सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर सरकार का यू-टर्न: फैसले को बताया गलत

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने मंगलवार को केरलम के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री देने का आदेश जारी रहे या नहीं इस पर पहले दिन की सुनवाई की।

केंद्र ने कहा- सबरीमाला मामले में गलत फैसला दिया गया था। उसे गलत कानून घोषित किया जाना चाहिए। मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक बरकरार रखी जाए। धार्मिक आस्था के मामले में अदालत को दखल नहीं करना चाहिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा इस मामले में 'अनुच्छेद 17' दलील पर किस तरह पेश किया जाए, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने 3 दिन तक तो महिला को 'अछूत' माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई 'अछूतपन' न रह जाए।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर कोई सामाजिक बुराई है, जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दे दिया गया हो तो अदालत उनके बीच फर्क कर सकती है कि वह एक सामाजिक बुराई है या कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा है।

इस पर केंद्र ने कहा कि संवैधानिक दृष्टि से इसका जवाब यह होगा कि इसका समाधान अनुच्छेद 25(2)(b) में है, यानी संसद इस पर कानून बना सकती है।

दरअसल, धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव के मुद्दे पर जारी इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला के अलावा मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला का खतना और दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थलों में जाने का अधिकार मिले या नहीं, कोर्ट इस पर भी फैसला करेगा।

सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े ये सवाल पिछले 26 साल से देश की अलग-अलग अदालतों में पेंडिंग हैं। सुप्रीम कोर्ट में आज से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई होगी।

सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।

9 जजों की बेंच के सामने सुनवाई के 5 मुद्दे

1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं। इस फैसले के खिलाफ मंदिर के पुजारी और कुछ संस्थाओं ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की हैं।

2. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना के मुद्दे पर 2017 में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?

3. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है?

4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है, जो तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है।

5. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है?


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हनुमान जयंती पर शोभायात्रा को लेकर हाई अलर्ट, उत्तम नगर में भारी पुलिस फोर्स तैनात; चप्पे-चप्पे पर कड़ा पहरा

राजधानी दिल्ली के जहांगीरपुरी में कुछ ही समय में हनुमान जयंती के अवसर पर शोभायात्रा निकालने वाली है। इसी के मद्देनजर जहांगीरपुरी और उत्तम नगर में पुलिस-प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था के कड़े इंतजाम कर रखे हैं।

बता दें कि उत्तम नगर में बीते 4 मार्च को एक 26 वर्षीय युवक की हत्या कर दी गई थी। होली पर हुए इस हत्याकांड लेकर तभी से इलाके में तनाव जैसा माहौल बना हुआ है। इसी के चलते पुलिस ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं।

शोभायात्रा के निकलने से पहले ही जहांगीरपुरी में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। पूरे इलाके में चप्पे-चप्पे पर पुलिस पहरा है।

कॉलोनी के निवासियों ने इस तनावपूर्ण स्थिति के लिए बाहरी तत्वों को जिम्मेदार ठहराया है। स्थानीय लोगों का तर्क है कि यहां रहने वाले लोग आपसी सद्भाव के साथ रहना चाहते हैं, लेकिन बाहर से आए कुछ लोग भड़काऊ बयानबाजी कर माहौल को जानबूझकर तनावपूर्ण बना रहे हैं। क्षेत्रवासियों ने प्रशासन से मांग की है कि ऐसे बाहरी लोगों पर नकेल कसी जाए जो शांति भंग करने की कोशिश कर रहे हैं।

हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई

घटना के बाद उपद्रव की आशंका को देखते हुए पुलिस ने लगभग 100 लोगों को हिरासत में लिया था। हालिया जानकारी के अनुसार, पुलिस ने इन लोगों को सीधे रिहा करने के बजाय रणनीति के तहत नरेला, जाफरपुर और बवाना जैसे दूरदराज के इलाकों में ले जाकर शाम के समय छोड़ दिया। इस कदम को पुलिस की एक एहतियाती कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है ताकि मुख्य प्रभावित क्षेत्र में भीड़ जमा न हो सके।


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शीतला माता मंदिर में भगदड़, 9 श्रद्धालुओं की जान गई

