3 लाख का वॉटर प्यूरीफायर लेकर इंदौर पहुंचे शुभमन गिल, दूषित पानी से डरी टीम इंडिया

भारतीय क्रिकेट टीम तीसरे और निर्णायक मुकाबले के लिए इंदौर पहुंच चुकी है। हाल के दिनों में इंदौर देशभर में चर्चा का केंद्र बना हुआ है, जिसकी वजह यहां का दूषित पानी है। इस पानी को पीने से कई लोगों की मौत हो चुकी है और मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। ऐसे में टीम इंडिया भी पूरी तरह सतर्क नजर आ रही है। केवल खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) भी इस मुद्दे को लेकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता।

टीम इंडिया इंदौर के एक फाइव-स्टार होटल में ठहरी है, जहां आमतौर पर स्वच्छता और हाइजीन के उच्च मानकों का पालन किया जाता है। टीम के आगमन को देखते हुए होटल प्रबंधन ने भी अतिरिक्त इंतजाम किए हैं। इसके बावजूद, खिलाड़ियों और टीम मैनेजमेंट के बीच पानी की गुणवत्ता को लेकर चिंता बनी हुई है।

3 लाख का प्यूरीफायर

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, शुभमन गिल दूषित पानी से बचने के लिए अपने साथ करीब तीन लाख रुपये का अत्याधुनिक वाटर प्यूरीफायर लेकर इंदौर पहुंचे हैं। यह प्यूरीफायर न सिर्फ आरओ पानी, बल्कि बोतलबंद पानी को भी दोबारा शुद्ध करने में सक्षम है। गिल ने इस मशीन को अपने होटल के कमरे में इंस्टॉल करवाया है। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि जब इस विषय पर टीम इंडिया के मीडिया मैनेजर से प्रतिक्रिया मांगी गई, तो उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

होटल में पीने के सुरक्षित पानी के कई विकल्प मौजूद हैं, जिनमें आरओ और पैक्ड बोतलबंद पानी शामिल है। इसके बावजूद टीम इंडिया किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती। पानी को लेकर भारतीय टीम के स्टार बल्लेबाज विराट कोहली पहले से ही काफी सतर्क रहते हैं और वे आमतौर पर फ्रांस से आयातित इवियान नैचुरल स्प्रिंग वाटर का ही सेवन करते हैं।

क्या है पूरा मामला

इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से अब तक 23 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि, मध्य प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट में 15 मौतों की पुष्टि की है, लेकिन मुआवजा 21 परिवारों को दिया गया है। फिलहाल छह मरीज आईसीयू में भर्ती हैं, एक को जनरल वार्ड में शिफ्ट किया गया है, जबकि तीन मरीज अभी भी वेंटिलेटर पर हैं। इस घटना के बाद राज्य सरकार को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है।


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झारखंड में ‘कोल्ड डायरिया’ का अलर्ट, बच्चों में तेजी से फैल रहा रोटा वायरस

कड़ाके की ठंड और गिरते तापमान के बीच झारखंड में मौसमी बीमारियों ने चिंताजनक रूप ले लिया है। इन दिनों बच्चों में रोटा वायरस के कारण होने वाला ‘कोल्ड डायरिया’ तेजी से फैल रहा है। अस्पतालों में ऐसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वहीं, बुजुर्गों में ब्लड प्रेशर और जोड़ों के दर्द की शिकायतें भी गंभीर होती जा रही हैं।

सदर अस्पताल के सीनियर फिजिशियन डॉ. हरीश चंद्र ने लोगों की स्वास्थ्य से जुड़ी जिज्ञासाओं का समाधान किया। उन्होंने बताया कि ठंड के मौसम में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे वे रोटा वायरस की चपेट में आसानी से आ जाते हैं।

डॉ. हरीश चंद्र के अनुसार, बच्चों में रोटा वायरस के प्रमुख लक्षणों में पेट में मरोड़, लगातार उल्टी, बार-बार दस्त और शरीर में पानी की कमी शामिल है। उन्होंने सलाह दी कि बच्चों को बिना चिकित्सकीय परामर्श के कोई दवा न दें। उन्हें लगातार ओआरएस का घोल पिलाते रहें और गर्म कपड़े पहनाकर रखें। साथ ही छोटे बच्चों को भीड़-भाड़ वाली जगहों पर ले जाने से बचें।

