सरकार का बड़ा कदम: AI कंटेंट पर लेबल अनिवार्य, नियम लागू

अगर कोई फोटो, वीडियो या ऑडियो एआई की मदद से बनाया गया है, तो उस पर 'लेबल' लगाना जरूरी कर दिया गया है। इसके साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को किसी भी आपत्तिजनक कंटेंट को शिकायत मिलने के महज 3 घंटे के भीतर हटाना होगा। ये नए नियम 20 फरवरी 2026 से लागू हो गए हैं। 10 फरवरी को इसका नोटिफिकेशन जारी हुआ था।

पीएम बोले- कंटेंट पर 'ऑथेंटिसिटी लेबल' की जरूरत

इन नियमों के लागू होने से एक दिन पहले यानी, 19 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने AI समिट में भी लेबल को लेकर सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि जैसे खाने के सामान पर 'न्यूट्रिशन लेबल' होता है, वैसे ही डिजिटल कंटेंट पर भी लेबल होना चाहिए। इससे लोगों को पता चल सकेगा कि क्या असली है और क्या फैब्रिकेटेड, यानी एआई से बनाया गया है।

मेटाडेटा से छेड़छाड़ की तो डिलीट होगा पोस्ट

1. एआई लेबल: वीडियो पर 'डिजिटल स्टैम्प'

जैसे खाने के पैकेट पर लिखा होता है कि वह 'शाकाहारी' है या 'मांसाहारी', ठीक वैसे ही अब हर एआई वीडियो, फोटो या ऑडियो पर एक लेबल लगा होगा।

मान लीजिए आपने एआई से एक वीडियो बनाया जिसमें कोई नेता भाषण दे रहा है, तो उस वीडियो के कोने में साफ लिखा होना चाहिए- "AI जनरेटेड"।

2. टेक्निकल मार्कर: डिजिटल डीएनए

मेटाडेटा को आप उस फाइल का 'डिजिटल डीएनए' मान सकते हैं। यह स्क्रीन पर तो नहीं दिखता, लेकिन फाइल की कोडिंग के अंदर छिपा होता है।

इसमें यह जानकारी दर्ज होगी कि यह फोटो या वीडियो किस तारीख को बना, किस AI टूल से बना और किस प्लेटफॉर्म पर पहली बार अपलोड हुआ।

अगर कोई एआई का इस्तेमाल करके अपराध करता है, तो पुलिस इस 'टेक्निकल मार्कर' के जरिए उसके असली सोर्स तक पहुंच सकेगी।

3. छेड़छाड़ पर रोक: मिटाया नहीं जा सकेगा लेबल

पहले लोग एआई से बनी फोटो का कोना काटकर या एडिटिंग करके उसका 'वॉटरमार्क' हटा देते थे ताकि वह असली लगे। अब सरकार ने इसे गैर-कानूनी बना दिया है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को ऐसी तकनीक अपनानी होगी कि अगर कोई उस लेबल या मेटाडेटा को हटाने की कोशिश करे, तो या तो वह कंटेंट ही डिलीट हो जाए।

चाइल्ड पोर्नोग्राफी और डीपफेक पर सख्त एक्शन

अगर AI का इस्तेमाल चाइल्ड पोर्नोग्राफी, अश्लीलता, धोखाधड़ी, हथियारों से जुड़ी जानकारी या किसी की नकल उतारने के लिए किया जाता है, तो इसे गंभीर अपराध माना जाएगा।

3 घंटे की डेडलाइन, पहले 36 घंटे का समय मिलता था

आईटी नियमों में हुए नए बदलाव के बाद अब सोशल मीडिया कंपनियों के पास कार्रवाई के लिए बहुत कम समय होगा। पहले किसी गैर-कानूनी कंटेंट को हटाने के लिए 36 घंटे का समय दिया जाता था, जिसे अब घटाकर सिर्फ 3 घंटे कर दिया गया है।

यूजर ने गलत जानकारी दी तो प्लेटफॉर्म जिम्मेदार

अब जब भी कोई यूजर सोशल मीडिया पर कुछ अपलोड करेगा, तो प्लेटफॉर्म को उससे यह डिक्लेरेशन लेनी होगी कि क्या यह कंटेंट एआई से बनाया गया है। कंपनियों को ऐसे टूल्स तैनात करने होंगे जो यूजर के इस दावे की जांच कर सकें। अगर कोई प्लेटफॉर्म एआई कंटेंट को बिना डिस्क्लोजर के पब्लिश होने देता है, तो इसके लिए वह खुद जिम्मेदार माना जाएगा।

केंद्र ने कहा- इससे इंटरनेट ज्यादा भरोसेमंद बनेगा

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने साफ कहा कि ये स्टेप 'ओपन, सेफ, ट्रस्टेड और अकाउंटेबल इंटरनेट' बनाने के लिए है। यह जनरेटिव AI से आने वाली मिस-इनफॉर्मेशन, इम्पर्सनेशन और इलेक्शन मैनिपुलेशन जैसी रिस्क्स को हैंडल करेगा। इससे इंटरनेट ज्यादा भरोसेमंद बनेगा।

सरकार के नोटिफिकेशन में दिए जरूरी सवालों के जवाब…

सेक्शन 1: नए नियम और उनके उद्देश्य

1. आईटी संशोधन नियम, 2026 क्या हैं?

यह नियम 2021 के आईटी नियमों को मजबूत करते हैं, ताकि एआई द्वारा बनाई गई जानकारी (SGI) और ऑनलाइन होने वाले नुकसानों को रोका जा सके ।

2. इन संशोधनों की जरूरत क्यों पड़ी?

