद का रास्ता तैयार करने में अहम भूमिका निभाई और युद्धविराम तक पहुंचने में मदद की। शहबाज शरीफ ने घोषणा की कि दोनों देश तत्काल प्रभाव से सीजफायर पर सहमत हो गए हैं और आगे की बातचीत के लिए उन्हें इस्लामाबाद आने का न्योता भी दिया गया है।

सीजफायर से पहले पाकिस्तान बैकचैनल कूटनीति में लगातार सक्रिय रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, असीम मुनीर ने पूरी रात अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, दूत स्टीव विटकॉफ और ईरानी विदेश मंत्री के साथ संपर्क बनाए रखा। पाकिस्तान ने अमेरिका का 15 सूत्रीय प्रस्ताव ईरान तक पहुंचाया और फिर ईरान की प्रतिक्रिया अमेरिका तक भेजी, इस तरह वह दोनों देशों के बीच एक पुल की तरह काम करता रहा। 29 मार्च को पाकिस्तान ने तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों की बैठक भी कराई, जिसमें मध्य पूर्व के संकट पर चर्चा हुई।

पाकिस्तान को मध्यस्थ के रूप में दोनों देशों का भरोसा मिलना भी एक अहम कारण रहा। ईरान को अपने कई अरब पड़ोसियों पर पूरी तरह भरोसा नहीं है, जबकि पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते स्थिर हैं और दोनों की सीमाएं भी जुड़ी हुई हैं। पाकिस्तान के इजरायल के साथ राजनयिक संबंध नहीं होने से भी ईरान का भरोसा मजबूत हुआ। वहीं, अमेरिका के साथ हाल के वर्षों में बेहतर होते संबंध और असीम मुनीर के दोनों पक्षों से संपर्क ने पाकिस्तान को इस भूमिका में बढ़त दिलाई।

इस पहल के पीछे पाकिस्तान के अपने रणनीतिक और आर्थिक हित भी जुड़े थे। उसकी ऊर्जा जरूरतें बड़े पैमाने पर मध्य पूर्व पर निर्भर हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के चलते ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा था। इसके अलावा खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों पाकिस्तानी नागरिकों की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। पहले से आर्थिक संकट और अफगानिस्तान के साथ तनाव झेल रहे पाकिस्तान के लिए क्षेत्र में और अस्थिरता नुकसानदेह हो सकती थी।

हालांकि यह युद्धविराम अभी भी नाजुक स्थिति में है। यदि समझौता टूटता है, तो पाकिस्तान की कूटनीतिक साख को झटका लग सकता है। साथ ही, उसके पास इतना सामरिक प्रभाव नहीं है कि वह इस सीजफायर को पूरी तरह लागू करवा सके। ऐसे में आने वाले समय में इस समझौते की स्थिरता ही पाकिस्तान की इस कूटनीतिक सफलता की असली परीक्षा होगी।


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ईरान युद्ध का असर: पाकिस्तान में बिगड़े हालात, आज रात से लॉकडाउन का ऐलान; शहबाज शरीफ का बड़ा फैसला

पाकिस्तान में सरकार ने सोमवार को फैसला किया कि देश भर के बाजार और शॉपिंग मॉल सिंध को छोड़कर ऊर्जा बचाने के उपायों के तहत रात 8 बजे तक बंद हो जाएंगे। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी एक बयान में बताया गया कि यह फैसला इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अध्यक्षता में हुई एक बैठक के दौरान लिया गया।

सिंध को छोड़कर सभी जगहों पर पाबंदी लागू

इससे पहले बयान में कहा गया था कि KP के डिविजनल मुख्यालयों में बाजारों को रात 9 बजे तक खुला रहने की अनुमति होगी, और सिंध के बाजारों के लिए खुलने-बंद होने के समय को लेकर अभी बातचीत चल रही है। इस बीच, बयान में कहा गया कि बैठक में यह फैसला लिया गया कि KP के बाकी हिस्सों, पंजाब, बलूचिस्तान, इस्लामाबाद, गिलगित-बाल्टिस्तान और अन्य जगहों पर बाजार और शॉपिंग मॉल रात 8 बजे तक बंद हो जाएंगे।

