BHU वैज्ञानिकों का कमाल, बनाई 1300 किलोमीटर रेंज वाली इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी

पर्यावरण संकट की वजह से दुनिया के सामने इलेक्ट्रिक वाहन मजबूत विकल्प बने हैं। भले ही सरकार सब्सिडी और सुविधाओं के जरिए जनता को ई-वाहनों से जोड़ने में जुटी है, लेकिन इलेक्ट्रिक वाहनों में रेंज की समस्या बड़ी चुनौती है। यह ई-वाहनों की व्यापक स्वीकृति को प्रभावित कर रहा है। हालांकि, यह समस्या वाहनों की बैटरी की सीमित क्षमता और चार्जिंग की धीमी गति की देन है।

बीएचयू के भौतिक विज्ञानियों ने रेंज की समस्या के समाधान के लिए बेहतर प्रयास किया है। भौतिकी विभागाध्यक्ष प्राे. राजेंद्र कुमार सिंह के नेतृत्व में आधा दर्जन शोधार्थियों ने औद्योगिक कचरे में मिलने वाले सल्फर की मदद से रूम टेंप्रेचर सोडियम सल्फर बैटरी तैयार की है। लैब में क्वायन सेल का माडल बनाया है।

इस बैटरी की लागत सोडियम आयन बैटरी और लीथियम आयन बैटरी की तुलना में 35 प्रतिशत कम होगी। बड़े बैटरी पैक के रूप में वाहनों में प्रयोग किए जाने की स्थिति में यह सल्फर बैटरी एक बार चार्ज होने पर करीब 1300 किलोमीटर का रेंज देने में सक्षम होगी।

डा. राजेंद्र ने बताया कि रूम टेेंप्रेचर सोडियम सल्फर बैटरी सोडियम आयन बैट्री का बेहतर विकल्प है। प्रोजेक्ट के वृहद अनुसंधान और विकास के लिए ऊर्जा मंत्रालय की कंपनी सीपीआरआइ (सेंट्रल पावर रिसर्च इंस्टीट्यूट) बेंगलुरु से अनुबंध हुआ है। दो वर्ष में प्राेजेक्ट को पूर्ण करने का लक्ष्य तय हुआ है। तकनीक हस्तांतरण के उपरांत बैटरी का थोक उत्पादन होगा।

सोडियम आयन बैटरी की डिस्चार्ज क्षमता 170 से 175 मिली एंपियर हावर प्रति ग्राम होती है, जबकि ऊर्जा घनत्व 150 से 180 वाट हावर प्रति किलोग्राम होता है। विभाग के लैब में ट्रायल के दौरान रूम टेंप्रेचर सोडियम सल्फर बैटरी की डिस्चार्ज क्षमता 1300 से 1400 मिली एंपियर हावर प्रति ग्राम और ऊर्जा घनत्व 1274 वाट हावर प्रति किलोग्राम मिला है।

सोडियम आयन बैट्री की डिस्चार्ज क्षमता कम होती है क्योंकि यह कैथोड पर निर्भर करता है। ऊर्जा घनत्व भी कम होने से इन बैट्रियों की रेंज भी कम होती है। चार पहिया वाहन में ऐसी बैट्रियों का बड़ा पैक एक बार चार्जिंग पर ढाई सौ से तीन सौ किमी का रेंज कवर करतीं हैं।

उधर, सल्फर बैटरी काफी सस्ती होती है, डिस्चार्ज क्षमता और ऊर्जा घनत्व अधिक होेने के कारण वाहनों की रेंज क्षमता 1200 से 1300 किलोमीटर होगी। यह बैटरी सोडियम और सल्फर के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया पर आधारित है। कम तापमान पर भी यह काम कर सकती है, जो विभिन्न अनुप्रयोगों में उपयोगी बनाती है। पर्यावरण अनुकूलता भी खास पहलू है।

लैब में दूर की जा रहीं कई चुनौतियां, मिलेंगे सकारात्मक परिणाम

डा. राजेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि देश में सल्फर प्रचुरता मेें औद्योगिक कचरे के रूप में उपलब्ध हैं। कोयला, तेल और गैस काे जलना पर सल्फर गैस का उत्पादन होता है। सल्फर बैटरी को सिलिका मैट्रिक्स, कुछ कैटालिसिस व इलेक्ट्रोलाइट से बनाया जाता है, इससे लागत कम आएगी और क्षमता अधिक होगी। हालांकि, बैटरी निर्माण में कुछ तकनीकी चुनौतियां भी हैं, पाली सल्फाइड डिजुलेशन शटल इफेक्ट और कैथोड में शार्ट सर्किट जैसी बाधाओं को दूर करने का प्रयास हो रहा है।


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एआई के बढ़ते उपयोग से कोडिंग और प्रोग्रामिंग में भारतीय नौकरियां पर पड़ेगा असर, बनानी होगी नई रणनीति

एक तरफ जहां दुनियाभर में इस बात की पुरजोर वकालत की जा रही है कि एआई के आगमन से आईटी इंडस्ट्री में नया बूम आ जाएगा तो दूसरी तरफ गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भरे बाजार और बढ़ती कानूनी दुविधाओं से जूझते हुए, भारतीय आईटी कंपनियां अपने मार्जिन को बचाने के लिए 'दबाव' महसूस कर रही हैं और अपने मुनाफे में सुधार के लिए तेजी से ऑटोमेशन प्लेटफार्मों की ओर झुक रही हैं। दुनिया के बड़े टेक्नोलॉजी दिग्गजों के भी इसे लेकर अपने-अपने मत हैं। आईबीएम की एग्जीक्यूटिव चेयरमैन गिन्नी रोमेटी का कहना है कि "कुछ लोग इसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता कहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह तकनीक हमें बेहतर बनाएगी। इसलिए मुझे लगता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बजाय हम अपनी बुद्धिमत्ता को बढ़ाएंगे।" एलन मस्क, जो भविष्य की तकनीकों पर अरबों डॉलर खर्च करने के लिए जाने जाते हैं, मानवता के लिए इसे सबसे बड़ा खतरा बताते हैं।

मौजूदा समय में एआई के विकास के साथ भारतीय आईटी क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। एक्सपर्ट मानते हैं कि नई तकनीकों को अपनाने और एकीकृत करने की क्षमता ही तय करेगी कि क्या ये कंपनियां संभावित खतरों को विकास के अवसरों में बदल सकती हैं ? इसे लेकर अधिकतर कंपनियां और टेक दिग्गज आशान्वित हैं। वह मानते हैं कि मौजूदा घटनाक्रम ऐसे भविष्य का संकेत देते हैं जहां एआई न केवल आईटी कंपनियों की क्षमता बढ़ाएगा, बल्कि उन्हें इनोवेशन और मार्केट में नेतृत्व करने के नए रास्ते भी खोलेगा।

आईटी क्षेत्र न केवल एक प्रमुख नियोक्ता है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता भी है। यह जीडीपी में 7% का योगदान करता है और कुल निर्यात का लगभग एक-चौथाई हिस्सा इसी से आता है। हालांकि, एआई के ऑटोमेशन की क्षमता, दक्षता के संदर्भ में आशाजनक है, लेकिन इससे आर्थिक संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव भी हो सकते हैं। कैपिटल इकोनॉमिक्स के अनुसार, यदि एआई इस क्षेत्र में मानव नौकरियों को पूरी तरह से प्रतिस्थापित कर देता है, तो अगले दशक में भारत की जीडीपी वृद्धि दर में लगभग एक प्रतिशत की गिरावट हो सकती है।

एआई दुनिया भर में अर्थव्यवस्थाओं और उद्योगों में बदलाव ला रहा है। भारत के विकसित भारत 2047 के विजन और समावेशी विकास हासिल करने के क्रम में एआई महती भूमिका निभा रहा है। अर्थव्यवस्था में 500 बिलियन डॉलर का योगदान करने की क्षमता के साथ, AI कृषि, स्वास्थ्य सेवा और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला सकता है। एआई न केवल इनोवेशन में बड़ा योगदान दे रहा है, बल्कि भारत की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों को हल करने के लिए एक रणनीतिक टूल साबित हो रहा है।