नालंदा जिले में मंगलवार सुबह शीतला अष्टमी के अवसर पर शीतला माता मंदिर में भीषण भगदड़ मच गई, जिसमें 9 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में 8 महिलाएं शामिल हैं, जिनकी भीड़ में दबने से मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक पुरुष ने इलाज के दौरान अस्पताल में दम तोड़ दिया। 

बाकी घायलों को इलाज के लिए मॉडल अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हादसे (Nalanda Stampede) के बाद मंदिर परिसर और अस्पताल में अफरा-तफरी का माहौल रहा।

प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए मंदिर और मेला को बंद करा दिया है तथा स्थिति को नियंत्रण में लाने के प्रयास जारी हैं। इस हादसे को लेकर केंद्र और राज्य सरकार की ओर मृतकों के परिजनों के लिए कुल 8 लाख रुपये मुआवजे का एलान किया है। वहीं, घायलों के लिए केंद्र सरकार ने 50 हजार रुपये की सहायता देने की घोषणा की। जबकि राज्य सरकार ने घायलों का पूरा इलाज कराने की घोषणा की है। 

एक-दूसरे के ऊपर गिर गए श्रद्धालु

घटना उस समय हुई जब चैत्र माह के आखिरी मंगलवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचे थे। मौके पर मेला भी लगा था, जिससे भीड़ और बढ़ गई थी।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, भीड़ को नियंत्रित करने के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। दर्शन की जल्दी में धक्का-मुक्की शुरू हो गई और अफरातफरी के बीच कई लोग भीड़ में दब गए।

 हादसे में कई श्रद्धालु घायल भी हुए हैं, जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घटना के बाद प्रशासन ने मंदिर और मेला दोनों को बंद करवा दिया है।

दो मृतकों की हुई पहचान

मृतकों में से अब तक दो की पहचान हुई है। सकुन्त बिहार निवासी दिनेश रजक की पत्नी रीता देवी (50) और नूरसराय के मथुरापुर निवासी कमलेश प्रसाद की पत्नी रेखा देवी (45)। अन्य मृतकों की पहचान की प्रक्रिया जारी है।

रेखा देवी के पुत्र ने बताया कि उनकी मां मेला देखने गई थीं। “हजारों की भीड़ थी। सूचना मिलने पर हम पहुंचे और अस्पताल लाए, लेकिन तब तक उनकी मौत हो चुकी थी।”

भीड़ के कारण मची भगदड़

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शीतलाष्टमी के अवसर पर सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी हुई थी। मंगला मेला के कारण भीड़ और बढ़ गई थी। इसी दौरान अचानक अफरा-तफरी मच गई और लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे, जिससे भगदड़ की स्थिति बन गई।

मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री ने किया मुआवजे का एलान

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शीतला मंदिर हादसे पर शोक जताया और मृतकों के लिए मुआवजे की घोषणा की। मृतकों को राज्य आपदा प्रबंधन विभाग से 4 लाख रुपये और मुख्यमंत्री राहत कोष से 2 लाख रुपये (कुल 6 लाख रुपये प्रति व्यक्ति) की सहायता राशि देने की घोषणा की है।

वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी घटना पर शोक जताया और केंद्र सरकार की ओर से मृतकों के परिजनों के लिए 2 लाख और घायलों को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का एलान किया है। 

प्रधानमंत्री ने कहा कि यह घटना बेहद दुखद है। उन्होंने घटना पर दुख जताया और घायलों के जल्द स्वस्थ्य होने की कामना की है। इस तरह केंद्र और राज्य को मिलाकर मृतकों के लिए कुल 8 लाख रुपये और घायलों के लिए 50 रुपये मुआवजे की घोषणा की है  

हर साल उमड़ती है भारी भीड़

मघड़ा स्थित यह मंदिर बिहारशरीफ से करीब 5 किलोमीटर दूर है। शीतला अष्टमी पर यहां विशेष पूजा होती है। परंपरा के अनुसार इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले बना ठंडा भोजन माता को भोग लगाया जाता है। इसी कारण हर वर्ष यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

लापरवाही पर उठे सवाल

हादसे के बाद प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इतनी बड़ी भीड़ के बावजूद पर्याप्त सुरक्षा बल और भीड़ नियंत्रण के इंतजाम नहीं किए गए थे।