इसके साथ ही यह भी फैसला लिया गया है कि बेकरी, रेस्टोरेंट, तंदूर और खाने-पीने की चीजें बेचने वाली दुकानें रात 10 बजे तक बंद हो जाएंगी। वहीं, मैरिज हॉल, मार्की और शादी समारोहों के आयोजन के लिए इस्तेमाल होने वाली अन्य कमर्शियल जगहें भी इसी समय तक बंद करने होंगे।

शादी के लिए रात 10 बजे तक छूट

बयान में आगे कहा गया कि निजी जगहों और घरों में भी रात 10 बजे के बाद शादी समारोह आयोजित करने पर पाबंदी होगी। हालांकि, इसमें कहा गया कि मेडिकल स्टोर और दवा की दुकानों को समय की पाबंदियों से छूट दी जा रही है, और ये नए समय 7 अप्रैल (मंगलवार) से लागू होंगे। ये फैसले बलूचिस्तान और KP सरकारों द्वारा अपने-अपने प्रांतों के लिए व्यावसायिक समय की घोषणा करने के एक दिन बाद आए हैं, जो सोमवार की बैठक में लिए गए फैसलों के अनुरूप हैं।

PMO ने X पर पोस्ट कर दी जानकारी

PMO के बयान के अनुसार, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में ईंधन और ऊर्जा-बचत के उपायों पर चर्चा की गई। इसके साथ ही मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध के दौरान खर्च में कटौती के उपायों की भी समीक्षा की गई। यह संघर्ष 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के साथ शुरू हुआ था। जिसके दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य एक रणनीतिक समुद्री गलियारा जिससे युद्ध से पहले दुनिया का लगभग 25 प्रतिशत तेल गुजरता था। उसमें रुकावट के कारण ईंधन की कीमतें बढ़ गई हैं और आपूर्ति में बाधाएं आई हैं।

मुजफ्फराबाद में एक महीने तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट फ्री

उन्होंने यह भी कहा कि गिलगित और मुजफ्फराबाद में एक महीने तक शहरों के बीच चलने वाली पब्लिक ट्रांसपोर्ट सेवाएं मुफ्त दी जाएंगी। इस दौरान इसका सारा खर्च केंद्र सरकार उठाएगी। PMO के बयान के अनुसार, इस बैठक में उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार, आर्थिक मामलों के मंत्री अहद चीमा और संबंधित वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे।

सिंध के मुख्यमंत्री ने भी जारी किया बयान

सिंध के मुख्यमंत्री ने कारोबारी समुदाय के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस बीच, सिंध के मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी एक बयान में कहा गया कि प्रांत के मुख्य कार्यकारी, मुराद अली शाह ने सोमवार को कारोबारी समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक की। इस बैठक में कराची चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, कोरंगी एसोसिएशन ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री और अन्य व्यवसायों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

बयान में मुराद के हवाले से कहा गया कि "देश के हालात को देखते हुए हम सभी को अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी" और सिंध सरकार ऊर्जा बचाने के लिए कदम उठाना चाहती है। उन्होंने कहा कि सरकार साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए भी कदम उठा रही है कि गरीबों पर कम से कम बोझ पड़े। उन्होंने कहा कि व्यापारियों के संगठनों ने बाजार खुलने के समय के बारे में अपने सुझाव दिए हैं, और उन सुझावों की समीक्षा करने के बाद प्रधानमंत्री को इसकी जानकारी दी जाएगी।


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अमेरिका-ईरान के बीच आज से लागू होगा सीजफायर, दावा- होर्मुज तुरंत खोलने पर बनी सहमति