तमाम संभावनाओं के बीच एआई को लेकर चुनौतियां भी बनी हुई हैं। भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी स्किल गैप और असमानताओं से जूझ रही है। भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में कहा कि वैश्विक तकनीकी महाशक्ति बनने के लिए, हमें स्वास्थ्य, शिक्षा, स्मार्ट शहरों और कृषि में चौथी औद्योगिक क्रांति प्रौद्योगिकियों का लाभ उठाने के लिए सभी हितधारकों से सहयोग की आवश्यकता है।

टैग्सलैब के संस्थापक हरिओम सेठ कहते हैं कि भारतीय आईटी क्षेत्र में स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप एआई आधारित समाधानों को बनाने की अपार संभावनाएं हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में क्षेत्रीय स्तरों पर समाधान दिए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए दूरदराज के क्षेत्रों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं, वहां एआई के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाई जा सकती है। कृषि में छोटे किसानों को एआई की सहायता से सटीक कृषि तकनीकों का प्रदर्शन करके लाभान्वित किया जा सकता है।

डिजिटल एमिनेंट के संस्थापक मुकुल राज शर्मा कहते हैं कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं आमतौर पर कृषि, विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला वाले टास्क को पूरा करने के लिए कई तरह की परेशानियों से जूझती हैं। भारतीय आईटी कंपनियां एआई-आधारित समाधान विकसित करके इन क्षेत्रों में क्रांति ला सकती हैं। देश की बड़ी आबादी अभी भी बैंकिंग सेवाओं से वंचित है या उन्हें सीमित पहुंच प्राप्त है। भारतीय आईटी कंपनियां एआई का उपयोग करके इन लोगों तक वित्तीय सेवाएं पहुंचा सकती हैं। एआई का उपयोग करके संदिग्ध लेनदेन की पहचान और रोकथाम की जा सकती है, जिससे डिजिटल भुगतान प्रणाली में विश्वास बढ़ेगा और इसका व्यापक उपयोग संभव होगा।

अमेरिका में एक तिहाई आईटी प्रोग्रामर्स की नौकरी खतरे में

हाल के वर्षों में, अमेरिका में प्रोग्रामर्स की संख्या में उल्लेखनीय कमी देखी गई है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है। अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में प्रोग्रामर्स की संख्या में लगभग 27% की गिरावट आई है, जो मुख्यतः ChatGPT जैसे AI टूल्स के आगमन के साथ मेल खाती है।

भारतीय आईटी उद्योग पर प्रभाव

भारतीय आईटी उद्योग में बड़ी संख्या में प्रोग्रामर्स कार्यरत हैं, और अमेरिका में आई इस गिरावट से भारतीय आईटी नौकरियों पर संभावित प्रभाव के बारे में चिंताएं बढ़ रही हैं। AI और ऑटोमेशन के बढ़ते उपयोग से कोडिंग और प्रोग्रामिंग से संबंधित कार्यों की मांग में कमी आ सकती है, जिससे भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं। आईटी पेशेवरों को AI, मशीन लर्निंग, डेटा एनालिटिक्स, और साइबर सुरक्षा जैसे उभरते क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक है। इससे वे बदलते तकनीकी परिदृश्य में प्रासंगिक बने रह सकते हैं। कंपनियों को अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाना चाहिए ताकि वे नई तकनीकों के विकास और कार्यान्वयन में अग्रणी बन सकें।

कानूनी ढांचों और अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखने की आवश्यकता

कापी मशीन के हेड ऑफ मार्केटिंग अनुराग दास कहते हैं कि भारत में फिलहाल एआई के लिए कोई एकीकृत कानूनी ढांचा नहीं है। इस कारण से कारोबार में अनिश्चितता का माहौल बनता है। इसके विपरीत, यूरोपीय संघ में एआई अधिनियम मौजूद है, जिसका फायदा कंपनियों को काम करने में मिलता है। इसके बनिस्पत भारत में एआई नियमों में अनिश्चितता का असर इनोवेशन पर पड़ सकता है, क्योंकि कारोबारी बिना स्पष्ट दिशानिर्देशों के भारी-भरकम निवेश करने से हिचकिचाते हैं। एआई एल्गोरिदम डेटा-आधारित होते हैं। भारत का पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा है, कई बार विलंबित और संशोधित हुआ है। इस बिल में शामिल प्रावधान जैसे कि डेटा लोकलाइजेशन, सहमति, क्रॉस-बॉर्डर डेटा ट्रांसफर, ये सभी प्रावधान एआई के विकास और उपयोग को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं। खासकर उन व्यवसायों पर इसका अधिक असर पड़ सकता है, जो अंतरराष्ट्रीय डेटा सेट पर निर्भर हैं। इसके अलावा, संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा को संभालने वाले एआई सिस्टम के साथ पीडीपी बिल को कैसे एकीकृत किया जाएगा, इस पर भी गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं।

40 फीसद काम कर रहा है एआई

हरिओम सेठ के अनुसार विभिन्न अनुमानों के अनुसार, भारत में आईटी पेशेवरों द्वारा किए जाने वाले लगभग 40-50% कार्य एआई के माध्यम से ऑटोमेटेड किए जा सकते हैं। इनमें मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर टेस्टिंग, डेटा एंट्री, और कस्टमर हेल्प जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। एआई के कारण कुछ भूमिकाएं समाप्त हो रही हैं। साथ ही, एआई डेवलपमेंट, डेटा साइंस और एआई कंसल्टिंग में नई नौकरियां उत्पन्न हो रही हैं। ईवाई इंडिया की रिपोर्ट 'भारत का एआई आइडिया: 2025 में कहा गया है कि भारतीय उद्योगों में 24% कार्य पूरी तरह से स्वचालित किए जा सकते हैं, जबकि 42% कार्य एआई की सहायता से अधिक प्रभावी बनाए जा सकते हैं। इससे ज्ञान आधारित क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए प्रति सप्ताह 8 से 10 घंटे का अतिरिक्त समय उपलब्ध हो सकता है। उद्योगों के संदर्भ में, सेवा क्षेत्र में सबसे अधिक उत्पादकता वृद्धि की संभावना है क्योंकि इसमें श्रम की हिस्सेदारी अधिक है। इसके विपरीत, विनिर्माण और निर्माण क्षेत्रों में एआई का अपेक्षाकृत कम प्रभाव देखने को मिलेगा।

आईटी सेक्टर का वर्तमान जॉब मार्केट

नैस्कॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय आईटी क्षेत्र में लगभग 4.5 मिलियन पेशेवर कार्यरत हैं, जिसकी वृद्धि दर 7-8% प्रति वर्ष है। 2025 तक इस क्षेत्र का राजस्व 350 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। मैकेंजी की एक रिपोर्ट का अनुमान है कि भारत में आईटी पेशेवरों द्वारा किए जाने वाले लगभग 50-60% कार्यों को एआई और अन्य तकनीकों का उपयोग करके स्वचालित किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप पिछले दो वर्षों में इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में नौकरियां खत्म हुई हैं।

एआई ने आईटी क्षेत्र में कई नौकरियों की जगह ले ली है। इन बदलाव की सफलता दर मिश्रित रही है। गार्टनर की एक रिपोर्ट में पाया गया कि भारत में लगभग 30% एआई परियोजनाएं डेटा क्वालिटी के मुद्दों, विशेषज्ञता की कमी और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे जैसे विभिन्न कारणों से अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहीं। हालांकि, सफल एआई कार्यान्वयन से उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि और बचत हुई है। उदाहरण के लिए, एक्सेंचर के एक अध्ययन में पाया गया कि आईटी क्षेत्र में एआई-संचालित ऑटोमेशन से परिचालन लागत में 30-40% की कमी आ सकती है।