बताया जा रहा है कि नालंदा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति के कार्यक्रम को लेकर जिले के अधिकांश पुलिस बल की तैनाती अन्य जगहों पर थी।

जांच में जुटा प्रशासन

प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि हादसे के कारणों का पता लगाया जा रहा है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।


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धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में सार्वजनिक अवकाश की मांग शामिल नहीं', सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की मांग पर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में किसी धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग करने का अधिकार शामिल नहीं है। सार्वजनिक अवकाश घोषित करना सरकार का नीतिगत निर्णय है।

कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि विकासशील राष्ट्र के तौर पर भारत को उत्पादकता और काम की निरंतरता को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने गुरु गोविंद सिंह की जयंती (प्रकाश पर्व) को पूरे देश में सार्वजनिक अवकाश (राजपत्रित अवकाश) घोषित करने की मांग खारिज कर दी।

इतना ही नहीं शीर्ष अदालत ने कहा कि सिख धर्म के सिद्धांत स्मरण, ईमानदार श्रम और नि:स्वार्थ सेवा पर विशेष बल देते हैं। गुरु गोविंद सिंह जी का जीवन साहस, अनुशासन और कर्तव्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का उदाहरण है। गुरु गोविंद सिंह जी के प्रति अगाध सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करते हुए कोर्ट ने कहा कि उनका जीवन न्याय और सांसारिक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए एक अथक संघर्ष था।

इस परिप्रेक्ष्य में, उनकी विरासत का सम्मान करने का सबसे उत्तम तरीका शायद यह है कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन किया जाए, न कि केवल श्रद्धा की मांग करके सम्मान का कोई प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया जाए।

कोर्ट ने खारिज की याचिका

ये फैसला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा की याचिका याचिका खारिज करते हुए दिया। कोर्ट ने कहा कि रिट याचिका के पीछे की भावना सम्माननीय है परंतु यह अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल रिट में न्यायिक हस्तक्षेप का न्यायोचित आधार नहीं बनती। याचिका में दसवें सिखगुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के प्रकाश पर्व को पूरे देश में राजपत्रित अवकाश घोषित करने की मांग की गई थी।

सार्वजनिक अवकाश घोषित करना कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में- कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक अवकाश घोषित करना पूरी तरह से कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसमें न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं है। पीठ ने अनुच्छेद 25 में मिली धार्मिक स्वतंत्रता की दलील ठुकराते हुए कहा कि जहां एक ओर धर्म की स्वतंत्रता हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देती है, वहीं दूसरी ओर यह किसी धार्मिक अवसर को पूरे देश में अनिवार्य सार्वजनिक अवकाश के रूप में राज्य से मान्यता दिलाने के अधिकार तक विस्तारित नहीं होती।

कोर्ट ने कहा कि भारत की संघीय संरचना राज्यों को भिन्न निर्णय लेने की अनुमति देती है। राज्यों द्वारा पेश सामग्री ये दर्शाती है कि सार्वजनिक अवकाशों का निर्धारण स्थानीय आवश्यकताओं और सामाजिक सांस्कृतिक कारकों पर आधारित होता है। कोर्ट ने कहा कि ये काम कार्यपालिका के विवेक पर छोड़ना उचित है। अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तर्कसंगत भिन्नता को स्वीकारता है।

भिन्नता को भेद भाव नहीं माना जा सकता- कोर्ट

कोर्ट ने यह भी माना कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में पहले से ही अनेक धार्मिक अवसरों पर अवकाश दिए जाते हैं। अलग-अलग राज्यों में स्थानीय परिस्थितियों और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुसार छुट्टियां निर्धारित की जाती हैं, जो संघीय ढांचे का हिस्सा है। इसलिए इसमें भिन्नता को भेद भाव नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि मांगी गई राहत देने से अलग-अलग समूहों से इसी तरह की मांगों की बाढ़ आ सकती है। नतीजन सार्वजनिक अवकाशों का अव्यवहारिक विस्तार होगा और शासन व प्रशासनिक कामकाज पर बुरा असर पड़ेगा।


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Jagannath Temple में 48 साल बाद रत्नों की गिनती शुरू