एआई के जरिए अब असली दिखने वाले डीपफेक बनाना आसान हो गया है । इनसे गलत सूचनाएं फैलने, पहचान चोरी होने और अश्लीलता (NCII) जैसे खतरों को रोकने के लिए ये नियम लाए गए हैं। ये नियम 20 फरवरी, 2026 से पूरे देश में लागू हो चुके हैं ।

सेक्शन 2: मुख्य परिभाषाएं और दायरा

3. 'ऑडियो, विजुअल या ऑडियो-विजुअल जानकारी' का क्या मतलब है?

कंप्यूटर के जरिए बनाई या बदली गई कोई भी आवाज, फोटो, ग्राफिक या वीडियो कंटेंट।

4. 'सिंथेटिकली जनरेटेड इंफॉर्मेशन' (SGI) क्या है?

ऐसी जानकारी जिसे एआई या एल्गोरिदम से बनाया गया हो और वह बिल्कुल असली व्यक्ति या घटना की तरह लगे। जिसे देखकर कोई भी धोखा खा जाए।

5. किन चीजों को SGI नहीं माना जाएगा?

फोटो की ब्राइटनेस बढ़ाना, वीडियो कंप्रेस करना या बैकग्राउंड शोर कम करना । या फिर पीपीटी बनाना, डायग्राम बनाना या रिसर्च के लिए काल्पनिक केस स्टडी बनाना ।

वीडियो में सबटाइटल जोड़ना, अनुवाद करना या ऑडियो को टेक्स्ट में बदलना। वहीं अगर एआई से फर्जी मार्कशीट या सरकारी लेटर बनाया, तो उसे छूट नहीं मिलेगी।

6. क्या ये नियम सिर्फ वीडियो पर लागू हैं?

SGI मुख्य रूप से फोटो, वीडियो और ऑडियो पर केंद्रित है। सिर्फ टेक्स्ट SGI नहीं है, लेकिन अगर टेक्स्ट का इस्तेमाल गैर-कानूनी काम में होता है, तो IT नियमों के दायरे में आएगा ।

सेक्शन 3: यूजर्स और कंपनियों की जिम्मेदारी

7. क्या प्लेटफॉर्म्स पर 'सेफ हार्बर' सुरक्षा बनी रहेगी?

हां, अगर कंपनियां इन नियमों का पालन करते हुए एआई कंटेंट को हटाती हैं, तो उनकी कानूनी सुरक्षा (धारा 79) बनी रहेगी । यानी, कंपनी पर कार्रवाई नहीं होगी।

सेफ हार्बर' को आसान भाषा में ऐसे समझें:

कानूनी ढाल: यह सोशल मीडिया कंपनियों को मिला एक सुरक्षा कवच है, जो कहता है कि अगर किसी यूजर ने प्लेटफॉर्म पर कोई गलत पोस्ट या वीडियो डाला है, तो उसके लिए कंपनी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा।

शर्तिया सुरक्षा: यह सुरक्षा तभी तक मिलती है जब तक कंपनियां सरकार के नियमों को मानती हैं। अगर वे शिकायत मिलने पर 3 घंटे के भीतर SGI नहीं हटातीं, तो यह सुरक्षा कवच खत्म हो जाता है और पुलिस कंपनी पर भी केस दर्ज कर सकती है।

8. एआई बनाने वाले टूल्स के लिए क्या खास चेतावनी है?

AI टूल बनाने वाली कंपनियों को अपने यूजर्स को चेतावनी देनी होगी कि गलत AI कंटेंट बनाने पर सजा हो सकती है। नियम तोड़ने पर उसका कंटेंट हटाया जाएगा और उसका अकाउंट सस्पेंड या बंद किया जा सकता है। वहीं नोटिफिकेशन में सजा के बारे में जानकारी नहीं है।

ऐसा इसलिए क्योंकि भारत में सजा का निर्धारण IT एक्ट, 2000 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत होता है। यानी गलत कंटेंट बनाने पर मौजूदा कानूनों के तहत कार्रवाई होगी।

BNS धारा 353: गलत सूचना से डर या नफरत फैलाने पर 3 साल की जेल।

BNS धारा 336: एआई के जरिए किसी की नकल उतारने पर 2 साल की जेल।

IT एक्ट धारा 79: नियम न मानने पर प्लेटफॉर्म की कानूनी सुरक्षा खत्म।

सेक्शन 4: कंटेंट हटाने की नई डेडलाइन

9. सरकारी आदेश पर कंटेंट कितनी देर में हटाना होगा?

कोर्ट या सरकार के आदेश के बाद 3 घंटे के भीतर कंटेंट हटाना होगा। पहले यह 36 घंटे था। पुलिस विभाग में कम से कम डीआईजी रैंक का अधिकारी इसके लिए अधिकृत होगा।

नॉलेज पार्ट: डीपफेक के बारे में जानें

इसमें एआई का इस्तेमाल करके किसी असली व्यक्ति के चेहरे या आवाज को दूसरे वीडियो में बदल दिया जाता है, जिससे वह बिल्कुल असली लगता है।


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इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026’: पीएम मोदी ने भारत की युवा ताकत और टेक क्षमता पर जताया भरोसा

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ‘इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026’ को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने समावेशी और ‘सॉवरेन AI’ के विजन पर भारत की प्राथमिकताओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि देश की युवा पीढ़ी तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अपना रही है और इस क्षेत्र में युवाओं की बढ़ती भागीदारी गर्व का विषय है।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत नई तकनीकों का निर्माण भी करता है और उन्हें तेजी से अपनाता भी है। उन्होंने देश को टेक टैलेंट का प्रमुख केंद्र बताते हुए कहा कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है।

उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत करते हुए कहा कि इस ऐतिहासिक AI समिट में दुनियाभर से आए प्रतिनिधियों का 1.4 अरब भारतीयों की ओर से स्वागत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत, जो मानवता के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े टेक टैलेंट और मजबूत टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम वाले देशों में शामिल है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि नई तकनीकों को लेकर कुछ लोगों में संदेह हो सकता है, लेकिन जिस गति से युवा वर्ग AI को अपना रहा है, वह अभूतपूर्व है। समिट की प्रदर्शनी को लेकर भी भारी उत्साह देखने को मिला है। 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों की भागीदारी और युवाओं की मजबूत उपस्थिति इस आयोजन को नई ऊर्जा दे रही है।

उन्होंने कहा कि मानव इतिहास में कई ऐसे दौर आए हैं जिन्होंने विकास की दिशा बदल दी, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी ऐसा ही एक परिवर्तनकारी मोड़ है। AI मशीनों को अधिक सक्षम बना रहा है और मानव क्षमताओं को कई गुना बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि असली सवाल यह नहीं कि AI भविष्य में क्या कर सकता है, बल्कि यह है कि हम आज AI का उपयोग किस तरह करते हैं।

प्रधानमंत्री ने भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें यह भी सोचना होगा कि आने वाले समय में हम AI का कैसा स्वरूप आगे बढ़ाते हैं। उन्होंने जोर दिया कि इंसान केवल डेटा या संसाधन बनकर न रह जाए, इसलिए AI को लोकतांत्रिक और समावेशी बनाना जरूरी है, खासकर ग्लोबल साउथ के लिए।

उन्होंने कहा कि भारत AI को ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के दृष्टिकोण से देखता है। इस अवसर पर उन्होंने AI के लिए MANAV विजन पेश किया, जिसमें नैतिकता, जवाबदेही, राष्ट्रीय संप्रभुता, समावेशन और वैधता जैसे सिद्धांत शामिल हैं।

प्रधानमंत्री ने बताया कि भारत के पास प्रतिभा, ऊर्जा क्षमता और स्पष्ट नीतिगत दिशा है, और समिट के दौरान तीन भारतीय कंपनियों ने अपने AI मॉडल और ऐप्स लॉन्च किए हैं।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि दुनिया में कुछ लोग AI को डर के रूप में देखते हैं, जबकि कुछ इसे अवसर मानते हैं। भारत के लिए AI भय नहीं बल्कि भविष्य और संभावनाओं का प्रतीक है।


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Google Doodle से शुरू हुआ न्यू ईयर सेलिब्रेशन, काउंटडाउन एनिमेशन ने खींचा ध्यान

साल 2025 को अलविदा कहने और 2026 के जोरदार स्वागत की तैयारियों के बीच गूगल ने न्यू ईयर ईव 2025 के मौके पर एक खास डूडल पेश किया है। दुनियाभर के कई देशों में गूगल के होमपेज पर दिख रहा ये फेस्टिव डूडल नए साल की उलटी गिनती और जश्न के माहौल को दिखा रहा है। ये डूडल पुराने साल के एंड और नए साल की शानदार शुरुआत का प्रतीक बनकर सामने आया है।

गूगल के इस अनोखे डूडल में रंग-बिरंगे गुब्बारे, सजावट और कंफेटी जैसे उत्सव के एलिमेंट्स को ऐड किया है। डूडल के बीच में एक शानदार एनिमेशन दिखाया गया है, जिसमें '2025' बदलकर '2026' में तब्दील होता दिख रहा है। ये ठीक उस पल को दिखा रहा है, जब आधी रात को घड़ी की सुइयां नए साल की शुरुआत का एलान करती हैं।

गूगल ने डिस्क्रिप्शन पेज पर दी ये जानकारी

वहीं, डूडल के डिस्क्रिप्शन पेज पर कंपनी ने बताया है कि यह एनुअल डूडल दुनिया भर में मनाए जाने वाले न्यू ईयर ईव का जश्न मनाने के लिए बनाया गया है, जब अरबों लोग दोस्तों और अपनी फैमिली के साथ बीते साल को याद करते हैं और नए साल का स्वागत करते हैं। कुछ ही पलों में घड़ी आधी रात का संकेत देगी और 2026 की शुरुआत हो जाएगी।

लोगों के बीच काफी ज्यादा एक्ससिटेमेंट

बता दें कि गूगल डूडल्स लंबे टाइम से खास मौकों, ऐतिहासिक घटनाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को सेलिब्रेट करने के लिए जाने जाते हैं। इसी तरह आज न्यू ईयर ईव भी उन खास मौकों में से एक है, जिसे लेकर दुनियाभर में लोगों के बीच काफी ज्यादा एक्ससिटेमेंट देखने को मिलता है।

इतना ही नहीं जैसे ही आप इस गूगल डूडल पर क्लिक करते हैं तो आप एक New Year's Eve पेज पर पहुंच जाते हैं जहां नीचे की तरफ एक Party Popper दिखाई देता है जिस पर क्लिक करते ही इससे कंफेटी निकलता है जिससे एक जश्न का माहौल बन जाता है।


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Google करने जा रहा बड़ा बदलाव, Gmail यूजर्स बिना अकाउंट एक्सेस खोए बदल सकेंगे अपना ई-मेल एड्रेस

