अमेरिका में रहने वाले स्टूडेंट के लिए वीज़ा के नियमो में बदलाव किया

अमेरिका ने विदेशी स्टूडेंट्स (F), एक्सचेंज विजिटर्स (J) और विदेशी मीडिया प्रतिनिधियों (I) के लिए वीजा नियमों में बड़े बदलावों का ऐलान किया है।

अब इन वीजा धारकों को अनिश्चितकाल के लिए नहीं, बल्कि एक निश्चित समय के लिए अमेरिका में रहने की इजाजत होगी। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने इस बदलाव का प्रस्ताव रखा है, ताकि इन वीजा धारकों पर नजर रखी जा सके और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत किया जाए।

इस नए नियम के तहत, अगर कोई स्टूडेंट, एक्सचेंज विजिटर या मीडिया प्रतिनिधि अपनी तय समय-सीमा से ज्यादा वक्त तक अमेरिका में रहना चाहता है, तो उसे DHS से एक्सटेंशन ऑफ स्टे (EOS) के लिए अर्जी देनी होगी।

यह प्रस्ताव इसलिए लाया गया है, क्योंकि मौजूदा "ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस" नियम के तहत इन लोगों को बिना किसी निश्चित तारीख के रहने की छूट थी, जिससे फ्रॉड और नियम तोड़ने की आशंका बढ़ गई थी।

क्यों जरूरी है यह बदलाव?

DHS का कहना है कि मौजूदा सिस्टम में इमिग्रेशन अधिकारियों को यह जांचने का मौका नहीं मिलता कि वीजा धारक नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं।

2023 में अमेरिका में 16 लाख से ज्यादा F-1 स्टूडेंट्स, 5 लाख से ज्यादा J एक्सचेंज विजिटर्स और 32,470 I वीजा धारक दाखिल हुए। इतनी बड़ी तादाद में लोगों की निगरानी मुश्किल हो रही थी।

नए नियमों से DHS को समय-समय पर यह जांचने का मौका मिलेगा कि वीजा धारक सिर्फ वही काम कर रहे हैं, जिसके लिए उन्हें इजाजत दी गई है। इससे न सिर्फ सिस्टम में पारदर्शिता आएगी, बल्कि फ्रॉड और गैरकानूनी गतिविधियों पर भी लगाम लगेगी।

क्या हैं नए नियमों की खास बातें?

प्रस्तावित नियमों में कई अहम बदलाव शामिल हैं। मिसाल के तौर पर, F और J वीजा धारकों को अधिकतम चार साल की अवधि के लिए प्रवेश या एक्सटेंशन मिलेगा। F-1 स्टूडेंट्स के लिए पढ़ाई खत्म होने के बाद दी जाने वाली ग्रेस पीरियड को 60 दिन से घटाकर 30 दिन किया जाएगा। इसके अलावा, ग्रेजुएट लेवल के F-1 स्टूडेंट्स अब बीच में अपना प्रोग्राम नहीं बदल सकेंगे।

 वीजा धारकों (विदेशी मीडिया) के लिए 240 दिन की समय-सीमा तय की गई है, सिवाय कुछ खास मामलों के, जैसे कि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना से जुड़े मामलों में। इन बदलावों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि हर वीजा धारक अमेरिकी इमिग्रेशन कानूनों का पालन करे।

कैसे होगा असर और क्या है आगे का रास्ता?

ये नियम F, J और I वीजा धारकों को बाकी नॉन-इमिग्रेंट वीजा कैटेगरी की तरह लाएंगे, जिनके लिए पहले से ही निश्चित समय-सीमा लागू है। DHS का मानना है कि इससे निगरानी आसान होगी और सिस्टम की मजबूती बढ़ेगी।

इन प्रस्तावित नियमों पर जनता अपनी राय दे सकती है। इसके लिए फेडरल रजिस्टर नोटिस में दी गई समय-सीमा के भीतर Docket No. ICEB-2025-0001 के तहत कमेंट्स जमा करने होंगे। अगर ये नियम लागू हो गए, तो विदेशी स्टूडेंट्स, एक्सचेंज विजिटर्स और मीडिया प्रतिनिधियों के लिए अमेरिका में रहने का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा।


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टैरिफ के बाद भारत ने अमेरिका के लिए सभी तरह के डाक सामानों की बुकिंग बंद की

ट्रम्प के टैरिफ के जवाब में भारतीय डाक विभाग 25 अगस्त से अमेरिका के लिए सभी तरह के डाक सामानों की बुकिंग बंद करने जा रही है। फिलहाल ये फैसला अस्थायी रूप से लागू होगा बाद में अमेरिका के रूख के हिसाब से इसमें आगे बदलाव होगा।

दरअसल विभाग अमेरिका के एक नए टैरिफ के चलते अपनी सेवाओं में बदलाव कर रहा है। अमेरिकी प्रशासन ने 30 जुलाई 2025 को एक आदेश (एग्जीक्यूटिव ऑर्डर नंबर 14324) जारी किया था, जिसके तहत 800 डॉलर तक की कीमत वाले सामानों पर मिलने वाली ड्यूटी-फ्री छूट 29 अगस्त 2025 से खत्म हो जाएगी।

अब अमेरिका जाने वाले सभी डाक सामानों पर, चाहे उनकी कीमत कुछ भी हो, कस्टम ड्यूटी देनी होगी। यह ड्यूटी इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर एक्ट (IEEPA) के तहत देश-विशेष टैरिफ नियमों के आधार पर लगेगी। हालांकि, 100 डॉलर तक के गिफ्ट आइटम को इस ड्यूटी से छूट मिलेगी।