Jagannath Temple के रत्न भंडार में रखे खजाने की गिनती और सूची बनाने की प्रक्रिया 48 साल बाद शुरू हो गई है। यह ‘रत्न भंडार’ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के कीमती आभूषणों का भंडार है। मंदिर प्रशासन के अनुसार यह कार्य तय शुभ मुहूर्त (दोपहर 12:09 से 1:45 बजे के बीच) में शुरू किया गया और इसमें केवल अधिकृत लोगों को ही प्रवेश की अनुमति दी गई।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मंदिर की दैनिक पूजा-पाठ पर कोई असर नहीं पड़ेगा। श्रद्धालु बाहरी बैरिकेड से दर्शन कर सकेंगे, जबकि अंदरूनी हिस्से में फिलहाल प्रवेश बंद रखा गया है। तय नियमों के अनुसार सबसे पहले रोजाना उपयोग होने वाले गहनों की गिनती होगी, इसके बाद बाहरी कक्ष और अंत में भीतरी कक्ष को खोला जाएगा।

इससे पहले 1978 में हुई गिनती में बड़ी मात्रा में सोना, चांदी और रत्न दर्ज किए गए थे। इस बार आधुनिक तकनीक की मदद से हर वस्तु की पहचान की जा रही है और उसकी डिजिटल फोटो भी ली जा रही है। सोने, चांदी और अन्य वस्तुओं को अलग-अलग रंग के कपड़ों में लपेटकर विशेष बक्सों में सुरक्षित रखा जा रहा है। इस प्रक्रिया में मंदिर सेवक, सरकारी बैंक अधिकारी, रत्न विशेषज्ञ और Reserve Bank of India के प्रतिनिधि भी शामिल हैं।

सुरक्षा के लिहाज से सख्त इंतजाम किए गए हैं। मजिस्ट्रेट रोजाना रत्न भंडार की चाबी लेकर आएंगे और काम खत्म होने के बाद उसी दिन वापस जमा करेंगे। पूरी प्रक्रिया की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी भी की जा रही है ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

गौरतलब है कि 2018 में रत्न भंडार की चाबी गुम होने के कारण इसे खोला नहीं जा सका था, जिसके बाद काफी विवाद हुआ था। बाद में जांच बैठाई गई, लेकिन चाबी का कोई स्पष्ट पता नहीं चल पाया। हाल ही में 2024 में खजाने को बाहर निकालने की प्रक्रिया भी शुरू की गई थी, जिसके बाद अब विस्तृत गिनती और दस्तावेजीकरण का काम किया जा रहा है।


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अनुसूचित जाति का दायरा सीमित: हिंदू, बौद्ध और सिख ही पात्र

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों को ही मिल सकता है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करता है, तो वह यह दर्जा खो देता है और उससे जुड़े कानूनी लाभों का दावा नहीं कर सकता।

जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि ईसाई धर्म अपनाने वाला व्यक्ति SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मिलने वाले संरक्षण का लाभ नहीं ले सकता। यह मामला आंध्र प्रदेश के अनाकापल्ली के चिंथदा आनंद से जुड़ा है, जो पहले अनुसूचित जाति (माला समुदाय) से थे, लेकिन बाद में ईसाई धर्म अपनाकर पादरी बन गए। जांच में यह सामने आया कि धर्म परिवर्तन के बाद उनका SC प्रमाणपत्र रद्द हो चुका था।

अदालत ने यह भी दोहराया कि आरक्षण का लाभ लेने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करना संविधान की भावना के खिलाफ है। साथ ही, यदि कोई व्यक्ति दोबारा हिंदू धर्म में लौटता है, तो उसे SC दर्जा पाने के लिए ठोस प्रमाण और संबंधित समुदाय की स्वीकृति जरूरी होगी।

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार, केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों को ही SC का दर्जा दिया गया है। हालांकि, इस मुद्दे पर बहस जारी है और आंध्र प्रदेश विधानसभा ने 2023 में केंद्र सरकार से ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को भी SC दर्जा देने की मांग की थी।.