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच सीजफायर को लेकर अहम खबर सामने आई है।Reuters के अनुसार, Iran और United States के बीच युद्धविराम का एक प्रस्ताव तैयार किया गया है, जो सोमवार से लागू हो सकता है। इस प्रस्ताव के लागू होने पर रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण Strait of Hormuz को दोबारा खोला जा सकता है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ रहे असर को कम किया जा सकेगा।

सूत्रों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए एक फ्रेमवर्क Pakistan ने तैयार किया है और इसे तेजी से दोनों पक्षों के साथ साझा भी किया गया है। इस योजना में तत्काल सीजफायर के बाद एक व्यापक समझौते की दिशा में दो-स्तरीय (टू-लेयर) अप्रोच शामिल है, जिसे आगे चलकर MoU के रूप में अंतिम रूप दिया जा सकता है। बातचीत की इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान एक प्रमुख कम्युनिकेशन चैनल की भूमिका निभा रहा है।

इससे पहले 45 दिनों के संभावित सीजफायर को लेकर भी बातचीत की खबरें सामने आई थीं, जिसमें स्थायी शांति की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। प्रस्ताव के तहत तुरंत युद्धविराम लागू करने, होर्मुज स्ट्रेट को खोलने और 15–20 दिनों के भीतर बड़े समझौते को अंतिम रूप देने की योजना शामिल है। इस संभावित समझौते को “इस्लामाबाद अकॉर्ड” नाम दिए जाने की भी चर्चा है।

हालांकि, अब तक इस प्रस्ताव पर न तो Iran और न ही United States की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। वहीं, ईरान की ओर से पहले यह शर्त रखी गई थी कि वह तभी स्थायी सीजफायर के लिए तैयार होगा, जब उसे यह गारंटी मिले कि Israel और अमेरिका भविष्य में उस पर हमला नहीं करेंगे।

जानकारी के अनुसार, इस प्रस्ताव में यह भी शामिल हो सकता है कि प्रतिबंधों में राहत और फ्रीज किए गए एसेट्स की वापसी के बदले ईरान परमाणु हथियारों के विकास से पीछे हटे। हालांकि, अब तक ईरान की ओर से इस पर कोई स्पष्ट सहमति नहीं दी गई है। इस बीच, होर्मुज स्ट्रेट के जरिए शिपिंग में संभावित रुकावट को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बनी हुई है, क्योंकि यह मार्ग दुनिया की तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है।


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इजरायल-कुवैत की तेल रिफाइनरी में धमाका, आग भड़की; ट्रंप की धमकी के बाद ईरान के हमले तेज

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव अब बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती टकराव की स्थिति के बाद हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी हमले के बाद तेहरान ने खाड़ी देशों के अहम ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी थी, और इसी क्रम में अब कुवैत की मीना अल-अहमदी रिफाइनरी पर ड्रोन अटैक किया गया। इस हमले के चलते रिफाइनरी की कई यूनिट्स में भीषण आग लग गई, जिसे बुझाने के लिए इमरजेंसी टीमें लगातार जुटी हुई हैं।

कुवैत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन के मुताबिक, यह हमला शुक्रवार सुबह ड्रोन के जरिए किया गया, जिससे रिफाइनरी के ऑपरेशनल हिस्सों को भारी नुकसान पहुंचा है। सरकारी एजेंसियों ने तुरंत राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिया और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सभी जरूरी सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं। चूंकि यह रिफाइनरी देश के सबसे बड़े तेल प्रोसेसिंग केंद्रों में से एक है, इसलिए इस हमले का असर अंतरराष्ट्रीय ऑयल सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है।

इस बीच, सऊदी अरब ने दावा किया है कि उसने ईरान के पांच ड्रोन को हवा में ही मार गिराया है। वहीं तेल अवीव में सायरन बज रहे हैं और लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है। इजरायल की सेना ने बताया कि उसका एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय है और ईरान से दागी गई मिसाइलों को रोकने का प्रयास कर रहा है।