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श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे को किया गया गिरफ्तार

श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे को गिरफ्तार कर लिया गया है। बताया जा रहा है कि कथित भ्रष्टाचार के मामले में उनकी गिरफ्तारी हुई है। जानकारी के अनुसार, शुक्रवार को कोलंबो में क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) ने पूर्व राष्ट्रपति को गिरफ्तार किया है।

बता दें कि उनकी गिरफ्तारी ऐसे समय पर हुई है, जब वह अपनी पुराने एक भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में अपना बयान दर्ज कराने के लिए सीआईडी के ऑफिस पहुंचे थे।

गए थे बयान दर्ज कराने हो गई गिरफ्तारी

मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे शुक्रवार को एफसीआईडी के सामने पेश हुए थे। यहां पर वह अपना बयान दर्ज कराने के लिए पहुंचे थे। अधिकारियों का कहना है कि पूर्व राष्ट्रपति की गिरफ्तारी के बाद उन्हें कोलंबो फोर्ट मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा।


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अमेरिकी टैरिफ के खिलाफ भारत के सपोर्ट में चीन

चीन के राजदूत शू फीहोंग ने गुरुवार को भारत पर लगाए गए 50% अमेरिकी टैरिफ की निंदा की। उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित एक प्रोग्राम में कहा कि चीन इसका कड़ा विरोध करता है। चुप रहने से दबंगई को बढ़ावा मिलता है। चीन भारत के साथ मजबूती से खड़ा है।

फीहोंग ने भारत और चीन के बीच रणनीतिक भरोसे और सहयोग को मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दोनों देश प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार हैं और मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाना चाहिए।

चीनी राजदूत ने कहा- भारत और चीन को आपसी संदेह से बचना चाहिए और रणनीतिक भरोसे को बढ़ाना चाहिए। दोनों देशों के लिए एकजुटता और सहयोग ही साझा विकास का रास्ता है।

अमेरिका ने भारत कुल 50% टैरिफ लगाया है। इसमें से एक्स्ट्रा 25% टैरिफ रूसी तेल खरीदने की वजह से लगाया है, जो 27 अगस्त से लागू होगा। अमेरिका का कहना है कि भारत के रूसी तेल खरीदने की वजह से रूस को यूक्रेन जंग में मदद मिल रही है।

फीहोंग बोले- भारत-चीन दोस्ती दुनिया के लिए फायदेमंद

फीहोंग ने ग्लोबल हालात पर कहा कि दुनिया इस समय बड़े बदलावों से गुजर रही है और ऐसे में भारत-चीन रिश्तों का महत्व और बढ़ गया है। उन्होंने कहा- भारत और चीन एशिया की आर्थिक प्रगति के दो इंजन हैं। हमारी दोस्ती न सिर्फ एशिया बल्कि पूरी दुनिया के लिए फायदेमंद है।

फीहोंग ने कहा कि SCO समिट के लिए पीएम मोदी चीन यात्रा दोनों देशों के संबंधों को नई गति देगी।" यह विजिट 31 अगस्त से 1 सितंबर तक चीन के तियानजिन में होगी।

हाल ही में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने पीएम मोदी से मुलाकात कर उन्हें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का निमंत्रण सौंपा था। मोदी ने निमंत्रण स्वीकार करते हुए कहा कि वह शी जिनपिंग से तियानजिन में मुलाकात के लिए उत्सुक हैं।

भारत-चीन के रिश्ते लगातार बेहतर हो रहे

चीनी राजदूत ने कहा कि पिछले साल रूस के कजान में पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद भारत और चीन के रिश्ते लगातार बेहतर हो रहे हैं।

दोनों देश एक-दूसरे के हितों का सम्मान कर रहे हैं और आपसी समझ बढ़ा रहे हैं। इस दौरान कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू होना भी एक बड़ा कदम है।

दोनों देश लिपुलेख के रास्ते फिर व्यापार शुरू करेंगे

भारत और चीन ने हाल ही में उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे के रास्ते फिर व्यापार शुरू करने पर सहमति जताई है। यह फैसला 18-19 अगस्त को चीनी विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान हुआ। बातचीत में लिपुलेख के साथ शिपकी ला और नाथु ला दर्रों से भी कारोबार बहाल करने का फैसला लिया गया।

भारत और चीन के बीच लिपुलेख के रास्ते 1954 से व्यापार हो रहा है, जो हाल के सालों में कोरोना और अन्य वजहों से रुका था। अब दोनों देशों ने इसे फिर शुरू करने का फैसला किया है। 

गलवान झड़प से बिगड़े थे भारत-चीन रिश्ते

15 जून 2020 को चीन ने ईस्टर्न लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों में एक्सरसाइज के बहाने सैनिकों को जमा किया था। इसके बाद कई जगह पर घुसपैठ की घटनाएं हुई थीं।

भारत सरकार ने भी इस इलाके में चीन के बराबर संख्या में सैनिक तैनात कर दिए थे। हालात इतने खराब हो गए कि LAC पर गोलियां चलीं।

इसी दौरान 15 जून को गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। बाद में भारत ने भी इसका मुंहतोड़ जवाब दिया था। इसमें करीब 60 चीनी जवान मारे गए थे।

इस घटना के बाद दोनों देशों के रिश्ते काफी तनावपूर्ण हो गए थे, लेकिन बाद में पीएम मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग की मुलाकात से इनमें सुधार शुरू हुआ है।


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साउथ अमेरिका के पास समंदर में भूकंप के तेज झटके, 7.5 तीव्रता से कांप गया