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60 साल में पहली बार अल-अक्सा मस्जिद ईद पर बंद

दुनियाभर में ईद का जश्न शुरू हो चुका है। मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच पिछले 22 दिनों से जंग चल रही है। ऐसे में 60 साल में पहली बार इजराइल के यरुशलम में अल-अक्सा मस्जिद को ईद की नमाज के लिए बंद कर दिया गया है।

1967 के अरब-इजराइल युद्ध के बाद पहली बार है, जब अल-अक्सा को पूरी तरह बंद किया गया है। यह मुसलमानों के लिए मक्का और मदीना के बाद तीसरा सबसे पवित्र स्थल है।

ईरान में शुक्रवार को ईद मनाया गया। इस मौके पर बाजार वीरान नजर आए। वहीं कतर, UAE और कुवैत जैसे खाड़ी देशों में आज ईद मनाया जा रहा है। जंग की वजह से इन देशों में खुले मैदानों में नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी गई है।

यरुशलम में आम लोगों की एंट्री बंद

28 फरवरी से अमेरिका और इजराइल के ईरान के खिलाफ शुरू हुए युद्ध के बाद, सुरक्षा कारणों से इजराइली अधिकारियों ने यरुशलम में आम लोगों की एंट्री बंद कर रखी है। सिर्फ वहां रहने वाले लोग या दुकानदार ही अंदर जा सकते हैं।

6 मार्च से वेस्टर्न वॉल, अल-अक्सा मस्जिद और चर्च ऑफ द होली सेपल्कर जैसे सभी धार्मिक स्थल बंद हैं। पूरे देश में भीड़ पर भी पाबंदी है। मस्जिद के अंदर 100 और बाहर 50 लोगों तक ही इकट्ठा होने की अनुमति है।

यरुशलम के पुराने शहर के गेट पर शुक्रवार को ईद-उल-फितर की नमाज के दौरान सैकड़ों मुस्लिम नमाजियों और पुलिस के बीच झड़प हो गई। नमाजी ‘अल्लाहु अकबर’ और कलमा पढ़ते हुए गेट के अंदर जाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने सैकड़ों लोगों को जबरदस्ती हटाया।

ईरान: इजराइली हमले में मारी गई बच्चों को श्रद्धांजलि

ईरान में इस बार ईद उल फितर का त्योहार जंग और तनाव के साये में मनाया गया। रमजान खत्म होने के बाद देशभर में लोगों ने मस्जिदों और धार्मिक स्थलों पर नमाज अदा की।

युद्ध और हमलों के कारण कई जगहों पर जश्न सादगी से मनाया गया। बाजारों में भी रौनक कम रही और कई दुकानें बंद दिखीं।

UAE: ईद के मौके पर चहल-पहल में कमी दिखी

UAE में ईद-उल-फितर के मौके पर शुक्रवार से सोमवार तक 4 दिन की छुट्टी का ऐलान किया गया है। पूरे देश में बाजार, मॉल और सार्वजनिक जगहों पर लाइटिंग और सजावट की गई और लोगों की अच्छी खासी भीड़ देखने को मिली। हालांकि सुरक्षा व्यवस्था पहले से ज्यादा कड़ी कर दी गई है।

ईराक: लोगों ने खामेनेई को याद किया

ईराक में इस बार ईद उल फितर डर और तनाव के माहौल में मनाई जा रही है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर यहां के लोगों की भी जिंदगी पर हुआ है।

बाहर का माहौल पहले जैसा नहीं है। बड़े आयोजन और भीड़-भाड़ वाले जश्न अब कम हो गए हैं। लोग भीड़ से बच रहे हैं और बाहर निकलने में सावधानी बरत रहे हैं।

पहले जहां बच्चे मोहल्लों में घूमकर ईदी इकट्ठा करते थे, अब ऐसे नजारे कम दिखाई दे रहे हैं क्योंकि सुरक्षा चिंता ज्यादा है।

लेबनान: शेल्टर के पास घूमते दिखे लोग

लेबनान में ईद के मौके पर अलग-अलग माहौल है। उत्तरी लेबनान में जहां एक तरफ लोग ईद-उल-फितर की तैयारी कर रहे हैं, वहीं दक्षिण लेबनान में हजारों शरणार्थी अपने घरों से दूर रहकर ईद मना रहे हैं।

इजराइल ने ईरान पर हमला करने के बाद लेबनान के दक्षिणी शहरों में भी हमले तेज कर दिए हैं। अब तक यहां पर 1000 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।