ईरान का कहना है कि उसके हालिया हमले संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और इजरायल में मौजूद ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए हैं। तेहरान ने इन्हें अमेरिका और इजरायल द्वारा पहले किए गए हमलों का जवाब बताया है, जिससे पूरे क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनती जा रही है।


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United Arab Emirates-United States गठजोड़ सक्रिय, Iran पर बढ़ा खतरा

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अमेरिका और अन्य पश्चिमी सहयोगियों को बताया है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए मदद करेगा। इसके लिए उसने तैयारी भी शुरू कर दी है। जानकारी के अनुसार UAE दर्जनों देशों को "होर्मुज सुरक्षा बल" बनाने के लिए प्रेरित कर रहा है, ताकि इस जलडमरूमध्य को ईरानी हमलों से बचाया जा सके और जहाजों को सुरक्षा दी जा सके।

UAE पर ईरान ने सबसे ज्यादा हमले किए हैं

UAE को इस क्षेत्र के किसी भी अन्य देश, यहां तक कि इजरायल से भी ज्यादा ईरानी हमलों का सामना करना पड़ा है। अमेरिका के कई सहयोगी देशों ने कहा है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने के लिए जहाज भेजने की उनकी कोई तत्काल योजना नहीं है। इस बयान के साथ उन्होंने इस अहम जलमार्ग को खुला रखने के लिए ट्रंप की अपील को ठुकरा दिया है।

फ्रांस ने कहा युद्ध खत्म होने पर मिलेगी मदद

फ्रांस ने गुरुवार को कहा कि उसने लगभग 35 देशों के साथ बातचीत की है। ताकि स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए एक मिशन में साथ आ सके, लेकिन ऐसा तभी होगा जब ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल युद्ध खत्म होगा। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावी ढंग से बंद कर दिया है। जहां से दुनिया का लगभग 20% तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) गुजरता है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठ सकता है मामला

इससे कीमतें बढ़ गई हैं और दुनिया भर में महंगाई बढ़ने का डर पैदा हो गया है। कई रिपोर्ट के अनुसार UAE, बहरीन के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव लाने पर भी काम कर रहा है, ताकि भविष्य में बनने वाले किसी भी टास्कफोर्स को काम करने का अधिकार मिल सके। हालांकि, रूस और चीन इस कदम का विरोध कर सकते हैं।


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रूस ने 4 महीने के लिए पेट्रोल निर्यात रोका

रूस ने 1 अप्रैल से 31 जुलाई तक पेट्रोल निर्यात पर रोक का फैसला किया है। उप-प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने ऊर्जा मंत्रालय से इस प्रस्ताव को तैयार करने को कहा। रूस के मुताबिक यह कदम घरेलू सप्लाई बनाए रखने और कीमतें नियंत्रित रखने के लिए है।

नोवाक ने कहा कि मिडिल ईस्ट में चल रहे इजराइल-ईरान जंग की वजह से ग्लोबल तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्शन बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। इससे कीमतों में उतार-चढ़ाव हो रहा है। रूस रोजाना 1.2 से 1.7 लाख बैरल पेट्रोल निर्यात करता है।

इस फैसले से चीन, तुर्किये, ब्राजील, अफ्रीका और सिंगापुर प्रभावित हो सकते हैं। ये देश रूसी तेल उत्पादों के बड़े खरीदार हैं। भारत पर असर कम होगा क्योंकि वह पेट्रोल नहीं, कच्चा तेल खरीदता है।

पहले भी पेट्रोल एक्सपोर्ट पर रोक लगाई गई थी

मॉस्को में शुक्रवार को पेट्रोल एक्सपोर्ट के बैन को लेकर बैठक हुई थी। इसमें खासतौर पर यह जोर दिया गया कि राष्ट्रपति पुतिन ईंधन कीमतें नियंत्रित रखना चाहते हैं।