 साउथ अमेरिका के ड्रेक पैसेज इलाके में जोरदार भूकंप आया। शुरूआत में भूकंप की तीव्रता 8 बताई जा रही है। हालांकि बाद में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) ने इसकी तीव्रता 7.5 कर दी गई।

इस जोरदार भूकंप के बाद सुनामी की वॉर्निंग जारी कर दी गई है। यूएसजीएस के आंकड़ों के अनुसार, भूकंप 10.8 किलोमीटर की गहराई पर आया।

हालांकि अमेरिकी सुनामी चेतावनी प्रणाली ने ड्रेक पैसेज भूकंप के बाद कोई चेतावनी जारी नहीं की, लेकिन प्रशांत सुनामी चेतावनी केंद्र (पीटीडब्ल्यूसी) ने चिली के लिए संक्षिप्त चेतावनी जारी की है। इसमें कहा गया कि ड्रेक पैसेज में आए भूकंप से अगले तीन घंटों के भीतर चिली के कुछ तटों पर खतरनाक सुनामी लहरें उठने की आशंका है।


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आम जनता को नहीं मिलेगा रूस के सस्ते तेल का लाभ

बीते 3 साल से भारत को 5 से 30 डॉलर प्रति बैरल के डिस्काउंट पर रूस से क्रूड ऑयल मिल रहा है। इस डिस्काउंट का 65% फायदा रिलायंस और नायरा जैसी प्राइवेट कंपनियों के साथ इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम जैसी सरकारी कंपनियों को मिला। वहीं सरकार को 35% फायदा मिला। आम आदमी के हिस्से कुछ नहीं आया।

बीते दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर 50% टैरिफ लगाया है। उन्होंने इसका कारण रूस से तेल खरीद को बताया है। ट्रम्प का कहना है कि भारतीय रिफाइनरी कंपनियां इसे प्रोसेस करके यूरोप और अन्य देशों में बेच देती हैं। भारत को इस बात की कोई परवाह नहीं है कि रूस के हमले से यूक्रेन में कितने लोग मारे जा रहे हैं।

आम आदमी को सस्ते तेल का फायदा क्यों नहीं मिल रहा?

जवाब: भले ही तेल की कीमतें कागज पर डी-रेगुलेटेड हों, लेकिन रिटेल कीमतें सरकार और तेल कंपनियों के नियंत्रण में हैं। सरकार को टैक्स से स्थिर आय चाहिए और तेल कंपनियां पुराने LPG सब्सिडी के नुकसान का हवाला देकर अपने मार्जिन को जायज ठहराती हैं। नतीजा यह है कि सस्ते तेल का फायदा कंपनियों और सरकार के खजाने में जा रहा है, न कि आम लोगों की जेब में।

पेट्रोल और डीजल की कीमत का एक बड़ा हिस्सा टैक्स में चला जाता है। केंद्र सरकार पेट्रोल पर 13 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपए प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी वसूलती है। इसके अलावा, राज्य सरकारें वैल्यू-एडेड टैक्स (VAT) लगाती हैं। कुल मिलाकर, पेट्रोल की कीमत का 46% और डीजल की कीमत का 42% हिस्सा टैक्स होता है।

केंद्र सरकार हर साल इस टैक्स से 2.7 लाख करोड़ रुपए और राज्य सरकारें 2 लाख करोड़ रुपए कमाती हैं। अप्रैल 2025 में एक्साइज ड्यूटी में 2 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी से केंद्र को अतिरिक्त 32,000 करोड़ रुपए की कमाई हुई। सरकार के लिए यह टैक्स एक स्थिर और भरोसेमंद आय का स्रोत है। सस्ते तेल का फायदा ग्राहकों को देने के बजाय सरकार इस पैसे को अपने खजाने में रख रही है ताकि दूसरे खर्चे पूरे कर सके।

सवाल 2: तेल कंपनियों को सस्ते तेल से कितना मुनाफा हुआ?

जवाब: वित्त वर्ष 2020 में भारत अपनी जरूरत का केवल 1.7% तेल रूस से आयात करता था। ये हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 35.1% हो गई है। रूस से सस्ता तेल खरीदने का फायदा ऑयल कंपनियों के मुनाफे पर भी दिखा है।

2022-23 में इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम का कुल मुनाफा ₹3,400 करोड़ था।

2023-24 में इन तीनों सरकारी कंपनियों का मुनाफा 25 गुना बढ़ गया। तीनों ने मिलकर 86,000 करोड़ रुपए कमाए।

2024-2025 में इन कंपनियों का मुनाफा कम होकर 33,602 करोड़ रुपए हो गया, लेकिन ये 2022-23 के मुनाफे से ज्यादा है।

वहीं प्राइवेट रिफाइनरियों की बात की जाए तो भारत में मुख्य तौर पर दो बड़ी प्राइवेट कंपनियों की रिफाइनरियां है। रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी, दोनों सबसे ज्यादा क्रूड ऑयल प्रोसेस करती हैं। रिलायंस ने प्रति बैरल 12.5 डॉलर और नायरा ने 15.2 डॉलर का रिफाइनिंग मार्जिन हासिल किया। यानी, सस्ते में खरीदा, प्रोसेस किया और महंगे में बेचकर हर बैरल पर ज्यादा मुनाफा कमाया।

रूसी कच्चे तेल में रिलायंस-नायरा की 45% हिस्सेदारी: डेटा और एनालिटिक्स कंपनी केपलर के अनुसार, 2025 की पहली छमाही (24 जून तक) में भारत ने रूस से 23.1 करोड़ बैरल क्रूड आयात किया। रिलायंस और नायरा की इसमें 45% हिस्सेदारी थी। 2022 में रिलायंस की हिस्सेदारी 8% और नायरा की 7% थी।