ईद पर पाक-अफगान युद्ध 4 दिन के लिए रुका

पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने ईद-उल-फितर के अवसर पर जंग में अस्थायी विराम की घोषणा की। जंग को 5 दिनों के लिए रोक दिया गया है। यह कदम सऊदी अरब, तुर्किए और कतर की अपीलों के बाद उठाया गया है।

सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार नेप कहा कि यह सीजफायर 18/19 मार्च की रात से 23/24 मार्च की रात तक लागू रहेगा। हालांकि, किसी भी सीमा पार हमले, ड्रोन हमले या पाकिस्तान में आतंकवादी घटना होने पर ऑपरेशन तुरंत फिर से शुरू कर दिया जाएगा।

ईद पर विशेष उड़ानें

जानकारी के मुताबिक एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और ओमान के लिए नियमित और विशेष उड़ानें संचालित करेंगी।

एयरलाइनों के मुताबिक, कुछ उड़ानें फिलहाल अस्थायी रूप से बंद हैं, लेकिन यात्रियों की सुविधा के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही है।

दोनों एयरलाइनों ने यह भी बताया कि जेद्दा (सऊदी अरब) और मस्कट (ओमान) के लिए नियमित उड़ानें जारी रहेंगी। इसमें भारत और जेद्दा के बीच करीब 16 उड़ानें शामिल हैं।

एयरलाइनों का कहना है कि हालात को देखते हुए आगे की योजना में जरूरत के अनुसार बदलाव किया जा सकता है।


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देशभर में नवरात्रि उत्सव: देवी मंदिरों में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

देशभर में नवरात्रि का उत्सव मनाया जा रहा है। जम्मू-कश्मीर के कटरा में बारिश के बीच भक्त दर्शन करने पहुंचे। वहीं यूपी में भी बड़े मंदिरों में भीड़ नजर आ रही है।

उधर महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा उत्सव मनाया जा रहा है। नागपुर में सीएम देवेंद्र फडणवीस भी हिंदू नव वर्ष के कार्यक्रम में शामिल हुए। उधर पीएम ने देशवासियों को नवरात्रि और नव वर्ष पर 9 अलग-अलग तरह से पोस्ट कर बधाई दी।


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केदारनाथ रावल उत्तराधिकारी विवाद: मंदिर समिति और परंपराओं पर उठे सवाल

केदारनाथ रावल भीमाशंकर लिंग की ओर से परंपरा के विपरीत नांदेड़ में अपना उत्तराधिकारी घोषित कर उसका पट्टाभिषेक किया जाना और इस समारोह में बाबा केदार की रूप छड़ी की मौजूदगी ने रावल की भूमिका पर तो सवाल खड़े किए ही हैं, मंदिर समिति को भी कटघरे में ला दिया है।

बड़ा सवाल यह है कि मंदिर समिति के कर्मचारी बिना बोर्ड की मंजूरी के किसकी अनुमति से रूप छड़ी नांदेड़ ले गए।

हालांकि, इस संबंध में मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कड़ा रुख अपनाया है और प्रकरण से धर्मस्व मंत्री के साथ मुख्यमंत्री को भी अवगत कराया गया है।

परंपरा के अनुसार रावल का पद रिक्त होने की स्थिति में ही केदारनाथ धाम के नये रावल की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की जाती है और इसमें हक-हकूकधारी व दस्तूरदार अहम भूमिका निभाते हैं।

इसी आधार पर आठ सितंबर 2000 को रावल के पद पर भीमाशंकर लिंग का पट्टाभिषेक किया गया था। दरअसल, 21 सितंबर 1990 को तत्कालीन रावल सिद्धेश्वर लिंग ने गिरते स्वास्थ्य का हवाला देते हुए एक चेला दीक्षित करने की अनुमति मांगी थी।

हालांकि, उन्होंने त्यागपत्र वर्ष 2000 में दिया। इसके बाद रावल पद के लिए समाचार पत्रों में विज्ञापन जारी किया गया और तीन अभ्यर्थी चयन समिति के समक्ष उपस्थित हुए।