मंत्री नोवाक ने बैठक में कहा कि पेट्रोल-डीजल का पर्याप्त स्टॉक है और रिफाइनरियां पूरी क्षमता से काम कर रही हैं। तेल कंपनियों ने कहा कि पेट्रोल-डीजल का पर्याप्त स्टॉक है और रिफाइनरियां पूरी या उससे अधिक क्षमता पर काम कर रही हैं, जिससे जरूरत पूरी हो रही है।

रूस पहले भी कीमत नियंत्रण और घरेलू सप्लाई के लिए पेट्रोल-डीजल निर्यात पर रोक लगा चुका है। पिछले साल भी ऐसा हुआ था, जब यूक्रेन हमलों से रिफाइनरियां प्रभावित हुई थीं।

इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, रूस ने पिछले साल करीब 50 लाख मीट्रिक टन पेट्रोल एक्सपोर्ट किया था, यानी हर दिन लगभग 1.17 लाख बैरल के बराबर है।

एक दिन पहले ही नोवाक ने कहा था कि जरूरत पड़ी तो रूस फिर से तेल निर्यात पर रोक लगा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि रूस का यूराल्स तेल और दूसरे तेल उत्पाद इन दिनों ब्रेंट क्रूड के बराबर या उससे भी महंगे दाम पर बिक रहे हैं।

रूस के फैसले का भारत पर कितना असर

एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत सीधेतौर पर पेट्रोल जैसे तैयार ईंधन पर ज्यादा निर्भर नहीं है, बल्कि कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) पर निर्भर है। क्रूड ऑयल को ही रिफाइन कर पेट्रोल और डीजल बनाए जाते हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 80% कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से लगभग 20% रूस से आता है।

भारत बहुत कम मात्रा में पेट्रोल या अन्य तैयार ईंधन आयात करता है। इसके बजाय देश अपने बड़े रिफाइनरी नेटवर्क के जरिए कच्चे तेल को खुद प्रोसेस करता है। यही वजह है कि रूस के पेट्रोल निर्यात पर लगी रोक का भारत पर सीधा असर पड़ने की संभावना बहुत कम है।

भारत रोजाना करीब 56 लाख बैरल कच्चा तेल रिफाइन करता है। यह न सिर्फ अपनी घरेलू जरूरत पूरी करता है, बल्कि तैयार ईंधन का निर्यात भी करता है।

हालांकि एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि रूस के फैसले से अगर वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। पहले से ही जंग के कारण तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं।

क्रूड से 15 डॉलर तक महंगा मिल रहा रूसी तेल

इधर, इजराइल-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। इससे निपटने के लिए भारतीय रिफाइनर्स ने रूस से भारी मात्रा में तेल खरीदने का फैसला किया है। अप्रैल महीने की डिलीवरी के लिए भारत ने रूस से लगभग 60 मिलियन यानी 6 करोड़ बैरल कच्चे तेल का सौदा किया है।

जो रूसी तेल कभी भारत को भारी डिस्काउंट पर मिलता था, अब उसके लिए प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये सौदे ब्रेंट क्रूड की कीमतों पर 5 से 15 डॉलर प्रति बैरल के प्रीमियम (अतिरिक्त कीमत) पर बुक किए गए हैं। सप्लाई की कमी और मांग ज्यादा होने की वजह से कीमतों में यह उछाल देखा जा रहा है।

दरअसल, भारत की इस खरीदारी के पीछे अमेरिका की दी गई छूट का बड़ा हाथ है। अमेरिका ने भारत को उन रूसी तेल कार्गो को लेने की अनुमति दी है, जो 5 मार्च से पहले जहाजों पर लोड हो चुके थे। बाद में इस छूट का दायरा बढ़ाकर 12 मार्च कर दिया गया।