रिलायंस ने कुल तेल का लगभग 30% रूस से खरीदा: रिलायंस के एक प्रवक्ता ने कहा कि रिलायंस द्वारा खरीदे जाने वाले कच्चे तेल का लगभग 30% रूस से आता है। लेकिन केवल रूसी कच्चे तेल पर छूट को ही मुनाफे का कारण बताना गलत है। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते मिली छूट से पहले और बाद भी ऐसा ही रहा है। यूरोप को प्रोडक्ट बेचकर जो कमाई होती है, वह हमारे कुल उत्पादन का एक छोटा सा हिस्सा है।

रूसी तेल को प्रोसेस करके अमेरिका-यूरोप में बेचा: रूसी क्रूड ऑयल को आयात करके और इसे पेट्रोल, डीजल और ATF जैसे हाई वैल्यू प्रोडक्ट में रिफाइन किया गया। इसके बाद इन्हें यूरोप, अमेरिका, यूएई, सिंगापुर जैसे देशों में निर्यात किया। 2025 की पहली छमाही में दोनों कंपनियों ने 6 करोड़ टन रिफाइंड प्रोडक्ट्स निर्यात किए, जिनमें से 1.5 करोड़ टन यूरोपीय यूनियन को बेचे गए। इसकी कीमत 15 अरब डॉलर थी।

सवाल 3: रूस से सस्ता तेल खरीदने की शुरुआत कैसे हुई?

जवाब: फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद रूस ने अपने तेल को एशिया की ओर मोड़ा। भारत ने 2021 में रूसी तेल का सिर्फ 0.2% आयात किया था, लेकिन 2023 तक यह 2.15 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच गया। 2025 में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना, जो औसतन 1.67 मिलियन बैरल प्रति दिन की आपूर्ति कर रहा है। यह भारत के कुल जरूरत का करीब 37% है।

सवाल 4: भारत रूस से तेल खरीदना क्यों नहीं बंद करता?

जवाब: भारत को रूस से तेल खरीदने के कई डायरेक्ट फायदे हैं...

अन्य देशों से सस्ता तेल: रूस अभी भी भारत को दूसरे देशों की तुलना में सस्ता तेल दे रहा है। 2023-2024 में रूस से सस्ते तेल की वजह से भारत ने 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की बचत की। हालांकि, जो डिस्काउंट पहले 30 डॉलर प्रति बैरल तक था वह अब 3-6 डॉलर प्रति बैरल तक रह गया है।

लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स: भारत की प्राइवेट कंपनियों के रूस के साथ लॉन्ग टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स हैं। उदाहरण के लिए, दिसंबर 2024 में रिलायंस ने रूस के साथ 10 साल के लिए हर रोज 5 लाख बैरल तेल खरीदी का कॉन्ट्रैक्ट किया। इस तरह के समझौतों को रातोंरात तोड़ना संभव नहीं है।

वैश्विक कीमतों पर प्रभाव: भारत का रूसी तेल आयात वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने में मदद करता है। यदि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देता है, तो ग्लोबल सप्लाई कम हो सकती है, जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं। यूक्रेन के साथ युद्ध के बाद मार्च 2022 में तेल की कीमतें 137 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं।

भारत रूस से सस्ता कच्चा तेल आयात करता है, जिसे वह रिफाइन करके पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन जैसे उत्पादों में बदलता है। इन उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों, खासकर यूरोप में निर्यात किया जाता है, जो रूस से सीधे तेल आयात पर प्रतिबंध लगाए हुए है। भारत का कहना है कि उसका यह व्यापार पूरी तरह पारदर्शी है और इसमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है।

रूस से तेल आयात पर कोई प्रतिबंध नहीं है, केवल एक प्राइस कैप लागू है, जो 2022 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने शुरू किया था। इस मूल्य सीमा का उद्देश्य रूस की तेल आय को सीमित करना था, लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए रूसी तेल को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया गया। भारत ने तर्क दिया कि रूस से तेल खरीदने से वैश्विक तेल की कीमतें नियंत्रण में रहती हैं।

अगर रूस जैसे बड़े तेल उत्पादक का तेल बाजार से हट जाए, तो अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने 2022 में वाशिंगटन डीसी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यूरोप के दोहरे रवैये की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था, "हम जो तेल खरीदते हैं, वह यूरोप द्वारा एक दोपहर में खरीदे गए तेल से कम है।

सवाल 5: भारत के पास रूस के अलावा किन देशों से तेल खरीदने के विकल्प हैं?

जवाब: भारत अपनी तेल जरूरतों का 80% से ज्यादा इंपोर्ट करता है। ज्यादातर तेल रूस के अलावा इराक, सऊदी अरब और अमेरिका जैसे देशों से खरीदता है। अगर रूस से तेल इंपोर्ट बंद करना है तो उसे इन देशों से अपना इंपोर्ट बढ़ाना होगा...