ठंड का असर बुजुर्गों और पहले से बीपी व शुगर से पीड़ित मरीजों पर भी ज्यादा पड़ता है। डॉक्टरों के अनुसार, सर्दियों में शरीर की नसें सिकुड़ जाती हैं, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर के मरीजों को सुबह उठते ही ठंडी हवा या ठंडे पानी के संपर्क में आने से बचना चाहिए और नहाने के लिए गुनगुने पानी का उपयोग करना चाहिए। वहीं, मधुमेह के मरीजों को सर्दियों में भी हल्का व्यायाम जारी रखना चाहिए और खान-पान में फाइबर युक्त भोजन को शामिल करना चाहिए।

विशेषज्ञों ने सर्दियों में स्वस्थ रहने के लिए कुछ जरूरी सावधानियां अपनाने की भी सलाह दी है। धूप निकलने पर विटामिन-डी के लिए कुछ देर धूप में बैठें। कपड़ों की लेयरिंग करें, यानी एक भारी स्वेटर की बजाय दो-तीन हल्के गर्म कपड़े पहनें। आहार में बाजरा, मकई और रागी जैसे मोटे अनाज शामिल करें, पर्याप्त मात्रा में गुनगुना पानी पीते रहें और रोजाना 7 से 8 घंटे की नींद जरूर लें। डॉक्टरों का कहना है कि छोटी-छोटी सावधानियां अपनाकर सर्दी के मौसम में बड़ी बीमारियों से बचा जा सकता है।


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दूषित पानी बना बीमारी की वजह: इंदौर में 110 मरीज भर्ती, 15 की हालत गंभीर

इंदौर के भगीरथपुरा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र क्षेत्र में दूषित पेयजल से जुड़े उल्टी-दस्त के 38 नए मामले सोमवार को सामने आए है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि दूषित पेयजल कांड में अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है। अधिकारियों ने कहा कि छह मरीजों को उपचार के लिए अस्पतालों में रेफर किया गया है, जबकि 110 मरीजों का अस्पतालों में इलाज चल रहा है। इनमें से 15 मरीजों को आईसीयू में भर्ती किया गया है। 

अब तक 7 मौतें- स्वास्थ्य विभाग

इंदौर संभागायुक्त सुदाम खाड़े ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, अब तक 7 मौतें दर्ज की गई हैं। इससे एक दिन पहले तक अधिकारी 6 मौतों की पुष्टि कर रहे थे। हालांकि, स्थानीय लोगों ने इस बीमारी से 17 लोगों की मौत का दावा किया है। 

‘कोबो टूल’ के माध्यम से घर-घर सर्वेक्षण

इस बीच, स्वास्थ्य विभाग ने स्थिति का आकलन करने और प्रभावित क्षेत्र में क्लोरीनयुक्त पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भगीरथपुरा इलाके में ‘कोबो टूल’ के माध्यम से घर-घर सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण के लिए केंद्र सरकार के क्षेत्रीय स्वास्थ्य निदेशक डॉक्टर चंद्रशेखर गेडाम द्वारा जिला प्रशासन के सहयोग से प्रशिक्षण दिया गया था। 

करीब 200 टीमों को किया गया तैनात

अधिकारियों ने कहा कि यह टूल क्षेत्र की स्थिति का रियल-टाइम आकलन करने में सहायक है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉक्टर माधव प्रसाद हासानी के निर्देश पर क्षेत्र में करीब 200 टीमों को तैनात किया गया। प्रत्येक टीम ने पूर्व-चिह्नित घरों का दौरा कर सर्वेक्षण किया। 

स्वास्थ्य विभाग की टीम ने बांटी किट

एक आधिकारिक बयान के मुताबिक, प्रत्येक परिवार को ओआरएस के 10 पैकेट, जिंक की 30 गोलियां और एक ‘क्लीन वॉटर ड्रॉपर’ वितरित किया गया। निवासियों को 10 लीटर पानी में आठ से 10 बूंदें ‘क्लीन वॉटर’ द्रव डालकर एक घंटे बाद उपयोग करने की सलाह दी गई है।

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इंदौर में जहरीला पानी बना संकट, 15 की जान गई, सैकड़ों बीमार

इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी के कारण बीमार होने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। गुरुवार को 338 नए मरीज सामने आए हैं। फिलहाल 32 मरीज आईसीयू में भर्ती हैं, जबकि अन्य को प्राथमिक उपचार दिया गया है। अब तक करीब 2800 मरीज उल्टी-दस्त और पेट संबंधी बीमारियों से प्रभावित हो चुके हैं।

एक और मौत

भागीरथपुरा में दूषित पानी की वजह से शुक्रवार को एक और बुजुर्ग महिला की मौत हो गई। इसके साथ ही इस हादसे में जान गंवाने वालों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है। जानकारी के अनुसार, बुजुर्ग महिला का अरविंदो अस्पताल में इलाज चल रहा था, जहां उन्होंने दम तोड़ दिया।

भागीरथपुरा स्थित स्वास्थ्य केंद्र पर सुबह से देर रात तक मरीजों की भीड़ लगी रही। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक बड़ी संख्या में लोग इलाज के लिए पहुंचे, जिनमें अधिकांश उल्टी-दस्त से पीड़ित हैं। क्षेत्र के रहवासियों में भारी आक्रोश है और कई परिवारों में सभी सदस्य बीमार पड़ चुके हैं।

प्रशासन की ओर से पानी के टैंकर भेजे जा रहे हैं, लेकिन लोग उसका पानी इस्तेमाल करने से भी डर रहे हैं। कई लोग आरओ का पानी मंगवाकर पीने को मजबूर हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार 21 टीमें गठित की गई हैं, जिनमें डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ, एएनएम और आशा कार्यकर्ता शामिल हैं। ये टीमें घर-घर जाकर उबला पानी पीने और बाहर का खाना न खाने की सलाह दे रही हैं।

गुरुवार को 1714 घरों का सर्वे किया गया, जिसमें 8571 लोगों की जांच की गई। इनमें से 338 मरीज पाए गए, जिन्हें प्राथमिक उपचार दिया गया। अब तक कुल 272 मरीजों को अस्पताल में भर्ती किया गया है, जिनमें से 71 को डिस्चार्ज किया जा चुका है। वर्तमान में विभिन्न अस्पतालों में 201 मरीज भर्ती हैं, जिनमें 32 की हालत गंभीर बनी हुई है और वे आईसीयू में हैं।

जोन नंबर पांच में बढ़ीं जल संबंधी शिकायतें

भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद नगर निगम ने जल संबंधी शिकायतों को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। साल के पहले दिन दोपहर 2:30 बजे तक इंदौर-311 हेल्पलाइन पर पिछले 24 घंटों में 206 जल संबंधी शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें सबसे अधिक शिकायतें जोन नंबर पांच से सामने आई हैं।


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कैंसर के इलाज में नई उम्मीद: वैज्ञानिकों ने पौधों से एंटी-कैंसर दवा का फॉर्मूला खोजा

यूबीसी ओकनागन के वैज्ञानिकों ने यह अहम खोज की है कि पौधे एक दुर्लभ प्राकृतिक यौगिक माइट्रैफिलीन कैसे बनाते हैं, जिसे कैंसर-रोधी प्रभावों से जोड़ा जा रहा है। शोध में दो ऐसे प्रमुख एंजाइमों की पहचान की गई है, जो अणुओं को सही आकार देने और अंतिम रूप में मोड़ने का काम करते हैं। इस खोज ने उस वैज्ञानिक पहेली को सुलझा दिया है, जो वर्षों से शोधकर्ताओं को उलझाए हुए थी।

इस उपलब्धि से माइट्रैफिलीन और इससे जुड़े अन्य यौगिकों का उत्पादन भविष्य में कहीं अधिक आसान हो सकता है। साथ ही यह भी सामने आया है कि पौधे अप्रयुक्त चिकित्सीय क्षमता के साथ अत्यंत कुशल “प्राकृतिक रसायनज्ञ” की तरह काम करते हैं। माइट्रैफिलीन एक दुर्लभ प्राकृतिक पदार्थ है, जो अपनी संभावित एंटी-कैंसर भूमिका के कारण वैज्ञानिकों का ध्यान खींच रहा है।