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United States ने Iran पर 850 टॉमहॉक मिसाइलें दागीं: मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव

ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका ने बड़े पैमाने पर टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया। इसे अमेरिकी हथियारों के जखीरे का अहम हथियार माना जाता है।

वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक चार हफ्तों में 850 से ज्यादा मिसाइलें दागी गईं। अनुमान है कि अमेरिकी नौसेना के पास लगभग 4,000 टॉमहॉक मिसाइलें थीं।

अगर यह सही है तो टॉमहॉक मिसाइलों का करीब एक चौथाई हिस्सा खत्म हो चुका है। रक्षा मंत्रालय के भीतर इसको लेकर चिंता बढ़ गई है। एक टॉमहॉक बनाने में करीब 2 साल लग सकते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार कमी पूरी करने में कई साल लगेंगे।

अमेरिका के पास करीब 4000 टॉमहॉक मिसाइलें

टॉमहॉक अमेरिका की खास क्रूज मिसाइल है। यह 1,000 मील (1609 किमी) तक उड़कर 1,000 पाउंड (453 किलो) विस्फोटक सटीक निशाने पर गिरा सकती है। इसके एडवांस वर्जन की रेंज 2500 किमी है।

टॉमहॉक का बड़े पैमाने पर पहला इस्तेमाल 1991 के खाड़ी युद्ध में हुआ। अमेरिका ने इराक पर दूर से सैकड़ों मिसाइलें दागीं। इसे रिमोट वार कहा गया, क्योंकि पहली बार इतनी सटीक और लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें इस्तेमाल हुईं।

टॉमहॉक को समुद्र में मौजूद युद्धपोतों और पनडुब्बियों से भी दागा जा सकता है, जिससे दुश्मन के इलाके में घुसे बिना हमला संभव हो जाता है। अमेरिका बीते एक महीने से ईरान पर हमले कर रहा है। यह पूरी तरह ‘स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक’ है। यानी हमला इतनी दूर से किया गया कि अमेरिकी सैनिकों को जमीन पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ रही है।

एक्सपर्ट्स के अनुमान के मुताबिक अमेरिका के पास फिलहाल 4000 के करीब टॉमहॉक मिसाइलें हैं। यूरोप, मिडिल ईस्ट और एशिया में बढ़ते खतरों के बीच अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को टॉमहॉक मिसाइलों की बहुत जरूरत है।

अगर युद्ध लंबा चला, तो अमेरिका के पास अपने उपयोग के लिए भी टॉमहॉक खत्म हो सकते हैं, सहयोगियों को देना मुश्किल होगा।

एक साल में 600 टॉमहॉक मिसाइल बनाता है अमेरिका

अमेरिका टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का उत्पादन बहुत सीमित मात्रा में करता है। मौजूदा क्षमता के मुताबिक एक साल में करीब 600 टॉमहॉक मिसाइलें बनाई जा सकती हैं।

एक टॉमहॉक की लागत करीब 36 लाख डॉलर (34 करोड़ रुपए) है, जिससे तेज इस्तेमाल ने सप्लाई पर दबाव बढ़ाया है।

समस्या यह है कि एक टॉमहॉक बनने में लगभग 2 साल लगते हैं, इसलिए ऑर्डर के बाद तुरंत उपलब्ध नहीं होती।

यही वजह है कि जब युद्ध में इनका तेजी से इस्तेमाल होता है, जैसे अभी ईरान संघर्ष में हुआ, तो स्टॉक जल्दी घट जाता है और उसे भरने में कई साल लग सकते हैं।

जापान के साथ मिसाइल बनाने की डील अटकी

2024 में टॉमहॉक की कमी का समाधान दिखा, जब अमेरिका जापान में जॉइंट प्रोडक्शन के करीब पहुंचा, जिससे उत्पादन दोगुना हो सकता था।