Google एक बड़े और यूजर-फ्रेंडली बदलाव की तैयारी कर रहा है, जिससे लाखों Gmail यूजर्स को राहत मिलने वाली है। कंपनी ने अपने सपोर्ट पेज को अपडेट करते हुए संकेत दिया है कि अब यूजर्स बिना Google अकाउंट का एक्सेस खोए अपना Gmail ई-मेल एड्रेस बदल सकेंगे। इसका मतलब यह है कि यूजर अपने ईमेल एड्रेस का वह हिस्सा बदल पाएंगे जो @gmail.com से पहले आता है, जबकि उनका पूरा Google अकाउंट पहले की तरह ही बना रहेगा। इसमें कॉन्टैक्ट्स, ईमेल, Google Drive फाइल्स, फोटो, सब्सक्रिप्शन और परचेज से जुड़ा डेटा सुरक्षित रहेगा।

अब तक Google केवल थर्ड-पार्टी ईमेल एड्रेस (जो @gmail.com पर खत्म नहीं होते) बदलने की अनुमति देता था। Gmail यूजर्स के पास नया एड्रेस बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। लेकिन 9to5Google की रिपोर्ट के अनुसार, इस नए फीचर को अब चरणबद्ध तरीके से रोलआउट किया जा रहा है और यह Google अकाउंट सेटिंग्स में उपलब्ध होगा।

Google के अनुसार, नया Gmail एड्रेस चुनने के बाद पुराना एड्रेस एलियास के रूप में काम करता रहेगा। यानी पुराने एड्रेस पर भेजे गए ईमेल भी यूजर के इनबॉक्स में मिलते रहेंगे और यूजर पुराने या नए किसी भी Gmail एड्रेस से साइन-इन कर सकेंगे। Gmail, Drive, YouTube और Maps जैसी सेवाओं की साइन-इन एक्सेस पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

हालांकि, इस सुविधा के साथ कुछ शर्तें भी होंगी। यूजर्स हर 12 महीने में केवल एक बार Gmail एड्रेस बदल सकेंगे और अधिकतम तीन बार बदलाव की अनुमति होगी। यानी एक अकाउंट से कुल चार ईमेल एड्रेस जुड़े रह सकते हैं। Google ने यह भी साफ किया है कि पुराना Gmail एड्रेस किसी और को नहीं दिया जाएगा और वह उसी अकाउंट से जुड़ा रहेगा।

कंपनी ने चेतावनी दी है कि नया Gmail एड्रेस अपनाने पर कुछ सेवाओं में अतिरिक्त सेट-अप की जरूरत पड़ सकती है, खासकर Chromebook, Google के जरिए साइन-इन और Remote Desktop यूज करने वालों को। Google ने यूजर्स को सलाह दी है कि वे बदलाव से पहले अपने डेटा का बैकअप जरूर लें, क्योंकि यह प्रक्रिया नए डिवाइस में साइन-इन करने जैसी हो सकती है।


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रिलायंस जियो ने अपने दो पॉपुलर वाले प्रीपेड प्लान को किया बंद

रिलायंस जियो ने अपने करोड़ों ग्राहकों को एक के बाद एक झटका दिया है। कंपनी ने महज दो दिन के अंदर ही अपने दो सबसे पॉपुलर प्रीपेड प्लान्स को बंद कर दिया है। इनमें पहला 249 रुपये का बजट-फ्रेंडली प्लान था, जो खासतौर पर कम डेटा और महीने भर की वैलिडिटी चाहने वाले यूजर्स के बीच काफी पसंद किया जा रहा था। जबकि दूसरा प्लान 799 रुपये वाला था, जो लॉन्ग-टर्म वैलिडिटी वाले यूजर्स के बीच काफी ज्यादा पॉपुलर था। हालांकि अब कंपनी ने इन दोनों ही प्लान्स को बंद कर दिया है। चलिए पहले इन दोनों प्लान्स के बारे में विस्तार से जानें और फिर अब आपके पास क्या ऑप्शंस हैं इस पर भी एक नजर डालते हैं...

Jio का 249 रुपये वाला प्लान

जियो के इस प्लान में कंपनी 28 दिन की वैलिडिटी, रोजाना 1GB हाई-स्पीड डेटा, अनलिमिटेड कॉलिंग और हर दिन 100 SMS की सुविधा दे रही थी। साथ ही इस प्लान में फ्री JioCinema, JioTV और JioCloud का एक्सेस भी मिल रहा था। यह प्लान एक बजट-फ्रेंडली होने के साथ-साथ डेटा, कॉलिंग और SMS की जरूरत को भी पूरा कर रहा था।

Jio का 799 रुपये वाला प्लान

जियो के इस प्लान में कंपनी 84 दिन की वैलिडिटी, रोजाना 1.5GB डेटा (कुल 126GB), अनलिमिटेड कॉलिंग और 100 SMS/दिन भेजने की सुविधा दे रही थी। साथ ही इस प्लान में फ्री JioCinema, JioTV और JioCloud का एक्सेस भी मिल रहा था। यह प्लान लंबे टाइम तक डेटा और कॉलिंग की सुविधा दे रहा था। अब कंपनी ने इसे भी My Jio ऐप से हटा दिया है।

अब आपके पास क्या हैं ऑप्शंस?