माइट्रैफिलीन एक विशेष रासायनिक समूह स्पाइरोऑक्सिंडोल एल्कलॉइड्स का हिस्सा है। इन अणुओं की पहचान उनके अनोखे मुड़े हुए रिंग स्ट्रक्चर से होती है, जो इन्हें शक्तिशाली जैविक गुण प्रदान करता है। इन्हीं गुणों के कारण इनमें एंटी-ट्यूमर और एंटी-इंफ्लेमेटरी प्रभाव देखे जाते हैं। हालांकि वैज्ञानिकों को लंबे समय से इन यौगिकों के महत्व का अंदाजा था, लेकिन पौधों में इनके बनने की सटीक प्रक्रिया अब तक स्पष्ट नहीं थी।

जैविक रहस्य का समाधान

2023 में यूबीसी ओकनागन के इरविंग के. बार्बर फैकल्टी ऑफ साइंस में डॉ. थू थुई डांग के नेतृत्व में एक टीम ने उस पहले एंजाइम की पहचान की थी, जो इन अणुओं में मौजूद विशेष स्पाइरो संरचना बनाने में सक्षम है। इसी शोध को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टोरल छात्र तुआन आन्ह गुयेन ने माइट्रैफिलीन के निर्माण में शामिल दो अहम एंजाइमों की पहचान की। इनमें से एक एंजाइम अणु को सही त्रि-आयामी संरचना देता है, जबकि दूसरा उसे उसके अंतिम स्वरूप में बदल देता है।

डॉ. डांग के अनुसार, यह खोज किसी असेंबली लाइन की गायब कड़ियों को ढूंढने जैसी है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि प्रकृति इतने जटिल अणुओं का निर्माण कैसे करती है और अब वैज्ञानिक उसी प्रक्रिया को प्रयोगशाला में दोहराने के नए रास्ते तलाश सकते हैं।

माइट्रैफिलीन प्राप्त करना क्यों है मुश्किल

कई प्राकृतिक यौगिक पौधों में बेहद कम मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे उनका उत्पादन महंगा और कठिन हो जाता है। माइट्रैफिलीन भी ऐसा ही यौगिक है, जो उष्णकटिबंधीय पेड़ों जैसे माइट्रागाइना (क्रैटम) और अनकारिया (कैट्स क्लॉ) में बहुत ही कम मात्रा में मौजूद होता है। यही वजह है कि अब तक इसका बड़े पैमाने पर उपयोग संभव नहीं हो पाया था।

इको-फ्रेंडली दवा उत्पादन की ओर कदम

तुआन आन्ह गुयेन का कहना है कि इस खोज से माइट्रैफिलीन जैसे यौगिकों तक पहुंचने के लिए ग्रीन केमिस्ट्री आधारित तरीके अपनाए जा सकते हैं। इससे न केवल पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचेगा, बल्कि दवा उत्पादन भी अधिक टिकाऊ और किफायती हो सकेगा। उन्होंने इस शोध को एक ऐसे सहयोगी वातावरण का परिणाम बताया, जहां छात्र और वैज्ञानिक मिलकर वैश्विक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान पर काम कर रहे हैं।


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जहरीली हवा से बढ़ रहा लंग कैंसर का खतरा, इन 8 लक्षणों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज

लंग कैंसर दुनियाभर में कैंसर से होने वाली मौतों के सबसे बड़े कारणों में शामिल है। भारत में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसमें बढ़ते प्रदूषण की बड़ी भूमिका है। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण PM2.5 फेफड़ों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं और इस कारण लंग कैंसर (Lung Cancer) का जोखिम बढ़ जाता है।

ऐसे में प्रदूषण से बचाव के साथ-साथ लंग कैंसर के शुरुआती लक्षणों (Symptoms of Lung Cancer) की जानकारी होना बेहद जरूरी है, ताकि समय रहते बीमारी का पता लगाया जा सके और प्रभावी इलाज मिल सके। आइए जानें कि लंग कैंसर के संकेत कैसे नजर आते हैं और प्रदूषण किस तरह इसके खतरे को बढ़ा देता है।

लंग कैंसर के लक्षण कैसे नजर आते हैं?