इराक: रूस के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर है, जो हमारे इंपोर्ट का लगभग 21% प्रोवाइड करता है।

सऊदी अरब: तीसरा बड़ा सप्लायर, जो हमारी जरूरतों का 15% तेल (करीब 7 लाख बैरल प्रतिदिन) सप्लाई करता है।

अमेरिका: जनवरी-जून 2025 में भारत ने अमेरिका से रोजाना 2.71 लाख बैरल तेल इंपोर्ट किया, जो पिछले से दोगुना है। जुलाई 2025 में अमेरिका की हिस्सेदारी भारत के तेल आयात में 7% तक पहुंच गई।

साउथ अफ्रिकन देश: नाइजीरिया और दूसरे साउथ अफ्रिकन देश भी भारत को तेल सप्लाई करते हैं और सरकारी रिफाइनरीज इन देशों की ओर रुख कर रही हैं।

अन्य देश: अबू धाबी (UAE) से मुरबान क्रूड भारत के लिए एक बड़ा ऑप्शन है। इसके अलावा, भारत ने गयाना ब्राजील, और अन्य लैटिन अमेरिकी देशों से भी तेल आयात शुरू किया है। हालांकि, इनसे तेल खरीदना आमतौर पर रूसी तेल की तुलना में महंगा है।

रूसी टैरिफ के कारण ट्रम्प के लगाए 50% टैरिफ पर भारत ने क्या कहा?

जवाब: भारत ने इस अतिरिक्त टैरिफ को "अनुचित, अनपेक्षित और अव्यवहारिक" करार दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के दोहरे मापदंडों को उजागर किया। भारत ने बताया कि अमेरिका खुद रूस से यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड, पैलेडियम, उर्वरक और रसायन जैसे उत्पाद आयात करता है।

वहीं, यूरोपीय संघ का रूस के साथ 2024 में 67.5 अरब यूरो का व्यापार हुआ, जिसमें 16.5 मिलियन टन तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का आयात शामिल है। यह 2022 के 15.2 मिलियन टन के पिछले रिकॉर्ड से भी ज्यादा है। इसके अलावा, यूरोप रूस से उर्वरक, खनन उत्पाद, रसायन, लोहा-इस्पात, मशीनरी और परिवहन उपकरण भी आयात करता है।

भारत का कहना है कि पश्चिमी देश खुद रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका रूस से तेल आयात राष्ट्रीय जरूरतों को पूरा करने के लिए है, न कि मुनाफे के लिए। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद फरवरी 2022 में भारत ने रूसी तेल आयात शुरू किया, क्योंकि यूरोप ने भारत के पारंपरिक तेल आपूर्तिकर्ताओं (खाड़ी देशों) से तेल खरीदना शुरू कर दिया था। भारत ने सस्ते रूसी तेल का उपयोग अपनी 1.4 अरब आबादी के लिए किफायती ऊर्जा सुनिश्चित करने के लिए किया।

अकेला भारत ऐसा देश नहीं है जो रूस से कच्चा तेल खरीदता है। 2024 में चीन ने 62.6 बिलियन डॉलर का तेल रूस से आयात किया था। वहीं भारत का इस दौरान रूस से तेल आयात 52.7 बिलियन डॉलर ही था। इसके बावजूद डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन पर अतिरिक्त टैरिफ न लगाते हुए ट्रेड डील के लिए 90 दिनों का समय दिया है।


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चीन पर मेहरबान हुए ट्रंप! 90 दिनों के लिए टैरिफ से फिर मिली छूट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान नजर आ रहे हैं। सोमवार को ट्रंप ने चीनी सामानों पर लगने वाले टैरिफ की डेडलाइन को फिर से आगे बढ़ा दिया। ट्रंप ने इस संबंध में एक आदेश पर हस्ताक्षर किए। यह फैसला चीन-अमेरिका के बीच टैरिफ वार की समयसीमा खत्म खत्म होने के कुछ घंटे पहले लिया गया।

अमेरिकी मीडिया वॉल स्ट्रीट जर्नल और सीएनबीसी ने बताया कि ट्रंप ने चीन पर लगने वाले टैरिफ पर रोक 90 दिनों के लिए बढ़ा दी है। यह रोक मंगलवार को समाप्त होने वाली थी। इतना ही नहीं, ट्रंप ने ये तक कह दिया कि चिनफिंग के साथ उनके संबंध बहुत अच्छे हैं और चीन काफी अच्छे से व्यवहार कर रहा है।

नवंबर तक चीन को मिली छूट

ट्रंप ने टैरिफ रोकने वाले जिस आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं, उसका पूरा टेक्स्ट अभी तक रिलीज नहीं किया गया है। लेकिन वॉल स्ट्रीट जर्नल ने दावा किया है कि यह छूट नवंबर शुरुआत में समाप्त हो जाएगा। चिनफिंग और ट्रंप ने टैरिफ को लेकर फोन पर बात भी की थी। चीन ने उम्मीद जताई है अमेरिका बातचीत के दौरान बनी सहमति का पालन करेगा।

बता दें कि इस साल की शुरुआत में ट्रंप ने चीन पर भारी-भरकम टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिका पर भयंकर टैरिफ लगा दिया था। लेकिन मई में दोनों देशों के बीच हुए समझाते में अस्थायी रूप से टैरिफ कम करने पर सहमति बनी थी। इसके बाद ट्रंप ने चीन पर लगने वाले टैरिफ को होल्ड कर दिया था। यह समयसीमा मंगलवार को खत्म होने वाली थी, जिसे फिर बढ़ा दिया गया है।

चीन पर लगने वाले टैरिफ को होल्ड किए जाने का मतलब है कि चीन से अमेरिका जाने वाले सामानों पर अभी केवल 30 फीसदी टैरिफ लगेगा। जबकि चीन अमेरिका से 10 फीसदी टैरिफ वसूल रहा है। वहीं ट्रंप ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने की घोषणा की है। इसमें 25 फीसदी टैरिफ रूस के तेल खरीदने के लिए लगाया गया है।


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पाकिस्तान-बांग्लादेश पर मेहरबान ट्रम्प, टैरिफ 20% से ज्यादा नहीं

दुनियाभर के देशों को टैरिफ से डरा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत के दो पड़ोसी देशों पर खासे मेहरबान हैं। ट्रम्प ने पाकिस्तान पर 19% तो बांग्लादेश पर 20% टैरिफ लगाने का ऐलान किया है।