एआई कंप्यूटर और सेमीकंडक्टर इंफ्रास्ट्रक्चर

भारत अपनी बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था का समर्थन करने के लिए तेजी से एक मजबूत एआई कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है। 2024 में इंडिया एआई मिशन की मंजूरी के साथ, सरकार ने एआई क्षमताओं को मजबूत करने के लिए पांच वर्षों में 10,300 करोड़ रुपये आवंटित किए। इस मिशन का एक प्रमुख फोकस 18,693 ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPU) से लैस एक उच्च-स्तरीय सामान्य कंप्यूटिंग सुविधा बनाना है। इससे भारत वैश्विक स्तर पर सबसे व्यापक AI कंप्यूटर इन्फ्रास्ट्रक्चर बना सकता है। यह क्षमता ओपन-सोर्स AI मॉडल डीपसीक की तुलना में लगभग नौ गुना और चैटजीपीटी द्वारा संचालित क्षमता का लगभग दो-तिहाई है।

जेनरेटिव एआई का उभार

व्यूहा मेड के सीईओ और सीओओ धृतिमान मलिक कहते हैं कि भारत की आईटी सर्विसेज के बदलाव के केंद्र में है जनरेटिव एआई। यह भारतीय टेक सेक्टर को फिर से परिभाषित करने के लिए तैयार है। सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में जनरेटिव एआई का तेजी से बढ़ना एक बड़ा फैक्टर है। यह तकनीक उन व्यक्तियों को भी सक्षम बनाती है, जिनके पास सीमित कोडिंग अनुभव है। कुछ ही दिनों में एप्लिकेशन विकसित किया जा सकता है। यह कार्य पहले महीनों तक आउटसोर्स करना पड़ता था। सॉफ्टवेयर विकास में यह निस्संदेह महत्वपूर्ण है, और इसके दूरगामी प्रभाव हैं।

आउटसोर्सिंग मॉडल को चुनौती

मलिक कहते हैं कि एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां एआई में निपुण फ्रीलांसर प्रमुख आईटी कंपनियों की तुलना में काफी कम दरों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह केवल व्यावसायिक संरचना में बदलाव नहीं है। यह स्टार्टअप्स की इनोवेशन क्षमता का प्रमाण भी है, जिससे वे स्थापित कंपनियों को चुनौती दे रहे हैं। हालांकि, आईटी दिग्गजों ने वर्षों में जो मजबूत नेटवर्क बनाए हैं, उन्हें तुरंत समाप्त करना आसान नहीं होगा। एआई के उपयोग में निष्पक्षता और पक्षपात से जुड़े नैतिक प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं। यह आवश्यक है कि एआई सिस्टम का उपयोग जिम्मेदारीपूर्वक किया जाए।

भारत में अभी तक एआई नियामक ढांचा नहीं

सेठ कहते हैं कि भारत में अभी तक एक व्यापक एआई नियामक ढांचा नहीं है। इससे एआई व्यवसायों और इसके विकास में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। एआई सिस्टम से संबंधित डेटा की सुरक्षा और एआई द्वारा होने वाली संभावित हानियों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

उभरते अवसर, जहां हम बढ़त बनाए रखेंगे

तमाम चुनौतियों के बारे में बात करने के बाद, भारतीय आईटी सेक्टर भी इसे अवसर के तौर पर ले सकता है। अक्सर कहा जाता है कि हर संकट एक अवसर भी होता है। आइए देखें कि इस अफरा-तफरी भरे समय में हम किन संभावित अवसरों का लाभ उठा सकते हैं।

सस्ते समाधान के साथ ग्लोबल साउथ हमारे नए बाजार हो सकते हैं

भारतीय आईटी इंडस्ट्री ने दशकों तक अपनी सेवाओं को विकसित देशों मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप को प्रदान करके वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। हालांकि, आज की दुनिया में तकनीकी परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एआई सक्षम समाधान भारत के आईटी सेक्टर को केवल विकसित देशों तक सीमित रखने के बजाय ग्लोबल साउथ अफ्रीका, दक्षिण एशिया, लैटिन अमेरिका और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में नए अवसरों की ओर ले जा सकते हैं।

भारत की विस्तृत सर्विस डिस्ट्रीब्यूशन क्षमताएं और तकनीकी कौशल इसे उभरते बाजारों में सुलभ, किफायती और उच्च गुणवत्ता वाले समाधान प्रदान करने में सक्षम बनाते हैं। ये क्षेत्र तेजी से डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन कई बार अत्यधिक महंगे पश्चिमी समाधान उनके लिए सुलभ नहीं होते। भारत के पास कम लागत पर एआई-समर्थित टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म बनाने की क्षमता है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वित्त और ई-कॉमर्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं। इसके अतिरिक्त, भारत सरकार की नीतियां, जैसे "मेक इन इंडिया" और "डिजिटल इंडिया", एआई और आईटी इनोवेशन को बढ़ावा दे रही हैं। भारतीय कंपनियां अब न केवल कस्टमाइज़्ड सॉल्यूशंस विकसित कर सकती हैं, बल्कि इन्हें स्थानीय जरूरतों के हिसाब से ढालकर उभरते बाजारों में तेजी से अपना सकती हैं। एआई के नेतृत्व में भारतीय आईटी उद्योग के लिए ग्लोबल साउथ एक नया व्यापारिक क्षितिज बन सकता है। सही रणनीति और निवेश के साथ, भारत उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक प्रमुख टेक्नोलॉजी पार्टनर के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।

भारतीय शिक्षा प्रणाली में एआई के साथ क्रांति लाई जा सकती है: भारत को एआई सक्षम शिक्षा सेवाओं में भारी निवेश करना शुरू करना चाहिए ताकि हमारी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक का समाधान किया जा सके। यह स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर भी लागू होता है।

कौशल मजबूत कर उच्च वेतन सुनिश्चित करना: बड़ी समस्या है कि अधिक प्रतिभाशाली और सक्षम लोगों का वेतन बढ़ता रहेगा और कम वेतन पाने वाले लोग सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इस प्रवृत्ति का मुकाबला करने के लिए, हमें लोगों को कौशल बढ़ाना चाहिए।

विकास का समय, लागत और प्रयास बहुत कम हो जाएगा: कोड/सॉफ्टवेयर विकसित करने का समय तेजी से कम हो जाएगा। Github के लिए को-पायलट और अन्य IDE सपोर्टिंग Ai टूल के साथ, अधिक से अधिक कोडर्स की आवश्यकता तेजी से कम हो सकती है। कम कोड और प्रोडक्टाइजेशन/SaaS आदि के साथ, कस्टम कोड विकसित करने की आवश्यकता लगातार कम होती गई।

डेटा प्रोसेसिंग के कामों में लाभकारी साबित होगा एआई

नियमित कार्यों को ऑटोमेटेड करने की AI की क्षमता कॉल सेंटर और बुनियादी डेटा प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रभावशाली है। उदाहरण के लिए, चैटजीपीटी जैसे AI टूल के लांच होने के बाद से लेखन कार्यों की आय में गिरावट देखी गई है। यह बदलाव केवल आईटी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ग्राफिक डिज़ाइन जैसे रचनात्मक क्षेत्रों को भी प्रभावित करता है, जहां AI ने उत्पादन की लागत और समय को कम करके पारंपरिक भूमिकाओं को कम करना शुरू कर दिया है।

उदाहरण के लिए, इंफोसिस ने अपने संचालन में एआई डिवाइस का इस्तेमाल किया है, जिससे कथित तौर पर कुछ विकास कार्यों के लिए आवश्यक समय में 30% तक की कमी आई है।

भविष्य की चिंताएं

आईटी क्षेत्र में एआई का बढ़ता उपयोग भारत में काम के भविष्य को लेकर कई चिंताएं पैदा करता है। कुछ प्रमुख मुद्दे जिन पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, वे हैं:

1. नौकरी विस्थापन: आईटी क्षेत्र में नौकरियों के ऑटोमेशन से महत्वपूर्ण नौकरी विस्थापन हो सकता है, विशेष रूप से एंट्री लेवल और मीडियम लेवल के पेशेवरों के लिए।

