अमीर-ग़रीब में भेदभाव रहेगा तो कैसे कोविड महामारी का अंत होगा?

113 साल पहले 1918 में वैश्विक महामारी से जितने लोग अमरीका में मृत हुए थे उससे ज़्यादा वहाँ पर अब कोविड से मृत हो चुके हैं। अमरीका जैसे साधन सम्पन्न राष्ट्र का यह हाल है तो अन्य विकासशील देशों में स्वास्थ्य सुरक्षा की कल्पना कीजिए कि महामारी ने कितनी वीभत्स मानवीय त्रासदी उत्पन्न की है। यह बात सच है कि कोरोना वाइरस के कारण जान गयी हैं परंतु यह भी कटु सत्य है कि कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली, ग़ैर बराबरी वाली व्यवस्था के कारण भी अनेक जाने गयी हैं। कहीं लोग अस्पताल में भर्ती न होने के कारण मृत हुए तो कहीं ऑक्सिजन न मिल पाने के कारण। हर इंसान के लिए सशक्त जन स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा कितनी ज़रूरी है यह हमने सीखने में सदियां लगा दी हैं।


विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक दुनिया की आबादी के एक बड़े भाग (70 फीसदी से अधिक) को नौ-दस महीनों की समय सीमा में पूरा टीकाकरण नहीं मिल जाता, तब तक टीकाकरण के ज़रिए कोविड महामारी पर विराम कैसे लगेगा? सिर्फ़ अमीर देशों में या अमीर लोगों को ही पूरा टीका मिलेगा और अन्य लोग वंचित रहेंगे तो महामारी पर अंकुश कैसे लगेगा? यह गम्भीर सवाल न केवल अमीर देशों के लिए है बल्कि ग़रीब और विकासशील देशों में अमीर वर्ग के लिए भी है। चीन के वुहान से जो वाइरस दिसम्बर 2019 में रिपोर्ट हुआ था, वह दुनिया के सभी देशों में फैल गया है-अमीर हो या ग़रीब। यह समझना सबसे ज़रूरी है कि एक व्यक्ति की स्वास्थ्य सुरक्षा अन्य लोगों की स्वास्थ्य सुरक्षा पर भी निर्भर है। और यह भी समझना ज़रूरी है कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य सुरक्षा कदापि पर्याप्त नहीं है क्योंकि वह शासन-प्रशासन और हरी-भरी पृथ्वी पर भी निर्भर है (उदाहरण के तौर पर, वायु प्रदूषण से होने वाले फेफड़े के कैन्सर और अन्य जानलेवा रोग से स्वास्थ्य बीमा या स्वास्थ्य सेवा नहीं बचा पाएगी)।


ठोस प्रमाण: टीकाकरण से कोविड होने पर उसके गम्भीर परिणाम होने का ख़तरा बहुत कम


टीकाकरण का व्यक्तिगत लाभ भी मिलता है क्योंकि जिसको पूरा टीका लगा है उसको कोविड होने पर कोविड के गम्भीर परिणाम होने का ख़तरा अत्यंत कम है और कोविड से मृत होने की सम्भावना भी बहुत कम है। दुनियाभर में हुए अनेक वैज्ञानिक शोध इस बात को प्रमाणित करते हैं कि कोविड टीके से कोविड होने के गम्भीर परिणाम होने का ख़तरा बहुत कम होता है और मृत्यु का ख़तरा भी अत्यंत कम (उन लोगों की तुलना में जिन्हें कोविड टीका नहीं लगा है)। दुनिया में अनेक देशों में आबादी का एक बड़ा भाग पूरा टीकाकरण करवा चुका है जैसे कि अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेल्या, फ़्रान्स, यूरोप के अन्य अमीर देश, उरुगाय, सिंगापुर आदि। इनमें से अनेक देशों में 80 फीसदी से अधिक आबादी को पूरा टीका लगा है और अनेक जगह 50 फीसदी से अधिक आबादी पूरा टीकाकरण करवा चुकी है।


जिन देशों में अत्याधिक आबादी पूरा टीकाकरण करवा चुकी है, वहाँ पर इसीलिए जिस अनुपात में नए कोविड पॉज़िटिव केस हैं उस अनुपात में लोगों को अस्पताल को ज़रूरत नहीं पड़ती, ऑक्सिजन की ज़रूरत नहीं पड़ती, और मृत्यु दर भी कम है। जिन देशों में टीकाकरण कम है वहाँ जिस अनुपात में नए कोविड केस हैं उसी अनुपात में अस्पताल की ज़रूरत बढ़ती है, ऑक्सिजन की ज़रूरत बढ़ती है, मृत्यु दर बढ़ती है। साफ़ ज़ाहिर है कि कोविड टीकाकरण करवाने के कारण कोविड होने पर गम्भीर परिणाम होने का ख़तरा बहुत कम होता है।


क्या टीकाकरण से संक्रमण होने से बचाव होता है?