इसके उलट भारत पर दो बार में 25-25% टैरिफ लगाने का आदेश दिया है। साथ ही सेकेंडरी सैंक्शन्स की धमकी भी दी है।

भारत की तरह ही ब्राजील पर ट्रम्प ने 50% टैरिफ लगा दिया है। वहीं, चीन पर फिलहाल 30% टैरिफ लगाया जा रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर टैरिफ दर बढ़ती है, तो चीन की GDP लगभग 1% तक घट सकती है।

देश जिन्हें टैरिफ से सबसे ज्यादा फायदा

1. पाकिस्तान: साउथ एशियाई देशों के मुकाबले सबसे कम टैरिफ

ट्रम्प ने पाकिस्तान पर 19% टैरिफ लगाया है। साउथ एशिया के किसी भी देश पर यह सबसे कम अमेरिकी टैरिफ है। इससे पहले ट्रम्प ने अप्रैल में पाकिस्तान पर 29% टैरिफ लगाने की बात कही थी।

नए आदेश में ट्रम्प ने पाकिस्तान को 10% की रियायत दी है। ट्रम्प ने पाकिस्तान के साथ ऑयल डील भी की है। इसके तहत अमेरिका, पाकिस्तान में तेल की खोज, प्रोसेसिंग और स्टोरेज बनाने में मदद करेगा।

पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र उसका कपड़ा उद्योग (80%) है। अमेरिका उसका सबसे बड़ा खरीदार है। कम टैरिफ से इसकी अमेरिकी बाजार में हिस्सेदारी बढ़ सकती है।

अमेरिका की पाकिस्तान के साथ डील, भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव ला सकती है। इससे पाकिस्तान, अमेरिका के साथ मिलकर अपनी क्षेत्रीय स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगा।

अमेरिका की मदद से पाकिस्तान को वर्ल्ड बैंक और IMF से वित्तीय सहायता भी मिल सकती है।

2. बांग्लादेश: 4 महीने में 17% टैरिफ कम करवाया

अमेरिका ने बांग्लादेश पर 20% टैरिफ लगाया है। इससे पहले अप्रैल में बांग्लादेश पर 37% टैरिफ लगाया गया था। बांग्लादेश 4 महीने में अमेरिका से 17% टैरिफ कम कराने में कामयाब रहा।

बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक है। भारत पर ज्यादा टैरिफ से इसका कपड़ा निर्यात बढ़ सकता है। 2024 में इसका निर्यात 8 अरब डॉलर (70 हजार करोड़ रुपए) था, जो 2026 तक 10 अरब डॉलर (88 हजार करोड़ रुपए) हो सकता है।

कम टैरिफ से बांग्लादेश अमेरिकी बाजार में अपनी 9% हिस्सेदारी बनाए रख सकता है। FBCCI के मुताबिक इससे देश की GDP में 2026 तक 0.2% तक बढ़ोतरी हो सकती है।

3. वियतनाम: टेक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में बढ़त

अमेरिका ने वियतनाम पर 20% टैरिफ लगाया है, लेकिन यह भारत (50% टैरिफ) और चीन (30%) की तुलना में कम है। इससे वियतनाम के सामानों को अमेरिकी बाजारों में आसानी से पहुंच मिलेगी।

वियतनाम को सेमीकंडक्टर सेक्टर में पहले ही बड़ी कंपनियों की ‘चाइना-प्लस-वन’ पॉलिसी (चीन के अलावा एक और साझेदार) का लाभ मिल रहा है।

एपल और सैमसंग जैसी कंपनियां चीन से अपनी सप्लाई चेन को वियतनाम ट्रांसफर कर रही हैं। दूसरे देशों की तुलना में कम टैरिफ होने से वियतनाम का अमेरिका को निर्यात बढ़ सकता है।

अमेरिका के कम टैरिफ का फायदा वियतनाम की टेक्सटाइल इंडस्ट्री खासकर सस्ते कपड़ों और रेडीमेड गारमेंट्स को होगा। 2013-2023 के बीच वियतनाम का कपड़ा निर्यात 82% बढ़कर लगभग 3 लाख करोड़ रुपए हो गया।

4. मेक्सिको: कई सामानों पर 0% टैरिफ

मेक्सिको पर अमेरिका ने 25% टैरिफ लगा रखा है। हालांकि मेक्सिको USMCA (United States-Mexico-Canada Agreement) के तहत व्यापार करता है। जिसके तहत कुछ छूट का लाभ उठा सकता है। USMCA के नियमों का पालन करने वालों सामानों पर अमेरिका ने मेक्सिको को 0% टैरिफ की छूट दी है।

मेक्सिको अमेरिका के साथ ट्रेड करने में पहले स्थान पर है। 2024 में अमेरिका के साथ व्यापार में मेक्सिको की भागीदारी 16% थी। ये अब और बढ़ सकती है।

मेक्सिको, अमेरिका को कारें, ट्रक और ऑटोमोबाइल पार्ट्स जैसे इंजन, ट्रांसमिशन का निर्यात करता है। मेक्सिको के ऑटोमोबाइल पार्ट्स के कुल निर्यात का लगभग 90% हिस्सा अमेरिका जाता है।

मेक्सिको, अमेरिका को कृषि उत्पाद (टमाटर, एवोकाडो, बेरीज नींबू, सब्जियां) निर्यात करता है। मेक्सिको अमेरिका का सबसे बड़ा एवोकाडो सप्लायर है। USMCA के तहत इन पर 0% टैरिफ लगता है, जिससे इस सेक्टर को फायदा होगा।

अमेरिका कुल स्टील निर्यात का 15-20% हिस्सा मेक्सिको से लेता है। ये कनाडा और ब्राजील के बाद तीसरे नंबर पर है। ब्राजील पर 50% टैरिफ होने के कारण अमेरिका मेक्सिको से स्टील निर्यात बढ़ा सकता है।

देश जिन्हें टैरिफ से सबसे ज्यादा नुकसान...