2. स्किल गैप: भारतीय आईटी क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और संबंधित तकनीकों की मांग तेजी से बढ़ रही है। कंपनियां अब मशीन लर्निंग (ML), डेटा एनालिटिक्स, क्लाउड कंप्यूटिंग, और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले पेशेवरों की तलाश कर रही हैं। हालांकि, मौजूदा शिक्षा प्रणाली कई बार इंडस्ट्री की नवीनतम आवश्यकताओं के साथ तालमेल नहीं रख पाती, जिससे एक महत्वपूर्ण स्किल गैप पैदा हो रहा है।

इसके अतिरिक्त, नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज (NASSCOM) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वर्ष 2026 तक एआई और डेटा साइंस में करीब 14-16 लाख पेशेवरों की आवश्यकता होगी, लेकिन मौजूदा शिक्षा प्रणाली केवल एक तिहाई आवश्यक स्किल्स को पूरा कर पा रही है।

3. डेटा की गुणवत्ता और नियामक ढांचा: एआई मॉडल की सटीकता और विश्वसनीयता इस पर निर्भर करती है कि उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए किस गुणवत्ता के डेटा का उपयोग किया गया है। यदि डेटा अधूरा, गलत, पक्षपाती या असंगत होता है, तो इससे एआई मॉडल में भी पूर्वाग्रह आ सकता है। ऐसे पक्षपाती एआई मॉडल न केवल गलत निर्णय लेते हैं, बल्कि वे सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को भी बनाए रख सकते हैं या उन्हें बढ़ा सकते हैं। भारत में एआई के लिए स्पष्ट नियामक ढांचे का अभाव व्यवसायों और व्यक्तियों दोनों के लिए अनिश्चितता और जोखिम पैदा कर सकता है।

4. आईटीईएस और बीपीओ को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है: बीपीओ (बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग) उद्योग मुख्य रूप से टेक्स्ट, वॉयस और दस्तावेज़ प्रसंस्करण को संभालने के बारे में है। एलएलएम आधारित समाधानों का इस सेगमेंट पर सबसे मजबूत प्रभाव होगा। जैसे-जैसे कंपनियां अपने वर्कफ़्लो में एआई-सक्षम उपकरणों को एकीकृत करेंगी, उत्पादकता बढ़ेगी और सेवा दरें घटेंगी। इससे भारतीय बीपीओ कंपनियों के लिए मूल्य प्रतिस्पर्धा की चुनौती बढ़ जाएगी। हरिओम सेठ कहते हैं कि मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत में लाखों नौकरियां स्वचालित हो सकती हैं, जिनमें आईटीईएस/बीपीओ क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होगा। ऐसे में पूरी तरह से स्वचालन के बजाय "ह्यूमन-इन-द-लूप" दृष्टिकोण अपनाना होगा, जहां जटिल मामलों को इंसानों द्वारा प्रबंधित किया जाए और सरल कार्यों को एआई संभाले।

5. हमारे उद्योग को नए उपकरणों और मानसिकता के साथ तैयार होना होगा: भारतीय आईटी क्षेत्र को इन क्षमताओं का लाभ उठाने और प्रतिस्पर्धी बनने के लिए बड़ी मात्रा में एआई इनेबल डिवाइस, सिस्टम और प्रक्रियाएं विकसित करनी होंगी। परंपरागत रूप से हमारी ताकत इनोवेशन के बजाय प्रक्रियाओं में रही है। यदि भारतीय आईटी कंपनियां एआई-इंटीग्रेटेड वर्कफ़्लो में निवेश नहीं करतीं, तो प्रतिस्पर्धी देश (जैसे – वियतनाम, फिलीपींस) वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं। एक्सपर्ट मानते हैं कि भारतीय आईटी उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बने रहने के लिए एआई इनेबल डिवाइस, देशी इनोवेशन, और डिजिटल चेंज को अपनाने की आवश्यकता है। यदि कंपनियां समय रहते अपनी रणनीति में बदलाव नहीं करतीं, तो उन्हें विदेशी एआई डिवाइस पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसका प्रतिकूल प्रभाव होगा। इससे न केवल लागत बढ़ेगी, बल्कि वैश्विक बाजार में उनकी पकड़ भी कमजोर हो सकती है।

6. गुणवत्ता पहलू : आईटी क्षेत्र में एआई-संचालित समाधानों की गुणवत्ता चिंता का विषय रही है। कैपजेमिनी की एक रिपोर्ट में पाया गया कि भारत में लगभग 70% एआई-संचालित समाधानों को गुणवत्ता में सुधार करना होगा। इन चिंताओं को दूर करने के लिए, कई भारतीय आईटी कंपनियां एआई अनुसंधान और विकास में भारी निवेश कर रही हैं, साथ ही अपने कर्मचारियों को एआई और संबंधित प्रौद्योगिकियों में प्रशिक्षण और कौशल प्रदान कर रही हैं।



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9 महीने 14 दिन बाद पृथ्वी पर लौटीं सुनीता विलियम्स

भारतीय मूल की अमेरिकी एस्ट्रोनॉट सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर 9 महीने 14 दिन बाद पृथ्वी पर लौट आए हैं। इनके साथ क्रू-9 के दो और एस्ट्रोनॉट अमेरिका के निक हेग और रूस के अलेक्सांद्र गोरबुनोव भी हैं। उनका ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट भारतीय समयानुसार 19 मार्च को सुबह 3:27 बजे फ्लोरिडा के तट पर लैंड हुआ।

ये चारों एस्ट्रोनॉट मंगलवार (18 मार्च) को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) से रवाना हुए थे। स्पेसक्राफ्ट के धरती के वायुमंडल में प्रवेश करने पर इसका तापमान 1650 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो गया था। इस दौरान करीब 7 मिनट के लिए कम्युनिकेशन ब्लैकआउट रहा, यानी यान से संपर्क नहीं रहा।

स्पेस स्टेशन से पृथ्वी पर लौटने में 17 घंटे लगे

ड्रैगन कैप्सूल के अलग होने से लेकर समुद्र में लैंडिंग तक करीब 17 घंटे लगे। 18 मार्च को सुबह 08:35 बजे स्पेसक्राफ्ट का हैच हुआ, यानी दरवाजा बंद हुआ। 10:35 बजे स्पेसक्राफ्ट ISS से अलग हुआ।

19 मार्च को रात 2:41 बजे डीऑर्बिट बर्न शुरू हुआ। यानी, कक्षा से उल्टी दिशा में स्पेसक्राफ्ट का इंजन फायर किया गया। इससे स्पेसक्राफ्ट की पृथ्वी के वातावरण में एंट्री हुई और सुबह 3:27 बजे फ्लोरिडा के तट पर समुद्र में लैंडिंग।

8 दिन के मिशन पर गए थे, लेकिन 9 महीने से ज्यादा समय लग गया

सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर बोइंग और NASA के 8 दिन के जॉइंट ‘क्रू फ्लाइट टेस्ट मिशन’ पर गए थे। इस मिशन का उद्देश्य बोइंग के स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट की एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन तक ले जाकर वापस लाने की क्षमता को टेस्ट करना था।

एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन पर 8 दिन में रिसर्च और कई एक्सपेरिमेंट भी करने थे। लेकिन थ्रस्टर में आई गड़बड़ी के बाद उनका 8 दिन का मिशन 9 महीने से ज्यादा समय का हो गया था।

सुनीता विलियम्स की सफल वापसी के बाद नासा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और इलॉन मस्क की स्पेस कंपनी स्पेसएक्स को धन्यवाद दिया। कहा- इस मिशन में कई चुनौतियां थीं, लेकिन सबकुछ जैसा सोचा था वैसा रहा।

सुनीता विलियम्स को ड्रैगन कैप्सूल से बाहर निकाला गया। इस दौरान उनके चेहरे पर खुशी दिख रही थी। उन्होंने हाथ हिलाकर वहां मौजूद लोगों का अभिवादन किया।

सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर को स्पेस स्टेशन पर क्यों भेजा गया था

सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर बोइंग और NASA के 8 दिन के जॉइंट ‘क्रू फ्लाइट टेस्ट मिशन’ पर गए थे। इस मिशन का उद्देश्य बोइंग के स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट की एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन तक ले जाकर वापस लाने की क्षमता को टेस्ट करना था।

एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन पर 8 दिन में रिसर्च और कई एक्सपेरिमेंट भी करने थे। मिशन के दौरान उन्हें स्पेसक्राफ्ट को मैन्युअली भी उड़ाना था।

बोइंग का स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट कब और कैसे लॉन्च किया गया था

5 जून 2024 को रात 8:22 बजे एटलस V रॉकेट के जरिए बोइंग का स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट लॉन्च हुआ था। ये 6 जून को रात 11:03 बजे स्पेस स्टेशन पहुंचा था। इसे रात 9:45 बजे पहुंचना था, लेकिन रिएक्शन कंट्रोल थ्रस्टर में परेशानी आ गई थी।

सुनीता और विल्मोर इतने लंबे समय तक स्पेस में कैसे फंस गए?