उनमें से सिद्धेश्वर लिंग के दीक्षित शिष्य भीमाशंकर लिंग को पद के लिए उपयुक्त पाया गया। जबकि, अब रावल भीमाशंकर लिंग ने परंपराओं को दरकिनार कर न केवल अपने उत्तराधिकारी का चयन कर दिया, बल्कि उसका पट्टाभिषेक भी कर दिया गया।

विवादों में हिमवंत केदार वैराग्य पीठ

अभिलेखों में उल्लेख है कि मंदिर समिति की भूमि पर ‘हिमवंत केदार वैराग्य पीठ’ का निर्माण किया गया है, जिस पर मंदिर समिति ने आपत्ति जताई है।

इस पीठ का उल्लेख शीतकालीन पूजा स्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ के स्थान पर भी हुआ है।

इसके अलावा फरवरी 2026 में एक निजी कार्यक्रम के दौरान रावल भीमाशंकर लिंग की ओर से अपने शिष्य केदार लिंग को अगला रावल घोषित किए जाने का मामला भी सामने आया था।

इसे मंदिर अधिनियम के प्रविधानों के विपरीत बताते हुए मंदिर समिति ने नोटिस जारी कर रावल से स्पष्टीकरण मांगा है।

ईश्वर लिंग प्रकरण

ईश्वर लिंग की नियुक्ति वर्ष 2016 में स्वयं रावल की संस्तुति पर ‘वीरेश्वर पुजारी’ के रूप में हुई थी। बताया गया कि सात जुलाई 2024 को रावल ने समिति को पत्र लिखकर ईश्वर लिंग को हटाने और उनकी जगह शांत लिंग को नियुक्त करने का प्रस्ताव भेजा, जिसे विवादास्पद माना गया।

मंदिर समिति ने पाया कि ईश्वर लिंग ने कोविडकाल में भी निष्ठापूर्वक सेवाएं दी और वे वीर शैव जंगम परंपरा सहित सभी पारंपरिक योग्यताओं को पूरा करते हैं।

इसी कड़ी में बीते 10 मार्च को आयोजित बोर्ड बैठक में समिति ने रावल के विरोध को दरकिनार करते हुए ईश्वर लिंग को रिक्त पुजारी पद पर स्थायी नियुक्ति प्रदान करने का संकल्प पारित किया।

ऐसे नियुक्त होता है नया रावल

रावल की मृत्यु अथवा स्वास्थ्य खराब होने की दशा में त्यागपत्र देने पर मंदिर समिति की ओर से चयन प्रक्रिया शुरू की जाती है।

इसके लिए चयन समिति (जिसमें समिति के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मुख्य कार्याधिकारी और अन्य सदस्य शामिल होते हैं) उम्मीदवारों का परीक्षण करती है।

रावल के लिए पात्रता: वीरशैव जंगम परंपरा का होना, धार्मिक दीक्षा (दीक्षित चेला), शैव परंपराओं और पूजा-पद्धति का ज्ञान और ब्रह्मचर्य एवं धार्मिक आचार का पालन। चयन के बाद मंदिर समिति की स्वीकृति से रावल की औपचारिक नियुक्ति की जाती है।

चयन प्रक्रिया: समाचार पत्रों मे विज्ञप्ति जारी की जाती है, दक्षिण भारत के स्थानीय समाचार पत्रों में भी यह विज्ञप्ति प्रकाशित कर आवेदन मांगे जाते हैं।

नियुक्ति की प्रक्रिया: श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर अधिनियम 1939 (संशोधित) के प्रविधानों के अनुसार संपन्न होती है। इस अधिनियम के तहत मंदिर के प्रशासन और नियुक्तियों का अधिकार मंदिर समिति को प्राप्त है।


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क्यों मिलती है मंदिर जाने से अद्भुत शांति? जानिए क्या है इसके पीछे वैज्ञानिक, वास्तुकला एवं आध्यात्मिक रहस्य ?