1. भारत- 25 से 30 लाख नौकरियां खतरे में

अमेरिका ने भारत पर 6 अगस्त को 25% एक्स्ट्रा टैरिफ लगा दिया। इससे भारत का कुल टैरिफ 25% से बढ़कर 50% हो गया है। ये एक्स्ट्रा टैरिफ 27 अगस्त से शुरू होगा। ट्रम्प ने टैरिफ बढ़ाने का कारण रूस से तेल खरीद को बताया।

अमेरिका ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने अमेरिका को लगभग 7.35 लाख करोड़ रुपए का सामान निर्यात किया। 50% टैरिफ से भारत के प्रोडक्ट अमेरिकी बाजार में महंगे होंगे, जिससे मांग में कमी आएगी।

अमेरिका 15% टेक्सटाइल भारत से आयात करता है। टैरिफ बढ़ने से इसमें गिरावट आ सकती है, जिसका असर भारत में टेक्सटाइल प्रोडक्शन पर पड़ सकता है।

हाई टैरिफ का असर रोजगार पर भी पड़ेगा। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, MSME (छोटे और मध्यम उद्योग) क्षेत्र में 25-30 लाख नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं।

भारत ने 2024 में 11 बिलियन डॉलर (₹91 हजार करोड़) का रत्न और ज्वेलरी निर्यात किए। टैरिफ से कीमतें बढ़ने पर मांग कम हो सकती है। इसका असर भारत के ज्वेलरी बाजार सूरत के डायमंड और पॉलिशिंग हब पर पड़ेगा।

2. ब्राजील: GDP में 2.7% तक की गिरावट का अनुमान

अमेरिका ने भारत की तरह ब्राजील पर भी 50% टैरिफ लगा रखा है। इसके पीछे ट्रम्प ने पूर्व राष्ट्रपति जायरे बोल्सोनारो पर मुकदमा चलाए जाने को वजह बताया है। राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने इसके खिलाफ विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शिकायत भी की है।

ब्राजील, अमेरिका को स्टील बेचने में तीसरे नंबर पर है। ब्राजील ने 2024 में अमेरिका को 10 बिलियन डॉलर (₹87 हजार करोड़) का स्टील और एल्यूमीनियम निर्यात किया था। टैरिफ लगने से इसे सबसे ज्यादा नुकसान होगा।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के मुताबिक, ब्राजील की GDP में 2.7% तक की गिरावट और 1 लाख से ज्यादा नौकरियां छिन सकती हैं।

बढ़ें टैरिफ का असर कॉफी उत्पादन पर भी पड़ेगा। 2024 में ब्राजील ने अमेरिका को 4.4 बिलियन डॉलर (₹38 हजार करोड़) की 4.40 लाख करोड़ किलो कॉफी निर्यात की।

3. चीन की GDP 1% तक गिरने का खतरा

अमेरिका ने मई में चीन पर 145% टैरिफ लगा दिया था। इसके बाद चीन ने अमेरिका पर 125% जवाबी टैरिफ लगाया। बातचीत के बाद दोनों ने एक दूसरे पर टैरिफ कम किया। अभी अमेरिका ने चीन पर 30% और चीन ने अमेरिका पर 10% टैरिफ लगाया है।

अमेरिका ने चीन को ट्रेड डील के लिए अलग से 12 अगस्त तक की मोहलत दी है। चीन पर अमेरिका के हाई टैरिफ का सीधा असर उसके निर्यात और इंडस्ट्री पर पड़ेगा।

चीन अमेरिका को लगभग 500 अरब डॉलर (43 लाख करोड़ रुपए) से अधिक का सामान निर्यात करता है। Apple जैसे ब्रांड चीन में बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन करते हैं। उन्हें मंहगाई का सामना करना पड़ेगा।

फाइनेंशियल  की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के व्यापक टैरिफ उपायों के बावजूद चीन का आर्थिक प्रभाव सीमित रहा है। यदि टैरिफ दर बढ़ती है, तो इससे चीन की GDP 1% तक घट सकती है।


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'सेमीकंडक्टर के आयात पर 100 प्रतिशत शुल्क लगेगा', भारत पर 50 फीसदी टैरिफ के बाद ट्रंप का एक और एलान

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों अपने टैरिफ वाले फैसले को लेकर सुर्खियों में हैं। उन्होंने हाल में ही भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने का एलान किया है। इसके बाद भारत पर टैरिफ बढ़कर 50 प्रतिशत हो गया है। अब एक नया एलान किया है।

दरअसल, बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह कंप्यूटर चिप्स और सेमी कंडक्टर के आयात पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का फैसला लेने वाले हैं। माना जा रहा है कि ट्रंप के इस कदम के बाद अमेरिका में इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल घरेलू उपकड़ों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने की संभावना है।

इन कंपनियों को ट्रंप देंगे छूट

हालांकि, इसके अलावा ट्रंप ने कहा कि वह उन कंपनियों को छूट देंगे, जो अमेरिका में ही सेमीकंडक्टर बनाती हैं। इसका मतलब है कि इन कंपनियों को सामान आयात करने पर शुल्क में राहत मिलेगी।

बता दें कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ओवल ऑफिस में एप्पल के सीईओ से टिम कुक से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने कहा कि हम कंप्यूटर चिप्स और सेमीकंडक्टर पर करीब 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की योजना बना रहे हैं। हालांकि, जो कंपनियां अमेरिका में इसका उत्पादन करती हैं उन्हें इस शुल्क से राहत मिलेगी।

ट्रंप के इस फैसले से अमेरिकी उपभोक्ताओं पर क्या होगा असर?