स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट के 28 रिएक्शन कंट्रोल थ्रस्टरों में से 5 फेल हो गए थे। 25 दिनों में 5 हीलियम लीक भी हुए। हीलियम प्रोपलेंट को थ्रस्टरों तक पहुंचाने के लिए बहुत अहम है। ऐसे में स्पेसक्राफ्ट के सुरक्षित रूप से लौटने पर चिंताएं थी।

डेटा का विश्लेषण करने के बाद नासा ने फैसला लिया कि स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट सुनीता और बुच विल्मोर को वापस लाने के लिए सुरक्षित नहीं है, इसलिए वो अंतरिक्ष यात्रियों के बिना ही स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट को 6 सिंतबर 2024 को पृथ्वी पर वापस ले आया।

अब स्पेसएक्स को एस्ट्रोनॉट्स को वापस लाने की जिम्मेदारी दी गई। स्पेसएक्स का ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट हर कुछ महीनों में 4 एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन लेकर जाता है और वहां मौजूद पिछला क्रू स्पेस स्टेशन में पहले से पार्क अपने स्पेसक्राफ्ट से वापस आ जाता है।

स्पेसएक्स ने जब 28 सितंबर 2024 को क्रू-9 मिशन लॉन्च किया तो इसमें भी 4 एस्ट्रोनॉट जाने वाले थे, लेकिन सुनीता और बुच के लिए दो सीट खाली रखी गई। इनके पहुंचने के बाद क्रू-8 स्पेस स्टेशन में पार्क अपने स्पेसक्राफ्ट से पृथ्वी पर लौट आया।

15 मार्च 2025 को SpaceX ने 4 एस्ट्रोनॉट्स के साथ क्रू-10 मिशन लॉन्च किया। 16 मार्च को ये एस्ट्रोनॉट ISS पहुंच गए। अब क्रू-9 के चारों एस्ट्रोनॉट जिम्मेदारी क्रू-10 को हैंडओवर करने के बाद स्पेस स्टेशन पर सितंबर से पार्क अपने स्पेसक्राफ्ट से लौट रहे हैं।

क्रू-10 मिशन को इतनी देरी से क्यों भेजा गया, पहले भी भेज सकते थे?

स्पेसएक्स के पास अभी 4 ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट है। एंडेवर, रेजीलिएंस, एंड्योरेंस और फ्रीडम। पांचवें स्पेसक्राफ्ट की मैन्युफैक्चरिंग हो रही है। क्रू-10 के लिए इसी पांचवें स्पेसक्राफ्ट का इस्तेमाल किया जाना था, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग में देरी के कारण नासा ने क्रू-10 मिशन को फरवरी से मार्च के अंत तक टाल दिया। हालांकि बाद में नासा ने क्रू-9 को वापस लाने में हो रही देरी को देखते हुए क्रू-10 के लिए पुराने एंड्यूरेंस स्पेसक्राफ्ट के ही इस्तेमाल का फैसला लिया।

वहीं इस देरी की एक वजह पॉलिटिकल भी बताई जा रही है। पिछले साल, मस्क ने सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर को तय समय से पहले घर वापस लाने में मदद की पेशकश की थी, लेकिन उनका दावा है कि बाइडेन प्रशासन ने इसे अस्वीकार कर दिया था। फॉक्स न्यूज़ के होस्ट सीन हैनिटी के साथ एक इंटरव्यू में मस्क ने कहा, "दोनों एस्ट्रोनॉट्स को राजनीतिक कारणों से स्पेस स्टेशन में छोड़ दिया गया, जो अच्छा नहीं है।"


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सुनीता विलियम्स 9 महीने बाद अंतरिक्ष से रवाना

अंतरिक्ष में फंसे एस्ट्रोनॉट सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर 9 महीने 13 दिन बाद पृथ्वी पर लौट रहे हैं। उनके साथ इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में मौजूद क्रू-9 के दो और एस्ट्रोनॉट निक हेग और अलेक्सांद्र गोरबुनोव भी आज, 18 मार्च को स्पेस स्टेशन से रवाना हुए।

चारों एस्ट्रोनॉट के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट में सवार होने के बाद सुबह 08:35 बजे इस स्पेसक्राफ्ट का हैच यानी, दरवाजा बंद हुआ और 10:35 बजे स्पेसक्राफ्ट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से अलग हुआ। यह 19 मार्च को सुबह लगभग 3:27 बजे फ्लोरिडा के तट पर लैंड होगा।

एस्ट्रोनॉट्स की धरती पर वापसी केसी होगी 7 सवालों में जानें....

1. स्पेस स्टेशन से पृथ्वी पर लौटने में कितना समय लगेगा?

इस सफर में करीब 17 घंटे लगेंगे। नासा की ओर से इस इवेंट का एक अनुमानित शेड्यूल जारी किया गया है। इसमें मौसम के कारण बदलाव भी हो सकता है।

नासा के अनुसार 19 मार्च को सुबह 2:41 बजे डीऑर्बिट बर्न शुरू होगा। यानी, कक्षा से उल्टी दिशा में स्पेसक्राफ्ट का इंजन फायर किया जाएगा। इसके बाद स्पेसक्राफ्ट की पृथ्वी के वातावरण में एंट्री होगी और सुबह फ्लोरिडा के तट पर पानी में लैडिंग होगी।

2. सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर को स्पेस स्टेशन पर क्यों भेजा गया था?

सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर बोइंग और NASA के 8 दिन के जॉइंट ‘क्रू फ्लाइट टेस्ट मिशन’ पर गए थे। इस मिशन का उद्देश्य बोइंग के स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट की एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन तक ले जाकर वापस लाने की क्षमता को टेस्ट करना था।

एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन पर 8 दिन में रिसर्च और कई एक्सपेरिमेंट भी करने थे। मिशन के दौरान उन्हें स्पेसक्राफ्ट को मैन्युअली भी उड़ाना था।

3. बोइंग का स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट कब और कैसे लॉन्च किया गया था?

5 जून 2024 को रात 8:22 बजे एटलस V रॉकेट के जरिए बोइंग का स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट लॉन्च हुआ था। ये 6 जून को रात 11:03 बजे स्पेस स्टेशन पहुंचा था। इसे रात 9:45 बजे पहुंचना था, लेकिन रिएक्शन कंट्रोल थ्रस्टर में परेशानी आ गई थी।

4. सुनीता और विल्मोर इतने लंबे समय तक स्पेस में कैसे फंस गए?

