चारधाम यात्रा इस साल रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही है। 19 अप्रैल से 13 मई तक के आंकड़ों के अनुसार, 12 लाख 64 हजार 217 श्रद्धालुओं ने चारों धामों के दर्शन किए हैं। लेकिन इस उत्साह के बीच यात्रा के दौरान हुई मौतों का आंकड़ा भी चिंता का विषय बन रहा है।
बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री में भी बढ़ी संख्या
राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र (SEOC) द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, चारधाम यात्रा में 40 श्रद्धालुओं की जान जा चुकी है, जिनमें से सबसे ज्यादा 22 मौतें केदारनाथ धाम में हुई हैं। इसके अलावा, बद्रीनाथ में 7, यमुनोत्री में 6 और गंगोत्री में 5 श्रद्धालुओं की मृत्यु हुई है।
स्वास्थ्य चुनौतियाँ और मृत्युदर का कारण
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि अधिकांश मौतें हार्ट अटैक, हाई एल्टीट्यूड सिकनेस और अन्य स्वास्थ्य कारणों से हुई हैं। यात्रा का मार्ग ऊंचाई वाले क्षेत्रों से होकर गुजरता है, जहां ऑक्सीजन का स्तर कम होने से बुजुर्ग और पहले से बीमार श्रद्धालुओं को अधिक परेशानी हो रही है।
सरकार की तैयारी पर सवाल
हालांकि सरकार ने यात्रा से पहले स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था का दावा किया था, लेकिन लगातार बढ़ती मौतों के आंकड़े चिंतनीय हैं। सरकार ने यात्रा के लिए एडवाइजरी जारी की थी, जिसमें सलाह दी गई थी कि बुजुर्गों और हाई ब्लड प्रेशर वालों को स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए।
Chardham Yatra Deaths in Kedarnath: स्वास्थ्य मंत्री की अपील
स्वास्थ्य मंत्री डॉ. सुबोध उनियाल ने कहा है कि यात्री अक्सर अपने शरीर के संकेतों को नजरअंदाज कर तेज़ गति से यात्रा पूरी करने की कोशिश करते हैं, जिससे हार्ट अटैक और उच्च ऊँचाई से जुड़ी समस्याएँ बढ़ जाती हैं।
स्थानीय स्वास्थ्य सेवा सुविधाएँ
यात्रा मार्ग पर 47 अस्पतालों के साथ-साथ 2820 स्वास्थ्य कर्मियों और 400 डॉक्टरों की तैनाती की गई है। डॉक्टरों को खास ट्रेनिंग दी गई है कि वे हाई एल्टीट्यूड सिकनेस, हाइपरटेंशन और शुगर मरीजों का इलाज कैसे करें।
ट्रॉमा सेंटर बनाने की योजना
सरकार अब यात्रा मार्ग पर ट्रॉमा सेंटर बनाने की योजना बना रही है। दून मेडिकल कॉलेज और श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में ट्रॉमा सेंटर खोले जाने की तैयारी चल रही है, ताकि स्वास्थ्य आपात स्थितियों में त्वरित सहायता मिल सके।
भविष्य की चुनौतियाँ
यात्रा मार्ग पर अन्य संवेदनशील स्थलों पर भी ट्रॉमा सेंटर बनाने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य दुर्घटनाओं या स्वास्थ्य आपात स्थितियों में ‘गोल्डन ऑवर’ के भीतर इलाज सुनिश्चित करना है, ताकि ज्यादा से ज्यादा जिंदगियाँ बचाई जा सकें।