माना जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले का सीधा असर अमेरिका में उपभोक्ताओं पर देखने को मिल सकता है। अगर डोनाल्ड ट्रंप कंप्यूटर चिप्स और सेमीकंडक्टर पर 100 प्रतिशत का भारी टैरिफ लगाते हैं, तो इसके कारण मोबाइल, कार समेत कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण महंगे हो जाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि इन कंपनियों का मुनाफा कम हो जाएगा।

दुनिया में बढ़ रही सेमीकंडक्टर्स की मांग

बता दें कि अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देशों में सेमीकंडक्टर की मांग बढ़ रही है। कोरोना काल में दुनिया भर में चिप्स की भारी कमी हो गई थी। माना जा रहा है कि ट्रंप के इस फैसले के बाद कमोवेश वैसी ही स्थिति हो सकती है। आज के समय में दुनिया भर में चिप्स की मांग बढ़ती जा रही है। ऑटोमोबाइल, मोबाइल के लिए चिप्स की अहम भूमिका है। 


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पश्चिमी देशों का दोहरा रवैया, भारत को दे रहे उपदेश और खुद रूस से जमकर कर रहे Import

पश्चिमी देशों खास तौर पर अमेरिका और यूरोपीय संघ की तरफ से रूस से तेल खरीदने के मामले में भारत को लगातार उपदेश दिया जा रहा है और आर्थिक दंड लगाने की धमकी भी दी जा रही है लेकिन हकीकत यह है कि ये देश अभी भी रूस से लगातार अपनी जरूरत की चीजें खूब खरीद रहे हैं।

ताजे आंकड़े बताते हैं कि जुलाई, 2025 में रूस के पाइपलाइन से यूरोपीय देशों की गैस आपूर्ति में 37 फीसद की वृद्धि हुई है। यूरोपीय देशों का दावा कि उन्होंने रूस से कम ऊर्जा उत्पादों की खरीद की है, असलियत में पूरी तरह से गलत है। क्योंकि आंकड़ों में जो कमी दिख रही है वह इसलिए दिख रही है कि यूरोपीय देशों के ऊर्जा आयातकों को रूस को भुगतान करने में दिक्कत आ रही है।

क्यों भारत सरकार प्रतिबंधों पर गंभीर नहीं?

भारत सरकार के पास अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की खरीद-बिक्री को लेकर उक्त सारे आंकड़े हैं यहीं वजह है कि विदेश मंत्रालय यूरोपीय संघ की तरफ से रूस से ऊर्जा खरीद पर नये प्रतिबंध लगाने की धमकी को बहुत गंभीरता से नहीं ले रहा है।

ऊर्जा क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि इस तरह का प्रतिबंध वैश्विक ऊर्जा बाजार को और ज्यादा अस्थिर करेगा जिसका ज्यादा खामियाजा पश्चिमी देशों पर होगा।

कूटनीतिक सूत्रों ने हाल ही में क्रिया (सीआरईए-सेंटर फॉर रिसर्च ऑन इनर्जी एंड क्लीन एयर) की उस रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि, “जब से रूस ने यूक्रेन पर हमला किया है तब से यूरोपीय संघ ने रूस को ऊर्जा खरीद के बदले कुल 105.6 अरब डॉलर का भुगतान किया है जो रूस के कुल सैन्य बजट का 76 फीसद है।

रूसी इम्पोर्ट में बेतहाशा बढ़ोतरी

रूस का एलएनजी अभी तक यूरोपीय संघ के हर देश में इस्तेमाल हो रहा है। रूस का 87 फीसद एलएनजी स्पेन, बेल्जियम और फ्रांस को गया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा एलएनजी सिर्फ इन्हीं तीन देशों में इस्तेमाल किया गया।

फ्रांस के एलएनजी आयात में 47 फीसद तो नीदरलैंड ने रूसी एलएनजी के आयात में 81 फीसद वृद्धि की है। अगर वर्ष 2025 की बात करें दो यूरोपीय देशों ने रूस को एलएनजी के बदले 8.5 अरब डॉलर का भुगतान किया है।” यह बताता है कि रूस से आयातित ऊर्जा उत्पादों का विकल्प खोजने में यूरोपीय देश असफल रहे हैं। असलियत में दुनिया में कहीं से भी रूसी एलएनजी का विकल्प यूरोपीय देशों के पास नहीं है।

ट्रंप के बयानों पर भारत का रुख

भारत सरकार ने दो दिन पहले रूस से तेल व गैस की खरीद पर अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों को अन्यायपूर्ण व असंगत करार दिया है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप को सही स्थिति के बारे में पता नहीं है।

तभी मंगलवार को जब उनसे यह पूछा गया कि क्या अमेरिका अभी भी इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए आवश्यक धातु और परमाणु कार्यक्रम केलिए यूरेनियम की खरीद कर रहा है तो उनका जवाब था कि इस बात का उनको पता नहीं है।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपनी प्रतिक्रिया में अमेरिका को याद दिलाया था कि वह अपने परमाणु उद्योग के लिए यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड, ईवी उद्योग के लिए पैलेडियम और साथ ही फर्टिलाइजर्स की खरीद कर रहा है।


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