पूरा कोविड टीकाकरण कराने से व्यक्ति कोविड से संक्रमित होने से बचेगा या नहीं इस पर ठोस प्रमाण अभी आना बाक़ी है। अमरीका में दिसंबर 2020 से अप्रैल 2021 तक हुए प्रारम्भिक शोध के आँकड़े बताते हैं कि जिन लोगों ने पूरा टीकाकरण करवाया था उनको संक्रमण होने का ख़तरा 80 फीसदी कम था हालाँकि अमरीकी सीडीसी के अनुसार, अभी अधिक शोध की ज़रूरत है कि यह बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो और ठोस रूप से कही जा सके. हाल ही में जारी दिशानिर्देश में, अमरीका के सीडीसी ने कहा कि कोविड टीके की पूरी खुराक लगवाने पर कोविड होने का ख़तरा 5 गुणा कम होता है और यदि कोविड हो जाए तो गम्भीर परिणाम होने का ख़तरा 10 गुणा कम और कोविड से मृत्यु होने का ख़तरा 10 से अधिक गुणा कम होता है। पर यह बात स्पष्ट है कि टीकाकरण करवाने से कोविड होने का ख़तरा अत्यंत कम होता है पर शून्य नहीं होता है-इसीलिए मास्क ठीक से पहने, भौतिक दूरी बनाये रखें, और संक्रमण नियंत्रण पर ध्यान दें। मुंबई में आँकड़े देखें तो जिन लोगों को पूरा टीका लगा था उनमें सिर्फ़ 0.35 फीसदी को कोविड हुआ। मुंबई में 25 लाख लोगों को पूरा टीका लगा था जिनमें से 9001 कोविड पॉज़िटिव हुए।


उत्तर प्रदेश में कुल आबादी के मात्र 8 फीसदी को अब तक लगा है पूरा टीका

16 जनवरी 2021 से सितम्बर तक, उत्तर प्रदेश में कुल आबादी के मात्र 8 फीसदी का पूरा टीकाकरण हुआ है जो राष्ट्रीय औसत पूरा टीकाकरण दर से आधा है! केरल जैसे राज्यों में राष्ट्रीय औसत से दुगना टीकाकरण हो रहा है। हालाँकि इसी समय अवधि में अमीर देशों में आबादी का 80 फीसदी से अधिक का टीकाकरण हो चुका है। जुलाई 2021 में भारत में आबादी के 8.8 फीसदी लोगों का पूरा टीकाकरण हो चुका था पर उत्तर प्रदेश में 4.3 फीसदी ही हुआ था। सशक्त जन स्वास्थ्य प्रणाली कितनी ज़रूरी है सतत विकास के लिए यह कोविड ने पुन: स्पष्ट कर दिया है। कोविड महामारी पर अंकुश लगाने के लिए यह ज़रूरी है कि एक समयबद्ध तरीक़े से बिना भेदभाव के सभी का टीकाकरण हो। अमीर हो या गरीब, अमीर देश में हो या गरीब देश में, दुनिया में सभी के टीकाकरण की ज़रूरत है जिससे कि महामारी पर सफलतापूर्वक अंकुश लग सके। अनेक देशों में टीकाकरण दर अत्यंत कम पर अमीर देश तीसरे बूस्टर डोज़ लगवाने पर आतुर!


यदि अमीर लोग या अमीर देश टीके की होड़ करेंगे और खुद तीसरी बूस्टर डोज़ लगवाएँगे तो नि:संदेह महामारी के ख़िलाफ़ जंग अभी काफ़ी जटिल होने को है! दुनिया में कुल आबादी है 7 अरब और 5.5 अरब वैक्सीन डोज़ लग चुकी हैं पर इनमें से 80 फीसदी अमीर देशों में लगी हैं न कि विकासशील या ग़रीब देशों में। यह बात भी हम ध्यान दें कि अनेक विकासशील देश जैसे कि भारत में यह अधिकांश वैक्सीन बनी हैं। दुनिया के अमीर देश तीसरी बूस्टर डोज़ लगवाने को आतुर हैं परंतु उनके अकेले के टीकाकरण से महामारी का अंत कैसे होगा? इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉक्टर टेडरॉस ने कहा है कि 2021 के अंत तक, कोई देश तीसरा बूस्टर डोज़ न लगवाए। 


विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के सभी देशों से अपील की है कि सितम्बर 2021 के अंत तक, सभी देश अपनी आबादी के 10 फीसदी का कम-से-कम पूरा टीकाकरण करें, दिसम्बर 2021 तक 40 फीसदी और जून 2022 तक 70 फीसदी आबादी का हर देश कम-से-कम टीकाकरण करे। अमीर देशों ने वादा किया था कि 1 अरब डोज़ वह ग़रीब देशों को दान देंगे पर इस वादे का सिर्फ़ 15 फीसदी अभी तक दान दिया गया है। हाल ही में प्रकाशित समाचार के अनुसार, भारत में भी तीसरे डोज़ की बात हो रही है जो सर्वदा अनुचित है क्योंकि पूरी आबादी में सभी पात्रों को टीका तो पहले मिले तब ही हम लोग तीसरी बूस्टर डोज़ का सोचें।


कोविड महामारी का प्रकोप अनेक गुना तीव्र करने में हमारे समाज में व्याप्त ग़ैर बराबरी की बड़ी भूमिका है। इसीलिए कोविड के दौरान जीवनरक्षक दवाओं या ऑक्सिजन की कालाबाज़ारी, जमाख़ोरी, आदि, पीपीई किट या मास्क भी इस मुनाफ़े के खेले से अछूते नहीं रहे। हद तब हो गयी जब मृत्यु उपरांत परिवारजन को शव ले जाने वाले वाहन, ऐम्ब्युलन्स आदि या क्रिया क्रम में भी लूटने की खबरें आयीं। जब तक समाज के सबसे वंचित वर्ग जो हाशिये पर हैं वह सुरक्षित नहीं रहेंगे और बिना किसी शोषण या भेदभाव के मानवीय ढंग से जीवनयापन नहीं कर सकेंगे, तब तक कोविड जैसी महामारी मानवीय त्रासदी बन हम पर क़हर ढाहती रहेंगी।


-बॉबी रमाकांत-