239 रुपये वाला प्लान

अगर आप 249 रुपये वाले बजट-फ्रेंडली प्लान की जगह कोई और सस्ता प्लान ढूंढ रहे हैं तो 239 रुपये वाला प्लान आपके लिए एक बेस्ट अल्टरनेटिव ऑप्शन हो सकता है। हालांकि इस प्लान में थोड़ी कम 22 दिन की वैलिडिटी मिलती है लेकिन यह प्लान रोजाना 1.5GB डेटा, अनलिमिटेड कॉलिंग और 100 SMS/दिन भेजने की सुविधा दे रहा है।

889 रुपये वाला प्लान

वहीं, अगर आप 889 प्लान वाले प्लान की जगह कोई और प्लान ढूंढ रहे हैं तो 889 रुपये वाला प्लान आपके लिए एक बेस्ट अल्टरनेटिव ऑप्शन हो सकता है। इस प्लान में आपको 84 दिन की वैलिडिटी मिलती है जिसके साथ कंपनी रोजाना 1.5GB डेटा, अनलिमिटेड कॉलिंग, 100 SMS/दिन और JioSaavn Pro सब्सक्रिप्शन भी ऑफर कर रही रही है।


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टेलीग्राफ से लेकर 5G तक का सफर और अब स्वदेशी 6G टेक्नोलॉजी पर हमारा फोकस

देश आज 79वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। आज देश जहां खड़ा है उस आधुनिक भारत की नींव इसके गौरवशाली इतिहास में है। ऐसा ही एक सेक्टर भारत के टेलीकॉम सेक्टर की बात करें तो हम हाई स्पीड 5G नेटवर्क तक पहुंच चुके हैं। इतना ही नहीं भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हैं, जिसके पास अपनी टेलीकॉम टेक्नोलॉजी सिस्टम है।

इतिहास में देखें तो भारत में टेलीकॉम की शुरुआत साल 1851 में टेलीग्राफ लाइन से हुई और आज देश में 97 करोड़ टेलीकॉम यूजर हैं। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हम आपको आज भारत की टेलीकॉम सेक्टर के डेवलपमेंट की जानकारी शेयर कर रहे हैं।

भारत में टेलीफोन की शुरुआत

भारत में टेलीफोन सर्विस की शुरुआत साल 1882 से हुई। देश में सबसे पहले कोलकाता, बॉम्बे (मुंबई) और मद्रास (चेन्नई) में टेलीफोन एक्सचेंज ओपन किए गए। उस वक्त देश में ब्रिटिश शासन था और टेलीफोन सर्विस को आम लोगों से दूर रखा गया था। यह सर्विस सिर्फ कुछ चुनिंदा सेवाओं के लिए थी। कोलकाता एक्सचेंज की बात करें तो शुरुआत में सिर्फ 93 ग्राहक थे।

आजादी के बाद भी टेलीफोन कनेक्शन मिलना बिलकुल आसान नहीं था। आवेदन करने के बाद लोगों को महीनों और सालों का इंतजार करना पड़ता था। टेलीकॉम सेक्टर में सुधार 1990 में आर्थिक सुधार के बाद ही आया

प्राइवेट कंपनियों की शुरुआत

साल 1991 में आर्थिक सुधारों के बाद देश में टेलीकॉम सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों की एंट्री हुई। नेशनल टेलीकॉम पॉलिसी 1994 के बाद इस सेक्टर में विदेशी निवेश भी आने लगा और मोबाइल फोन, रेडियो पेजिंग और इंटरनेट सर्विस की शुरुआत हुई।

पहली मोबाइल कॉल

देश में पहली मोबाइल कॉल 31 जुलाई 1995 को हुई। यह कॉल केंद्रीय दूरसंचार मंत्री सुखराम और पश्चिम बंगाल के सीएम ज्योति बसु के बीच हुई। उस वक्त मोबाइल फोन आज की तरह हल्के नहीं थे। इसके साथ नेटवर्क भी काफी कमजोर था और एक कॉल के लिए कॉलर और रिसीवर को करीब 16 रुपये प्रति मिनट तक देने होते थे।

हर जेब तक पहुंचा मोबाइल

प्राइवेट कंपनियों और विदेशी निवेश के आने से देश में टेलीकॉम सेक्टर की तस्वीर पूरी तरह से बदल गई। 2000 के दशक तक मोबाइल खास लोगों से आम लोगों के बीच में पहुंच गया। देश में तेजी से मोबाइल सब्सक्राइबर्स का बेस बढ़ने लगा। साल 1999 में देश में 12 लाख लोगों के पास मोबाइल था और 20003 में करीब 2.73 करोड़ लोगों तक इसकी पहुंच हो गई। इसके साथ 2005 तक मोबाइल कनेक्शन ने लैंडलाइन को भी पीछे छोड़ दिया।

यह सब सस्ते GSM/CDMA नेटवर्क, प्रति मिनट के बजाय प्रति सेकंड बिलिंग सिस्टम और सस्ते चाइनीज फोन की वजह से मुमकिन हो पाया। साल 2008 में भारत 30 करोड़ कनेक्शन के साथ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल मार्केट बन गया।

डेटा और स्मार्टफोन की एंट्री

2010 में एक बार फिर से देश की टेलीकॉम इंडस्ट्री में क्रांती आई। सस्ते एंड्रॉयड फोन और डेटा के साथ लोग की पहुंच इंटरनेट से हुई। 2012 में Airtel ने 4G लॉन्च किया और 2016 में मुकेश अंबानी ने जब रिलायंस जियो के साथ इस इंडस्ट्री में कदम रखा तो सबकुछ बदल गया। उन्होंने वॉइस कॉलिंग, रोमिंग और डेटा के प्लान बदलकर टेलीकॉम सेक्टर की तस्वीर ही बदल दी। 2018 तक भारत दुनिया में सबसे ज्यादा मोबाइल डेटा यूज करने वाला देश बन गया।

5G की शुरुआत और 6G की राह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2022 में देश में 5जी सर्विस लॉन्च की। 2025 तक देश के सभी बड़े शहरों और जिलों में 5जी नेटवर्क मौजूद है। इसके साथ ही ग्रामीण भारत में भी 5G सर्विस पहुंचाने पर काम हो रहा है।