शुरुआती स्टेज में लंग कैंसर के संकेत आमतौर पर स्पष्ट नहीं होते, जिससे बीमारी की पहचान देरी से होती है। जैसे-जैसे कैंसर बढ़ता है, निम्न लक्षण दिखने लगते हैं—

लगातार खांसी – तीन सप्ताह से अधिक समय तक बनी रहने वाली और धीरे-धीरे बढ़ती खांसी।

खांसी में खून – बलगम के साथ खून आना।

सांस लेने में दिक्कत – सामान्य गतिविधियों में भी सांस फूलना या घरघराहट।

सीने में दर्द – गहरी सांस, खांसने या हंसने पर छाती में दर्द या जकड़न।

आवाज में बदलाव – आवाज भारी या कर्कश होना।

बिना वजह वजन घटना – अचानक और अनइक्सप्लेंड वेट लॉस।

थकान महसूस होना – लगातार कमजोरी और थकावट।

बार-बार फेफड़ों का इन्फेक्शन – निमोनिया या ब्रोंकाइटिस का बार-बार होना।

ये संकेत कई अन्य सांस संबंधी बीमारियों जैसे लग सकते हैं, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। खास बात यह है कि नॉन-स्मोकर्स भी इस बीमारी का शिकार हो सकते हैं, इसलिए इन लक्षणों को कभी हल्के में न लें।

प्रदूषण कैसे बढ़ाता है लंग कैंसर का खतरा?

PM2.5 कणों का गहराई तक प्रवेश – वाहन, फैक्ट्री और निर्माण कार्यों से निकलने वाले बेहद सूक्ष्म कण सीधे फेफड़ों की गहराई तक पहुंचकर सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं और कैंसर से जुड़ी म्यूटेशन की शुरुआत कर सकते हैं।

कार्सिनोजेनिक केमिकल्स – प्रदूषित हवा में मौजूद बेंजीन, फॉर्मलडिहाइड, आर्सेनिक और PAHs जैसे तत्व डीएनए को नुकसान पहुंचाकर कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं।

लगातार सूजन – लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से फेफड़ों में क्रॉनिक इंफ्लेमेशन होता है, जो सेल डैमेज और अनकंट्रोल्ड सेल बढ़ोतरी को बढ़ावा देता है।

इम्युनिटी कमजोर होना – प्रदूषण शरीर की प्राकृतिक कैंसर-रोधी क्षमता को प्रभावित कर असामान्य कोशिकाओं को बढ़ने का मौका देता है।

धूम्रपान के दुष्प्रभाव को दोगुना करना – प्रदूषण और स्मोकिंग का संयोजन फेफड़ों पर कई गुना अधिक खतरनाक असर डालता है।


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जीवन जीने की वास्तविक कला है योग , जीवन का मूल आधार है योग

योग एक प्राचीन भारतीय शास्त्र है जो शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक विकास का मार्ग दिखाता है। यह शरीर को स्वस्थ रखने के साथ-साथ मन को शांत और सशक्त बनाता है। योग जीवन का आधार इसलिए माना जाता है क्योंकि यह तनाव कम करता है, एकाग्रता बढ़ाता है, और व्यक्ति को संतुलित और सफल जीवन जीने में मदद करता है। नियमित योगाभ्यास से शारीरिक रोग दूर होते हैं और मानसिक शांति प्राप्त होती है, जिससे जीवन सुखमय और सार्थक बनता है। इसलिए योग को जीवन के प्रति एक मजबूत आधार के रूप में स्वीकार किया जाता है। शारीरिक लाभों के अलावा, योग का एक सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में भी मदद करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि योग किसी भी व्यक्ति को तनाव से निपटने में मदद करता है, जिसके शरीर और मन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ने के लिए जाना जाता है।  तनाव कई रूपों में प्रकट हो सकता है, जिसमें पीठ या गर्दन में दर्द, नींद न आना, सिरदर्द, नशीली दवाओं का सेवन और ध्यान केंद्रित न कर पाना शामिल है।" योग, तनाव से निपटने में  भी प्रभावी होता है।  योग लोगों को अपने जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने में मदद करता है।

बेहतर एकाग्रता, शांत मन के अनेको लाभों में से एक है। आधुनिक जीवन के लोग एकाग्रता के महत्व को भलीभांति समझते हैं, क्योंकि वे अक्सर खुद को एक से अधिक कार्यों में उलझा हुआ पाते हैं। ध्यान, एकाग्रता को तीव्र करने का एक प्रभावशाली अभ्यास है। ध्यान में, जब भी आपका मन भटकता है, आप अपना ध्यान श्वास, मंत्र या किसी दृश्य पर केंद्रित करते हैं। ओर उससे आपका मन बेहतर एकाग्रता प्राप्त करता है।