स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट के 28 रिएक्शन कंट्रोल थ्रस्टरों में से 5 फेल हो गए थे। 25 दिनों में 5 हीलियम लीक भी हुए। हीलियम प्रोपलेंट को थ्रस्टरों तक पहुंचाने के लिए बहुत अहम है। ऐसे में स्पेसक्राफ्ट के सुरक्षित रूप से लौटने पर चिंताएं थी।

डेटा का विश्लेषण करने के बाद, नासा ने फैसला लिया कि स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट सुनीता और बुच विल्मोर को वापस लाने के लिए सुरक्षित नहीं है, इसलिए वो अंतरिक्ष यात्रियों के बिना ही स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट को 6 सिंतबर 2024 को पृथ्वी पर वापस ले आया।

अब स्पेसएक्स को एस्ट्रोनॉट्स को वापस लाने की जिम्मेदारी दी गई। स्पेसएक्स का ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट हर कुछ महीनों में 4 एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन लेकर जाता है और वहां मौजूद पिछला क्रू स्पेस स्टेशन में पहले से पार्क अपने स्पेसक्राफ्ट से वापस आ जाता है।

स्पेसएक्स ने जब 28 सितंबर 2024 को क्रू-9 मिशन लॉन्च किया तो इसमें भी 4 एस्ट्रोनॉट जाने वाले थे, लेकिन सुनीता और बुच के लिए दो सीट खाली रखी गई। इनके पहुंचने के बाद क्रू-8 स्पेस स्टेशन में पार्क अपने स्पेसक्राफ्ट से पृथ्वी पर लौट आया।

15 मार्च 2025 को SpaceX ने 4 एस्ट्रोनॉट्स के साथ क्रू-10 मिशन लॉन्च किया। 16 मार्च को ये एस्ट्रोनॉट ISS पहुंच गए। अब क्रू-9 के चारों एस्ट्रोनॉट जिम्मेदारी क्रू-10 को हैंडओवर करने के बाद स्पेस स्टेशन पर सितंबर से पार्क अपने स्पेसक्राफ्ट से लौट रहे हैं।

5. क्रू-10 मिशन को इतनी देरी से क्यों भेजा गया, पहले भी भेज सकते थे?

स्पेसएक्स के पास अभी 4 ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट है। एंडेवर, रेजीलिएंस, एंड्योरेंस और फ्रीडम। पांचवें स्पेसक्राफ्ट की मैन्युफैक्चरिंग हो रही है। क्रू-10 के लिए इसी पांचवें स्पेसक्राफ्ट का इस्तेमाल किया जाना था, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग में देरी के कारण नासा ने क्रू-10 मिशन को फरवरी से मार्च के अंत तक टाल दिया। हालांकि, बाद में नासा ने क्रू-9 को वापस लाने में हो रही देरी को देखते हुए क्रू-10 के लिए पुराने एंड्यूरेंस स्पेसक्राफ्ट के ही इस्तेमाल का फैसला लिया।

वहीं इस देरी की एक वजह पॉलिटिकल भी बताई जा रही है। पिछले साल, मस्क ने सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर को को तय समय से पहले घर वापस लाने में मदद की पेशकश की थी, लेकिन उनका दावा है कि बाइडेन प्रशासन ने इसे अस्वीकार कर दिया था। फॉक्स न्यूज़ के होस्ट सीन हैनिटी के साथ एक इंटरव्यू में मस्क ने कहा, "दोनों एस्ट्रोनॉट्स को राजनीतिक कारणों से स्पेस स्टेशन में छोड़ दिया गया, जो अच्छा नहीं है।"

6. सुनीता की वापसी में क्या खतरे हो सकते हैं?

सुनीता की धरती पर वापसी में मुख्य रूप से 3 खतरे हैं।



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तेजस MK1 प्रोटोटाइप से अस्त्र मिसाइल का सफल परीक्षण

ओडिशा के चांदीपुर में बुधवार को भारतीय वायुसेना ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। इसमें स्वदेशी अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल का सफल टेस्ट किया गया। इस मिसाइल को LCA तेजस MK1 प्रोटोटाइप से लॉन्च किया गया।

दरअसल अस्त्र मिसाइल को पहले ही भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल किया जा चुका है। इस वजह से अस्त्र मिसाइल का स्वदेशी लड़ाकू विमानों के साथ सफलतापूर्वक जोड़ा जाना एक बड़ी उपलब्धि है।

अस्त्र मिसाइल को DRDO द्वारा बनाया गया है। यह मिसाइल 100 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तक दुश्मन के विमानों को मार गिराने में सक्षम है। यह पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित है, जिससे भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जो लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों का निर्माण कर सकते हैं। इससे पहले इस तकनीक पर अमेरिका, रूस और फ्रांस जैसे देशों का वर्चस्व था।

मिसाइल की 3 खासियत:

स्मोकलेस प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी, जिससे दुश्मन को इसकी मौजूदगी का अंदाजा नहीं लगता।

एडवांस्ड इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, जो तेज गति से उड़ते लक्ष्यों को भी सटीक निशाना बना सकता है।

तेजस जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमानों के साथ पूरी तरह से अनुकूल।

तेजस के साथ पहली बार सफल ट्रायल, IAF की ताकत बढ़ेगी

इससे पहले, अस्त्र मिसाइल को सुखोई Su-30 MKI जैसे विमानों पर तैनात किया जा चुका था। लेकिन 12 मार्च 2025 को हुए इस टेस्ट ने साबित कर दिया कि यह LCA तेजस जैसे स्वदेशी फाइटर जेट्स के साथ भी पूरी तरह फिट बैठती है। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में भारतीय वायुसेना तेजस में अस्त्र मिसाइल को तैनात कर अपनी हवाई ताकत को और मजबूत करेगी।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता पर DRDO, IAF, ADA और HAL की पूरी टीम को बधाई दी और इसे ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक बड़ा कदम बताया।

सीमा पर भारत की रक्षा रणनीति को मिलेगी नई मजबूती

यह टेस्ट ऐसे समय पर हुआ है, जब भारत अपने रक्षा बेड़े को आधुनिक बनाने में जुटा है। अस्त्र मिसाइल की मारक क्षमता और तेजस से इसकी सफल लॉन्चिंग से भारत की डिफेंस डिटरेंस (रक्षा प्रतिरोधक क्षमता) को मजबूती मिलेगी। यह खासतौर पर सीमा पर बदलते हवाई युद्ध की रणनीति के लिहाज से अहम साबित होगा।

ASTRA से LCA तेजस MK1A की बढ़ेगी मारक क्षमता

इस टेस्ट के साथ ही LCA तेजस MK1A वेरिएंट के इंडक्शन की प्रक्रिया को तेज करेगा। तेजस का यह उन्नत वेरिएंट हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा विकसित किया जा रहा है। अस्त्र मिसाइल के साथ तेजस का इंटीग्रेशन होने से दुश्मन के विमानों को दूर से ही निशाना बनाया जा सकेगा।

स्वदेशी डिफेंस सेक्टर को बड़ा बढ़ावा

अस्त्र का सफल टेस्ट भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन के लिए भी मील का पत्थर साबित होगा। इसमें ADA, DRDO, HAL, CEMILAC, DG-AQA और IAF जैसी कई संस्थाओं का योगदान रहा।

ASTRA एयर-टू-एयर मिसाइल सिस्टम में आत्मनिर्भरता की ओर कदम

आने वाले महीनों में अस्त्र मिसाइल के और टेस्ट होंगे, जिससे इसकी सटीकता और विश्वसनीयता को परखा जाएगा।

इसे LCA MK2 और AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) जैसे भविष्य के फाइटर जेट्स में भी शामिल करने की योजना है।

इससे भारत को एयर-टू-एयर मिसाइल सिस्टम में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी, जिससे विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम होगी।


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सुनीता विलियम्स की अंतरिक्ष से वापसी टली

भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और बुच विलमोर की इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) से वापसी टल गई है। NASA ने तकनीकी खराबी के चलते स्पेस स्टेशन के लिए नए क्रू को लेकर जा रहे मिशन क्रू 10 को टाल दिया है।

इस मिशन को कल यानी 12 मार्च को स्पेसएक्स के रॉकेट फाल्कन 9 से लॉन्च किया जाना था। इसमें चार अंतरिक्ष यात्री स्पेस स्टेशन के लिए रवाना होने वाले थे।

इनमें दो अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री ऐनी मैकक्लेन और निकोल एयर्स, जापान के टाकुया ओनिशी (JAXA) और रूस के के अंतरिक्ष यात्री किरिल पेस्कोव (रोस्कोस्मोस) शामिल हैं। ये चारों पिछले 9 महीने से स्पेस स्टेशन में फंसे सुनीता विलियम्स और बुच विलमोर की जगह लेते।