देश में फिलहाल कुल मोबाइल इंटरनेस सब्सक्राइबर्स की संख्या लगभग 97 करोड़ है। इसके साथ ही शहरों में टेली-डेंसिटी 131.45% और ग्रामीण टेली डेंसिटी 59.06% है। इसके साथ भारत ने तेजी से स्वदेशी 6G टेक्नोलॉजी पर भी काम शुरू कर दिया है।

स्वदेशी 6G टेक्नोलॉजी

5G के बाद अब भारत 6G टेक्नोलॉजी की ओर तेजी से कदम बढ़ रहा है। केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने B6GA (भारत 6G गठबंधन) की समीक्षा करते हुए बताया कि भारत का लक्ष्य 2023 तक देश को 6G में ग्लोबल लीडर बनाने का लक्ष्य रखा। B6GA मिशन के तहत भारत में 80+ संस्थाएं और 30+ स्टार्टअप जुड़े हैं।

6G विजन डॉक्युमेंट के तहत भारत अभी से स्वदेशी नेटवर्क, ग्रामीण स्मार्ट कनेक्टिविटी और हेल्थ व एग्रीकल्चर में 6G के उपयोग पर  काम कर रहा है। इसके साथ ही हमारा फोकस हाई-स्पीड इंटरनेट और स्मार्ट नेटवर्क के साथ भारत को टेक्नोलॉजी क्रिएटर और ग्लोबल इनोवेशन हब बनाने पर है।




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समुद्र में गिराया जाएगा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन

 एक फुटबॉल ग्राउंड के आकार की लैबोरेटरी, वजन 430 टन से अधिक और धरती से लगभग 400 किलोमीटर की ऊंचाई। 28 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घूम रही इस लैबोरेटरी को हम इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन कहते हैं। 1998 में इसकी लॉन्चिंग के बाद से अब तक 26 देशों के 280 से ज्यादा एस्ट्रोनॉट ISS का दौरा कर चुके हैं।

लेकिन नासा अब इसे प्रशांत महासागर में गिराने की तैयारी कर रहा है। इसकी वजह ये है कि ISS के प्राइमरी स्ट्रक्चर जैसे मॉड्यूल, ट्रस और रेडिएटर खराब हो रहे हैं और 2030 के बाद इसका संचालन काफी जोखिम भरा व महंगा होता जाएगा। कई विकल्पों पर विचार करने के बाद इसे प्रशांत महासागर के पॉइंट निमो में गिराने का फैसला किया गया है।

क्या होता है पॉइंट निमो?

पॉइंट निमो दक्षिण प्रशांत महासागर का एक ऐसा क्षेत्र है, जो पृथ्वी का सबसे एकांत स्थान माना जाता है। इंसान तो छोड़िए, पक्षी भी इसके आसपास नहीं फटकते। न्यूजीलैंड के ईस्ट कोस्ट से 3000 मील और अंटार्कटिका से 2000 मील दूर ये जगह लंबे वक्त से रिटायर हो चुके सैटेलाइट और अंतरिक्ष यानों की कब्रगाह बनी हुई है।

ISS का संचालन नासा, रोस्कोस्मोस, ईएसए, जेएक्सए और कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी करती है। अब इसको डिऑर्बिट करने की जिम्मेदारी भी इन्हीं की है। 150 अरब डॉलर की लागत वाले इस स्पेस स्टेशन को डिऑर्बिट करने के लिए स्पेसएक्स डिऑर्बिट व्हीकल बनाएगा। यह एक ऐसा विशेष अंतरिक्ष यान है, जो ISS को नियंत्रित तरीके से पॉइंट निमो तक ले जाएगा और इसी के साथ ISS के 30 साल के इस शानदार सफर का अंत हो जाएगा।

क्या ISS को गिराना ही आखिरी विकल्प?

ऐसा नहीं है कि नासा ने ISS को गिराने के अलावा किसी अन्य विकल्प पर विचार नहीं किया। पहला विचार इसी बात पर किया गया कि इसे अधिक ऊंचाई की कक्षा में धकेल दिया जाए, जिससे यह ऐतिहासिक अवशेष के रूप में हमेशा के लिए बना रहे। ISS जहां है, वहां उस पर अंतरिक्ष में किसी मलबे से टकराने का खतरा 50 साल में एक बार का है, लेकिन अधिक ऊंचाई पर ले जाने से यह 4 साल में एक बार या उससे अधिक भी हो सकता है।

इसके अलावा इस बात पर भी विचार किया गया कि ISS को उसकी कक्षा में ही विघटित कर दिया जाए और फिर इसे वापस लाकर म्यूजियम या रिसर्च के लिए रखा जाए। लेकिन यह लगभग असंभव था। इसमें अत्यधिक फंड और एस्ट्रोनॉट की जान जोखिम में डालने जैसे फैसले लेने पड़ते और इसी कारण ये फैसला टाल दिया गया। इसकी जगह डिऑर्बिट के बाद जलने से बचे हुए टुकड़ों को एकत्र करने का प्लान बनाया गया है।

क्या अब नहीं रहेगा कोई स्पेस स्टेशन?