उपभोक्ता जनघोष:जब कभी जीवन में कुछ समझ नहीं आता और संघर्षों से मन हारता जाता है तो कदम खुद ब खुद मंदिर की ओर चल पड़ते हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि परेशानियों के झंझट में लड़खड़ाता मन मंदिर में जाकर क्यों स्थिर हो जाता है।  

आइए जानते है कुछ मुख्य बिंदु  

सबसे पहले दर्शन और पूजन का वैज्ञानिक स्वरूप बताया। उन्होंने कहा कि हमारे देश में प्राचीन मंदिर धरती के धनात्मक यानी पॉजिटिव ऊर्जा केंद्रों पर बनाये गए हैं। ये मंदिर आकाशीय ऊर्जा के ग्रिड हैं। भक्त मंदिर में नंगे पैर होता है। इससे उसके शरीर में अर्थ प्रवाहित होने लगता है। जब हाथ जोड़ता है तो शरीर का ऊर्जा चक्र चलने लगता है। देव प्रतिमा के आगे सिर झुकाता है तो प्रतिमा से परावर्तित होने वाली पृथ्वी व आकाशीय तरंगे मस्तक पर पड़ती हैं और मस्तक पर स्थित आज्ञा चक्र पर प्रभाव डालती है। जिससे सकरात्मक विचार आते हैं। भक्त अपने अंदर एक विशेष ऊर्जा और हल्केपन तथा शांति का अनुभव करने लगता है।।

मंदिर के शिखर का भी विशेष महत्व होता है। मंदिर के शिखर की भीतरी सतह से ऊर्जा ध्वनी एवं तरंगें टकरा कर  मनुष्य को प्रभावित करती हैं। ये परावर्तित तरंगें मानव तन की प्राकृतिक आवृति बनाये रखने में भी सहायक सिद्ध होती है।  ध्वनि, प्रकाश, वायु आदि सभी मे तरंगें होती हैं। कोई भी तरंग सीधी रेखा में नही चलती सभी की अपनी आवृति होती है। विस्फोट होता है। ये जितनी अधिक शक्तिशाली होगी उसका उतना ही अधिक क्रिया क्षमता पर असर पड़ेगा। मन्दिरों में शंख, घण्टे और मन्त्रों की ध्वनि में एक विशेष आवृति बनती है। वह दैवीय ऊर्जा होती है जो हमें मानसिक शारीरिक और आत्मिक रूप से दृढ़ बनाती है।

वही देखा जाये तो हमारे देश में मंदिरों के गुंबद पिरामिड के आकार जैसे होते हैं। जो कास्मिक ऊर्जा के संपर्क में रहते हैं। प्रतिमा का सीधा संबंध उस ऊर्जा से सदा बना रहता है। जब भक्त प्रतिमा के समक्ष जाता है तो उसका ब्रेन कास्मिक वेव के संपर्क में आ जाता है और ब्रेन यानी मस्तिक के न्यूरॉन्स विशेष प्रकार से सक्रिय होने लगते हैं। उस समय भक्त प्रतिमा के सामने जो भी प्रार्थना करता है उसका फल उसे अवश्य मिलता है। प्रार्थना जितनी गहन होगी उतनी ही जल्दी फलित भी होती है।

वही अगर मंदिर के द्वार की बात करे तो   मंदिर और गर्भ गृह का द्वार बड़ा नहीं होना चाहिए । बस एक ही भक्त एक बार मे प्रवेश कर सके, इस शिल्प से द्वार इसीलिए  बनाये जाते थे जिससे  कास्मिक ऊर्जा का संतुलन बना रहे। उसी प्रकार मंदिर की चौखट का महत्व है। मंदिर का चौखट सामान्य चौखट से ऊंची और चौड़ी होती है। यह पत्थर, लकड़ी आदि की होती है उस पर सोने, चांदी, पीतल आदि से कवर किया जाता है इसलिए कि मंदिर की दिव्य ऊर्जा बाहर विकीर्ण न हो सके। मंदिर की ऊर्जा मंदिर के अंदर ही रहे। इसके पीछे आध्यात्मिक रहस्य भी है। चौखट पर भगवान नर सिंह का वास माना जाता है इसलिए उसे स्पर्श कर सिर पर लगाना या सिर से स्पर्श करना चाहिए। मंदिर में प्रवेश करते समय पैर चौखट से स्पर्श न हो। मंदिर की चौखट लाल या पीले रंग से रंगी जाती है। उसके दोनों तरफ तीन रंग की धारियां होती है। लाल पीला और सफेद यह सत्व रज और तम का प्रतीक हैं।


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