प्लान यह था कि जापान, अमेरिका के लिए टॉमहॉक मिसाइल के कुछ हिस्से का उत्पादन करे। इसका फायदा दोनों देशों को मिलता। जापान अपनी रक्षा नीति में बदलाव कर रहा है और लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। यही वजह है कि उसने मिसाइल बनाने में मदद करने की हामी भरी।

हालांकि अमेरिका ने इस साझेदारी के लिए कई सख्त शर्तें रखी थीं। जैसे कि

मिसाइलों की तकनीक और डिजाइन पर पूरा कंट्रोल अमेरिका का रहेगा

जापान इन मिसाइलों को बिना अमेरिका की मंजूरी के किसी तीसरे देश को नहीं बेच सकेगा

इनका इस्तेमाल भी तय नियमों और शर्तों के तहत ही होगा

संवेदनशील तकनीक के ट्रांसफर को सीमित रखा जाएगा

हालांकि अमेरिका के अंदर ही इस डील का विरोध शुरू हो गया। दोनों ही पार्टी में कई नेताओं और विशेषज्ञों को डर था कि एडवांस्ड मिसाइल टेक्नोलॉजी विदेश में शेयर करना जोखिम भरा हो सकता है। टोमहॉक बनाने वाली कंपनी RTX के एक सीनियर अधिकारी ने भी इस विरोध में साथ दिया।

यह भी चिंता थी कि इससे अमेरिका की रक्षा इंडस्ट्री को नुकसान होगा और देश की इकोनॉमी पर भी असर पडे़गा। इस वजह से यह योजना पूरी तरह लागू नहीं हो पाई और मामला अटका गया।

अमेरिका से 6 गुना तेज हथियार बना रहा चीन

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक यह मामला अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा की बड़ी समस्या दिखाता है। वह अकेले चीन की बढ़ती औद्योगिक क्षमता का मुकाबला नहीं कर पा रहा, जो अब सैन्य शक्ति में बदल रही है।

चीन वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का 28% और अमेरिका 17% हिस्सेदारी रखता है। अनुमान है कि चीन 5-6 गुना तेजी से एडवांस हथियार हासिल कर रहा है।

चीन का एक शिपयार्ड अमेरिका के सभी शिपयार्ड्स से ज्यादा जहाज बना सकता है।

अमेरिका को चीन से पिछड़ने का खतरा

अब अमेरिका को यह खतरा है कि वह इतिहास में ब्रिटेन, जर्मनी और जापान की तरह किसी उभरती औद्योगिक ताकत से सैन्य रूप से पिछड़ जाए। इतिहास बताता है कि ऐसी प्रतिस्पर्धाओं अक्सर विनाशकारी युद्धों में खत्म होती हैं।

समाधान यह है कि अमेरिका अकेले नहीं, बल्कि जापान, दक्षिण कोरिया, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर चीन का मुकाबला करे।

काफी समय तक कई सहयोगी देश अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका पर छोड़ते रहे। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसे ‘फ्री राइडिंग’ कहा था। ये देश अपनी अर्थव्यवस्था का बहुत छोटा हिस्सा रक्षा पर खर्च करते थे और अमेरिका पर निर्भर रहते थे।

ट्रम्प अक्सर फ्री राइडर्स के खिलाफ सख्ती का श्रेय लेते हैं। पिछले 60 सालों में अमेरिका ने अपनी जीडीपी का 3 से 9.4 प्रतिशत तक रक्षा पर खर्च किया है, जबकि कई सहयोगी देशों का खर्च 1 प्रतिशत से भी कम रहा है।

अब एशिया में चीन की बढ़ती आक्रामकता और यूरोप में रूस की जंगबाजी को देखते हुए यह व्यवस्था अब टिकाऊ नहीं रही। अब अमेरिका को दुनिया में अपनी भूमिका और गठबंधनों को नए सिरे से सोचना होगा, क्योंकि अब वह अकेला सबसे ताकतवर देश नहीं रहा।


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