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन एक जगह है, जहां पूरी दुनिया के एस्ट्रोनॉट जाकर माइक्रोग्रैविटी में रिसर्च करते हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इसके गिराए जाने के बाद कोई स्पेस स्टेशन नहीं रहेगा। दरअसल नासा की कोशिश है कि वह अब निजी कंपनियों के स्पेस स्टेशन को डिमांड के अनुसार इस्तेमाल करे। एक्सिओम स्पेस, ब्लू ओरिजिन और वॉयेजर जैसी निजी कंपनियां इसी दिशा में काम कर रही हैं।

वहीं चीन दुनिया का एकमात्र देश है, जिसके पास अभी वर्किंग स्पेस स्टेशन तियांगोंग है। रूस भी 2033 तक अपना स्पेस स्टेशन बनाने पर काम कर रहा है। भारत ने 2035 तक अपना स्पेस स्टेशन बनाने का लक्ष्य रखा है। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि धरती पर गिराए जाने के दौरान ही ISS का अधिकांश हिस्सा जलकर राख हो जाएगा और पॉइंट निमो की गहराई में हमेशा के लिए दफ्न हो जाएगा।


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रूस के पास 2 एटमी पनडुब्बियां तैनात करेगा अमेरिका

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच शुक्रवार को रूस के नजदीक दो न्यूक्लियर पनडुब्बियां तैनात करने का आदेश दिए। साथ ही गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि पनडुब्बियां कहां तैनात की जाएंगी।

ट्रम्प ने अपने इस कदम के पीछे रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव की भड़काऊ बयानबाजी को जिम्मेदार बताया। साथ ही ट्रम्प ने मेदवेदेव के परमाणु हमले की धमकी पर कहा कि- 'अमेरिका रूस के परमाणु खतरों का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है।'

दरअसल, मेदवेदेव ने X पर कहा था- हम इजराइल या ईरान नहीं हैं। ट्रम्प की ओर से दिया गया हर नया अल्टीमेटम युद्ध की धमकी माना जाएगा। उन्होंने ट्रम्प को याद दिलाते हुए कहा था- 'रूस के पास सोवियत संघ के समय से परमाणु हमले डेड हैंड की क्षमता है।'

ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर लिखा- 'रूस के पूर्व राष्ट्रपति और सिक्योरिटी काउंसिल के उपाध्यक्ष दिमित्री मेदवेदेव की भड़काऊ बयानबाजी की वजह से मैंने रूस के नजदीक दो न्यूक्लियर पनडुब्बियों को तैनात करने का आदेश दिया है, ताकि भड़काऊ बयान सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहे।

शब्द बहुत कीमती होते हैं और कई बार अनजाने में गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। मुझे उम्मीद है कि यह ऐसा मामला नहीं होगा।'

ट्रम्प ने बताया डेड इकोनॉमी तो रूस ने डेड हैंड की याद दिलाई

ट्रम्प ने 30 जुलाई को भारत पर 25% टैरिफ लगाने के बाद भारत और रूस को डेड इकोनॉमी बताया था। उन्होंने कहा था- भारत और रूस अपनी अर्थव्यवस्था को साथ ले डूबें, मुझे क्या। इसके जवाब में रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने कहा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति घबरा गए हैं।

मेदवेदेव ने टेलीग्राम पर लिखा था- 'ट्रम्प को डेड हैंड की खतरनाक ताकत याद रखनी चाहिए, भले ही यह अब मौजूद नहीं है। अगर रूस के पूर्व राष्ट्रपति के कुछ शब्दों से अमेरिका के शक्तिशाली राष्ट्रपति इतना घबरा जाते हैं तो रूस का रास्ता बिल्कुल सही है। हम अपने रास्ते पर आगे बढ़ते रहेंगे।'

डेड हैंड क्या है?

सोवियत यूनियन ने 1980 के दशक में एक ऑटोमैटिक परमाणु रिटैलिएशन सिस्टम बनाया था, जिसे डेड हैंड कहते हैं। इसे 'पेरिमीटर' सिस्टम भी कहते हैं।

रूस की पूरी लीडरशिप के मारे जाने पर ये सिस्टम अपने आप परमाणु हथियार लॉन्च कर सकता है।

यह सिस्टम अब भी एक्टिव स्टैंडबाई मोड में माना जाता है। मतलब अगर अमेरिका ने रूस पर हमला किया और रूस के नेता मारे गए, फिर भी ये सिस्टम अमेरिका पर हमला कर देगा।

ट्रम्प ने मेदवेदेव को असफल पूर्व राष्ट्रपति कहा था

इससे पहले भी मेदवेदेव ने ट्रम्प पर निशाना साधते हुए कहा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति की रूस को धमकी युद्ध शुरू कर सकती है। यह रूस और यूक्रेन के बीच नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ होगा। उन्होंने ट्रम्प को 'स्लीपी जो' (जो बाइडेन) की राह न अपनाने की भी सलाह दी थी।

इसके जवाब में ट्रम्प ने गुरुवार देर रात मेदवेदेव को 'असफल पूर्व राष्ट्रपति' करार देते हुए कहा था कि वे अभी भी खुद को राष्ट्रपति समझते हैं। ट्रम्प ने मेदवेदेव को उनके शब्दों पर ध्यान देने और खतरनाक बयानबाजी न करने की चेतावनी दी थी।

ट्रम्प कई बार रूस के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। हालांकि, वे रूसी राष्ट्रपति पुतिन पर सीधे हमले से बचते रहे हैं। उन्होंने कुछ दिन पहले कहा था- 'मेरी पुतिन के साथ फोन पर अच्छी बातचीत होती है, लेकिन इसके कुछ घंटों बाद ही रूस यूक्रेन पर हमले करता है। इससे मैं निराश हूं। फिर भी पुतिन ऐसे इंसान हैं, जिसके साथ मैं अच्छा तालमेल बना सकता हूं।'


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ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने इंस्टाग्राम के जरिए बताया अंतरिक्ष का अनुभव

भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष यात्रा पूरी करने के बाद अपने अनुभव सोशल मीडिया पर साझा किए। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष में रहना शरीर के लिए एक बिल्कुल नया अनुभव होता है, क्योंकि इंसान का शरीर हमेशा गुरुत्वाकर्षण वाले माहौल में जीता है। अंतरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी यानी शून्य गुरुत्वाकर्षण की स्थिति में शरीर को ढलने के लिए कई बदलाव करने पड़ते हैं।

शुभांशु ने लिखा, हम गुरुत्वाकर्षण में बड़े होते हैं, शरीर को इसके अलावा कुछ पता नहीं होता। जब हम अंतरिक्ष में जाते हैं तो शरीर कई तरीकों से बदलता है।’ 

उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष में रहते हुए शरीर के तरल पदार्थ कम हो जाते हैं। दिल की धड़कन धीमी हो जाती है क्योंकि उसे खून को सिर तक पहुंचाने के लिए गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ मेहनत नहीं करनी पड़ती। इतना ही नहीं, संतुलन बनाए रखने वाली प्रणाली यानी वेस्टिबुलर सेंस को भी नए वातावरण में खुद को ढालना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि अच्छी बात यह है कि शरीर जल्दी ही इन बदलावों को अपना लेता है और अंतरिक्ष यात्री सामान्य महसूस करने लगते हैं। लेकिन असली चुनौती तब आती है जब मिशन पूरा होने के बाद हम वापस धरती पर लौटते हैं। 

शुभांशु ने लिखा, जब हम पृथ्वी पर लौटते हैं, तो शरीर को फिर से गुरुत्वाकर्षण के हिसाब से ढलना पड़ता है। इस समय सीधा चलना भी चुनौती बन जाता है। रिएक्शन टाइम कम हो जाता है और संतुलन बिगड़ जाता है। हालांकि यह सब अस्थायी होता है और कुछ समय में शरीर सामान्य हो जाता है।’

उन्होंने यह भी कहा कि इन बदलावों को समझना बेहद जरूरी है ताकि लंबे समय तक चलने वाले अंतरिक्ष अभियानों के लिए वैज्ञानिक समाधान खोजे जा सकें। शुभांशु ने पोस्ट के अंत में लिखा, यह मैं स्प्लैशडाउन के तुरंत बाद हूं। ऐसा लग रहा है जैसे अंतरिक्ष से लौटकर फिर से चलना सीख रहा हूं। कहा, अंतरिक्ष यात्रियों को तकनीकी चुनौतियों के साथ-साथ शारीरिक बदलावों से भी गुजरना पड़ता है।





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अंतरिक्ष से समुद्र में उतरे शुभांशु शुक्ला

अंतरिक्ष से वापसी के बाद शुभांशु शुक्ला का अंतरिक्षयान समुद्र में उतरा, लेकिन 41 साल पहले अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय राकेश शर्मा जब वापस लौटे थे तो उन्होंने समुद्र में नहीं जमीन पर लैंडिंग की थी।

राकेश शर्मा ने जमीन पर की थी लैंडिंग

अप्रैल 1984 में, अंतरिक्ष में जाने वाले राकेश शर्मा, सोवियत सैल्यूट 7 अंतरिक्ष स्टेशन के अपने मिशन के बाद सोयूज टी-10 कैप्सूल पर सवार होकर कजाखस्तान में जमीन पर उतरे थे। समुद्र में उतरना हर बार आसान और सुरक्षित नहीं होता, फिर भी अमेरिका के मिशन में अंतरिक्ष यात्री अक्सर समुद्र में उतरते रहे हैं, जबकि रूस और चीन जमीन पर लैंडिंग को प्राथमिकता देते हैं।

क्या है स्प्लैशडाउन के फायदे?

''स्प्लैशडाउन'' या पानी में उतरने का बड़ा फायदा यह है कि अंतरिक्षयान के मलबे को पहले ही समुद्र में गिरा दिया जाता है, जिससे जमीन पर मौजूद लोगों और संपत्ति को नुकसान पहुंचने का खतरा काफी हद तक खत्म हो जाता है, वहीं जमीन पर उतरना अधिक सटीक होता है, लेकिन जमीन पर उतरते समय अक्सर अधिक जोरदार टक्कर का सामना करना पड़ता है।

राकेश शर्मा ने क्या कहा था?

जमीन पर उतरने से समुद्र में बचाव की जटिलताओं से बचा जा सकता है। 2024 में एक साक्षात्कार में राकेश शर्मा ने कहा था कि अंतरिक्ष से वापसी के समय मुझे लगा था कि मैं इसमें सफल नहीं हो पाऊंगा। तभी पैराशूट खुला और अंदर से बहुत अधिक आवाज आई। आखिकार मैनें सफल लैंडिंग की।

धरती पर सकुशल लौटे शुभांशु शुक्ला

शुभांशु शुक्ला आईएसएस पर भारत का पहले अनुसंधान मिशन को पूरा कर शुभांशु धरती पर लौट चुके हैं। शुभांशु अंतरिक्ष स्टेशन पर 18 दिन रहे। उन्होंने यहां सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण संबंधी कई प्रयोग किए।

लैंडिंग का लाइव टेलीकास्ट

शुभांशु शुक्ला की धरती पर सफल वापसी के ऐतिहासिक क्षण को देखने के लिए दिल्ली स्थित नेहरू तारामंडल में मंगलवार को स्काई थियेटर में खास लाइव स्क्रीनिंग का आयोजन किया गया था। सुबह से ही छात्रों, वैज्ञानिकों, खगोल-प्रेमियों और आम नागरिकों की भीड़ उमड़ती रही। यहां आधे घंटे का लाइव प्रसारण किया गया। लोग दिल थामकर अंतरिक्ष यात्रियों की वापसी देखते रहे।


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