स्पेस स्टेशन का हैंडओवर देने के बाद सुनीता विलियम्स और अन्य 3 साथी 16 मार्च को स्पेस स्टेशन से रवाना होते। हालांकि अब इसमें देरी आ गई है। क्रू 10 मिशन को टालने की वजह उसके रॉकेट के ग्राउंड सपोर्ट क्लैम्प आर्म में हाइड्रोलिक सिस्टम में आई खराबी थी।

मस्क की स्पेसएक्स के पास वापस लाने की जिम्मेदारी

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्पेस एक्स के CEO इलॉन मस्क से अंतरिक्ष में फंसी सुनीता विलियम्स और उनके सहयोगी बुच विल्मोर को वापस लाने का काम सौंपा है।

ट्रम्प ने जनवरी में सोशल मीडिया पर लिखा- मैंने मस्क से उन दो ‘बहादुर अंतरिक्ष यात्रियों’ को वापस लाने को कहा है। इन्हें बाइडेन प्रशासन ने अंतरिक्ष में छोड़ दिया है। वे अंतरिक्ष स्टेशन पर कई महीनों से इंतजार कर रहे हैं। मस्क जल्द ही इस काम में लग जाएंगे। उम्मीद है कि सभी सुरक्षित होंगे।

मस्क ने इसके जवाब में कहा कि हम ऐसा ही करेंगे। यह भयानक है कि बाइडेन प्रशासन ने उन्हें इतने लंबे वक्त तक वहां छोड़ रखा है।

सुनीता और विलमोर को स्पेस स्टेशन पर क्यों भेजा गया था?

सुनीता और बुच विलमोर बोइंग और NASA के जॉइंट ‘क्रू फ्लाइट टेस्ट मिशन’ पर गए थे। इसमें सुनीता, स्पेसक्राफ्ट की पायलट थीं। उनके साथ गए बुच विलमोर इस मिशन के कमांडर थे। दोनों को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) में 8 दिन रुकने के बाद वापस पृथ्वी पर आना था।

लॉन्च के समय बोइंग डिफेंस, स्पेस एंड सिक्योरिटी के प्रेसिडेंट और CEO टेड कोलबर्ट ने इसे स्पेस रिसर्च के नए युग की शानदार शुरुआत बताया था। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य स्पेसक्राफ्ट की एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन तक ले जाकर वापस लाने की क्षमता साबित करना था।

एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन पर 8 दिन में रिसर्च और कई एक्सपेरिमेंट भी करने थे। सुनीता और विलमोर पहले एस्ट्रोनॉट्स हैं जो एटलस-वी रॉकेट के जरिए स्पेस ट्रैवेल पर भेजे गए। इस मिशन के दौरान उन्हें स्पेसक्राफ्ट को मैन्युअली भी उड़ाना था। फ्लाइट टेस्ट से जुड़े कई तरह के ऑब्जेक्टिव भी पूरे करने थे।

सुनीता और विलमोर इतने लंबे समय तक स्पेस में कैसे फंस गए?

स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट के लॉन्च के समय से ही उसमें कई दिक्कतें थीं। इनके चलते 5 जून से पहले भी कई बार लॉन्च फेल हुआ था। लॉन्च के बाद भी स्पेसक्राफ्ट में दिक्कतों की खबर आई।

NASA ने बताया कि स्पेसक्राफ्ट के सर्विस मॉड्यूल के थ्रस्टर में एक छोटा सा हीलियम लीक है। एक स्पेसक्राफ्ट में कई थ्रस्टर होते हैं। इनकी मदद से स्पेसक्राफ्ट अपना रास्ता और स्पीड बदलता है। वहीं हीलियम गैस होने की वजह से रॉकेट पर दबाव बनता है। उसका ढांचा मजबूत बना रहता है, जिससे रॉकेट को अपनी फ्लाइट में मदद मिलती है।

लॉन्च के बाद 25 दिनों में स्पेसक्राफ्ट के कैप्सूल में 5 हीलियम लीक हुए। 5 थ्रस्टर्स काम करना बंद कर चुके थे। इसके अलावा एक प्रॉपेलेंट वॉल्व पूरी तरह बंद नहीं किया जा सका। स्पेस में मौजूद क्रू और अमेरिका के ह्यूस्टन में बैठे मिशन के मैनेजर मिलकर भी इसे ठीक नहीं कर पाए।

8 दिनों के लिए अंतरिक्ष गई सुनीता विलियम्स 8 महीनों से इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में फंसी हैं। उनके धंसे गाल, कमजोर शरीर देखकर डॉक्टर भी चिंता जाहिर कर चुके हैं। राष्ट्रपति बनते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने इलॉन मस्क से कहा था- बहादुर अंतरिक्ष यात्रियों को वापस लाओ, जिन्हें बाइडेन ने अंतरिक्ष में छोड़ दिया है।


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दिल्‍ली से जयपुर का सफर सिर्फ 30 मिनट में! देश का पहला हाइपरलूप टेस्‍ट ट्रैक तैयार, 1100 KM प्रति घंटा की स्पीड से दौड़ेगी ट्रेन

 भारत के पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में एक बड़ी क्रांति आने वाली है। देश की पहली हाइपरलूप टेस्ट ट्रैक पर पूरी तरह से तैयार है और इसका वीडियो खुद रेल मंत्रालय में जारी कर ये साफ किया कि भारत हाई-स्पीड ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ा चुका है।

यह ट्रैक 422 मीटर लंबा है और इसे IIT मद्रास ने तैयार किया है। इस परियोजना को पूरा करने के लिए भारतीय रेलवे ने आईआईटी मद्रास को आर्थिक मदद प्रदान की है।

क्या है हाइपरलूप

हाइपरलूप एक ऐसी तकनीक है, जिसमें ट्रेन को एक खास ट्यूब में टॉप स्पीड पर चलाया जाता है। इस तकनीक की मदद से लोगों को बहुत तेज और सुरक्षित यात्रा का अनुभव होगा। ट्रायल सफल रहने के बाद यह तकनीक भारत के पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को पूरी तरह से बदल सकती है।

बुलेट ट्रेन से भी ज्यादा है रफ्तार

हाइपरलूप ट्रेनें 1100 किलोमीटर की रफ्तार से चलेंगी। बुलेट ट्रेन की टॉप स्पीड के बारे में बात करें तो उसकी स्पीड 450 किलोमीटर होती है। हाइपरलूप के जरिए दिल्ली के यात्री सिर्फ 30 मिनट में ही जयपुर तक का सफर तय कर सकेंगे।

अब उम्मीद लगाई जा रही है कि जल्द ही इस हाइपरलूप ट्रैक पर ट्रायल रन शुरू होंगे। ट्रायल सफल रहने पर भारत में इस अत्याधुनिक तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट में बड़ा बदलाव

भारत में हाइपरलूप ट्रेन अगर शुरू होती है तो आने वाले समय में रेलवे और सड़क यात्रा का ढांचा बदल जाएगा। भारत अब उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जो हाइपरलूप तकनीक को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।


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मेडिकल कॉलेज और आईआईटी में बढ़ेंगी सीटें, AI सेंटर होगा स्थापित

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में देश का आम बजट पेश कर दिया है।इस केंद्रीय बजट 2025 में आईआईटी, मेडिकल कॉलेज और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी बड़ी घोषणाएं की गई हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ने कहा, देश में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए जाएंगे, जो कि AI पर आधारित होंगे, इन सेंटर्स के लिए 500 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया जाता है। साथ ही, उन्होंने आईआईटी में विस्तार की भी बात कही। वित्त मंत्री ने कहा, पिछले 10 वर्षों में 23 आईआईटी में छात्रों की संख्या 100% बढ़ी है। ऐसे में, "साल 2014 के बाद बनाए गए 5 आईआईटी में अतिरिक्त 6,500 छात्रों के लिए एडिशनल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा। वित्त मंत्री ने यह भी बताया कि आईआईटी पटना में छात्रावास और बुनियादी सुविधाओं का भी विस्तार किया जाएगा, जिससे वहां के स्टूडेंट्स को सहूलियत हो सके। इसके साथ ही, स्किल डेवलपमेंट के लिए 5 नेशनल सेंटर्स ऑफ excellence स्थापित किए जाएंगे। 