गतिहीन जीवनशैली कई शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनती है, जैसे सीमित लचीलापन, कमज़ोर शक्ति, खराब मुद्रा, अकड़न, और भी बहुत कुछ। योग आसन शरीर को विभिन्न दिशाओं में गति करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिससे अकड़न कम होती है, जोड़ों की गतिशीलता बढ़ती है और दबी हुई भावनाएँ मुक्त होती हैं जिससे शक्ति और लचीलापन बढ़ता है। मांसपेशियों, ऊतकों और स्नायुबंधों के स्वस्थ रखरखाव के लिए अधिक शक्ति और लचीलापन महत्वपूर्ण है।


वैभव भारद्वाज ( परा मनोवैज्ञानिक)

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दिल्ली-NCR में खतरनाक प्रदूषण: AQI 400 के ऊपर, सांस लेना मुश्किल

दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर बना हुआ है। राजधानी में धुंध की मोटी परत छाई हुई है और बृहस्पतिवार (20 नवंबर) को भी हवा की गुणवत्ता बेहद खराब रही। दिल्ली के अधिकांश इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 400 से ऊपर दर्ज किया गया है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, बृहस्पतिवार सुबह 7 बजे दिल्ली का औसत AQI 399 रहा। कई क्षेत्रों में AQI ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच गया—पंजाबी बाग में 439, आनंद विहार में 420, बवाना में 438, बुराड़ी में 414, जहांगीरपुरी में 451 और वजीरपुर में 477 रिकॉर्ड किया गया।

इसके अलावा अलीपुर में AQI 366, चांदनी चौक में 418, आईटीओ में 400, द्वारका में 411 और नरेला में 392 दर्ज किया गया। दिल्ली से सटे इलाकों में भी स्थिति चिंताजनक है—नोएडा सेक्टर-62 में AQI 348, गाजियाबाद के वसुंधरा में 430, इंदिरापुरम में 428 और गुरुग्राम सेक्टर-51 में 342 रिकॉर्ड किया गया। इससे पहले बुधवार को दिल्ली का औसत AQI 392 था, जो ‘गंभीर’ श्रेणी के करीब पहुंच गया था।

गौरतलब है कि CPCB मानकों के अनुसार, AQI 0-50 ‘अच्छा’, 51-100 ‘संतोषजनक’, 101-200 ‘मध्यम’, 201-300 ‘खराब’, 301-400 ‘बहुत खराब’ और 401-500 ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है।


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दिल्ली की हवा फिर जहरीली, मध्यप्रदेश में बढ़ी ठिठुरन

विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय मौसम प्रणालियों के बावजूद हवा की रफ्तार बेहद कम रहने से मौसम में खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। मौसम विज्ञानियों का कहना है कि आने वाले दो दिनों में रात के तापमान में 2 से 3 डिग्री तक बढ़ोतरी हो सकती है। गुरुवार सुबह मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल घने कोहरे की चादर में लिपटा रहा। वहीं, सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अनुसार, सुबह 7 बजे दिल्ली के अधिकांश इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘बेहद खराब’ श्रेणी में दर्ज किया गया, जिससे लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है और मास्क पहनना मजबूरी बन गया है। इंडिया गेट क्षेत्र में प्रदूषण की धुंध साफ दिखाई दी और AQI 400 के पार पहुंच गया।

मैदानी इलाकों में बढ़ी गलन

पहाड़ी राज्यों में जारी बर्फबारी का असर मैदानी क्षेत्रों में भी साफ दिख रहा है। मध्य प्रदेश में पिछले एक सप्ताह से कड़ाके की ठंड बनी हुई है। बीते 24 घंटों में भोपाल, इंदौर, जबलपुर, उज्जैन सहित 15 शहरों का न्यूनतम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे दर्ज हुआ। शाजापुर 6.4 डिग्री के साथ प्रदेश का सबसे ठंडा स्थान रहा।

अगले दो दिनों के लिए अलर्ट

भोपाल, इंदौर समेत छह जिलों में शीतलहर चलने की संभावना है और अगले दो दिनों के लिए अलर्ट जारी किया गया है। राजस्थान के माउंट आबू में पारा शून्य के करीब पहुंच गया, जबकि अन्य जिलों में तापमान सामान्य से 3-4 डिग्री नीचे दर्ज हुआ है। हिमाचल प्रदेश में हालिया दिनों में बर्फबारी कम हुई है, लेकिन 29 शहरों में न्यूनतम तापमान 10 डिग्री से नीचे बना हुआ है। लाहौल-स्पीति में तापमान लगातार माइनस में बना है।

राजस्थान में जमने लगी ओस की बर्फ

माउंट आबू में ठंडी बयार के चलते ओस की बूंदें जमकर बर्फ में बदल गईं। हालांकि धूप निकलने के बाद हल्की राहत मिली। फतेहपुर, नागौर, सीकर और दौसा में भी तेज सर्दी महसूस की गई।

उत्तराखंड में कोहरा और बढ़ती ठंड

उत्तराखंड के निचले इलाकों में सुबह-शाम कोहरा छाया रहता है। मौसम विभाग ने अगले दिनों के लिए कड़ाके की ठंड का अलर्ट जारी किया है, जिसके दौरान तापमान में 4-5 डिग्री तक गिरावट आने की संभावना है।


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भारत में बढ़ा खतरा: 83% मरीजों में मिले मल्टीड्रग रेजिस्टेंट सुपरबग

हाल ही में Lancet eClinical Medicine में प्रकाशित एक स्टडी ने भारत में बढ़ते एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। अध्ययन के अनुसार, भारतीय मरीजों में 83% तक मल्टीड्रग रेजिस्टेंट ऑर्गैनिज्म (MDROs) पाए गए हैं, जो दुनिया के सबसे ऊंचे आंकड़ों में से एक है। यह स्थिति बताती है कि सुपरबग (Superbug) का खतरा अब सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक स्तर पर फैल चुका है।

चार देशों—भारत, इटली, अमेरिका और नीदरलैंड—में 1,200 से अधिक मरीजों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि भारत की स्थिति सबसे गंभीर है। आंकड़े इस प्रकार रहे—भारत 83%, इटली 31.5%, अमेरिका 20.1% और नीदरलैंड 10.8%। भारतीय मरीजों में विशेष रूप से 70.2% ESBL-प्रोड्यूसिंग बैक्टीरिया और 23.5% कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया मिले। यह बैक्टीरिया उन ‘लास्ट-रिज़ॉर्ट’ एंटीबायोटिक्स पर भी असर नहीं होने देते, जिन्हें बेहद गंभीर संक्रमण में अंतिम विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

स्टडी में यह भी पाया गया कि यह समस्या मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री से नहीं जुड़ी, बल्कि समाज में एंटीबायोटिक्स के गलत और अत्यधिक इस्तेमाल से बढ़ रही है। यह चिंताजनक है कि 80% से अधिक मरीजों में रेजिस्टेंट बैक्टीरिया पाए गए, जो एंटीबायोटिक्स के उपयोग पर सख्त नियंत्रण की जरूरत को दर्शाते हैं।

भारत में रेजिस्टेंस बढ़ने की कई वजहें सामने आई हैं—बिना प्रिस्क्रिप्शन एंटीबायोटिक लेना, वायरल बीमारियों में भी दवाओं का सेवन, दवाओं का पूरा कोर्स न करना और पशुओं व खेतों में एंटीबायोटिक्स का बढ़ता उपयोग। इससे बैक्टीरिया समय के साथ मजबूत होते जाते हैं और दवाओं पर असर नहीं रहता।

एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का असर बेहद गंभीर है। इससे उपचार न केवल कठिन होता है, बल्कि खर्च भी कई गुना बढ़ जाता है। जहां सामान्य मरीज कुछ दिनों में कम खर्च में ठीक हो जाता है, वहीं MDR मरीज को ICU, महंगी दवाओं और लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने की जरूरत पड़ सकती है।

सुपरबग से बचाव के लिए कुछ सरल लेकिन जरूरी कदम अपनाने चाहिए—बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक न लें, बची हुई दवाओं का प्रयोग न करें, वायरल बीमारियों में एंटीबायोटिक की मांग न करें और डॉक्टर द्वारा बताए गए कोर्स को पूरा करें। साथ ही, साफ-सफाई, सुरक्षित भोजन, स्वच्छ पानी और समय पर वैक्सीन लगवाना भी बेहद जरूरी है। पालतू जानवरों में भी एंटीबायोटिक का उपयोग केवल वेटरनरी डॉक्टर की सलाह पर ही होना चाहिए।


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