Education Budget 2025: 50 हजार स्कूलों में अटल Tinkering लैब होगी स्थापित

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि अगले पांच वर्षों में 50,000 सरकारी स्कूलों में अटल Tinkering लैब स्थापित की जाएंगी। उन्होंने अपने बजट भाषण में घोषणा कि, ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी को सभी सरकारी माध्यमिक और प्राथमिक विद्यालयों तक भी बढ़ाया जाएगा। साथ ही, स्टार्टअप क्रेडिट गारंटी बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये की गई। इसके अलावा, भारतीय भाषा स्कीम भी लॉन्च की गई है। 

Education Budget 2025: मेडिकल कॉलेजों में बढ़ेगी 75 हजार सीटें 

वित्त मंत्री ने आईआईटी में विस्तार करने के साथ-साथ मेडिकल काॅलेजों में भी सीटें बढ़ाने का एलान किया है। निर्मला सीतामरण के अनुसार, देश भर के मेडिकल कॉलेजों में अगले पांच वर्षों में मेडिकल की 75,000 सीटें और बढ़ाए जाने का लक्ष्य है, जबकि अगले साल 10 हजार सीटें बढ़ाई जाएंगी। वहीं, फिलहाल, 1,12,112 सीटें, जिन पर स्टूडेंट्स को दिया जाता है। अब सीटों की संख्या में इजाफा होने के चलते अब मेडिकल छात्र-छात्राओं कोबेहद फायदा होगा। 

बिहार में नेशनल इंस्ट्टीयू ऑफ फूड टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट स्थापत किया जाएगा। इस संस्थान के स्थापित होने से, किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें कौशल के अवसर प्रदान करने और युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही, उन्होंने कहा कि इस चिकित्सा शिक्षा पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाएगा।


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10 महीने में लॉन्च होगा स्वदेशी जेन AI मॉडल, अमेरिका और चीन के दबदबे को चुनौती देगा भारत

अमेरिका और चीन के बाद अब भारत जल्द अपना एआई मॉडल लॉन्च करने जा रहा है। आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आज इसका एलान किया है। भारत के स्वदेशी जेनरेटिव एआई मॉडल के अगले 10 महीनों में उपलब्ध होने की उम्मीद है। यह एआई मॉडल ChatGPT, Gemini और DeepSeek जैसे पॉपुलर एआई मॉडल को चुनौती देगा। उन्होंने बताया कि सरकार ने इसके लिए 10 कंपनियों को शॉर्टलिस्ट किया है।

अश्विनी वैष्णव ने बताया कि स्वदेशी एआई मिशन को पूरा करने के लिए मौजूदा समय में सरकारी कम्प्यूटिंग फैसेलिटी में 18,693 ग्राफिक प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) उपलब्ध हैं।

भारत ने स्वदेशी एआई मिशन के लिए रिलायंस जियो, टाटा कॉम्युनिकेशन, ओरिएंट टेक, योट्टा कॉम जैसी कंपनियों को शॉर्टलिस्ट किया है। इसके साथ ही सरकार ने अन्य कंपनियों से भी फांउडेशनल मॉडल के लिए आवेदन मांगे हैं। इसके साथ ही इडिविजुअल डेवलपर्स से भी आवेदन मांगे जा रहे हैं। 

प्राइवेसी को लेकर सरकार चिंतित

डीपसीक एआई की लोकप्रियता और यूजर्स की प्राइवेसी को लेकर पूछे सवाल के जवाब में अश्विनी वैष्णव ने बताया कि सरकार यूजर्स की प्राइवेसी को लेकर गंभीर हैं। उन्होंने बताया कि सरकार जल्द ही यूजर्स की प्राइवेसी और सुरक्षा के लिए डीपसीक से भारत में सर्वर लगाने के लिए कहेगी।



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कोलकाता में गणतंत्र दिवस की परेड में रोबोट डॉग्स

कोलकाता में रविवार को 76वें गणतंत्र दिवस पर इंडियन ऑर्मी के रोबोट डॉग्स परेड में शामिल हुई। रोबोट आर्मी ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस को सलामी भी दी।

भारतीय सेना ने नॉर्थ टेक सिम्पोजियम 2023 में इन रोबोट्स को लॉन्च किया था। इनका नाम संजय मल्टी यूटिलिटी लेग्ड इक्विपमेंट (MULE) है। इन्हें पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से बनाया गया है। सेना ने अपनी कई यूनिट्स में 100 रोबोटिक डॉग्स को शामिल किया है।

ये माइनस 40 डिग्री टेम्परेचर में भी काम कर सकते हैं। इनका वजन करीब 15 किलो तक है और 10 किलोमीटर तक चल सकते हैं।। इन्हें रिमोट कंट्रोल से ऑपरेट किया जाता है। ये न्यू टेक्नोलॉजी से लैस हैं और जरूरत पड़ने पर रिस्पॉन्स कर सकते हैं।

राज्यपाल बोस ने कोलकाता के रेड रोड पर तिरंगा फहराया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी मौजूद थीं। भारतीय सेना, नौसेना, वायु सेना, पश्चिम बंगाल पुलिस, कोलकाता पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स और आपदा प्रबंधन समूह की टुकड़ियों ने परेड में हिस्सा लिया। इनके अलावा, विभिन्न स्कूलों के छात्रों ने भी समारोह में हिस्सा लिया और सांस्कृतिक कार्यक्रम किए।

क्या कर सकते हैं ये रोबोट?

MULE रोबोट बर्फ, पहाड़ों और ऊंची सीढ़ियों पर भी चल सकते हैं। यह 45 डिग्री के कोण पर पहाड़ों पर चढ़ सकते हैं और 18 सेंटीमीटर ऊंची सीढ़ियां भी चढ़ सकते हैं। इनसे विस्फोटक का पता लगाकर उन्हें नष्ट किया जा सकता है। इनका इस्तेमाल खुफिया जानकारी के लिए और बॉर्डर पर निगरानी के लिए भी किया जाएगा।

ऑर्मी डे परेड में रोबोट डॉग्स का प्रदर्शन हुआ था

भारतीय सेना ने 15 जनवरी को महाराष्ट्र के पुणे में 77वां आर्मी डे मनाया था। परेड में अलग-अलग रेजिमेंटल सेंटर्स से 8 मार्चिंग कंटिंजेंट ने मार्च पास्ट किया था। इसमें सेना ने पहली बार 12 रोबोटिक डॉग्स का प्रदर्शन किया था।

ऊंचे पहाड़ से लेकर पानी तक में काम कर सकते हैं

ये रोबोटिक डॉग किसी भी ऊंचे पहाड़ से लेकर पानी की गहराई तक जाकर काम करने में सक्षम हैं। इन्हें 10 किमी दूर बैठकर भी ऑपरेट किया जा सकता है।

एक घंटे चार्ज करने के बाद ये लगातार 10 घंटे तक काम कर सकते हैं। जैसलमेर के पोकरण फायरिंग रेंज में रोबोटिक डॉग ने भारतीय सेना की बैटल एक्स डिवीजन के साथ 14 से 21 नवंबर 2024 तक अभ्यास किया था। 

गणतंत्र दिवस परेड में पश्चिम बंगाल की झांकी

दिल्ली के कर्तव्य पथ पर पश्चिम बंगाल की गणतंत्र दिवस की झांकी में राज्य की 'लक्ष्मी भंडार' योजना पर प्रकाश डाला गया, जो महिलाओं को मासिक आय की गारंटी प्रदान करती है। झांकी के सामने एक दुर्गा की मूर्ति थी, जिसके साथ छऊ कलाकार भी थे।



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